इस संज्ञान का मुकाबला कैसे करे कि आप ज़्यादा दिन ज़िंदा नहीं रहने वाले हैं? 28 अक्टूबर 2015

आर्थिक और आपसी संबंधों से जुड़ी समस्याओं पर लिखने के पश्चात् आज मैं एक ऐसी बिल्कुल अलग प्रकार की मुसीबत के विषय में लिखना चाहता हूँ जो आपकी दुनिया को झँझोड़कर रख देती है: जब आपको पता चलता है कि खुद आप या आपका कोई बहुत करीबी व्यक्ति किसी घातक बीमारी से या किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या से ग्रसित है। निश्चय ही मैं सर्दी-खाँसी जैसी सामान्य व्याधिओं की चर्चा नहीं कर रहा हूँ-जी नहीं, मेरा मतलब कैंसर जैसी बीमारियों या जानलेवा अपघातों से है, जहाँ घायल व्यक्ति अपनी हड्डियाँ तुड़वा बैठा है या पक्षाघात-ग्रस्त हो गया है। ऐसी स्थितियों का मुक़ाबला कैसे करें?

स्वाभाविक ही, मैं कोई चिकित्सकीय सलाह देने नहीं जा रहा हूँ। उसके लिए आपको बहुत सारे काबिल डॉक्टर मिल जाएँगे, जो आपकी या आपके प्रियकरों की हर संभव चिकित्सा कर सकेंगे। मैं सिर्फ समस्या के भावनात्मक और मानसिक पहलुओं पर दृष्टि डालूँगा।

बीमारी और मौत दो ऐसी परिस्थितियाँ हैं जहाँ आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प होता है: उन्हें स्वीकार करना।

और यह बात कहने में जितनी आसान है उस पर अमल करना उतना ही कठिन है और मैं जानता हूँ कि जो भी इस परिस्थिति से गुज़र रहा होता है, जानता है कि वास्तव में यह कितना कठिन है। अगर आप जानते हैं कि एक या दो साल से अधिक आपका जीना संभव नहीं है। जब आपको पता चलता है कि अब आपको अपने पैरों का एहसास नहीं होगा क्योंकि आप लकवाग्रस्त हो चुके हैं। जब आपको पता चलता है कि आपकी पत्नी के हाथ कट जाने के बाद आपकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाने वाली है।

मुद्दे की बात यह है कि ऐसे मामलों में आपके पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि आप परिस्थिति को स्वीकार कर लें। इस सच्चाई को स्वीकार करें और यह सुनिश्चित करें कि इस कठिन परिस्थिति में भी आप अच्छे से अच्छा क्या कर सकते हैं।

अगर आप या आपका कोई प्रियकर जानता है कि आपमें से किसी एक के पास बहुत कम जीवन बचा है तो पूरी कोशिश करें कि ये कुछ दिन, सप्ताह या महीने अधिक से अधिक सुखद हों। उनके लिए, जो अभी काफी समय तक करीब रहने वाले हैं, बहुत सारी उल्लासपूर्ण स्मृतियों को सँजोने की कोशिश करें। उन बातों को अंजाम दें, जिन्हें आप करना चाहते थे और हमेशा बाद में करने के लिए टाल देते रहे थे। संसार की खूबसूरती का उन लोगों के साथ आनंद लें, जिन्हें आप प्रेम करते हैं। यदि आपमें थोड़ी-बहुत लिखने की प्रतिभा है तो मैं सलाह दूँगा कि आपके मन में होने वाली हलचलों को लिखकर रख लें, जिससे इन्हीं परिस्थितियों से गुज़रने वाले दूसरे लोग आपके अनुभवों से शक्ति प्राप्त कर सकें!

यदि आप इन परिस्थितियों से बचकर निकल आते हैं तो उनके हर लमहे की कदर करें, उन्हें शिद्दत के साथ याद रखें, भले ही उन परिस्थितियों ने आपका नुकसान किया हो या आपके जीवन में उनके कारण स्पष्ट परिवर्तन आ गया हो! क्योंकि कितनी भी बुरी परिस्थिति से आप गुजरे हों, कोई न कोई होता है जो आपसे भी बुरी परिस्थिति से गुज़र चुका होता है। आपने उस प्रेरणादायक वक्ता का वीडियो देखा होगा, जिसकी बाहें और पैर नहीं हैं! जीने के आनंद के बारे में बात करते हुए उसे देखना अपने आपमें असाधारण और विस्मित करने वाला अनुभव है! न देखा हो तो उस वीडियो को अवश्य देखें।

जिन परिस्थितियों के साथ आपको आगे भी गुज़ारा करना है, उनको सहजता के साथ स्वीकार करते हुए, तदनुसार अपना भविष्य का संसार रचें। एक बार, जब आप उन्हें स्वीकार करने लगेंगे, आप नोटिस करेंगे कि आपकी परवाह करने वाले बहुत से करीबी लोग आपकी सहायता के लिए आगे आते जा रहे हैं और आपकी हर संभव मदद के लिए प्रस्तुत हैं। न सिर्फ अपनी विकट परिस्थितियों को स्वीकार करें बल्कि उस मदद को भी स्वीकार करें, जिनकी आपको सख्त ज़रूरत है।

निश्चित ही यह कठिन है लेकिन एक बार आप उन्हें स्वीकार करने लगें तो वे आसान होती जाएँगी और उनमें आपको जीवन की कई सकारात्मक बातें भी नज़र आने लगेंगी।

मृत्यु संबंधी बच्चे के प्रश्न का एक नास्तिक के रूप में क्या जवाब दें – 3 सितंबर 2015

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि हम अपरा से बहुत बातें करते हैं। उसने बहुत जल्दी बोलना शुरू कर दिया था और हमेशा से वह बहुत समझदार रही है और जो कुछ भी उसे बताया जाता है, तुरंत समझ जाती है। शुरू से हमने सोचा था कि अपने आसपास घटित होने वाली हर बात उसे अच्छी तरह समझाएँगे लेकिन उसकी तीक्ष्ण बुद्धि को देखते हुए हम उसे और अधिक उत्साह से सारी बातें बताते हैं। और मृत्यु की जिज्ञासा भी उसमें शामिल है- जो काफी समय पहले ही उसके साथ हमारी चर्चा में शामिल हो चुकी है।

आप जानते ही हैं कि जब अपरा सिर्फ ग्यारह माह की थी तब मेरी माँ अचानक चल बसीं। हमारे लिए आज भी वे कुछ माह बहुत मूल्यवान हैं, जब अपरा अपनी दादी के साथ समय बिताया करती थी। बब्बाजी के कमरे में अम्माजी के साथ उसके बड़े-बड़े चित्र लगे हुए हैं और एक दिन उन्हें देखकर अपरा ने पूछा: 'अम्माजी कहाँ हैं?'

