जब महिलाएँ अपने पति के विवाहेतर संबंधों को स्वीकार कर लेती है – 7 दिसंबर 2015

जब मैं जर्मनी में था, कुछ मित्र अपने मित्रों की कहानियाँ सुना रहे थे। उनमें से एक कहानी ने मुझे वैसी ही स्थितियों का सामना करने को मजबूर बहुत सी भारतीय महिलाओं के विषय में सोचने को विवश कर दिया। मैंने सोचा, आखिर दोनों में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है: वैवाहिक संबंधों में कुछ महिलाएँ अपने पतियों के विवाहेतर संबंधों को बड़ी सहजता के साथ स्वीकार कर लेती हैं-सुविधाजनक होने के कारण या फिर डर के मारे!

एक दोस्त ने मुझे बताया, एक महिला, जिसे वह बीस साल से भी ज़्यादा समय से जानता है, अपने पति के साथ काफी समय से अत्यंत असामान्य परिस्थितियों में रह रही है: उसका पति हफ्ते में लगभग एक बार उससे मिलने घर आता है। बाकी समय वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहता है। जब वह घर आता है तो सब कुछ ऐसा होता है जैसे वे दोनों सामान्य विवाहित पति-पत्नी हों: वह अपने गंदे कपड़े लेकर आता है और वह उन्हें धोती है, उस रोज़ वह एक अतिरिक्त व्यक्ति के लिए खाना बनाती है और इस तरह वह एक सामान्य काम पर से घर लौटा हुआ पति होता है!

लेकिन वे एक साथ नहीं सोते-और कहानी के इसी बिंदु पर मुझे पूछना ही पड़ा: क्या पहले शुरू हुआ, अलग-अलग बिस्तरों पर सोना या गर्लफ्रेंड के साथ रहना? अलग-अलग बिस्तरों सोना पहले शुरू हुआ था! एक बार महिला ने अपने पति से कहा था कि वह भविष्य में उसके साथ यौन संबंध नहीं रखना चाहती। वह उसके साथ सोना नहीं चाहती थी और उसने पति के सामने यह विकल्प भी रखा कि यदि वह चाहे तो कहीं और जाकर अपनी यौन ज़रूरतें पूरी कर सकता है।

बहुत से कारण थे कि वे अलग नहीं हुए और मुख्य रूप से सिर्फ इसलिए कि यह बहुत आसान और सुविधाजनक था: वे अपने टैक्स और बैंक खाते एक रखे हुए थे, जिस तरह वह हमेशा से रहती आई थी, अब भी रह सकती थी और पति को उसकी स्वतंत्रता भी उपलब्ध हो गई। उनके संबंध अच्छे हैं, यानी बाकी सब कुछ ठीक है।

मेरे मन में तुरंत उन परिवारों का खयाल आया, जिनसे मिलने रमोना अक्सर उनके घर जाती रहती है-हमारे स्कूली बच्चों के घर, जहाँ अक्सर महिलाएँ ढोंग करती हैं, जैसे वे एक सामान्य, सुखी दाम्पत्य संबंध में बंधी हुई हैं जबकि वास्तव में उनके पति ज़ोर-शोर से विवाहेतर संबधों में मुब्तिला होते हैं। एक नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पति और पत्नी के बीच बेगानापन व्याप्त है और उनके बीच आन्तरिक संबंधो का लोप हो चुका है-लेकिन वे विवाह का भ्रम बनाए रखती हैं। दंपति के रूप में साथ जीवन बिताने का ढोंग, क्योंकि संबंध विच्छेद की तुलना में यह आसान और सुविधाजनक है और एक ऐसे समाज में जहाँ एकाकी महिला पर लोगों का कहर टूट पड़ता हो, निश्चित ही तलाकशुदा कहलाने से बहुत बेहतर!

मुझे समानताएँ नज़र आती हैं। मुझे लगता है, कुल मिलाकर दोनों स्थानों पर स्थिति एक जैसी है। इसी तरह चलाना अधिक सुविधाजनक है। साथ ही मैं यह फैसला नहीं दे रहा हूँ कि यह ठीक है या गलत है या कि यह एक देश के संदर्भ में सही और दूसरे की परिस्थितियों में गलत है! मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि मैंने दोनों में ये समानताएँ पाईं और उन्हें आपके सामने रख रहा हूँ।

उन्मुक्त सेक्स संबंध बनाना गलत नहीं है परन्तु मुझे लगता है, वे सफल नहीं हो पाते – 3 दिसंबर 2015

पिछले तीन दिन से खुले संबंधों के बारे में लिखने के बाद और यह बताने के बाद कि क्यों वे अक्सर असफल रहते हैं, आज मैं एक और बात बहुत स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: जबकि मेरा विश्वास है कि वे सफल नहीं हो सकते, अगर लोग इन संबंधों को आजमाना चाहते हैं तो मैं नहीं समझता कि उसमें कुछ भी गलत है।

मैं सामान्य रूप से खुले दिमाग वाला और खुले और स्पष्ट रवैए वाला व्यक्ति हूँ, विशेष रूप से सेक्स को लेकर। मैं मानता हूँ कि यह पूरी तरह आपका चुनाव होना चाहिए कि आप किसके साथ सेक्स संबंध रखना चाहते हैं। अगर आप कई अलग-अलग लोगों के साथ सम्भोग करना चाहते हैं तो कीजिए। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ बंधे नहीं रहना चाहते तो वैसा ही करें। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ सुदीर्घ और पक्का संबंध रखते हुए आपसी समझौते के तहत अधिक पार्टनर्स रखने की स्वतंत्रता चाहते हैं तो वह भी मेरे लिए पूरी तरह स्वीकार्य है।

सेक्स एक वर्जना बन चुका है, जबकि यह दुनिया में सबसे अधिक आनंददायक कार्य है और इसके साथ तरह-तरह के प्रयोग करना, और नई-नई चीजें आजमाना और भी आनंददायक उत्तेजना प्रदान करता है। शायद इसी आनंद के चलते इसका दमन किया जाता है, जिससे लोगों को अपने काबू में रखा जा सके।

