यहाँ सब कुछ आभासी नहीं है: जब सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है! 16 दिसंबर 2015

सोशल मीडिया मित्रों को वास्तविक जीवन में एक-दूसरे से मिलवाता है

मेरे कल और परसों के ब्लॉगों की ध्वनि से कुछ लोगों को यह प्रतीत हो सकता है कि मैं सोशल मीडिया को कतई पसंद नहीं करता। लेकिन यह सही नहीं है। सोशल मीडिया दुनिया में बहुत सारे सकारात्मक परिवर्तन लेकर आया है और एक आधुनिक व्यक्ति के नाते मैं उससे होने वाले लाभों के प्रति सजग हूँ। लेकिन फिर भी मैं उसकी तुलना में वास्तविक जीवन को विशेष तरज़ीह देता हूँ।

मैं तकनीकी प्रगति पसंद करता हूँ। मैं शुरू से ही नई-नई मशीनों, जैसे कैमेरा, के प्रति आकर्षित होता रहा हूँ। अपने शहर में मैं कुछ पहले लोगों में से था, जिन्होंने पहले पहल डिजिटल कैमेरा खरीदा था और जब फोन आया तो बहुत से पड़ोसी फोन करने हमारे घर आते थे, पहला मोबाइल, जो मैंने खरीदा था वह एक बड़ी सी ईंट जैसा था क्योंकि तब मोबाइल फोन अभी आए ही आए थे और उस समय ऐसे ही होते थे! मेरा विश्वास है कि तकनीकी खोजें हमारी बहुत अधिक मदद कर सकती हैं। इंटरनेट मैं काफी समय से इस्तेमाल करता रहा था और स्वाभाविक ही एक दिन सोशल मीडिया नेटवर्क से भी जुड़ गया।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि आज के दिन यह लोगों के साथ जुड़ने का एक प्रमुख तरीका है और इसकी तुलना किसी भी पुराने तरीके से नहीं की जा सकती! बहुत से मेरे परिचित, जिनसे मैं वास्तविक दुनिया में पहले से जुड़ा हुआ हूँ, अब नेट के ज़रिए भी मेरे साथ जुड़े हुए हैं और मैं नेट-संदेशों के माध्यम से उनसे एक साथ बातचीत कर सकता हूँ। इसी के साथ, उनके अलावा भी बहुत से दूसरे लोग हैं, जिन्हें मैं बिल्कुल नहीं जानता और जो मुझसे कभी रूबरू नहीं मिले हैं-जो मेरे शब्दों को पढ़कर, शायद उन्हें पसंद करके मेरे बारे में और भी अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं।

मैं एक ही समय में बहुत सारे लोगों से जुड़ सकता हूँ और उनमें से हर व्यक्ति इस बात का चुनाव कर सकता है कि वह और आगे पढ़ना चाहता है या नहीं! वे अपनी कंप्यूटर सेटिंग इस तरह रख सकते हैं कि जब भी मैं कुछ लिखूँ, वे पढ़ सकें या वह उनके स्क्रीन पर ही ना आए! मेरी नज़र में वह लोगों को चुनने का बहुत शानदार अवसर प्रदान करता है कि वे क्या करना चाहते हैं।

यह तो हुई लोगों से जुड़ने की बात। लेकिन उसके बाद, मुझे लगता है, एक कदम और रखने की ज़रूरत है। उन आभासी लोगों को वास्तविक जीवन में लेकर आने की। जब आपको लगता है कि आप किसी से ऑनलाइन जुड़े हैं तो वास्तव में वह बहुत एकतरफा एहसास होता है! सामने वाले के लिखे शब्द आप अक्सर पढ़ते हैं। आप उसके पोस्ट किए हुए चित्र देखते हैं और फेसबुक पर उन्हें ‘लाइक’ भी कर देते हैं। लेकिन संभव है, सामने वाला इस बात को नोटिस ही न करे कि इस तरह आप उसके कितने करीब हैं। वह नोटिस करे, इसके लिए आपको सीधे संदेश भेजना होगा, ईमेल करना होगा या फोन करना होगा या फिर रूबरू जाकर मिलना होगा।

और हमने इसे संभव किया है: मेरे कई ऑनलाइन मित्र मुझसे मिलने यहाँ आए हैं। भारतीय, जो जीवन के प्रति अलग नज़रिए को और सोचने के भिन्न तरीके को पसंद करते हैं, एक दिन के लिए या सप्ताहांत में यहाँ आते रहे हैं। दुनिया भर के लोग कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए हमारी योग और आयुर्वेद की कार्यशालाओं में या विश्रांति शिविरों में शामिल होने आश्रम आते हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में मैं समझता हूँ कि वास्तव में सोशल मीडिया वास्तविक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है: जब कोई बताता है कि उन्होंने मेरे बारे में कहीं ऑनलाइन पढ़ा और फिर मेरे ब्लॉग पढ़ने लगे और उनसे उन्हें सहायता प्राप्त हुई। जब किसी ने मुझे ऑनलाइन देखा, वेबसाइट पर जाकर हमारे चैरिटी कार्यों के बारे में पढ़ा और किसी बच्चे के प्रायोजक बने। जब किसी ने मेरी ऑनलाइन टिप्पणियों को पढ़ा और मुझसे रूबरू बातचीत करने लंबी यात्रा करके भारत आ गए। जब किसी ने हमारे विश्रांति शिविरों के फोटो देखे और हमारे योग अवकाश शिविर में शामिल होने का निर्णय लिया।

मैं वास्तविक संपर्क में विश्वास करता हूँ और सोशल मीडिया महज इसका एक साधन है, उस दिशा में आगे बढ़ने का एक माध्यम। ऑनलाइन हो या ऑफ़लाइन, मैं उसकी वास्तविकता कायम रखना चाहता हूँ।

ऑनलाइन संसार – कितना झूठा, कितना सच्चा? 15 दिसंबर 2015

ऑनलाइन संसार – कितना झूठा, कितना सच्चा

कल मैंने लिखा था कि सोशल मीडिया को आप अपना दूसरा यथार्थ न बनने दें। क्योंकि अंततः वह झूठी दुनिया ही सिद्ध होता है! सोशल मीडिया पर दूसरों की टिप्पणियाँ पढ़ते हुए और तब भी जब आप खुद कुछ लिख रहे हैं या अपनी पढ़ी हुई कोई टिप्पणी साझा कर रहे हैं, इस बात को सदा याद रखें।

आपके लिए यह याद रखना आवश्यक है कि इंटरनेट पर कोई भी कुछ भी लिख सकता है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सभी लोग झूठ ही लिखते हैं मगर लोगों के लिए किसी भी बात को वास्तविकता से अधिक उजला दिखाना आसान होता है! कुछ शब्दों के हेर-फेर से एक उत्कृष्ट दिन साल का सर्वोत्कृष्ट दिन बन जाता है। कोई फोटो आपके मन में अपने प्रिय साथी के लिए लालसा पैदा कर सकता है कि वह आपको अपनी बाँहों में भर ले क्योंकि उस फोटो में मित्र को वैसा दिखाया गया है-लेकिन फोटो लेने से पहले हुई नोक-झोंक आप नहीं देख सकते…ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं!

