जब मैं पारंपरिक विवाह समारोह में शिरकत करता हूँ तो क्या मैं दहेज प्रथा का समर्थन करता हूँ? 25 दिसंबर 2014

कल मैंने कुछ परिस्थितियों का वर्णन किया था, जिसमें मैंने कहा था कि यदि अस्पृश्यता और दहेज प्रथा जैसी हानिकारक और पूरी तरह अन्यायपूर्ण परम्पराओं का पालन न करने की बात हो तो हमें अपने आधुनिक विचारों पर अडिग रहना चाहिए। एक भारतीय ने कुछ दिन पहले मुझसे कहा कि वह भी पेशोपेश में है कि क्या उसकी परिस्थिति भी उसी श्रेणी में आती है। उसका मित्र विवाह कर रहा था और वह जानता था कि मित्र के विवाह में दहेज लिया जाएगा, जिसका वह दृढ़ता पूर्वक विरोध करता था। अब वह पेशोपेश में था कि क्या उसे अपने मित्र के विवाह में शामिल होना चाहिए या नहीं यानी क्या वह वहाँ जाकर दहेज प्रथा का समर्थन कर रहा होगा!

जब इस तरह के मामले सामने आते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि मैं बहुत सख्त हूँ। और वास्तव में मैं अपने शब्दों का शब्दशः पालन करता हूँ और जो लिखता हूँ या कहता हूँ, उस पर पूरा अमल करता हूँ। लेकिन साथ ही मैं इन दो स्थितियों में अंतर कर सकता हूँ कि कब अपने विश्वास या अविश्वास को सबके सामने रखना चाहिए और कब उनसे मुझे एक मित्र की तरह मिलना चाहिए क्योंकि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं।

मेरे विचार में यहाँ भी वही मामला है। अगर वह आपका घनिष्ठ मित्र है तो शायद आपने अपना मंतव्य ज़ाहिर कर दिया है। अगर वह आपका करीबी रिश्तेदार है और आपको इस मामले में उससे कुछ कहना है तो मैं कहूँगा कि आपको दहेज के इंतज़ाम या उसके ‘लेन-देन’ को रोकने के लिए, जो भी आपसे बन पड़े, करना ही चाहिए।

आप कितना भी करीबी रूप से दूल्हा या दुल्हन से जुड़े हों, दहेज के मुद्दे पर आपके विवाह समारोह में न जाने पर विवाह नहीं रुकने वाला। अगर आप रिश्तेदार नहीं हैं, करीबी मित्र भी नहीं हैं तो फिर आपको समारोह में बुलाने वाले इसका बुरा नहीं मानेंगे बल्कि हो सकता है आपके न आने को नोटिस तक न लें और तब आपका विरोध अलक्षित रह जाएगा। अगर आप करीबी रिश्तेदार या मित्र हैं तो आपके न आने पर वे विचलित होंगे और उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी और आप उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे होंगे।

आपका यह व्यवहार आपके आपसी रिश्तों को तो नुकसान पहुँचाएगा मगर आपके मित्रों या रिश्तेदारों को अपनी दकियानूसी और नुकसानदेह परंपराओं का पालन करने से नहीं रोक पाएगा। जब आप उनके सामने अपने विचार रखकर कुछ नहीं कर पाए तो ऐसा करके भी कुछ हासिल नहीं कर पाएँगे।

और यहाँ मैं आपसे यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है: आपका अहं, जोकि उनके द्वारा आपके विचारों का अनुपालन न करने के कारण आहत हुआ है या उनके प्रति आपका स्नेह? आपका विश्वास या आपकी मित्रता?

मेरे विचार से विवाह में आपका सम्मिलित होना उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण, उनके लिए सबसे सुखद और आत्मीय अवसर पर आपका उनके साथ रहना है! उनके प्रेम में सहभागी होने के लिए आप एक शाम इस बात को भुलाकर कि उनके विचार आपसे नहीं मिलते या वे दक़ियानूसी और नुकसानदेह हैं, उनके साथ मिलकर सिर्फ अवसर का आनंद उठाएँ!

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आपको पूरे समय वहाँ बैठकर सारे कर्मकांडों में उपस्थित रहना है, अगर आप उस अवसर के धार्मिक अंशों के विरुद्ध हैं तो उनसे दूर रहिए! यह आवश्यक नहीं है और यदि वे आपका नज़रिया जानते हैं तो कोई भी इस बात से परेशान नहीं होगा कि आप विवाह समारोह के उस हिस्से में अनुपस्थित रहे। लेकिन पार्टी में वे आपको अवश्य ही मिस करेंगे-और निश्चय ही आप भी उन्हें मिस करेंगे!