इसकी जगह आप अपने आपको शक्तिशाली बनाने में सेक्स का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन जब मैं यह कहता हूँ तो मेरा मतलब यह नहीं होता कि सिर्फ इसलिए कि समाज इसे वर्जित करता है, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के साथ संभोग करने से आप अधिक शक्तिशाली और कार्यक्षम हो जाते हैं। जी नहीं, मेरा मतलब होता है कि आप अपने दिल की सुनें और अपने शरीर की आवश्यकता तो पूरी करें ही, अपनी भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति भी करें। कि अपनी दिली इच्छाओं के सामने आप परम्पराओं और सामाजिक नियमों को व्यवधान न बनने दें।

लेकिन मेरा विश्वास है कि देर-सबेर अधिकतर लोगों का मन उन्हें बता देगा: यही है वह! वह व्यक्ति, जिसे मैं किसी और के साथ साझा नहीं करना चाहता और जिसके लिए मैं स्वयं एकमात्र व्यक्ति बने रहना चाहता हूँ।

मेरी नज़र में अन्य सभी संबंध सफल नहीं हैं।

अत्यधिक सेक्स किस तरह एक रूखा अनुष्ठान बनकर रह जाता है – 2 दिसंबर 2015

पिछले दो दिनों में मैंने आपको बताया कि कि क्यों खुले सेक्स संबंध अक्सर सफल नहीं होते। उदाहरण स्वरूप मैंने आपको दो स्थितियों से अवगत कराया था और दोनों ही स्थितियों में संबंधों की असफलता का पहला कारण यह होता है: लोग सेक्स को एक तकनीक के रूप में देखते हैं, एक ऐसी क्रिया, जिससे मनोरंजन होता है, उसमें एक तरह का उत्तेजक आनंद प्राप्त होता है-और वे प्रेम को पूरी तरह भूल जाते हैं!

बहुत से लोग खुले संबंधों के विचार पर मोहित होकर उसे आजमाते हैं। फिर वे बहुत से भिन्न-भिन्न लोगों के साथ हमबिस्तर होने लगते हैं और संभोग में बुरी तरह लिप्त हो जाते हैं। कई बार वे अपने पार्टनर्स इतनी जल्दी-जल्दी बदलते हैं कि उन्हें याद तक नहीं रहता कि कल रात किसके साथ सोए थे। इन संबंधों में भावना नहीं होती, एहसास नहीं होता। तब सेक्स महज शारीरिक क्रिया भर बनकर रह जाती है, एक तरह का यांत्रिक अनुष्ठान, जिसे किसी तरह निपटाया जाना है। उसमें प्रेम नदारद होता है।

कुछ समय बाद उन्हें लगता है कि हर बार किसी चीज़ की कमी रह गई है। वे समझने लगते हैं कि उन्हें वह प्राप्त नहीं हो रहा है, जिसकी खोज में वे यह सब कर रहे थे: किसी रिश्ते का असली मकसद हासिल नहीं हो पाता। किसी के साथ उस स्तर पर जुड़ाव, जो इतनी गहराई तक चला जाता है, जिसे शारीरिक संसर्ग छू भी नहीं सकता। उन्हें प्रेम नहीं मिल पा रहा है।

ऐसा हो भी नहीं सकता! अगर सेक्स सिर्फ अनुष्ठान है, यांत्रिक कर्मकांड है, जब इससे कोई फर्क न पड़े कि किसके साथ सेक्स संबंध बनाया जा रहा है और भले ही आप खुद अपने पार्टनर का चुनाव कर रहे हों लेकिन आप उन्हें बार-बार बदलते रहें तो आप उस पार्टनर से उस तरह नहीं जुड़ पाएँगे जिस तरह किसी एक के साथ दीर्घजीवी सबंध में जुड़ पाते हैं। और सेक्स को लेकर आपकी भावनाएँ भी समान नहीं होंगी, जैसी कि पहले प्रयोग के समय किसी एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में होती हैं।

आप सेक्स साझा कर सकते हैं, शारीरिक संसर्ग साझा कर सकते हैं और किसी अनुष्ठान में साथ-साथ शामिल हो सकते हैं लेकिन आप वही स्नेह, वही भावनाएँ और वही प्रेम साझा नहीं कर सकते जैसा एक सेक्स पार्टनर के साथ कायम दीर्घजीवी संबंध में कर पाते हैं। प्रेम ही वह चुंबक है जो आपको और आपके पार्टनर को जोड़े रखता है। अक्सर लोग समझते हैं कि सेक्स वह गोंद है-लेकिन वास्तव में वह चुंबक सिर्फ और सिर्फ प्रेम है।

मेरे विचार में सेक्स भी महत्वपूर्ण है! जी हाँ, वह संबंधों के आवेग को घनीभूत कर देता है और दो व्यक्तियों को करीब लाने में महत्वपूर्ण स्थान अदा करता है। लेकिन सिर्फ तभी जब शारीरिक के अलावा एक दूसरा रिश्ता भी हो। आप किसी के साथ एक विस्मयकारी रात गुज़ार सकते हैं और नियमित रूप से उसके साथ यौनानुभव प्राप्त कर सकते हैं, जो आपकी शारीरिक जरूरतों को पूरी तरह संतुष्ट और आनंदित भी कर सकता है लेकिन इतना होने के बाद भी आप किसी चीज़ की कमी महसूस करते हैं।

यही 'कोई चीज़' प्रेम है। और मेरे विचार में इस गहरे प्रेम और लगाव को किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा करना असंभव है!

एक से अधिक सेक्स पार्टनर के साथ आपसी संबंधों में रोमांच, थ्रिल, उत्तेजना और असफलता – 1 दिसंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे बहुत से खुले संबंध टूटने लगते हैं क्योंकि संबंधित लोग वास्तव में खुला और स्वतंत्र होने के स्थान पर मुख्य पार्टनर के साथ अपने संबंध में लिप्त रहे आते हैं। एक और परिस्थिति है, जिसका सामना होने पर भी अक्सर संबंध टूटते हैं: जब पार्टनरों में से कोई एक अपने साथी में रुचि खो देता है, क्योंकि एक के साथ अधिक समय बिताने के बाद वह उससे बोर होने लगता है!