भारत में ज़्यादातर लोग इसका उत्तर इस तरह देते हैं: 'वह भगवान के पास चली गई हैं' या 'भगवान उसे अपने साथ ले गए' आदि, आदि। अपने यूरोपियन मित्रों से मैंने सुना है कि वहाँ भी ऐसी स्थिति में अक्सर इसी तरह के जुमलों का इस्तेमाल होता है, उनके द्वारा भी, जो वैसे धार्मिक नहीं है, ईसाई चर्च के औपचारिक सदस्य भर हैं, साल में एकाध बार चर्च जाते हैं और ईश्वर पर भी कोई आस्था नहीं रखते। वे समझते हैं कि मृत्यु की वास्तविकता को समझाने का इससे आसान तरीका दूसरा नहीं है।

स्वाभाविक ही, हमारे पास यह विकल्प उपलब्ध नहीं था। मैं कई बार सोचता हूँ कि क्या इस तरह के उत्तरों का उल्टा असर नहीं होता होगा! धार्मिक लोग यह तो नहीं चाहते होंगे कि बच्चा भगवान पर नाराज़ हो कि उसने दादी को उसके साथ खेलने के लिए नहीं छोड़ा, बल्कि अपने साथ अपने घर ले गया! दरअसल वह तो बड़ा निर्दयी जान पड़ता है! भगवान आपके प्रियकरों को आपसे छीनकर ले जाता है और आप बाद में कभी उससे मिल भी नहीं सकते! ऐसे तो बच्चे हमेशा-हमेशा के लिए भगवान से डर जाते होंगे!

इसीलिए हम अपरा को यही बताते हैं कि हर कोई धीरे-धीरे बूढ़ा होता है और समय आने पर मर जाता है। उसके बाद वे लोग कभी वापस नहीं आ सकते। यह दुखद है मगर ऐसा ही होता है। इसी तरह जानवर भी मरते हैं और पेड़-पौधे भी। फूलों के साथ ऐसा होता हुआ उसने देखा है, उसने जानवरों की कहानियाँ सुनी हैं और यह समझ चुकी है कि उसकी दादी यानी मेरी माँ मर चुकी है और कभी लौटकर नहीं आएगी।

वास्तव में वह इसे अच्छी तरह समझती है। दूसरी बात जो उसने समझी है, वह यह है कि मेरी नानी जी भी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी हैं। पहले भी वह यह जानती थी लेकिन अब इस तथ्य के साथ एक दूसरा पहलू भी जुड़ गया था! इसलिए एक दिन वह नानी जी के पास गई और उनसे पूछा: 'क्या आप बूढ़ी हो चुकी हो?' और जब नानी जी ने सहमति जताई तो तुरंत उसने यह प्रश्न जड़ दिया: 'तो क्या आप भी जल्दी ही मर जाओगी?'

गज़ब! मेरी नानी निश्चित ही सोच रही होंगी कि न जाने इसके दिमाग में ऐसे विचार कहाँ से आते होंगे, लेकिन उन्होंने इससे भी सहमति जताई और कहा: 'हाँ, शायद मैं जल्दी ही मर जाऊँगी लेकिन कब, कोई नहीं जानता।'

मुझे लगता है कि जब भी ऐसा दुखद दिन आएगा, मेरी बेटी, अपरा भरसक पहले से तैयार होगी। कम से कम उसकी हालत उससे बेहतर होगी जब किसी कारण हमने इस प्रश्न से किनारा किया होता या उसकी जिज्ञासा का उत्तर ठीक तरह से समझाकर नहीं बताया होता। मृत्यु जीवन का एक हिस्सा है, कडुवी सचाई है और भले ही जब अपना कोई स्नेही जुदा होता है तो दुःख तो होता ही है लेकिन इस बात को स्वीकार करना ही पड़ता है। और उसके लिए पहले से तैयार होना कितनी अच्छी बात है?

अपरा इस मामले में ठीक राह पर है। उसने नानी जी के कथन पर सहमति में सिर हिलाया लेकिन उसके बाद अपनी बात इस लहजे में कही, जैसे वह भी हकीकत जानती हो: 'हाँ, लेकिन हम सब आपको मिस करेंगे। मुझे बहुत रोना आएगा।'

नानी जी ने जवाब दिया: 'बिल्कुल! ज़रूर रोना आएगा!' और एक अजीब सी ख़ुशी से भर उठीं!

संथारा की मूर्खतापूर्ण परंपरा की वजह से आत्महत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता! 26 अगस्त 2015

सोमवार को मैं एक टी वी परिचर्चा के लिए बहुत लघु-सूचना पर दिल्ली गया था। चर्चा का विषय था, संथारा, जो जैन समुदाय की एक धार्मिक प्रथा है। पहले मैं आपको बताता हूँ कि ठीक-ठीक यह प्रथा है क्या और इस विषय पर अभी अचानक टी वी चर्चा क्यों आयोजित की गई और इस पर मेरा रुख क्या रहा, यह भी स्पष्ट करूँगा।

संथारा, जिसे सल्लेखना भी कहते हैं, जैन धर्म में आस्था रखने वालों की एक प्रथा है, जिसके अनुसार 75 साल से अधिक उम्र वाले लोग स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। जैन धर्म का कोई वृद्ध व्यक्ति यदि यह महसूस करता है कि जीने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है, अगर वह मुक्ति चाहता है, अगर उसे लगता है कि संसार को उसकी ज़रूरत नहीं है या स्वयं उसे संसार की ज़रूरत नहीं रह गई है तो वह व्यक्ति खाना-पीना छोड़ देता है। अब वह एक कौर भी मुँह में नहीं डालेगा, न ही एक घूँट पानी पीएगा। वह भूख और प्यास सहन करते हुए मौत को गले लगाएगा-और उसके सधर्मी नाते-रिश्तेदार और मित्र उसकी प्रशंसा करेंगे।

अतीत में इसी तरह से उनके संतों ने प्राण त्यागे थे और मरने के इसी तरीके को जैन धर्म गौरवान्वित करता है। लेकिन हाल ही में हाई कोर्ट ने इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी है क्योंकि कोर्ट उसे आत्महत्या मानता है।

स्वाभाविक ही, जैन समुदाय इससे नाराज़ है और न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने का विचार कर रहा है, जिससे इस पाबंदी को हटवाया जा सके। उनका कहना है कि कोर्ट या क़ानून प्राचीन समय से चली आ रही इस प्रथा और परंपरा को वर्जित घोषित नहीं कर सकते।

तो इस विषय पर मैं इन पाँच महानुभावों के साथ टी वी पर बहस कर रहा था। मैंने साफ शब्दों में कहा कि यह आत्महत्या के सिवा और कुछ नहीं है-और इसीलिए कोर्ट ने उस पर पाबंदी लगाई है! भारत में हर साल लगभग 200 लोग इस तरीके से खुद अपनी जान ले लेते हैं! अगर कोई भूख-हड़ताल पर बैठता है तो सरकार उसे मरने नहीं देती- बल्कि वह उसे ज़बरदस्ती खाना खिलाती है! और इधर आप खाना-पीना छोड़ देते हैं कि मर जाएँ-क्या फर्क है, दोनों में?

