गरीबों को सिर्फ निम्न स्तरीय शिक्षा ही नसीब हो सकती है – हमारे स्कूल के बच्चे – 23 अक्टूबर 2015

आज मैं आपका परिचय दो लड़कों से करवाना चाहता हूँ, जिन्होंने इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है और जिनके नाम हैं, धनेश और हितेश। वृंदावन के सबसे गरीब इलाके में रहने वाले एक परिवार के चार बच्चों में ये दो सबसे बड़े बच्चे हैं।

बच्चों का पिता पेंटर के रूप में काम करता है लेकिन उसके पास मासिक आमदनी वाला कोई स्थिर काम नहीं है और रोज़ सबेरे उसे काम की खोज में निकलना पड़ता है-कभी ठेकेदारों के संपर्कियों से ज़रिए तो कभी लेबर मार्केट में मजदूरों की तलाश में निकले भवन निर्माताओं या ठेकेदारों से बातचीत करके। कभी तो कुछ दिन काम करने की जगह मिल जाती है और कभी कोई काम नहीं मिलता और स्वाभाविक ही, जब महीने के अधिकतर दिनों में काम मिल जाता है तो उस माह आमदनी भी अधिक हो जाती है। लेकिन अक्सर यह होता है कि माह में ज़्यादा से ज़्यादा पंद्रह दिनों का काम ही मिल पाता है।

इतने संघर्ष के पश्चात कमाए रुपयों से भी मुश्किल से ही घर का खर्च चल पाता है। पाँच दिन की कमाई तो सिर्फ एक कमरे वाले घर का किराया चुकाने में ही खर्च हो जाती है, जिसमें परिवार के छह सदस्य मुश्किल से समा पाते हैं। यह कमरा भी एक और परिवार के मकान का एक हिस्सा है। मकान के मुख्य हाल में स्थित हैंड पंप पर ही वे लोग नहा-धो लेते हैं और शहर के बाहर खेतों में सबेरे-सबेरे दिशा-मैदान के लिए चले जाते हैं।

लड़कों की माँ घर में रहकर बच्चों की देखभाल करती है। दस साल उम्र का धनेश सबसे बड़ा है और घर के कामों में हाथ बँटाता है। हितेश छह साल का है। उनका चार साल का एक भाई और दो साल की एक नन्हीं सी बहन भी है। वे सभी दिन का बहुत सारा समय बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेलते-कूदते हुए और मटरगश्ती करते हुए बिताते हैं।

जब हम उनके घर गए थे तब हमने पूछा था कि क्या धनेश पहले कभी स्कूल नहीं गया।.पता चला वह स्कूल जाता था लेकिन वह एक सस्ता निजी स्कूल था जहाँ पढाई का स्तर बहुत खराब था! धनेश ने बताया कि उनके गणित के शिक्षक ने बीच सत्र में (पढ़ाई के सत्र के बीचोंबीच) स्कूल की नौकरी छोड़ दी थी और तब से साल के अंत तक स्कूल में गणित की पढ़ाई-लिखाई बिल्कुल बंद रही।

इस तरह, तीन बच्चों को पढ़ाने की चिंता के साथ वे इस बात से भी ठगा सा महसूस कर रहे थे कि जिस स्कूल की पढ़ाई पर वे इतना सारा पैसा खर्च करते रहे थे, वह व्यर्थ हो गया था! इसलिए जब उचित समय पर उन्हें हमारे स्कूल के बारे में पता चल गया तो वे ख़ुशी से फूले नहीं समाए और उन्होंने अपने दो बच्चों को तुरंत हमारे यहाँ भर्ती करा दिया!

अब धनेश और हितेश, दोनों हमारे स्कूल की पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ रहे हैं। दोनों बहुत जीवंत, चंचल और होशियार बच्चे हैं और हमारे शिक्षक उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने के लिए तत्पर हैं!

हितेश और धनेश जैसे बच्चों की शिक्षा में आप भी मदद कर सकते हैं-किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

भारत में शिक्षा व्यवसाय को बंद कराने में अम्माजी’ज़ आयुर्वेदिक रेस्तराँ किस तरह सहायक होगा? 21 मई 2015

इस हफ्ते की शुरुआत में मैंने भारत में शिक्षा संबंधी एक महती समस्या और बराबरी को लेकर अपनी परिकल्पना के बारे में आपको बताया था। शिक्षा व्यवसाय में मौजूद बड़े व्यापारी घरानों को कैसे चुनौती दी जा सकती है, इस संबंध में मैंने कल विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए थे। आज मैं इससे भी अधिक ठोस योजना आपके सामने रखने जा रहा हूँ और बताना चाहता हूँ कि मैं कैसे इस बात की कल्पना कर पा रहा हूँ कि हमारे आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी’ज़ की सहायता से मेरा यह स्वप्न यथार्थ में परिणत हो सकता है।

इतने साल तक हम अपने स्कूल और दूसरी चैरिटी परियोजनाओं को अपने व्यवसाय और प्रायोजकों तथा दूसरे मददगारों के सहयोग से चलाते रहे हैं। हमारे सारे व्यावसायिक ग्राहक और अधिकांश आर्थिक मददगार पश्चिमी देशों के लोग रहे हैं। ऐसे गैर भारतीय, जो योग और आयुर्वेद विश्राम सत्रों में शामिल होने यहाँ आते हैं, जो हमारी कार्यशालाओं में सम्मिलित होते हैं या व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं। इसके अलावा कुछ गैर भारतीय वैसे भी, हर तरह से गरीब बच्चों की आर्थिक मदद करना चाहते हैं इसलिए हमारे इन कामों में आर्थिक सहयोग करते हैं।

अब एक आयुर्वेदिक रेस्तराँ, अम्माजी'ज़ शुरू करने के साथ हम एक नए व्यवसाय में कदम रखने जा रहे हैं। वहाँ हम भोजन के शौकीनों के लिए उच्च गुणवत्ता वाला भोजन मुहैया कराएँगे और इस तरह उनके शरीर और स्वास्थ्य के लिए भी कुछ बेहतर कर पाएँगे। गलत खाद्य के ज़रिए हम बहुत सी बीमारियों को न्योता देते हैं-और अम्माजी'ज़ में न सिर्फ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग स्वास्थ्यवर्धक भोजन कर पाएँगे बल्कि अपने चटोरे मित्रों और बच्चों को भी परितुष्ट कर पाएँगे! वहाँ हम आहार और शारीरिक पोषण संबंधी टिप्स और जानकारियाँ उपलब्ध कराएँगे, जो हमारे यहाँ की विशेषता होगी और एक अतिरिक्त लाभ भी क्योंकि जब भी आप यहाँ भोजन करने आएँगे, अपने बच्चों की निःशुल्क शिक्षा में मददगार भी हो रहे होंगे!

