अगर राधे माँ जैसी कोई महिला मिनीस्कर्ट पहने या नृत्य करे तो उसमें कोई बुराई है क्या? 9अगस्त 2015

मैं पिछले दो दिन भी बहुत व्यस्त रहा। कल और परसों टीवी पर मैंने दो परिचर्चाओं में भाग लिया। दोनों में ही प्रश्न एक गर्मागर्म विषय पर पूछे गए, जो पिछले कुछ दिनों से भारतीय समाचारों में छाया हुआ है: राधे माँ, एक महिला गुरु, जिसकी ईश्वर के रूप में पूजा होती है। एक महिला गुरु, जिसके कुछ निजी फ़ोटो और वीडियो सार्वजनिक हो गए।

सन 2012 में ही अपने पाठकों से मैं इस महिला का परिचय करवा चुका हूँ कि कैसे यह महिला धार्मिक बनाव-श्रृंगार करके अपने अनुयायियों की गोद में बैठकर 'लैप डांस करती है

इस महिला के विरुद्ध, जिसका असली नाम सुखविंदर कौर है, हाल ही में एक अन्य महिला ने, जिसके घर में वह रहती थी, पुलिस के पास शिकयत दर्ज़ कराई थी। आरोप यह था कि वह उस महिला के साथ हिंसक व्यवहार करती है और परिवार के दूसरे सदस्यों पर दबाव डाल रही है कि वे उसके माता-पिता से अधिक दहेज़ की मांग करें।

ये समाचार भी उतनी गंभीरता के साथ नहीं दिखाए जा रहे थे लेकिन तभी उसके कुछ व्यक्तिगत फ़ोटो और वीडियो मीडिया के हाथ लग गए, जिसमें राधे माँ मिनीस्कर्ट पहनकर फ़ोटो खिंचवा रही है और बॉलीवुड फिल्मों के गानों की धुन पर नाच रही है। जिस दिन से ये फ़ोटो और वीडियो सार्वजनिक हुए, उन्हें बार-बार टीवी समाचारों में दिखाया जाने लगा!

कुछ लोग उसके समर्थन में उतर आए हैं तो कुछ विरोध में। कुपित हिन्दू पूछ रहे हैं कि आधुनिक जीवन किस तरह धर्म और भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ा रहा है और उसे अपवित्र कर रहा है; वे महिला पर आरोप लगा रहे हैं कि वह लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचा रही है। दूसरे धर्मगुरु और अवतार कह रहे हैं कि वह परमानंद को प्राप्त हो चुकी है, भक्ति-भाव में तन्मय हो चुकी है, इसलिए नाच-गा रही है क्योंकि ऐसी हालत में भजन-कीर्तन और बॉलीवुड के गानों में कोई अंतर नहीं रह जाता।

ऐसी दो टीवी चर्चाओं में मैंने भी भाग लिया, जहाँ कुछ लोग उसका विरोध तो कुछ लोग समर्थन कर रहे थे। मैंने दरअसल पूछा भी कि नृत्य करने में क्या दिक्कत है। वह राधे माँ कहलाती है- यह समस्या है! भारत में कई ऐसे अवतार हैं जो नृत्य करके लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। राधा और कृष्ण भी नृत्य किया करते थे और उन पर कोई उंगली नहीं उठाता! मीडिया पहले से जानता था कि वह अपने अनुयायियों के साथ लैप-डांस करती है लेकिन जब तक उनके पास इस महिला के मिनीस्कर्ट पहने हुए फोटो हाथ नहीं लगे थे, उसे किसी समस्या की तरह प्रस्तुत नहीं किया गया!

जिस व्यक्ति को आप ईश्वर के स्थान पर रखते पूजते हैं, इस तरह उसके आदेशों का पालन करते हैं, जैसे खुद आप, आपका जीवन और आपका भविष्य उससे छिपा हुआ नहीं है, उससे अपेक्षा करते हैं कि वह सार्वजनिक जीवन में एक खास तरह का व्यवहार करे, समाज में उसकी छवि साधु-संतों की तरह हो, भले ही वह महज दिखावा ही कर रहा हो। आपने उसे उच्चासन पर तो बिठा दिया लेकिन फिर आप चाहते हैं कि वह दैवी श्रृंगार करके वहाँ बैठे, एक सामान्य मनुष्य के रूप में नहीं!

यह कौन बताता है कि कोई व्यक्ति पुरुष या स्त्री अवतार होने के काबिल है? क्या कोई ऐसी संस्था है, जहाँ ये लोग कोई परीक्षा पास करके आते हैं? क्या वहाँ बताया जाता है कि उन्हें मिनीस्कर्ट नहीं पहनना है? और क्या कोई उन्हें यह भी बताता है कि अपनी झूठी दैवी शक्ति के भ्रमजाल में फँसाकर भोलेभाले लोगों को धोखा नहीं देना चाहिए? इन लोगों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा? क्या वे लोग लेंगे, जो उनके पास जाते हैं?

इसके विपरीत, राजनेता और दूसरे प्रसिद्ध लोग इन नकली और जालसाज गुरुओं के पास दौड़े चले आते हैं, उनके चरणों में लोटते हैं, उन पर पैसों की बारिश करते हैं और दुनिया के सामने ज़ाहिर करते हैं कि वे उन गुरुओं को मानते हैं, उनके कामों का अनुमोदन करते हैं। कोई भी व्यक्ति, जो थोड़ा-बहुत अभिनय जानता है, साधु जैसे धार्मिक कपड़े पहनकर भगत, साधु या गुरु बन सकता है! वे टीवी पर प्रचार करते हैं, विज्ञापनों पर काफी पैसा खर्च करते हैं, लोगों को आकर्षित करते हैं और अंततः उनकी जेबों से काफी पैसा निकलवाकर अपनी झोली भरते हैं!

लेकिन वे उनका आर्थिक शोषण करके ही संतुष्ट नहीं होते! वृंदावन के लिए यह कोई नई बात नहीं है: आए दिन पुलिस इन गुरुओं और अवतारों का पर्दाफाश करती रहती है, जो अपने भक्तों के पूर्ण समर्पण का लाभ उठाकर उनका दैहिक शोषण करते हैं, उन्हें अपने साथ सोने के लिए मजबूर करते हैं! कुछ लोगों के लिए यह न सिर्फ अपनी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति का जरिया होता है बल्कि उससे उनकी शारीरिक पिपासा भी शांत हो जाती है! लेकिन कुछ दूसरों के लिए ऐसे काम गर्हित होते हैं, उन्हें महसूस होता है कि उनके डर या संकोच का लाभ उठाकर कि जिसे वे ईश्वर मान रहे हैं, वह नाराज़ या दुखी न हो, उन्हें ये काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है!

अपने टीवी इंटरव्यू में मैंने कहा कि आसाराम जैसे गुरु, जो अभी भी एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में जेल में हैं, और राधे माँ जैसे लोग धर्म की पैदावार हैं। जब तक संगठित धर्म मौजूद हैं, ऐसे लोगों का अस्तित्व भी बना रहेगा, वे बार-बार तरह-तरह के अवतार लेकर हमारे सामने उपस्थित होते रहेंगे। वास्तव में इसकी जड़ धर्म ही है!

