भारतीय क्यों सोचते हैं कि बच्चों को अपने अभिभावकों से डरना चाहिए? 8 दिसंबर 2015

हमारे स्कूल के बच्चों की छमाही परीक्षाएँ शुरू हो गई हैं। वे पढ़ाई में बहुत व्यस्त हैं, उत्साहित हैं कि परीक्षा में किसी तरह उनके सारे सवाल सही हों और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब अगले दो सप्ताह बीतेंगे और परीक्षाएँ समाप्त होंगी। एक दिन अगली परीक्षा के लिए रमोना आश्रम में ही रहने वाले एक बच्चे, प्रांशु को पढ़ा रही थी कि एक पुस्तक पलटते हुए उसकी नज़र इस सवाल पर पड़ी: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?' उसे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा प्रश्न भी किसी पाठ्य पुस्तक में हो सकता है!

‘नैतिक शिक्षा’ विषय का यह प्रश्न था। अधिकतर हमें यह विषय बच्चों के लिए काफी उपयोगी और महत्वपूर्ण लगता है। यह विषय उन्हें समझ प्रदान करता है कि एक-दूसरे के साथ कैसा सुलूक किया जाना चाहिए और अपने पर्यावरण और खुद अपने आप के प्रति आपका रवैया कैसा होना चाहिए। पाठ हैं, जिनमें नम्रता सिखाई जाती है और दूसरों का आदर करने की शिक्षा दी जाती है। कुछ पाठों में काम की महत्ता दर्शाई जाती है और यह भी कि कैसे कक्षा में अपने विवादों को मिलजुलकर सुलझाना चाहिए। इस विषय की एक ही समस्या है कि पाठ्य पुस्तक और शिक्षक भी अनिवार्य रूप से पाठों पर बहुत सी मनगढ़ंत बातें भी सिखाने लगते हैं और उन बातों से मैं हमेशा सहमत हो जाऊँ यह मुमकिन नहीं हो पाता।

प्रस्तुत प्रकरण में उस पुस्तक का एक पाठ बच्चों को यह बताता है कि घर का हर सदस्य महत्वपूर्ण है। दादा-दादी इसलिए कि वे आपको अपने संस्मरण सुनाते हैं, माता-पिता इसलिए कि दोनों बाहर जाकर काम करते हैं और पैसे कमाते हैं और बच्चे भी, इसलिए कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं और बड़े-बूढ़ों की सहायता कर सकते हैं। यहाँ तक ठीक है। लेकिन उसके बाद प्रश्नावली में इस तरह के प्रश्न हैं, जिनके उत्तर बच्चों को अपनी परिस्थितियों और अनुभव के आधार पर लिखने हैं: आपके परिवार में कितने सदस्य हैं?, आपके घर में होमवर्क कौन करता है? इत्यादि।

और उसके बाद यह प्रश्न: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?'

भारत के घरों की स्थिति के बारे में जो बात मैं हमेशा से लिखता रहा हूँ, यह पाठ और यह प्रश्न उसे पूरी तरह सही ठहराता है: अर्थात, भारतीय घरों में हिंसा होती है और डर भी व्याप्त होता है! अभिभावक सोचते हैं कि उनके बच्चे तभी उनकी बात मानते हैं जब उनके मन में डर होता है। अगर उन्हें शिष्टाचार और सदाचार सिखाना है तो उन्हें डराकर रखा जाना ज़रूरी है। अगर वे नहीं डरते तो उनकी पिटाई भी होती है। और अंत में…उपरोक्त प्रश्न का आदर्श उत्तर क्या होना चाहिए? स्वाभाविक ही: पिता!

माँएँ, चाचियाँ और दादा-दादियाँ सारा दिन घर के बच्चों को इसी तरह धमकाती रहती हैं: 'आने दो तुम्हारे पिताजी को!' या, 'तुमने कहना नहीं माना तो पिताजी से शिकायत कर दूँगी!' स्वाभाविक ही इन धमकियों में शारीरिक सज़ा का पूरा इंतज़ाम होता है!

आखिर कब भारतीय पिता अपने बच्चों के साथ एक स्वस्थ संबंध विकसित कर पाएँगे? वह दिन भर घर में नहीं रहता, उसे पैसे कमाने बाहर निकलना ही पड़ता है और जब वह घर आता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दिन भर तजवीज की गई सज़ाओं को एक जल्लाद की तरह अंजाम देगा! आप बच्चों के मन में क्या भरना चाहते हैं?

एक पिता के रूप में मुझे यह बड़ा भयानक लगता है और मेरे परिवार में कोई ऐसी बात मेरी बेटी से पूछने की कल्पना भी नहीं कर सकता। हमारे यहाँ शिक्षा में डर के लिए कोई जगह नहीं है-लेकिन ज़्यादातर भारतीय परिवारों में यही स्थिति पाई जाती है और इसलिए स्कूलों में भी, किताबों में भी!

लेकिन हमारे स्कूल में हमने यह सुनिश्चित कर लिया है कि पाठ्य पुस्तकों से इस प्रश्न को हटा दिया जाए और यह भी कि शिक्षक भी जानें कि हमने ऐसा क्यों किया है: क्योंकि बच्चों को डरना नहीं बच्चों को उनके घर तथा स्कूल में सबसे सुरक्षित वातावरण प्राप्त होना चाहिए और उनके अभिभावक और शिक्षक उनसे प्रेम करते हैं और उन्हें खुश देखना चाहते हैं।

आपके हवाई जहाज़ पर एक बच्चा रो रहा है? क्या करना चाहिए और क्या नहीं? 17 नवंबर 2015

पिछले शुक्रवार को 7 घंटे की हवाई यात्रा के बाद आज मैं आपसे सिर्फ यूँ ही एक बात पूछना चाहता हूँ: क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी हवाई यात्रा में किसी रोते हुए बच्चे के आसपास बैठे हों या वह आपके साथ वाली सीट पर ही बैठा हो? सिर्फ इतना करें कि आपकी किसी हरकत से बच्चे के रोने की असुविधाजनक स्थिति में फँसे माँ-बाप पर कायम मानसिक दबाव और अधिक न बढ़े!

यह न समझें कि अपरा हल्ला मचा रही थी इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ। जी नहीं, जैसा मैंने पहले बताया, वह तो पूरे हवाई सफर में सोती रही थी! लेकिन यह सच है कि इस हवाई सफर में हमारे साथ बहुत से बच्चे थे, शायद इसलिए कि दो दिन पहले ही दीवाली के समारोह समाप्त हुए थे। बहुत कम लोग इतनी जल्दी भारत छोड़कर जा पाए होंगे और जो परिवार अब जाने लगे थे, उनके साथ, स्वाभाविक ही, बहुत से छोटे-छोटे बच्चे थे!

विमान में हमारे आसपास लगभग पाँच बच्चे थे और पीछे से भी कुछ बच्चों की आवाज़ें आ रही थी। जिन लोगों ने बहुत सारे छोटे बच्चों के साथ हवाई यात्रा की है, जानते होंगे कि उनमें से किसी न किसी एक बच्चे को प्लेन में चढ़ना ही बहुत अप्रिय लग रहा होता है। वह अपना असंतोष तेज़ और तीखे स्वर में चीखते-चिल्लाते हुए व्यक्त करता है-और उसका रोना किसी तरह सोने की कोशिश कर रहे सहयात्रियों के मनोरंजन का साधन बन जाता है।

ऐसी परिस्थिति में निश्चित ही आपको आसपास के लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सुनने को मिलेंगी: उनमें से कुछ तो जैसे कान बंद कर लेते हों या बहरे हो, विमान में पहले से व्याप्त कोलाहल में एक और स्वर के योग से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता-वे लोग अपने काम में लगे रहते हैं और बगल में हो रही चीख-चिल्लाहट से पूरी तरह अलिप्त रहे आते हैं। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि अधिकांश माँओं-बापों को ऐसे लोग सबसे अधिक भाते होंगे!

एक और तरह की प्रतिक्रिया होती है, जिसे भी सामान्यतया पसंद किया जाता है: आसपास का कोई अजनबी न जाने किस कारण से रोते हुए बच्चे का ध्यान बँटाने के लिए तरह-तरह के उपाय करता नज़र आता है। कभी-कभी यह उपाय काम कर जाता है लेकिन कई बार समस्या उससे बदतर होती है, अरुचि भयंकर होती है, प्रयास विफल ही नहीं होते, कई बार समस्या और बिगड़ जाती है। ज़्यादातर अभिभावक आपके प्रयासों पर खुश ही होंगे इसलिए एकाध बार यह प्रयास अवश्य कर सकते हैं!