यह सिर्फ दोस्त की तस्वीरों से गलत संदेश लेने का मामला ही नहीं है! जी नहीं, आपको वास्तव में यह बात समझनी होगी कि आभासी दुनिया, आभासी दुनिया है और आभासी ही रहेगी। निश्चित ही आप वहाँ शुभकामना संदेश लिखकर भेज सकते हैं और उन्हें खुश करने के लिए फेसबुक पर ‘लाइक’ क्लिक कर सकते हैं। लेकिन आप माउस क्लिक करके दुनिया को बचा नहीं सकते!

ओह, रुकिए! यहाँ मुझे भेद करना होगा: निश्चित ही बहुत सारे आंदोलन इन्हीं क्लिक्स और व्यूज़ की मदद से परवान चढ़ते हैं। बहुत सारे प्रतिरोध सिर्फ ऑनलाइन चलते हैं, जिनमें हज़ारों लोगों की आभासी भागीदारी होती है। लेकिन बहुत से घोटाले भी यही से उद्भूत होते हैं और मैं उन्हीं की बात कर रहा हूँ।

आप एक लड़की की भयंकर जन्मजात विकृति का चित्र देख सकते हैं, जिसके नीचे आपसे गुजारिश की जाती है कि चित्र को ज़्यादा से ज़्यादा लाइक और शेयर करें क्योंकि कोई अज्ञात और अनजान संगठन लड़की के इलाज के लिए हर लाइक पर पाँच डॉलर और हर शेयर पर 10 डॉलर दान देगा। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसा होने वाला नहीं है क्योंकि वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता। यहाँ तक कि उस लड़की का फोटो भी वास्तविक नहीं होगा या पूर्णतया किसी दूसरे संदर्भ में लिया गया होगा!

न तो आप अफ्रीका के किसी देश की सरकार को किसी अपराधी को खोजने में अतिरिक्त प्रयास करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और न ही फेसबुक से अपनी नीति बदलने की गुहार करती हुई आपकी टिप्पणी से वे अपनी नीतियाँ बदलेंगे।

अरे हाँ, मैं भूल रहा था: न तो किसी हिन्दू देवता का चित्र साझा करके आपको कोई अतिरिक्त कर्मा पॉइंट्स नहीं मिलने वाले हैं और न ही पाँच मिनट में उस संदेश को अपने दस दोस्तों के साथ साझा न करने पर उस देवता का कोप आप पर बरसने वाला है।

मैं इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ हूँ कि बहुत से ऑनलाइन रहने वाले लोग यह भेद नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए हमारे एक कर्मचारी ने रमोना से पूछा कि क्या वाकई उसने कोकाकोला से 3 मिलियन रुपए जीते हैं, जैसा कि उसे उसके इनबॉक्स में मिला एक स्पैम बता रहा है!

ऐसे संदेशों का इन लोगों तक पहुँचना भी अपने आप में कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन आखिर यह वर्ल्ड वाइड वेब के खेल का ही हिस्सा है! आप सिर्फ इतना कर सकते हैं कि सतर्क रहें और ऑनलाइन दुनिया की अपनी जानकारी को सदा अप टू डेट रखें। अपनी सोशल मीडिया साइट्स पर हर वक़्त नज़र रखें और हर ऑनलाइन पढ़ी हुई बात पर भरोसा न करें!

भरोसा करना अच्छी बात है – मगर अपने शक पर भी भरोसा करें – 16 नवंबर 2015

अक्सर मैं लोगों से कहता हूँ कि उन्हें दूसरों पर भरोसा करने की क्षमता बढ़ानी चाहिए। लोगों से मिलते समय शुरू से उनके प्रति नकारात्मक रवैया रखना ठीक नहीं। लेकिन कुछ परिस्थितियों में समुचित जाँच किए बगैर कि सामने वाला झूठा इंसान या फ्रॉड तो नहीं, भरोसा नहीं करना चाहिए। अधिकतर मामलों में ऐसी स्थिति पैसों के संबंध में पेश आती है। अगर आपके सामने ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं, जहाँ आपको सामने वाले पर शक होता है कि वह भला व्यक्ति है या चालबाज़ (फ्रॉड) तो आज का ब्लॉग पढ़ना आपके लिए उपयोगी होगा।

सर्वप्रथम, इस बात का ध्यान रखें कि सामने वाले के पहनावे, चाल-ढाल और रहन-सहन से कतई प्रभावित न हों। हो सकता है कि वह बड़ी सी कार में घूमता-फिरता हो, डिज़ाइनर कपड़े पहनता हो और नवीनतम आईफोन लेकर चलता हो-लेकिन ये बातें उसे ईमानदार या भला व्यक्ति सिद्ध नहीं करतीं! कोई व्यक्ति जितना बड़ा चालबाज़ (फ्रॉड) होगा उतना ही उसका पहनावा, एक्सेसरीज़ और रहन-सहन भड़कीला होगा। पहुँचे हुए चालबाज़, छलछद्मी और धोखेबाज़ लोग प्रभावित करने वाले हर तरह के औज़ारों से लैस होते हैं और अक्सर यह सिद्ध करने में कामयाब हो जाते हैं कि वे वास्तव में बड़े भले और सत्यनिष्ठ व्यक्ति हैं।

दूसरा बिंदु है: झूठे और बेईमान लोग लगभग हमेशा ज़्यादा बोलते हैं। और इसी एक बात से आप अक्सर समझ सकते हैं कि वे और कुछ भी हो सकते हैं मगर ईमानदार नहीं! सिर्फ उस व्यक्ति की बातें ध्यान से सुनें: अगर झूठा इंसान होगा तो वह दो मिनट पहले कही अपनी ही बात भूल चुका होगा। बस वह लगातार बात करता रहेगा और अपनी ही पिछली बात का खंडन करती हुई बात कहेगा-ज़ाहिर है, बार-बार आपसे कोई न कोई झूठी बात कह रहा होगा। आदतन झूठ बोलने वालों को इस बात का एहसास ही नहीं होता कि अभी-अभी वे क्या कह चुके हैं क्योंकि वे इतना अधिक झूठ बोलते हैं कि वे अपने सारे झूठे वचनों को याद ही नहीं रख सकते। इसलिए अगर आप कुछ देर शान्त बैठे रहें तो उसी वक़्त आपको पता चल जाएगा कि वह झूठ बोल रहा है।

अंत में, इन बातों का यह अर्थ नहीं है कि आप जिस मामले में चर्चा कर रहे हैं, अनिवार्य रूप से उस मामले में भी वह चालबाज़ी कर रहा हो। लेकिन अब हम उस बिंदु पर बात करते हैं, जहाँ मामला पैसे से संबंधित होता है: उस व्यक्ति पर कतई भरोसा न करें, जो कहे- 'तुम मुझ पर भरोसा कर सकते हो, मुझे पैसे दे दो'। उसके बाद अगर आप साफ़ शब्दों में यह कह दें कि आप उसे नहीं जानते और इसलिए उस पर भरोसा नहीं कर सकते तो जवाब में वह कह सकता है, 'अगर आप मुझ पर भरोसा नहीं कर सकते तो हम साथ में काम नहीं कर सकते!' बस, इसी बिंदु पर वह धोखेबाज़ रफूचक्कर हो जाएगा।

इससे हमें यह शिक्षा मिलती है: कभी-कभी शक सही निकलते हैं। अगर आपके मन में किसी व्यक्ति के प्रति किसी प्रकार का शकोशुबहा है तो उसे व्यक्त करने में कतई संकोच न करें! अगर वह गंभीर है, ईमानदार है तो हर तरह के प्रयास करके अपनी नेकनीयती सिद्ध करेगा और अंततः आपका विश्वास हासिल कर लेगा। सिर्फ चालबाज़ और मक्कार ही भाग जाएँगे!