माफ कीजिए, मैं नास्तिक गुरु नहीं हो सकता – 6 अगस्त 2015

आप पहले ही पढ़ चुके हैं कि नास्तिकों के लिए कोई संगठन स्थापित करने की मेरी कतई कोई इच्छा नहीं है और न ही कोई इरादा है। कल मैंने बताया कि उसके एक धर्म में तब्दील हो जाने का बहुत बड़ा खतरा है और यह भी कि नास्तिकता को परिभाषित करने के परंपरावादी तरीके से हमें दूर रहना चाहिए। आज मैं आपको इसका एक और कारण बताता हूँ: ऐसे किसी संगठन के लिए आवश्यक ढाँचा मुझे नापसंद है!

आप जानते ही हैं कि आश्रम में इतने सारे नास्तिकों से मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी और मैंने उनके सान्निध्य का बहुत आनंद उठाया। भविष्य में भी मैं नास्तिकों को अपने आश्रम में आमंत्रित करना चाहूँगा, जिससे वे एक-दूसरे के साथ मिल-बैठकर चर्चा कर सकें, नज़दीक आ सकें और ऐसी सभाओं के लिए कोई नियत स्थान भी उपलब्ध हो सके। चाहे ऑनलाइन हो चाहे रूबरू, मुझे उनके साथ बातचीत करना पसंद है, उन्हें अपने विचार बताना, उनके विचारों से अवगत होना और अपनी ओर से उनकी समस्याओं के हल की दिशा में हरसंभव मदद करना! लेकिन यह सब करने के लिए मैं कोई संगठन खड़ा करना नहीं चाहता!

बहुत से लोगों ने इसके लिए मुझसे व्यक्तिगत रूप से निवेदन किया है और इसलिए, मुझे लगता है, विशेष रूप से उन लोगों को मुझे कोई न कोई उत्तर देना चाहिए: आप एक ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें आप अपनी नास्तिकता को फिट कर सकें। लेकिन नास्तिकता का तकाज़ा है कि वह मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध हो!

बहुत से लोगों के लिए नास्तिक होने का कारण यह होता है कि वे पुरोहितों को धर्म द्वारा प्रदत्त अनुक्रमणीय आधिपत्य को पसंद नहीं करते! मैं ऐसे किसी संगठन का मुखिया होना पसंद नहीं करूँगा क्योंकि युवावस्था में और वयस्कता की शुरुआत से ही मैं लगभग ऐसे ही पद का, धार्मिक और आध्यात्मिक गुरु के पद का, अनुभव प्राप्त कर चुका हूँ! मैं लोगों को उपदेश दिया करता था कि उन्हें क्या करना चाहिए, कैसे जीवन बिताना चाहिए। मैं उसे पीछे छोड़ चुका हूँ- दूसरे कारणों के अलावा इसलिए भी कि मैं सबके समान होना चाहता था! सामने वाले के साथ मैं सामान्य बातचीत कर सकूँ, यह चाहता था, न कि यह कि बातचीत के दौरान वह मेरे पैर पकड़ ले!

तो, अगर अब मैं कोई संगठन शुरू करता हूँ तो मैं उसका मुखिया होऊँगा। कुछ दूसरे निर्देशक भी होंगे। उसकी व्यवस्था देखने वाले लोग होंगे, जो एक सीढ़ी नीचे होंगे- संगठन में दूसरे नंबर पर। और इसी तरह चलता रहेगा, जिसके चलते होगा यह कि कुछ ऊपर होंगे और कुछ निचली पायदानों पर! मैं मानता हूँ कि हम सब मनुष्य हैं और हम सबको एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। व्यापारिक कंपनियों में यह ढाँचा आवश्यक है, जिससे व्यापार सुचारु रूप से चलाया जा सके लेकिन नास्तिक मित्रों के बीच ऐसी गैर बराबरी देखना मैं पसंद नहीं करूँगा! क्योंकि यही बात दुनिया भर के धर्मों में अत्यंत घृणित रूप से मौजूद है!

क्या करे, किधर जाएँ, कौन सा रास्ता चुनें, यह बताने के लिए आपको किसी और की ज़रूरत क्यों पड़नी चाहिए? आप ऐसे किसी व्यक्ति या समूह की खोज में क्यों लगे हुए हैं? अगर आप खुद पर और अपने अनुभवों पर भरोसा करते हैं तो आप स्वयं ज़्यादा बेहतर तरीके से इस संदेश का प्रसार कर सकते हैं! बिना किसी संगठन के नास्तिकता के बारे में आप लोगों को क्यों नहीं बता सकते?

मैं यह नहीं चाहता। मेरे खयाल से, अगर हमने यह किया तो हम भी किसी संगठित धर्म से और उसके अनुयायियों से बेहतर नहीं होंगे।

तो, जब मैं कहता हूँ कि मैं कभी भी ऐसा कोई संगठन नहीं बनाऊँगा तो मुझ पर विश्वास कीजिए। मज़ाक में भी जब कोई व्यक्ति मुझे 'नास्तिक गुरु' कहता है तो मुझे हँसी आती है लेकिन मैं ऐसा कुछ नहीं होना चाहता!

अपने दिमाग के दरवाजे दूसरों के लिए खुले छोड़ देने के खतरे – 18 मार्च 2015

यथार्थ से कोसों दूर, काल्पनिक दुनिया के निर्माण के चलते पेश आने वाले मानसिक और शारीरिक खतरों के विषय में कल मैंने लिखा था। इसके एक और खतरे की चर्चा मैंने अब तक नहीं की थी, जिसके बारे में कुछ और विस्तार से लिखने की आवश्यकता है: किसी को जब आप अपनी कल्पनाओं, आस्थाओं और इस तरह प्रकारांतर से आपकी दुनिया को भी प्रभावित करने की छूट दे देते हैं-और फिर वह उसका अनुचित लाभ उठाने लगता है!

अगर आपने परसों की यानी दिनांक 16 मार्च की मेरी टिप्पणी को ध्यान से पढ़ा होगा, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे आप अपनी काल्पनिक निजी दुनिया निर्मित कर लेते हैं, तो आप समझ सकेंगे कि इससे मेरा क्या अभिप्राय है। साधारणतया हम अपने विचारों और कल्पनाओं के अनुसार व्यवहार करते हैं और जब हम कुछ आस्थाओं पर विश्वास करने का मन बना लेते हैं तो वे आपका यथार्थ बन जाती हैं। अब इस बात की कल्पना कीजिए कि कोई आपके विचारों को अपने पक्ष में प्रभावित कर रहा है! वह आपके उस यथार्थ को, आपकी उस दुनिया को भी प्रभावित और परिवर्तित कर रहा होगा जिसे आप अपने लिए निर्मित कर रहे हैं!