कुछ व्यक्ति तीसरी श्रेणी में आते हैं और मैं विनती करना चाहता हूँ कि इस श्रेणी में आपकी गिनती कभी न हो! वे लोग जो, स्वाभाविक ही, नाराज़ होने लगते हैं। देखिए, मैं समझ सकता हूँ कि आप थके होंगे, न तो आप सो पा रहे हैं और न ही शांतिपूर्वक हवाई यात्रा में मनोरंजनार्थ उपलब्ध अपना मनपसंद कार्यक्रम ही देख पा रहे हैं। वहाँ मौजूद लोगों में कोई भी ऐसा नहीं कर पा रहा है। बहरहाल, बच्चे के अभिभावक भी नहीं कर पा रहे हैं। वे इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि उनके बच्चे का तेज़ स्वर में रोना-चिल्लाना आपको परेशान कर रहा है और वे भरसक कोशिश कर रहे हैं कि बच्चा किसी तरह बहल जाए। लेकिन उनकी ओर बार-बार ताकती आपकी गुस्साई नज़रें, जानबूझकर गहरी साँसें भरकर अपनी हताशा का प्रदर्शन या उन्हें सुनाते हुए आपका कोई कटाक्ष करना, इत्यादि समस्या में ज़रा सा भी सुधार नहीं ला सकते!

इसके विपरीत, आपकी एकमात्र उपलब्धि यह होती है कि आप बच्चे के एक अभिभावक को चिंताग्रस्त कर देते हैं और दूसरे को नाराज़ और इस प्रकार आप दोनों पर अतिरिक्त मानसिक बोझ डाल देते हैं और नतीजतन बच्चा और अधिक रोने-चिल्लाने लगता है। असल में बच्चे इस बात को ठीक-ठीक महसूस कर लेते हैं कि कब उनके माता-पिता आपा खो रहे हैं और यह उन्हें असुरक्षित कर देता है और वे घबरा जाते हैं-कुल मिलाकर नतीजा यह होता है कि आप अपने व्यवहार से बच्चे को और अधिक रोने-धोने के लिए उद्यत कर देते हैं!

तो कृपया इस बात को समझें कि बच्चा बेहद थक गया है, आसपास इतने सारे लोगों को देखकर, कर्कश आवाज़ों के कारण और अजनबी वातावरण में बुरी तरह डर गया है। हो सकता है, आम तौर पर बच्चों को हवाई यात्रा में पेश आने वाली इअर प्रेशर की समस्या का सामना हो या सम्भव है, वह यह न समझ पा रहा हो कि उसके प्यारे माता-पिता इस भयानक जगह क्यों आ गए हैं जबकि घर में गर्म और नरम बिस्तर सहित सारी सुख-सुविधाएँ हासिल थीं!

हर व्यक्ति जानता है कि एक नन्हे बच्चे के लिए यह कतई आदर्श परिस्थिति नहीं है। कोई भी अभिभावक अत्यधिक प्रसन्न और संतुष्ट होगा यदि उनका बच्चा शोरगुल और सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच ज़रा सी बंद जगह में बिना किसी नखरे के या बिना रोए-धोए यात्रा कर ले। इसलिए एक-दूसरे के साथ सौजन्यता के साथ पेश आएँ, एक दूसरे को और एक-दूसरे की परिस्थितियों को थोड़ा बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करें और संयत और शांतचित्त बने रहें। मैँ आपको विश्वास दिलाता हूँ कि बच्चा भी इस बात को समझेगा और थोड़ी देर में स्थिरचित्त हो जाएगा! फिर वह हम सब लोगों के लिए सुखद और आरामदेह विमान-यात्रा सिद्ध होगी। जमकर बैठिए, शांत रहिए, शोर को बाहर भगाइए और हर तरह के रोमांच और उत्तेजना के साथ जीवन का मज़ा लीजिए!

कुछ बच्चे पढ़ने में कमज़ोर होते हैं लेकिन मार-पिटाई से उनमें कोई परिवर्तन नहीं होगा! 24 सितंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि भारत में बहुत से लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं होते कि मार-पीट या कभी-कभार एकाध चाँटा मार देना भी बच्चे के लिए नुकसानदेह है। चाहे घर में हो या स्कूल में। मैंने बताया था कि कैसे यह पूरी तरह गलत है। शिक्षक यह नहीं समझना चाहते कि शिक्षा और स्कूल का अर्थ सिर्फ नंबर, परीक्षा और परीक्षा-परिणाम के आँकड़ों से कहीं बढ़कर है। इसका अर्थ बच्चों को ज़िम्मेदार नागरिक बनाना है जिससे वे आगे चलकर समाज, देश और संसार का बहुमूल्य हिस्सा बन सकें। और भय के वातावरण में आप यह काम नहीं कर सकते!

सभी जानते हैं कि हम सब एक जैसे नहीं हैं। हम सभी अलग-अलग जींस लेकर पैदा हुए हैं और हर एक की अलग-अलग प्रतिभा और अलग-अलग क्षमता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ व्यक्तियों के पास बिना किसी समस्या के झटपट सीखने-समझने का और किसी भी जानकारी या किसी भी बताई गई बात को ग्रहण करने और उसे अच्छी तरह याद रखने का जन्मजात गुण होता है। लेकिन बहुत से दूसरे लोग होते हैं, जिनके पास यह गुण विद्यमान नहीं होता और उन्हें चीजों को ग्रहण करने के लिए दृश्यात्मक चित्रण की ज़रूरत पड़ती है, याद रखने के लिए बार-बार दोहराने की या किसी संदर्भ से उन्हें जोड़ने की जरूरत पड़ती है।

उन्हें डरा-धमकाकर आप उनकी कोई मदद नहीं कर रहे होते। कक्षा के तीस से पचास बच्चों को एक छड़ी से नहीं हाँक सकते, जो बच्चा आपके सिखाए शब्दों को क्रमानुसार दोहरा नहीं पा रहा है, उसे मार-पीट कर आप ठीक-ठीक दोहराने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इसके विपरीत आप उन्हें भयभीत, बेचैन और अधीर कर देते हैं, जिसके कारण कुछ सीखने के स्थान पर उनके मन में नकारात्मक परिणामों का विचार घर कर लेता है। जिसे सीखने की वाकई उन्होंने कोशिश की थी, उसे सीख न पाने के कारण आप उन्हें पीड़ा पहुँचा रहे हैं।

यह बच्चे का दोष नहीं है कि वह सीख नहीं पाया! ऐसा नहीं है कि वह जानबूझकर याद नहीं करना चाहता। और यह कोई अपराध नहीं है कि उसे सीखने में दिक्कत पेश आ रही है- लेकिन बच्चे को मारना-पीटना अपराध है! क्या आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि आप उसे सिखाने में असमर्थ रहे हैं। आप अपना कर्तव्य ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे हैं? कक्षा के सभी बच्चों को पढ़ाना आपका काम है और आप सिर्फ पिटाई करके बच्चों के दिमाग में जानकारियाँ ठूँसना चाहते हैं जबकि उनमें से कुछ बच्चे उन जानकारियों को दूसरों के मुक़ाबले तुरत-फुरत ग्रहण कर पाने में असमर्थ हैं।

इससे ज़्यादा से ज़्यादा आप यह कर पाएँगे कि बच्चों को तोते की तरह कोई बात रटा देंगे लेकिन उन शब्दों का वास्तविक अर्थ वे ग्रहण नहीं कर पाएँगे। बच्चे उन्हें बहुत जल्दी भूल जाएँगे क्योंकि आपने उन्हें सिर्फ उथली जानकारी दी है, उसके मर्म को समझाने की गंभीर कोशिश नहीं की है, उस बात का महत्व नहीं बताया है। आप ज़ोर-जबरदस्ती करके उन्हें सिखा रहे हैं लेकिन वे सीखने के आनंद से वंचित हो रहे हैं। आपकी हिंसा उनके अंदर भी हिंसा का संचार कर रही है, उन्हें इतना आक्रामक बना रही है कि या तो वे खुद को नुकसान पहुँचा लेंगे या फिर दूसरों को नुकसान पहुँचाएँगे।

परीक्षा में पाठों को दोहरा दें, इस उद्देश्य से स्कूल में पढ़ाने से अधिक ज़रूरी है यह सिखाना कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, किस तरह दूसरों के साथ शांतिपूर्ण वार्तालाप करना चाहिए, किस तरह मिल-जुलकर विवादों का समाधान ढूँढ़ना चाहिए, किस तरह अपनी भावनाओं को और अपने अभिमत को व्यक्त करना चाहिए और किस तरह दूसरों के विचारों का भी सम्मान करना चाहिए। बच्चों को बेहतर इंसान बनाना स्कूलों और शिक्षकों का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।

हर चाँटा आपके बच्चे को थोड़ा सा और तोड़ देता है! 23 सितंबर 2015

कल मैंने बताया था कि बहुत से शिक्षकों के लिए किस तरह बिना शारीरिक सज़ा दिए बच्चों को पढ़ाना कल्पनातीत है। यहाँ तक कि बच्चों के प्रति वृंदावन के एक स्कूल में जारी हिंसा का खुलासा करते हुए हमारे वीडियो की प्रतिक्रिया में भी कई लोगों ने कहा कि अगर बच्चों को छड़ी और डंडे से अकारण मारना-पीटना सज़ा की अति है तो भी एक सीमा तक बच्चों के प्रति हिंसा बच्चों के लालन-पालन के लिहाज से न सिर्फ अच्छी है बल्कि काफी हद तक ज़रूरी भी है। दरअसल बच्चों के प्रति हिंसा का यह विचार भारतीय समाज में गहरे जड़ जमाए हुए है- लेकिन है यह पूरी तरह गलत विचार!