जल्द ही हमारे यहाँ बहुत से भारतीय मेहमान भी आने लगेंगे और तब हम ऐसे बिंदु पर पहुँच जाएँगे जब न सिर्फ हम गरीब बच्चों की मदद करते रह सकेंगे बल्कि कुछ बड़ी परियोजनाओं पर भी काम कर सकेंगे! हम एक स्तरीय स्कूल खोलेंगे, जहाँ हर संभव सुविधाएँ होंगी-वह भी पढ़ने वाले हर बच्चे के लिए पूरी तरह मुफ़्त! और हाँ, हमारे रेस्तराँ के ग्राहकों के बच्चों के लिए भी!

जी हाँ, वास्तव में जब भी आप हमारे स्कूल में भोजन करने आएँगे तो उस पर खर्च होने वाला एक एक रुपया आपके बच्चे की बेहतर शिक्षा पर खर्च किया जाएगा! इस तरह हमारा यह नया व्यवसाय भी इस स्कूल की मदद में पूरी तरह सहभागी होगा!

मेरा विश्वास है कि इस मिशन और हमारी परियोजना से सभी संतुष्ट होंगे: गरीब बच्चों के माता पिता, जिनके बच्चे अपढ़ रह जाने के अभिशाप से मुक्त होंगे और मुफ़्त विद्यार्जन कर पाएँगे; मध्यवर्गीय अभिभावक, जिन्हें बच्चों की अच्छी शिक्षा हेतु संघर्ष नहीं करना होगा क्योंकि शिक्षा निःशुल्क होगी और आर्थिक रूप से संपन्न अभिभावक, जिनके बच्चे वही शिक्षा मुफ़्त पा सकेंगे, जिसके लिए उन्हें मोटी रकम खर्च करनी पड़ती! किसी विशाल मॉल में खरीदी जाने वाली वस्तु की तरह विद्या खरीदने के स्थान पर समानता और बंधुत्व की शिक्षा देने वाले स्कूल में निःशुल्क शिक्षा कौन नहीं पसंद करेगा?

सिर्फ ऐसे व्यवसायी, जिनकी ऐसी मॉलनुमा शिक्षा संस्थाएँ होंगी, वही मेरी इस परियोजना पर आपत्ति करेंगे क्योंकि वह उनके लिए नुकसानदेह होगी!

लेकिन कोई भी दूसरा व्यवसाय करने वाले लोग इसे पसंद करेंगे। और यही मुख्य बिन्दु है, जहाँ मैं लोगों से कहूँगा कि वे आगे आएँ और अपने व्यापार के माध्यम से और आर्थिक मदद के ज़रिए इस मिशन का समर्थन करें! व्यापारी अपने व्यापारिक लाभ का एक नियत प्रतिशत इस परियोजना के खर्च में लगा सकते हैं। समर्थ अभिभावक गण इस कार्य हेतु उपहार स्वरूप पैसे दे सकते हैं, भले ही उतनी ही रकम, जितना वे किसी भी दूसरे अच्छे स्कूल में अदा करते। और हाँ, फर्नीचर से लेकर भोजन या किताबों तक वे कई प्रकार से स्कूलोपयोगी वस्तुओं को प्रायोजित कर सकते हैं! हर व्यक्ति अपने तरीके से अपना अंशदान कर सकता है! स्वाभाविक ही, विदेशों से आने वाले डोनेशंस और प्रायोजन का स्वागत तो है ही!

फिर यह दूसरे कई शहरों में फैल सकता है, जहाँ हम आगे चलकर अपना रेस्तराँ खोलने का प्रयास करेंगे और हर रेस्तराँ के साथ एक स्कूल भी। सबके लिए निःशुल्क, इतना स्तरीय कि सभी इस परियोजना में शामिल होना चाहेंगे! एक इलाके में जब हमारे इस तरह के कई स्कूल खुल जाएँगे तो फिर लोग स्कूल जैसे दिखाई देने वाले इन मॉलों में इतना रुपया खर्च करने के लिए राज़ी नहीं होंगे-और बहुत से दूसरे लोग भी हमारे उदाहरण का अनुसरण करेंगे!

मैं नहीं जानता की इस विचार को मूर्त रूप देने में किस हद तक सफलता प्राप्त होगी और कितनी जल्दी सब कुछ आगे बढ़ेगा लेकिन मैं तो कल्पना करने की स्वतन्त्रता में आनंदमग्न रहता हूँ। अपने विचार रखने और सपने देखने की स्वतन्त्रता। समाज के हर आर्थिक और सामाजिक वर्ग से आने वाले हर बच्चे के लिए एक समान शिक्षा के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से इस रास्ते पर हम आगे बढ़ते रहेंगे!