इस तरह आपको प्रभावित करने वाले बहुत से अलग-अलग व्यक्ति हो सकते हैं। इसकी शुरुआत अभिभावकों के साथ होती है और इसी कारण उनकी ज़िम्मेदारी भी बहुत बढ़ जाती है: सबसे कोमल और आसानी से प्रभावित हो सकने वाले दिमागों तक उनकी पहुँच होती है और उन्हें गढ़ने और जीवन के लिए तैयार करने की ज़िम्मेदारी उन पर आयद होती है। वे एक संसार का निर्माण करते हैं। आपका परिवार, फिर शिक्षक, दोस्त और उसके बाद बहुत से दूसरे लोग, जिन पर आप भरोसा करते हैं या जिन्हें आप विशेषज्ञ या अधिकारी समझते हैं, जिनके विचारों को आप पसंद करते हैं। इनमें विभिन्न धार्मिक, आध्यात्मिक और यहाँ तक कि राजनैतिक नेता भी शामिल होते हैं।

एक जिम्मेदार व्यक्ति उन लोगों का खयाल रखता है, जिन्हें वह प्रभावित कर सकता है। स्वाभाविक ही, इस शक्ति का दुरुपयोग भी किया जा सकता है-और शायद आप उन हजारों प्रकरणों के बारे में जानते होंगे जहाँ गुरुओं, धार्मिक नेताओं और विभिन्न संप्रदायों के मुखियाओं ने ठीक यही किया: वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए नहीं बल्कि उन्हें अपनी आज्ञा का शब्दशः पालन करने, उन्हें अपने कहे अनुसार करने हेतु बाध्य करने में किया। उन पर प्रभुत्व स्थापित करके और छल-प्रपंच से इस तरह उनका इस्तेमाल किया कि सिवा उस नेता के किसी और का उससे कोई लाभ नहीं हो सकता था। उनका जबर्दस्ती मत परिवर्तन किया गया, उन्हें असंगत विचारों और कल्पनाओं की घुट्टी पिलाई गई, उनके साथ छल करके उन्हें एक दूसरी दुनिया में ले जाकर स्थापित कर दिया गया जो किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा निर्मित, नियंत्रित और संचालित थी।

नतीजा: जितनी बड़ी संख्या में लोग उनके प्रभाव में आते जाते हैं, उतना ही ये गुरु, संप्रदाय और संगठन अमीर होते जाते हैं। ये अनुयायी, अंधी भेड़ों की तरह उसी दुनिया में रहने लगते हैं, उनके आदेशों का पालन करते हैं और यहाँ तक कि खुद अपने सालों के संबंधों को तोड़ लेते हैं, मित्रता छोड़ देते हैं, यहाँ तक कि परिवार का परित्याग कर देते हैं। बहुत से लोग सालों उन धूर्तों के जाल में फँसे रहते हैं। कभी-कभी जीवन भर के लिए।

कुछ लोगों को एक सीमा के बाद अचानक शक होने लगता है। जैसे-जैसे शक बढ़ता जाता है, वे खुद अपने दिमाग से सोचने की ओर अग्रसर होते हैं। यह उन्हें बहुत कठिन और खतरनाक लगता है, एक तरह से वे एक लंबे अर्से बाद खुद अपने पैरों पर खड़े हो रहे होते हैं, धीरे-धीरे खुद चलना सीख रहे होते हैं! निश्चित ही यह परिवर्तन उनकी उस दुनिया को तहस-नहस कर देता है, जिसे उन्होंने खुद गढ़ा होता है और इतने सालों में जिसके वे आदी हो चुके होते हैं। जिस गुरु का वे इतना सम्मान करते थे, जिससे इतना प्यार करते थे, वह अचानक उनका दुश्मन हो जाता है और उसके साथ उनके वे सारे मित्र भी, जो उस गुरु के कारण इतने सालों से उनके मित्र बने हुए थे।

तो, अगर कोई व्यक्ति आपकी रचना-प्रक्रिया को समझ ले या उसमें प्रवेश पा ले तो वह आपके मस्तिष्क को नियंत्रित भी कर सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब आप उसे प्रवेश करने दें! इसलिए अगर किसी को अपने इतना नजदीक आने दे रहे हैं तो बहुत सतर्क रहें-और जब आपको लगे कि वह आपके द्वारा प्रदत्त इस सुविधा का गलत लाभ उठा रहा है या उसका इस्तेमाल ज़िम्मेदारी के साथ नहीं कर रहा है तो उसका प्रवेश वर्जित कर दें!

सतर्क रहें और अपना ध्यान रखें!

गुरु हो या राजनेता कोई फर्क नहीं पड़ता – भारत में मानव भक्ति – 16 फरवरी 2015

कल मैंने बताया था कि पिछले साल मैंने राजनीति के कारण अपने दो पुराने मित्रों को खो दिया। पहले तो मैं विश्वास ही नहीं कर पाया कि ऐसा भी हो सकता है- आखिर, राजनैतिक विचारों से मित्रता अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए! लेकिन फिर मैंने मामले का गहराई से विश्लेषण किया और मुझे लगा कि मैंने ऐसे व्यवहार का कारण समझ लिया है: भारत की प्राचीन काल से चली आ रही मानव भक्ति (व्यक्ति-पूजा) की परम्परा।

जी हाँ, मैं जानता हूँ कि मानव भक्ति (व्यक्ति-पूजा) भारत के इतिहास और उसकी संस्कृति में रची-बसी है और वह आज भी पूरी तरह मौजूद है। आप उन गुरुओं और साधू-संतों पर नज़र दौड़ाइए, जिनके बारे में मैं अक्सर लिखता रहा हूँ। उन पर बलात्कार और हत्याओं के इलज़ाम होते हैं फिर भी उनके भक्त उनके भक्त उनकी पूजा करते ही रहते हैं। यहाँ तक कि उन्हें जेल की सज़ा हो जाती है और उनके भक्त गण जेल के बाहर बैठे पूजा-अर्चना और भजन कीर्तन करते हैं। लेकिन यह धर्म के अलावा दूसरे नेताओं के साथ भी सामान्य रूप से देखी जाती है: चाहे वे आपके पूर्वज हों, फ़िल्म अभिनेता, गायक या राजनेता हों!

भारत में राजनीति चर्चा का सबसे लोकप्रिय विषय है। जर्मन पत्नी होने के कारण हम लोग आपस में अक्सर जर्मनी और भारत की राजनीति के बीच तुलना किए बगैर नहीं रह पाते: जर्मनी में बहुत कम लोग राजनीति की चर्चा करते हैं और जब करते भी हैं तो निश्चय ही वह भारत जैसी उत्कट नहीं होती। सम्भव है, यह उनके अधिक धीर-गंभीर स्वभाव और फितरत के कारण होता होगा-इसके प्रमाण स्वरूप जर्मनी और भारत में होने वाले संसदीय सत्रों की तुलना करना पर्याप्त होगा-लेकिन सिर्फ यही कारण नहीं है। जर्मनी में किसी राजनैतिक नेता की पूजा होते हुए मैंने नहीं देखा। वे किसी एक को सबसे बेहतर मानते हुए, उसे सबसे अधिक प्रतिभाशाली, सर्वगुणसंपन्न, लाखों में एक मानते हुए, उसके साथ किसी देवता (फरिश्ते या आदर्श) की तरह व्यवहार करते नहीं देखा जैसा कि भारतीय अकसर करते हैं! और निश्चय ही वे राजनीति के कारण अपनी दशकों पुरानी मित्रता नहीं तोड़ेंगे!

