इस बात को समझिए कि आपका वास्तविक जीवन आपकी ऑनलाइन दुनिया से अधिक महत्वपूर्ण है – 4 मार्च 2015

बहुत से लोग आजकल दिन का बहुत सारा समय मोबाइल फोनों और टेबलेटों पर गुज़ारते हैं। वहाँ वे कोई काम नहीं कर रहे होते बल्कि सोशल मीडिया पर यार-दोस्तों से गपशप कर रहे होते हैं। मैं नहीं समझता कि इसमें कोई बुराई है। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि आप ऐसा न करें। लेकिन मैं यह अवश्य कह रहा हूँ कि सतर्क रहें और यह न समझें कि जो भी आप वहाँ पढ़ रहे हैं, सच ही है।

बहुत से लोगों के साथ मैंने ऐसा होते देखा है-विशेष रूप से उनके साथ, जिनकी प्रवृत्ति अपने आपको दूसरों से कमतर समझने की होती है। दूसरों की लिखी मसालेदार टिप्पणियों को, ट्वीटों को और वक्तव्यों को वे पढ़ते हैं और फिर अपने जीवन में हीनता-बोध से ग्रसित हो जाते हैं।

कुछ समय पहले की ही बात है जब लोग पत्रिकाओं में प्रसिद्ध लोगों के साक्षात्कार पढ़ते थे और सोचते थे कि उनका जीवन कितना शानदार है, उनका शरीर कितना गठीला या लोचदार है और वे किस तरह अपने प्रेमियों के साथ रहते हैं और उनके पास सफलता, प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य, सब कुछ है। फिर जब एक दिन वे सुनते थे कि उस व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली तो उन्हें बहुत बड़ा झटका लगता था, वे अचंभित रह जाते थे कि इतना सुखी व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है-कोई भी यह नहीं देख पाता था कि उनका जीवन भी वास्तव में कितना दीन-हीन, कितना अभागा था। जैसा मीडिया में दिखाया जाता था, कम से कम वैसा सम्मोहक तो वह कतई नहीं था।

फिर वे अपने वास्तविक जीवन के मित्रों की ओर देखते और पाते कि वास्तविक, समस्या-ग्रस्त इंसान सिर्फ वे ही नहीं हैं। दिक्कतें, परेशानियाँ और तुनकमिजाजी सिर्फ उनके मित्रों में ही नहीं, बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली लोगों में भी पाई जाती है।

आज, सोशल मीडिया पर उन टिप्पणियों को पढ़कर आप सोच में पड़ जाते हैं कि क्या उन्हें लिखने वाले वास्तव में हमेशा प्रसन्न रहते हैं, क्या वे सम्पूर्ण रूप से निर्दोष, आदर्श व्यक्ति हैं या वास्तविक, सामान्य मनुष्य हैं। और मुझे लगता है कि यहीं पर असली खतरा विद्यमान होता है।

उन लोगों के लिए, जिन्हें दूसरों से अपने आप की तुलना करना पसंद है, इसका परिणाम यह होता है कि वे अपने आपको तुच्छ समझने लगते हैं। स्वाभाविक ही, ये दूसरे लोग, जिन्हें उन्होंने प्रत्यक्ष देखा नहीं होता, कोई प्रख्यात सेलेब्रिटी नहीं होते बल्कि उनके वास्तविक मित्र और जान-पहचान वाले होते हैं! तो उन्हें लगता है कि उनके आसपास का हर कोई वास्तव में एक शानदार दुनिया में, जैसे स्वर्ग में ही रह रहा है और एक से बढ़कर एक, मज़ेदार और सुखद बातों का अनुभव कर रहा है, सबसे इतना प्रेम और प्रशंसा पा रहा है। सिर्फ वे ही हैं, जिन्हें यह सब उपलब्ध नहीं है!

जिन्हें ऐसा महसूस होता है उन्हें मैं यही सलाह देना चाहता हूँ कि कंप्यूटर स्क्रीन से कुछ समय के लिए दूर हो जाएँ और इस आभासी दुनिया के मित्रों से वास्तविक जीवन में आमने-सामने मिलें। वास्तविक दुनिया के साथ अपना ताल्लुक बढ़ाएँ और इस बात को समझें कि आप जो चाहें, कुछ भी लिख सकते हैं और उन बातों को छिपा सकते हैं, जिनसे आपका जीवन वास्तव में प्रभावित होता है। स्वाभाविक ही बहुत से लोग अपने अच्छे, सुखद क्षणों को दूसरों के साथ साझा करना चाहते हैं, जबकि वास्तविक जीवन में, अकेले में वे बहुत बुरी परिस्थितियों का सामना कर रहे होते हैं! वे नहीं चाहते कि इस आभासी दुनिया में कोई भी उन पर दया करे, वे नहीं चाहते कि कोई भी उनके लिए सोशल मीडिया में सहानुभूतिपूर्ण शब्द लिखे, जब कि वास्तविक जीवन में उन्हें सर रखकर रोने के लिए एक कंधे की ज़रूरत है!