तो ऐसे सवालों से अपने आपको परेशान करने की ज़रूरत नहीं है, जो आपकी दिली इच्छा हो वही कीजिए और अपने परिवार और दोस्तों के साथ खुला व्यवहार कीजिए! जीवन का आनंद लीजिए-उसे बहुत ज़्यादा जटिल मत बनाइए!

और उसी जज़्बे के साथ, भले ही मेरा क्रिसमस से या उसकी परम्पराओं से या उसके महत्व से कोई लेना-देना नहीं है, मैं अपने पाठकों और मित्रों के लिए, जिन्होंने कल या आज क्रिसमस मनाया या कल मनाएँगे, क्रिसमस की शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ कि उनके जीवन में सदा सुख-शांति बनी रहे! अपनी छुट्टियाँ और त्योहार मनाते रहें, परिवार वालों को खूब गले लगाएँ और ज़्यादा खाना न खाएँ भले ही वह कितना भी सुस्वादु क्यों न हो!

एक गरीब भारतीय व्यक्ति के लिए बेटी के विवाह का क्या अर्थ होता है – हमारे स्कूल के बच्चे-15 नवंबर 2013

मैं आज आपको दीपक और कैलाश से मिलवाना चाहता हूँ। दीपक दस साल का है और हमारे स्कूल की पहली कक्षा में पढ़ता है। कैलाश चौदह साल का है और चौथी में है। हमारे सभी बच्चों की तरह वे भी गरीब परिवारों से आते हैं। दूसरे लोगों की तरह, उस परिवार की भी सबसे बड़ी चिंता पैसे की किल्लत है। पैसा ही उनकी बड़ी बहन का भविष्य तय करेगा।

उनका पिता साधारण मजदूर है और लगभग चार डालर रोज़ यानी लगभग 250 रुपए रोज़ कमाता है। जब उसे माह भर लगातार काम मिलता रहता है तो वह इतना कमा लेता है कि परिवार का खर्च किसी तरह चल सके लेकिन मजदूरी का काम अनिश्चित और अस्थिर होता है। आज आप एक काम कर रहे हैं मगर हो सकता है कल पैसा कमाने के लिए आपको किसी दूसरी जगह, किसी दूसरे काम की तलाश में निकालना पड़े। इसीलिए कैलाश की माँ भी काम करती है। वह एक स्कूल में सफाई के साथ-साथ दूसरे छोटे-मोटे काम करती है। कक्षाएँ शुरू होने से पहले और उनके समाप्त होने के बाद रोज़ वह कमरे साफ करती है और जब स्कूल चालू रहता है तब शिक्षकों को पानी पिलाने का, छोटे बच्चों को पेशाब कराने का और यहाँ से वहाँ संदेश लाने-ले जाने का काम करती है। माह के उन दिनों में, जब उसके पति के पास काम नहीं होता तब उसकी ज़िम्मेदारी होती है कि वह घर का खर्च चलाए। वह 30 यू एस डालर प्रतिमाह कमाती है जो परिवार का खर्च चलाने में बहुत मददगार साबित होता है।

कुछ समय तक उन्होंने बहुत कोशिश करके प्रति माह कुछ बचत की और राशि को एक बड़े कार्यक्रम के लिए अलग रख छोड़ा: अपनी अठारह वर्षीय सबसे बड़ी बेटी के विवाह के लिए। उनका विचार था कि विवाह के लिए और देर करना ठीक नहीं होगा। कोई शक नहीं कि यह एक आयोजित विवाह (अरेंज्ड विवाह) होगा और परिवार वाले तय करेंगे कि भविष्य में उनका दामाद कौन होगा और उनकी लड़की किस घर में जाएगी। पिछले कई हफ्तों से वे उसके लिए लड़का देख रहे थे और कुछ प्रस्ताव भी उनके पास आए थे लेकिन एक ही समस्या थी, उनके पास पर्याप्त रुपए नहीं थे। आयोजित विवाहों का बाज़ार दूसरे सभी बाज़ारों की तरह ही होता है: अगर आप उत्कृष्ट वस्तु चाहते हैं तो कीमत भी ज़्यादा अदा करनी पड़ती है। एक अच्छे दूल्हे के लिए अच्छा दहेज भी देना पड़ता है! दहेज की प्रथा कानूनन निषिद्ध है मगर जब दूल्हे को जानवरों की तरह खरीदने की यह प्रथा उच्च वर्ग में भी जारी है तो मध्यम और निचला वर्ग क्यों पीछे रहें!

