क्या अंधविश्वासी लोग सच में अपनी बक़वास बातों पर विश्वास करते हैं? – 8 मार्च 13

पिछले कई दिनों से मैं अपने मित्र गोविंद के साथ घटी सड़क दुर्घटना और उसके बाद अस्पताल में उसकी सर्जरी को लेकर लोगों के बेहूदा अंधविश्वासों की बात कर रहा हूं। मेरे कई पाठक यह पढ़कर हैरान हैं कि लोग वास्तव में इस बात में विश्वास रखते हैं कि गुरुवार को सर्जरी करवाने से दोबारा सर्जरी करवाने का खतरा बढ़ जाता है। खासकर पाश्चात्य देशों के मेरे पाठक, जहां लोग अपेक्षाकृत कम अंधविश्वासी हैं, प्रश्न करते हैं: "क्या लोग वास्तव में इन बातों में यकीन करते हैं?" तो मैंने सोचा डायरी के आज के पन्ने में इस प्रश्न का विश्लेषण करना उचित रहेगा।

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये लोग यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि उनका अंधविश्वास कोरी बक़वास है। संभव है कि सुदूर ग्रामीण अंचलों के छोटे गांवों में रहने वाले लोग इन अंधविश्वासों को सच मानते हों। लेकिन जो लोग आधुनिक दुनिया में रहते हैं, जो यह जानते हैं कि लाखों लोग इनमें विश्वास नहीं करते, मैं नहीं मानता कि उन्हें इस इस सच्चाई का ज्ञान नहीं है। तो फिर अंदर खाने अंधविश्वास को निराधार मानते हुए भी वे क्यों नहीं उसके अनुरूप व्यवहार करते? क्यों नहीं इस बारे में खुलकर बात करते?

जिस बात को लोग एक ज़माने से मानते आए हों उसमें विश्वास करना एक प्रकार का सामूहिक निर्णय होता है। हर कोई यह मानता है कि यह एक परम्परा है और एक मामूली सी बात है। इस पर कभी कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया गया और अग़र किसी ने प्रश्न किया भी तो उसे यह कहकर चुप कर दिया कि 'इसमें शक़ की कोई गुंजाइश नहीं है हम तो इसी बात में विश्वास करते हैं।' लाखों लोग इस बात का प्रमाण दे सकते हैं कि अंधविश्वास में सच्चाई नहीं होती। लेकिन अग़र मात्र एक व्यक्ति यह कहानी सुना दे कि कैसे मंगलवार उसके लिए मंगलकारी रहा अथवा गुरुवार को किया गया काम दोबारा करना पड़ा तो अंधविश्वासियों को इससे बड़े प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

अंधविश्वास का विरोध करने वाले को एक ही बात कहकर चुप करा दिया जाता है "ठीक है, आप अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन मैं इसमें विश्वास करता हूं।" वे जानते हैं कि आप सही हैं लेकिन इस बात को अपने मन में छुपाकर रखेंगें और बाहर कभी ज़ाहिर नहीं होने देंगें। उनके मन में भीतर कहीं यह आशंका रहती है कि अग़र उन्होंने इसे मानना बंद कर दिया और तत्पश्चात कुछ अनिष्ट हो गया तो! अधिकतर लोगों की नज़र में 'दुर्घटना से सावधानी भली होती है।' बिना सोचे समझे अंधविश्वास को मानते रहना एक आसान काम है। यह बात अवश्य है कि इस तरह के बेहूदा अंधविश्वासों को नकारने के लिए साहस की ज़रूरत होती है।

आप सोच रहे होंगें कि मैं गोविंद को अपना गहरा दोस्त कैसे कह सकता हूं, जबकि वह अंधविश्वासी है और मैं इसका घोर विरोधी। मैं उसके विचार और विश्वासों को जानता हूं और वह भी यह अच्छी तरह जानता है कि मैं किन बातों में विश्वास रखता हूं और किनमें नहीं। हम दोनों के बीच में यह बात बिल्कुल स्पष्ट है, लेकिन फिर भी हमारी दोस्ती बहुत गहरी है।

