सिर्फ रहने के स्थान के बदले में दिन भर मजदूरी करना – हमारे स्कूल के बच्चे – 22 जनवरी 2016

रोशनी और कृष्णकांत

आज फिर शुक्रवार है और इसलिए अपने स्कूल के बच्चों से आपका परिचय करवाने का दिन। आज मैं आपको रौशनी और उसके छोटे भाई कृष्णकांत से मिलवाना चाहता हूँ। रौशनी ग्यारह साल की और कृष्णकांत नौ साल का है और दोनों ही दो साल से हमारे स्कूल के विद्यार्थी हैं।

जब हम उनके घर पहुँचे तो बाहर से देखकर सबसे पहले हमें बड़ा अचंभा हुआ कि इतने शानदार बंगले में ये लोग कैसे रह रहे हैं। लेकिन जल्द ही उसका कारण स्पष्ट हो गया: जिन बच्चों से हम बाहर मिल चुके थे और जिनके साथ ही अंदर आए थे, बंगले के भीतर नहीं बल्कि उससे लगे एक कमरे के भीतर निकल गए। वह एक कमरे का अलग फ्लैट है, जिसमें बाथरूम और संडास भी है। उसे देखकर लगता है जैसे उसे नौकरों के लिए ही बनवाया गया है-और फिर हमें पता चला कि वास्तव में तथ्य यही है।

रौशनी की माँ उस बंगले के मालिक के परिवार में नौकरानी है। वह घर की सफाई करती है, खाना बनाती है, परिवार की बूढ़ी माँ की देखभाल करती है और घर भर के कपड़े भी धोती है। अर्थात, घर के लगभग सारे काम वही करती है। बदले में उन्हें बंगले से लगे हुए छोटे से घर में रहने की जगह मिली हुई है।

पहली नज़र में यह एक बढ़िया समझौता प्रतीत होता है लेकिन कुछ देर बाद ही यह स्पष्ट हो जाता है कि उस जगह के किराए के रूप में वास्तव में वे कितनी बड़ी कीमत अदा कर रहे हैं-और तब आपको लगता है कि किसी नियमित नौकरी में होती तो वह महिला इतना काम करके इससे बहुत ज़्यादा कमा सकती थी! इसके अलावा न सिर्फ उसे उस परिवार के लिए खाना बनाना पड़ता है बल्कि अपने परिवार के लिए अलग से राशन खरीदकर फिर से अपने घर में दोबारा वही मशक्कत करनी पड़ती है।

परिवार का राशन, कपड़े-लत्ते और रोज़मर्रा की दूसरी सभी आवश्यक वस्तुएँ रौशनी के पिता की आमदनी से पूरी की जानी ज़रूरी हो जाती हैं। वह बिजली-मिस्त्री है लेकिन स्वतंत्र रूप से काम नहीं करता बल्कि एक ठेकेदार के नीचे काम करता है। लेकिन इसके बावजूद उसकी आमदनी इस पर निर्भर करती है कि ठेकेदार को और उसे कितना काम मिलता है-और जब काम कम होता है तो परिवार के खर्चे मुश्किल से ही पूरे हो पाते हैं और उन्हें किसी तरह अपना काम चलाना पड़ता है!

इसके बावजूद परिवार खुश है। तीन साल पहले, जब उन्हें अपने गृहनगर, फिरोजाबाद में काम मिलना बंद हो गया, वे लोग वृंदावन आ गए थे। उस समय की उनकी आर्थिक स्थिति की तुलना में आज उनकी आर्थिक स्थिति काफी बेहतर है। और फिर हमारे स्कूल का पता चल जाने के बाद स्थिति और बेहतर हो गई क्योंकि उसके बाद से उन्हें बच्चों की स्कूल-फीस, किताब-कापियों और दूसरे पढ़ने-लिखने के सामानों के खर्चों की चिंता भी नहीं करनी पड़ती-फीस नहीं लगती और सारे सामान उन्हें स्कूल से मुफ्त प्राप्त हो जाते हैं।

लेकिन बच्चों को एक बात जो सबसे अच्छी लगती है और जिसका ज़िक्र वे अक्सर करते रहते हैं, वह यह है: यहाँ शिक्षक हर चीज़ बहुत अच्छी तरह समझाकर पढ़ाते हैं और बच्चों को वे मारते-पीटते भी नहीं!