माँ बताती है कि उन्हें अभी हाल ही में एक अच्छे लड़के का प्रस्ताव रुपयों की कमी के चलते अस्वीकार करने पड़ा। लड़का अच्छा था और वे सोचते थे कि उनकी लड़की उस लड़के और उसके परिवार के साथ सुख के साथ रह सकेगी लेकिन लड़के वाले दो लाख रुपये और ऊपर से एक मोटर बाइक की मांग कर रहे थे। सब मिलाकर यह रकम 4000 यू एस डालर या अढ़ाई लाख रुपए होती है। इस गरीब परिवार के लिए यह बहुत बड़ी रकम थी। 3000 डालर या लगभग दो लाख रुपए से ज़्यादा वे इस समारोह पर, जिसमें शादी-हाल का किराया, मेहमानों का प्रीतिभोज और दहेज आदि का खर्च शामिल हैं, खर्च नहीं कर सकते थे।

इसी काम के लिए वे बचत कर रहे थे। वे जानते हैं कि आसपास के लोगों से उन्हें ऋण भी लेना पड़ सकता है लेकिन जहां तक हो सकेगा वे स्वयं सारा खर्च उठाना चाहते हैं। इसी के चलते उनका घर, जो फिलहाल एक कमरा और एक और अर्धनिर्मित कमरा भर है, पूरा नहीं हो पाया। इस दूसरे कमरे पर ऊपर छत नहीं है, दरवाजा लगाया जाना बाकी है और उन्होंने उस हिस्से को एक कंबल से ढँक रखा है।

ऐसी हालत में अगर उन्हें बच्चों के स्कूल की फीस भी देनी पड़े तो उनकी परेशानियाँ और बढ़ जाएंगी। दूसरा उपाय यह हो सकता है कि पढ़ाई का खर्च उठाने की जगह वे बच्चों को स्कूल ही न भेजें, भले ही बच्चे अपढ़ रह जाएँ। अभी वे हमारे स्कूल में मुफ्त शिक्षा पा रहे हैं। इन बच्चों में आप देख सकते हैं कि कैसे दो सगे भाइयों का स्वभाव और चरित्र पूरी तरह अलग हो सकता है! दीपक मेहनत के साथ पढ़ाई करने वाला, एक शांतचित्त लड़का है और परीक्षाओं में उसके अच्छे नंबर आते हैं। दूसरी तरफ कैलाश बिल्कुल विपरीत प्रकृति का लड़का है। वह पढ़ने की कोशिश तो बहुत करता है मगर पिछले साल फेल होते-होते बचा। वह अपनी कक्षा के और बड़ी कक्षाओं के बच्चों के साथ भी लड़ता-झगड़ता रहता है और शिक्षकों को उसे बार-बार चेतावनी देनी पड़ती है कि पढ़ाई के समय बात करना मना है। हो सकता है, यह किशोरावस्था के उन चंचल हार्मोन्स का असर हो या फिर दोनों भाइयों के स्वभाव में यह फर्क जन्मजात ही हो। लेकिन हम कोशिश करेंगे कि उसे भी हम आगे बेहतर ढंग से पढ़ा ले जाएँ और उसे शिक्षा का मजबूत आधार प्राप्त हो सके।

कई प्राचीन परंपराएँ आपके सम्मान की हकदार नहीं हैं! – 13 मई 2013

अपेक्षानुसार, आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) से संबंधित अपनी डायरियों पर मुझे बहुत सी प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुई हैं। इस विषय पर और ऐसे ही दूसरे विषयों पर यह एक टिप्पणी अवश्य होती है: 'आपको अपनी प्राचीन परंपराओं का आदर करना चाहिए न कि उनका अपमान!' मेरा छोटा सा जवाब होता है कि नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा! विस्तृत जवाब चाहिए तो ठीक है; लीजिये, हाजिर है!

आयोजित विवाहों के एक बड़े समर्थक ने यह तर्क पेश किया: 'प्रेम क्या है? अगर आपने कोई कुत्ता पाल रखा है तो साथ रहते रहते उससे भी आप प्रेम करने लगते हैं।' उनका मतलब यह है कि विवाह से पहले प्रेम भी हो, यह आवश्यक नहीं है। आप किसी के साथ भी लंबे समय तक रहें तो परस्पर प्रेम करने लगेंगे। माफ करें, मैं उस परंपरा का कोई सम्मान नहीं कर सकता जो एक पालतू कुत्ते और पत्नी में कोई भेद नहीं करता। यह हमारी भारतीय संस्कृति है, हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित परंपराएँ हैं जो जानवरों की तरह महिलाओं, बेटियों और पत्नियों का सौदा करती हैं। प्रेम महत्वपूर्ण नहीं है, वह साथ रहते-रहते हो ही जाएगा! हो सकता है।