मेरी बात का ज़बरदस्त विरोध हुआ- यह कहते हुए कि यह आत्महत्या नहीं है बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाने वाला तप है। आत्मा जानती है कि उसका समय पूरा हो गया है और पुनर्जन्म के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी है।

मैंने उनके इस जवाब का खण्डन करते हुए कहा कि यह महज बकवास है और आत्मा या पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ नहीं होती। अगर आप उन्हें खुद की हत्या की इजाज़त देते हैं तो आपको सभी को आत्महत्या की इजाज़त देनी होगी। फिर ऐसा कानून बनाइए कि सभी अपनी मर्ज़ी से मृत्यु का वरण कर सकें- तब हर कोई, जब उसकी मरने की इच्छा होगी, अपनी हत्या का निर्णय ले सकेगा। लेकिन आप यह अधिकार सिर्फ अपने लिए रखना चाहते हैं क्योंकि दूसरों को इसकी इजाज़त ही नहीं है! और ऐसी मौत को आप गौरवान्वित कर रहे हैं, जिससे लोग उनका अनुसरण करने लगें! आप उन्हें आत्महत्या करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं!

उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज भी सदा से इस प्रथा का पालन करते रहे हैं। एक वकील ने, जो इस पाबंदी का विरोध कर रहे हैं, दावा किया कि यह आत्महत्या है ही नहीं क्योंकि आत्मा समय आने पर ही अपने शरीर का त्याग करेगी। इस तरह लोग बिना खाए-पिए महीनों और सालों पड़े रहते हैं। इसके अलावा युवकों को संथारा लेने के लिए नहीं कहा जाता, सिर्फ 75 साल से अधिक उम्र वाले ही संथारा ले सकते हैं।

मेरे विचार से यह कोई तर्क नहीं है कि 'हमारे पूर्वज यही किया करते थे'! इसका अर्थ यह नहीं है कि यह ठीक है और सिर्फ इसलिए कि अतीत में वे कोई गलत बात कर रहे थे इसलिए आपको भी वही करते चले जाना चाहिए! यही तर्क हिंदुओं की सती प्रथा के लिए भी दिया जाता था, जिसमें पति की चिता के साथ पत्नी भी आत्महत्या कर लेती थीं! जब तक उस पर पाबंदी नहीं लगी थी, वास्तव में उन्हें इस परंपरा का अनुपालन करने के लिए मजबूर किया जाता था यहाँ तक कि जबर्दस्ती मृत पति की चिता में झोंक दिया जाता था! तब भी बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया था- लेकिन आखिर किसी देश के क़ानून धर्म या परंपरा के अनुसार नहीं बनाए जा सकते!

आपका यह तर्क भी, कि संथारा सिर्फ वृद्ध व्यक्ति ही ले सकते हैं, एक बेहद कमजोर तर्क है! क्योंकि इस बात का निर्णय कौन करेगा कि कौन वृद्ध है और कौन वृद्ध नहीं है? यह दावा कौन कर सकता है कि वृद्ध लोग समाज के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं या उस पर बोझ बन गए हैं? आप उनके मन में यह विचार क्यों डालना चाहते हैं कि आप 75 साल के हो गए हैं इसलिए अब आपको मरना होगा? बहुत से राजनीतिज्ञ और दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अस्सी-अस्सी साल से ज़्यादा उम्र के हो चुके हैं और अपना काम भलीभाँति अंजाम दे रहे हैं! यह देखते हुए कि मेरी नानी मेरी बेटी के लिए कितनी मूल्यवान है, मैं इस मूर्खतापूर्ण परंपरा की खातिर उसे खोना नहीं चाहूँगा! वह इस समय 95 साल की है, शायद उससे भी अधिक- यानी इस तरह हम उसे 20 साल पहले ही खो चुके होते!

और मैं इस बात का जवाब भी देना पसंद नहीं करूँगा कि कोई व्यक्ति एक घूँट पानी पिए बगैर भी एक माह तक ज़िंदा रह सकता है- सालों जीवित रहने की बात तो छोड़ ही दीजिए! यह बकवास के सिवा कुछ नहीं है और मेरी नज़र में पाखंडियों का बहुत बड़ा कपटपूर्ण दावा है- आखिर धार्मिक धोखेबाज़ों का तो काम ही यही है!

मेरा विश्वास है कि यह पाबंदी बनी रहेगी और मेरे खयाल से यह अच्छा ही है कि आखिरकार यह प्रथा भी समाप्त हो जाएगी।

‘मृत्यु के पश्चात जीवन’ (लाइफ आफ्टर डैथ) कार्यक्रम की तैयारी – 23 जुलाई 15

आश्रम में इस सप्ताहांत आयोजित हो रहे एक कार्यक्रम की तैयारियों में हम बुरी तरह व्यस्त हैं। हमने लोगों को हमारे यहाँ आने और देह-दानदाता के रूप में जुड़ने के लिए आमंत्रित किया है। वे इस बात से राज़ी होंगे कि उनकी मृत्यु के बाद किसी अस्पताल को उनका शरीर दान कर दिया जाएगा, जिससे चिकित्सा के क्षेत्र में प्रगति हेतु उनका उपयोग उपयोग किया जा सके!

सभी धर्मों में मृत्यु पश्चात जीवन संबंधी अपने-अपने तरह-तरह के धार्मिक कर्मकांड और रीति रिवाज होते हैं, जिन्हें पूरा किया जाना ज़रूरी माना जाता है। कुछ धर्म मृत शरीर को जलाते हैं, और कुछ दफनाते हैं। यह सब आत्मा की शांति के लिए, उसे स्वर्ग या जन्नत पहुँचाने के लिए या इसी प्रकार के विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। परंतु उस इन्सान के शरीर के साथ क्या किया जाए, जो इन ‘लाभों’ में या ‘आत्मा की शांति’ वगैरह में कोई रुचि नहीं रखता, क्योंकि इन सब बातों पर उसका कभी विश्वास ही नहीं रहा?