आभासी दुनिया बहुत शानदार है, आप उसकी सहायता से दुनिया भर के लोगों से संपर्क बनाए रख पाते हैं और देख सकते हैं कि वे क्या कर रहे हैं-लेकिन अपने वास्तविक जीवन को भूल न जाएँ, हाड़-मांस के वास्तविक लोगों से मिलें-जुलें और आप जैसे हैं, वैसे ही बने रहें, हर तरह की भावनाओं से युक्त, एक सामान्य इंसान!

खूबसूरती अलग-अलग रूपों में सामने आती है! खूबसूरती के गलत मानदंडों से हानि- 28 अगस्त 2013

कल मैंने समझाया था कि कैसे कुछ लोग, खासकर औरतें, अपने आप की तुलना दूसरों से करते हैं, अपनी संदेहास्पद विजय के लिए अपने स्वाभिमान को ताक पर रख देते हैं और जब तुलना में वे हार जाते हैं तो उन्हें बुरा लगता है। यह तो होता ही है कि अकेले में इस विषय में सोचकर आपको दुख होता है, लेकिन आप यह भी समझें कि खूबसूरती के जिस आदर्श के पीछे आप भाग रहे हैं वह आपके लिए और भी बहुत सी समस्याएँ लेकर आता है।

मुझे लगता है कि इस बारे में चर्चा करके वक़्त बरबाद करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि खूबसूरती के जिन आदर्शों से अधिकांश महिलाएं अपने शरीर की तुलना करती हैं वह वास्तविकता पर आधारित है या नहीं। मीडिया जिस छवि को दर्शा रहा है उन्हें कम्प्युटर द्वारा सुधारा गया है, जिन्हें दिखाया जा रहा है उन्होंने उस वक़्त काफी मेकअप किया हुआ होता है, प्रकाश-व्यवस्था उनके पक्ष में होती है, परन्तु वे वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में अभिनय नहीं कर रही होतीं और सबसे बढ़कर, वैसा दिखाई देना उनका व्यवसाय होता है। इस तरह, जो छवि आप आम तौर पर पोस्टर्स पर, पत्र-पत्रिकाओं में, टीवी पर देखती हैं वह आपके दिमाग में ज़बरदस्ती प्रवेश कर जाता है और आप भूल जाती हैं कि यह आपको इसलिए दिखाया गया है कि आप उस विज्ञापित वस्तु को खरीदें। और आप इसे सुन्दरता का मानदंड मान लेते हैं कि आपको और सभी महिलाओं को खूबसूरत कहलाने के लिए उसके जैसा दिखाई देना चाहिए!

मुख्यधारा का मीडिया इस बात की परवाह नहीं करता कि कई तरह के शरीर वाले लोग होते है! आखिर जिन्हें आप देखते हैं, पुरुष और महिलाएं, वे बहुत थोड़े से चुनिन्दा लोग होते हैं, कड़े मानकीकरण और कसौटियों से, जिन पर अधिकांश लोग पूरा नहीं उतर सकते, गुज़रकर आए हुए लोग।

इसका नतीजा स्पष्ट है: सभी लोग सोचते हैं कि यह साधारण और सामान्य-सी बात है और उनकी तरह दिखना चाहते हैं। अगर वे इसमें असफल होते हैं तो वे सोचते हैं कि वे उतने खूबसूरत नहीं हैं-जब कि यह वास्तव में बिल्कुल असंभव है! और यह सत्य बहुत सी महिलाओं को निराश कर देता है, जो बड़ी ईमानदारी से अपना वज़न कम करने की कोशिश कर रही थीं, या टीवी में दिखाई जा रही महिला की तरह की देहयष्टि बनाने की कोशिश कर रही थी! वे इसमें सफल नहीं हो सकतीं और इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे, हो सकता है कि उनकी शारीरिक बनावट ही बिल्कुल अलग हो!