आप भी जानते हैं कि शुरू में सब कुछ बड़ा उत्तेजक और रोमांचक लगता है लेकिन कुछ हिचकिचाहट भी होती है: इन संबंधों को समाज उचित नहीं मानता अर्थात समाज में यह एक टैबू ही है। इसलिए वे डरते हैं कि लोगों को पता चलने पर वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? या भविष्य में किसी दिन मुझे पता चलेगा कि मैं ज़िन्दगी भर वैश्यागीरी करता रहा? सबसे प्रमुख संबंध यानी जिसके साथ सबसे पहले संबंधों की शुरुआत हुई थी, एक तरह की सुरक्षा जैसा होता है, एक सुरक्षित सहारा-समाज के दूसरे लोगों के सन्दर्भ में भी और खुद अपनी भावनाओं और विचारों के सन्दर्भ में भी। यह एक सुविधाजनक ढाँचा होता है, जिसकी कार्यविधि और व्यवस्था के बारे में आपको पता होता है कि वह कैसे काम करता है और दूसरे सेक्स संबंधों के रोमांच से तुष्ट होकर या ऊबकर आप पुनः जिसके पास निःसंकोच वापस जा सकते है।

लेकिन कुछ समय बाद वे इस रोमांच से आश्वस्त होते जाते हैं। बार-बार पार्टनर बदलने की उन्हें आदत पड़ जाती है बल्कि इस जीवन-शैली को अपनाने वाले ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। आप तुरंत अनुमान लगा सकते हैं कि उसके बाद क्या होता होगा: उन्हें किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती!

नियमित रूप से किसी एक व्यक्ति के साथ रहना बहुत उबाऊ हो जाता है, बहुत से उत्तेजक, विविधतापूर्ण, नए से नए और तैयार विकल्प मौजूद होते हुए किसी एक के साथ रहना! सीधी सी बात है, खुले संबंध में भी सुदीर्घ संबंधों के कारण होने वाली दिक्कतों को क्यों भुगता जाए?

पहला मुख्य पार्टनर जो दे सकता है, वह अब इतना आकर्षक नहीं रह गया है कि उसी के साथ रहने की कोई मजबूरी हो। अगर दोनों एक जैसा महसूस कर रहे हों तो ये संबंध आपसी समझौते के तहत बिना किसी बड़ी मुसीबत के समाप्त हो जाते हैं और दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर निकल पड़ते हैं। अगर दोनों की जीवन शैली यही है तो भविष्य में वे एक रात के साथियों की तरह मिल भी सकते हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

लेकिन अगर दोनों में से सिर्फ एक की जीवन शैली ऐसी है तो दूसरे का दुखी होना अपरिहार्य है और पता चलते ही वह इन खुले संबंधों को कोसना शुरू कर देगा और उसका अहं यह सोचकर चोट खा सकता है कि सामने वाले को कभी भी उससे अधिक प्रिय व्यक्ति नहीं मिल सकेगा! पूरी संभावना होती है कि ऐसा व्यक्ति स्थिर संबंध की ओर वापस लौट आए, जिसमें इतना अनुशासन होगा कि अपने मुख्य संबंध के बाहर किसी और से सम्भोग का त्याग कर दे। जब आप इस दर्द का अनुभव कर लेते हैं तो उसके बाद उन्हीं खुले संबंधों के अनुभव को आप दोहराना नहीं चाहेंगे!

लेकिन इस प्रकरण के सन्दर्भ में मूल समस्या दूसरी है: जब लोग सेक्स को प्यार से नहीं जोड़ते। लेकिन उस विषय पर विस्तार से कल…

क्या आप भी अपने आपको सेक्स का सबसे बड़ा खिलाड़ी समझते हैं – 30 नवंबर 2015

मैंने पहले कई बार खुले संबंधों के बारे में लिखा है और उन पर विस्तार से अपना मत भी रखा है। हालांकि अब भी इस विषय में मेरा मत काफी हद तक वही है जो पहले था, मैं आज अपने ब्लॉग का उपयोग इसी स्वच्छंद जीवन शैली पर लिखने के लिए करना चाहता हूँ-क्योंकि मुझे अब भी लगता है कि यह किसी भी हालत में ज़्यादा समय तक सुचारू रूप से नहीं चल सकता!

मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जिन्हें स्वच्छंद और खुले संबंध पूरी तरह स्वीकार्य हैं, कुछ दूसरे हैं जो किसी के साथ इसे शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और कुछ और हैं जो पहले ही इसमें लिप्त हो चुके हैं। और एक वर्ग उनका भी है जो पहले इसमें मुब्तिला रह चुके हैं। ज़्यादातर लोगों को शुरू में बहुत रोमांच होता है लेकिन समय के साथ अंततः उन्हें पता चलता है कि वे भ्रमित थे। अब वे उससे निराश हो चुके हैं क्योंकि अब उन्हें लगता है कि उसके बारे में जैसा उन्होंने सोचा था, उनका अनुभव वैसा नहीं रहा है।

जो लोग इस तरह जीवन बिताना चाहते हैं, स्वाभाविक ही, शुरू में उन्हें इसमें बड़ी उत्तेजक सम्भावनाएँ दिखाई देती हैं। बिना अपने मुख्य पार्टनर की सुरक्षा खोए स्वच्छंद रूप से किसी भी पुरुष या महिला के साथ सोने की आज़ादी। तीसरे या चौथे व्यक्ति को भी बिस्तर पर लाकर सेक्स के ज़ायके को और चटपटा बनाने की संभावना भी। ईर्ष्या या ऐसे ही दूसरे अप्रिय एहसासों से निपटने का कोई झंझट नहीं क्योंकि समझौते के मुताबिक आखिर हर कोई दूसरे यौन साथियों का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र है!