अगर ऐसा ही है तो फिर आजकल संभावित दूल्हे और दुल्हिन को विवाह से पहले आपस में मिलने ही क्यों दिया जाता है? अगर प्रेम हो ही जाना है तो फिर सशरीर किसी को देखने की आवश्यकता ही क्या है? क्या आप वाकई मानते हैं कि प्राचीन परंपरा यही थी? आपके परदादाओं के जमाने में तो विवाह से पहले दूल्हा और दुल्हन एक दूसरे को देखते तक नहीं थे। ऐसे खयाल को तुरंत नामंजूर कर दिया जाता था क्योंकि उसे संस्कृति और परंपरा का अपमान माना जाता था।

अधकचरे आधुनिक लोग मुझसे कहते हैं कि वे मॉडर्न हैं लेकिन फिर भी परंपराओं का सम्मान करते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। आप अपने बच्चों को सलाह देते हैं कि वे प्रेम तो कर सकते हैं मगर अपनी जाति या उपजाति में ही! क्या आप ऐसे आयोजनों में इतने दक्ष हैं कि अपने बच्चों को ठीक-ठीक निर्देश दे सकें कि किससे प्रेम किया जाए? क्या आप वाकई ऐसा मानते हैं कि यह संभव है? आपको मालूम होना चाहिए कि यह आपका भ्रम है अन्यथा आपका दूसरा वाक्य धमकी और अस्वीकार से भरा नहीं हो सकता: 'मैं किसी दूसरी जाति, धर्म या देश की लड़की या लड़के को स्वीकार नहीं कर सकता!'

अगर आप ऐसा करते हैं तो क्या आप वाकई अपनी 'प्राचीन परंपराओं' का निर्वाह कर रहे हैं? प्रकट रूप में आपकी महान संस्कृति बच्चों का अपनी मर्ज़ी से प्रेम करना बर्दाश्त नहीं करती मगर आप यह भी जानते हैं कि आप परिवर्तन को रोक नहीं सकते और इसलिए आप परंपरा की बेड़ियों को थोड़ा ढीला भर कर देते हैं। एक कदम आगे जाकर मैं कहूँगा कि वास्तविकता यह है कि आप स्वयं ही जस का तस अपनी परंपराओं का सम्मान नहीं कर रहे हैं। आप उसमें ढील ही तो दे रहे हैं!

आपकी महान संस्कृति कहती है कि प्रेम करना अपराध है। आप अपनी बेटियों को सीख देते हैं कि अपने साथ पढ़ने वाले लड़कों से बात तक मत करो लेकिन अपेक्षा करते हैं कि वह एक अजनबी के साथ विवाह कर ले और उसके साथ हमबिस्तर होने के लिए मजबूर हो जाए। क्या यह गलत नहीं है?

अगर आप अपने बच्चों के विवाह आयोजित करते हैं तो आप सिर्फ शरीरों का सौदा कर रहे हैं। आप अगर अपने बच्चों को अपनी जाति के लड़के या लड़की से प्रेम करने की इजाज़त दे भी देते हैं तब भी आप अपने बच्चों को एक दकियानूसी और पूरी तरह गलत जाति प्रथा में बांधकर ही रखना चाहते हैं। अगर आप दहेज लेते हैं या देते हैं तो आप महिलाओं का अपमान करते हैं। अगर आप किसी लड़की या लड़के के शरीर को देखकर उसका चुनाव करते हैं तो आप मनुष्यता का अपमान करते है। आखिर एकाध घंटे की मुलाकात में आप इतना ही तो देख पाते हैं। आप इतने समय में किसी भी व्यक्ति की आत्मा, उसके विचार या उसकी भावनाएं नहीं जान सकते। और इस तरह यह महज शरीर का लेन-देन भर बनकर रह जाता है। किसी अनजान परिवार में अपनी लड़की या लड़के को बेचना। एक विवाह, जोकि सामान्य रूप से एक सुखकर अवसर होना चाहिए, प्रेम से लबालब होना चाहिए, एक व्यापार और दौलत का दिखावा भर बनकर रह जाता है।

पुरुष-सत्तात्मक भारतीय समाज इन परंपराओं से चिपका हुआ है क्योंकि वे पुरुषों की ताकत को बरकरार रखती हैं, वे जाति प्रथा की समाप्ति में अवरोध का काम करती हैं और क्योंकि वे पुरुषों को इस बात की इजाज़त देती हैं कि वे महिलाओं से घोड़ों जैसा व्यवहार करें, उन पर दांव लगाएँ और उनकी लगाम अपने हाथों में रख सकें जिससे महिलाएं अपनी ऊर्जा का उपयोग अपनी बेहतरी के लिए न कर सकें। अगर आप परंपराओं की बात करते हैं तो हमारे देश में और हमारी संस्कृति में बहुत सी ऐसी परंपराएँ हैं जो पहले भी गलत थीं और आज भी गलत हैं। कई परंपराएँ पहले ही खत्म हो चुकी हैं मगर कई आज भी मौजूद हैं, जैसे दहेज की परंपरा, प्रिय व्यक्ति के देहावसान पर भोज का आयोजन, महिला भ्रूणहत्या और जाति प्रथा। हाँ, मैं मानता हूँ कि मैं ऐसी किसी परंपरा का सम्मान नहीं कर सकता और उनका निरादर भी करता रहूँगा जो मनुष्य को मनुष्य नहीं मानती और उसका हर तरह से अपमान करती हैं। और यह मैं जीवन भर करता रहूँगा। अगर आपको यह ठीक नहीं लगता तो मेरा कहना है कि मैं इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करता!