चार हफ्ते में 14 किलो – हमारे योग-आयुर्वेद-शिविर के वज़न घटाओ कार्यक्रम की सफलता की कहानी – 21 जनवरी 2016

weight loss

हाल ही में हमारे योग-आयुर्वेद-शिविर के वज़न घटाओ कार्यक्रम के अंतर्गत आश्रम में चार हफ्ते गुज़ारने के बाद एक व्यक्ति ने यहाँ से बिदा ली-और निश्चित ही अपनी सफलता पर अत्यंत खुश और संतुष्ट होने के बाद! उसने सिर्फ चार सप्ताह में अपना 14 किलोग्राम वज़न कम किया, उसके पैंट बहुत ढीले पड़ गए थे और वह इतना चुस्त-दुरुस्त और तंदरुस्त दिखाई देने लगा, जैसा शायद वह जीवन में कभी नहीं रहा होगा! और हमारे लिए यह एहसास ही इतना सुन्दर था कि आश्रम में गुज़ारे समय को लेकर वह अत्यंत खुश और संतुष्ट महसूस कर रहा था!

इस व्यक्ति ने आश्रम आते ही मुझसे कहा था कि वह आश्रम में हर तरह के अनुशासन का पालन करने के लिए कटिबद्ध है. और वाकई उसने अपने संकल्प को दृढ़ता पूर्वक निभाया!

हमारे विश्रांति शिविर में योग और आयुर्वेद दोनों सम्मिलित होते हैं. सुबह सबेरे दस किलोमीटर लंबे परिक्रमा मार्ग पर तेज़ गति से पैदल चलना होता है-निश्चित ही पुण्य लाभ प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि शारीरिक व्यायाम के उद्देश्य से! हमारा मेहमान पूर्णेंदु के साथ घूमने जाता था-और जल्दी ही वे दोनों काफी तेज़ गति से घूमने लगे थे, इतना तेज़ कि जब वापस आश्रम आते थे तो पूरी तरह पसीने में नहाए होते थे- लेकिन अत्यंत प्रसन्न भी दिखाई देते थे!

उसके दिन का अगला कार्यक्रम होता था, यशेंदु के साथ योग का ‘वज़न घटाओ’ कार्यक्रम! न सिर्फ इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले सहभागी, बल्कि यशेंदु भी इस योग-सत्र का भरपूर आनंद लेता है. इस योगाभ्यास से मांसपेशियों की अच्छी वर्जिश होती है, दिल और फेफड़ों के कई व्यायाम भी किए जाते हैं और एक घंटे तक शक्ति प्रदान करने वाले ये व्यायाम करने के बाद कोई भी व्यक्ति थककर चूर हो सकता है!

इतना व्यायाम करने के पश्चात वह व्यक्ति आयुर्वेदिक मसाज लेने पहुँचता था, जो उसकी मांसपेशियों के सारे तनाव को दूर करके उसे विश्रांति पहुँचाता था. आम तौर पर हमारे विश्रांति शिविरों में सहभागियों को एक दिन छोड़कर मालिश प्रदान की जाती है लेकिन इस व्यक्ति को मालिश इतनी पसंद आई कि उसने अतिरिक्त बुकिंग करवाके रोज़ मालिश करवाई! और तेलमालिश के पश्चात स्टीम केबिन में पसीना बहाकर वह शरीर के दूसरे ज़हरीले टॉक्सिन्स भी बाहर निकाल पाता था.