जी हाँ, अगर किसी स्कूल में को बच्चों लात-घूसों से मारा-पीटा जाता है, अगर उन्हें अकारण शारीरिक दंड दिया जाता है तब तो लोग कहते हैं कि गलत हो रहा है मगर जब बच्चा हल्ला कर रहा है और शिक्षक या शिक्षिका उसे एक चाँटा जड़ देती है तो लोग कहेंगे, इतना तो होना ही चाहिए। हमारा वीडियो उनके लिए कुछ अधिक उग्र था लेकिन इससे भी खराब वीडिओज़ हर साल कई बार समाचारों में आते रहते हैं, जिनमें दहला देने वाले पिटाई के दृश्य होते हैं। यहाँ तक कि ऐसी खबरें भी अक्सर आती हैं, जहाँ बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए और कुछ प्रकरणों में उनकी मृत्यु भी हो गई है। इसलिए यह कोई बड़ा मामला नहीं है- अगर शिक्षक के पास छड़ी नहीं होती, अगर वह सिर्फ हाथ से ही मार लेता तो शायद यह खबर नहीं बनती, इसका वीडियो इस तरह वाइरल नहीं होता। क्यों? क्योंकि लोग इसके आदी हो चुके हैं और वास्तव में समझते हैं कि यह अनुचित नहीं है।

क्योंकि यही वे अपने बच्चों के साथ भी करते हैं! और इसलिए चाँटा मारने को उचित सिद्ध करने का, हिंसा को सही ठहराने का वे कोई न कोई तरीका ढूँढ़ ही निकालते हैं।

जी हाँ, गाल पर एक चाँटा या, जैसा कि बहुत से अभिभावक स्वयं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ करते हैं, चूतड़ पर मारना भी हिंसा में ही शामिल है। मैं भारतीय अभिभावकों और शिक्षकों, और इस दुनिया में रहने वाले हर उस व्यक्ति से, जो समझता है कि इतनी हिंसा बच्चों के उचित लालन-पालन के लिए ज़रूरी है, उनकी शिक्षा के लिए ज़रूरी है, अपील करता हूँ कि आप जो कर रहे हैं वह आपके बच्चों और विद्यार्थियों के लिए नुकसानदेह है!

अपने आसपास रहने वाले व्यक्तियों के लिए आप एक उदाहरण हैं, विशेष रूप से किशोर और युवकों के लिए, जो आपको देखकर, आपके व्यवहार से प्रेरणा लेकर सीखते हैं कि उन्हें ऐसी परिस्थिति में कैसा व्यवहार करना है! इसका अर्थ है, आप भी उन्हें हिंसा की शिक्षा दे रहे हैं। आप उन्हें सिखा रहे हैं कि आपको यानी उम्र में उनसे बड़े और शक्तिशाली लोगों को छोटे और कमजोर लोगों को मारने का अधिकार हासिल है। जो सबसे शक्तिशाली होगा वह दूसरों की पिटाई कर सकता है।

ऐसी स्थिति में, कोई शक नहीं कि आपका बच्चा भी अपने छोटे भाई-बहनों को मारेगा-पीटेगा। कक्षा के बड़े बच्चे अपने से छोटे और कमजोर बच्चों पर हाथ उठाएँगे। क्योंकि यही आपने उन्हें शुरू से सिखाया है! इसका अर्थ यह हुआ कि जब वे आपसे बड़े और शक्तिशाली हो जाएँगे तो वे आपको भी मार सकते हैं! क्या आप यही कहना चाहते हैं?

कुछ लोग हमसे पूछते हैं, ‘लेकिन अगर दो बच्चे लड़ रहे हों तो उन्हें अलग करने के लिए आपको उन्हें पीटना ही होगा!’ इससे अधिक अर्थहीन बात कुछ नहीं हो सकती! मार-पीट करने वाले बच्चों को आप मार-पीट करके ही समझाना चाहते हैं कि मार-पीट करना उचित नहीं है! आप उसे मारते हैं, जो खुद मार रहा है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है मार-पीट करने वाला बदल गया है- अब आप मारने वाले बन गए हैं- और आपको मारने वाला कौन है?

और विडंबना यह कि आप सोचते हैं कि आप यह इसलिए कर रहे हैं कि यह उनके लिए अच्छा है। ठीक? लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि यह मार-पीट आपके बच्चे को नुकसान ही पहुँचाती है। जी हाँ, अगर आप मुझ पर और मेरे तर्कों पर विश्वास न करना चाहें और अपनी हिंसा जारी रखना चाहें तो कम से कम उन वैज्ञानिकों पर भरोसा करें, जिन्होंने यह तथ्य दुनिया के सामने रख दिया है। ऐसे बच्चों का विकास बाधित हुआ और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है: एक बच्चा आप पर विश्वास करता है, मार्गदर्शन के लिए आपकी तरफ देखता है। आपका हर चाँटा बच्चे को थोड़ा सा और तोड़ देता है और आपके आपसी संबंध को भी नुकसान पहुँचाता है। जी हाँ, यह सिद्ध हो चुका है।

यह समझिए कि यह गलत है और बच्चों के प्रति अपने व्यवहार में बदलाव लाइए!

भारतीय स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली क्रूरतापूर्वक शारीरिक प्रताड़ना का वीडियो सहित पर्दाफाश – 18 सितंबर 2015

आप पवन को जानते होंगे- या तो आप कभी आश्रम आए होंगे या मेरे ब्लोगों को नियमित पढ़ते होंगे और आपको पता चला होगा कि वह यहाँ, आश्रम में पिछले छह साल से रह रहा है। हम उसे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं और इसलिए जब हमें पता चला कि उसके नए स्कूल में उसके साथ क्या हो रहा है तो हमें उतनी ही तकलीफ हुई, जितनी किसी भी दूसरे, सगे माता-पिता को होती।

इस साल जून में, जब गर्मी की छुट्टियाँ समाप्त हुईं तो पवन बड़ा उत्साहित था: जुलाई की शुरुआत से उसके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत होने वाली थी। जब से वह आश्रम आया है, स्वामी बालेंदु ई व्ही प्राथमिक शाला में पढ़ता रहा है लेकिन इस साल नए सत्र की शुरुआत से वह वृंदावन के इंडियन पब्लिक स्कूल नामक एक दूसरे स्कूल में पढ़ने जाने वाला था। रोज़ वहाँ जाने के लिए हमने उसके लिए साइकल खरीदी थी, उसकी प्रवेश फीस भरी थी, उसकी वर्दियाँ और किताब-कापियाँ खरीदी थीं।

यह सब अत्यंत रोमांचक था लेकिन उसे वहाँ भर्ती कराते वक़्त ही हमने प्रधानाध्यापक से पूछा था कि क्या उनके यहाँ शिक्षक बच्चों को मारते-पीटते हैं, क्या उनके यहाँ बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और उनकी तरफ से यह पक्का आश्वासन ले लिया था कि ऐसा नहीं होगा। आप सभी जानते हैं कि हमारे स्कूल खोलने का प्रमुख कारण ही यह था: हम सुनिश्चित करना चाहते थे कि हमारे स्कूल में आकर बच्चे पिटाई को लेकर निश्चिंत हो सकें। ज़्यादा से ज़्यादा मुफ्त स्कूल खोलने और उन्हें अपने रेस्तराँ से जोड़ने के इरादे के पीछे भी यही कारण था कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चे पिटाई के डर से मुक्त होकर वहाँ मुफ्त शिक्षा प्राप्त कर सकें! अहिंसा और प्रेममय वातावरण बच्चों को उपलब्ध कराना हमारे स्कूल के प्रमुख मूल्य रहे हैं! उस स्कूल ने भी हमें आश्वस्त किया था कि वहाँ बच्चों के साथ किसी तरह की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। इस वचनबद्धता के पश्चात ही हमने अपने बच्चे को वहाँ भर्ती कराया था।

हम सोच भी नहीं सकते थे कि वे लोग ज़बान देकर किस हद तक अपने शब्दों के विरुध्द आचरण कर सकते हैं!