हम दोनों रेल की दो पटरियों की तरह हैं – हम दोनों साथ साथ चलते हैं और एक दूसरे के बगैर हमारा गुजारा नहीं है लेकिन फिर भी जरूरी नहीं कि हम दोनों के विचार एक जैसे हों। हम अनेकों बार एक दूसरे से अपनी बात नहीं मनवा पाते हैं लेकिन इसके बावजूद हम दोस्त हैं।

हम अपना स्नेह आपस में बांटते हैं, दिल की बात एक दूसरे को बताते हैं। हमने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा साथ साथ गुजारा है। बहुत कुछ बदल गया है लेकिन हमारी सोच और विश्वासों की वजह से आपसी प्रेम में कोई कमी नहीं आई और मुझे यकीन है कि ऐसा कभी होगा भी नहीं। हम दोनों के विचार और आस्थाएं अलग अलग हो सकती हैं परंतु हम हमेशा दोस्त बने रहेंगें।

अब मैं आगरा के लिए निकलने वाला हूं गोविंद को अस्पताल से घर वापिस लाने के लिए।

एक और अंधविश्वास – बृहस्पतिवार को बीमारों या घायलों को देखने न जाएं – 7 मार्च 13

मैं आपको पहले बता चुका हूं कि कई लोगों को हैरानी हो रही थी कि गोविंद के साथ मंगलवार जैसे शुभ दिन दुर्घटना क्यों घटी। आज मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि क्यों ये सब लोग नहीं चाहते थे कि गोविंद की सर्जरी बृहस्पतिवार को हो। दुर्घटना के तुरंत बाद जब हम गोविंद को अस्पताल ले आए तो डॉक्टरों ने उसका एक्स – रे करवाया। रिपोर्ट आने पर उन्होंने बताया कि यह कोई छोटा मोटा फ्रैक्चर नहीं है बल्कि हड्डियां पूरी तरह टूट चुकी हैं। कहने का मतलब यह कि टांग पर प्लास्तर चढ़ा देने मात्र से बात बनने वाली नहीं है। टूटी हड्डियों के दोनों सिरे जोड़ने के लिए टांग की सर्जरी करनी पड़ेगी। गोविंद के परिवारजन एवं अन्य रिश्तेदार जो वहां इकठ्ठे थे, सब के सब इस बात पर एकमत थेः डॉक्टरों को जो करना है करें, लेकिन गुरुवार को सर्जरी न करें।

मैं शाम को उस बात को समझ नहीं पाया। मैं इस बात को भूल भी गया था लेकिन जब मैं बुधवार को वापिस अस्पताल आया तो गोविंद के पास बैठे एक सज्जन, जो जाने के लिए बस तैयार ही थे, बोले, "मैं तुम्हें देखने रोज आया करूंगा, कल को छोड़कर" उनके जाने के बाद मैंने गोविंद से पूछा – तुम गुरुवार को ऑपरेशन क्यों नहीं करवाना चाहते हो और ये सज्जन गुरुवार को क्यों नहीं आ सकते?

तब कहीं जाकर गोविंद ने मुझे इस अंधविश्वास के बारे में बताया। गुरुवार एक शुभ दिन नहीं माना जाता। इस दिन जो भी काम करेंगें, वह पूरा नहीं होता और अग़र यह कोई अशुभ काम है तो निश्चित ही इसकी पुनरावृत्ति होगी।

इसका अर्थ इस प्रकार समझें कि वे सब लोग बृहस्पतिवार को सर्जरी इस कारण से नहीं चाहते थे कि इस दिन की गई सर्जरी असफल होगी और डॉक्टरों को यह ऑपरेशन दोबारा करना पड़ेगा। गोविंद और वहां मौजूद परिवारजनों ने बताया कि बहुत से डॉक्टर भी गुरुवार को सर्जरी नहीं करते।