दुर्भाग्य से, मैंने देखा है कि यही तथ्य लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्याएँ खड़ी करता है! वे समझते हैं कि यह बड़ा मज़ेदार है, वे किसी दूसरे के साथ संभोग करते रहेंगे और उनके पार्टनर को इस बात से ईर्ष्या नहीं होगी-लेकिन पार्टनर के प्रति अपने अनुराग को और अपनी ईर्ष्या को वे खुद ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं, उसे कम आँक रहे हैं! वे नहीं समझते कि उनका पार्टनर भी यही कर सकता है-वह भी दूसरों के साथ यौन संबंध बना सकता है!

वास्तव में मैंने पाया है कि बिस्तर पर प्रवीणता के संदर्भ में यह समस्या अतिशय अहं से संबंधित है। जैसे हर महिला समझती है कि बिस्तर पर वह सबसे प्रवीण स्त्री है वैसे ही हर पुरुष अपने आपको सेक्स का सबसे शक्तिशाली, प्रवीण और उत्तेजक खिलाड़ी समझता है! एक तरफ महिला पार्टनर समझती है कि पुरुष पार्टनर को मिलने वाली कोई भी स्त्री सेक्स के मामले में मेरे जितनी प्रवीण हो ही नहीं सकती तो दूसरी तरफ पुरुष सोचते हैं कि मेरे अंदर सेक्स की इतनी दक्षता और क्षमता है कि कोई स्त्री एक बार मेरे साथ सो ले तो किसी दूसरे के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती!

एक बार जब आप इस संभावना को अपने लिए खोल देते हैं तो आपको जल्द ही पता चलता है कि वास्तविकता कुछ अलग है! अचानक आप नोटिस करते हैं कि सिर्फ आप ही माह में तीन या चार अलग-अलग लोगों के साथ मौज नहीं ले रहे हैं या एक रात के साथियों के साथ संभोगरत नहीं हो रहे हैं बल्कि आपका पार्टनर भी उसी राह पर चल पड़ा है। स्वाभाविक ही, उस पर भी दूसरे विपरीतलिंगियों की नज़रें हैं और वह भी इस स्वच्छंदता का भरपूर आनंद ले रहा है या ले रही है!

मेरे प्रिय मित्रों, यहीं से असली समस्या की शुरुआत होती है। ईर्ष्या, हर वक़्त दबा हुआ गुस्सा-क्योंकि जो आप स्वयं कर रहे हैं, उसी बात पर आप अपने पार्टनर पर नाराज़ नहीं हो सकते- आपको सामान्य नहीं रहने देता। ईर्ष्या के कारण उपजे इसी दुःख और कथित अपमान के चलते छोटी-छोटी बातों पर आपस में झगड़े शुरू हो जाते हैं!

मैंने कई खुले संबंधों को इसी तरह असफल होते हुए देखा है, जिसका कारण यही होता है कि दोनों पार्टनर पर्याप्त खुले और लचीले नहीं थे और अपने मुख्य पार्टनर से उतने अलिप्त नहीं हो सके थे, जितना वे समझते थे कि हो गए हैं!

हाँ, मुझे सेक्स, पैसा, भौतिक पदार्थ और मेरी पत्नी पसंद हैं और मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है! 19 नवंबर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक ऐसा मेहमान आया, दुनिया के बारे में जिसका बहुत कट्टर नज़रिया था। कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो, आप कुछ भी कहें या करें, आपको नीचा दिखाने की चाह रखते हैं। यह व्यक्ति उसी तरह का व्यक्ति था- और आज मैं उसी व्यक्ति को ऐसे व्यवहार का उदाहरण बनाना चाहता हूँ।

यह व्यक्ति अपने आप को कम्युनिस्ट विचारधारा का नास्तिक कहता था। वह हमेशा बातचीत के लिए सन्नद्ध रहता था-जो अक्सर दूसरों को नीचा दिखाने की कवायत में बदल जाती थी। इसी तरह जब एक बार हम आश्रम में टहल रहे थे तो उसने मेरे कपड़ों के बारे में पूछा। निश्चय ही, यह पहला मौका नहीं था जब किसी ने मुझसे मेरे कपड़ों के बारे में पूछा था। दरअसल यह अक्सर होता है लेकिन इस बार प्रश्न के स्वर में एक प्रकार का आरोप नज़र आता था: अगर मैं खुद को नास्तिक कहता हूँ तो ऐसे कपड़े क्यों पहनता हूँ जिससे कोई अन्य धारणा बनती है?

अपने ब्लॉगों में पहले ही मैं स्पष्ट कर चुका हूँ कि अपने कपड़ों से मैं कोई सन्देश नहीं दे रहा हूँ। जैसे भी हों, मुझे यही कपड़े पसंद हैं और दूसरी तरह के कपड़े मैं नहीं पहनना चाहता।

अपने प्रश्न के इस उत्तर पर उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया: आपको अपने कपड़े पसंद हैं? यानी आपको भौतिक वस्तुएँ पसंद हैं?

जी हाँ, पसंद हैं! मुझे बहुत से साज़ो-सामान पसंद हैं और पैसा कमाना भी पसंद है। मुझे अपने काम से प्यार है और मैं अपनी पत्नी और बेटी से भी प्यार करता हूँ! मैं किसी तरह की धार्मिक जड़ता से या ऐसे किसी अन्य दर्शन से बंधा हुआ नहीं हूँ, जो मुझे सलाह दे कि यह पहनो और वह न पहनो! मैं किसी दूसरे व्यक्ति के विचारों को इजाज़त नहीं देता कि वे मेरी भावनाओं को निर्देशित करने लगें!

बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भौतिक वस्तुओं से अलिप्तता ही सही रास्ता है। बहुत से लोग ब्रह्मचर्य पर विश्वास करते हैं और भावनाओं के प्रति अलिप्तता को भी उचित मानते हैं। भारत में ऐसे लोग अधिकतर धार्मिक साधू होते हैं। पश्चिम में भी ऐसे लोग अध्यात्मवादियों में पाए जाते हैं। वे अधार्मिक हो सकते हैं लेकिन फिर भी उनकी कोई न कोई विचारधारा होती है और साथ ही यह विचार कि आपको क्या प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

ये सारे लोग मानते हैं कि हमें अपने कपड़ों से लगाव नहीं होना चाहिए, पैसे से प्यार नहीं होना चाहिए और हमें अपने करीबी लोगों से अलिप्त रहना चाहिए। उन्हें जो मानना है, मानते रहें लेकिन मैं अपने जीवन का पूरा मज़ा लेना चाहता हूँ! मैं मानता हूँ कि जीवन का आनंद न लेना गलत है इसलिए मुझे अपने वस्त्र पसंद हैं और मैं अपने काम से प्रेम करता हूँ। जैसे मुझे गरीब बच्चों की मदद करना अच्छा लगता है, उसी तरह पैसे कमाना भी बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी बेटी से और पत्नी से प्यार करता हूँ, मुझे सेक्स बहुत पसंद है और मुझे हर तरह की आरामदेह सुविधाओं का उपभोग भी बहुत पसंद है। मैं छुट्टियाँ मनाना पसंद करता हूँ-जैसा कि मैं इस समय जर्मनी में अपने परिवार और बहुत सारे दोस्तों के साथ कर रहा हूँ!

मुझे जीवन का आनंद लेना पसंद है। मुझे जीवन से प्यार है और मानता हूँ कि हम सब को जीवन का हरसंभव अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करना चाहिए। यदि आप कोई इतर विचार रखते हैं, तो बेशक अपने विचार के साथ खुश रहें और उसी के अनुसार जीवन बिताएँ-मुझे अपने विचारों के लिए नीचा दिखाने की कोशिश न करें। इसमें आपको सफलता नहीं मिलेगी और आप बेकार ही मेरा और खुद अपना समय बरबाद करेंगे। मैं आपको सहमत करने की कभी कोशिश नहीं करूँगा। मैं सिर्फ एक सलाह दूँगा: सिर्फ एक बार मेरी तरह जीवन का आनंद लेने और उससे प्यार करने की कोशिश करके देखिए। आप पछताएँगे नहीं!

धर्म, सेक्स, ईश्वर और आपके पूर्वजों के बीच क्या संबंध है? 13 अक्टूबर 2015

आज से नवरात्रि की शुरुआत है, जो हिंदुओं का एक पवित्र त्योहार है और कई दिनों तक चलता है। यह बताने के स्थान पर कि इन नौ दिनों में हिन्दू क्या करते हैं, मैं आज आपको बताऊँगा कि वे क्या नहीं करते: सेक्स। जी हाँ, और इसे 15 दिन और खींचकर लंबा कर दिया जाता है, जो दोनों मिलाकर 24 दिन हो जाते हैं और माना जाता है कि अच्छे, आस्थावान हिन्दू इन 24 दिनों में संभोग नहीं करते। गजब!

असल में इस बात का एहसास मुझे हाल ही में एक मित्र के साथ बातचीत के दौरान हुआ। वह उच्च जाति का धार्मिक व्यक्ति है और हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों का सख्ती के साथ पालन करता है। बातचीत के दौरान उसने बताया कि दो हफ्तों से उसने सम्भोग नहीं किया है। अपने जीवन में वार्षिक श्राद्ध के इन दो हफ़्तों के दौरान उसने कभी सेक्स नहीं किया। तभी मुझे आगामी त्योहारों में होने वाले जश्न का खयाल आया और मैंने पूछा, ‘तब तो नवरात्रि के अगले दस दिन भी तुम सम्भोग नहीं करोगे?’ उसने कहा कि नही, बिल्कुल नहीं-नवरात्रि के दिन तो बहुत पवित्र होते हैं, सम्भोग का सवाल ही नहीं उठता!

न जाने कितने हिन्दू यह पढ़कर मुझे भला-बुरा कहेंगे-नवरात्रि का पहला दिन है और इसे चर्चा के लिए यही विषय मिला!

पिछले 15 दिन का समय हर साल वह समय होता है जब हिन्दू अपने पूर्वजों को याद करते हैं। इन दिनों में वे अपने मृत पूर्वजों के लिए कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। वे मानते हैं कि इस समय उनके मृतक रिश्तेदार उनके करीब होते हैं। इन दिनों में वे कोई नया या शुभ कार्य शुरू नहीं करते क्योंकि वे मानते हैं कि यह समय अशुभ है और इसलिए उस काम में व्यवधान उपस्थित होंगे। इस समय आप जो भी करें, उसे अपने पुरखों के विचार के साथ करें। सेक्स करना उनके प्रति असम्मान होगा, उनकी अवज्ञा मानी जाएगी और ऐसा करके आप अपने माता-पिता, दादा-दादी और दूसरे पूर्वजों का अपमान कर रहे होंगे!

लेकिन आज और आने वाले नौ दिनों की बात बिल्कुल दूसरी है। नवरात्रि का समय शुभ समय है और आम हिन्दू इन दिनों में बहुत से समारोह आयोजित करते हैं, नए काम शुरू करते हैं और मानते हैं कि ईश्वर का आशीर्वाद इन कार्यों के साथ होगा और उनका परिणाम अच्छा और शुभ होगा! और वे सेक्स करके उसकी पवित्र, लाभदायक ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहेंगे!

जी नहीं, सेक्स एक पाप की तरह है, वह किसी शुभ काम को खराब कर सकता है, जो भी अच्छा काम आप शुरू करना चाहते हैं, उसमें वह व्यवधान उपस्थित कर सकता है! यहाँ, भारत में सेक्स बहुत खराब और अपवित्र काम माना जाता है! आप सोच सकते हैं कि अगर आपके मन में सेक्स को लेकर ऐसी भावनाएँ हैं तो आप सेक्स करते हुए खुद को कितना अपराधी महसूस करेंगे! धर्म के अनुसार भारत में सिर्फ वंशवृद्धि हेतु सेक्स की मान्यता है और अगर आपका उद्देश्य बच्चे पैदा करना नहीं बल्कि प्रेम के वशीभूत अपनी और अपने साथी की शारीरिक क्षुधा शांत करना है तो निश्चित ही वह सर्वथा अनुचित है!