और उसके बाद दोपहर में रमोना उसके लिए और योग-आयुर्वेद विश्रांति-शिविर में भाग लेने आए दूसरे सहभागियों के लिए एक हल्का-फुल्का योग कार्यक्रम रखती थी, जिसमें सिर्फ खिंचाव के व्यायामों द्वारा मांसपेशियों को लचीला बनाने पर मुख्य ज़ोर दिया जाता है.

और इतना सब करने के बाद वह बहुत स्वास्थ्यवर्धक भोजन ग्रहण करता था-वैसा भोजन, जो कम कैलोरी युक्त होता है अर्थात वैसे खाद्य, जिनसे पेट भर जाए और खाने वाला भूखा महसूस न करे, वह स्वास्थ्यकर भी हो लेकिन जिनसे शरीर में कम से कम कैलोरीज़ प्रवेश कर सकें.

निश्चित ही यहाँ वज़न घटाने की सारी व्यवस्था मौजूद है और हम भी उसे प्रोत्साहित करने की हर-संभव कोशिश करते हैं- लेकिन उस व्यक्ति को वैसी सफलता सिर्फ इसलिए प्राप्त हो सकी कि उसने पूरे दृढ निश्चय के साथ उन व्यवस्थाओं का लाभ उठाया और उन प्रयोगों और कार्यक्रमों में पूरी तन्मयता के साथ हिस्सा लिया. हम अक्सर उसकी इच्छा शक्ति की तारीफ़ करते रहते थे और मैं जानता हूँ कि उसी के कारण वह अपने उद्देश्य में सफल हुआ और साथ ही अपनी सफलता पर खुश भी.

इस तरह लोगों को उनके लक्ष्य हासिल करने में मदद करके हमें बहुत ख़ुशी होती है. चाहे लक्ष्य विश्रांति प्राप्त करने का हो, शक्ति और ऊर्जा में वृद्धि हासिल करने का हो या वज़न कम करने का: अगर आप वास्तव में अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें पूरा विश्वास है कि हम उसमें आपकी न सिर्फ मदद कर सकते हैं बल्कि सारी प्रक्रिया को आपके लिए बहुत आसान, रोचक और खुशनुमा बना सकते हैं! तो आप अपनी उड़ानों की बुकिंग कीजिए और हम यहाँ आपका स्वागत करने हेतु हर समय प्रस्तुत हैं!

कंप्यूटर आपके जीवन को आसान बना सकते हैं, अगर वे ठीक तरह से काम करते रहें! 20 जनवरी 2016

कंप्यूटर

पिछले कुछ समय से रमोना अपने कंप्यूटर के साथ बुरी तरह जूझ रही थी और अब ऐसा लग रहा है कि इस संघर्ष में अंततः उसने कंप्यूटर पर विजय पा ली है- और इसलिए इस विजय-गाथा के बारे में आपको बताने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ!

समस्या एक नए सॉफ्टवेअर खरीदने के साथ शुरू हुई, जो हमारे जर्मन चैरिटी संगठन को मिलने वाली सहयोग-राशियों की रसीदें सीधे उनके पास भेजने के काम में प्रयुक्त होता। इस साल के अंत में जब प्रविष्टियाँ करने के लिए रमोना ने सॉफ्टवेअर इंस्टॉल किया तो उसके कंप्यूटर ने भी अपने सॉफ्टवेअर को न्यू ऑफिस वर्जन के मुताबिक़ अपडेट कर लिया।

जब नए सॉफ्टवेअर पर वह काम करने लगी तो उसे पता चला कि चीजें उस तरह काम नहीं कर रही हैं जैसा, सामान्य रूप से उन्हें करना चाहिए। गलतियाँ हो रही थीं उसके स्क्रीन पर बार-बार ‘errors’ का संदेश दिखाई देता और उसका आगे काम करना असंभव हो जाता। आखिर उसे एक सॉफ्टवेअर डेवलपर की मदद लेनी पड़ी। रिमोट कंट्रोल के ज़रिए उसने रमोना के कंप्यूटर पर कुछ और सॉफ्टवेअर इंस्टॉल किए तथा कुछ फाइलें जोड़ीं, जिससे सारी चीजें पुनः सुचारू रूप से काम करने लगीं। रमोना खुश हुई कि, देर से ही सही, आखिर अब वह अपने सारे काम निपटा लेगी!