यह बात सुनकर मैं अपने परिचित डॉक्टरों के बारे में सोचने लगा और एक सच मेरे सामने आयाः उनमें से बहुत से डॉक्टर गुरुवार को अपना क्लीनिक बंद रखते हैं! ऐसा नहीं है कि केवल आम लोग अंधविश्वास के चलते इस दिन डॉक्टर के पास नहीं जाते बल्कि स्वयं कई डॉक्टर भी अंधविश्वासी हैं। मैंने कई डॉक्टरों के क्लीनिक के मुख्य दरवाजे पर बुरी नज़र से बचाने वाले टोटके लटकते हुए देखे हैं। अस्पतालों में लिखा रहता है "हम सेवा करते हैं, इलाज तो 'वह' करता है" मैं सोचने लगा कि इन डॉक्टरों ने विज्ञान का अध्ययन किया है तथा शरीर, उसमें होने वाली बीमारियों एवं उनके इलाज के बारे में जानते हैं। इसके बावजूद ये इस बात में विश्वास क्यों करते हैं कि गुरुवार एक अशुभ दिन होता है!

और ये मिजाज़पुर्सी के लिए आने वाले लोग बृहस्पतिवार को क्यों नहीं आयेंगें, भई? यहां भी वही अंधविश्वास हावी है: यदि आप किसी ऐसे घर में जाते हैं जहां गुरुवार को कोई मौत हुई है तो आपको दोबारा फिर किसी और की मातमपुर्सी के लिए उस घर में आना पड़ेगा – मतलब आपने पहले से ही सोच लिया कि इस घर में एक मौत और होगी। इसी तरह किसी बीमार का हाल पूछने के लिए गुरुवार को नहीं जाना चाहिए। गोविंद ने मुझे बताया कि मैं उसके परिवार के सदस्य जैसा हूं इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जो लोग इस बात में विश्वास रखते हैं, उनके यहां अग़र आप गुरुवार को मरीज़ का हाल पूछने जाते तो वे लोग आप पर बहुत नाराज़ होते। वे सोचते कि मैं उनका शुभचिंतक नहीं हूं और चाहता हूं कि ऐसी दुर्घटना दोबारा घटे।

मैंने इस बात का विरोध किया और पूछा कि मेरे जैसे लोगों का क्या जो इन अंधविश्वासपूर्ण नियम – कायदों से परिचित नहीं हैं। वह मुस्कराकर बोला, "आप समाज में रहते है । क्या समाज के नियम – कायदों की जानकारी आपको नहीं होनी चाहिए?"

मैं इन सब बातों से अनजान हूं और आप सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि जिस दिन को आप अशुभ मानते हैं, उस दिन यदि मैं आपके यहां आ जाऊं तो बुरा न मानिएगा। मैं इस बात से अनभिज्ञ हूं और आपका बुरा बिल्कुल नहीं चाहता हूं। गोविंद और उसके परिवार वालों की तरह आप भी मेरे इस अधार्मिक भोलेपन का बुरा न मानना।

आज मैंने गोविंद से फोन पर बात की और पूछा कि उसे अस्पताल से छुट्टी कब मिलेगी। डॉक्टर शाम को आया था और उसने नया एक्स – रे देखा था। दो दिन पहले भी हम इस बारे में चर्चा कर रहे थे कि वह अस्पताल से कब घर लौटेगा। वहां आए हुए रिश्तेदारों ने साफ कह दिया था, "अग़र बुधवार को छुट्टी मिलती है तो ठीक है। लेकिन यदि डॉक्टर गुरुवार को छुट्टी देता है तो हम एक दिन और यहां रुकेंगें और अगले दिन शुक्रवार को घर ले जाएंगें।" वे नहीं चाहते कि गोविंद गुरुवार को घर जाए। अगर ऐसा होता है तो उसे दोबारा अस्पताल आना पड़ेगा। मैंने फिर विरोध करते हुए कहा, "वह यहां रहकर ऊब चुका है। पिछले एक हफ्ते से वह इस छोटे से कमरे में पड़ा हुआ है। उसे घर जाने की इजाज़त मिल गई है तो फिर आप लोग एक दिन और क्यों रखना चाहते हैं यहां? क्या आप लोग अपने इस अंधविश्वास की वजह से अस्पताल का एक दिन का खर्चा और बर्दाश्त करोगे?" जवाब बड़ा चौंकाने वाला था, "जब किसी बृहस्पतिवार को आपको कोई बुरा अनुभव होगा, तब आप भी इसमें विश्वास करने लगेंगें।" इसी तरह धर्म का व्यापार चलता है: वे डरा – धमकाकर आपको अपने अंधविश्वास में शामिल कर लेते हैं। मैं उन लोगों से आगे बहस नहीं करना चाहता था जिन्होंने अपनी बुद्धि को धर्म को बेच दिया है। ऐसी परिस्थिति में गोविंद बीच का रास्ता पकड़ना चाहता था। वह कहने लगा, "बालेन्दु, मैं जानता हूं कि तुम बिल्कुल सही कह रहे हो लेकिन हमें रीति – रिवाजों का पालन करना पड़ता है और हम अपने बड़ों की बात को टाल नहीं सकते।" और आज सुबह जब मैंने यह सुना, उसे अस्पताल घर जाने की अनुमति तो मिल गई है लेकिन वह आज नहीं बल्कि कल शुक्रवार के शुभ दिन घर जाएगा, तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