अगर आप कभी पवन से मिले हों तो जानते होंगे कि स्वभाव से ही वह बहुत शांत बालक है। उस नए स्कूल में कुछ हफ्ते गुज़ारने के बाद से ही हमने नोटिस किया कि उसके व्यवहार में कुछ तब्दीली आ रही है। हमने सीधे उसी से पूछा: ‘क्या हो गया है तुम्हें? स्कूल में कुछ हुआ है?’ और तब हमें सारी कहानी पता चली।

वहाँ जाना शुरू करने के पहले हफ्ते से ही उसने देखा कि शिक्षक उसके सहपाठियों की पिटाई कर रहे हैं। हाथ पर छड़ियाँ, और कभी-कभी पैरों पर, पीठ पर और जहाँ शिक्षक का हाथ पहुँच सकता हो, वहाँ पर! उसे भी पहले भी मार पड़ चुकी थी और उस दिन भी पड़ी थी। उसने अपने हाथ दिखाए- मार खाकर लाल-गुलाबी हो रहे थे और उनमें इतना दर्द हो रहा था कि ठीक होने में दो दिन लगे।

वहाँ की जो कहानियाँ उसने बताईं, उन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं: हर शिक्षक के पास एक छड़ी है और जब भी वे पाते हैं कि किसी बच्चे ने होमवर्क नहीं किया है या कोई गलती की है तो किसी बच्चे से वह छड़ी मँगवाते हैं। उसके बाद गलती करने वाले बच्चे को अपना हाथ शिक्षक के सामने खोलकर रखना होता है। सामान्यतया छड़ी हाथ पर पड़ती है मगर यदि शिक्षक कुछ ज़्यादा ही गुस्से में हुआ तो वह कहीं भी उसकी बरसात कर सकता है। अक्सर इस हिंसा का कोई विशेष कारण भी नहीं होता।

हमने पूछा कि क्या उसने प्रधानाध्यापिका से शिकायत की तो हमें और भी बहुत कुछ जानने को मिला: प्रधानाध्यापिका खुद स्कूल का चक्कर लगाती है और मौका मिलते ही, खुद भी बच्चों की पिटाई करती है! ऐसी प्रधानाध्यापिका से शिकायत करने की हिम्मत कौन करेगा? हमें बहुत दुःख हुआ और हम क्रोध से भर उठे! हमारे दिल को ठेस लगी थी कि जिस बच्चे को हमने अपने स्कूल में इतने साल मार-पीट से दूर रखा, जिसे स्कूली पिटाई को कोई अनुभव नहीं है, उसे इस प्रताड़ना से गुज़रना पड़ रहा है! मुझे अपने स्कूली दिनों की याद हो आई और उस समय बच्चों के साथ होने वाली हिंसा पर अपनी खीझ, गुस्से और हताशा की भी

हमें क्या करना चाहिए?

यह सोचकर कि बच्चे को वहाँ से निकालकर किसी दूसरे स्कूल में भर्ती करवा देते हैं, हमने कुछ दूसरे स्कूलों के विषय में विस्तृत जानकारियाँ प्राप्त करने की कोशिश की। समस्या यह थी कि वैसे भी बच्चों के प्रति शारीरिक हिंसा के मसले पर सभी स्कूल साफ़ झूठ बोल देते हैं और ऐसी स्थिति में हम कैसे विश्वास करते कि किसी अन्य स्कूल में भी ऐसा ही नहीं होगा? जिनके बच्चे स्कूलों में पढ़ते थे, उनके अभिभावक मित्रों से पता किया और वही बात सामने आई जिसका हमें शक था- हमें पता चला कि कमोबेश सभी स्कूलों में बच्चों का शारीरिक दंड दिया जाता है!

एक और विकल्प था: घर में पढ़ाना। हमने सोचा यह हमारे लिए एक और विकल्प हो सकता है- लेकिन उससे उस स्कूल के बच्चों को क्या लाभ मिलेगा जिन्हें रोज़ ब रोज़ शिक्षकों की पिटाई बर्दाश्त करनी पड़ती है, चाहे वह किसी भी विषय की पढ़ाई हो, कोई भी शिक्षक हो! इस प्रकरण के बाद क्या हमारे लिए इतना पर्याप्त होगा कि सिर्फ अपने आश्रम के बच्चों को हम पहले अपने स्कूल में पढ़ायें और फिर आगे की पढाई भी उन्हें आश्रम में ही रख कर कराई जाये?

पवन के साथ बात करके हमने कोई ठोस कार्यवाही करने का निर्णय किया, जिससे इस स्थिति में बदलाव लाया जा सके। हमने एक गुप्त कैमरा खरीदकर पवन को दिया, जिसे वह अगले सात या दस दिन तक स्कूल ले जाता रहा। जो वीडियो क्लिप्स वह लेकर आया है, वे उसकी बताई कहानियों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं। आप उन्हें नीचे देख सकते हैं और आप भी अगर हम जैसे संवेदनशील हुए तो हमारी भाँति द्रवित हुए बगैर नहीं रह पाएँगे!

उनकी कक्षाध्यापिका एक दिन कक्षा में आई और पूरी कक्षा को एक सिरे से मारना शुरू कर दिया, सिर्फ इसलिए कि कुछ दूसरे शिक्षकों ने कक्षा के बारे में उससे शिकायत की थी! हर किसी को डंडे से मारा गया, सबकी पिटाई हुई। कुछ बच्चे उसी समय कक्षा में आए थे, उनकी भी पिटाई हुई और उन्हें समझ में तक नहीं आया कि उन्हें क्यों मारा-पीटा जा रहा है! एक लड़के को उसने कुछ लाने के लिए भेजा था, जब वह वापस आया तो उसे भी नहीं छोड़ा गया! और अंत में उसने बच्चों को धमकाया भी, कि एक हफ्ते तक वह इन सज़ाओं को रोज़ दोहराएगी, जिससे वे कुछ सीख ले सकें और अगर वे उससे भी नहीं सीख पाए तो उसके बाद दिन भर के लिए उन्हें 'मुर्गा' बनने की सजा देगी!

वीडियो क्लिप्स अलग-अलग शिक्षिकाओं द्वारा, अकारण या छोटी-मोटी गलतियों पर लड़के और लड़कियों, दोनों की क्रूर मार-पीट, यहाँ तक कि कभी-कभी शिक्षिकाओं को बच्चों के सिर पर चोट करते हुए भी दिखाती हैं। साथ ही उन्हें बुरी तरह अपमानित भी किया जाता है। एक क्लिप में आप एक शिक्षिका को यह कहते हुए सुन सकते हैं, ये गाँव वाली हेकड़ी, गाँव में ही छोड़कर आना तुम, और इतने बेशर्म हो कि इतनी पिटाई के बाद कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आदत पड़ी हुई है रोज रोज पिटते आ रहे हो ठुकते आ रहे हो! लात-घूँसे खाकर भी तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा!

हमें पवन पर गर्व है कि पकड़े जाने और पीटे जाने का खतरा होने के बावजूद भी उसने बाल उत्पीड़न के ये प्रमाण हमें उपलब्ध कराए। अगर उन्हें पवन के पास कैमरा मिल जाता तो वे उसके साथ न जाने क्या करते?

जब हमें कुछ वीडियो क्लिप्स मिल गईं तो हमने उनके आधार पर तुरंत कार्यवाही करने का निर्णय लिया। मैंने उत्तर प्रदेश की बाल-आयोग की अध्यक्ष, श्रीमती जूही सिंह से काफी देर बातचीत की और उन्हें सारी घटनाओं का ब्योरा दिया।

मुझे उनसे समुचित कार्यवाही का आश्वासन प्राप्त हुआ है।

अगले दिन हम उस स्कूल की प्रधानाध्यापिका से मिले। शुरू में तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया मगर जब हमारा संबल पाकर पवन ने ज़ोर देकर वही बात कही तो उसने अपनी दो शिक्षिकाओं को बुलवाया। और उन्होंने वे सारे तथ्य क़ुबूल किए, जिन्हें हमने इन वीडियो क्लिप्स में देखा था। कक्षाध्यापिका ने क़ुबूल किया कि उसने कक्षा के सारे बच्चों की पिटाई की थी क्योंकि उसे यह पता नहीं चल पा रहा था कि कौन बदमाशी या शैतानी कर रहा है। तो आपको दोषी का पता नहीं चला इसलिए आप सभी निर्दोषों को सज़ा देंगी? आप वहाँ की हालत समझ सकते हैं, जहाँ शिक्षिकाएँ खुले आम, बिना किसी पश्चाताप या अपराधबोध के सब कुछ स्वीकार करने की ढिठाई कर सकती हैं! जब प्रधानाध्यापिका उनसे कहने लगी कि शैतानी करने वाले बच्चे को उनके पास भेजना चाहिए था, तो हमने प्रतिवाद किया कि वे स्वयं भी बच्चों के साथ मार-पीट करती हैं! इस सच्चाई के सामने कुछ कहना उनके लिए असंभव था।

हमने साफ़ कहा कि बच्चों को शारीरिक दंड देना कानूनन अपराध है और इसके लिए आपको जेल की सज़ा भी हो सकती है! हमने उन्हें सी बी एस ई (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल) द्वारा जारी 'शारीरिक दंड की रोकथाम हेतु दिशानिर्देशों' की पुस्तिका दी क्योंकि वह स्कूल भी सी बी एस ई से ही सम्बद्ध है!