लेकिन दूसरे दिन एक और नाटक शुरू हो गया: उसका ‘आउटलुक’, जिसके ज़रिए वह सामान्यतः अपने ईमेल भेजती है, काम ही नहीं कर रहा था! अगले चार दिनों तक वह माइक्रोसॉफ्ट के कस्टमर सपोर्ट के साथ घंटों फोन पर उलझी रही! उसके पिता भी उसके साथ बैठकर देखते रहे कि कैसे तकनीकी कर्मचारी उसके कंप्यूटर पर कब्ज़ा जमाए इस कोशिश में लगे हुए हैं कि किसी तरह उसके ईमेल्स का आना-जाना पुनः शुरू हो सके!

अंततः, अपरा के जन्मदिन के एक दिन पहले रात साढ़े नौ बजे आशा की किरण दिखाई दी और समस्या का समाधान हुआ: उसका ‘आउटलुक’ फिर काम करने लगा और वह पुनः इमेल्स भेजने और आए हुए इमेल्स पढ़ने में कामयाब हो सकी!

न जाने क्यों, इस सब के बीच कोई यह नहीं समझ पाया कि समस्या के साथ नए सॉफ्टवेअर का क्या संबंध हो सकता है जबकि सॉफ्टवेअर को पिछले ‘ऑफिस’ वर्जन के साथ काम करते रहना चाहिए था, न कि इस वर्जन के साथ! क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब रमोना ने सॉफ्टवेअर खोला और उस पर काम करना शुरू किया तो क्या हुआ? बिल्कुल ठीक: ‘आउटलुक’ ने फिर से काम करना बंद कर दिया!

लेकिन इस बिंदु पर आकर रमोना को पता चल गया कि क्या हुआ है और दो-चार बार कोशिश करने के बाद वह पुनः ईमेल की समस्या हल करने में सफल हो गई। लेकिन सॉफ्टवेअर का क्या किया जाए? उसने सोचा, चलो, एक बार फिर सॉफ्टवेअर डेवलपर से ही पूछते हैं!

संक्षेप में, पिछले दस दिनों में रमोना चार अलग-अलग कंप्यूटरों पर उस सॉफ्टवेअर को चलाने की कोशिश कर चुकी है और हर बार यही पता चलता है कि किसी न किसी सेटिंग में कोई न कोई दिक्कत पेश आ ही रही है-या फिर वह कंप्यूटर ही उस नए सॉफ्टवेअर को चलाने के लिहाज से बहुत पुराना पड़ चुका है। और अंत में, आखिरकार, वही व्यक्ति, जिसने वह सॉफ्टवेअर बनाया था और उसे बनाने में घंटों मेहनत की थी, पुनः उसकी सारी सेटिंग्ज़ ठीक करके उसे काम करने लायक बनाने में कामयाब हुआ।

गज़ब! आधुनिक तकनीकों का जवाब नहीं! कभी-कभी आप उन्हें बहुत पसंद करते हैं क्योंकि वे आपके जीवन को आसान बनाती हैं। इसके विपरीत, कभी-कभी लगता है, उसके बगैर ही ठीक था! लेकिन नहीं, अंततः नई तकनीकें आपके शारीरिक श्रम को कम ही करती हैं-इसलिए उस पर काम करते रहना कतई व्यर्थ नहीं कहा जा सकता!