भारत का उच्च वर्ग – प्रतिष्ठा खोने के डर ने तलाक रोका – 3 मई 2013

पिछले दो दिनों में मैंने निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग के दंपतियों की हालत का वर्णन किया जो वैवाहिक समस्याओं के बावजूद विवाह में बने रहने के लिए मजबूर होते हैं। मैंने उन कारणों का विश्लेषण किया जिनके चलते सुखी होने का झूठा दिखावा करते हुए विवाह को बनाए रखना उनके लिए ज़रूरी होता है, भले ही रोज़ घर में लड़ाइयाँ होती रहें। मैं समझता हूँ कि पाठक पढ़ना चाहते होंगे कि ऐसी ही परिस्थिति में उच्च वर्ग की प्रतिक्रिया भी समान ही क्यों होती है-आखिर उनके पास तो दौलत होती है कि तलाक का सामना आसानी के साथ कर सकें। मैं आज यही स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा कि क्यों वे भी अलग होना ठीक नहीं समझते और तलाक को टालने में ही अपनी भलाई देखते हैं।

आप कल्पना कर सकते हैं कि जब निम्न वर्ग कर्ज़ लेकर और मध्य वर्ग जीवन भर की पूंजी को दांव पर लगाते हुए अपने बच्चों के विवाह के आयोजन और दहेज देने में खर्च कर डालते हैं तो उच्च वर्ग विवाह पर कितना धन खर्च करता होगा! उनके लिए धन की कोई समस्या नहीं होती और वे बड़े से बड़े 5 सितारा होटलों में समारोहों का आयोजन करते हैं जहां अनगिनत खाने-पीने की वस्तुएं, महंगे से महंगे मनोरंजन के कार्यक्रम, महिला बैरे और विदेशी नाचने-गाने वलियाँ, दुल्हा और दुल्हन के लिए ढेर सारे आभूषण और स्वाभाविक ही दहेज की विशाल राशि पर खर्च किया जाता है! लाखों-करोड़ों रुपए फूँक दिये जाते हैं, प्रतिष्ठित मेहमानों की लंबी सूची होती है और वह आडंबर का विशाल समारोह बन जाता है!

यह वर्ग दौलत का फूहड़ प्रदर्शन करता है। विवाह के हर कार्यक्रम और समारोह में यही किया जाता है और विवाह के पेशेवर आयोजक नियुक्त किए जाते हैं जो नई-नई महंगी युक्तियाँ प्रयुक्त करते हैं जिससे विवाह को ज़्यादा से ज़्यादा उत्तेजक बनाया जा सके और जो पिछले सभी विवाहों को मात करे! उनके विवाह फिजूलखर्ची और आडंबर से भरे होते हैं और एक से एक बढ़कर प्रतिष्ठित व्यक्तियों से आप वहाँ मिल सकते हैं। ढ़ोल-मजीरों और तुरहीनाद से इस विवाह की घोषणा की जाती है!

दुल्हन का स्वागत उसके सास-ससुर के विशाल महलनुमा बंगले में किया जाता है। वहाँ पर्याप्त जगह होती है, उन्हें मध्य वर्ग की तरह 24 घंटे परिवार के साथ एक ही कमरे में दिन गुजारने की समस्या नहीं होती। लेकिन प्रेम के स्थान पर दंभ और अहं हो तो दुनिया की तमाम दौलत भी तनाव और समस्याओं को पैदा होने से नहीं रोक सकती!