मुझे लगता है, इन सब कर्मकांडों के मुक़ाबले अपने शरीर को चिकित्सकीय प्रयोगों के लिए दान कर देना कहीं बेहतर विकल्प होगा। यदि आपके मृत शरीर का कोई अंग किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन बचाने में काम आ जाए, तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? इसलिए नहीं कि ऐसा करने पर आप आगे भी जीवित रहेंगे, बल्कि इसलिए कि मरने के बाद भी आप किसी के काम आए, आपने किसी का जीवन बचाने में मदद की! अगर आप वृद्ध हैं और आपके अंगों का उपयोग किसी दूसरे व्यक्ति के बीमार अंग के स्थान पर प्रत्यारोपित नहीं किया जा सकता तो भी आपका मृत शरीर चिकित्सा के क्षेत्र में प्रयोगों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है! न जाने कितने छात्र हैं, जिन्हें शरीर की और उसके विभिन्न अंगों में हो सकने वाली बीमारियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है, जिससे आगे चलकर वे उनका उपचार कर सकें, और यह काम वे आपके शरीर पर प्रयोग करके सीख सकते हैं!

काफी समय पहले मेरे पिताजी ने मुझसे यह पता लगाने के लिए कहा था कि कहाँ और किस प्रकार मृत्यु के बाद वे अपना शरीर दान कर सकते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे पिताजी वास्तव में बड़े खुले विचार रखते हैं और इस विचार की वे पहले से ही बहुत सराहना किया करते रहे हैं!

आखिरकार, इस सप्ताहांत, वे एक फार्म भरेंगे और इस बात को साबित करेंगे। मेरे कुछ नास्तिक मित्र हैं, जिनसे मेरा परिचय सोशल नेटवर्क साइटों पर हुआ है और शुक्रवार और शनिवार को हम सब मिलकर एक कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। हम लोग और भी बहुत से नास्तिक व्यक्तियों से मिलेंगे- क्योंकि सामान्यतया धार्मिक व्यक्ति इसमें रुचि नहीं लेंगे- और उन्हें भी इस विचार से परिचित करेंगे, उनके साथ बात करके, मिल-जुलकर एक-दूसरे को जानेंगे-समझेंगे, कुछ नए मित्र बनाएँगे और इस तरह बहुत से बीमार और घायल व्यक्तियों की मदद करने के अलावा विज्ञान की उन्नति की दिशा में अपना हर संभव योगदान देने का प्रयास करेंगे!

हमें नहीं पता कि आखिरकार कितने लोग आएँगे। साठ से अधिक लोगों से हमें उनके आने की पुष्टि प्राप्त हो चुकी है- लेकिन आप जानते हैं, भारत में क्या होता है- हो सकता है, ज़्यादा लोग आ जाएँ! इसलिए हम भोजन और रहने की व्यवस्था के मामले में आश्रम को अच्छी तरह तैयार करने में लगे हुए हैं और निश्चित ही बहुत पूरे उत्साह के साथ लोगों के आने का और इस कार्यक्रम के शुभारंभ का इंतज़ार कर रहे हैं!

मैं इस कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट रविवार को प्रस्तुत करूँगा!

जब स्वयं को प्रबुद्ध समझने वाले व्यक्ति असंवेदनशील बन जाते हैं! 2 नवम्बर 2014

मैंने आपको बताया था कि 2006 में मेरी बहन की मृत्यु के बाद मुझे अपने मित्रों की ओर से बड़ा संबल मिला था। हालाँकि आपका दुःख वास्तव में कोई कम नहीं कर सकता मगर इस दुःख में यदि कोई ढाढ़स बंधाने वाला हो, प्यार से गले लगाने वाला हो, कोई मित्र हो, जो आपके कंधे पर अपना सांत्वना भरा हाथ रख सके तो यह बड़े सौभाग्य की बात होती है। लेकिन ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने हमसे संपर्क तो किया मगर उनका मकसद हमें ढाढ़स बंधाना नहीं था, जबकि मैं उन्हें अपना मित्र समझता था।

मुझे ऐसा ही एक ईमेल प्राप्त हुआ था। वह एक महिला की ओर से था, जिसे मैं अपना बहुत अच्छा मित्र समझता था, हालांकि उसके बारे में मुझे यह एहसास हो चुका था कि, वह बहुत ही ऐजोटेरिक भूत-प्रेत और हवा-हवाई बातों में विश्वास करने वाली महिला है। वह उन बातों पर भरोसा करती थी, जो मेरे हिसाब से अत्यंत अविश्वसनीय थीं और क्योंकि वह दूसरों को उन बातों पर सहमत करने के लिए उतावली भी रहती थी और जिसे अकसर लोग बिलकुल बर्दाश्त नहीं करते थे, मैंने भी उससे कुछ दूरी बना ली थी।

इस महिला के ईमेल में उसने शुरुआत तो बहन, परा की मृत्यु पर शोक-संवेदना से की थी मगर बाद में उसने लिखा था कि उसे एक सपना आया है। उसे यह सपना आया था कि परा अपने कथित कर्मों के चलते दो लोकों के बीच भटक रही है, कुछ पाप, जिनका प्रायश्चित वह, अपनी असामयिक मृत्यु के कारण, इस लोक में अपने जीवन में नहीं कर पाई है, उसकी आत्मा दो लोकों के बीच कहीं अटक गई है।

क्या आप इस पर विश्वास कर सकते हैं? इस पर कि किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसने अभी-अभी अपनी बहन को खोया है और गहन दुख में डूबा हुआ है, कोई इस प्रकार का ईमेल भेज सकता है? यह बात कौन सुन सकता है कि उसकी अभी-अभी मृत बहन जैसे शुद्धिकरण के लिए कहीं पड़ी हो और उसे यातना झेलनी पड़ रही हो, एक तरह की ब्लैकमेलिंग कि आप कोई कर्मकांड कर लें, जिससे मृत आत्मा को शांति मिल सके?

मैंने उसे उसे तुरंत जवाब भेजा, और मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है कि मैंने क्या लिखा था, लेकिन लगता है कि मैंने उसे मेरी आत्मा या मेरे परिवार के किसी सदस्य की आत्मा के विषय में चिंतित न होने के लिए लिखा था। संभव है, उसका अर्थ अच्छा ही रहा हो, मगर उसने जो लिखा था वह किसी शोक-संतप्त व्यक्ति से कहने की बात नहीं थी!