मज़ेदार बात यह है कि सिर्फ भक्त ही ऐसा करते नज़र आते हैं-खुद नेताओं का ऐसा खयाल नहीं होता। वे अपने व्यक्तिगत लक्ष्य पर एकाग्र होते हैं और यहाँ तक कि खुद अपनी कही बातों को अपने भक्तों जितना महत्व न देते हुए वही करते हैं जो उन्हें जीवन में आगे ले जा सकता है। यानी उनसे अधिक उनके भक्त उनकी बातों को अधिक महत्व देते हैं। और यही बात मैं राजनैतिक नेताओं के इन भक्तों के सामने स्पष्ट करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि वे अधिक अच्छी तरह, अधिक ईमानदारी और एकाग्रता के साथ अपने देवता (आदर्श) के पदचिह्नों पर चलें!

अक्सर भारत के चुनाव प्रचार बेहद उत्तेजक, आवेशपूर्ण और कटु होते हैं। दिल्ली विधान सभा के पिछले चुनावों में एक पार्टी के मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार, अरविन्द केजरीवाल के लिए मौजूदा प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने बड़े भद्दे शब्दों का प्रयोग किया, उन्हें खुले आम नक्सली, पाकिस्तानी एजेंट, देशद्रोही और न जाने क्या-क्या कहा गया! हालाँकि, फिर भी वह जीत गए- बल्कि शायद इसीलिए कि लोगों को ऐसा गंदा दुष्प्रचार अच्छा नहीं लगा, विशेष रूप से 'देश के सर्वोच्च नेता' द्वारा किया गया दुष्प्रचार। अब चुनावों के बाद, प्रधानमंत्री ने दिल्ली के नए मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया और उसके साथ चाय पीते हुए चित्र को ट्वीट भी किया। क्या आपको आश्चर्य हो रहा है कि वे आपस में गले मिले, साथ में चाय पी और पूर्ण सामंजस्य के साथ भरपूर वक़्त गुज़ारा?

इस व्यक्ति के अनुयायी उसके लिए 20-30 साल की मित्रता और संबंध पल भर में तोड़ देते हैं। ये अनुयायी यह नहीं देख पाते कि उनके नेताओं के लिए यह सब नाटकबाज़ी था! कि पर्दे के पीछे वे सभी एक ही हैं, कि वे इस बात को कोई अहमियत नहीं देते कि पहले उन्होंने क्या कहा या किया था और आज क्या कह या कर रहे हैं!

मैं इन राजनेताओं के सभी भक्तों से अपील करना चाहता हूँ कि कृपा करके अपने संबंधों को इन नेताओं के लिए समाप्त न करें। किसी भी संबंध को, जहाँ प्रेम है और किसी भी ऐसे संबंध को, जिसमें प्रेम के साथ विकसित होने की संभावना है। क्योंकि जीवन में कभी न कभी, किसी न किसी समय आपको किसी और मनुष्य की ज़रुरत पड़ेगी-और उस समय न तो मोदी होगा न ही आपका कोई दूसरा राजनेता! उनके पास आप जैसे लाखों-करोड़ों लोग हैं। आप उन्हें हमेशा पहचानेंगे लेकिन वे न तो आपका चेहरा पहचानेंगे और न ही आपका नाम याद रखेंगे।

हर चुनाव के साथ राजनेता आते-जाते रहते हैं। वास्तविक जीवन में आवश्यकता पड़ने पर मदद के लिए और आपको सहारा देने के लिए आपके मित्र ही मौजूद रहेंगे, मोदी नहीं रहेगा।

इसलिए आप किसी भी तरह के नेता के प्रति कितने भी समर्पित क्यों न हों, अपने इस समर्पण को इस बात की इजाज़त मत दीजिए कि वह आपकी मित्रताओं को किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाने लगे!

क्या मैं पैसे कमाने के लिए नास्तिक हो गया – 8 फरवरी 2015

आज रविवार है और मैं आपको एक बार फिर अपने जीवन के विषय में कुछ बताना चाहता हूँ, कुछ ज़्यादा ही व्यक्तिगत और कुछ ऐसा, जिसने आज मुझे अपनी मित्रताओं पर और अपने बीते हुए जीवन पर एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया।

मेरा स्कूल के ज़माने का एक मित्र था। दरअसल वह मुझसे कुछ साल बड़ा था और मुझसे आगे की किसी कक्षा में पढ़ता था लेकिन मैं और मेरा एक और बहुत अच्छा मित्र और वह मित्र बन गए। वह यूरोप चला गया और वहीं स्थायी रूप से बस गया। जब मैं यूरोप गया तो उससे मिलने उसके घर गया था।

हम लोग मित्र तो थे मगर उतने घनिष्ट मित्र नहीं थे। क्योंकि दोनों की ज़्यादातर रुचियाँ एक जैसी नहीं थीं, धीरे-धीरे एक-दूसरे के साथ हमारा संपर्क टूटता गया। बीच-बीच में हमारे बीच संपर्क हो जाता था लेकिन मुझे लगा कि जब मुझे धर्म से विरक्ति होने लगी, तभी से हमारे संबंधों की ऊष्मा भी समाप्त हो गई। बाद में जब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि मेरे विचार उसके विचारों से बिलकुल मेल नहीं खाते और जब मेरा ईश्वर पर विश्वास भी पूरी तरह समाप्त हो गया, हमने जो थोड़ा-बहुत संपर्क था भी, उसे भी पूरी तरह तोड़ लिया।

लेकिन मेरा वह दूसरा घनिष्ठ मित्र उसका मित्र बना रहा और जब वह उससे मिलने के बाद वृन्दावन आता तो उससे उस भूतपूर्व मित्र की खैर-खबर मिल जाती थी।

काफी समय बाद, इसी तरह मैंने सुना कि वह भी मेरे बारे में पूछता रहता है। मुझे यह भी पता चला कि इस व्यक्ति ने, जो पहले मेरा मित्र रह चुका था, मेरे इस मित्र से कहा कि उसके अनुसार मैं हमेशा हर काम व्यापार के नज़रिए से ही करता रहा हूँ। उसकी नज़र में एक धर्मोपदेशक के रूप में मेरा काम, मेरा लंबा गुफा-निवास, सब कुछ सिर्फ पैसा कमाने के उद्देश्य से किए जाने वाले उपक्रम थे। उसने कहा कि वह पहले से जानता था कि मैं धार्मिक नहीं हूँ, कि मैं सदा से एक नास्तिक था और यह भी कि मैंने अपने नास्तिक होने की घोषणा उपयुक्त समय देखकर, बाद में इसलिए की कि मैंने सोचा ऐसा करने से और भी ज़्यादा पैसा कमाया जा सकता है।