घायल अथवा बीमार के साथ नका्रात्मक बातें न करें – 6 मार्च 13

सोमवार को मैं आपसे कह रहा था कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों मैं सकारात्मकता का साथ नहीं छोड़ता हूं, जैसे कि पिछले हफ्ते अपने दोस्त गोविंद के साथ घटी दुर्घटना के बाद भी सकारात्मक बना रहा। मैं इस बात में पूरा विश्वास करता हूं कि सकारात्मक विचार हमारी मदद करते हैं – खासकर ऐसी विकट परिस्थितियों में जब नकारात्मकता की गहरी खोह में गिरने की प्रबल संभावना रहती है। दुर्भाग्य से सभी लोग इस बात से सहमत नहीं होते या इस विचार को समझते नहीं हैं। पिछले सप्ताह गोविंद के साथ अस्पताल में बिताए दिनों के दौरान मैंने इसका साक्षात प्रमाण देखा।

बहुत सारे लोग गोविंद की मिजाज़पुर्सी के लिए आते हैं लेकिन मेरा मक़सद केवल एक ही रहता है उसे प्रसन्नचित्त रखना और उसके साथ समय बिताना। एक रिश्तेदार आया, दुर्घटना की कहानी सुनी और सिर हिलाते हुए दुखी स्वर में बोला, "अब तो तुम कभी दौड़ भाग नहीं कर पाओगे, कूद भी नहीं सकोगे", मैंने तुरंत इसका विरोध किया और बताया कि डॉक्टर ने ऐसा कुछ नहीं कहा है। उल्टे सर्जरी के बाद तो कुछ हफ्तों की फीजियोथैरेपी की मदद से वह बिल्कुल ठीक हो जाएगा। अगले दिन एक दूसरे सज्जन ने पूछा, "क्या तुम अब चल पाओगे?" एक महाशय तो कल भी अपनी राय प्रकट करते हुए कह रहे थे कि "अगर आपरेशन सफल न हो तो तुम्हारी टांग सीधी नहीं हो पाएगी। ऐसा भी हो सकता है कि यह हमेशा टेढ़ी ही रहे।"

एक महिला रिश्तेदार तो जितनी देर वहां रहती, उतनी देर बिसूरती ही रहती थी। आखिरकार मुझे कहना पड़ा कि ये नाटक कब तक चलता रहेगा? ऐसे मामलों मे मैं कोई संकोच नहीं करता / बड़ा मुंहफट हूं। इस तरह रोने का कोई कारण भी तो नहीं है। जो होना था वह हो गया और अगर यहां बैठकर आप इस तरह आंसू बहाते रहेंगें तो इससे गोविंद की कोई मदद नहीं होने वाली है। हां, इससे यहां बैठे सभी लोग दुखी और हो जाएंगें।

इन छोटी मोटी टिप्पणियों का मेरे दोस्त की मनःस्थिति पर कितना बुरा असर हुआ यह तब स्पष्ट नज़र आया जब उसने अगले दिन अपनी सूजी हुई टांग की तरफ देखते हुए अपने एक सहकर्मी से वेदनापूर्वक कहा, "पता नहीं अब मैं वापिस अपने काम पर जा पाऊंगा या नहीं।" मैंने उसे समझाया, "अरे, तुम ऐसे क्यों सोच रहे हो? तुम ठीक हो जाओगे। सब कुछ ठीक होगा और एक दिन ऐसा आयेगा जब तुम यह भी भूल जाओगे कि तुम्हारे साथ क्या हुआ था। यह सब भी तुम्हें तब याद आयेगा जब तुम किसी की टूटी हुई टांग के बारे में सुनोगे। तब तुम अपने आप से कहोगे, हां, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था!"