खुशी और उत्सव के इतने बड़े आडंबर के बाद वे असफलता कैसे स्वीकार करें? समाज के सामने यह कैसा लगेगा? वे मुंह दिखने के काबिल नहीं रह जाएंगे! वे इतने लोगों को जानते हैं, सब उन्हें लेकर बातें करेंगे, चुहलबाजियाँ करेंगे! नहीं-वे यह खतरा नहीं उठा सकते! इसलिए वे अपने व्यक्तिगत जीवन पर पर्दा डालने की और आसपास के लोगों को एक दूसरा ही रूप दिखाने की कोशिश करते हैं। बंद दरवाजों के पीछे से आने वाली आहटों को सुन पाने वाले उनके कर्मचारियों के अलावा उनकी समस्याओं को कोई नहीं जान सकेगा।

इसके अलावा यह सार्वभौमिक सच्चाई-यह सभी वर्गों के लिए समान रूप से लागू होती है-कि तलाक़शुदा व्यक्ति के लिए दूसरा साथी खोज पाना बहुत मुश्किल होता है। हो सकता है कि वे अपने जैसा कोई तलाक़शुदा व्यक्ति खोज लें मगर आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बाज़ार में कोई भी तलाक़शुदा व्यक्ति को अपना लड़का या लड़की देना पसंद नहीं करता। लड़कियों को तो टूटा-फूटा समान ही समझा जाता है और पुरुषों को? पता नहीं वह कैसा है? हो सकता है पीकर पत्नी को मारता-पीटता हो…ज़रूर कोई बहुत बुरा आदमी होगा अन्यथा क्यों उसका पहला विवाह टूटता?

कैच 22 वाली परिस्थिति बन जाती है: अगर आप विवाह में बने रहते हैं तो आप जीवन भर दुखी रहेंगे क्योंकि आपकी अपेक्षाओं का वैवाहिक जीवन आपको मिलने वाला नहीं है। अगर तलाक लेते हैं तो आपको दूसरी बार उपयुक्त साथी मिल ही जाए यह ज़रूरी नहीं। क्यों? क्योंकि हर कोई यही सोचता है कि आपमें ज़रूर कोई न कोई ऐसी खराबी होगी कि तलाक तक की नौबत आ गई। किस बुराई का चुनाव किया जाए?

आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) के बारे में मैंने जो भी लिखा है, अपने अनुभवों के आधार पर लिखा है, उन्हें मैंने अपने आसपास घटते देखा है और अपने खुद के सोच-विचार के बाद प्रस्तुत किया है। निस्संदेह, यह व्यक्ति-व्यक्ति की बात होती है और कई आयोजित विवाह होते हैं जो पूरी तरह सफल भी होते हैं क्योंकि इत्तफाक से दंपतियों के मन और विचारों में तालमेल बैठ गया। लेकिन समस्याग्रस्त विवाहों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है और इसीलिए मैंने ऐसे विवाहों के असफल होने के कारणों को रेखांकित करने की कोशिश की है।

मध्य वर्गीय लड़कियां- विवाह के लिए इतनी बचत करने के बाद तुम तलाक नहीं ले सकती!-2 मई 2013

कल के ब्लॉग में यह बताने के बाद कि तलाक लेने की जगह निचले वर्ग की लड़कियां खुश रहने का दिखावा करती हुई अपने विवाह में क्यों बनी रहती हैं आज मैं इसी संबंध में मध्य वर्ग की लड़कियों की बात करूंगा। अर्थात, मैं उन खाते-पीते परिवारों के बारे में लिखूँगा जिन्हें जीवित रहने की चिंता नहीं है, जिनके पास बच्चों को स्कूल भेजने के लिए, उनके लिए कपड़े खरीदने और अच्छा भोजन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त धन है मगर इसके बावजूद जिन्हें कोई बड़ा खर्च करने से पहले चार बार सोचना पड़ता है।

लड़की पैदा होते ही उसके विवाह के लिए वे बचत करना शुरू कर देते हैं। वे यह जानते हैं कि एक दिन आएगा जब उन्हें अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा खर्च कर देना होगा और वे बैंक जाकर अपने सामर्थ्यानुसार विवाह बचत योजना में हर माह पैसा जमा करना शुरू कर देते हैं। आम तौर पर बीस साल के बाद वह रुपया उन्हें प्राप्त होता है और वे अपनी लड़की के विवाह पर एक बड़े खर्च के लिए तैयार होते हैं।

उनके लिए यह एक बड़ा आयोजन होता है और विवाह की तैयारियों के दौरान आप बार-बार उनके मुंह से सुन सकते हैं कि 'शादी जीवन में एक बार ही होती है!' इस तरह यह लड़की और लड़का, दोनों के लिए जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण आयोजन बन जाता है। शादी होने के बाद अगर वे महसूस करते हैं कि मामला जमा नहीं तो यह उनके लिए बहुत संकटपूर्ण घड़ी होती है। उनके परिवारों ने उनके विवाह पर इतना अधिक खर्च कर दिया होता है, एक दिन में ही सारा प्रेम और सारी जमा-पूंजी, कि दोनों के लिए यह सोचना भी मुश्किल होता है कि इस व्यक्ति के साथ रहने के स्थान पर वे अब अलग हो जाएंगे, लड़की के मामले में इसका यह अर्थ होता है कि वह उस घर से ही बाहर निकल जाएगी।

