भारत में सहज शारीरिक निकटता परिवारों को मजबूत बनाती हैं-18 जनवरी 2011

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कल मैंने बताया था कि अगर आप किसी के साथ शारीरिक रूप से नजदीक आते हैं तो उसके साथ आप बेहतर भावनात्मक रिश्ता भी कायम कर सकते हैं। मैंने देखा है कि भारत और पश्चिमी देशों के बीच इस तरह के रिश्तों को लेकर बहुत भिन्नता पाई जाती है।

एक बार, बहुत साल पहले, एक पश्चिमी मित्र यहाँ आया। मुझे और मेरी बहन को, जो अब इस दुनिया में नहीं है, एक साथ खेलते और गले लिपटते देखकर वह दंग रह गया और उसने कहा, ‘अगर ऐसा मैं अपनी बहन के साथ करूँ तो वह मुझे तुरंत लतिया देगी! हम कभी भी एक दूसरे का हाथ नहीं थामते या एक दूसरे के इतना नजदीक नहीं बैठते। इतनी शारीरिक निकटता हम लोगों की कभी नहीं रही और ऐसी निकटता हम अपनी गर्ल-फ्रेंड के साथ ही रख सकते हैं।’ अब अगर आप किसी चीज़ को देखने के आदी नहीं हैं तो वह आपको हास्यास्पद लगेगा ही। भाई-बहन की हमारी नजदीकी भी उन्हें वैसी ही हास्यास्पद लगी तो उसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

भारत आने वाले यात्रियों को कई बार यह गलतफहमी हो जाती है कि यहाँ बड़ी तादाद में समलैंगिक पाए जाते हैं। वे उन्हें हाथ में हाथ डाले घूमते हुए देखते हैं। पश्चिमी देशों में इस तरह घूमने वालों को समलैंगिक ही समझा जाता है। वहाँ इस तरह घूमते लोग बहुत कम नज़र आएंगे। लेकिन भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है। यशेंदु और उसके मित्र अक्सर इसी तरह सटकर बैठते हैं, एक-दूसरे के कंधों पर बाँहों का घेरा डाले धीमी आवाज़ में बात करते हुए जिसे दिखकर कोई विदेशी यह सोच सकता है कि वे समलैंगिक जोड़ा हैं और आपस में फुसफुसाते हुए प्रेम-निवेदन कर रहे हैं। जब टूरिस्ट यहाँ कुछ समय गुज़ार लेता है तभी वह समझ पाता है कि भारत में पुरुष आपस में शारीरिक नजदीकी के साथ सामान्य मित्रता रख सकते हैं। यह बहुत आम दृश्य होता है।

मैं भारतीय संस्कृति की इस विशेषता की बहुत कद्र करता हूँ। परिवार के सारे सदस्य अक्सर एक ही कमरे में सोते हैं। मेरा मतलब सिर्फ उन लोगों से नहीं है जो बड़ा घर लेने में असमर्थ हैं और जिनके पास एक ही कमरा होता है जहां वे रहते हैं, खाना बनाते हैं, भोजन करते हैं और सोते हैं। नहीं। जो लोग ज़्यादा कमरों वाला घर ले सकते हैं वे भी ऐसा करते हैं। अपने बचपन में हम लोग जिस घर में रहते थे उसमें 4 सोने के कमरे थे लेकिन इसके बावजूद हम छह लोग, मेरे माता-पिता, मेरी बहन और हम तीन भाई, सभी एक ही कमरे में सोते थे। एक परिवार, एक साथ, एक घर में रहता है और उनके बीच हमेशा शारीरिक निकटता होती है। इसके जरिये, स्वाभाविक ही भावनात्मक संबंध भी मजबूत हो जाते हैं।

मैंने ऐसे प्रकरण दोनों संस्कृतियों में देखे हैं जहां शारीरिक निकटता की कमी के चलते भावनात्मक संबंध नहीं बन पाए और परिवार के सदस्यों के बीच लड़ाई-झगड़े और कई समस्याएं पैदा हो गईं। और विशेषकर पश्चिमी समाज के बारे में मैं महसूस करता हूँ कि उनके यहाँ सभी शारीरिक अलगाव के लिए बाकायदा प्रशिक्षित किए जाते हैं।

यह बिल्कुल बचपन से शुरू हो जाता है, जब फ्लॅट या घर में बच्चे अपना अलग कमरा पाते हैं। जब वे ज़बान से एक शब्द भी नहीं बोल पाते, अलग सोने लगते हैं! अगर किसी बच्चे को एक खास उम्र के बाद अपना अलग कमरा नहीं मिल पाता तो यह बड़ी असामान्य बात मानी जाती है। उस परिवार पर आपको तरस आता है जो अपने छोटे बच्चों के लिए अलग कमरे का इंतज़ाम नहीं कर पाते और उन्हें माँ-बाप के सोने के कमरे में सुलाते हैं। वास्तव में आप सोचते हैं कि बच्चों के लिए यह अच्छा है कि वे अलग सोएँ। मेरे लिए तो यह एक अजीब बात है सिर्फ इसलिए कि मेरी संस्कृति में एक परिवार बच्चों के वयस्क हो जाने के बाद भी एक कमरे में साथ-साथ सो सकता है।

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