मोनिका अपनी अंतिम बड़ी शल्यक्रिया के लिए तैयार है – 19 जनवरी 2016

मोनिका

मुझे विश्वास है कि आप हमारे स्कूल की एक बहुत ख़ास लड़की, मोनिका को भूले नहीं होंगे, जिसकी हम विशेष देखभाल करते रहे हैं। वे पाठक, जो उसे नहीं जानते, उसकी दारुण व्यथा के विषय में मेरा पहला ब्लॉग यहाँ पढ़ सकते हैं। मई 2014 में मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव के एक भयंकर विस्फोट में वह बुरी तरह जल गई थी, जिसके चलते उसका चेहरा, छाती बाँहें और हाथ में कई तरह की विकृतियाँ आ गई थीं।

उस साल जब वह दिसंबर में वापस स्कूल आई तो हमें उसके साथ हुए हादसे का पता चला और हमने देखा कि कैसे इस हादसे ने उसकी शारीरिक गतिविधियों को अत्यंत सीमित कर दिया है: वह आँखों की पलकें झपका नहीं पाती थी, गरदन को हिला-डुला नहीं पाती थी, दाहिने हाथ को ऊपर नहीं उठा पाती थी और यहाँ तककि मुँह भी पूरा खोल नहीं पाती थी। हमें तुरंत लगा कि हमें उसकी मदद करनी होगी और अब, दो शल्यक्रियाओं के बाद वह अपने सिर को स्वतंत्रतापूर्वक घुमा-फिरा पाती है, बाँह उठा पा रही है और फिर से लगभग पूरी तरह दोनों आँखें खोल-बंद कर पा रही है।

नई-नई दवाइयों की मदद से उसकी हालत में बहुत सुधार हुआ है-और कुछ दिनों में हम इस दिशा में अगला कदम रखने वाले हैं: मोनिका पर तीसरी और अंतिम शल्यक्रिया की जानी है।

कल मैं शल्यक्रिया से पहले होने वाली आवश्यक जाँचों के लिए मोनिका और उसकी माँ को लेकर अस्पताल गया था। उसके शरीर की क्रियाशीलता के संबंध में यह अंतिम बड़ी शल्यक्रिया होगी। डॉक्टर्स इस बार उसके मुँह पर शल्यक्रिया करेंगे, जो अभी जली हुई त्वचा की सिकुड़न के चलते और ज़ख्म के निशानों के कारण सिर्फ लगभग दो अंगुल चौड़ा ही खुल पाता है। इसके अलावा वे एक बार पुनः उसकी दाहिनी आँख पर काम करेंगे क्योंकि पिछली शल्यक्रिया के बावजूद वह अभी भी पूरी तरह बंद नहीं हो पाती। वे उसके होठों के आस-पास के कट्स और ग्राफ्ट्स को हटाएँगे, जिससे वह ठीक तरह से अपना मुँह खोल पाए और इसके अलावा उसकी दाहिनी आँख पर भी एक बार और शल्यक्रिया करेंगे, जिससे वह अपनी आँख अच्छी तरह बंद कर सके।

डॉक्टरों में बताया कि मुँह की शल्यक्रिया के कारण कुछ दिनों के लिए उसके मुँह की सभी क्रियाओं पर पूरी तरह रोक लगानी होगी और तब उसे एक ट्यूब के ज़रिए खाना देना होगा। इसी कारण संभवतः उसे इस बार कुछ अधिक समय तक अस्पताल में रहना पड़ेगा, शायद दस दिनों के लिए। और उसके पश्चात्, पहले की तरह कुछ समय के लिए उसे अस्पताल के आसपास ही कहीं रहना होगा, जहाँ से वह नियमित रूप से पट्टियाँ बदलवाने और ज़रूरत पड़ने पर दूसरे कामों के लिए वहाँ जा सके।

स्वाभाविक ही, मोनिका शल्यक्रिया को लेकर पुनः एक बार घबराई हुई है, बल्कि इस बार कुछ ज़्यादा ही, क्योंकि इस बार कई दिनों तक वह मुँह भी नहीं खोल पाएगी और यह उसे पता है। लेकिन फिर भी ठीक होकर पुनः अच्छे से खा-पी सकने की आशा से वह बहुत खुश भी है!