यह देखते हुए, कई इस प्रयास से ही अपने आपको मुक्त कर लेती हैं। वे देखती हैं कि ‘खूबसूरत’ माने जाने का एकमात्र तारीका यही है कि उनके जैसा दिखाई दिया जाए-लेकिन वे कभी भी उसमें सफल नहीं हो पाएँगी, इसलिए कोशिश करने से क्या लाभ? उनमें कसरत करने का उत्साह नहीं रह जाता, घूमने-फिरने और अपने शरीर के लिए कुछ करने की इच्छा ही नहीं रह जाती। सिर्फ एक ही कारण वे देखती हैं और वह है प्रतिस्पर्धा या एक लक्ष्य, जिसे पाना है, मगर जब यह संभव ही नहीं है तो कोशिश ही क्यों करें? वे जानती हैं कि वे कभी भी जीत नहीं पाएँगी।

समाज जिस तरह से चल रहा है और खूबसूरती के अस्वाभाविक, और अवास्तविक मानदंडों को बढ़ावा दे रहा है, उसे बदलने के अलावा इस समस्या का एक समाधान यह है कि कसरत, स्वास्थ्यप्रद खान-पान और अपने शरीर के प्रति अपने नज़रिये को बदला जाए। आपको समझना चाहिए कि आप स्वास्थ्यवर्धक भोजन इसलिए नहीं करते कि आपका वज़न कम हो और आप किसी और की तरह दिखें। आप सबेरे सैर करने इसलिए नहीं जातीं या दौड़ इसलिए नहीं लगातीं या तैरने इसलिए नहीं जातीं कि आपका शरीर किसी दूसरे जैसा हो जाए। आपको यह सब किसी दूसरे के लिए नहीं बल्कि अपने लिए करना चाहिए!

यह सब अपने लिए कीजिए! अच्छा, स्वास्थ्यवर्धक भोजन कीजिए क्योंकि आप अच्छा महसूस करें! व्यायाम कीजिए क्योंकि आपका मन प्रसन्न रहे और आपका शरीर पुनः तरोताजा हो जाए, आप स्फूर्ति महसूस करें! वज़न सीमा में रहेगा तो आपको लाभ होगा किसी और को नहीं! स्वस्थ रहने के लिए यह सब कीजिए क्योंकि आप अपने शरीर से प्रेम करती हैं, क्योंकि आप खुद से प्रेम करती हैं!

अगर पर्याप्त लोग इस तरह व्यवहार करें तो हो सकता है कि विज्ञापन कंपनियाँ, फिल्म इंडस्ट्री और समाज भी धीरे-धीरे यह समझ जाएंगे कि हर व्यक्ति के अंदर सुंदरता है, अलग-अलग अनंत आकारों और रूपों में!

दूसरों से तुलना करने पर न तो आपकी सुन्दरता बढ़ती है न ही घटती है- 27 अगस्त 2013

कल मैंने बताया था कि लोग लगातार हर बात में दूसरों से अपनी तुलना करके बहुत अवसादग्रस्त हो जाते हैं। जिस बात पर, खासकर महिलाएं, अपनी तुलना दूसरों से करती हैं, वह है सुंदरता। लेकिन मेरी नज़र में, इस तरह की तुलना ही महिलाओं में स्वाभिमान की कमी और अपने शरीर के बारे में कुंठा और अवहेलना का कारण है।

मुख्य समस्या फिर वही है: बाहरी बातों से अपनी तुलना करना। यह बिल्कुल असामान्य दृश्य नहीं है कि एक महिला किसी और के कमरे में प्रवेश करती हैं और पूरे कमरे का बारीक मुआयना करना शुरू कर देती हैं। यह पिश्टोक्ति होगी लेकिन अधिकांश महिलाएं यह बात मानेंगी-कम से कम दिल ही दिल में-कि वे दूसरी महिलाओं के शरीर और चेहरे को बड़ी उत्सुकता से देखती हैं और उनके वस्त्रों, उनकी देहयष्टि, उनकी तंदरुस्ती, केशसज्जा और यहाँ तक कि मेकअप आदि की तुलना खुद की इन्हीं चीजों से करती हैं। इस जांच के आधार पर उनका स्वाभिमान या तो बढ़ जाता है या कम हो जाता है। अगर सामने वाली महिला थोड़ी मोटी है या उसके चेहरे पर मुहासे हैं या बाल खराब हैं तो उसी अनुपात में वे खुद को ज़्यादा सुंदर अनुभव करने लगती हैं। इसके विपरीत अगर वह महिला उन्हें अपने आप से ज़्यादा सुंदर लगती हैं तो वे अपने वज़न या जिस बात को भी वे अपनी कमजोर नब्ज़ समझती हैं, उसके प्रति अचानक चैतन्य और सतर्क हो जाती हैं।

वैसे मैं यहाँ महिलाओं की बात कर रहा हूँ लेकिन यह सिर्फ महिलाओं की ही समस्या नहीं है! जब पुरुष यही बात करते हैं तो, हो सकता है, सुंदरता के विषय में न सोचें लेकिन कुल मिलाकर मतलब अलग नहीं होता! पुरुष, दूसरे पुरुषों (के पेट की, बाँहों की) की मांसपेशियाँ, उनकी दौलत और स्वाभाविक ही उनका बेफिक्र व्यवहार और विश्वस्त मुस्कुराहट देखते हैं और वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा महिलाएं करती हैं!