आपको यह ध्यान रखना होगा कि ऐसी आर्थिक स्थिति वाले लोग अपना रहन-सहन हमेशा अच्छा बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास करते हैं। वे अपनी आमदनी का बेहतर प्रबंध करने की कोशिश करते रहते हैं और चाहते हैं कि आस-पड़ोस और दोस्त-रिश्तेदार भी उनके रहन-सहन को देखें और समझें कि वे बिल्कुल निचले वर्ग जितने गरीब नहीं हैं। वे कुछ ज़्यादा कमा लेते हैं और विवाह पर ज़्यादा खर्च भी करते हैं। लेकिन दरअसल यह खर्च उनकी कूवत के बाहर का होता है और जीवन भर की बचत इसमें खर्च होती है और अगर दंपति अलग होना चाहते हैं तो यह बचत उन्हें डूबती हुई दिखाई देती है। वे यह जानते हैं और सभी देख सकते हैं कि उनका सारा खर्च एक तरह का अपव्यय ही था।

लेकिन मध्य वर्ग में तलाक न लेने का कारण सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं होता। लोग जितना अधिक अमीर होते हैं उतना ही उनके लिए आडंबरपूर्ण दिखावा करना महत्वपूर्ण होता है। वे विश्वास करते हैं कि अपने परिवार में आप जितना खुश हैं, समाज में आपकी प्रतिष्ठा का स्तर भी उतना ही ऊंचा माना जाता है। अगर आप लड़ते-झगड़ते हैं या अलग होने के बारे में सोच रहे हैं तो समझा जाता है कि आप निचले वर्ग के लोगों जैसा व्यवहार कर रहे हैं और आपको यह शोभा नहीं देता।

उनकी लड़कियां पढ़ी-लिखी हो सकती हैं और तलाक के बाद नौकरी करके कमा-खा सकती हैं। दुर्भाग्य से ऐसा समझा जाता है कि वही औरतें नौकरी करती हैं और पैसा कमाती हैं जो निर्धन हैं और यह उनकी प्रतिष्ठा को कम करने वाला होता है। बहुत सी औरतों के लिए यह उनके अहं को चोट पहुंचाने वाली बात होती है। इसलिए वे यही बेहतर समझती हैं कि मुश्किल हालातों के बावजूद किसी तरह घर में बनी रहें, अपने पति और उसके परिवार के साथ लड़ते-झगड़ते!

अकसर यह घर के ही टूटने का कारण बनता है। पति-पत्नी तय करते हैं कि रोज़ की तू-तू, मैं-मैं से अलग होना ही बेहतर है और वे अलग हो जाते हैं। यह उनकी आर्थिक स्थिति पर थोड़ा बोझ तो होता है मगर अपने विवाह के तनावों को कम करने का इसके सिवा उन्हें कोई चारा नज़र नहीं आता। लेकिन तलाक किसी हालत में विकल्प नहीं होता!

निचले वर्ग की भारतीय लड़कियां-दहेज जुटाना मुश्किल और तलाक पाना असंभव! – 1 मई, 2013

पिछले कुछ दिनों से मैं आयोजित विवाहों की (अरेंज्ड मैरेज) विभिन्न समस्याओं के बारे में लिखता आ रहा हूँ। अपनी कुछ प्रविष्टियों को दोबारा पढ़ने पर मुझे लगा कि इनसे कोई सोच सकता है कि मैं समाज के एक खास वर्ग के बारे में ही लिख रहा हूँ। पश्चिम के लोग, जिन्हें आयोजित विवाह का विचार एक नयी बात लगता है, सोच सकते हैं कि सिर्फ उस खास वर्ग के लोग ही समस्याओं के बावजूद अपने विवाह में बंधे रहते होंगे। वे नहीं जानते कि असफल विवाहों कि समस्या समाज के सभी वर्गों में समान रूप से पाई जाती है और सभी वर्गों के लोग अपने दुर्भाग्य को नियति मानकर भुगतते रहते हैं मगर नाता तोड़कर तलाक नहीं लेते। आप निचले वर्ग, मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के लोगों से पूछिए, आयोजित विवाह सफल भले न हो मगर पति-पत्नी शादीशुदा ही बने रहेंगे। यह बहुत तार्किक है, अगर आप समाज की संरचना पर गौर करें। मैं बताता हूँ कि क्यों।