हम भी उसके सामने सकारात्मक पहलुओं पर ही बात करते हैं: बस, यह आखिरी बड़ा ऑपरेशन है और उसके बाद उसे कभी भी लंबे समय के लिए अस्पताल में नहीं रहना पड़ेगा, शल्यक्रिया के बाद डॉक्टर्स उसके चेहरे की त्वचा पर काम करके उसे बिल्कुल चिकना कर देंगे और फिर उसका रंग भी एकदम उसके शरीर के रंग जैसा प्राकृतिक हो जाएगा, आदि आदि।

लेकिन इस समय हम जिस काम को करने निकले हैं, उस पर पूरा फोकस कर रहे हैं और हमें विश्वास है कि हमेशा की तरह इस बार भी वह सुचारू रूप से संपन्न हो जाएगा। मैं उसके बारे में आपको लगातार अवगत कराता रहूँगा- और हमेशा की तरह हमारे इस महती काम में आपकी मदद के लिए भी हम शुक्रगुज़ार रहेंगे! दुनिया भर से मिल रही आपकी शुभकामनाओं और मदद के लिए एक बार फिर शतशः धन्यवाद!

क्यों भारतीय युवा अपने माता-पिता से झूठ बोलते हुए ज़रा सा भी नहीं झिझकते? 18 जनवरी 2016

parenting

पिछले सप्ताह मैंने भारतीय महानगरों के बारे में लिखते हुए बताया था कि वहाँ भी अभिभावक आज भी परंपराओं से चिपके हुए नज़र आते हैं, जिससे कहीं वे आधुनिक जीवन द्वारा प्रस्तुत नए तौर-तरीकों में कहीं खो न जाएँ। जबकि वे कई तरह से आधुनिक होने की कोशिश कर रहे होते हैं, विशेष रूप से लड़कियों के लालन-पालन में वे वापस परंपरा की ओर लौट आते हैं-और यह बात उनके लिए बहुत सी समस्याएँ खड़ी कर देती है! मैं बताता हूँ कि कैसे।

पिछले कुछ महीनों में मैं बहुत से युवा भारतीयों से मिला हूँ, जिनमें से कई लोग दिल्ली शहर के रहने वाले थे। हमने कई विषयों पर बातें कीं, जिनमें से दिल्ली की लड़कियों और युवा महिलाओं की जीवन पद्धति एक मुख्य विषय था। वे वहाँ पढ़ने आती हैं और विश्वविद्यालय की पढ़ाई समाप्त करके वहीं कहीं नौकरी करने लगती हैं। वे मेट्रो और ऑटो रिक्शा में दिल्ली के हर इलाके में घूमती-फिरती हैं, बड़े शहर द्वारा प्रस्तुत अवसरों को वे हाथोहाथ लेती हैं और अपने जीवन का भरपूर उपभोग करती हैं। लेकिन उनके सामने एक समस्या अवश्य पेश आती है:वे अपने अभिभावकों से हर विषय पर खुलकर बातें नहीं कर पातीं!

हमारे यहाँ आने वाली बहुत सी युवतियों ने बताया कि वे लड़कों के साथ अपनी मर्ज़ी से कहीं भी घूमने-फिरने जाती रही हैं। ज़्यादातर युवतियाँ अपने पुरुष और महिला मित्रों के साथ समय बिताकर समान रूप से खुश होती हैं और उनमें से कुछ लड़कियों के पहले भी बॉयफ्रेंड रहे हैं। वे उनके साथ देर रात को चलने वाली फ़िल्में देखने जाती हैं और उनके साथ उनके निवास पर रात भी गुज़ार लेती हैं।

और निश्चित ही ये बातें वे अपने अभिभावकों को नहीं बतातीं! मैं ‘निश्चित ही’ कह रहा हूँ क्योंकि आज भी अविवाहित भारतीय युवक-युवतियाँ एक साथ रात गुज़ार लें, यह सोचा भी नहीं जा सकता। और वे अच्छी तरह जानती हैं कि उनके अभिभावक इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे और बहुत सी दूसरी मुसीबतें खड़ी करेंगे, जैसे बुरा-भला कहने से लेकर उनके बाहर निकलने पर तरह-तरह की पाबंदियाँ लगाना शुरू कर देंगे।