उसकी बात पर मुझे विश्वास नहीं हुआ और फिर मैं हँसे बिना नहीं रह सका! एक ऐसे व्यक्ति के मुँह से यह सुनना, जो मुझे अच्छी तरह जानता है! गुफा-गमन तक और उससे पहले मैं बहुत अधिक धार्मिक, आस्थावान और ईश्वर के लिए समर्पित व्यक्ति था! मैं ईमानदारी के साथ इन सब बातों पर विश्वास करता था और इसीलिए गुफा में मंत्रोच्चार करते हुए मैं तीन साल तक एकांतवास कर सका। अगर सिर्फ पैसे के लिए यह कर रहा होता तो कुछ महीनों में ही पागल हो गया होता! सिर्फ अंधश्रद्धा ही आपसे इस तरह के सनकी कार्य करवा सकती है!

और मुझे नास्तिक होकर क्या मिला? ईमानदारी की बात यह है कि आर्थिक दृष्टिकोण से मेरे लिए धर्म का परित्याग करने और ईश्वर पर विश्वास न करने से अधिक मूर्खतापूर्ण कार्य कोई हो ही नहीं सकता था क्योंकि इन्हें छोड़ने का अर्थ था, अपने अच्छे-खासे जमे-जमाए व्यवसाय से और असंख्य भक्तों से हाथ धोना! अगर मैं हर वक़्त पैसे के बारे में ही सोचता रहता हूँ तो अब धर्म और ईश्वर से कोई लेना-देना न होने के बावजूद मैं आज भी गुरु ही बना रह सकता था, जो मैं पहले से था ही।

मुझे लगता है कि इससे यह पता चलता है कि मेरा दोस्त धर्म के बारे में क्या विचार रखता है: कि सिर्फ व्यापार-व्यवसाय की खातिर ही लोग धर्म को अपनाते हैं और उसमें इतनी सक्रियता से हिस्सा लेते हैं और नाटक और ढोंग करके लोगों को मूर्ख बनाते हैं। शायद इससे धर्म के प्रति उसका रवैया भी उजागर हो जाता है-या क्या वह यह कहना चाहता है कि हर कोई इसे गलत तरीके से कर रहा है और वही सिर्फ ठीक तरीके से कर रहा है?

इस धार्मिक अहंमन्यता के बारे में कल मैं और विस्तार से लिखूँगा। आज के लिए इतना कहना ही काफी है कि न तो मेरे धार्मिक होने का पैसा कमाने से कोई संबंध था और न ही मेरे नास्तिक होने का उससे कोई संबंध है!

भक्त के घर में उसके गुरु के चित्र के नीचे बैठकर गुरु की आलोचना करना – 9 नवम्बर 2014

सन् 2006 में अपने यूरोप प्रवास के दौरान मैं बेल्जियम भी गया था, जहाँ मुझे एक कार्यक्रम में बुलाया गया था। हालाँकि कुछ कार्यशालाओं, व्यक्तिगत सत्रों और भाषणों सहित सारा कार्यक्रम सदा की तरह व्यवस्थित रूप से संपन्न हो गया मगर अपने एक व्याख्यान के कारण वह दौरा मुझे हमेशा याद रहेगा।

जब यशेन्दु, हमारा संगीतज्ञ और मैं अपने आयोजकों के घर पहुँचे तो हमारा दिली स्वागत किया गया। हमारी आत्मीय बातचीत हुई और हमें एक-दूसरे को बेहतर तरीके से जानने का मौका मिला। जब हम उनके लिविंग रूम में पहुँचे तो हमने एक पुरुष और महिला का बड़ा सा फ़ोटो दीवार पर टंगा देखा। मैं नहीं जानता था कि वे कौन हैं, उनकी तस्वीर दीवार पर क्यों लगी है और वे अपने वास्तविक जीवन में क्या करते हैं। वह किसी भारतीय गुरु और उसकी पत्नी या किसी महिला गुरु का सम्मिलित चित्र लगता था मगर मैंने आयोजकों से इस विषय में कुछ नहीं पूछा। अगर वे किसी गुरु को अपनाना चाहते थे तो यह उनका अपना निजी मामला था और सिर्फ इसलिए कि मैंने इस विचार से किनारा कर लिया है, मैं उन्हें किसी बात पर सहमत करने की कोशिश नहीं करने वाला था।

जब मेरा नम्बर आया तो मैंने बोलना शुरू किया। मुझे याद नहीं है कि मुझसे किस विषय पर बोलने के लिए कहा गया था मगर इतना याद है कि न जाने कैसे मैंने प्रबोधन या enlightenment के बारे में बताना शुरू कर दिया। स्वीडन में, जहाँ मैं गर्मियों में गया था, मुझे किसी ने ‘दीक्षा आंदोलन’ का ज़िक्र करते हुए बताया था कि कोई गुरु पैसे लेकर लोगों को प्रबोध प्रदान करने का पाठ्यक्रम चला रहा है। मैंने मज़ाकिया लहजे में कहा कि जिसने आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए पैसे खर्च किए होंगे उसने एक तरह की मनी बैक गारंटी ली होगी, जिसे वह कभी क्लेम नहीं करेगा-क्योंकि इतनी बड़ी रकम चुकाने के बाद कौन कहेगा कि उसे ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है।

मैंने उस विचार और उन कार्यशालाओं का मज़ाक उड़ाया और समझाया कि कैसे उस गुरु के शिष्यों ने अपने गुरुओं के लिए पैसा कमाने के उद्देश्य से ‘दीक्षा’ शब्द को ही तोड़-मरोड़कर पेश किया है। उन गुरुओं के लिए, जो इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं।

मैं बिल्कुल नहीं जानता था कि मेरे पीछे दीवार पर टंगे फ़ोटो में ठीक उन्हीं दो गुरुओं की तस्वीरें हैं, जिन्होंने यह आंदोलन शुरू किया है! उन्हें ‘कल्कि भगवान्’ कहा जाता है और उनकी बगल में उनकी पत्नी, ‘अम्मा भगवान्’ का चित्र है मगर उस समय तक मैंने उनका नाम तक नहीं सुना था और न ही उनसे रूबरू मिला था न कोई तस्वीर देखी थी!

वह पूरी तरह संयोग की बात थी और मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि क्या मुझे सुनने वालों में भी ऐसे बहुत से लोग थे, जो मेरी तरह उन्हें नहीं जानते थे या जानते तो थे मगर संयम और शान्ति के साथ मुझे सुनते रहे। जो भी हो, व्याख्यान के बाद एक महिला मेरे पास आई और उस फ़ोटो की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा, ‘आपको पता है, आप जिस दीक्षा आंदोलन की बात कर रहे थे वह इन दोनों के नेतृत्व में ही चल रहा है!’