लेकिन क्या सुंदरता तभी साबित होगी, जब आप तुलना में जीत जाएंगे? क्या आप वास्तव में तभी अपने आपको सुंदर समझ पाती हैं जब उस फिल्म-स्टार या सुपर-मोडेल स्त्री से, तुलना में, आपसे भी कम सुंदर महिला खड़ी हो? क्या आप वाकई यह सोचती हैं कि आप तभी सुंदर होंगी जब आप उस पोस्टर वाली या टीवी विज्ञापन वाली महिला जैसी दिखने लगेंगी?

मैं समझ सकता हूँ कि जब आप किसी तुलना में बेहतर सिद्ध होते हैं तो अच्छा लगता ही है (फील-गुड फैक्टर जैसी कोई चीज़ होती ही है), भले ही वह आपके मस्तिष्क में होता हो और आपकी विजय को देखने के लिए कोई दर्शक मौजूद नहीं है। लेकिन आपको समझना चाहिए कि वास्तव में आप वहाँ कर क्या रही हैं और इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि आपका खूबसूरती का मानदंड क्या है!

सच्चाई यह है कि सुंदरता का यह आदर्श, यह मानदंड किसी भी तरह से वास्तविक नहीं है क्योंकि हर मीडिया चैनल, हर मोडेल और अभिनेत्री के चेहरे को बेहतर दिखाने के लिए कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करते हैं। और ऐसे अवास्तविक चित्र को आप अपना आदर्श मान लेती हैं, उसे अपने लिए एक लक्ष्य बना लेती हैं, जिसे पाने के लिए आप कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाती हैं और इसके अलावा, इसी मानदंड पर आप दूसरी औरतों को भी तौलने लगती हैं।

फिर प्रश्न वही है कि अपने आपको समझने (परिभाषित करने) और अपनी पहचान के लिए कि आप कौन हैं, आपको बाहर कितना देखना चाहिए? क्या आपको यह सोचना चाहिए कि "मैं हीथर से दुबली हूँ, मेरी त्वचा का रंग मेरी से बेहतर है, मेरे बाल लूसी से घने हैं?" क्या यह सोचना पर्याप्त नहीं होगा कि "मैं सुंदर हूँ?"

मैं यह कितनी बार कहूँ कि सुंदरता सिर्फ बाहर नहीं है और यह कि सुंदरता की समझ सबके पास अलग-अलग होती है! जब आप कमरे में अकेली होती हैं और तुलना करने के लिए कोई आदर्श या कोई प्रतिस्पर्धी आपके सामने नहीं होता, तब भी आपको खुद को सुंदर ही समझना (महसूस करना) चाहिए! और सुपरस्टार्स की भीड़ के बीच भी आपको अपनी सुंदरता का एहसास होना चाहिए। आप अनूठे हैं, आप जैसा कोई नहीं है और आप सुंदर हैं।

दूसरों के साथ अपनी तुलना मत कीजिए और खुश रहिए! 26 अगस्त 2013

पिछले सप्ताह मैंने कार्यक्षेत्र में होने वाली प्रतिस्पर्धा के बारे में लिखा था, जिसकी अधिकता लोगों को मानसिक रूप से तोड़ देती है और उनका मानसिक और शारीरिक क्षरण होने लगता है। अंततः वे गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा सिर्फ कार्यक्षेत्र में ही देखने को मिलती हो, ऐसा नहीं है, जीवन के हर क्षेत्र में यह सामान्य रूप से मौजूद होती है और अगर आप लगातार दबाव में जीवन बिताना चाहते हैं तो कहीं भी उससे साबका पड़ सकता है! यह काफी हद तक आप पर निर्भर हैं: आप दूसरों के साथ कितनी स्पर्धा करना चाहते हैं या कितनी हद तक किसी के साथ अपनी तुलना करना चाहते हैं? इसके विपरीत, आप खुद अपने आप पर कितनी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा खर्च करना चाहते हैं?