आस्था आपको पशुओं का मल-मूत्र भी खिला पिला सकती है – 8 अक्टूबर 2015

कल मैंने भारत की एक गंभीर होती जा रही राजनीतिक समस्या का ज़िक्र किया था। आज जिस विषय पर मैं लिखने जा रहा हूँ, उसे पढ़कर आपको हँसी आए बगैर नहीं रहेगी या घृणा से नाक-भौंह सिकोड़ेंगे या स्तब्ध रह जाएँगे! और कूपमंडूक हिन्दू रूढ़िवादियों की बात तो छोड़िए, खुद वर्तमान हिन्दूवादी भारत सरकार भी ठीक इसी बात का प्रचार-प्रसार कर रही है जबकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि गोमूत्र और गोबर के सेवन से कोई लाभ होता है!

जी हाँ, भारत में बहुत से लोग विश्वास करते हैं कि गाय का मल-मूत्र उनके लिए लाभप्रद हो सकता है। वे गंभीरता पूर्वक मानते हैं कि वह बहुत सी बीमारियों का इलाज कर सकता है। इसके अलावा वह पवित्र तो है ही! पवित्र इसलिए कि वह पवित्र गाय द्वारा, जिसे धार्मिक हिन्दू 'मानव जाति की माँ' समझते हैं, उत्सर्जित किया गया है!

यह कोई नई बात नहीं है। दरअसल बहुत से पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गाय से प्राप्त होने वाले पाँच पदार्थों को अर्थात दूध, दही, घी, मूत्र और मल को, एक कर्मकांड के साथ ग्रहण करने से शरीर पवित्र हो जाता है। यहाँ, वृंदावन में, जोकि 'दैवी चरवाहे' कृष्ण की नगरी है, कई वर्षों से गोमूत्र और गोबर से बनी वस्तुएँ लोकप्रिय हैं। और अब, जब कि एक ऐसी पार्टी सत्ता में है, जो हिन्दू धर्म, हिन्दू परंपरा और हिन्दू मूल्यों का प्रचार-प्रसार करने में लगी है, इन वस्तुओं का बाज़ार अचानक और अधिक फल-फूल रहा है!

स्वाभाविक ही उनके विज्ञापनों में बहुत सारी अनाप-शनाप मूर्खतापूर्ण बातें हैं: सिर्फ इतना ही नहीं कि गाय का मल-मूत्र बहुत सी बीमारियों के इलाज में असरकारक है, यहाँ तक कि कैंसर भी इस चमत्कारी इलाज से ठीक हो जाता है-और यह उनका सबसे जनप्रिय दावा है। इतना ही नहीं, वे झूठी अफवाहें फैलाने में भी नहीं हिचकिचाते-कहते हैं नासा ने भी यह स्वीकार किया है कि गाय के पिछवाड़े से विसर्जित पदार्थ ग्रहण करना आपके शरीर के लिए लाभप्रद होता है! वास्तव में मैं जानना चाहूँगा कि इससे महत्वपूर्ण और कौन सी बात नेशनल ऐरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन को गाय के मूत्र का विश्लेषण करने की प्रेरणा दे सकती है!

चलिए, मज़ाक छोड़कर कुछ गंभीर बात करें। मेरा मानना है कि लोगों को गाय के मल-मूत्र में उलझाकर देश की वास्तविक समस्याओं की ओर से उनका ध्यान बँटाने का यह एक सोचा-समझा मगर कारगर तरीका है। लेकिन गाय को पवित्र, देवता या माता मानने वालों के पाखंड पर मैं एक बार फिर स्तब्ध रह जाता हूँ! वे उसे माँ कहते हैं, खास मौकों पर उसकी पूजा करते हैं और गाय द्वारा उत्सर्जित सभी वस्तुओं को प्रसाद मानकर उनका सेवन करते हैं-लेकिन जब गाय दूध देना छोड़ देती है तो उसकी कोई चिंता नहीं करते कि उसके साथ क्या हो रहा है, इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि गलियों और कचरे के ढेरों पर वह कूड़ा-करकट और जानलेवा प्लास्टिक खा रही है। उसके चमड़े से बने जूते और बेल्ट इस्तेमाल करने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं होता! उस वक्त गाय की दैवी पवित्रता का विचार कहाँ चला जाता है? तब उन्हें नहीं लगता कि अपनी माँ की त्वचा से बने जूते पहनकर वे कोई पाप कर रहे हैं?

किसी पशु के अपशिष्ट को धर्म द्वारा पवित्र बनाकर प्रस्तुत करना वास्तव में विचलित कर देने वाला कृत्य है! इलाज के लिए खुद अपना मूत्र पीना भी कुछ लोगों में लोकप्रिय है। और अब आप गोमूत्र पी रहे हैं-आप गधे या बंदर का मूत्र भी पी सकते हैं! गोमूत्र में पाया जाने वाला कोई उपयोगी एंज़ाइम उसमें भी मौजूद हो सकता है!

मैं पूरी गंभीरता के साथ कहना चाहता हूँ कि मैं इसकी अनुशंसा कभी नहीं करूंगा! गोबर और गोमूत्र वे पदार्थ हैं, जिन्हें शरीर ने बाहर निकाला ही इसलिए है कि वे उपयोगी नहीं हैं, वे अपशिष्ट हैं! शरीर के अंग-प्रत्यंगों से होकर गुजरने के बाद इन पदार्थों का कोई उपयोग नहीं रह गया होता! फिर उन्हें आप क्यों पीएँगे या खाएँगे? बल्कि मैंने सुना है कि इन अपशिष्टों को ग्रहण करने से गाय की आँतों में पाए जाने वाले विषाणुओं के संक्रमण का खतरा भी हो सकता है!

तो धर्म की यही वास्तविक शक्ति है! वह आपको पशुओं का मूत्र पीने और उनका मल खाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह वही धर्म है, जो एक मनुष्य का छुआ पानी पीने से भी मना करता है क्योंकि उस व्यक्ति को धर्मग्रंथों ने ‘अछूत’ घोषित कर रखा है!

क्या आप नहीं समझते कि धर्म के नाम पर यह बहुत गलत हो रहा है?