यह सब देखकर मुझे लगा कि अपने मित्र के पास रोज अस्पताल आने का मेरा निर्णय बिल्कुल सही रहा। उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता है और इसके अलावा मैं उसे प्रसन्नचित्त और सकारात्मक रखने की कोशिश करता रहता हूं। मैं उसे उसे समझाता रहता हूं कि एक टांग ही तो टूटी है, यह मुश्किल भी खत्म हो जाएगी और वह वापिस भला चंगा हो जाएगा।

मैं आप सभी से अनुरोध करना चाहता हूं: अगली बार जब कभी भी आप किसी बीमार या घायल का हाल पूछने के लिए जाएं तो वहां बैठकर नकारात्मक बातें न करें। मुस्कराते रहें, मरीज़ को हौंसला दें, सकारात्मक रहें और बीमार को उम्मीद बंधाएं। यदि आप अपनी चिंताएं मरीज़ को बताने लगेंगें तो ऐसा करके आप पहले से ही पीड़ा भुगत रहे व्यक्ति की परेशानियों में इज़ाफा ही करेंगें।

यदि आप सकारत्मक रहेंगें तो मेरी तरह आप भी यह कह पाएंगें, "घबराओ मत, तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे।" कल गोविंद की सर्जरी हो गई और सब कुछ ठीकठाक निपट गया। अब उसकी टांग ठीक होने में बस थोड़ा सा समय और लगेगा और उसके बाद वह फिर से चलने का अभ्यास करने लगेगा।

मंगलवार को भगवान आपकी रक्षा करते हैं – बेवकूफाना अंधविश्वास! – 5 मार्च 13

कल मैंने आपको बताया था कि पिछले एक हफ्ते से मैं रोज आगरा जा रहा हूं अपने मित्र गोविंद से मिलने के लिए। पिछले मंगलवार को हुई एक सड़क दुर्घटना में पैर की हड्डी टूटने के बाद से वह आगरा के एक अस्पताल में दाखिल है। मेरी तरह और भी बहुत लोग गोविंद से मिलने आते हैं। आनेवालों की बातचीत का एक हिस्सा मैंने सुना तो मैं भी बीच में बोल पड़ा क्योंकि बातचीत मेरे प्रिय विषय पर हो रही थीः धार्मिक अंधविश्वास!

यह चर्चा तब छिड़ी जब आगंतुकों में से एक ने गोविंद से पूछा कि यह दुर्घटना किस दिन हुई थी। वह मंगलवार का दिन था और साथ ही गोविंद ने यह भी जोड़ा, "जबकि मंगलवार तो बड़ा शुभ दिन होता है" अधिकांश हिंदू इस बात में विश्वास करते हैं कि मंगलवार एक पवित्र दिन होता है, यह भगवान का दिन होता है और वे इस दिन विशेष प्रार्थनाएं करते हैं। आम तौर पर वे ऐसा मानते हैं कि इस दिन सब कुछ शुभ ही होता है।

बड़ा प्रश्न यह थाः तो फिर यह दुर्घटना मंगलवार को क्यों घटी? मुझे उम्मीद थी कि धर्मभीरू लोग अपने अंधविश्वास की पुष्टि करने के लिए कोई न कोई उत्तर ढूंढ ही लेंगें – और मुझे निराशा नहीं हुई। ईश्वर की कृपा से, जो मंगलवार को विशेष रूप से कृपालु हो जाता है, बहुत ज्यादा बुरा नहीं हुआ। केवल टांग की हड्डी टूटी। अग़र यह दुर्घटना मंगलवार को न होती तो न जाने और क्या बुरा होता!