धनवान और गरीब सभी के लिए एक जैसी उच्च स्तरीय मुफ्त शिक्षा का सपना – 20 मई 2015

कल मैंने आपको बताया था कि मेरी दिली इच्छा है कि भारत में सभी के लिए एक जैसी शिक्षा हो। ऐसी शिक्षा, जो सभी बच्चों के लिए एक सी हो, भले ही अभिभावक उसके लिए कितना पैसा भी खर्च कर सकते हों, जिससे सभी लड़कियों और लड़कों को उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध हो सकें, जिन्हें वे प्राप्त करना चाहते हैं! विश्वास करें या न करें, मेरे पास इस स्वप्न को अंजाम तक पहुँचाने की एक कार्य योजना मौजूद है।

अब आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं मूर्ख हूँ, दिवास्वप्नी हूँ या हवाई किले बनाने वाला अयथार्थवादी व्यक्ति हूँ। मैं शिक्षा में पैसे की भूमिका का महत्व समाप्त करना चाहता हूँ- भारत जैसे देश में, एक ऐसे समाज में, जहाँ कुछ लोगों के लिए पैसा ही सब कुछ है- क्योंकि बिना पैसे के यहाँ कुछ नहीं होता।

लेकिन आप जानते हैं कि हम पिछले आठ साल से यह स्कूल चला रहे हैं और पहले से ही गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के अभियान में भरपूर शक्ति के साथ अपना योगदान कर रहे हैं और इस तरह ऐसे कामों का हमारे पास काफी तजुर्बा है। मेरे विचार हवाई नहीं होते, वे अनुभव की ठोस, यथार्थवादी भूमि पर आकार लेते हैं। हर साल हमारे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उदार आर्थिक मददगारों की सहायता से हमने अपने स्कूल की इमारत की पहली मंज़िल का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, जिसमें पाँच नई कक्षाएँ शुरू हो चुकी हैं और अब हम कुछ अधिक बच्चों को पढ़ा पा रहे हैं!

स्वाभाविक ही हर चीज़ की एक सीमा होती है और हमेशा होगी।

मैं नहीं समझता कि सपने में भी मैं इस देश के भ्रष्टाचार को समाप्त कर सकता हूँ। न ही मैं हर एक को इतना धनवान बना सकता हूँ कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा वाले ख़र्चीले स्कूलों में भेज सकें। जी नहीं, मेरा विचार यथार्थ को मद्देनजर रखते हुए, कुछ छोटे-छोटे कदमों के साथ आगे बढ़ने का है लेकिन संभव हुआ तो, क्रमशः काम को इतने विशाल पैमाने पर फैला देने का भी है कि उसका अच्छा खासा असर दिखाई दे सके!

बराबरी के अपने स्वप्न के अनुसार मैं स्कूल का निर्माण करूँगा। एक ऐसा स्कूल, जहाँ आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से समाज के हर वर्ग से आए बच्चे एक साथ पढ़ सकें और वह भी मुफ्त! हम वहाँ हर विद्यार्थी को एक जैसी उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान करने का इरादा रखते हैं, चाहे किसी रिक्शा-चालक का लड़का हो, चाहे बैंक के उच्च प्रबंधन से जुड़े किसी उच्चाधिकारी की लड़की हो!

जैसा कि अभी भी हो रहा है, हमारा स्कूल आगे भी हर बच्चे को किताब-कापियाँ, वर्दियाँ और भोजन मुहैया कराएगा। हर बच्चे का स्कूल की ओर से स्वास्थ्य बीमा करवाया जाएगा और हर बच्चा हर तरह से अपने साथ बैठे अगले बच्चे के बराबर होगा।

जब हमने अपना मुफ्त स्कूल शुरू किया था तब कई छोटे और सस्ते स्कूलों के व्यापार पर बुरा असर पड़ा था और एक स्कूल तो बंद ही हो गया-क्योंकि बच्चे अब हमारे स्कूल में पढ़ने आने लगे थे।

अब उस स्थिति की कल्पना कीजिए कि हम कई ऐसे स्कूल खोलें, जहाँ भर्ती के समय आने वाले हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है-स्वाभाविक ही, सीट भरने तक! शिक्षा व्यवसाय के इस दीर्घाकार दैत्य पर यह एक करारा प्रहार होगा-क्योंकि तब सामान्यतया उन स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चे भी हमारे यहाँ आएँगे क्योंकि यहाँ भी वैसी ही बढ़िया शिक्षा का इंतज़ाम होगा, वह भी बिल्कुल मुफ्त!

अब एक स्वाभाविक प्रश्न- यह स्वप्न कैसे साकार होगा, इसके लिए इतना पैसा कहाँ से आएगा? अम्माजी’ज़ से! अपने आयुर्वेदिक रेस्तराँ से! क्या? कैसे? इस विषय में आप कल पढ़ सकेंगे!

ईश्वर के बगैर बच्चों का लालन-पालन करना – 24 फ़रवरी 2015

कुछ दिन पहले एक शाम हम आश्रम के मुख्य हाल में बैठे हुए थे और अचानक आश्रम के एक बच्चे, प्रांशु और अपरा के साथ रमोना का संवाद शुरू हो गया। आज मैं उसी चर्चा के बारे में लिखना चाहता हूँ।

बात वहाँ से शुरू हुई जब अपरा नानी जी के कमरे में जाकर उनसे टॉफी मांगने लगी। नानी जी जानती हैं कि खाना खाने से पहले मीठी चीज़ खाना उचित नहीं है इसलिए उन्होंने अपरा से पूछा, खाना खा लिया? अपरा ने पहले तो हाँ में सिर हिलाया मगर फिर सच कहने का विचार किया और नहीं में सिर हिलाकर कमरे से बाहर निकल गई-उसे टॉफी नहीं मिल पाई थी। पीछे से नानी की आवाज़ रमोना के कानों में पड़ी: "झूठ बोलना पाप है!"

उसने पहले तो उस पर विशेष ध्यान नहीं दिया मगर जब आठ साल का प्रांशु, जो आजकल अपरा का सबसे प्रिय सखा बना हुआ है, नानी के शब्द बार-बार दोहराने लगा तो वह उसके पास जाकर बैठ गई। "क्या तुम्हें पाप का मतलब मालूम है?" उसने बच्चे से पूछा। "यह तो नानी ने कहा," उसने जवाब दिया और एक और सवाल के उत्तर में स्वीकार किया कि इसका ठीक-ठीक मतलब उसे पता नहीं है। तब रमोना ने उसे समझाना शुरू किया:

"नानी के कहने का अर्थ यह है कि अगर झूठ बोलोगे तो भगवान नाराज़ हो जाएँगे।… अब तुम्हें एक और बात बताती हूँ, मैं तो भगवान को नहीं मानती इसलिए भगवान झूठ बोलने से नाराज़ हो या न हो, मुझे कोई परवाह नहीं है- क्योंकि मैं तो यही नहीं मानती कि वह कहीं होता भी है। तुम्हें क्या लगता है, भगवान होता है?"

