मूर्ख धार्मिक चैरिटी वाले समलैंगिकों की मदद लेने से इंकार कर देते हैं! 26 नवम्बर 2014

सन 2010 में जब हम न्यूयॉर्क में थे, मैंने कई नए दोस्त बनाए। उनमें से एक दोस्त को मेरे कुछ अमरीकी मित्र जानते होंगे क्योंकि वह रेडियो और टीवी शो में अक्सर काम करता रहता है और वैसे भी वह लोगों से मिलने-जुलने वाला मिलनसार व्यक्ति है और कई चैरिटी परियोजनाओं से जुड़ा हुआ भी है। उसका नाम मैक्स टकी (Max Tucci) है। कल मुझे पता चला कि एक चैरिटी ने, जिसकी वह अकसर मदद किया करता था, उसके साथ बड़ी बेहूदा और अपमानजनक हरकत की: उन्होंने उसकी मदद नकार दी। क्यों? क्योंकि मैक्स समलैंगिक है।

2010 में मैक्स अपनी काफी स्वस्थ दादी के साथ मुझसे मिलने न्यूयॉर्क में सेन्ट्रल पार्क आया था। दादी ने सारा जीवन योग किया था इसलिए उस वक़्त भी बहुत तरोताज़ा और लोचदार लग रही थी। हमने बहुत अच्छा समय साथ गुज़ारा और बाद में अपने रेडियो शो के लिए मैक्स ने मेरा इंटरव्यू लिया, जिसमें कुछ देर हमारी अच्छी बातचीत भी हुई। मुझे तभी समझ में आ गया था कि मेरे सामने बैठा हुआ व्यक्ति एक खुले दिल वाला इंसान है जो हर संभव तरीके से दूसरों की मदद के लिए सदा तैयार रहता है। मुझे फेसबुक के ज़रिए पता चला कि ठीक इन्हीं सेवाओं से जुड़ी बहुत सी परियोजनाओं में वह भी सहभागी होता रहता है।

कुछ दिन पहले मैं और रमोना मैक्स द्वारा साझा किए गए किसी चैरिटी कार्यक्रम के फ़ोटो देख रहे थे, जिसे मैक्स और उसके मित्रों ने आयोजित किया था। उन सब ने ‘ड्रैग’ (drag) पहने हुए थे। इस शब्द के बारे में मुझे अभी-अभी पता चला है और इसका अर्थ यह है कि पुरुषों ने तड़क-भड़क वाले महिलाओं के वस्त्र पहने थे और गहरा, चमकीला रंगीन मेक-अप किया हुआ था और ऊँची एड़ियों वाले सैंडिल्स और सिर पर विग पहना हुआ था। वे स्टेज पर नाच रहे थे और शायद गा भी रहे थे और साफ़ नज़र आता था कि वे सब खूब मौज-मस्ती कर रहे थे और उसके साथ ही ‘Neighbours 4 Neighbours’ नामक किसी चैरिटी संस्था के लिए, जिसका उद्देश्य अमरीका के गरीबों की मदद करना है, चंदा भी इकठ्ठा कर रहे थे।

उस सद्कार्य के लिए उन्होंने काफी बड़ी रकम इकठ्ठा कर ली और जबकि यहाँ, सारी दुनिया और एक ऐसे देश में जहाँ ऐसा आयोजन अकल्पनीय था, लोग उसे लेकर अचंभित और बहुत खुश थे, स्वाभाविक ही, कुछ उन्हीं के बहुत करीबी लोग खुश नहीं थे। एक अन्य चैरिटी ने, जिसके लिए पहले मैक्स ने बहुत समय और ऊर्जा खर्च की थी, उससे संपर्क करके कहा: उसने जो कुछ वहाँ किया, वे उसका अनुमोदन नहीं करते। यहाँ यह बताना उचित होगा कि वे लोग अपने आपको ‘रूढ़िवादी ईसाई’ (conservative Christians) मानते हैं। मैक्स का यह जवाब भी कि ईसा मसीह सबसे प्रेम करते थे और अपने अनुयाइयों को भी उन्होंने यही सिखाया था, उन्हें संतुष्ट नहीं कर। स्वाभाविक ही यह बात मेरे मित्र को दुखी कर गई कि उसके समय, प्रेम और ऊर्जा की, जो उसने इन लोगों के लिए अर्पित किए थे, कोई कदर नहीं की गई और इससे भी दुखद यह कि वे लोग उसे पथभ्रष्ट और चरित्रहीन समझते थे, सिर्फ इसलिए कि जो वह था वैसा ही बना रहना चाहता था।