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आज समाज में बड़ी संख्या में लोग तनावग्रस्त पाए जाते हैं क्योंकि समाज में आपसी प्रतिस्पर्धा बहुत सामान्य और आम बात हो गई है। प्रतिस्पर्धा करना है इसलिए दूसरों से अपनी तुलना करना भी सहज-स्वाभाविक है क्योंकि तभी तो आप जान पाएंगे कि कहीं दूसरे आपसे बेहतर तो नहीं कर रहे हैं! अगर आपसे खराब कर रहे हैं तो वह भी अपनी तात्कालिक खुशी के लिए ज़रूरी है। लोग अपने सहकर्मियों के साथ ही प्रतिस्पर्धा नहीं करते, वे अपने बचपन के सहपाठियों के साथ भी यह तुलना करते हैं कि उन्होंने कितनी तरक्की ही है, और उनकी खुद की तरक्की से वे कितना आगे या पीछे हैं! किसी जिम में ट्रेडमिल पर वे कितना तेज़ दौड़ते हैं और उनके मित्र कितना! खुद वे कितना कमा रहे हैं, इसके अलावा वे यह भी देखते हैं कि उनकी पत्नी कितना कमा रही है और फिर उससे अपने पड़ोसी परिवार की कमाई से तुलना करते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी सुंदरता की तुलना किसी अजनबी से भी करने लगते हैं! अपने अवकाश के समय में वे क्या पढ़ रहे हैं, इसकी तुलना वे लोगों द्वारा पूल पर, सी-बीच पर या मेट्रो में पढ़ी जा रही किताबों से करते हैं। क्या मैं अधिक बुद्धिमान हूँ? क्या मैं ज़्यादा सफल हूँ? क्या मैं ज़्यादा सुंदर हूँ? क्या मैं ज़्यादा तेज़, ऊंचा या अच्छा हूँ?

अगर इन सभी सवालों के जवाब ‘हाँ’ में हों, तभी वे संतुष्ट होते हैं। अगर आपमें यह प्रवृत्ति है तो आप समझ सकते हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ। आप हर वक्त तुलना करते रहते हैं, बार-बार अपनी तरफ देखते हैं और फिर किसी दूसरे की तरफ और अगर आप जीत रहे हैं तो इस तुलना का आप पर सकारात्मक असर होता है अन्यथा आप निराश हो जाते हैं।

समस्या यह है कि ऐसा करके आपका ध्यान पूरी तरह दूसरों पर केन्द्रित हो जाता है और आप इन्हीं तुलनाओं के जरिये अपनी पहचान सुनिश्चित करने लगते हैं। आप कौन हैं? मैं दौड़ में जैक से तेज़ हूँ, मैं काम में जैस्मिन से ज़्यादा सफल हूँ, मैं अपने पड़ोसी, मिलर्स से बेहतर अभिभावक हूँ! सब कुछ बाहर है, दूसरे प्रगति में कितना आगे हैं और आप कहाँ है। आप अपने आंतरिक मूल्य, अपनी आंतरिक शक्तियों, अपनी आंतरिक सुंदरता से सम्बद्ध नहीं रह पाते और अंततः अपना महत्व कम कर लेते हैं। यहाँ तक कि आपके ये गुण आपकी जानकारी में ही नहीं रहते क्योंकि आप तो अपना ध्यान दूसरों पर (बाहरी बातों पर) केन्द्रित किए हुए हैं।

आप हमेशा जीत नहीं सकते और स्वाभाविक ही बार-बार हारना तनाव पैदा करता है! पूर्णतावादी और खुद से बहुत ज़्यादा अपेक्षा रखने वाले, हार को और भी ज़्यादा दिल पर ले लेते हैं, जो उन पर और भी ज़्यादा शारीरिक और मानसिक दबाव पैदा करने का कारण बनता है। वैसे ही आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी द्वारा निर्मित दबाव कोई कम नहीं हैं। इसलिए कम हाई-प्रोफ़ाइल नौकरी वाले लोग या जो लोग नौकरी नहीं करते या कोई काम भी नहीं करते, वे भी शारीरिक और मानसिक क्षय (breakout) से पीड़ित रहते हैं।

आप जो हैं, जैसे हैं, वैसे ही महत्वपूर्ण हैं, इस बात को आपको समझना होगा। अपनी सीमाओं के कारण अपने आपको कम आंकने की आदत छोड़कर, अपनी कीमत पहचानना सीखना सीखिए। यह आवश्यक नहीं है कि हमेशा आप सर्वोत्तम या नंबर वन ही हों-सच तो यह है कि आप हो ही नहीं सकते! कोई भी नहीं हो सकता! इस बात को स्वीकार कीजिए कि आप अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं और आपकी प्रतिभा हर वक़्त, हर क्षेत्र में सर्वोत्तम नहीं हो सकती।

अगर आप अपनी यह आदत बदलना चाहते हैं तो प्रतिदिन कम से कम थोड़े समय के लिए ध्यान लगाने की कोशिश अवश्य कीजिए या अपने आप को याद दिलाते रहिए कि किसी के साथ अपनी तुलना करने की आपको आवश्यकता नहीं है। जब भी आप निराश या दुखी हों, उसका कारण जानने की कोशिश कीजिए-कहीं यह इसलिए तो नहीं है कि आप किसी से अपने आपको कमतर महसूस कर रहे हैं? फिर इस एहसास से मुक्त होने का प्रयत्न कीजिए, अपने आपको समझाइए कि आप दोनों ही मनुष्य हैं इसलिए दोनों का एक ही महत्व है, सिर्फ इतना ही कि उसके पास दूसरी विशेषताएँ हैं।

दूसरों से अपनी तुलना करना छोड़ें और खुश रहें!