यह बड़ा मज़ेदार संयोग था मगर मेरे और मेरे आयोजकों के बीच कोई अप्रिय बात नहीं हुई और हमारे सम्बन्ध वैसे ही बने रहे। यह एक और उदाहरण है कि लोग पूरी तरह भिन्न विचार रखते हुए भी बिना किसी समस्या के अपने सम्बन्ध बनाए रख सकते हैं, बिना किसी विवाद के और एक-दूसरे का सम्मान करते हुए!

आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए फंदा: अस्तित्वहीन की खोज का अंतहीन सिलसिला – 30 जुलाई 2014

कल मैंने इस बात की ओर इशारा किया था कि गुरु और धर्म लोगों को आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु बनाने के ज़िम्मेदार हैं। मेरा विश्वास है कि ऐसा जानबूझकर किया जाता है- जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा शक्तिशाली हो सकें!

मैं आपको बता चुका हूँ कि इसे किस तरह अंजाम दिया जाता है: मान लीजिए कोई वास्तव में अपने जीवन से असंतुष्ट है। उसका परिवार, उसका काम-धंधा, उसकी आर्थिक स्थिति या उसका व्यक्तिगत अथवा यौन जीवन, कुछ न कुछ होता है जो ठीक नहीं चल रहा होता। उसे एहसास होता है कि कोई चीज़ है जो उसके पास नहीं है मगर क्या, वह समझ नहीं पाता। बेचैन होकर वह उसकी खोज में, उसे किसी भी तरह प्राप्त करने की कोशिश में लग जाता है। और जो उसे मिलता है वह होता है इस खोज में उसकी सहायता का जबरदस्त आश्वासन-आध्यात्मिक गुरुओं की ओर से, साधु-संतों और स्वामियों की ओर से और सीधे-सीधे धर्मों (धर्मग्रंथों) की ओर से!

अब यह व्यक्ति अपने आपको ‘आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु या अन्वेषक कहता है और समझता है कि निश्चय ही उसने कुछ न कुछ खो दिया है। उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसे उनका अनुसरण करना चाहिए जो कथित रूप से, यह जानते हैं कि उसने क्या खोया है। जो उसे रास्ता दिखा सकता है। लेकिन वह नहीं समझता कि उसकी तलाश कभी ख़त्म नहीं होने वाली है!

साधु-संत, गुरु और धर्म (धर्मग्रन्थ), ये सब यही सिखाते हैं कि कोई न कोई ऐसी रहस्यमय चीज़ मौजूद है जिसे आप नहीं समझ सकते, जज़्ब नहीं कर सकते और यह भी कि उसे आप सिर्फ उन्हीं के ज़रिए जान सकते हैं, प्राप्त कर सकते हैं। आपके पास अब यही काम रह जाता है कि उसे खोजें लेकिन आप उस पहेली को कभी भी हल नहीं कर सकते, उस भूलभुलैया से किसी भी हालत में बाहर नहीं निकल सकते।

सिर्फ आपके चलते, जो अपने आपको आध्यात्मिक साधक मानता है, उनका धंधा-पानी चल सकता है। वे तभी सफल ही सकते हैं जब आप जैसे अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ सकें। उन्हें इस विश्वास का भुलावा देकर कि वे आपको कुछ दे सकते हैं, कि वे आपको सुख-शांति की ओर ले जाने वाला सही रास्ता दिखा सकते हैं। वास्तव में वे चाहते ही नहीं हैं कि आप उस चीज़ को पा सकें, जिसकी खोज में आप लगे हुए हैं। इसलिए आप एक तरह की माया, मृगतृष्णा के पीछे भागते रह जाते हैं। एक प्रायोजित अयथार्थ, असार, बनावटी चीज़ के पीछे। परमानंद के मायाजाल के पीछे, जिसका वास्तविक आनंद से कोई संबंध नहीं है।

आपका दुख और अवसाद ईश्वर के खो जाने से नहीं है। आप उनके द्वारा प्रस्तावित और प्रदान की गई काल्पनिक चीजों से कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि आप अपने भौतिक जीवन की किसी बात से नाखुश हैं। आप प्रेम खो बैठे हैं, या सम्मान या प्रशंसा, रुपया-पैसा या सफलता, किसी दोस्त या भावनात्मक सहारे को खो बैठे हैं।

इसका संबंध किसी न किसी सांसारिक कमी से है-और इसमें मैं प्रेम को भी शामिल करता हूँ-जिसने आपको इस खोज की ओर प्रवृत्त किया है। और एक बार फिर मैं यह बात दोहराता हूँ: खोजना बंद करें और आपको मिलेगा। ऐसे किसी व्यक्ति के चंगुल में न फँसें, जिसका धंधा ही आध्यात्मिक जिज्ञासुओं को उनकी समस्याओं के मायावी और काल्पनिक समाधान की ओर उद्यत करना है!

योग गुरु कैसे अपने समलैंगिक शिष्यों के मन में आतंरिक कलह पैदा करते हैं! 25 मई 2014

मैंने आपको पहले बताया था कि सन 2006 में मेरा बहुत से समलैंगिकों से संपर्क हुआ था। उनमें से एक पुरुष समलैंगिक मेरा अच्छा दोस्त बन गया था। योग में उसकी बहुत रुचि थी और उसका एक भारतीय योग-गुरु भी था। लेकिन इसी कारण मैं हमेशा देखता था कि उसके भीतर कोई मानसिक उथल-पुथल मची हुई है: उसका गुरु उसकी समलैंगिकता को स्वीकार नहीं करता था।

तब मेरा मित्र 23 साल का युवक था। सालों से उसकी भारत में रुचि रही थी और हालाँकि वह कभी भारत नहीं आया था, वह उसकी संस्कृति परम्पराओं और धर्मग्रंथों से बड़ा प्रभावित और उन पर मोहित था। उसने भारत के बारे में बहुत सी किताबें पढ़ रखी थीं और स्वाभाविक ही उनका उस पर गहरा असर था। वह बहुत शांत-चित्त, ठन्डे दिमाग वाला और आध्यात्मिकता, योग और ध्यान आदि में रुचि रखने वाला युवक था। इन सब बातों ने उसे इस भारतीय गुरु की ओर, जो कई सालों से पश्चिम में रहकर योग और भारतीय दर्शन की शिक्षा दिया करता था, आकृष्ट किया। वह गुरु लोगों को दीक्षित भी किया करता था, लिहाजा मेरे मित्र ने उस गुरु से दीक्षा प्राप्त कर ली और उसका शिष्य बन गया।

सन 2006 की गर्मियों में हमने बहुत सा समय साथ बिताया। वह सिर्फ मुझे देखने मेरे कार्यक्रमों में आता रहता था और एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर यात्रा करते हुए हम लोग कई विषयों पर लम्बी चर्चाएँ किया करते थे। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उसने मुझे बताया कि एक किशोर के रूप में वह कभी भी स्त्रियों की ओर आकृष्ट नहीं होता था। इसके विपरीत पुरुषों की ओर आकृष्ट होना उसे अधिक स्वाभाविक लगता था। किसी स्त्री को देखकर ऐसी भावनाएँ उसके मन में कभी भी नहीं उमड़ती थीं। मैंने महसूस किया कि उसकी समलैंगिकता उसके लिए कितनी सहज और स्वाभाविक थी और यही उसने कहा भी: 'यही मैं हूँ, यही मेरा स्वभाव, मेरी प्रकृति है!'