प्रांशु ने मुसकुराते हुए सिर हिलाया। पास बैठी अपरा चिल्लाते हुए हँस पड़ी, "नहीं!"

रमोना ने आगे कहा: "तो इसका मतलब यह कि तुम्हें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि भगवान नाराज़ होता है या नहीं लेकिन मैं तुम्हें आगाह करती हूँ कि अगर झूठ बोलोगे तो मैं ज़रूर नाराज़ हो जाऊँगी और तुम देख ही रहे हो कि मैं तो तुम्हारे सामने खड़ी हूँ, यहाँ, अपने घर में! ठीक?"

एक मुस्कान के साथ उसने अपनी बात समाप्त की और उसके साथ प्रांशु भी मुस्कुरा दिया।

वह रमोना की बात समझ गया था और हमें महसूस हुआ कि छोटी-मोटी चर्चाओं से भी हमारे बच्चे हमें और हमारे विचारों को आसानी के साथ जान-समझ लेते हैं। जहाँ तक अपरा का सवाल है, हमें पता है कि अभी उसके लिए भगवान कथा-कहानियों और कॉमिकों का एक पात्र भर है।

हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे जीवन के प्रति एक यथार्थपरक नज़रिया विकसित करें और भगवान का अस्तित्व नहीं है, यह जानना उसी दिशा में उठा एक कदम है।

एक घर, चार कमरे, चार परिवार – हमारे स्कूल के बच्चे – 14 नवंबर 2014

जब हम इस साल अपने स्कूल की भर्तियों के लिए नए बच्चों के यहाँ दौरे पर निकले तो प्रिया और हिमांशु के यहाँ भी पहुँचे। और एक बार फिर हमें एहसास हुआ कि एक कायदे के घर, जिसमें सभी के लिए जगह हो, क्या होता है।

जब हम पहुँचे तब हिमांशु अंदर सो रहा था और प्रिया दौड़कर उसे जगाने चली गई। इस बीच उसका बड़ा भाई भी, जो बाहर खेल रहा था, हमारे पास आ गया। उनकी माँ ने हमें बताया कि प्रिया के पिता ने पहले वेल्डिंग का काम सीखा था लेकिन इस क्षेत्र में उसे कोई रोजगार नहीं मिल पाया। इसलिए वह अभी वृन्दावन में ही किसी निर्माण स्थल पर साधारण मजदूर के रूप में काम कर रहा है। यह नियमित रोजगार नहीं है और इस काम में उसका कोई नियमित मालिक नहीं है और उसे रोज़ बाज़ार जाकर, जहाँ मजदूर और बिल्डर्स आपस में मिलते हैं, अपना श्रम बेचने के लिए बैठे रहना पड़ता है। जब नियमित रूप से रोज़ उसे काम मिलता रहता है तो माह भर में वह 3000 रुपए यानी लगभग 50 डॉलर कमा लेता है।

वे भाग्यशाली हैं कि उन्हें अपने घर का किराया नहीं देना पड़ता अन्यथा इतनी कम आमदनी में निर्वाह करना उनके लिए बहुत मुश्किल होता। घर उनका खुद का है-या कम से कम घर का चौथाई हिस्सा। यह घर प्रिया और हिमांशु के दादा ने बनवाया था और जब उसकी मृत्यु हुई तो वह उसके चार बेटों की मिल्कियत हो गई। इस तरह सबके पास अब एक-एक कमरा है और रसोई और एक थोड़ा बड़ा सा हाल है, जिन्हें सब भाई मिलकर साझा करते हैं।

यह एक पुराना घर है। वह गली और आसपास का इलाका दूसरे बहुत से निर्माणों के चलते समय के साथ थोड़ा ऊपर उठ चुका है लेकिन उन्होंने वहीं मकान बनवाया, जहाँ उन्होंने प्लॉट खरीदा था। इस तरह पूरा मकान मुख्य सड़क की सतह से आधा मंज़िल नीचे आ गया है। मकान में पीछे भी एक प्रवेशद्वार है, जो एक पतली गली में, जो मकान की सतह पर ही है, खुलता है। लेकिन अगर आपको मुख्य द्वार से प्रवेश करना है तो आपको कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरना पड़ता है।

हालांकि उन्हें किराए की बचत हो जाती है लेकिन आमदनी इतनी कम है कि परिवार का माह भर का खर्च पूरा करना भी प्रिया के माता-पिता के लिए मुश्किल होता है। जब प्रिया ने स्कूल जाना शुरू किया, उनकी यह चिंता और बढ़ गई क्योंकि अब उन्हें हर माह उसकी फीस भी भरनी थी। वे उसके बड़े भाई की फीस पहले ही अदा कर रहे थे और अब प्रिया और उसके बाद हिमांशु भी स्कूल जाने लायक हो गया था! उन्होंने पड़ोसियों से अपनी इस परेशानी का ज़िक्र किया और उन्होंने हमारे स्कूल की जानकारी दी।

और इस तरह जुलाई 2014 से प्रिया और हिमांशु हमारे स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। दोनों ही बहुत खुशमिजाज़, चंचल बच्चे हैं और हमें खुशी है कि वे हमारे स्कूल में पढ़ाई करते हुए अपना समय प्रसन्नतापूर्वक गुज़ारते हैं! उनके अभिभावक भी खुश है: उनके बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और रोज़ उन्हें गर्मागरम भोजन भी मुफ्त प्राप्त हो जाता है। उनके लिए यह बहुत बड़ी मदद है और उनके बच्चों के लिए यह सुखद भविष्य की नीव है।

आप भी किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके हमारी इस परियोजना में सहभागी हो सकते हैं।

मालाएँ बेचकर इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके – हमारे स्कूल के बच्चे – 7 नवंबर 2014