उत्तर? 'जी हाँ, लेकिन नियम तो बहुत सारे हैं- अगर हम उन सभी नियमों का पालन करते रहे तो और कुछ नहीं कर पाएँगे!' प्रधानाध्यापिका अपने आपराधिक कामों को उसी तरह जायज़ ठहरा रही थी जैसा हमारे स्कूल की पूर्व-शिक्षिकाएँ किया करती थीं और जिन्हें हमने सिर्फ एक बार बच्चे पर हाथ उठाने पर निकाल बाहर किया था: 'आप क्या करेंगे जब बच्चा पूरी तरह हाथ से निकल जाए? 'प्रधानाध्यापिका, जिसकी छड़ी उसके पास ही रखी हुई थी, तर्क करती ही चली जा रही थी, 'चलिए माना कि छड़ी से पिटाई करना गलत है लेकिन बच्चों को काबू में रखने के लिए आपको 'कुछ न कुछ' तो करना ही पड़ेगा!'

यह वादा करते हुए कि भविष्य में बच्चों की पिटाई बंद कर दी जाएगी वे हमें इस बात पर सहमत करने की पूरी कोशिश करते रहे कि हम पवन को उनके स्कूल में भेजना जारी रखें। लेकिन मामला सिर्फ उसका नहीं था, दूसरे सभी बच्चों का था! जब हमने उनसे यह लिखकर देने के लिए कहा कि भविष्य में किसी बच्चे पर हाथ नहीं उठाया जाएगा तो वह इसके लिए राज़ी नहीं हुई।

प्रधानाध्यापिका ने हमें स्कूल के संचालक के पास भेज दिया, जो उसका पति ही था और प्रधानाध्यापिका के साथ उस स्कूल का मालिक था। यह मुलाक़ात बहुत छोटी सी थी क्योंकि वह बहुत रूखा और अशिष्ट था। उसने हमसे बैठने तक के लिए नहीं कहा और हर बात से इंकार करता रहा। अंत में उसने कहा, 'जाइए, जो बन पड़े कर लीजिए!' स्वाभाविक ही, उसे पता नहीं था कि हमारे पास उनके अपराधों का पक्का प्रमाण भी मौजूद है। हम चुपचाप चले आए। उसके साथ आगे बात करना ही व्यर्थ था।

जब हम आश्रम वापस आए, हमें अपने एक भूतपूर्व पड़ोसी का फोन मिला, जिन्हें वे लोग भी जानते हैं। उसने कहा, 'आप इनसे पंगा क्यों लेते हो? जानते हैं, इस डायरेक्टर का भाई एक बार एक व्यक्ति के सिर पर पिस्तौल तानकर खड़ा हो गया था?' यह प्रकारांतर से हमारे पास भेजी गई धमकी थी। हमने जवाब दिया कि वह हम सबको गोली मार सकता है लेकिन हम वही करेंगे जो हमारा दिल चाहता है और जो किया जाना चाहिए।

हमारा अगला कदम मीडिया से सम्पर्क करना था। उन्होंने उनके इंटरव्यू लिए और हमने वीडियो क्लिप्स उन्हें थमा दी। हमने एक वीडियो तैयार किया है और वे अपने कार्यक्रम में उसे दिखाकर इस अपराध को जनता के सामने रखेंगे।

हमारे लिए यह सिर्फ इन शिक्षिकाओं, इस प्रधानाध्यापिका या इस स्कूल की बात नहीं है। मामला समाज और देश के बच्चों से संबंधित है! लोग सोचते हैं कि बच्चे कुछ सीख सकें, इसके लिए हिंसा ज़रूरी है! बच्चे कुछ कहते हुए घबराते हैं, अभिभावक शिकायत करते हुए डरते हैं। अभिभावक समझते हैं, उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, बच्चे को उस स्कूल से निकाल लें तो उसकी पढ़ाई का एक साल बरबाद होगा।

हिंसा या भय का वातावरण सीखने में कोई मदद नहीं करता। विपरीत इसके, वह उन्हें नुकसान पहुँचाता है, स्वस्थ तरीके से विकसित होने में रुकावट बनता है! सकारात्मक और स्नेहिल वातावरण में बच्चे उससे कहीं अधिक सीख पाते हैं और उनका समग्र विकास संभव होता है!

मैं उन बच्चों की मदद करना चाहता हूँ जो स्कूलों में मार खाते हैं। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यह गैरकानूनी है, कि इसकी शिकायत कहाँ और कैसे की जाए- और यदि आप ऐसा करते हैं तो आपका नाम गुप्त रखा जाएगा!

प्रिय अभिभावकों, विश्वास कीजिए, यह आपके बच्चे के लिए हानिकारक है। जब भी आपको पता चले कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हो रहा है तो चुप न बैठें! प्रतिरोध में आवाज़ बुलंद करें, शिक्षकों से, स्कूल प्रबंधन से, दूसरे अभिभावकों से मिलकर चर्चा करें। इन घटनाओं को जनता के सामने लेकर आएँ, इस प्रताड़ना का सक्रिय प्रतिरोध करें!

प्यारे बच्चों, अपनी बात कहने से कभी न घबराएँ! आपके साथ जो हो रहा है अपने अभिभावकों को अवश्य बताएँ, खुद भी सक्रिय हों, जो कुछ आपके साथ हो रहा है, उसकी सूचना अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

मैं भी आपकी मदद के लिए यहाँ मौजूद हूँ। जब भी ज़रूरत हो, मुझसे संपर्क करें। मैं आपके समर्थन में खड़ा रहूँगा और हर संभव मदद करने का प्रयास करूँगा।

बच्चों की खातिर हमें इस देश में और समाज में परिवर्तन का सूत्रपात करना है।

बात करने के लिए कभी-कभी आपको किसी दूरस्थ मित्र की ज़रूरत पड़ती है – 8 सितंबर 2015

हाल ही में मैं अपने एक मित्र से बात कर रहा था। वह आस्ट्रिया में रहता है और उससे मेरी मुलाक़ात छह साल पहले अपने आस्ट्रिया दौरे के समय हुई थी। इस बीच हम लोग कभी-कभार बात करके एक-दूसरे के हालचाल ले लिया लिया करते थे, एक दूसरे की गतिविधियों के बारे में पूछ-ताछ कर लेते थे। पिछले हफ्ते उसका फोन आया, सिर्फ मौसम का हाल जानने के लिए नहीं बल्कि एक मित्र के रूप में, मुझसे मदद चाहता था।

हर व्यक्ति जानता है कि मित्र होते ही इसलिए हैं कि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद ली जा सके। लेकिन ऐसे मौके भी आते हैं, जब आप अपनी कुछ बातें अपने करीबी मित्रों को नहीं बता सकते, आप कुछ बातें उनके साथ साझा करने में संकोच करते हैं। ऐसे वक़्त, आपका कोई ऐसा दूर रहने वाला मित्र हो, जो सारी परिस्थिति को कुछ दूर से देख-समझ सके, तो अच्छा होता है। मेरे आस्ट्रियाई मित्र के साथ कुछ ऐसा ही था।

जब पहले-पहल मेरा उससे परिचय हुआ था, तब, हाल ही में अपनी पत्नी और दो छोटे-छोटे बेटों के साथ वह अपने नए घर में रहने आया था। नई जगह में नए जीवन की शुरुआत करते हुए वे बहुत उल्लसित थे। उनका बड़ा बेटा उसी साल स्कूल जाना शुरू करने वाला था और सब कुछ बढ़िया चल रहा था।