हम उनसे शुरू करते हैं जिन्हें आप उनकी आर्थिक स्थिति के अनुरूप निचला वर्ग कहेंगे। उनकी आमदनी अधिक नहीं होती, निश्चित रूप से खर्चीले आयोजित विवाह सम्पन्न करने के लिए वे पर्याप्त बचत कर पाने में असमर्थ होते हैं। वे रोज़ मजदूरी करते हैं ताकि इतना कमा सकें कि खुद और बाल-बच्चों को खाना खिला सकें, उनके कपड़े-लत्ते खरीद सकें और उन्हें किसी तरह बड़ा कर सकें। बड़े आयोजनों के लिए वे दूसरों पर निर्भर होते हैं।

लड़कियों की शादी तय होने पर जहां कहीं भी उन्हें सहायता की उम्मीद होती है वे हाथ फैलाते हैं। उदार मना लोग उन्हें कुछ रुपया देते हैं, चैरिटी संस्थाएं भी मदद करती हैं जिससे वे दूल्हे को देने के लिए दहेज का जुगाड़ कर सकें और कुछ रुपये विवाह के आयोजन और पार्टी के लिए भी उपलब्ध हो सके। वे पूरा प्रयास करते हैं कि पर्याप्त धन इकट्ठा हो जाए लेकिन अगर पूरा नहीं पड़ता तो वे अपने रिश्तेदारों से उधार लेते हैं, या किसी मित्र या किसी साहूकार से लेते हैं, जो रुपये वापसी के समय मूल के साथ ब्याज भी वसूल करता है।

रुपया इकट्ठा करने के इस आवश्यक मगर बेहद कष्टकर काम के चलते ज्यादातर लोग लड़के की कामना करते हैं। अगर उनकी कई लड़कियां हैं तो सभी के विवाह का इंतज़ाम उन्हें करना पड़ता है और ऊपर से दहेज भी देना पड़ता है।

पैसा आने पर और उचित कीमत पर दुल्हा मिल जाने पर लड़की की शादी कर दी जाती है। यह बहुत कम उम्र में भी हो सकता है, खासकर गरीब परिवारों में। तेरह और चौदह साल की लड़कियों को भी ब्याह दिया जाता है जबकि 18 साल की लड़कियों के ब्याह गैरकानूनी हैं। गांवों में हर साल अनगिनत बाल-विवाह होते हैं। ये लड़कियां इतनी परिपक्व नहीं होतीं कि अपने लिए कोई निर्णय ले सकें और जैसा उनके अभिभावक चाहते हैं वही करती हैं। उसने अब तक का पूरा जीवन अपने अभिभावकों के कहे अनुसार गुज़ारा है इसलिए विवाह के बाद अगर उसे अपना पति पसंद नहीं आता तो वह यह बात भी अपने अभिभावकों से कहती हैं। और वे उसे समझाते हुए कहते हैं कि उसे स्वीकार करो, उसके साथ सामंजस्य बिठाओ और किसी भी हालत में अपनी गृहस्थी की गाड़ी को पटरी से उतरने मत दो।

लड़की की हालत की कल्पना कीजिये। उसने कोई काम नहीं सीखा है और अगर उसे अपने दम पर जीना है तो या तो उसे भीख मांगनी होगी या कड़ी मेहनत वाला काम करना होगा। उसके माँ-बाप के लिए उसे वापस अपने पास रखना मुश्किल है। प्रेम के वशीभूत वे ऐसा कर भी लें तो उस लड़की की आत्मग्लानि की कल्पना कीजिये। वह न सिर्फ अपने पिता का कहा न मानने की दोषी है बल्कि उनकी आर्थिक तंगी को और बढ़ाने का कारण भी बन गई है! अगर उसका कोई बच्चा हो चुका है तो और भी परेशानी हो सकती है।

लड़के के लिए यानी नए दूल्हे के लिए भी परिस्थिति बहुत आसान नहीं होती। अगर उसे लगता है कि उसकी पत्नी उसके परिवार के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है और उसके साथ भी लड़ने का कोई न कोई बहाना ढूंढती रहती है तो उसे क्या करना चाहिए? अगर उनके बीच तलाक हो जाता है तो लोग उस पर हंस सकते हैं कि वह एक औरत को भी अपने साथ नहीं रख पाया! और फिर क्या वह अपनी पत्नी के प्रति कोई ज़िम्मेदारी महसूस न करने वाला गैरजिम्मेदार पति है? इन सब बातों के कारण वे साथ ही रहे आते हैं, चाहे उनके बीच विवाद के कई मुद्दे हों, रोज़ लड़ाइयाँ ही क्यों न होती हों। वे दुखी रहते हैं, झगड़ा करते रहते हैं, अक्सर सबके सामने, क्योंकि गरीब होने के कारण सब छोटे-छोटे घरों में आसपास ही रहते हैं। फिर भी जीवन में परिवर्तन के लिए कुछ भी नहीं करते।