कुछ लोगों को यह पता ही नहीं होता कि व्यावहारिकता, समझदारी और संवेदनशीलता किस चिड़िया का नाम है, कि उनके किस व्यवहार से दूसरों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं। एक और महिला एक बार आश्रम आई। हम एक-दूसरे को बहुत समय से जानते थे। जब वह आश्रम से बिदा लेने लगी तो विमान-तल जाने के लिए टॅक्सी में बैठते ही उसने ड्राईवर से सीट-बेल्ट के बारे में तफतीश की। क्योंकि भारत में अक्सर कोई भी सीट बेल्ट नहीं बांधता, उसे सीट कवर के नीचे कुछ देर सीट-बेल्ट ढूँढ़ना पड़ा। और फिर सीट बेल्ट बांधते हुए उसने हमसे कहा, "मैंने आपके अनुभव से ही सीखा है!" और चल दी।

सीट-बेल्ट बांधने के बाद भी मेरी बहन या कोई भी कार में उस तरफ बैठा हुआ व्यक्ति बच नहीं सकता था। इस तथ्य के बावजूद कोई मित्र इस तरह की बात नहीं करता। कहने की ज़रूरत नहीं, हम लोग अब दोस्त नहीं रह गए हैं।

इस तरह मैंने जाना कि आपका बुरा समय भी आपको स्पष्ट बता देता है कि कौन आपका मित्र है और कौन नहीं।

दुखद हादसों के बाद भी कैसे जीवन अपनी गति से चलता रहता है – 26 अक्टूबर 2014

सन 2006 की सर्दियों में जर्मनी वापस आकर मैं और यशेंदु उसी तरह काम करने लगे जैसे अपनी बहन की मृत्यु से पहले किया करते थे। एक के बाद दूसरी जगह यात्रा करते हुए, एकाध हफ्ता हर जगह रुककर अपनी कार्यशालाएँ और व्यक्तिगत-सत्र आयोजित करते हुए। जीवन में जब कोई दुखद हादसा होता है तब भी आपको अपना काम तो उसी तरह करते रहना पड़ता है लेकिन ऐसे हादसे आपका जीवन बदलकर रख देते हैं-और आप रोज़मर्रा के काम करते हुए भी इस परिवर्तन को महसूस करते हैं।

हम अपने भारतीय बाँसुरी-वादक के साथ यूरोप के कई शहरों और कस्बों में घूमे। हम बेहद दुखी थे लेकिन ऐसी मानसिक अवस्था में भी लोगों से मिलते, अपनी कार्यशालाएँ आयोजित करते, उनके साथ मुस्कुराते और आपसी अनुभव साझा करते। जब आप अपने मस्तिष्क को अपने दुःख से इतर किसी दूसरी बात में व्यस्त कर देते हैं तो दुःख के बारे में न सोचना आसान हो जाता है, उसी दुःख में हर वक़्त लिप्त न रहना आसान हो जाता है और सामान्य रूप से सोचना, बातचीत करना, प्रतिक्रिया व्यक्त करना संभव हो पाता है। लेकिन अपने व्यक्तिगत सत्रों के दौरान मुझे बहन की याद बार-बार आती रही।

मेरे पास लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं और अक्सर वे मानसिक समस्याएँ होती हैं। तो उस बार, जब एक महिला मेरे पास आई और बताया कि उसके पति का देहांत हो गया है तो मुझे अपनी बहन की याद कैसे न आती? मैंने उससे अपना दुःख भी साझा किया। कुछ देर हम यूँ ही मौन बैठे हुए अपने-अपने गुज़र चुके प्रियजन को महसूस करते रहे और फिर उसके बगैर दैनिक जीवन में होने वाले अनुभवों और एहसासात को साझा किया। अंत में मैंने उससे कहा कि हमें अपना जीवन जीते रहना होगा और हमने एक-दूसरे की आँखों में देखा और महसूस किया कि हम ऐसा ही करेंगे।

फिर एक बार एक और महिला आई और बताया कि उसके भाई के साथ उसका झगड़ा हुआ है। इतनी बुरी तरह लड़ाई हुई है कि उसने अपने भाई के साथ सारे सम्बन्ध तोड़ लिए है। भरी आँखों से उसने कहा कि वह उससे प्रेम तो करती है मगर भविष्य में कभी भी उसका मुँह नहीं देखना चाहती। लगता था, वह परस्पर विरोधी भावनाओं के बीच उलझ गई है, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई है। यह सोचकर मैं खुश हुए बगैर नहीं रह सका कि मेरे और मेरी बहन के बीच कभी भी इस तरह झगड़ा नहीं हुआ। मैंने उसे इस सचाई का एहसास कराने की कोशिश की कि जीवन बहुत छोटा हो सकता है। जब वह उसे प्रेम करती है तो हमेशा इस बात को याद रखे और इस झगड़े को अपने सम्बन्ध का आखरी पड़ाव न बनने दे। एक छोटी सी लड़ाई पर सम्बन्ध समाप्त न करे- कल क्या होगा, आप नहीं जानते!

मैं उन मित्रों के साथ, जो उसे भी जानते थे, कई बार बैठकर रोता रहा। हम उसे याद करते रहे और मुझे चाहने वालों ने एक बार फिर मुझे ढाढ़स बंधाया।

वास्तव में जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता रहा और साथ ही परा हर वक़्त मेरे साथ बनी रही और एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने उसे याद न किया हो या उसके बारे में न सोचा हो।

प्रियजन को खोना आपके विश्वास की जड़ों को हिला देता है – 12 अक्टूबर 2014

मैंने आपको मेरी बहन, परा की सितम्बर 2006 में हुई मृत्यु का ज़िक्र करते हुए बताया था कि किस तरह हमारा पूरा परिवार बहुत दिनों तक उस सदमे से उबरने की कोशिश करता रहा। हिन्दू धर्म में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के पश्चात् कुछ धार्मिक कर्मकांड किए जाने आवश्यक माने जाते हैं। इन कर्मकांडो पर हमारी प्रतिक्रिया दर्शाती है कि किस हद तक परा की मृत्यु ने मेरे और मेरे परिवार के धार्मिक विश्वासों और हमारी आंतरिक दुनिया को बदलकर रख दिया था।

मेरे परिवार ने कर्मकांड करवाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं थीं। हममें से कोई भी दिखावे में यकीन नहीं रखता और हम पर दुखों का पहाड़ भी टूटा हुआ था लिहाजा कोई बड़ा कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया था। फिर भी उन्होंने कुछ परम्परागत कर्मकांड शुरू किए- और मैंने तुरंत अपनी नापसंदगी ज़ाहिर कर दी। सच बात तो यह है कि मैं अच्छा-ख़ासा नाराज़ हुआ। कोई भी काम मेरी बहन को वापस नहीं ला सकती थी! कितनी भी प्रार्थनाएँ आप कर लें, कितनी भी पूजा-अर्चनाएँ आप करवा लें, दान-दक्षिणाएँ दे लें, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। वह पुनर्जीवित नहीं होने वाली थी!