लेकिन जब भी वह जर्मनी में या गुरु के अमरीका स्थित आश्रम में अपने गुरु से मिलता था, उसे हमेशा एक समस्या का सामना करना पड़ता था: उसका गुरु उससे कहता कि समलैंगिकता एक समस्या है, जिससे वह निजात पा सकता है और उसे ऐसा करना चाहिए। हिन्दू धर्म में और योग की कठिन परंपरा में इसकी मान्यता नहीं है। वह अपने गुरु को चाहता था लेकिन इस समस्या के चलते भ्रमित था और जब भी वह अपने गुरु से सुनता कि यह एक प्रकार की बीमारी है, मस्तिष्क में एक तरह का अवरोध या कुछ अनुचित सी बात है, जिसे ठीक करना ज़रूरी है और जिस पर उसे 'कुछ करना' चाहिए तो वह सहम जाता था और अपने व्यक्तित्व को लेकर उसके मन में द्वंद्व पैदा हो जाता था!

मुझे एहसास है कि गुरु की यह बात उसके भीतर कितना द्वंद्व पैदा करती रही होगी। जिस रास्ते पर वह चल पड़ा था, उस पर चलते हुए वह भीतर ही भीतर बहुत असुरक्षित महसूस करता रहा होगा क्योंकि वह ऐसा रास्ता था जो उसके एक अंश को स्वीकार ही नहीं करता था! उसे अपने गुरु की सहानुभूति और सहायता की ज़रुरत थी, उसके मार्गदर्शन की ज़रुरत थी-आखिर इसीलिए तो उसने उस गुरु का चुनाव किया था-लेकिन साथ ही वह आँख मूंदकर गुरु के हर आदेश का पालन भी नहीं करना चाहता था!

अगर वह कोशिश करता कि गुरु का आदेश मानकर अपने आकर्षण को पुरुषों की ओर से हटाकर महिलाओं की तरफ मोड़ दे तो फिर वह अपने आप के प्रति ईमानदार नहीं रह सकता था! वह संघर्ष करता रहा और मैं यह देखकर खुश हुआ था कि अंततः उसका व्यक्तित्व इस संघर्ष में विजयी होकर निकला! वह अपने सहज-स्वाभाविक प्राकृतिक सत्य को लेकर कोई समझौता नहीं कर सकता था।

लेकिन दुर्भाग्य से उस पूरे समय यह मामला उसके मस्तिष्क में उथल-पुथल मचाए रहा करता था।

और यह उसका एकमात्र संघर्ष या द्वंद्व नहीं था-मगर उसके बारे में बाद में फिर कभी।

अपनी स्वाधीनता और ज़िम्मेदारी: परिवार का समर्थन और प्रोत्साहन- 1 दिसंबर 2013

मैं आपको पहले बता चुका हूँ कि सन 2005 में, जब मैंने अपने पिताजी से यह कहा कि मैं अब गुरु का काम नहीं करना चाहता और यह कि जिन धर्मग्रंथों का अनुसरण और अनुपालन मैं अतीत में किया करता था, अब नहीं करना चाहता तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी। उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा था कि अगर ऐसा करके मैं खुश हूँ तो सारा परिवार खुशी-खुशी मेरे साथ है। मुझे उनकी इस प्रतिक्रिया से कोई आश्चर्य नहीं हुआ था।

दरअसल मैं पहले से जानता था कि वे यही कहेंगे। मुझे थोड़ी सी भी आशंका नहीं थी कि वे कोई दूसरी बात कह सकते हैं और जब मैंने उनके शब्द सुने तो मैं याद कर रहा था कि कैसे पहले भी अपने निर्णयों में मुझे उनका समर्थन और प्रोत्साहन मिलता रहा था।

जब मैं सिर्फ 13 साल का था, मैंने अपना काम शुरू कर दिया था और क्रमशः अधिकाधिक व्यस्त होता जा रहा था। कभी-कभी मैं अपने पिताजी के साथ उनके कार्यक्रमों में भी चला जाता था मगर अब मैं स्वतंत्र रूप से अकेले ही देश भर में घूम-घूमकर अपने कार्यक्रम भी करने लगा था। स्वाभाविक ही ऐसे कार्यक्रम सिर्फ स्कूल की छुट्टियों में ही नहीं होते थे इसलिए मुझे अक्सर स्कूल में अनुपस्थित रहना पड़ता था।

उस वर्ष अपने किसी कार्यक्रम के बाद जब मैं स्कूल आया तो मेरे एक शिक्षक ने पूछा कि मैं कहाँ था और मैं स्कूल क्यों नहीं आता। मैंने उन्हें बताया कि मैं दूसरे प्रांत, मध्य प्रदेश प्रवचन करने गया हुआ था। उन्हें पहले से पता था कि मैं क्यों स्कूल में अनुपस्थित रहता हूँ इसलिए उन्होंने पूछा: "जब तुम अक्सर स्कूल नहीं आते तो स्कूल आना पूरी तरह क्यों नहीं छोड़ देते?" उनकी बात का अर्थ यह था कि मैंने जब अपने पेशे का चुनाव कर लिया है तो स्कूल की चिंता छोड़कर पूरा ध्यान उस पर लगाना चाहिए।

मुझे कुछ समझ में नहीं आया। दरअसल यात्राओं में मैं हमेशा अपने साथ अपनी कोर्स की किताबें भी साथ रखता था और स्कूल की पढ़ाई भी करने की पूरी कोशिश करता था। नतीजतन, स्कूल से दूर रहने के बावजूद मैं पढ़ाई में कभी खराब विद्यार्थी नहीं रहा! अब मेरे शिक्षक कह रहे थे कि मैं स्कूल ही न आऊँ। समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए।

उस दिन जब मैं घर आया तो मेरे मन में यह बात घूम रही थी और मैंने अपने अभिभावकों से इस विषय में क्या करना चाहिए, पूछा। मेरे पिताजी ने जवाब दिया: वही करो, जो तुम्हें उचित लगता है।

आप कह सकते हैं कि एक 13 साल के बच्चे के लिए इस बात का निर्णय करना बड़ा मुश्किल था। लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा। बल्कि मैं उत्साह से भर गया कि मेरे पिताजी मुझ पर इतना विश्वास करते हैं, उन्हें लगता है कि मैं अपने बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम हूँ और अपने दिल का कहा मानकर अपने बारे में कोई भी निर्णय लेने की मुझे स्वतन्त्रता है। और मैंने वही किया। मैंने अपना पेशा चुना, स्कूल नहीं।