उसके करीब आना, जिसे आप प्रेम करते हैं, उससे लिपटना, चूमना, आनंद लेना और सबसे बढ़कर, अपनी शारीरिक इच्छाओं को संतुष्ट करना आदि हर तरह से बुरा और अनुचित माना जाता है। यहाँ तक कि वे लोग भी, जो सामान्य रूप से सोचने-समझने वाले हैं और समझते हैं कि सेक्स में कोई बुराई नहीं है, सेक्स को लेकर जड़ जमाए बैठी नकारात्मक भावनाओं के चलते सामान्य दिनों में भी अपने साथी के साथ सोते हुए अपराधी महसूस करते हैं। इन पवित्र दिनों में वे सेक्स के बारे में क्या सोचते होंगे, आप कल्पना कर सकते हैं! और यह इन नौ दिनों की ही बात नहीं है, साल भर में यहाँ त्योहारों के इतने सारे शुभ दिन हैं जब-उन लोगों के लिए, जो सेक्स को पाप मानते हैं-प्रेम का यह समारोह वर्जित है।

लेकिन यह इतना गलत विचार है कि मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अपना विरोध ठीक तरह से कैसे व्यक्त करूँ! इस धरती पर मौजूद सबसे शानदार चीज़, प्रेम के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा शारीरिक मिलन, दो शरीरों का पिघलकर एक हो जाना, प्रेम के चलते होने वाली वह इंद्रियजन्य अनुभूति, वह भावना आदि, इन सभी को धर्म ने आसुरी करार दे दिया है। इन सीमाओं से हमें बाहर निकलना होगा-अपने व्यवहार के धरातल पर ही नहीं, बल्कि अपने दिलो-दिमाग से भी इन गलत विचारों को निकाल बाहर करना होगा!

प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति गलत नहीं है बल्कि बहुत सुंदर है!

सेक्स, सेक्स और सेक्स – पश्चिम के विषय में भारत का विकृत नजरिया – 2 सितंबर 2015

पिछले दो दिन मैंने आपको समाचारों में देखी गई कुछ बातें बताईं: यूरोप आने वाले शरणार्थियों की समस्या और कैसे यूरोप के लोग उनका स्वागत कर रहे हैं और उनकी हरसंभव मदद भी कर रहे हैं। लेकिन इनमें से ज़्यादातर जानकारियाँ मुझे भारतीय मीडिया से प्राप्त नहीं हुई हैं बल्कि जर्मन और अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन समाचारों के ज़रिए प्राप्त हुई हैं। यहाँ, भारत में हमें पश्चिम के समाचार मिलते तो हैं किन्तु उनके ऊपर वहाँ की चटपटी खबरें और कहानियाँ ज़्यादा होती हैं। मुझे लगता है पश्चिम और वहाँ के निवासियों को एक ख़ास, भ्रामक नज़रिए से देखने के भारतीय रवैए के पीछे इन्हीं चटपटी कहानियों का बहुत बड़ा हाथ होता है!

मैं इसे और स्पष्ट करता हूँ। मैंने कई बार आपसे कहा है कि पश्चिम के बारे में बहुत से भारतीयों का रवैया बड़ा हास्यास्पद होता है। उनका विश्वास होता है कि पश्चिम में ज़िन्दगी गुज़ारने का मतलब 'मुक्त यौन संस्कृति' में जीना है। यह परिभाषा अपने आप में हास्यास्पद है और जब दो अलग अलग व्यक्ति इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो दोनों के ही मन में इसके पूर्णतः अलग अलग अर्थ होते हैं!

हमारे अखबारों में अंतर्राष्ट्रीय समाचार वाले पृष्ठ पर सिर्फ राजनैतिक खबरें होती हैं: ओबामा के निर्णय, संयुक्त राष्ट्र और उसके कामकाज, ग्रीस को यूरोपियन यूनियन में बनाए रखने के लिए यूरोपीय देशों की जद्दोजहद, आदि, आदि। लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं होता, हमें पश्चिमी जीवन शैली और फैशन के बारे में भी खूब पढ़ने को मिलता है!

अब यह मत कहने लगिएगा कि हॉलीवुड के बारे में भी बहुत कुछ होता होगा- हमारे पास बॉलीवुड है, इसलिए हमें ज़्यादा सितारों की, फिल्मों और गायकों की ज़रूरत नहीं पड़ती! फिर भी, कुछ चुनिंदा कहानियाँ तो होती ही हैं, जो निश्चित ही खासी बिकाऊ होती हैं: कुछ भी, सेक्स की चाशनी में पगा हुआ!

उदाहरण के लिए, जब एक ऑस्ट्रेलियन महिला जानवरों को प्रताड़ित करने के जुर्म में ब्रिटेन में गिरफ्तार हुई थी! सिर्फ क्रूरता के आरोप में नहीं! असल में पुलिस ने उसके घर पर छापा मारा और नशीली दवाएँ ढूँढ़ती रही और उसका मोबाइल फोन जब्त कर लिया- मगर किसी नशीले पदार्थ का कोई सुराग उन्हें नहीं मिला बल्कि एक वीडियो मिला, जिसमें वह अपने कुत्ते के साथ संभोगरत दिखाई गई थी मगर यहाँ के समाचार पत्रों में नशीले पदार्थ की नहीं बल्कि एक वीडियो मिलने की खबर की नमक-मिर्च लगाकर विस्तृत चर्चा की गई थी कि वीडियो में वह महिला अपने कुत्ते के साथ संभोगरत दिखाई गई है!

निश्चित ही, उस दिन ब्रिटेन से आने वाला सबसे मुख्य समाचार यही रहा होगा!