जब वह पुरोहित आया, जिसे सारे कर्मकांड निपटाने थे तो वास्तव में मैं बेहद क्रोधित हुआ और तुरंत उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। स्वाभाविक ही पुरोहित स्तब्ध रह गया होगा मगर यह देखकर कि मैं उसे या मेरे परिवार वालों को किसी भी प्रकार का धार्मिक आयोजन करने देने वाला नहीं हूँ, वह चला गया। गुस्से के आवेग में मैंने साफ़-साफ़ कह दिया कि मेरे विचार में यह सब महज फूहड़ नौटंकी के सिवा कुछ भी नहीं है।

मेरे अभिभावकों की क्या प्रतिक्रिया रही और उन्होंने क्या महसूस किया, यह जानकार आप आश्चर्य करेंगे। मेरे पास यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि मुझे संसार में इससे अच्छा परिवार प्राप्त नहीं हो सकता था: उन्होंने मेरी बात मान ली। उन्होंने कोई तर्क नहीं किया, नाराज़ होने की तो बात ही छोड़िए। वे समझ गए कि मैं क्या कह रहा हूँ- और कोई एतराज़ नहीं जताया।

यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि मेरी बहन की मृत्यु ने मेरी और मेरे परिवार की धार्मिकता को झंझोड़कर रख दिया था। अगर हम तब भी गहरे धार्मिक विश्वासों में जकड़े होते तो हम उसकी आत्मा की और उसके मृत्यु उपरांत जीवन की चिंता कर रहे होते और भरसक अच्छे से अच्छे तरीके से और विशाल पैमाने पर सारे कर्मकांड आयोजित करवाते। लेकिन परा की मृत्यु ने बहुत कुछ बदल दिया था।

मेरी बहन की मृत्यु धार्मिक विश्वासों पर मेरी श्रद्धा टूटने के पीछे का एक प्रमुख कारण रहा। यह इतना बड़ा सदमा था कि उसने उन सारे स्तंभों को ढहा दिया, जिन पर मैं अटूट विश्वास रखता था। इतनी दुखद घटना होने पर छोटी बातों से शुरू करते हुए आप बहुत से विश्वासों पर पर प्रश्नचिह्न लगाना शुरू कर देते हैं: मैंने उसकी कुंडली का अध्ययन किया था और उसमें कहीं भी उसकी असामयिक मृत्यु का संकेत नहीं था! हमारे साथ यह कैसे हो सकता है- धर्म-कर्म से जुड़े एक ऐसे पक्के धार्मिक परिवार के साथ, जो दूसरों को भी धर्म में विश्वास करने का उपदेश देता रहा है? और उसके साथ- आखिर उसने ऐसा क्या किया था कि ईश्वर ने उसे ऐसी सज़ा का पात्र समझा?

स्वाभाविक ही, धर्म और रूढ़ियों से दूर होते जाने की यह कहानी एक दिन में संभव नहीं हुई थी। यह एक लम्बी प्रक्रिया थी, जिसे मैंने गुफा के अपने एकांतवास से बाहर आने के बाद शुरू किया था और जो उसके बाद कुछ सालों तक जारी रही थी। इस सफ़र में बहन की मृत्यु एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई थी। मैंने अपना गुरु का चोला उतार फेंका था और धर्म से दूरी बनाना शुरू कर चुका था; हालाँकि मुझमें आ रहे इस परिवर्तन के प्रति मैं जागरूक नहीं था और नहीं जानता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं ईश्वर को भी छोड़ दूँगा।

प्रियजन के विछोह को शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं! 5 अक्टूबर 2014

पिछले रविवार को मैंने आपको बताया था कि 18 सितंबर 2006 के दिन मेरी बहन की मृत्यु कैसे हुई। उसकी मृत्यु के बाद के दिन एक धुंधलके की तरह गुज़र गए। मुझे याद नहीं है कि उस समय ठीक-ठीक क्या हुआ था लेकिन उस समय हम पर छाए हुए गहरे शोक की याद आज भी ताज़ा है।

उसकी मृत्यु के बाद हम लोग घर पर क्या कर रहे थे? वास्तव में हमारे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। सिर्फ हम लोग एक-दूसरे को कसकर थामे हुए थे, अपने विषाद में एक-दूसरे का ढाढ़स बंधा रहे थे। नानी जी ने अपनी नातिन को खोया था। बब्बाजी और अम्माजी ने अपनी एकमात्र बेटी खो दी थी और हम तीन भाइयों ने अपनी बहन को खोया था।

शुरू में, काफी समय तक मैं बुरी तरह सदमे में रहा। मैं रोया नहीं था। मैंने अपनी रोती माँ को अपनी बाँहों में भरा हुआ था, मैं इतना शोकाकुल था कि आज तक वैसा दुखी कभी नहीं हुआ मगर मैं रो नहीं पा रहा था। हम परा के बारे में बातें करते रहे और सोचते रहे कि उसके बिना हमारा भविष्य कैसा होगा। वह बेहद मटमैला, विषादग्रस्त और एकाकी दिखाई दे रहा था। सब रोए-मगर मैं रो ही नहीं पा रहा था।

मुझे लगता है कि सदमे ने मेरे मस्तिष्क को बुरी तरह झँझोड़ दिया है। मुझे अधिक नींद की ज़रूरत कभी नहीं पड़ी लेकिन उन दिनों मैं बुरी तरह सोता था। ऐसी ही किसी रात के बाद सबेरे अपने कमरे से लगभग उनींदा सा मैं बाहर आया तो मेरे मन में एक हास्यास्पद विचार कौंधा, जो पल भर के लिए मुझे हर बात का समाधान नज़र आ रहा था। जब मुझे यशेंदु दिखाई पड़ा तो मैंने उससे कहा कि तुरंत कंप्यूटर चालू करे: हम गूगल पर उसे ढूँढ़ते हैं! हाँ, वह कहीं नहीं गई है, हम उसे पा लेंगे! मैं उस कड़ुवी सच्चाई को हजम नहीं कर पा रहा था, यथार्थ का सामना करना मेरे लिए असंभव हो रहा था।

परा की मृत्यु के बाद कुछ दिनों तक बहुत से लोग घर आते रहे। यहाँ तक कि दुनिया के कोने-कोने से बहुत से दोस्तों ने अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए ईमेल भेजे, मोबाइल संदेश भेजे या फोन किया। हर ईमेल के बाद, उनके हर शब्द के बाद, जिसमें वे उसके साथ बिताए समय का ज़िक्र करते या सिर्फ मानसिक संवेदना प्रेषित करते, मैं महसूस करता कि सिर्फ मैंने और मेरे परिवार ने ही उसे नहीं खोया है बल्कि और भी बहुत सारे लोगों ने उसे खो दिया है। वह अभी बहुत छोटी थी, दुनिया में उसे बहुत कुछ देखना बाकी था और उसके साथ दुनिया में न जाने कितने लोगों के दिलों को स्पंदित होना था!