आध्यत्मिक मूर्खता, जिसका दावा है कि सी-सेक्शन माँ और बच्चे के बीच के लगाव को बाधित करता है – 12 अगस्त 2015

कुछ समय पहले रमोना ने अपनी फेसबुक वाल पर एक टिप्पणी पढ़ी और ऊँचे स्वर में उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा, ' आध्यत्मिक मूर्खता!' उसके स्वर में हल्का सा तिरस्कार का भाव था, जिसे सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ और मैंने पूछा, 'ऐसा क्या पढ़ लिया भई!' उसके किसी जान-पहचान वाले ने एक पोस्ट की थी, जिसमें महिलाओं को सलाह दी गई थी कि वे बच्चे को प्राकृतिक रूप से जन्म दें, न कि सी-सेक्शन द्वारा बच्चा पैदा करने का निर्णय लें। टिप्पणी में उनसे दर्द से बचने के लिए लगाया जाने वाला एपिड्यूरल लगवाने के लिए भी हतोत्साहित किया गया था। कारण? उसके अनुसार, महिलाएँ प्रसव-पीड़ा के ज़रिए ही अपने बच्चे से घनिष्टता के साथ जुड़ पाती हैं और इसलिए एपिड्यूरल या सी-सेक्शन द्वारा प्रसव माँ और बच्चे के बीच विकसित होने वाले लगाव में बाधक होता है।

खैर, मेरी पत्नी सोशल नेटवर्क पर चर्चा करने में ज़्यादा रस नहीं लेती इसलिए वहाँ उसने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन बाद में हमने इस विषय पर जो बातें कीं, वे उस पोस्ट को पूरी तरह ख़ारिज कर देती हैं।

निश्चित ही, यह तो हम जानते हैं कि इन विचारों का उद्गम स्थल कहाँ है: आजकल बच्चे की पैदाइश के दिन और समय का पहले से चुनाव करने का नया चलन शुरू हो गया है और जब बच्चे का वज़न एक ख़ास सीमा तक बढ़ जाता है तो उसे शल्यक्रिया द्वारा सी-सेक्शन के ज़रिए सुरक्षित रूप से बाहर निकालना संभव हो जाता है। ऐसी भी औरतें हैं जो प्राकृतिक रूप से बच्चा पैदा करने की कोशिश भी नहीं करतीं, चाहे वह दर्द के डर से हो या किसी और मनगढ़ंत कारण से।

वह व्यक्ति शायद इसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश कर रहा था। रहस्यवादी अतिशयोक्तियों और कण-कण के बीच मौजूद आध्यात्मिक संबंधों पर अपने विश्वास के चलते वह महज यह नहीं कह सकता: जन्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, उसके ज़रिए अपने शरीर में पैदा हो रहे परिवर्तनों को स्वाभाविक मानकर सहजता के साथ स्वीकार करें। नहीं, हमें उसमें प्रेम और लगाव का अतिरिक्त संचार करना चाहिए, जिससे उसे और अधिक महत्वपूर्ण और ज़्यादा आध्यात्मिक बनाया जा सके।

कुछ लोगों ने इस सिद्धांत पर शक ज़ाहिर करते हुए टिप्पणियाँ लिखीं और उसकी सचाई का प्रमाण माँगा लेकिन उसने कह दिया कि उसे प्रमाण की ज़रूरत नहीं है। यह अनुभव की बात है कि लोग उन चीजों से ज़्यादा प्रेम करते हैं, जिन्हें वे बहुत तकलीफ उठाकर प्राप्त करते हैं।

गज़ब! मतलब हर माँ, जिसके बच्चे को चिकित्सकीय जटिलताओं के चलते शल्यक्रिया द्वारा बाहर निकालना पड़ता है, चिल्ला-चिल्लाकर डॉक्टरों और रिश्तेदारों को कोसती है! क्योंकि उसे प्रसव-पीड़ा नहीं सहनी पड़ी, उसे वह दर्द अनुभव नहीं करना पड़ा, जो कथित रूप से उसके अंदर और ज़्यादा प्यार और लगाव भर देता!

भयानक प्रसव-पीड़ा के बाद पैदा हुए अपने बच्चे के प्रति माँ के उत्कट प्रेम के बारे में इस तरह बात करना बड़ा भावपूर्ण लग सकता है, जबकि वास्तविकता यह है कि वह जन्म देते समय दर्द के कारण, बल्कि कहा जाना चाहिए कि दर्द के बावजूद, अपनी सारी परेशानियाँ और लगाव भूल जाती है। लेकिन यह पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है क्योंकि इसका अर्थ यह होगा कि जो महिलाएँ सी-सेक्शन के ज़रिए या सिर्फ दर्द सहन न कर पाने के कारण एपिड्यूराल लगवाकर बच्चे पैदा करती हैं, वे अपने बच्चे से उतना प्रेम नहीं करतीं। अपने बच्चे के साथ उतना लगाव महसूस नहीं करतीं।

अपरा के जन्म के समय हमने भी सी-सेक्शन करवाया था। डॉक्टरों की बहुतेरी कोशिशों के बाद भी रमोना को न सिर्फ दर्द नहीं उठा बल्कि बच्चे को जन्म देने की पूरी प्रक्रिया के दौरान उसे किसी असुविधा का एहसास भी नहीं होता था। अंत में जब डॉक्टरों ने हमसे कहा कि प्राकृतिक प्रसव के लिए और इंतज़ार करना खतरे से खाली नहीं है तो हमने अपनी बच्ची के लिए तय किया कि वह इस संसार में शल्यक्रिया के ज़रिए ही प्रवेश करे। क्या हमें वह प्रसव-पीड़ा और लगाव अनुभव करने के लिए हृदयाघात या मस्तिष्काघात का खतरा मोल लेना चाहिए था? क्या इससे बच्चे को जन्म देने का हमारा अनुभव कम मूल्यवान हो जाता है?

जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता। और मैं सोच-समझकर "प्रसव का हमारा अनुभव" कह रहा हूँ क्योंकि मैं भी शुरू से आखिर तक इस अनुभव में सम्मिलित रहा था। जब डॉक्टर रमोना के पेट पर चीरा लगा रहे थे, मैं उसका हाथ पकड़े वहीं खड़ा था और देख रहा था कि यह आश्चर्य कैसे प्रकट होता है और कैसे मेरी बेटी पहली बार इस संसार को अपनी आँखों से देखती है।

जी नहीं, आप यह नहीं कह सकते कि अपरा से रमोना का लगाव ज़रा भी कम है, सिर्फ इसलिए कि उसने सात घंटे प्रसव-पीड़ा नहीं झेली- क्योंकि नवजात शिशु के साथ किसी भी दूसरी महिला के लगाव से उसके लगाव में मैंने आज तक कोई अंतर नहीं पाया है! आप मुझसे यह भी नहीं कह सकते अपरा का जन्म-समय किसी दूसरे बच्चे के जन्म-मुहूर्त से रत्ती भर भी कम महत्वपूर्ण है- क्योंकि हम अस्पताल में बिताए अपने समय को शुरू से आखिर तक आज भी पूरी शिद्दत के साथ याद करते हैं!

और यह बात दुनिया की हर महिला के लिए सच है। अपने बच्चे के प्रति आपका लगाव आपके प्रेम पर निर्भर है न कि प्रसव-पीड़ा के किसी ख़ास अंतराल पर!

अंत में यह कि मेरे पास एक और तर्क है, बल्कि सबसे बड़ा तर्क: मैं अपनी बेटी के साथ बहुत लगाव महसूस करता हूँ। मैंने कोई प्रसव-पीड़ा नहीं झेली, यहाँ तक कि वह मेरे पेट में भी नहीं रही लेकिन फिर भी वह मेरा अटूट हिस्सा है- इस बात से इस तथ्य पर कोई असर नहीं पड़ता कि वह किस प्रक्रिया से गुज़रकर इस संसार में आई है। पिता भी अपनी बेटी से उतना ही लगाव रखता है भई!