फोन पर उसने मुझे बताया कि परिस्थितियों में बहुत सारी तब्दीलियाँ आ चुकी हैं। उसे पता चला है कि सालों से उसकी पत्नी उसके साथ छल कर रही थी और उनके साझा दोस्त के साथ उसके संबंध थे। इसलिए वह उससे अलग होकर तलाक लेना चाहता था। उसका दिल टूट चुका था और वह यह निर्णय ले भी चुका था: अर्थात, वह उसे भूल भी नहीं पा रहा था और उससे संबंध भी तोड़ना चाहता था।

यह समझने के लिए कि वह अपने स्थानीय मित्रों से इस बारे में बात क्यों नहीं कर सकता था, आपको दो और बातें जाननी आवश्यक हैं। मेरा दोस्त बहुत छोटे से गाँव में रहता था, जहाँ हर कोई अक्षरशः एक-दूसरे को जानता है। संबंध टूटने या संबंध में तनाव होने जैसी कोई भी खबर वहाँ छिपी नहीं रह सकती थी- बाज़ार-मुहल्लों में इसकी चर्चा होनी शुरू हो जाती और तुरंत हर कोई इसे जान सकता था।

दूसरा कारण यह था कि उसकी पत्नी कुछ समय से शराब की आदी हो चुकी थी। मेरे मित्र ने पत्नी की मदद की लेकिन इस बात का भी भरसक प्रयास किया कि गाँव में यह बात न फैले। वह अपनी पत्नी को, परिवार की प्रतिष्ठा को और बच्चों को इन सब परेशानियों से दूर रखना चाहता था और उन्हें बदनामी से बचाना चाहता था।

और अभी भी वह यही कर रहा था। वह अपना सिरदर्द अपने दोस्तों के साथ साझा नहीं करना चाहता था-वह अपनी वैवाहिक समस्याओं के बारे में उनसे कहना नहीं चाहता था सिर्फ इसलिए कि सारा गाँव तुरंत इस बात को जान जाएगा। दूसरी समस्या यह थी कि पत्नी की शराब की लत की वजह से वह अपने बेटों को उसके पास छोडना नहीं चाहता था! बिना पत्नी को तकलीफ पहुँचाए यह बात भी वह किसी से नहीं कह सकता था- कम से कम वह ऐसा समझता था! क्योंकि, हर कोई वह बात जान जाएगा, जिसे वह इतने समय से छिपाने की कोशिश कर रहा था!

तो इस तरह उसने मुझे यह पूछने के लिए फोन किया था कि क्या किया जाए।

सबसे पहले तो मैंने उससे कहा कि उसके और शीघ्र ही भूतपूर्व हो जाने वाली पत्नी के विषय में लोग क्या सोचेंगे, उसे इस बात की चिंता छोड़ देनी चाहिए! उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उसके दिल में मची हलचल, उसकी भावनाएँ और उसके बच्चे अधिक महत्वपूर्ण हैं! इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे क्या सोचते हैं और दूसरे क्या कहेंगे- उसके बच्चों को सुरक्षित होना चाहिए! उसे चिंता न करने की सलाह देने के अलावा मैंने उससे कहा कि किसी अच्छे वकील से मिलकर उससे सारी बातों की चर्चा करे।

फिर अपने दोस्त से मिले और बात करे। आपको चाहिए कि अपने अंदर की बात किसी न किसी को अवश्य बताएँ! उसकी पत्नी को शराब की लत के संबंध में मदद की ज़रूरत है और यह बात छिपाकर कोई लाभ नहीं है, उससे यह लत छूटने वाली नहीं है। उसे दबाने की कोशिश करके वह उसकी कोई मदद नहीं कर रहा होगा-और अंत में मैंने उससे कहा कि अब तुम्हारे बेटों को तुम्हारी ज़रूरत है!

मैंने उसे उससे कहा कि कैसे गाँव छोड़कर किसी दूसरे शहर में रहना भी एक विकल्प हो सकता है, फिर से एक नया जीवन शुरू करना- लोगों की बेकार चर्चाओं से, अफवाहों, कानाफूसियों से दूर किसी शांत जगह में। इस बीच एक दिन सब ठंडा पड़ जाएगा और सिर्फ वही, जो उसके सच्चे मित्र हैं, उसके साथ खड़े रहेंगे!

वह खुश हुआ, मुख्य रूप से इसलिए कि वह किसी से अपनी बात साझा कर सका। और मैं खुश हूँ कि मेरे ऐसे मित्र भी हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर मुझे, इतनी दूरी के बावजूद, याद कर लेते हैं!

अपने बच्चों के सामने दूसरे बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करें – 18 अगस्त 2015

हमारे यहाँ, आश्रम में हमेशा बच्चे मौजूद होते हैं और स्वाभाविक ही पिछले साढ़े तीन साल से उनके बीच हमारी बेटी भी है। वह अब भी उन बच्चों में सबसे छोटी है और जब कि वह हमारे लिए हमेशा कुछ ख़ास रहेगी, हम उसे एक बात सिखाने की भरसक कोशिश करते हैं: हम सब बराबर है। तुम और दूसरे सभी बच्चे एक जैसे हैं। मुझे लगता है, बहुत से अभिभावक अपने बच्चों के मन यह संदेश बिठाने के लिए परिश्रम करते होंगे और इसीलिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ।

हमारे स्कूल का एक बुनियादी उसूल है, मेरे जीवन का भी यह बुनियादी उसूल है और अपनी बेटी को भी मैं यही बात सिखाना चाहता हूँ: हम सब बराबर हैं। कोई भी आपसे ऊपर नहीं है, दूसरे जो भी काम कर सकते हैं, आप भी कर सकते हैं। लेकिन साथ ही, कोई भी आपसे छोटा नहीं है।

निश्चित ही आपका बच्चा आपके लिए हमेशा ख़ास होगा। आप सोचेंगे कि वह अधिक बुद्धिमान, अधिक सुन्दर है, हर चीज़ में दूसरे बच्चों से बढ़-चढ़कर है। यहाँ तक सब कुछ ठीक है, आप इस एहसास में खुश रहें, आनंदित हों और जब भी वह कुछ अच्छा करे, उसकी तारीफ़ करें।

लेकिन उसे यथार्थ की सीमा में रखें: बच्चे सभी एक जैसे होते हैं। कुछ बच्चे किसी क्षेत्र में प्रतिभाशाली होते हैं तो दूसरे किसी दूसरे क्षेत्र में। हम ही होते हैं जो उन्हें एक काम में या किसी और काम में प्रशिक्षित करते हैं और संभवतः उसमें उसे आगे और विकसित करने में अपना योगदान देते हैं!

लेकिन साथ ही हम ही होते हैं जो उन्हें इस बात की शिक्षा देते हैं कि एक-दूसरे के साथ परस्पर समान व्यवहार किया जाना चाहिए। हमें इसका उदाहरण बनना चाहिए। न सिर्फ दूसरे वयस्कों के साथ समान व्यवहार करके और यह दर्शा के कि हमें अपने साथ बराबरी का व्यवहार पसंद है, बल्कि दूसरे बच्चों के साथ वैसा ही व्यवहार करके, जैसा हम अपने बच्चे के साथ करते हैं।

आप नहीं चाहेंगे कि आपका बच्चा दूसरों को नीची नज़र से देखे। तो फिर आप भी वैसा ही करें और उसके सामने अपना उदाहरण प्रस्तुत करें।

मेरी बेटी मेरे लिए सदा कुछ ख़ास रहेगी और निश्चित ही मेरे पूरे परिवार के लिए भी। वह हमारे लिए राजकुमारी है- लेकिन हमारे साथ और भी दूसरे बच्चे रहते हैं। वे सभी एक से नियम सीख रहे हैं और जब भी हमारी बेटी उन नियमों से विचलित होती है तो उसे भी तुरंत आगाह किया जाता है।

स्वाभाविक ही वह हमारी थाली में खाएगी, हमारे साथ सोएगी। वह हमारे लिए खास होगी लेकिन मैं उसे सिखाना चाहता हूँ कि जब कि वह अपने आसपास के लोगों के लिए कुछ खास है, उसके आसपास मौजूद हर व्यक्ति भी कुछ और लोगों के लिए खास है। और जितने ज़्यादा खास लोग तुम्हारे आसपास मौजूद होंगे उतना ही खुश तुम रहोगी।

हम सब बराबर हैं, हम सब खास हैं!

और अब हम पवन के भाई, गुड्डू का जन्मदिन मनाने जा रहे हैं, जो अब हमारे साथ ही रह रहा है। वह उसका खास दिन होगा- हम सुनिश्चित करेंगे कि उसे महसूस हो कि वह हम सबके लिए कितना खास है!