आज पुनः अपने स्कूल के बच्चों से आपका परिचय करवाने का समय है। उनके नाम कीर्ति और सुमित हैं और वे क्रमशः छह और दस साल के हैं। दोनों ने इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है।

इस साल अप्रैल माह में जब हम उनके घर जा रहे थे तो हमें एक सँकरे दरवाज़े से भीतर जाना पड़ा, जिसके बाद उतनी ही सँकरी सीढ़ियाँ चढ़कर हम उनके छोटे से घर तक पहुँच सके, जो पहली मंज़िल पर ही स्थित है। हम एक लगभग खुली बालकनी पर खड़े थे, जहाँ से थोड़ा आगे की तरफ दो कमरे दिखाई दे रहे थे।

कीर्ति की माँ ने परिवार के सभी सदस्यों को बुलाया और तब कीर्ति और सबसे छोटे सुमित से और उनके भाई और उनके पिता से हमारा पहला परिचय हुआ। बच्चों में सबसे बड़ा उनका भाई मनोज है, जो एक दूसरे स्कूल में 7वीं कक्षा में पढ़ता है। वे जानते थे कि सभी बच्चों की फीस अदा करना उनके बस की बात नहीं है लिहाजा उन्होंने सोचा कि सुमित और कीर्ति को हमारे स्कूल में भर्ती करवा दिया जाए।

मालाएँ, जैसे भगवानों के चित्रों या छोटी-छोटी मूर्तियों वाली कंठियाँ आदि बनाकर बेचने का परिवार का व्यवसाय है, जिसे कीर्ति का पिता अपने भाई के साथ मिलकर संभालता है। उनके घर में हर तरह के मनके उपलब्ध हैं, जिन्हें धागे में पिरोकर और कई जगह गठानें लगाकर वे एक लटकन लटका देते हैं। उनके पास एक ठेला भी है और जब कोई धार्मिक उत्सव या यात्रा होती है तो ठेले पर सामान रखकर वे सड़कों के किनारे चलते हुए या कहीं रुककर अपना सामान बेचते हैं।

वृन्दावन तीर्थयात्राओं का शहर है इसलिए यहाँ बहुत से लोग परिक्रमा के लिए आते रहते हैं। ये तीर्थयात्री उनके संभावित ग्राहक होते हैं-और यह परिवार अपनी आजीविका के लिए उनके द्वारा की जाने वाली खरीदारी पर निर्भर होता है। उन्होंने हमें बताया कि कैसे हिमालय पर हुए पिछले साल के भयंकर हादसे के बाद उनका धंधा मंदा पड़ गया है क्योंकि उसके बाद से तीर्थयात्रियों की संख्या में कमी आ गई है।

फिर ठीक इस आर्थिक तंगी के बीच कीर्ति बुरी तरह बीमार पड़ गई। वे पहले ही परेशानी में थे, उसकी दवाइयों खरीदने में उनकी बची-खुची पूंजी भी स्वाहा हो गई और उनके पास स्कूल की फीस अदा करने के लिए कुछ भी न बचा। स्कूल ने उसे वार्षिक परीक्षा में बैठने की इजाज़त नहीं दी, बल्कि स्कूल से ही निकाल बाहर किया।

इस तरह वे हमारे पास आ गए, इस आशा में कि उनके दो बच्चे हमारे स्कूल में मुफ़्त पढ़ाई कर सकेंगे, जिससे उन्हें स्कूल फीस और पढ़ाई के दूसरे अतिरिक्त सामान्य खर्चों का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा।

अब सुमित तीसरी और कीर्ति यू के जी में पढ़ रहे हैं। दोनों ही कुछ शर्मीले और संकोची हैं लेकिन पढ़ने में तेज़ हैं और जब वे आपसे खुलते हैं तो ज़ोर-शोर से ठहाकों के साथ हँसते हैं। उन्हें हँसते-खिलखिलाते और सीखते-पढ़ते देखना हमारे लिए बड़े संतोष और ख़ुशी की बात होती है!

आप भी सुमित और कीर्ति जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित कीजिए!

फ्लैट स्क्रीन टीवी तो है मगर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए पैसा नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे – 3 अक्टूबर 2014

आज मैं आपका परिचय एक शर्मीले लड़के से करवाना चाहता हूँ, जिसके दिमाग में बहुत सी शरारतें भरी हुई हैं। उसका नाम मोहित है और वह आठ साल का है लेकिन इसी साल से उसने स्कूल जाना शुरू किया है। वह पहले स्कूल क्यों नहीं जा सका? पैसों की समस्या के चलते।

उनका घर बहुत जर्जर अवस्था में है और जब हम उनसे कारण पूछते हैं तो हमें बताया जाता है कि उन्होंने एक साल पहले कुछ कर्ज़ लिया था और उनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा उस कर्ज़ की किश्तें भरने में ही चला जाता है। इतना ही नहीं, बार-बार उन्हें घरेलू खर्चों में मदद के लिए अपने रिश्तेदारों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है।

मोहित का पिता एक पुरोहित है और वृन्दावन में यह धंधा करने वाले हजारों की संख्या में हैं। इतने लोगों की भीड़ जब लोगों के धार्मिक संस्कार और कर्मकांड कराने के लिए मौजूद हो तो ज़ाहिर है कि हर एक को कठोर प्रयास करना पड़ता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उसे इस सेवा के लिए चुनें। तो, उनमें से कोई भी काम तो कुछ ज़्यादा नहीं पाते लेकिन ऐसी कोई जगह पाने की अथक कोशिश में जुटे रहते हैं, जहाँ उनकी ज़रुरत हो। मंदिरों में जाकर वे पता करते हैं कि कोई बड़ा समारोह होने जा रहा हो तो वे सहायक के रूप में वहाँ कोई काम कर सकें। वृन्दावन के बाहर से आने वाले तीर्थयात्रियों से मिलकर बात करने वाले वे पहले पुरोहित होते हैं कि उनसे कोई धार्मिक संस्कार करवाना चाहें तो वे तुरंत उपलब्ध हो सकें। स्पष्ट है कि उनके पास नियमित आमदनी का कोई ज़रिया नहीं है। धार्मिक उत्सवों के दौरान वे कुछ ज़्यादा कमा लेते हैं लेकिन बाकी समय वे विभिन्न आश्रमों के चक्कर लगाते रहते हैं कि कुछ रुपयों के बदले वे वहाँ होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में सहायक के रूप में कोई छोटा-मोटा काम कर सकें।