और किसी दूसरे दिन शायद यह देश भर की स्नातक परीक्षाओं के नतीजे आने के बाद लगभग 5500 युवा लड़के-लड़कियाँ स्कॉटलैंड के बीच पर खुशियाँ मना रहे थे। अलग-अलग कुछ समूहों में वे शराब पी रहे थे और अचानक दो समूहों के बीच मार-पीट होने लगी। जब पुलिस आई तो उन्होंने सिर्फ मार-पीट करने वाले शराबियों को ही गिरफ्तार नहीं किया बल्कि सड़क के किनारे संभोगरत दर्जनों युवा लड़के-लड़कियों को भी गिरफ्तार कर ले गए। और यहाँ के अखबारों का शीर्षक बना "बीच पर सेक्स"!

शायद आप समझ रहे होंगे कि इन बातों का रुख किधर होता है! उनमें इसके आगे कोई जानकारी नहीं होती और बाकी हमारी स्वैर कल्पनाओं पर छोड़ दिया जाता है! ऐसे समाचार हम अक्सर पढ़ते रहते हैं- इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि एक सामान्य भारतीय को पश्चिम के बारे में ऐसे मिथ्या विचार ही प्राप्त होते हैं! अगर आपको वहाँ जाकर कुछ समय बिताने का मौका नहीं मिला है या अगर आप वहाँ के अंग्रेजी टीवी नहीं देखते और अगर आपका पश्चिमी लोगों से कोई मिलना-जुलना नहीं है तो पूरी संभावना है कि आपके मन में पश्चिम के बारे में ऐसे विचार अक्स हो जाएँ: कि वहाँ सेक्स के अलावा विशेष कुछ नहीं होता और वहाँ हर जगह सेक्स ही सेक्स है!

दिन भर के कामकाज और मेहनत के बाद क्या आप सेक्स के लिए बेहद थक जाते हैं? 10 अगस्त 2015

कुछ समय पहले मुझसे किसी ने अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर सलाह मांगी: दिन भर कामकाज में व्यस्त रहता था। जब घर लौटता था तो अपने काम के तनाव और श्रम के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत शिथिल पड़ जाता था। या तो उसके पास समय नहीं होता था या समय होता था तो इतनी शक्ति नहीं होती थी कि पत्नी के साथ सम्भोग कर सके! इसके चलते स्वाभाविक ही पत्नी असंतुष्ट रह जाती थी और दुखी रहने लगी थी। उसे क्या करना चाहिए?

सर्वप्रथम तो यह कि यह बड़ी अच्छी बात है कि आप किसी दूसरे से सलाह मांगने की ओर उद्यत हुए हैं क्योंकि समय आ गया है कि आप इस विषय में गंभीर हो जाएँ! जब आपके संबंध उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जहाँ शिकायतों का स्वर तीक्ष्ण होने लगता है और दोनों एक-दूसरे से अप्रसन्न रहते हैं तब आपके लिए अपनी जीवन-चर्या पर गंभीरता पूर्वक विचार करना ज़रूरी हो जाता है! अच्छा हो अगर आप उसमें कुछ बड़े परिवर्तन भी कर सकें!

दूसरे, मैं आशा करता हूँ कि सहवास-सुख की कमी सिर्फ आपकी पत्नी नहीं, बल्कि आप भी महसूस कर रहे होंगे!

जब एक बार आप विवाह कर लेते हैं तो आपके साथ हाड़ मांस का एक और प्राणी भी साथ रहने लगता है, जिसकी आपसे कुछ जायज़ अपेक्षाएँ होती हैं। यहाँ मैं आर्थिक अपेक्षाओं की बात नहीं कर रहा हूँ! और स्पष्ट कहूँ तो मैं सिर्फ भौतिक अपेक्षाओं की बात भी नहीं कर रहा हूँ! असल में यह समस्या सेक्स से संबंधित है ही नहीं। वह भावनाओं और प्रेम से संबंधित है। परस्पर प्रेम के साझेदार के रूप में आपकी पत्नी का आपके हृदय और आपके समय पर कुछ अधिकार तो है ही!

आप खुद निर्णय करें: आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है? क्या आप अपने काम के लिए जी रहे हैं या सिर्फ आजीविका के लिए काम कर रहे हैं? आपको अपना काम ज़्यादा प्रिय है या पत्नी के साथ समय बिताना?

मुझे गलत न समझें- अपने काम में भी आपको मज़ा आना चाहिए। लेकिन ज़्यादा आनंद आपको अपने परिवार या साथी के साथ समय बिताने में आना चाहिए। अगर इस तरह आप अपना दिल पत्नी के सामने नहीं खोल सकते तो आपको जीवन जीने का कोई और तरीका अख्तियार करना चाहिए था!

बहुत से लोग कहेंगे: 'मैं यह सब, इतनी कड़ी मेहनत उन्हीं के लिए कर रहा हूँ, अपने परिवार के लिए, उनके भविष्य के लिए और बच्चों के लिए!' विशेष रूप से, जब आपके बच्चे भी हैं तो आपको यह समझना चाहिए कि आप ऐसे आनंद में अपना समय नहीं गुज़ार सकते। मेरा दावा है कि अगर आप कुछ कम काम करते हैं, थोड़ा कम पैसा कमाते हैं लेकिन कुछ अधिक समय परिवार और पत्नी के साथ गुज़ारते हैं तो आपका जीवन वास्तव में बेहतर हो जाएगा!

अगर आप इसी तरह चलते रहे, अपना रवैया नहीं बदला तो आप और आपका साथी एक-दूसरे से और दूर होते चले जाएँगे। अब आपको तय करना होगा कि आप साथ रहने में और एक-दूसरे से प्रेम करने में ज़्यादा रुचि रखते हैं या अपने काम में ही रमे रहना चाहते हैं। अगर आप अपने काम को चुनते हैं और पत्नी भी किसी दूसरी बात में मन लगा लेती है, कोई ऐसी रुचि पैदा कर लेती है, जहाँ वह अपना समय बिताना चाहती है तो फिर आपके पास शिकायत का कोई कारण नहीं होना चाहिए!