यहाँ तक कि एक करीबी मित्र, जिसके यहाँ परा को जर्मनी पहुँचने के बाद रुकना था, फ्लाइट पकड़कर आश्रम आ गई। सिर्फ हमारे साथ रहने के लिए, परा के लिए हमारे शोक में शामिल होने के लिए, वह इतनी दूर चली आई।

लेकिन आखिर वह समय भी आया जब मैं अपने दुख को निसृत कर पाया, उसे आंसुओं में बहा सकता था। और जब मैंने रोना शुरू किया तो तब तक रोता रहा जब तक सारे आँसू समाप्त नहीं हो गए। यह एक तरह की मुक्ति थी, एक भुलावा, जैसे मैंने अपने दुख को आंसुओं के जरिये बहा दिया हो-लेकिन शोक में ज़रा सी भी कमी नहीं आई। जो खाली स्थान वह छोड़कर गई है, उसे कभी भी किसी दूसरी चीज़ से भरा नहीं जा सकता।

मेरे जीवन का सबसे बुरा वक़्त: जब मैंने अपनी बहन को खो दिया – 28 सितम्बर 2014

सितम्बर 2006 में, वृन्दावन में परिवार के साथ उल्लासपूर्ण समय बिताने के बाद मैंने दक्षिण अफ्रीका के लिए उड़ान भरी। वहाँ मुझे बहुत थोड़े समय के लिए रुकना था और उसके बाद मेरे जीवन में आज तक का सबसे दुखद समय आने वाला था।

जिस तरह मैं हर जगह पहुँचते ही अपने काम में व्यस्त हो जाता था, यहाँ भी अपने व्यक्तिगत सत्रों, कार्यशालाओं और व्याख्यानों में व्यस्त हो गया। कुछ दिन बाद, 18 सितम्बर 2006 के दिन सबेरे-सबेरे मेरे पास फोन आया। जर्मनी से यशेंदु का फोन था। भरे गले से आँसुओं में भरकर उसने मुझे वह भयंकर खबर दी और एक भाई द्वारा दूसरे भाई को दी जा सकने वाली सबसे दर्दनाक खबर मैंने सुनी: एक कार हादसे में हमारी बहन का देहांत हो गया है।

उस रात पूर्णेंदु और परा विमान तल की ओर निकले हुए थे। परा को जर्मनी के लिए उड़ान भरनी थी, जहाँ वह यशेंदु से मिलने वाली थी और बाद में मैं भी उनके साथ शामिल होने वाला था। वह जर्मनी की उसकी दूसरी यात्रा थी।

लेकिन अब वह अपनी अंतिम यात्रा पर निकल चुकी थी। कार हादसा हुआ था। पूर्णेंदु अस्पताल में भर्ती था। यशेंदु ने कहा, वह तुरंत वापसी का टिकिट कटा रहा है।

मेरे हाथ-पाँव काँप रहे थे। मैं पसीने से लथपथ हो रहा था और कुछ मिनट तक मेरे लिए कुछ भी सोच पाना नामुमकिन हो रहा था। फिर मैंने अपने पिताजी को फोन किया और कहा कि मैं तुरंत पहुँच रहा हूँ।

दिल्ली के लिए अगली उड़ान दुबई से होते हुए जाती थी। मैंने टिकिट खरीदा और तुरंत विमान तल की ओर रवाना हो गया। मैं अपनी भावनाएँ व्यक्त करने में असमर्थ हूँ। उससे पहले और उसके बाद आज तक मैंने वैसा आघात, वह दर्द नहीं झेला। और पहले अविश्वास और फिर यथार्थ का एहसास होते ही पुनः भयंकर टीस। मेरी आँखों से एक आँसू नहीं निकला। किसी तरह मैंने कुछ घंटों का वह बेहद लम्बा सफ़र तय किया, जीवन की सबसे कठिन, सबसे तकलीफदेह उड़ान।

दूसरे दिन सबेरे मैं दिल्ली पहुँचा। अस्पताल में मेरे माता-पिता और यशेंदु मेरा इंतजार कर रहे थे। पूर्णेंदु अस्पताल के अपने कमरे में था। उसके एक पैर की हड्डी टूट गई थी और उस पर प्लास्टर चढ़ा था। इसके अतिरिक्त उसे कोई खतरनाक चोट नहीं थी। कहीं-कहीं खुरच गया था, मामूली चोटें थीं और यहाँ-वहाँ सफ़ेद पट्टियाँ बंधी हुई थीं। इतने बड़े हादसे को देखते हुए कुल मिलाकर वह ठीक-ठाक ही था। हादसे से ठीक पहले वह नींद में था और उसके बाद बेहोश। उसे बहुत देर बाद अस्पताल में ही होश आया। परा के देहांत की दर्दनाक खबर उस तक पहुँचाने का कठिन काम मुझे ही करना पड़ा।

जैसे ही पूर्णेंदु को अस्पताल से छुट्टी मिली, हम अस्पताल से परा के मृत शरीर को लेकर वृन्दावन की ओर निकल पड़े। रास्ते में फोन करके हमने वहाँ लोगों को अंतिम संस्कार की सब तैयारियाँ करने की सब हिदायतें दे दीं। आवश्यकता से अधिक एक पल भी हम ज़ाया नहीं करना चाहते थे। सभी आँसुओं में डूबे हुए थे, अम्माजी अपनी इकलौती बेटी की मृत्यु की खबर सुनकर टूट चुकी थीं और अभी यह जानलेवा खबर नानी को देना बाकी था, जो हमारा इंतज़ार कर रही थीं, इस त्रासदी की भयावहता से पूरी तरह अनजान।