इसलिए मोहित की बड़ी बहन, तीन सहोदरों में सबसे बड़ी, वृन्दावन के एक और चैरिटी स्कूल में पढ़ने जाती है, जहाँ उन्हें कोई फीस नहीं देनी पड़ती। वह एक धार्मिक प्रभाव वाला स्कूल है और वह सिर्फ लड़कियों का स्कूल है। उसका भाई एक सरकारी स्कूल में पढ़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्हें स्कूल फीस नहीं देनी पड़ती मगर दूसरे खर्च तो होते ही हैं: किताब-कापियाँ, टिफिन-कम्पास बॉक्स, वर्दी और बहुत सी दूसरी चीजें। इसके अतिरिक्त वहाँ की पढ़ाई का स्तर बहुत नीचा है और होमवर्क करके न लाने पर या शैतानी करने पर बच्चों की पिटाई भी की जाती है।

लड़कों को, एक लड़के को भी, निजी स्कूल में, जहाँ वे कुछ ठीकठाक पढ़ाई कर सकें, भर्ती कराने के लिए आवश्यक पैसे अभिभावकों के पास कभी नहीं हो पाते थे। आखिर जब उन्होंने हमारे स्कूल के बारे में सुना तो राहत की साँस ली: एक जगह, जहाँ उनका बेटा मुफ्त पढ़ सकेगा और स्कूल में उसे मार भी नहीं खानी पड़ेगी! वह बारहखड़ी जानता था, अपने बड़े भाई से उसने और भी बहुत कुछ सीख रखा था और इसलिए वह आज भी बड़ा प्रसन्न रहता है कि अपने सहपाठियों से पहले से ही वह कुछ आगे है।

एक बात और, जिसे देखकर हम आश्चर्यचकित रह गए, यह थी कि जब हम मोहित के घर गए तो लकड़ी के पल्ले की बगल में, जिस पर बच्चे सोते हैं, खिड़की के नीचे, अखबार से ढँका एक बड़ा सा सूराख है, जहाँ एक बड़ा सा फ्लैट टीवी रखा था! माँ से पूछा कि यह कहाँ से आया? इतना खर्च करने की उनकी हैसियत नहीं थी। टीवी उसके पति के एक धनी यजमान ने उपहार स्वरुप दिया था। एक श्रद्धालु व्यक्ति, जिसके यहाँ कभी उसने कोई धार्मिक कर्मकांड किया था। स्वाभाविक ही, उस सेठ ने यही सोचा होगा कि इस गरीब ब्राह्मण परिवार के लिए महंगा फ्लैट टीवी बहुत आवश्यक है!

लेकिन हमारा विश्वास यह है कि बच्चों के लिए शिक्षा अधिक आवश्यक है, जिससे उनका भविष्य उनके वर्त्तमान से बेहतर हो सके!

अगर आप हमारे इस प्रयास में सहभागी होना चाहते हैं तो किसी एक बच्चे को या स्कूल के सारे बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें, आपके सहयोग का स्वागत करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता होगी!

जब आर्थिक समस्याओं के बावजूद लड़के बेहतर शिक्षा प्राप्त करते हैं – 11 जुलाई 2014

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल की दो लड़कियों से करवाना चाहता हूँ। दस वर्षीय वर्षा पहले से हमारे स्कूल की विद्यार्थी है जबकि सात साल की काजल स्कूल की नई विद्यार्थी है।

वर्षा का पिता मालाएँ और दूसरी पूजा की वस्तुएँ बनाता है जिन्हें वह सड़क के किनारे छोटी सी दूकान लगाकर बेचता है। यह धंधा मुख्य रूप से धार्मिक त्योहारों और धार्मिक छुट्टियों पर निर्भर होता है, जब श्रद्धालु अधिक संख्या में बाहर से वृन्दावन आते हैं। इसके अलावा सही समय पर सही जगह समुचित सामान लेकर उपस्थित रहना भी आवश्यक होता है। हम जानते हैं कि यह धंधा आपको अमीर नहीं बना सकता लेकिन जब हमने उसकी पत्नी से पूछा कि उसका पति कितना कमाता है तो हमें कोई स्पष्ट उत्तर प्राप्त नहीं हुआ: वह बिल्कुल नहीं जानती थी। पैसे से और घर खर्च कैसे चलता है, इस बात से उसे कोइ मतलब नहीं था। वह पूरे समय घर में रहकर बच्चों की देखभाल में ही मगन रहती है।

उनका परिवार एक मकान के एक कमरे में रहता है और मकान में वर्षा के पिता के अलावा उसके तीन भाई अपने-अपने परिवारों को लेकर साथ रहते हैं। यानी, हालांकि घर काफी बड़ा है मगर जब सारे सदस्य घर पर मौजूद होते हैं तब वहाँ काफी भीड़-भाड़ हो जाती है। हर परिवार के पास एक कमरा है और उन सभी का अपना अलग काम-धंधा है। वे खाना भी अलग बनाते-खाते हैं। यह प्रदर्शित करता है कि सम्मिलित परिवारों की भारतीय परंपरा धीरे-धीरे टूट रही है। जब हम वहाँ पहुंचे, दरवाजे पर ही हमें यह प्रीतिकर नज़ारा देखने को मिला जिसमें एक माँ अपने तेरह साल के बच्चे को नहला रही थी।