तो, जिन मामलों में आध्यात्मिक मूर्खताओं की ज़रूरत नहीं है, उनसे उसे दूर ही रखिए- इससे आप दूसरों को अपमानित करने से बचे रहेंगे!

जब आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश में होने वाली धोखेबाज़ी ने मुझे आश्चर्यचकित किया! 23 नवंबर 2014

सन 2007 की शुरुआत में जब मैं आस्ट्रेलिया पहुँचा तो स्वाभाविक ही वहाँ मुझे कई जगहों की यात्राएँ करनी थी क्योंकि मेरे पास कई लोगों के निमंत्रण थे जो अपने यहाँ मेरा कार्यक्रम दोबारा आयोजित करना चाहते थे। इसी तरह कुछ नए आयोजक भी थे, जिनसे मैं पहली बार मिला और कुछ ऐसे भी, जिनसे मैं एक साल के अंतराल के बाद पुनः मिल रहा था। इनमें से एक मित्र ऐसा भी था जो इस बीच एक बार हमसे मिलने भारत भी आ चुका था। और जब हमें बातचीत करने की फुरसत मिली तो जो उसने बताया उस पर मैं विश्वास नहीं कर सका!

मेरा मित्र बहन के साथ हुई दुर्घटना से कुछ पहले आश्रम आ चुका था इसलिए उसे जानता था। लिहाजा कुछ समय हम उसे याद करते रहे। लेकिन फिर उसने बताया कि उसे एक सुनहरा मौका मिला है और उसे लेकर वह बहुत खुश और उत्साहित है: उसने किसी से सुना कि निवेश की कोई स्कीम है, जिसमें निवेश करने पर थोड़े समय में ही निवेशित धन का कई गुना वापस प्राप्त मिलने की पूरी उम्मीद है! वह एक व्यक्ति को जानता था, जिसने उस स्कीम में अपना धन लगाया था और वह इस निवेश की बदौलत बहुत जल्द अमीर हो जाने वाला था!

मुझे याद नहीं है कि ठीक-ठीक वह स्कीम क्या थी मगर मुझे लगता है कि वह एक कोश था जिसका संबंध साउथ अफ्रीका में सोने के खनन से था। किसी ने उसे बताया था कि सिर्फ पैसा लगाने वालों की ज़रूरत है और जैसे ही सोना निकलेगा, सब मालामाल हो जाएँगे!

उसकी बात सुनकर मैं अचंभित रह गया था: हमारे यहाँ, भारत में, ऐसे कई घोटाले हो चुके हैं और आज भी हो रहे हैं। मैंने उनके बारे में इतनी बार सुना है और अखबारों में विस्तार से पढ़ता रहता हूँ कि इन कपटपूर्ण स्कीमों की कार्य प्रणाली को पूरी तरह समझ चुका हूँ: लोगों को उनके पैसे का जल्द से जल्द कई गुना वापस करने का वादा करके, झाँसा देकर पैसा इकट्ठा करना। मुझे घोटाले का सुनकर इतना आश्चर्य नहीं हुआ जितना यह तथ्य जानकर हुआ कि यह सब आस्ट्रेलिया में भी होता है और स्वाभाविक ही वहाँ भी ऐसे लोग पाए जाते हैं, जो इन स्कीमों के झाँसे में आ जाते हैं!

उनमें से एक मेरा यह मित्र भी था। मैंने उससे पूछा, "तुमने तो उस स्कीम में पैसा नहीं लगाया होगा?" मुझे शक था कि उसने ज़रूर लगाया होगा। और यही हुआ था। "तुम्हें तो पता है कि मेरे पास ज़्यादा पैसे नहीं होते लेकिन जो भी मेरे पास जमा था, वह मैंने उसमें निवेश कर दिया है।" उसने मुझे आगे बताया कि करोड़पति होने के बाद वह क्या-क्या करेगा और मुझे भी उस अचूक और सुनिश्चित स्कीम में सहभागी होने के लिए सहमत करने की कोशिश करने लगा।

स्वाभाविक ही मैं धोखेबाज़ों के चंगुल में फँसकर अपना पैसा खोना नहीं चाहता था। मैंने अपना शक उस पर भी ज़ाहिर कर दिया था लेकिन स्पष्ट ही वह स्कीम के विरुद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहता था।

लेकिन इससे मुझे यह बात समझ में आई कि धोखेबाज़ दुनिया भर में मौजूद हैं और दुर्भाग्य से उनके झाँसे में आने वाले लोग भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। इससे बचने का एकमात्र उपाय इस बात को समझना है कि कोई भी आपको यूँ ही रुपए क्यों देने लगा! पैसा कमाने के लिए आपको अथक प्रयास करना पड़ता है, श्रम करना पड़ता है!

भारत के निजी स्कूल किस तरह शिक्षा को भ्रष्ट व्यापार में तब्दील किए दे रहे हैं! – 26 मार्च 2014

भारत के निजी स्कूलों के बारे में अपने खयालात के इज़हार के साथ मैंने निजी स्कूलों पर जारी इस श्रृंखला की शुरुआत की थी, जिसमें मैं आपको वहाँ अपनाई जाने वाली लम्बी, उबाऊ और श्रमसाध्य प्रवेश-प्रक्रिया के बारे में बता चुका हूँ लेकिन जिस विषय पर मैंने अभी सिर्फ संक्षिप्त टिप्पणी की है वह दरअसल सबसे बड़ी समस्या है और हमेशा की तरह वह है पैसा! दरअसल, शिक्षा बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है! एक विशाल, भ्रष्ट व्यापार!

हमें कई बार उन पश्चिमी मेहमानों की प्रतिक्रिया सुनने को मिलती है, जो भारत में माता-पिता द्वारा बच्चों की शिक्षा पर किये जाने वाले व्यय के बारे में सुनकर हैरान रह जाते हैं. जब हम उनसे कहते हैं कि हमारा स्कूल सिर्फ उन्हीं बच्चों के लिए है, जिनके माता-पिता उन्हें उन स्कूलों में भर्ती कराने में असमर्थ रहते हैं, जहाँ फीस ली जाती है तो वे आश्चर्य से पूछते हैं: ‘क्या? आपके देश में बच्चों की पढाई के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है?’

कई पश्चिमी देशों में शिक्षा पर कोई खर्च नहीं करना पड़ता है। हो सकता है कुछ जगह किताबें-कापियां खुद खरीदनी पड़ती हों मगर स्कूलों में फीस या चंदे के रूप में प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क आदि वसूल नहीं किया जाता। भारत में स्थिति कुछ अलग है।

जी हाँ! यहाँ सरकारी स्कूल हैं, जो मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं- कम से कम यह उन्हें ऐसा करना चाहिए! वहाँ स्कूल फीस नहीं लगती और सरकारें लम्बे-चौड़े इश्तहार प्रकाशित करती हैं कि वहाँ बच्चों को शिक्षा के अलावा मुफ्त भोजन भी मुहैया कराया जाता है- लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा वहाँ प्रदान की जाती है वह अक्सर बिलकुल निरुपयोगी और घटिया होती है! वहाँ अक्सर शिक्षक पढ़ाने ही नहीं आते और जब आते भी हैं तो आपस में बैठकर गपशप करते रहते हैं। कई जगह स्कूलों का इस्तेमाल कबाड़ख़ाने की तरह किया जाता है और यहाँ तक कि जानवर बाँधने के लिए भी उनका इस्तेमाल होता देखा गया है! कहीं कहीं शिक्षक अपने किसी स्थानापन्न को स्कूल भेज देते हैं, जो कम पढ़ा-लिखा और अयोग्य होता है और जिसे वे अपनी पक्की, सरकारी तनख्वाह में से कुछ रुपया दे देते हैं। इस दौरान शिक्षक अपने किसी निजी व्यापार में लगे होते हैं और इस तरह एक साथ दो स्रोतों से पैसा कमाते हैं। यह है सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई का हाल! किसी को कोई परवाह ही नहीं है!