एक बच्चे की आँख से दुनिया को देखें और अपना तनाव शांत करें – 17 अगस्त 2015

जब आप अभिभावक बन जाते हैं तो आपके जीवन में और आपकी दिनचर्या में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाता है। समझिए, दुनिया ही बदल जाती है! आपका बच्चा हर वक़्त आपके सोच में मौजूद होता है और इसलिए मैं समझता हूँ कि जीवन के बारे में मेरे चिंतन-मनन और सोच-विचार के केंद्र में अक्सर अपरा मौजूद होती है। आज मैं इस विषय में एक उदाहरण देना चाहता हूँ: अगर हम दुनिया को उस तरह देखें, जिस तरह एक बच्चा देखता है तो हम वास्तव में अपने तनाव को बहुत कुछ कम कर सकते हैं!

अपनी बच्ची को खेलता हुआ देखकर मैं इस बिन्दु पर पहुँचा हूँ। क्या कभी आपने ऐसा होते हुए देखा है कि बच्चा खेल रहा है और तभी अचानक कुछ गलत हो जाता है और जैसे उसका सारा संसार ही भरभराकर कर ढह गया हो? एक कागज का सितारा अपरा का प्रिय खिलौना था और वह अक्सर उससे खेलती रहती थी। अभी कुछ दिन पहले उसका एक कोना टूटकर अलग हो गया और जैसे प्रलय आ गया हो! लेकिन तब तक ही जब तक रमोना ने एक रंगीन, चमकता, भड़कीला पीला टेप उस पर चिपकाने के लिए ढूँढ़ नहीं निकाला। फिर तो वह पहले से भी ज़्यादा बढ़िया हो गया!

अब एक वयस्क बन जाइए और मान लीजिए कि चीज़ें उस तरह नहीं हो रही हैं, जैसी उन्हें होना चाहिए। बच्चे की तरह निराशा में हाथपैर मत पटकिए- बल्कि उसे तुरत-फुरत ठीक करने की जुगत भिड़ाइए! मामले को लंबा मत खींचिए और आगे बढ़िए! समस्या का निदान ढूँढ़िए और भूल जाइए! क्या गलत था यह सोचते हुए अपने निर्णयों पर पछताने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि उन्हें आप अब वापस लौटा नहीं सकते और यह बहुत से व्यर्थ तनावों का मुख्य कारण होता है!

एक बात और नोट कीजिए: बच्चे एक साथ बहुत से काम नहीं करते बल्कि एक काम पर ही पूरा ध्यान केन्द्रित करते हैं। वयस्क इस मामले में बच्चों से इस तरह अलग हैं कि वे हर वक़्त भूत और भविष्य के बारे में ही सोचते रहते हैं, बहुत सी योजनाओं के बारे में, तरकीबों, तिकड़मों के बारे में, जब कि कर कुछ और रहे होते हैं। नतीजा यह होता है कि आप कोई काम पूरा करना चाहते हैं लेकिन ध्यान-भंग की ऐसी हालत में आप उसे उचित समयावधि में या ठीक तरह से निपटा नहीं पाते। ये विचार पहले ही आपकी ऊर्जा नष्ट कर रहे होते हैं और फिर काम में होने वाली देर आपका तनाव और बढ़ाती जाती है। बच्चा बनने की कोशिश कीजिए- एक बार में सिर्फ एक पैर आगे बढ़ाइए!

लचीलापन लाइए, खोजबीन कीजिए। बच्चे हर वक़्त कुछ नया करने के लिए तैयार रहते हैं। वे जानते हैं कि किसी समस्या के और भी कई हल हो सकते हैं जिन्हें वे अभी तक आजमा नहीं सके हैं। आपके पास एक लाभ है- बच्चों के मुक़ाबले आप बेहतर स्थिति में हैं: आपके पास अनुभव है। लेकिन ज़्यादातर लोग इस अनुभव का नकारात्मक उपयोग करते हैं और उन्हीं, सैकड़ों बार आजमाई हुई बातों को दोहराते हैं जब कि उन्हें नए तरीकों को खोजने और उन्हें आजमाने के लिए सदा तैयार रहना चाहिए! बच्चे की तरह सोचिए- आप चकित रह जाएँगे!

और सबसे बड़ी बात- वही कीजिए, जो आप करना चाहते हैं। बच्चे कभी भी कोई ऐसा काम नहीं करते, जिसमें उन्हें मज़ा नहीं आता। जो काम उन्हें नहीं करना है, वे साफ मना कर देते हैं और उन्हें मनाते-मनाते आपकी हालत खराब हो जाती है। वयस्क के रूप में आपको कई काम ऐसे भी करने पड़ते हैं जो आपको पसंद नहीं हैं लेकिन अगर आप ठीक तरह से उनके बारे में सोचें तो आपको पता चलेगा कि वास्तव में उन्हें करने की ज़रूरत भी आपको नहीं थी। कई दूसरे तरीके भी मौजूद हैं। भरसक ऐसे कामों से दूर रहिए- और एक बच्चे की तरह जीवन का आनंद लीजिए!

कैसे सतत मार्गदर्शन बच्चों के विकास में बाधा पहुँचाता है – 11 अगस्त 2015

अपरा खेल रही थी और मैं और रमोना हमेशा की तरह बच्चों के लालन-पालन संबंधी विषयों पर चर्चा करने लगे कि कैसे आज जो आप बच्चों के साथ कर रहे हैं, उसका भविष्य में उन पर कितना गहरा असर पड़ता है। इस बार हमारी चर्चा इस ओर मुड़ गई कि बच्चों को यह निर्देश देने में कि वे क्या करें या न करें और उन्हें उनकी मर्ज़ी से कुछ भी करने की स्वतंत्रता देने के बीच क्या अंतर है।

मेरा विश्वास है कि दोनों के मध्य तालमेल बनाए रखने की ज़रूरत है लेकिन हम दोनों के दो भिन्न देशों और उनकी संस्कृतियों के बीच तुलना करते हुए हमने पाया कि दोनों ही परिस्थितियों में कई लोग अति कर देते हैं।

अगर आप भारतीय परिवारों में जाएँ तो कई बार आपको पता चलेगा कि घर में वयस्क सदस्य मौजूद हैं लेकिन वे बच्चों के साथ कोई चर्चा नहीं करते, उनके साथ विशेष मेलजोल नहीं रखते। माँ घर के कामकाज निपटा रही होती है, दूसरे सदस्य चर्चा कर रहे होते हैं और बच्चे अपनी मनमर्ज़ी से खेलकूद में लगे होते हैं या इधर-उधर मटरगश्ती कर रहे होते हैं। वे अपने खेल खुद चुनते हैं, उनके खिलौने उनके अपने हैं और कुल मिलाकर बिना किसी निर्देश के वे अपना पूरा समय बिताते हैं- वही तयशुदा खेल या अपवादस्वरूप कोई वयस्क उनके साथ खेलने वाला।

कभी-कभी, और खासकर अनपढ़ परिवारों में, इसके बड़े खतरनाक परिणाम निकलकर आते हैं! बच्चे अपने परिवेश की जाँच-परख करते हैं- परिवेश, जो आवश्यक नहीं कि बच्चों के लिए पूर्ण सुरक्षित हो- और गंभीर शारीरिक चोटें खा बैठते हैं। अगर कोई वयस्क उस समय उनके साथ होता या दूर से ही सही, सिर्फ उनकी ओर ध्यान दे रहा होता तो दुर्घटना टल सकती थी। संयुक्त परिवारों में भी, जहाँ काफी वयस्क और बुज़ुर्ग मौजूद होते हैं और जिनमें से कोई एक बच्चों का ध्यान रख सकता है, ऐसी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं।

इसके विपरीत, पश्चिम में मैंने देखा है कि बच्चे हर वक़्त किसी न किसी की नज़र में होते हैं और अधिकतर किसी न किसी वयस्क के साथ मिलकर सक्रिय रूप से कुछ न कुछ कर रहे होते हैं। इससे किसी संभावित दुर्घटना की रोकथाम हो जाती है और वयस्क को भी बच्चे के अंदर छिपी प्रतिभा को जानने और उसे आगे विकसित करने का मौका मिल जाता है।

बहुत छोटी उम्र से ही वहाँ खेलने का बंधा-बंधाया समय होता है। वयस्क उनके खिलौने तैयार करके उन्हें देते हैं कि उन्हीं से खेलें और वे उनसे खेलते हैं और अभिभावक लगातार उन्हें बताते रहते हैं कि कैसे खेलना है या कैसे उनका इस्तेमाल करना है। फिर बच्चे किंडरगार्टेन और स्कूल में पढ़ने जाने लगते हैं, जहाँ सब कुछ बंधा-बंधाया ही होता है। स्कूल से लौटने के पश्चात वाद्ययंत्र सीखने की कक्षाएँ या खेल-कूद का नियत समय होता है और निश्चित ही होमवर्क तो करना ही करना होता है। हर बात के स्पष्ट निर्देश होते हैं कि कब, कैसे और किस क्रम में उन्हें किया जाना है। यहाँ तक कि दोस्तों के साथ खेलने के नियत दिनों में भी मैंने देखा है कि अभिभावक बच्चों को क्या खेलना चाहिए, यह बताना आवश्यक समझते हैं।

बहुत ज़्यादा मार्गदर्शन के साथ मैं जो समस्या देखता हूँ वह यह है कि उससे बच्चे दूसरों के कहे अनुसार काम करने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे यह भी नहीं जान पाते कि वास्तव में वे खुद क्या करना चाहते हैं! खास कर परंपरागत शिक्षा विधियों और सख्त लालन-पालन के तरीकों के चलते उन्हें खुद कुछ करके देखने और खोज-बीन करते हुए आगे बढ़ने की कोई प्रेरणा या प्रोत्साहन नहीं मिल पाता! वे गिरते नहीं हैं या गिर नहीं सकते और इसलिए जानते ही नहीं हैं कि गिरने पर चोट लगती है। उन्हें खुद निर्णय लेने का मौका ही नहीं मिल पाता। और फिर वे यह भी समझ नहीं पाते कि वास्तव में वे क्या करना चाहते हैं!