अब मैं स्वयं को रोक नहीं पाया और उन लोगों से पूछा,"भगवान ने उसे इस आफत में डाला ही क्यों?"

जवाब मिला कि भगवान तो हमेशा हमारा भला ही करते हैं और जो कुछ भी बुरा हमारे साथ होता है वह हमारे कर्मों का फल होता है। वाह! धार्मिक विश्वासों का यह लचीलापन बड़ा दिलचस्प लगता है मुझे! आप अनापशनाप बोलते रहिए और अपनी बक़वास की पुष्टि के लिए आपको कोई न कोई धार्मिक तर्क अवश्य मिल जाएगा। मेरे विचार से भाग्य और भगवान एक साथ नहीं चल सकते। यदिं अच्छी बातों का श्रेय आप भगवान को देते हैं तो बुरी बातों का ठीकरा कर्मों के ऊपर क्यों फोड़ते हैं? क्या आपके अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्मों के लिए भगवान को जिम्मेदार नहीं होना चाहिए? जब मैं पूछता हूं कि दुनियाभर में बच्चे भूख से क्यों मर रहे हैं तो यही कर्मों का लचर सा तर्क दिया जाता है। ये लोग कहते हैं कि ये उन बच्चों के कर्मों का फल है कि भगवान उन्हें नहीं बचाता। उन्हें अपने कर्मों का फल भुगतना ही होगा। भगवान यह पक्षपात क्यों करता है कि कुछ लोगों को तो उनके दुर्भाग्य से बचा लेता है और कुछ को नहीं?

आप मानते हैं कि आपने पाप किया है इसलिए आपका भाग्य बुरा है। आपके दुर्भाग्य आपके साथ दुर्घटना घटी लेकिन ईश्वर ने आपका जीवन बचा लिया। उसने आपका जीवन तो बचा लिया लेकिन आपकी टांग नहीं बचा पाया वह। यदि भगवान आपका सिर जमीन से टकराने से बचा सकता है, यदि टेंपो से उछलकर बाहर गिरने पर वह आपको ऐसे स्थान पर गिरने से बचा लेता जहां कांच या ऐसी ही कोई खतरनाक वस्तु पड़ी हुई होती, यदि उसने सड़क पर दौड़ती हुई अन्य कारों के नीचे आने से आपको बचा लिया तो क्यों नहीं वह आपकी हड्डियों को टूटने से बचा पाया? उसने उस कार को टेंपो से टकराने ही क्यों दिया? उसने आपको टेंपो से बाहर गिरने ही क्यों दिया?

क्या उस वक़्त भगवान किसी और काम में व्यस्त था और आपका ख्याल उसे तब आया जब आपकी टांग टूट चुकी थी? कहीं वह ऐसा तो नहीं सोचता कि आप नीचे गिरें मग़र आपकी हड्डियां सही सलामत रहें, तो क्या यह कुछ अटपटा नहीं लगेगा? या फिर वाकई भगवान ने सोचा हो 'सुन रे गोविंद, उस वक़्त तेरा नसीब खराब था। लेकिन इतना भी खराब नहीं था तेरे दिमाग़ में कोई गंभीर चोट आती। खैर मना कि बात हड्डी पर टल गई।'

न तो वे लोग मुझे समझा पाए और न ही मैंने उन्हे अपनी बात समझाने की कोशिश की। वे तो बस इस बात में विश्वास करना चाहते थे कि भगवान ने उसे बचा लिया। वे आज फिर भगवान से प्रार्थना कर रहे होंगें कि उसकी सर्जरी सकुशल हो जाए, आखिरकार आज मंगलवार जो है! लेकिन आज मैं भी अस्पताल जाऊंगा और कामना करूंगा कि डॉक्टर के हाथ से उसकी सर्जरी अच्छी तरह संपन्न हो जाए। सर्जरी खत्म होने के बाद मैं अस्पताल में उसके साथ रहूंगा। यह बात कतई मायने नहीं रखती कि आप ईश्वर में विश्वास करते हैं या नहीं। मायने रखता है आपका स्नेह और सहयोग जो एक मित्र को उसके संकट की घड़ी से उबरने में मदद करता है।