उपलब्धियां और सफलताएँ जब खुशियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं! 20 अगस्त 2013

कल मैंने आपको अपनी नई परियोजना के विषय में बताते हुए ज़िक्र किया था कि कई खेल ऐसे हैं जो प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा करते हैं जब कि आगे चलकर बच्चों को जीवन में प्रतिस्पर्धा का सामना करना ही है। वैसे स्पर्धायुक्त खेल मज़ेदार हो सकते हैं और उनसे दूर रहना हमेशा उचित नहीं कहा जा सकता लेकिन वह प्रतिस्पर्धा, जिसका उन्हें वास्तविक जीवन में, खासकर अपने कामकाजी जीवन में, सामना करना है, वह बहुत सा अनावश्यक और हानिकारक दबाव और तनाव पैदा कर देती है।

दरअसल, यह आजकल स्कूलों में शुरू हो चुका है। जब परीक्षाओं में प्राप्त अंकों की घोषणा होती है तब, स्वाभाविक ही, हमेशा माहौल प्रतिस्पर्धात्मक हो जाता है। हर विद्यार्थी यही देखता है कि उसकी कक्षा के दूसरे बच्चों ने क्या परिणाम हासिल किए हैं और फिर अपने अंकों की तुलना उनके अंकों से करता है और सोचता है कि उनसे कितना अच्छे या बुरे अंक उसे प्राप्त हुए हैं। वह शिक्षा प्रणाली नैसर्गिक प्रतिस्पर्धा को पोषित और पल्लवित करती है जो विभिन्न क्षेत्रों मे पुरस्कार देने की हामी है और हमेशा ‘सर्वप्रथम’ का सम्मान करती है। इससे दूसरे बच्चे भी प्रशंसा प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं और वही सफलता प्राप्त करने में जी-जान लगा देते हैं।

यह स्कूल है, अभी भी यहाँ सुरक्षित वातावरण में, नियमानुसार और स्पष्ट ढांचे में काम होता है। यह वास्तविक जीवन के बीहड़ में संभावित कटु अनुभवों का आधार तैयार करता है। अगर आपने इस मंज़िल तक आकर भी सफलता प्राप्त करने लायक कुछ नहीं सीखा, तो फिर आगे आने वाली ज़िंदगी में वही बातें सीखने के लिए बहुत कड़ा परिश्रम करना होगा।

आप एक बड़ी कंपनी में नौकरी करते हैं क्योंकि आपको लगता है कि उसमें आगे बढ़ने की ज़्यादा संभावनाएं हैं-अधिक से अधिक सफलता प्राप्त करने के अवसर। आप पूरी ताकत लगा देते हैं और कोई उपलब्धि प्राप्त करते हैं, अपने इलाके में सबसे अधिक विक्रय, साल में सबसे ज़्यादा लाभ। आपको ‘साल का नया चेहरा’ या ‘न्यूकमर ऑफ द ईयर’ नामक पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है, वेतन में संभावित बढ़ोत्तरी के साथ आपका सम्मान होता है। अगर आप दूसरे नंबर पर हैं तो आपको कुछ नहीं मिलता। कंपनी की कार्य-प्रदर्शन सूची के अनुसार अगर आप कहीं बीच में हैं या बिलकुल नीचे के कुछ लोगों में आपका नाम आता है तो आप समझिए कि आपका कोई मूल्य नहीं है। आप पर कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी और आपको नीची नज़र से देखा जाएगा। आप कंपनी की सूची में हैं, बस!

मुझे लगता है कि मुझे बहुत ज़्यादा विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह व्यवहार कंपनी में किस तरह का वातावरण निर्मित करता है, उन लोगों के दिलों में किस किस्म की भावनाएँ जन्म लेती हैं, जो जीत नहीं पाए और पीछे रह गए! आधुनिक समाज लोगों को यह सिखाता है: अगर आप उत्कृष्ट हैं तो आप अच्छे हैं। आप अच्छे हैं अगर आप ‘नंबर वन’ हैं। अगर आप ऊपरी लोगों में से एक हैं तो आपका अहं कृत्रिम रूप से बढ़ जाता है और आप और भी अधिक अच्छा काम करना चाहते हैं, जिससे आप कंपनी की बिक्री और लाभ बढ़ा सकें।