ऐसी हालत में हम बड़ी तादात में ऐसे युवाओं को देखते हैं, जो वास्तव में यह भी नहीं जानते कि अपने समय का क्या सदुपयोग किया जाए। वे स्कूल से पढ़कर निकले हुए युवा बच्चे होते हैं, जो अब भी मार्गदर्शन के लिए अभिभावकों का मुँह जोहते हैं कि वे बताएँ कि नौकरी के लिए कहाँ आवेदन किया जाना ठीक होगा या किसी शिक्षक का, जो यह बताए कि अपने जीवन का आगे क्या किया जाना चाहिए। उन्हें बताई गई बातों का ही वे अनुसरण करते हैं क्योंकि वे उसी में आसानी महसूस करते हैं।

मुझे लगता है कि हमें बच्चों को स्वतन्त्रता पूर्वक अपनी मर्ज़ी से विकसित होने की आज़ादी देनी चाहिए। उनका मार्गदर्शन बहुत सहजता के साथ किया जाना चाहिए कि वे सीखें अवश्य लेकिन उनके लिए इतना मौका भी छोड़ना चाहिए कि वे समझ सकें कि वे क्या सीखना चाहते हैं! हमें उनकी सुरक्षा का खयाल अवश्य रखना चाहिए मगर इस तरह कि बिना किसी व्यवधान के वे खुद अपने अनुभव प्राप्त कर सकें।

अपनी साढ़े तीन साल की बच्ची, अपरा के बगैर पहली बार माँ और पा – 14 जुलाई 2015

कल मैंने आपको अपरा के पहले लंबे सफर के बारे में बताया था, जिसमें हम दोनों साथ नहीं थे: तीन दिन और दो रातें- अपने चाचा और परनानी के साथ खजुराहो घूमने! उसका समय तो बड़ा शानदार गुज़रा- लेकिन हमारा क्या? माँ और पा की क्या हालत हुई?

मैंने पहले ही बताया कि जाने से पहले हमने अपरा से अच्छी तरह बात कर ली थी कि रात को उसे हमारे बगैर सोना होगा। हम जानते थे कि उसके लिए यह सबसे मुश्किल वक़्त होगा। हमने उसे समझाया कि हम वहाँ उसके साथ नहीं होंगे और वह हमारे पास तुरंत आ भी नहीं सकेगी- लेकिन वह निश्चिंत थी कि उसे कुछ नहीं होगा, कोई परेशानी नहीं होगी। हम जानते थे कि दिन में वह हमें भूली रहेगी मगर यही अपने बारे में हम नहीं कह सकते थे!

जब वे सब चले गए, हमारी अजीब हालत हो गई: साढ़े तीन साल में पहली बार अपरा हमारे साथ नहीं थी! और तब हमें समझ में आया कि वह हमारी कितनी छोटी-छोटी बातों में शामिल थी, हमारे मामूली से मामूली कामों के पीछे यही होता था कि उसे तकलीफ न पहुँचे, उसे दिक्कत न हो! आज ऑफिस में उसकी कोई छेड़-छाड़ नहीं होने वाली थी, हमारा ध्यान अपनी ओर खींचने वाला आज यहाँ नहीं था और खाना खाते समय तो ऐसी निस्तब्धता थी कि पूछो मत! लेकिन वास्तव में हम पल-पल उसकी अनुपस्थिति का एहसास कर रहे थे और बहुत छोटी-छोटी, मामूली बातें हमें उसकी याद दिलाती थीं कि हम उसे कितना मिस कर रहे हैं: वह उठ न जाए इसलिए आज भी सबेरे हम फुसफुसाहटों में बात करते रहे, जबकि… वह बिस्तर पर नहीं थी। फोन पर बात करते हुए मैं आदतन दूसरे कमरे में चला जाता था कि कहीं वह आकर कान में चीखने न लगे और मैं फोन पर कुछ सुन न पाऊँ! यह सब सहज हो जाता था मगर हर बार तुरंत अपरा का खयाल आता था कि अरे, वह तो यहाँ नहीं है!

जी हाँ, हम उसे बुरी तरह मिस कर रहे थे। मैं जानता हूँ कि बहुत से अभिभावक कहते हैं कि बच्चों से मुक्त सप्ताहांत कितना स्वच्छंद और सुखद होता है! लेकिन हम ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं करते। मेरे विचार में इसका मुख्य कारण यह है कि उसके होते हुए भी हम किसी चीज़ से वंचित नहीं रहते। जो हम करना चाहते हैं, सब कुछ उसकी उपस्थिति में भी करते हैं और उसके साथ हम हर बात का आनंद लेते हैं! ऐसी कोई बात हमारे साथ नहीं होती कि वह चली गई है इसलिए ‘अब मौका मिला है, इसे निपटा लें’!

स्वाभाविक ही, पहले दिन रात को उसे रोता देखकर हम दुखी हुए थे लेकिन उससे अधिक हमें गर्व हो रहा था कि इतनी सी उम्र में वह हमारे बगैर बाहर चली गई और हालांकि शुरू में थोड़ा बिसूर रही थी लेकिन बाद में ठीक से सो गई और दूसरी रात तो हमें उतना मिस भी नहीं किया और बिना रोए सो गई। और अब वह आ गई है- रोमांचित, उत्साह से भरी और वहाँ की हर बात बताने के लिए बेताब!

इस यात्रा में उसने कितना कुछ सीखा! उसे दूरी की अवधारणा का बेहतर ज्ञान हुआ और वह यह समझने लगी कि कार में लंबे समय तक सफर करने पर पर शाम को मर्ज़ी होने पर आप माँ और पा के पास तुरत-फुरत नहीं पहुँच सकते। उसने सीखा कि कुछ पल आसपास चाचा न हो तो और किसी को पुकारकर मदद ली जा सकती है। उसने यह भी जाना कि बिना किसी को बताए कहीं भी नहीं चल देना चाहिए…और हर माता-पिता मानेंगे कि यह जीवन का बहुत बहुमूल्य पाठ उसने पढ़ा! इसके अलावा उसने हजारों छोटी-छोटी बातें सीखी होंगी, जिन्हें आप तब सिर्फ अनुभव करते हैं, जब घर पर नहीं होते।

मेरे विचार में जैसी स्वतन्त्रता मैं अपनी बेटी को देना चाहता हूँ, उस ओर उसका यह पहला कदम है। मैं चाहता हूँ कि वह जाने कि कुछ भी हो, हम हमेशा उसके साथ हैं, जब भी उसकी इच्छा हो, लौटकर अपने सुरक्षित स्वर्ग में आ सकती है। एक भरोसेमंद आसरा- लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह भरोसेमंद है, यह आसरा पाँव की बेड़ी नहीं बनेगा। उसे बाहर निकलकर दुनिया को करीब से देखने की आज़ादी मिलनी चाहिए। इस यात्रा के रोमांच को और उससे प्राप्त नए अनुभवों के रोमांच को उसे सदा बरकरार रखना रखना चाहिए। इस तरह, मेरा विश्वास है कि वह दुनिया के बारे में उससे कहीं अधिक जान सकेगी, जितना हम आश्रम में बैठकर उसे बता सकते हैं! निश्चित ही, हम भी उसके साथ यात्राओं पर जाएँगे, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब वह अपने चाचाओं के साथ ही नहीं, खुद अकेली घूमेगी-फिरेगी।

मैं जानता हूँ कि उस दिन मुझे गर्व का अनुभव होगा- और यह भी जानता हूँ कि मैं उसे बहुत मिस करूँगा!