मैं अपने ब्लॉग में यह सब मैक्स के समर्थन में लिख रहा हूँ। यह इस बात का एक और प्रमाण है कि आप कितना भी अच्छा करें, आपकी आलोचना करने वाले हमेशा विद्यमान रहेंगे। और एक बार मैं फिर ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि हम सब बराबर हैं, एक समान हैं।

वैसे तो वास्तव में धार्मिक लोगों की इस तरह की बातों को पढ़कर ज़्यादा आश्चर्य चकित नहीं होता। धार्मिक लोग जितना अधिक धार्मिक होते हैं उतना ही अधिक कूढ़-मगज भी होते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म को मानने वाले हों। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह हिन्दू धर्म को मानने वाले हैं, या फिर ईसाइयत या इस्लाम को मानते हैं, वे सभी जड़तापूर्वक अपनी उन धारणाओं पर अड़े रहते हैं, जो उनके प्राचीन धर्मग्रंथों में दर्ज अटल सूक्तियों से उद्भूत होती हैं। इसीलिए बहुत से लोग, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, संगठित धर्मों से से किनारा कर लेते हैं! एक तरफ वे प्रेम का उपदेश देते हैं और दूसरी तरफ सिर्फ प्रेम किया जाने वाला व्यक्ति पुरुष है या स्त्री, इस छोटी सी बात पर प्रेम करने वालों के साथ भेदभाव बरतते हैं! मैं जान-बूझकर यह नहीं लिखता कि ‘प्रेम करने का निर्णय लें’ क्योंकि इसका निर्णय या निश्चय नहीं किया जा सकता, प्रेम आपके भीतर से उद्भूत होता है और वह पवित्र होता है और उसका लिंग से कोई सम्बन्ध नहीं होता!

इसलिए मैं अपने मित्र, मैक्स और दूसरों की भलाई करने की इच्छा रखने वाले सभी लोगों से कहना चाहता हूँ कि अगर आप ऐसा करते हुए महज लिंग की बिना पर या व्यक्तिगत आदतों या जाति या धर्म की बिना पर अपमानित किए जाते हैं तो किसी भी कीमत पर उनसे प्रभावित न हों और न ही उनसे डर कर अपने आपको बदलने की कोशिश करें! इस बात के एहसास से कि आप किसी ज़रूरतमंद की मदद कर रहे हैं, शक्ति प्राप्त करें। जिससे प्रेम करते हैं, प्रेम करते रहें और आप वास्तव में जो हैं, जैसे हैं, वही रहते हुए दुनिया में प्रेम को प्रसारित करते रहें!

और हाँ, अगर आप थोड़ा विश्राम चाहते हैं, किसी ऐसी जगह पर सुकून के साथ कुछ दिन व्यतीत करना चाहते हैं, जहाँ आपकी निजता पर कोई सवाल न उठाए, हमारे स्कूल के बच्चों के साथ, जिनकी हम लोग हर समय मदद करते रहते हैं, समय गुज़ारना चाहते हैं तो हमारे आश्रम के दरवाज़े आपके लिए सदा खुले हैं।

समलैंगिकता का विरोध नहीं, बल्कि स्वीकृति योग का काम होना चाहिए – 1 जून 2014

मैंने आपको पिछले हफ्ते बताया था कि सन 2006 में कैसे मेरा एक पुरुष समलैंगिक मित्र हर वक्त अपने आपसे संघर्ष करता रहा था क्योंकि उसका योग गुरु, हर मामले में जिसकी सलाह वह माना करता था, समझता था कि उसकी समलैंगिकता अनुचित है। स्वाभाविक ही उसकी इस समस्या के बारे में सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ था कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि उसे ऐसा गुरु स्वीकार करना है और यह भी कि क्यों ऐसी धारणा रूढ हो गई है कि योग के अनुसार समलैंगिकता एक समस्या है।