स्वाभाविक ही अपढ़ माता-पिता भी, जो आर्थिक रूप से भी कमज़ोर होते हैं, इस स्थिति से अनभिज्ञ नहीं होते। उन्होंने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा मगर वे भी देखते-समझते हैं कि उनके लड़के-लड़कियां एक के बाद एक परीक्षाएं पास करते हुए अगली कक्षाओं में पहुँचते जा रहे हैं मगर अपने नाम तक लिख नहीं पाते। हिंदी में लिखा छोटा-मोटा वाक्य भी ठीक से पढ़ नहीं पाते!

इन अभिभावकों में से कुछ शिक्षा के महत्व को समझते हैं और चाहते हैं कि उनके बच्चे उनसे अधिक पढ़-लिख सकें- मगर उनके पास अपने बच्चों को किसी अच्छे निजी स्कूल में भेजने के लिए पर्याप्त रुपया नहीं होता। एक ऐसा स्कूल, जहाँ उन्हें वास्तव में पढ़ाया जाए! स्कूलों की वर्दियां और किताबें महँगी होती हैं, मासिक फीस बहुत अधिक होती है- 30 से 50 यू एस डॉलर यानी लगभग 2000 से 3000 रूपए तक! यह वह रकम है जो हमारे स्कूल के कई बच्चों के अभिभावक माह भर में कमा पाते हैं। वे किस तरह अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेज सकते हैं!

और सबसे मुख्य बात तो औपचारिक रूप से वितरित परिचय-पुस्तिकाओं में लिखा ही नहीं होता: अनौपचारिक प्रवेश-शुल्क, स्कूल को अनिवार्य रूप से दिया जाने वाला चन्दा, बच्चे को प्रवेश-प्रक्रिया में उत्तीर्ण कराने और उसका प्रवेश सुनिश्चित कराने के लिए दी जाने वाली रिश्वत! सामान्यतः यह रकम कुल मिलाकर 700 से 850 यू एस डॉलर यानी करीब 40 से 50 हजार रुपयों तक होती है। और अगर आप अपने बच्चे से प्रेम करते हैं और आपके लिए इतनी रकम खर्च करना सम्भव है तो आप यह सौदा मंज़ूर कर लेते हैं।

चंदे की शक्ल में इतनी बड़ी रकम अदा किये बगैर आप अपने बच्चे को किसी भी अच्छे स्कूल में दाखिल नहीं करवा सकते। हर व्यक्ति को इन स्कूलों में अपने बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित करने के लिए यह रकम अदा करनी ही होगी। और इन स्कूलों का भ्रष्ट प्रशासन-तंत्र यह सुनिश्चित करेगा कि रकम सही हाथों में पहुँच जाए।

आपको बच्चों की किताबें और कापियां स्कूल से ही खरीदनी पड़ती हैं और हर किताब-कापी पर स्कूल को अतिरिक्त लाभ प्राप्त होता है। इसी तरह स्कूल से ही वर्दियां भी खरीदनी पड़ती हैं, जिनकी कीमत बाज़ार में उपलब्ध उन्हीं वर्दियों की कीमत से बहुत ज़्यादा होती है।

भ्रष्टाचार! पैसा! व्यापार! भारत में बच्चों की शिक्षा के साथ यही खिलवाड़ हो रहा है।

और निश्चय ही यह देश को और आने वाली पीढ़ियों को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाने वाला रास्ता कतई नहीं है!

वास्तविक पढ़ाई के लिए स्कूल जाना – हमारे स्कूल के बच्चे – 7 फरवरी 2014

आज फिर शुक्रवार है और अपने स्कूल के किसी बच्चे से आपका परिचय करवाने का दिन। आज मैं आपका परिचय तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले तेरह वर्षीय अखिल से करवा रहा हूँ।

अखिल अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटा है और परिवार का दूसरा पुत्र है। उसका बड़ा भाई दसवीं तक स्कूल गया और जब दसवीं में फेल हो गया तो स्कूल जाना छोड़ दिया। वह ड्राप-आउट है, जिसने न तो स्कूल में कुछ सीखा और न ही वह कोई काम जानता है। तो इस समय वह वही सब कर रहा है, जो ऐसे लोग करते हैं यानी: कुछ भी नहीं!

लेकिन अखिल की सबसे बड़ी बहन उसके ठीक विपरीत है। इस समय वह ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रही है। उसे सीखने में बहुत रुचि है और उसे विश्वास है कि इस साल वह अच्छे नंबरों से पास हो जाएगी। वह पढ़ाई के अलावा घर पर सिलाई मशीन पर सिलाई भी करती है और वह सब कुछ सी लेती है, जिसकी परिवार के किसी सदस्य को ज़रूरत होती है। इसके अलावा वह पड़ोसी महिलाओं के कपड़े भी सीती है, जिससे परिवार के लिए बहुमूल्य, कुछ अतिरिक्त रुपए भी कमा लेती है।

उसकी इस मदद को परिवार कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार करता है क्योंकि बच्चों का पिता माह में 5000 रुपये यानी लगभग 80 डालर कमाता है। जब वह युवा था तब उसने नहीं सोचा था कि इतना पढ़-लिख लेने के बावजूद हर माह वह इतने कम रुपए कमा पाएगा। जी हाँ, वह यूनिवर्सिटी में पढ़ा-लिखा बी एड ग्रेजुएट है हालांकि वह कभी भी पढ़ाई में इतना अच्छा नहीं रहा कि उसे बेहतर वेतन वाली कोई अच्छी नौकरी मिल सके। इस तरह आज वह एक स्थानीय धर्मार्थ संगठन के भंडार-गृह की देखभाल करता है।

एक बी एड पास व्यक्ति जब अपनी एक बेटी पर पैसा खर्च करता है तो आपको लगता है कि यह व्यक्ति पढ़ाई की महत्ता समझता होगा लेकिन जब आप उसकी दूसरी बेटी का स्कूल रेकार्ड देखते हैं तो आपकी यह धारणा गलत सिद्ध होती है। वह कई साल हमारे स्कूल में पढ़ने आती थी लेकिन अचानक एक साल की शुरुआत में उसने आना बंद कर दिया। उसके अभिभावकों से पता किया तो हमें बताया गया कि उसे किसी दूसरे स्कूल में भेज दिया गया है। हमारे स्कूल से वह दूसरी कक्षा पास करके निकली थी और जब हमने उससे पूछा तो उसने बताया कि अब नए स्कूल में वह सातवीं कक्षा में पढ़ रही है! उसके पिता ने उस स्कूल के शिक्षकों से कुछ ले-देकर उसे पाँचवी पास का सर्टिफिकेट दिलवा दिया था; इस तरह बिना स्कूल गए और तीसरी से पाँचवी तक बिना पढ़ाई किए वह आज सातवीं कक्षा में पढ़ रही है।