मज़ेदार बात यह है कि वर्षा ने अभी पिछले साल ही हमारे स्कूल से अपर के जी पास किया है जबकि काजल पास के एक सस्ते निजी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ रही थी और इस साल से हमारे स्कूल में पढ़ने आ गई, लेकिन हमारे यहाँ उसे पुनः शुरू से ही पढ़ना होगा और उसका दाखिला लोअर के जी में ही हो पाएगा। क्यों? क्योंकि पिछले स्कूल में सालों पढ़ाई करने के बावजूद वह ज़्यादा कुछ सीख नहीं पाई है। सिर्फ दो सालों में ही वर्षा ने इतना कुछ सीख लिया है कि उसके अभिभावकों ने निर्णय लिया और उसकी छोटी बहन को भर्ती कराने के लिए इस साल स्कूल सत्र शुरू होने पर वे सबसे पहले हमारे स्कूल में हाजिर हुए, जिससे उनकी छोटी लड़की को भी हमारे यहाँ जगह मिल गई।

कुछ भी हो वे अमीर नहीं हैं और इसीलिए उनके सबसे बड़े बच्चे को, जोकि उनका एकमात्र लड़का भी है, उन्होंने एक निजी स्कूल में भर्ती कराया है, जहाँ पढ़ाई भी कुछ बेहतर है। दोनों लड़कियाँ भी एक निजी स्कूल में ही पढ़ा करती थीं मगर वह सस्ता स्कूल था क्योंकि परिवार की हैसियत नहीं थी कि उन्हें भी बेहतर निजी स्कूल में पढ़ा सकें। तब भी उन्हें पढ़ाना उनके लिए आर्थिक बोझ ही था और जब उन्होंने हमारे स्कूल के बारे में सुना तो पहले वर्षा को हमारे यहाँ भर्ती करा दिया। अब हमारे स्कूल में दोनों लड़कियाँ अपने भाई से भी बेहतर शिक्षा प्राप्त कर पाएँगी और हमें आशा है कि यह शिक्षा उनके जीवन में सार्थक परिवर्तन ला पाएगी।

अगर आप इन लड़कियों की सहायता हेतु जारी हमारी योजनाओं का हिस्सा बनना चाहते हैं तो आप भी किसी एक बच्चे को या हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके ऐसा कर सकते हैं!

अभिभावकों के होते हुए क्या बच्चों का बोर्डिंग स्कूल माता-पिता की स्नेहिल छत्रछाया का विकल्प हो सकता है? 2 जून 2014

शिक्षा उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है। इसी ध्येय-वाक्य के आधार पर ही हम अपना चैरिटी स्कूल चला रहे हैं। मैं उसके औचित्य पर विश्वास करता हूँ और इसीलिए हम गरीब बच्चों को पूरी तरह मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन कई बार मुझे यह देखकर बड़ी हैरानी होती है कि अभिभावक, विशेष रूप से अमीर अभिभावक इस ध्येय को किसी भी कीमत पर प्राप्त करने के उद्देश्य से अपने बच्चों के साथ बहुत ज़्यादती कर बैठते हैं। कई बार मुझे लगता है कि शिक्षा की बलिवेदी पर वे प्रेम, परिवार और घर में मिलने वाली सुरक्षा और ऊष्मा की बलि चढ़ा देते हैं।

कुछ दिन पहले एक परिचित ने बताया कि उसके दोनों बच्चे एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहे हैं, जो वृन्दावन से 600 किलोमीटर दूर स्थित है। हर दूसरे सप्ताह सिर्फ अपने बच्चों से मिलने के लिए पति-पत्नी दोनों दस घंटों का लम्बा और कठिन सफ़र तय करते हैं। क्यों? क्योंकि वह एक प्रतिष्ठित स्कूल है और हमारे इलाके में उसके जैसी उत्तम शिक्षा प्रदान करने वाला दूसरा कोई स्कूल नहीं है। दोनों बच्चे पिछले छह साल से उस स्कूल में पढ़ रहे हैं और लड़का 18 साल का है और लड़की 16 साल की।

यह ऐसा अकेला व्यक्ति नहीं है। जिन लोगों की हैसियत है उनके लिए बहुत छोटी उम्र में ही अपने बच्चों को किसी अच्छे बोर्डिंग स्कूल में, जहाँ पढ़ाई के अतिरिक्त बहुत से दूसरे हुनर भी सिखाए जाते हैं, जहाँ बच्चों की प्रतिभा को प्रोत्साहित किया जाता है, उन्हें परवान चढ़ाया जाता है और फिर वहाँ से जो प्रमाणपत्र प्राप्त होता है वह उनके सामने देश के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों के दरवाज़े खोल देता है। फिर उन्हें सफलतम प्रबंधक, इंजीनियर या डॉक्टर बनने से कोई नहीं रोक सकता और यहाँ तक कि वे विदेशों में जाकर बसने की संभावनाएं भी खुल जाती हैं। यह एक बड़ा सुनहरा सपना होता है और वे अपने बच्चों के लिए उसे संभव बनाने में कोई कसर नहीं रखना चाहते।

वे सोचते हैं कि बच्चों के लिए जो भी अच्छा वे कर सकते थे, कर रहे हैं। मगर मैं ऐसा नहीं सोचता।

वास्तव में, मुझे लगता है कि यह बच्चों के लिए अच्छा नहीं है। अपनी दस साल की बच्ची को अपने प्यारे माँ-बाप से सैकड़ों किलोमीटर दूर भेजना आपके लिए ज़रूरी क्यों होना चाहिए? हाँ, उसे वहाँ एक से एक शानदार खेल खेलने का या आयातित रंगों से चित्रकारी करने का मौका मिलता है और हाँ, उसे अपने आसपास के स्कूलों में उपलब्ध शिक्षकों से बेहतर शिक्षक वहाँ उपलब्ध होते हैं। भविष्य में उसके लिए अच्छे विश्वविद्यालयों के दरवाज़े खुल सकते हैं, जिससे उसे बेहतर नौकरी और अच्छा पैसा कमाने का मौका मिल सकता है। लेकिन निश्चय ही उसका स्नेहिल परिवार उससे छीन लिया जाता है। माँ का प्यार और उसकी स्नेहसिक्त देखभाल से वह वंचित रह जाती है और उसकी जगह उसे ऐसे लोगों की देखभाल और सुरक्षा प्राप्त होती है जो उसे एक कर्तव्य की तरह करते हैं। भले ही वे यह काम बहुत अच्छी तरह से अंजाम दें मगर दोनों में बहुत फर्क होता है।

आप माता-पिता क्यों बने हैं? अपने बच्चों से प्यार करने के लिए, उनकी देखभाल करने, उनका लालन-पालन करने और उनके साथ रहने के लिए? उन्हें गले लगाने के लिए, उनके साथ खेलने के लिए, उनके साथ हंसी-मज़ाक करने के लिए और दुख-सुख उनके साथ साझा करने के लिए? या महान इंजीनियरों या डॉक्टरों का निर्माण करने के लिए? अपने बच्चों को अपने से दूर रखने के लिए?