कुछ लोग प्रथम श्रेणी वाले, सबसे श्रेष्ठ समूह में दौड़े (काम किया), भरसक कठोर प्रयास किया और अंततः दबाव में आकर टूट गए। दूसरे कुछ वहाँ पहुँचने की बहुत कोशिश करते हैं लेकिन हमेशा मध्यम श्रेणी में बने रहते हैं और कभी भी वहाँ नहीं पहुंच पाते और अवसाद में घिर जाते हैं क्योंकि उन्हें कभी भी वह महत्व प्राप्त नहीं होता, जिसके लिए वे पूरे वक़्त लालायित रहे। फिर वे लोग भी हैं जिन्हें कभी मौका ही नहीं मिला, जो सदा निचली श्रेणी में ही रहे। वे हमेशा इस डर में रहते हैं कि उनकी जगह किसी और को रख लिया जाएगा और कंपनी में भी जड़वत काम करते रहते हैं-क्योंकि वे जानते हैं कि वे कभी भी ‘नंबर वन’ नहीं बन पाएंगे।

हम हमेशा इस तरह नहीं चल सकते! इसे बदलना होगा, थोड़ा सा बैठकर सोचना होगा और इस बात को समझना होगा कि सिर्फ आपकी सफलता ही आपकी पहचान नहीं है। यह हमारे लिए कोई खुशी नहीं लाएगा और न ही कोई आपको उस तरह से पसंद करेगा, जैसा कि वह किया करता था। अगर आप समझते हैं कि आपकी कंपनी आपसे इसलिए प्रेम करती है क्योंकि आप लाभ कमा रहे हैं तो इस बात को भी समझने की कोशिश कीजिए कि आप सिर्फ और सिर्फ इसलिए कंपनी के लिए महत्वपूर्ण हैं या उसके प्रेमपात्र हैं कि आप उनके लिए लाभ कमाते हैं।

यह आपके लिए कठिन होगा लेकिन मुझे लगता है कि अगर आप अपने आपको पूरी तरह टूटकर बिखरने से बचाना चाहते हैं तो आपको इस बात की गंभीरता को समझना ही होगा! आप इस प्रतिस्पर्धा में सफल हों या न हों, अपनी खुशी और आनंद को पूरी तरह इस खेल पर निर्भर न करें! भरपूर प्रयास करें मगर उसमें सम्मान या प्रशंसा की अपेक्षा न करें! आपको अपने परिवार और दोस्तों का एक तानाबाना विकसित करना चाहिए और अपने लिए एक आंतरिक स्वयोग्यता पैदा करनी चाहिए, जो ऐसी प्रतियोगिता से परे हो। अन्यथा आपका गिरना तय है और वह आपको तगड़ी चोट पहुंचाएगा। यह सुनिश्चित करें कि आपका स्व-सम्मान सिर्फ कार्यक्षेत्र में आपकी सफलता के चलते नहीं होना चाहिए। ध्यान से देखें कि आप कौन हैं, समझें कि आप आप हैं और सिर्फ यही बात, अपने आप में आपको प्रसन्न करने के लिए काफी है। यह आवश्यक नहीं है कि आप सर्वश्रेष्ठ ही हों। आप नंबर वन हों, यह ज़रूरी नहीं। अगर आपको मज़ा आ रहा है तो खेल में बने रहिए, जब तक मज़ा आ रहा है, खेलते रहिए। जब वह मज़ा, वह आनंद न मिले तो खेल से बाहर निकल आइये।

देशों और संस्कृतियों की तुलना करनी चाहिए मगर यह काम बहुत मुश्किल है – 15 जुलाई 2013

बच्चों की परवरिश के विषय में पिछले हफ्ते मैंने बहुत कुछ लिखा था और लोगों से अपनी महत्वाकांक्षाओं पर लगाम रखने की गुजारिश की थी। इसके अलावा यह भी कहा था कि वे अपनी आवश्यकताओं का भी यथार्थपरक अनुमान लगाएँ जिससे वे पैसा कमाने में ज़्यादा समय न लगाएँ और बचा हुआ समय बीबी-बच्चों के साथ बिता सकें। मेरी इस बात पर एक माँ ने मुझसे अपनी परिस्थिति बयान करते हुए कहा, "मैं जानती हूँ कि भारत के गरीब परिवारों की तुलना में मेरे पास बहुत कुछ है और…" उसके इस वाक्य ने मुझे ऐसी तुलनाओं के विषय में सोचने के लिए मजबूर कर दिया और अपने उन विचारों को मैं आज आपके सामने रख रहा हूँ।

मुख्य प्रश्न है: क्या आप भारत जैसे विकासशील देश की तुलना विकसित पश्चिमी देशों से कर सकते हैं? या क्या इन देशों के लोगों की आपस में तुलना करना ज़्यादा उचित होगा?