लेकिन अखिल हमारे स्कूल में ही आता रहा और यहीं पढ़ता रहा और उसके शिक्षक बताते हैं कि परीक्षा में प्राप्त नंबरों को देखा जाए तो वह एक औसत विद्यार्थी दिखाई देता है लेकिन कक्षा में पूरी लगन के साथ पढ़ने की कोशिश करता है। वे यह भी बताते हैं कि जब भी पढ़ाई से इतर कोई बात कक्षा में होती है तो अखिल सबसे पहले बोलने के लिए खड़ा हो जाता है। वह बहुत ज़िंदादिल और बातूनी बच्चा है। स्कूल आना उसे बहुत पसंद है और यहाँ जितनी देर रहता है अपने यार-दोस्तों के साथ समय का पूरा-पूरा आनंद उठाता है।

अखिल को पूरी तरह मुफ्त पढ़ाकर हम इस परिवार की मदद कर रहे हैं। अगर आप चाहते हैं कि अखिल जैसे और बच्चों को पढ़ाने के हमारे इस प्रयास में कोई मदद करें तो आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके ऐसा कर सकते हैं।

विदेशी पर्यटकों के साथ अंतरंगता तब तक ही अच्छी है जब तक उसमें कोई धोखेबाजी निहित न हो! 22 दिसंबर 2013

एक सप्ताह पहले मैंने आपसे अपने संगीतज्ञों और दूसरे पेशे में लगे भारतीयों के संबंध में अपने अनुभवों और मुझ पर होने वाले उनके प्रभावों के विषय में चर्चा की थी। उनमें से कई लोग सेक्स को लेकर पश्चिमी संस्कृतियों की स्वतन्त्रता देखकर अचंभित रह जाते थे और उनमें से अधिकांश इस स्वतन्त्रता का मज़ा भी उठाते थे और खुद उन अनुभवों से दो-चार होना पसंद करते थे-कई बार इस बात की परवाह किए बगैर कि उन पर भारत में पीछे छूट चुकी अपनी पत्नी के प्रति एकनिष्ठता और वफा का नैतिक बंधन है या अपने बच्चों के प्रति भी उनकी कोई ज़िम्मेदारी है। जब कि पिछली बार मैंने इन सम्बन्धों में सिर्फ पुरुषों की भूमिका के बारे में चर्चा की थी, इस बार इन मामलो से सम्बद्ध महिलाओं पर प्रकाश डालना चाहता हूँ।

अगर अपने कार्यक्रमों में शामिल संगीतज्ञ का उदाहरण लिया जाए तो मैं स्पष्ट रूप से देख सकता हूँ कि क्यों महिलाएं उसके प्रति आकर्षित हो जाती थीं। जो भी मेरे कार्यक्रमों में आता है, भारत, भारतीय दर्शन (अध्यात्म), भारतीय संस्कृति और भारतीय संगीत में उसकी थोड़ी बहुत रुचि भी होती ही है। कुछ समय किसी दूसरे देश और उस देश के लोगों के साथ सम्बद्ध होने के बाद और उस देश से संबन्धित बातों को पसंद करने के बाद, मेरी नज़र में, वहाँ के लोगों में माधुर्य और सौन्दर्य दिखाई देना स्वाभाविक ही है। अनजाने देश के प्रति आकर्षण, दूसरी संस्कृतियों के प्रति सम्मोह इस दीवानगी में इजाफा करता है और उसके बाद अगर कोई महिला उनके प्रस्तावों का अनुकूल प्रत्युत्तर देती है या इससे बढ़कर, खुद वही इस विषय में पहल करती है तो इसे किसी प्रकार का चमत्कार नहीं माना जाना चाहिए।

मैं नहीं समझता कि इसमें कोई बुराई है और अब मैं उन दूसरे लोगों की तरफ लौटता हूँ, जो सामान्य रूप से इस समस्या से घिरे हुए हैं। मेरे विचार में अपनी पत्नी के साथ धोखाधड़ी करना, विशेषकर तब जब कि वह हजारों किलोमीटर दूर रह रही है बहुत घृणास्पद कार्य है। यह एक विवाहित व्यक्ति द्वारा किया गया विश्वासघात है-और इसके लिए एक दूसरा व्यक्ति भी जिम्मेदार है।

ईमानदारी वाली बात यह है कि मैं मानता हूँ कि बहुत सी महिलाएं नहीं जानतीं कि जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने सेक्स संबंध स्थापित किए हैं, उसके पत्नी और बच्चे भी हैं। बहुत सी स्त्रियॉं के लिए यह एक रात का संबंध होता है और कुछ दूसरी स्त्रियाँ अधिक समय तक संबंध कायम रखती भी हैं तो इसलिए कि वे कई साल तक यह बात नहीं जान पातीं और इस बीच उस व्यक्ति के साथ जीवन भर साथ रहने का सपना भी देखने लगती हैं। इसके अलावा कुछ स्त्रियाँ ऐसी भी होती हैं, जिन्हें समय रहते यह जानकारी हो जाती है और वे संबंध विच्छेद कर लेती हैं क्योंकि वे उस व्यक्ति द्वारा धोखा नहीं खाना चाहतीं। और फिर कुछ ऐसी तो होती ही हैं, जो सब कुछ जानते-बूझते हुए भी ऐसे सम्बन्धों को जारी रखती हैं क्योंकि उन्हें किसी दूसरे की परवाह नहीं होती।

मैं सिर्फ यही कारण देख पाता हूँ कि क्यों वे स्त्रियाँ एक विवाहित और बाल-बच्चेदार व्यक्ति के साथ संबंध जारी रखती हैं। उन्हें कोई परवाह नहीं होती। पुरुषों की तरह वे इस आशंका की तरफ से मुंह फेर लेती हैं कि उनका यह काम किसी दूसरे को पीड़ा पहुंचा सकता है। शायद वे समझती हैं कि यह संबंध हमेशा गुप्त रह सकेगा, भारत में रहने वाली उसकी पत्नी कभी यह नहीं जान पाएगी कि उसके पति का उसके साथ सेक्स संबंध है। शायद वे सोचती हों कि अगर किसी को दुख पहुंचता भी है तो वह उस पुरुष की ज़िम्मेदारी है, जो अपनी पत्नी और बच्चों को अंधेरे में रख रहा है। ऐसे पुरुष दोहरा जीवन जी रहे होते हैं-भारत में एक पत्नी और यहाँ, पश्चिम में, एक दूसरी स्त्री के साथ, या कई स्त्रियॉं के साथ-जब जो भा जाए- साल भर से यह नाजायज संबंध।

इस जीवन-पद्धति को मैं आज तक नहीं समझ पाया। मैं मानता हूँ कि यह गलत है, इससे कई लोगों को पीड़ा पहुँच सकती है।

ध्यान में विचारशून्यता की बात महज भ्रम है या व्यापार कौशल! 11 नवंबर 2013

मैं समझता हूँ कि आप लोगों ने ध्यान की एक प्रचलित परिभाषा सुनी होगी, जो मेरे विचार में गलत परिभाषा है। लोग अक्सर कहते हैं कि ध्यान मन (मस्तिष्क) को विचारशून्यता की स्थिति में लाने का अभ्यास है। यह ऐसी स्थिति है जब आप कुछ भी सोच नहीं रहे होते, आपका मस्तिष्क जब पूरी तरह रिक्त हो जाता है। मेरा मानना है कि ऐसा संभव ही नहीं है। इससे भी आगे बढ़कर मैं कहना चाहूँगा कि इस विचार का उपयोग आजकल पैसा कमाने में किया जा रहा है!