मैं दिल की गहराइयों से महसूस करता हूँ कि अभिभावकों को अपने बच्चे को अधिक से अधिक प्यार और नजदीकी प्रदान करनी चाहिए क्योंकि एक दिन ऐसा आने ही वाला है जब वे इतने बड़े हो जाएंगे कि अपना अलग घर बसा लेंगे और आपसे दूर हो जाएंगे। जब उनके लिए आपकी यानी अपने माता-पिता की ज़रूरत समाप्त हो जाएगी। बहुत ज़्यादा न पढ़ पाना बहुत बुरी बात नहीं है। उनके साथ बिताया एक एक पल और वास्तव में हर वह व्यवहार जो आप उनके साथ मिलकर करते हैं मेरी नज़र में सुदूर स्थित अच्छे स्कूल की पढ़ाई और वहाँ प्राप्त हर तरह के हुनर से ज़्यादा कीमती है।

क्योंकि सिर्फ आप हैं, जो अपने बच्चे को माता-पिता का प्यार दे सकते हैं।

तापमान 48 डिग्री और एक पंखा तक नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे – 2 मई 2014

आज मैं आपको योगमाया और नीरज से मिलवाना चाहता हूँ, जो क्रमशः 12 और 10 साल के हैं।

योगमाया और नीरज की 13 साल की एक बड़ी बहन और 8 साल का छोटा भाई भी है। उनकी बड़ी बहन ने हमें बताया कि वह तीसरी कक्षा तक स्कूल गई थी लेकिन वहाँ शिक्षक क्या पढ़ा रहे हैं, कुछ समझ ही नहीं पाती थी इसलिए उसने स्कूल छोड़ दिया। मगर उसे स्कूल छूटने का कोई गम नहीं है-अब वह घर के कामों में माँ की मदद करती है और इस स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट है। चौथी कक्षा में पढ़ रही योगमाया पढ़ाई में अपनी बड़ी बहन से काफी आगे निकल चुकी है और यहाँ तक कि नीरज भी, जो अभी पहली कक्षा में है, अपनी सबसे बड़ी बहन की तुलना में ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ पढ़ और लिख पा रहा है।

बच्चों का पिता एक मजदूर है, जो ईंटों की ढुलाई का काम करता है। ईंट के भट्ठों से रोजाना हजारों ईंटें भवन-निर्माण-स्थलों तक लाई जाती हैं और उन्हें एक-एक कर ट्रैक्टरों पर चढ़ाने-उतारने का श्रमसाध्य काम वह करता है। इतना कठिन काम होने के बावजूद उसे रोज़ एक नया ठेकेदार ढूँढ़ना पड़ता है। शाम को उसे मजदूरी मिलती है और जिस दिन काम नहीं होता, वह खाली हाथ घर लौटता है।

ऐसे मौकों पर उनकी भैंस उनके बहुत काम आती है। वे हिसाब लगाते हैं कि उसका कितना दूध बेचकर उन्हें कितनी अतिरिक्त आमदनी हो सकती है। दुर्भाग्य से दो साल पहले बच्चा देने के बाद उसने अब तक कोई और बच्चा नहीं जना है। इस समय वह सिर्फ एक लीटर दूध देती है, जिसे वे घर में ही बच्चों के पीने के लिए या घी, दही आदि बनाने के लिए रख लेते हैं।

आजकल भैंस सामने पड़ी ज़मीन पर खड़ी पगुराती रहती है। यह ज़मीन बहुत पहले उनके परिवार ने इस उम्मीद में खरीदी थी कि आगे चलकर वे उस पर एक ठीक-ठाक मकान बनवा सकेंगे। फिलहाल वे जिस घर में रह रहे हैं, वह ईंटों का बना महज एक कमरा है, जिसका सामने का हिस्सा एक टिन की चादर से ढंका रहता है और दरवाजे के नाम पर सामने एक पुराना कंबल लटका (टंगा) रहता है। योगमाया बताती है कि वह और उसकी बहन अपने घर में नहीं सोतीं क्योंकि पंखा न होने के कारण इस गर्मी में सोना मुश्किल होता है। वे दोनों अपनी दादी के यहाँ जाकर सोती हैं क्योंकि उनके यहाँ पंखा है।

उनके घर पर नज़र पड़ते ही हम समझ गए कि यही लोग हैं, जिनके लिए हम अपना स्कूल चला रहे हैं। बच्चे, जिनके परिवार दूसरे किसी स्कूल का खर्च वहन नहीं कर सकते और पढ़ने के लिए जिन्हें हमारे स्कूल की वाकई ज़रूरत है। योगमाया पढ़ाई में काफी अच्छी है हालांकि वह बहुत बातूनी भी है। नीरज दिन भर ऊधम करता रहता है और परीक्षा में उसके नंबर भी यही ज़ाहिर करते हैं। लेकिन दोनों की ही पढ़ाई में उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है और उनकी शिक्षिकाएँ जानती हैं कि उनके लिए पढ़ना-लिखना कितना ज़्यादा ज़रूरी है। हम उनके मस्तिष्क में विद्या का संचार करना चाहते हैं, जो उन्हें अपना भविष्य बेहतर बनाने में उनकी मदद करेगा।

योगमाया और नीरज जैसे बच्चों की मदद करने के हमारे महती काम में अगर आप भी हाथ बटाना चाहते हैं तो किसी एक बच्चे को प्रयोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके आप ऐसा कर सकते हैं। धन्यवाद!