आश्रम में लोग अंतिम संस्कार की तैयारियाँ शुरू कर चुके थे और इसलिए नानीजी को अंदाजा हो चुका था कि कुछ न कुछ बहुत बुरा घटित हो चुका है। हमारे परिवार के लिए वे कुछ घंटे किसी अँधेरी खोह की मानिंद थे, जिसमें से होकर अब हमें गुज़रना था।

हर कोई रो रहा था लेकिन मुझे रोने के लिए न तो समय मिल रहा था और न कोई ऐसी जगह, जहाँ जी भरकर आँसू बहा सकूँ। ऐसा लगता था जैसे मेरा मन अभी भी मानने को तैयार नहीं है कि वास्तव में इतना बड़ा हादसा हो चुका है। यहाँ तक कि एक बार मैंने बहन के शव पर पड़ा सफ़ेद कपड़ा उठाकर उसके चेहरे को गौर से देखा जैसे विश्वस्त होना चाहता होऊँ कि वास्तव में वह जा चुकी है। वही थी। मृत।

उसके मृत शरीर को हम दाह संस्कार की जगह लेकर आए। पैर टूटा होने के कारण पूर्णेंदु नहीं आ पाया। मृत्यु को मैंने पहले और बाद में भी कई बार देखा है मगर वह पल मेरे जीवन का आज भी सबसे दर्दनाक समय बना हुआ है: जब हमने अपनी बहन की देह के नीचे रखी लकड़ियों में आग लगाई। वह चली गई।

अगर आप किसी भी क्षण मरने के लिए तैयार हैं तो फिर डरने की ज़रुरत नहीं! 31 अगस्त 2014

मैंने स्वीडन में 2006 में हुए आध्यात्मिक उत्सव के बारे में, जहाँ मेरी कई कार्यशालायें आयोजित की गईं थी, पहले आपको बताया था। उस दौरान एक प्राइवेट हवाई जहाज़ पर दिए गए साक्षात्कार के बारे में आज मैं आपको बताना चाहता हूँ!

वहाँ इंग्लैण्ड का एक फिल्म-क्रू भी आया हुआ था, जो उस उत्सव के बारे में एक लघु-चित्र फिल्माने की तैयारी कर रहा था। आयोजन स्थल की विभिन्न जगहों पर जाकर वह विभिन्न कार्यक्रमों की शूटिंग करता और वहाँ मौजूद सहभागियों, कार्यक्रम संचालकों के साक्षात्कार लेता, कुछ कार्यशालाओं को फिल्माता और कुल मिलाकर सारे उत्सव के माहौल को कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहा था।

सारा उत्सव स्वीडन के शानदार प्राकृतिक वातावरण में, जंगल के बीचोंबीच और साल के सबसे सुखद मौसम में आयोजित किया गया था, जब रात का अँधेरा भी वहाँ सिर्फ मध्य-रात्रि में कुछ देर के लिए होता है। इस अंग्रेज़ फिल्म क्रू ने फिल्म को और अधिक रोमांचक और दिलचस्प बनाने के उद्देश्य से उत्सव को ऊपर से अर्थात परिंदों की नज़र से एक छोटे से हवाई जहाज़ में बैठकर शूट करने का निर्णय किया- और चार लोगों के बैठने लायक एक हवाई जहाज़ किराए पर लेकर वहाँ, ऊपर मेरा साक्षात्कार लेने की पेशकश की!

जब मैं हवाई जहाज़ के छोटे से रनवे पर, जहाँ से उसे उड़ान भरना था, पहुँचा, कैमेरामैन और संवाददाता जहाज़ के करीब खड़े दिखाई दिए। मेरे पीछे पायलट आया और जब हम सब एक दूसरे का अभिवादन कर चुके, रिपोर्टर जहाज़ की तरफ देखते हुए बोला: 'पता नहीं, मुझे थोड़ा डर लग रहा है-जहाज़ कुछ ज़्यादा ही छोटा है!' पायलट ने उसे आश्वस्त करने के उद्देश्य से कि कुछ नहीं होगा, हमसे थोड़ा अलग हटने के लिए कहा और जहाज़ में अकेले ही एक छोटी सी उड़ान भरी। जब वह वापस नीचे आया तो रिपोर्टर की तरफ सवालिया निगाहों से देखा-जी हाँ, अब रिपोर्टर कुछ आश्वस्त लग रहा था।

माइक्रोफोन लगे हुए बड़े बड़े इयरफोन लेकर हम सब जहाज़ पर चढ़ गए और जहाज़ उड़ चला! वास्तव में ऊँचाई से उत्सव स्थल का दृश्य बहुत भव्य लग रहा था! आगंतुकों के रहने-सोने के छोटे-छोटे टेंटों के साथ कार्यशालाओं के बड़े टेंट और चारों ओर फैली अद्भुत प्राकृतिक दृश्यावलियाँ!

जहाज़ में बड़ा शोर था मगर इयरफोन लगाकर हम आसानी के साथ बातचीत कर सके। थोड़ी सी बातें हुईं: उसने मेरे पूर्व-जीवन के बारे में पूछा, उत्सव के बारे में कुछ बातें हुईं और उस पर मेरी प्रतिक्रिया ली गई, फिर थोड़ी सी बात मेरी कार्यशाला के बारे में, बस इतना ही। अंत में उसने पूछा 'मुझे तो अब भी थोड़ी घबराहट हो रही है, थोड़ा डर लग रहा है- आपको नहीं लग रहा? इस छोटे से जहाज़ में, लगता है जैसे कभी भी कुछ भी हो सकता है!'

मैंने जवाब दिया कि मुझे वैसा कोई डर नहीं है। स्वभाव से ही मैं डरपोक नहीं हूँ। पहली बात तो यह कि मैं इस तरह, इस दिशा में सोचता ही नहीं हूँ। दूसरे, अगर जहाज़ गिर ही जाता है तो हम सब मारे जाएँगे- लेकिन उसके लिए डरने की क्या ज़रुरत है?

मैं तो यह मानता हूँ कि किसी भी क्षण जीवन का अंत हो सकता है। हर पल हमें उसके लिए तैयार रहना चाहिए, सिर्फ उस समय नहीं जब हम कोई खतरनाक काम कर रहे होते हैं। तो अगर आप हर वक़्त मरने के लिए तैयार हैं तो आपको इस तरह का डर बिल्कुल नहीं लग सकता!

लगभग आधे घंटे बाद हम सुरक्षित नीचे उतर आए- और मैंने बिना किसी भय के उस शानदार नज़ारे को देखने और उसका आनंद उठाने के मौके का पूरा लाभ उठाया!