अपनी पत्नी से यह अपेक्षा न करें कि वह ताजिंदगी घर की सफाई करती रहेगी, बच्चों की देखभाल करती रहेगी और आपका इंतज़ार करती रहेगी कि जब आपको समय मिलेगा तो आप आएँगे और उसके साथ समय बिताएँगे। या उसके साथ बिस्तर साझा करेंगे- हालांकि इस मामले में सेक्स सिर्फ एक निशानी है कि आप लोग आपस में कितना करीब हैं। वह सिर्फ परस्पर प्रेम का भौतिक इज़हार है! और फिलहाल आपका काम उसे धीरे-धीरे खत्म कर रहा है!

आपके लिए आवश्यक है कि दैनिक जीवन में आप अपने प्रेमीजनों के लिए समय निकालें और फिर सप्ताहांत को वास्तविक सप्ताहांत बनाएँ- परिवार के साथ कहीं छुट्टियों पर निकल जाएँ या दो दिन का समय उनके साथ कुछ अलग तरह से बिताने की कोशिश करें। सिर्फ समय न गुजारें- ज़िंदगी का लुत्फ उठाएँ!

क्या आध्यात्मिकता (धार्मिकता) का अर्थ यह है कि आप दगाबाजी करें फिर अपने आप को माफ़ भी कर दें? 15 जुलाई 2015

कुछ सप्ताह पहले यहाँ आश्रम के एक मेहमान के साथ मैंने एक व्यक्तिगत सलाह सत्र किया था। वह शारीरिक विश्रांति और मानसिक स्पष्टता हेतु भारत आया था और इसलिए उसने हमारे आयुर्वेद योग अवकाश कार्यक्रम की बुकिंग की थी। कार्यक्रम के अंतर्गत वह योग कक्षाओं में शामिल हुआ और आयुर्वेदिक मालिश और चिकित्सा प्राप्त की। इससे बढ़कर, उसने मुझसे बात करने की इच्छा भी प्रकट की। वास्तव में वह महज अपनी निजी गुप्त बातों और उनके चलते उसके मस्तिष्क में व्याप्त जटिलताओं को सुलझाने के उद्देश्य से सारी बातचीत करना चाहता था।

उस व्यक्ति ने अपने संबंध के बारे में मुझे बताया। वह आठ साल से एक महिला के साथ संबंध रखे हुए थे। वे एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और एक दूसरे की भावनाओं का खयाल रखते थे लेकिन कभी विवाह करने का विचार उनके मन में नहीं आया। वे जिस तरह रहा करते थे, उसी में खुश थे और उन्हें एक दूसरे के होने के बारे में किसी आधिकारिक प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं थी। पिछले तीन साल से वे एक साथ, एक छत के नीचे रह भी रहे थे।

बोलते-बोलते इसी क्षण वह थोड़ा हिचकिचाया फिर कहा, "लेकिन मैं कभी भी उसके प्रति वफ़ादार नहीं रहा था।" वह काफी समय से अपने साथी के साथ धोखेबाज़ी कर रहा था और कई दूसरी महिलाओं के साथ यौन संबंध रखे हुआ था। ये सभी संबंध उन महिलाओं से होते थे, जिनसे वह कुछ समय पहले ही मिला होता था, फिर उनके बीच एक रात का संबंध बन जाया करता था और बाद में कभी उनकी मुलाक़ात नहीं होती थी। संयोग से, एक महिला ऐसी भी थी जो दोनों की साझा मित्र थी।

अपने सलाह सत्रों में अब तक मैं बहुत से लोगों से बातचीत कर चुका हूँ और यह विषय मेरे लिए कतई नया नहीं था। इसलिए जब यह व्यक्ति चुप हुआ और उसने बड़ी आशा से मेरी तरफ आँख उठाकर देखा तो मैंने उसे वही सलाह दी, जो अक्सर इन मसलों पर देता आया हूँ: सच का दामन न छोड़ें! अगर आप किसी और से प्रेम करते हैं तो उसे अपने साथी से कहें। अगर आप यह बात छिपाते हैं तो यह भेद जहर बनकर धीरे-धीरे न सिर्फ आपके संबंधों को दूषित करेगा बल्कि आपके दिमाग को भी करेगा। समय आएगा, जब आप अपने आपको इतना बुरा समझने लगेंगे कि अपना भेद छिपा नहीं पाएँगे। अभी भी मौका है, अगर आप ईमानदारी से सारी बातें खुलकर उसे बता दें और माफी माँग लें तो संभव है, वह आपको क्षमा कर दे।

लेकिन मेरी सलाह पर उसकी प्रतिक्रिया पर मैं स्तब्ध रह गया: "ओह, मैं अपने आपको गुनहगार नहीं समझता! मैं उस तरह का आदमी नहीं हूँ। मैं अपने आपको माफ कर सकता हूँ! लेकिन मुझे डर है कि वह इतना घबरा जाएगी कि अवसादग्रस्त हो सकती है! जिस घर में हम रह रहे हैं, वह उसी का है- वह मुझे निकाल बाहर करेगी…पता नहीं, इस शहर में मैं अपना घर ले पाऊँगा या नहीं!"

चलिए, सच तो सामने आया: आध्यात्मिक रूप से यह आदमी इतना पहुँचा हुआ है कि एक महिला के साथ दगाबाज़ी करके खुद अपने आपको माफ कर सकता है और ऊपर से यह दावा भी कर सकता है कि वह उस महिला से प्रेम करता है! इससे ज़्यादा क्या स्पष्ट होना था! फिर, वह उस महिला के साथ उसके घर में रहने में अपना फायदा भी स्पष्ट देख रहा है… अब उसके दिमाग का एक भ्रम मुझे दूर करना था: अगर आप ऐसा कुछ करते हैं, जिससे आपके साथी को नुकसान पहुँचे और फिर उस बात को उससे छिपाते भी हैं तो स्पष्ट है कि आप उससे प्रेम नहीं करते बल्कि सिर्फ उसके प्रेम का लाभ उठाना चाहते हैं!

आईने की तरह साफ – क्या ख़याल है आपका?