निश्चय ही एक हद तक आप ऐसा कर सकते हैं और यह अक्सर अच्छा ही होता है। जब आप दोनों देशों में रह रहे होते हैं और आपका उनसे लगातार संपर्क बना रहता है तो यह स्वाभाविक रूप से और अक्सर ही होता रहता है। दोनों देशों के लोगों का रहन-सहन कैसा है, उनके विचार क्या हैं, वे कितना कमाते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है, उनके जीवन में किस बात का कितना महत्व है और किन चीजों की उन्हें परेशानी होती है और उनकी आदतें क्या हैं? आदि आदि।

पश्चिमी देशों की नज़र से गरीब देशों को देखने का अर्थ है कि वास्तविकता से दो-चार होना। आपको समझ में आता है कि दरअसल आप बहुत सी ऐसी बातों से भी परेशान हो जाते हैं जो दरअसल जीवन में बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। आपको हमेशा लगता रहा है कि आपके पास पर्याप्त कपड़े नहीं हैं मगर फिर आपको पता चलता है कि दूसरों के पास सिर्फ एक या दो जोड़ी कपड़े ही हैं। यह आपके लिए जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं है कि आपका व्यापार कुछ मंदा चल रहा है जबकि दूसरे बहुत से लोगों के पास दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल से हो पाता है और अगर परिवार का मुखिया कुछ दिन बीमार हो जाए तो खाने के लाले पड़ जाते हैं। दुनिया के कई मुल्कों के लोग भुखमरी का सामना कर रहे हैं, उनका धर्म, जाति और लिंग के नाम पर दमन किया जा रहा है और समाज में उनके जीवन की कोई कीमत नहीं रह गई है और हर वक्त मौत का खौफ खाए जाता है।

तो, इस तरह की तुलना से आप अपने जीवन को बेहतर तरीके से और एक मौलिक नज़रिये से समझ पाते हैं। तब आप अपने जीवन से संतुष्ट हो पाते हैं और हो सकता है कि आप अपने आसपास के लोगों के साथ अपने व्यवहार पर भी पुनर्विचार करके उसे बेहतर बनाने के प्रयास करें।

शायद ऐसी तुलना उचित ही है और शायद इनका सकारात्मक असर भी होता होगा मगर दोनों के मध्य के विशाल अंतर को देखते हुए किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए यह तुलना निरर्थक ही सिद्ध होती है। ऐसी बहुत सी बाते हैं जो दो देशों या दो संस्कृतियों को देखने के आपके नज़रिये को प्रभावित करती हैं और उन बातों पर अलग से कई लंबे-लंबे लेख लिखे जा सकते हैं।

मैं एक उदाहरण देना चाहता हूँ। आप कहते हैं कि गरीब भारतीय लोगों के पास आपकी तुलना में बहुत कम साधन उपलब्ध है क्योंकि आप एक विकसित देश में रहते हैं। यह बिल्कुल ठीक होगा अगर आप सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से इसका आकलन कर रहे हों मगर आप निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते कि ये गरीब लोग आपसे ज़्यादा परेशान हैं। उनका जीवन पैसे के मामले में तो बहुत कठिन है मगर मानसिक रूप से वे आप लोगों से बहुत कम तनाव में रहते हैं। आपके पीछे कई तरह की जिम्मेदारियाँ और महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं जिन्हें आपको पूरा करना होता है। आपको हर काम अपनी मर्ज़ी से करना होता है और पूरी तरह सही काम करना होता है अन्यथा गलत काम के आप अकेले जिम्मेदार ठहराए जाते हैं, परिवार या समाज का कोई सदस्य आपकी मदद के लिए नहीं आने वाला।

आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि यह बात बहुत से गरीबों के लिए कितना मानसिक सुकून पहुँचाने वाली होती है कि उनके पास खोने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है। जिनके पास थोड़ा-बहुत धन है, वे भी आप लोगों से ज़्यादा मानसिक शांति में जीवन बिताते हैं क्योंकि उन्हें भी भौतिक सुविधाओं और संपत्ति से उतना मोह नहीं होता। इसके अलावा एक विशाल परिवार उनके पीछे खड़ा होता है जो उनके भीतर आपसी सुरक्षा और मानसिक संबल की भावना पैदा करता है।

आप यह न समझें कि मैं आपसे किसी खास दृष्टिकोण से दुनिया को देखने के लिए कह रहा हूँ। आप स्वयं यह निर्णय करें कि आप किस तरह या किस नज़रिये से उसे देखना चाहते हैं। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि मेरे पास किसी देश या समाज या संस्कृति को बेहतर और किसी दूसरे को कमतर समझने का कोई कारण नहीं है। पहली बात तो ऐसी तुलना करना बहुत मुश्किल होता है और फिर आपको किसी देश या समाज और उसकी संस्कृति को जानने के लिए वहाँ बहुत समय बिताना पड़ता है तभी आप ऐसी किसी तुलना की शुरुआत करने के काबिल हो सकते हैं।