इसलिए इन लड़कियों ने मुझसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे उनसे साफ झूठ बोल देती हैं। वे उनसे कहती हैं कि विश्वविद्यालय में कुछ ज़रूरी कामों में व्यस्त हैं या अपनी किसी पक्की दोस्त के यहाँ रात गुज़ारेंगी, जिसे उनके माता-पिता भी अच्छी तरह से जानते हैं। वे बताती हैं कि सचाई सबको दुखी कर सकती थी। एक झूठ उन्हें बहुत से प्रश्नों से दूर रखता है और बहुत सी असुविधाजनक स्थितियों से बचा ले जाता है और वैसे भी, वे जानती हैं कि वे उन्हें कभी संतुष्ट नहीं कर सकेंगी। तो फिर व्यर्थ वाद-विवाद की स्थिति क्यों पैदा की जाए? उनके चेहरों पर मैंने स्पष्ट देखा कि इन झूठ बातों के लिए उन्हें कतई कोई अपराधबोध या पछतावा नहीं है।

इसे उचित नहीं कहा जा सकता। दोनों ओर से यह परिस्थिति ठीक नहीं है लेकिन अभिभावक के रूप में आपको सोचना चाहिए कि आपके बच्चों को आपसे झूठ कहने की ज़रूरत ही क्यों पड़े। मेरा मानना है कि इस झूठ के लिए अभिभावक ही दोषी हैं जो तरह-तरह की पाबंदियाँ लगाकर बच्चों को झूठ बोलने के लिए मजबूर करते हैं। आधुनिक समय में पुरानी मान्यताओं से चिपके रहकर हम वास्तव में क्या कर रहे होते हैं? हम अभिभावकों और बच्चों के बीच खाई पैदा कर रहे होते हैं। आपके बच्चे, जो स्वयं वयस्क युवा हैं, जानते हैं कि उन्हें आप किन बातों की इजाज़त नहीं देंगे। वे यह भी जानते हैं कि वे क्या कर सकते हैं। वे फिल्में देखते हैं और अपने लिए वैसी ही स्वतंत्रता चाहते हैं जैसी उनमें दिखाई जाती है, विशेष रूप से उन शहरों में रहते हुए, जहाँ यह सहज संभव है!

और सबसे बड़ी बात, लड़कियाँ चाहती हैं कि वे भी वह सब कर सकें जो उनके भाई करते हैं। क्यों आप उन्हें आज़ादी के साथ रात को बाहर घूमने की इजाज़त दिए हुए हैं? क्यों आप उन्हें तीन-तीन बार नहीं टोकते जब वे रात दस बजे के बाद बाहर रहते हैं? उनकी कोई गर्लफ्रेंड हो तो आपको कोई आपत्ति नहीं होती लेकिन अगर आपकी बेटी का कोई बॉयफ्रेंड है तो वह आपको क्यों नागवार गुज़रता है?

जब आप बच्चों पर पाबंदियाँ लगाते हैं, मना करते हैं, वर्जनाएँ थोपते हैं तो आप उन्हें झूठ बोलने के लिए प्रेरित कर रहे होते हैं। उनके साथ खुला व्यवहार रखें और हर विषय पर उनसे बात करें। उन्हें अधिक से अधिक आज़ादी दें और तब वे उन नियमों का पालन करेंगे, जिनके बारे में आप बहुत गंभीर हैं और जिनका पालन करना आप ज़रूरी मानते हैं। सबसे बढ़कर, तब वे अपनी सुरक्षा के प्रति अधिक सतर्क रहेंगे। क्योंकि वे आपके पास आकर अपनी समस्याओं की जानकारी आपको दे सकेंगे, आपकी मदद ले सकेंगे। अन्यथा आप लोगों के बीच सिर्फ झूठ का बोलबाला होगा!