इस बात ने मुझे एक साथ स्वतन्त्रता और ज़िम्मेदारी प्रदान की, अपनी प्रसन्नता और अपने हितों की रक्षा करने की मुझमें शक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। उस समय सीखे हुए इस सबक के लिए मैं अपने अभिभावकों का सदा-सदा के लिए ऋणी रहूँगा। लगभग बीस साल बाद मेरे पिता ने फिर वही किया। जिन्होंने अपना जीवन ही धर्म की नीव पर खड़ा किया था और स्वयं एक धर्मगुरु थे और तब भी थे, जब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने दिल का कहा मानूँ, भले ही उससे मेरी राह उस राह से अलग हो जाती थी, जिस राह पर वे स्वयं चलते रहे थे और मुझे भी चलने के लिए प्रेरित किया था।

इस तरह मैं जो भी हूँ, जो भी करूँ, अपने परिवार के लगातार समर्थन और प्रोत्साहन के लिए उन सभी का सदा के लिए ऋणी रहूँगा। हमने एक साथ अपनी जीवन-यात्रा शुरू की और मैंने कभी भी एक क्षण के लिए भी उन्हें मेरा साथ छोड़ते हुए नहीं पाया। वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे और उसी तरह मैं भी हमेशा उनकी इच्छाओं और निर्णयों के समर्थन में खड़ा रहूँगा। मैं समझता हूँ कि सिर्फ इसी तरह हम सब प्रसन्न रह सकेंगे!

स्पष्टीकरण: अब मैं जिस बात पर विश्वास नहीं करता वह काम नहीं कर सकता! 24 नवंबर 2013

मैंने बताया था कि कैसे 2005 में मुझे लगा कि मुझे अपने जीवन में उस समय तक आ चुके परिवर्तनों के विषय में अपने परिवार वालों से बात करनी चाहिए। मैं यह भी सोच रहा था कि पता नहीं मेरे पिताजी, जिन्होंने अपना सारा जीवन एक गुरु के रूप में गुजारा था, कैसा महसूस करेंगे, जब मैं उन्हें बताऊंगा कि अब मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ और यहाँ तक कि मैंने धर्म से ही किनारा कर लिया है!

मैंने ऐसा समय चुना जब सारा परिवार एक साथ बैठा हुआ था और यह कोई मुश्किल बात नहीं थी क्योंकि हम सभी एक साथ भोजन किया करते थे। तो इस तरह एक बार फिर अपने सबसे नजदीकी लोगों के सामने, जिन पर मैंने सबसे अधिक भरोसा किया और जिन्हें मैं सबसे ज़्यादा प्रेम करता हूँ, दिल का गुबार निकालते हुए मैंने अपनी कहानी शुरू की।

मैंने गुफा से बाहर निकलने के बाद अपने अनुभवों के विषय में बताया। गुफा में लंबे एकांतवास के पश्चात मैं स्वयमेव एक बिल्कुल दूसरा व्यक्ति बन चुका था। मुझे अब दूसरों के साथ उस तरह जुड़ पाने में मुश्किल होती थी, जैसा कि पहले बहुत सहजता के साथ हो जाता था! मुझे अपनी बात को, अपने विचारों और धारणाओं में आए परिवर्तन को समझाने के लिए एक-एक शब्द ढूंढ़ना पड़ रहा था मगर परिवार के सभी सदस्यों ने मेरी बातें बहुत धैर्यपूर्वक सुनीं। मेरे लिए अब गुरु की भूमिका बिल्कुल अनुपयुक्त लग रही थी। धार्मिक विश्वासों के चलते जिन कामों को मैं पहले करता रहा था वे भी अब मुझे व्यर्थ लग रही थीं। मैं अब भी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर पर विश्वास करता था मगर उस शक्ति की परिभाषा मेरे लिए बदल चुकी थी। मैंने अपने धार्मिक कर्मकांड त्याग दिये थे और मैंने उन्हें बताया कि जिन विचारों और सिद्धांतों पर मैं पहले विश्वास करता था वे अब मुझे कतई विश्वसनीय नहीं लगते।

मेरे दिल का यह हिस्सा था, जो मुझे अपने गुरु वाले जीवन से दूर कर रहा था। मैं एक ईमानदार जीवन जीना चाहता था और अपने विचारों या भावनाओं और अपने व्यवहार में एकरूपता बनाए रखना चाहता था। मैं वह सब नहीं करना चाहता था, जिस पर अब मेरा विश्वास नहीं है या जिसे अब मैं ठीक नहीं समझता, भले ही पहले उन बातों पर मेरा दृढ़ विश्वास क्यों न रहा हो! इसके अलावा मैं नहीं चाहता था कि मैं उस बात के लिए किसी से कहूँ, जिस पर अब मैं खुद भी अमल नहीं करता। मेरे अंदर परिवर्तन इस रूप में हुआ था। अतीत के सभी शिष्यों से, वैसे भी, मैंने बिदा ले ली थी और किसी के साथ भी मेरा कोई संपर्क नहीं था। मेरे भाई-बहन और माता-पिता इस बात को पहले से जानते थे। जिनके साथ भी मैं मिलता था, उनके साथ भी मेरे संबंध अलग तरह के हो चुके थे। मैं उनके साथ अलग ढंग से बात करता था, अभी भी उन्हें और उनकी परिस्थितियों को मनोवैज्ञानिक रूप से परखता हुआ मगर एक मित्र या परिचारक के रूप में, उन्हें व्यावहारिक सलाह देते हुए, न कि एक गुरु के रूप में। सारी बातें उनके सामने खोलकर रखने के बाद आखिर मैंने परिवार के सभी सदस्यों पर नज़र डाली कि अब मुझे उनकी क्या प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।

न तो उन्हें कोई झटका लगा था न ही बहुत आश्चर्य हुआ। वे पहले से मुझमें और मेरे व्यवहार में क्रमशः आते परिवर्तनों को देख रहे थे। फिर भी, मेरे भीतर आए इन परिवर्तनों के विषय में इतने विस्तार से सुनना उनके लिए नई बात ही थी। यह कदम उठाने के लिए, जो मेरे अभिभावक जीवन में कभी भी उठा नहीं सकते थे, मैं क्यों और कैसे प्रवृत्त हुआ! अब वे सब कुछ मेरे मुख से सुन चुके थे और सभी ने उसे शांतिपूर्वक ग्रहण किया।

सभी बहुत गंभीरता और रुचि के साथ मुझे सुन रहे थे और जब मेरी बात समाप्त हुई तो भावुकतावश मेरे पिताजी के मुख से कुछ देर कोई बोल नहीं निकल सका। बड़ी मुश्किल से उन्होंने जो कुछ कहा वह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था और मन में गहरे उतर गया: "हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि तुम क्या सोचते हो। अगर तुम इसमें खुश हो तो हम भी खुश हैं। जो भी तुम्हारे अनुभव हैं, जो तुम्हारा मन कहता है, जो भी तुम्हारे विचार तुमसे कहते हैं, वही करो!"

सभी को अपनी राह खुद चुननी होती है।