उत्सव – पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों का आईना – 23 अक्टूबर 2014

दीवाली की छुट्टियाँ शुरू होने से एक दिन पहले स्कूल की शिक्षिकाओं ने छोटा सा कार्यक्रम आयोजित करके मिठाइयाँ वितरित कीं। इस अवसर पर रमोना ने उनसे पूछा कि उनके घरों में दीवाली किस तरह मनाई जाती है। बदले में उन्होंने रमोना से उसके देश में होने वाले समारोहों के बारे में पूछा। रमोना किंचित असहज हो गई।

स्वाभाविक ही उसने क्रिसमस के बारे में बताया लेकिन वे और अधिक जानना चाहते थे। उन्हीं में से किसी ने गुड-फ्राइडे का ज़िक्र किया क्योंकि भारत में भी उस दिन छुट्टी होती है। खैर, रमोना ने कहा कि हाँ, ईस्टर के सप्ताहांत में भी समारोह आयोजित किए जाते हैं- लेकिन समारोह’ शब्द उसके मुँह से निकलते ही उसके मन में यह बात आई कि वे इस शब्द से वास्तविकता से कुछ ज्यादा बड़े आयोजन की कल्पना कर रहे होंगे।

धार्मिक लोग धार्मिक छुट्टियों के दिन चर्च जाते हैं। इनमें से ज़्यादातर सिर्फ क्रिसमस के अवसर पर चर्च जाते हैं, तो फिर दूसरे धार्मिक अवसरों पर क्या किया जाता है? बच्चों के लिए ईस्टर बड़ा शानदार होता है और वे घरों और बाग़-बगीचों में चॉकलेट और ईस्टर एग ढूँढ़ने का खेल खेलते हैं। इसके अलावा त्योहारों के बारे में कहने के लिए विशेष कुछ नहीं होता।

यह सही है कि त्योहार होते हैं और त्योहारों पर दिन भर की छुट्टी भी होती है मगर किसी भी त्योहार पर, जैसे गुड-फ्राइडे पर भी, कोई विशाल आयोजन नहीं होता! हाँ, कार्नीवल आदि में लोग पार्टियाँ कर लेते हैं। क्रिसमस से पहले चार सप्ताह से उत्सव का माहौल हो जाता है क्योंकि आप क्रिसमस की खरीदारियाँ करते हैं और हर तरफ सजावट की हुई दिखाई देती है। लेकिन बहुत से त्योहारों पर सर्वसाधारण लोग सिर्फ छुट्टियाँ मनाते दीखते हैं! धर्म अब ज़्यादातर लोगों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं रह गया है और इस तरह धार्मिक त्योहार भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं।

यहाँ, भारत में हर त्योहारी छुट्टी पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं! और छुट्टियाँ भी बहुत होती हैं तथा त्योहार भी बहुत होते हैं! लोग सभी मुख्य-मुख्य भगवानों और संत-महात्माओं के जन्मदिन मनाते हैं, बहुत सी पूर्णिमाओं, अमावस्याओं, दूज, तीज और एकादशियों पर कोई न कोई समारोह आयोजित किया जाता है। और लगभग सभी अवसरों पर कोई न कोई पूजा होती है, कोई न कोई अनुष्ठान धार्मिक कर्मकांड आयोजित किए जाते हैं। कभी दिए जलाए जाते हैं, देवताओं की मूर्तियों पर चन्दन का लेप लगाया जाता है, कहीं उन्हें अच्छे-अच्छे पकवान अर्पित किए जाते हैं, कहीं औरतें किसी पेड़ की परिक्रमा करती नज़र आती हैं तो कहीं कुँवारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है। उपवास के सैकड़ों कारण होते हैं और जब भारतीय अपने पूर्वजों को याद करते हैं तो सिर्फ दिये प्रज्वलित करके नहीं रह जाते, बहुत कुछ और भी किया जाता है।

कुल मिलाकर उत्सव जर्मन और भारतीय लोगों के चरित्र का आइना हैं! एक तरफ त्योहार मनाने के विशाल और कर्मकांडों, विधि-विधानों और मिथकीय कथा-कहानियों से युक्त भारतीय तरीकों में उनका रंगबिरंगा, जीवंत और कई बार अतिउत्साही और प्रदर्शन-प्रिय चरित्र उजागर होता है तो दूसरी तरफ त्योहारों पर जर्मंस का व्यवस्थित, साफ़-सुथरा और कभी-कभी बहुत धीर-गंभीर और सचेत तरीका उनका चरित्र उजागर करता है, जिसमें वे बहुत साधारण तरीके से छोटी-छोटी पारिवारिक परम्पराओं का निर्वाह करते हुए उन्हें बहुत शालीन और निजी मामला बना देते हैं।

दोनों संस्कृतियों के बीच मौजूद विशाल अंतर को स्पष्ट करना या उन्हें शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल और लंबा काम है- उसे आप सिर्फ महसूस कर सकते हैं वह भी लम्बे समय तक दोनों संस्कृतियों के बीच रहने के बाद। आश्रम में हम लोग इन दोनों संस्कृतियों से समान रूप से जुड़े रहते हैं और फिर हम धार्मिक भी बिल्कुल नहीं हैं। इस तरह हम बिना किसी धार्मिक विधि-विधान के इन त्योहारों को सुन्दर तरीके से मनाते हैं।

आज दीवाली का दिन है और हम सब तेल के दिए जलाने में व्यस्त हैं और उसके बाद बहुत सारी सुस्वादु मिठाइयों से पेटपूजा करने वाले हैं। मानसिक रूप से आप भी हमसे जुड़ जाएँ- दीवाली हमारे साथ मनाएँ!

