सात लोगों का परिवार और कमाने वाला एक! – हमारे स्कूल के बच्चे- 4 अक्तूबर, 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

स्वाभाविक ही, वृन्दावन में कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां गरीब लोग रहते हैं। इसीलिए, जब हम कुमकुम और राधिका के या विनीता और तेजस्विनी के घर गए तो कुछ मीटर और चलते हुए नेहा के घर तक भी हो आए। इस सात साल की लड़की को हम अच्छी तरह से जानते हैं क्योंकि चार साल पहले से वह हमारे स्कूल में पढ़ रही है-जब हमारे यहाँ नर्सरी के बच्चों का भी एक समूह था। इस साल से उसका भाई, शिवम भी, जो अभी पाँच साल का है, हमारे स्कूल में पढ़ने आता है।

जब नेहा ने हमारे स्कूल में आना शुरू किया था, लगभग उसी समय उसके परिवार ने अपने घर में प्रवेश किया था। पहले वे नेहा के दादा-दादी और चाचा-चाचियों के साथ सम्मिलित परिवार में रहा करते थे लेकिन नेहा और उसके चार सहोदरों और उनके चचेरे भाई-बहनों के साथ उस घर में रहना मुश्किल था। तो, परिवार ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर, जहां पहले गाएँ बांधी जाती थीं, एक छोटा सा घर बनवा लिया।

इस परिवर्तन से उन्हें थोड़ा ज़्यादा स्थान प्राप्त हो गया-लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति जस की तस रही आई, वह ज़रा भी बेहतर नहीं हुई। नेहा और शिवम के पिता मजदूर हैं और पास की ही एक दुकान में सामान इधर से उधर लाने-ले जाने का काम करते हैं और दुकानदार के पीछे इधर उधर दौड़ते-भागते रहते हैं। वे 3500 रुपए माहवार कमाते हैं जो साठ डॉलर भी नहीं होता। इतनी आमदनी में सात सदस्यों के इस परिवार का गुज़ारा मुश्किल से ही हो पाता है!

इस बात का पता चलने पर हमारे लिए यह समझना और भी दूभर हो गया कि उनका 21 साल का सबसे बड़ा बेटा अपने परिवार की कोई आर्थिक मदद क्यों नहीं करता! माँ ने बताया कि कोई काम-धंधा करने के स्थान पर, जिससे उसके भाइयों के लालन-पालन में परिवार की आर्थिक मदद हो सके, वह दिन भर क्रिकेट खेलता रहता है। न ही कुछ पढ़ता-लिखता है, न कोई काम सीखता है कि कोई अच्छा सा रोजगार कर सके या कहीं नौकरी पा सके। उसकी बहन ने कालेज की पढ़ाई करने के उद्देश्य से ऐसा करके इतनी रकम जमा कर ली है कि कालेज का अपना खर्च वही उठाती है। अब वह कालेज के दूसरे वर्ष में है और अगले साल वह बी एड हो जाएगी! उसने अभी से ट्यूशन लेना शुरू कर दिया है और इस तरह अपना पढ़ाई का खर्च स्वयं उठा रही है।

यह इसी कारण संभव हुआ है क्योंकि नेहा और शिवम् हमारे स्कूल में पढ़ने आते हैं और उन्हें अपनी पढ़ाई की कोई फीस अदा नहीं करनी पड़ती-चाहे वह किताबें हों, चाहे स्कूल की वर्दी, पेन्सिल या गर्मागर्म दैनिक भोजन हो। वे दोनों स्कूल में बहुत मौज-मस्ती करते हैं और जो भी करते हैं उसे अच्छी तरह से करते हैं। अभी-अभी उनकी परीक्षाएँ हुई हैं और दोनों बच्चों ने परीक्षा में बहुत अच्छे नंबर प्राप्त किए हैं! और स्वाभाविक ही, वे रोज़ ही अपने पड़ोस के बच्चों से स्कूल में भी मिलते हैं इसलिए उनके दोस्त भी बहुत हैं!