यह संभव ही नहीं है। क्या आप कभी ऐसी स्थिति में पहुँच सके हैं? मैं नहीं समझता कि ऐसा हो सकता है। क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति से मिले हैं, जो यह दावा करता है? अगर ऐसा कोई व्यक्ति है तो फिर इसका प्रमाण क्या है? कौन इस बात की जांच करेगा कि उसका दावा सही है? यह ऐसा ही दावा है जैसा कि लोग कहते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या वह हर जगह मौजूद है-आप उसे देख नहीं सकते, आप उसे छू नहीं सकते, फिर कैसे कहा जा सकता है कि वह है? इस बात का प्रमाण कहाँ है कि ईश्वर है या इस बात का कि आप पूर्ण विचारशून्यता की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं?

सोचने के लिए यह खयाल रुचिकर हो सकता है लेकिन कार्यरूप में यह असंभव है। इस ‘रिक्त-मस्तिष्क’ वाली स्थिति प्राप्त करने के अभ्यास की पहली सीढ़ी क्या है? आपको शून्य पर ध्यान केन्द्रित करना होता है! आप अपने मस्तिष्क को उस बिन्दु तक ले जाते हैं जहां आप कुछ नहीं सोचते। लेकिन कुछ न कुछ तो होगा ही, भले ही वह अतिसूक्ष्म विचार हो, यही कि कुछ नहीं सोचना है!

इसे इस प्रकार देखें: आपका पेट है, खाद्य पदार्थों को हजम करने के लिए और उसके लिए भोजन चाहिए। आपकी आँख बनी हैं, देखने के लिए और उन्हें देखने के लिए कुछ चाहिए। आपके कान आवाजों को सुनने के लिए बने हैं और आवाज़ चाहिए, जिन्हें वे सुन सकें। आपका मस्तिष्क बना है सोचने के लिए और यह आवश्यक है कि वह सोचे। उसके बगैर उसका अस्तित्व ही संभव नहीं है। मस्तिष्क में किसी न किसी विचार का होना अवश्यंभावी है। अगर आप भोजन नहीं करेंगे तो आप भूखे मर जाएंगे। अगर आप सोचेंगे नहीं तो क्या होगा? आपका मस्तिष्क बिना विचार के ज़िंदा बच नहीं सकता।

चाहे जितना अच्छे शब्दों में इस बात को प्रस्तुत किया जाए, एक प्रश्न बरकरार रहेगा: आप अपने मस्तिष्क को इतनी पीड़ा क्यों पहुंचाना चाहेंगे? मस्तिष्क का विचार से सीधा संबंध है और मस्तिष्क को विचार से दूर रखना उसे उसकी खुराक से वंचित कर देना है! इसके विपरीत आप उसे कोई बढ़िया पोषक-तत्व क्यों नहीं मुहैया कराते? सोचना, विचार करना बहुत अच्छी बात है। अपने मस्तिष्क को कुपोषण का शिकार न बनाएँ-और अपने विचारों को समाप्त करने का प्रयास करते हुए उसे विचारशून्य बनाने की कोशिश करना एक तरह की मूर्खता और उसके प्रति लापरवाही के सिवा कुछ नहीं है।

फिर क्यों लोग आपसे कहते हैं कि यह आपका लक्ष्य होना चाहिए? क्योंकि वे अपना व्यापार चलाना चाहते हैं। इससे ज़्यादा अच्छा धंधा क्या होगा कि जिस चीज़ की इच्छा आप अपने ग्राहक के मन में पैदा कर देते हैं वह चीज़ आप उसे कभी देते नहीं हैं और न वह कभी उसे प्राप्त कर पाएगा और फिर भी वह उसे थोड़ा बहुत प्राप्त करने की आस में आपके पास बराबर आता रहेगा। आपको बताया जाता है कि एक ऐसी अवस्था, जो किसी भी तरह प्राप्त नहीं की जा सकती, आपको अतीव आनंद से भर देगी। अब आप उसके लिए मरे जा रहे हैं, उसे मुंहमांगी कीमत पर खरीद रहे हैं कि किसी तरह उस लक्ष्य तक पहुँच सकें। ये वही लोग हैं, जो भगवान बेचते हैं, जो हवा में से भभूत या सोना निकालने का चमत्कार बेचते हैं, जो कि कोई भी समझ सकता है कि संभव नहीं है। वही लोग अब कुछ ज़्यादा होशियार हो गए हैं और अब ध्यान-योग बेच रहे हैं। उनके ग्राहक एक ऐसे चक्रव्यूह में प्रवेश कर रहे होते हैं, जहां से बाहर निकल पाना मुश्किल है, ऐसी चीज़ पाने की कोशिश, जो प्राप्त होना असंभव है, एक ऐसा लक्ष्य जिसे हासिल करने का दावा वह गुरु करता है।

लेकिन इसमें इन गुरुओं की गलती नहीं होती क्योंकि अधिकतर योग और ध्यान-योग के गुरु यह विचार इसलिए प्रचारित करते हैं कि उन्हें भी उनके गुरु द्वारा मूर्ख बनाया गया होता है कि यह मस्तिष्क की कोई अद्भुत और दुर्लभ अवस्था है। सच बात तो यह है कि बहुत कम लोग मुझे मिले, जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने विचारशून्यता की यह अवस्था वास्तव में प्राप्त की है। कुछ लोग भ्रमित होते हैं और कहते हैं कि शायद एकाध मिनट के लिए यह अवस्था उन्होंने प्राप्त की है। मगर अधिकतर लोग यह ईमानदारी के साथ स्वीकार करते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने से कोसों दूर हैं। वे पूरा प्रयास कर रहे हैं मगर अभी वहाँ पहुंचे नहीं हैं। अपनी इस हालत पर उन्हें संकोच होता है, बुरा लगता है और वे अपने आपको उन लोगों से कमतर आँकते हैं, जो इस विचारशून्यता की अवस्था को प्राप्त करने का दावा करते हैं।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दूसरों से यह कहते हैं या किसी दूसरे से यह बात सुनते हैं। थोड़ा समय निकालकर मेरी बात पर गौर करें और फिर ध्यान करते समय विचारशून्यता प्राप्त करने का प्रयास करने के स्थान पर कोई अच्छी बात सोचें, कोई अच्छा विचार मन में रखें!

इस विषय पर इस ब्लॉग द्वारा आपके मन में थोड़ी सी हलचल पैदा करने के बाद मैं कल ध्यान-योग से संबन्धित कुछ दूसरे पहलुओं पर बात करूंगा।