मैं आप सभी को दीवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ!

आश्रम में पहले दीवाली कैसे मनाई जाती थी! 3 नवंबर 2013

आज दीवाली है, दुनिया भर में मनाया जाने वाला भारत का सबसे बड़ा उत्सव! यह रोशनियों का त्योहार है और हर चीज़ सजाई जाती है, मिठाइयाँ बनाई जाती हैं और नए कपड़े पहने जाते हैं। मैं 2005 और उससे पहले की दीवाली को याद करता हूँ और मुझे ध्यान आता है कि तब मेरे लिए दीवाली उतना महत्व नहीं रखती थी।

मेरे बचपन में कई बार दीवाली पर हमारे पिताजी घर पर नहीं होते थे क्योंकि वे दूसरे शहरों में प्रवचन देने गए हुए होते थे। स्वाभाविक ही हमारी माँ को यह अच्छा नहीं लगता था लेकिन कई दूसरे त्योहार हम सब एक-साथ मनाते थे। जब मैं यात्रा पर होता था, देश में या विदेशों में, तब मैं भी कई बार दीवाली पर वृन्दावन में नहीं होता था। लेकिन पहले मैं आपको बताता हूँ कि जब मैं आश्रम में होता था तब आश्रम की दीवाली का स्वरूप कैसा हुआ करता था।

तब मेरे माता-पिता और बहन शहर में हमारे पुराने घर में रहा करते थे और हम तीन भाई संस्कृत के कुछ विद्यार्थियों और आश्रम के कर्मचारियों के साथ आश्रम में रहते थे। आश्रम पूरी तरह पुरुषों का इलाका था, जहां सिर्फ एक व्यक्ति को खाना बनाना आता था और उसी पर रसोई और घर की साफ-सफाई की ज़िम्मेदारी थी। बिना किसी महिला के वही सारे काम अंजाम देता था-लेकिन बिना महिला के दीवाली का माहौल ही नहीं बन पाता था।

वैसे, मेरी बहन नियमित रूप से आश्रम आती रहती थी और कभी-कभी माँ भी आ जाती थी। दीवाली के दिन मेरे माता-पिता और बहन नए कपड़े पहनकर आश्रम आते थे और हम आश्रम को सजाते थे और फिर परंपरागत तरीके से कुछ तेल के दिये भी जलाते थे। अम्माजी मिठाइयाँ बनाकर लाती थीं, जिन्हें आश्रम के बच्चों और कर्मचारियों में बांटा जाता था। वैसे भी हम सब भाई शहर वाले मकान में ही खाना खाते थे और दीवाली के दिन हम कुछ जल्दी वहाँ पहुँच जाते थे, जिससे उनके साथ कुछ अधिक समय व्यतीत कर सकें, उनके साथ त्योहार मना सकें, मिठाइयाँ खा सकें।

मैं इस त्यौहार को इतना महत्व नहीं देता इसी लिए 2005 में मैं भी आश्रम में उपस्थित नहीं था। यही वह साल है जब हमारे जर्मन मित्रों ने आश्रम में अपना विवाह रचाया था और हनीमून के लिए हिमालय चले गए थे। वहाँ से लौटकर वे फिर हमारे आश्रम में दीपों का त्योहार, दीपावली मनाने के लिए रुक गए थे। मुझे याद है कि उन्होंने इस त्योहार का भरपूर आनंद उठाया था और यह भी कि मेरा परिवार भी ऐसे शुभ दिन मेहमानों का स्वागत करके बड़ा प्रसन्न हुआ था। उन्होंने त्योहारों पर अम्माजी और मेरी बहन द्वारा पकाए गए खास व्यंजनों का मज़ा लिया। खाने के पश्चात उन्हें दीवाली की खास भारतीय मिठाइयाँ खिलाई गईं। उन्होंने ऐसी मिठाइयाँ पहली बार खाई थीं। उनके और मेरे परिवार के लिए भी वह एक यादगार रात थी। अगले साल भी वे लोग आए और हमारे साथ मिल-जुलकर इस त्योहार का खूब मज़ा लिया।

आप दीवाली मनाते हों या न मनाते हों, मैं कामना करता हूँ कि दीवाली का यह दिन आपके जीवन में प्रेम, उजाला, उल्लास और सौभाग्य लेकर आए।