यह बात कि समलैंगिक होना एक ऐसी बीमारी है, जिसे ठीक किया जा सकता है और ठीक किया जाना चाहिए, पूरी तरह धर्म और परम्पराओं पर आधारित है अर्थात इस विश्वास पर कि औरत और मर्द ही साथ रह सकते हैं। पुराने ज़माने में लोग सोचते थे कि वह सब जो प्रचलित मानदंडों के अनुसार नहीं हैं, गलत है और उसका इलाज किया जाना ज़रूरी है। दुर्भाग्य से कुछ कठमुल्ला, पुरातनपंथी योगी, जो समयानुसार नहीं बदलते, आज भी यह विश्वास करते हैं कि अपने समलिंगी की ओर आकर्षण का होना अप्राकृतिक भावना है। और क्योंकि वे हर बीमारी का इलाज योग द्वारा करने चाहते हैं इसलिए सोचते हैं कि किन्हीं काल्पनिक अवरोधों को दूर करके वे समलैंगिकता नामक इस "बीमारी का इलाज" भी कर लेंगे।

समलैंगिकता के बारे में यह मूर्खतापूर्ण खयाल यहीं से आया है। लेकिन अगर आप योग के मूल आशय को समझेंगे तो वह है, स्वानुभव या जो जैसे हैं, वैसे ही बने रहें। योग हमें सिखाता है, अपने भीतरी और बाहरी व्यक्तित्व का स्वीकार, जैसे भीतर हैं वैसे ही बाहर भी दिखाई दें, भीतर बाहर में कोई द्वंद्व न रहे। मैं समझता हूँ कि हर पुरुष और महिला समलैंगिक जानता है कि वह भीतर से समलैंगिक है। किसी व्यक्ति का यौन रुझान उसकी अंदरूनी दुनिया का हिस्सा होता है और इसलिए मैं यह विश्वास करता हूँ कि योग को भी मूल रूप से समलैंगिकता को स्वीकार करना चाहिए न कि उससे संघर्ष करना चाहिए। लेकिन उसे खुले आम, सब के सामने स्वीकार करना अपने आप में बहुत कठिन काम है।

एक पुरुष या महिला समलैंगिक के रूप में संभवतः आपने लोगों के मूर्खतापूर्ण तर्कों को सुना होगा, जिनमें वे आपके समलैंगिक रुझान के विरुद्ध आपको तरह-तरह की बातें समझाने की कोशिश करते हैं। आप योग के पास सिर्फ शारीरिक व्यायाम के लिए ही नहीं बल्कि ध्यान और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने भी आते हैं। तो फिर, अगर आपको किसी गुरु की ज़रुरत है ही, तो भी आप अपने लिए किसी ऐसे गुरु को कैसे चुन सकते हैं, जो आपकी समलैंगिकता को ही स्वीकार नहीं करता?

ऐसा करके क्या आप अपने लिए मुश्किलें नहीं खड़ी कर रहे हैं? न सिर्फ आप अपने लिए पहचान का संकट खड़ा कर रहे हैं बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह भी नहीं कर पा रहे हैं। आपको इस व्यक्ति का पूरी तरह अनुगमन करना होता है और आप उसकी बातों पर कभी कोई प्रतिवाद भी नहीं कर सकते। गुरु से दीक्षा लेने का अर्थ यही है। इसलिए या तो आप अपनी पहचान का परित्याग कर दें या फिर आप गुरु-शिष्य परंपरा को मानना बंद कर दें।

तो फिर गुरु बनाते ही क्यों हैं?

बहुत समय पहले मैंने महसूस किया था कि गुरुवाद एक ऐसी चीज़ है, जो सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए मुफीद है, जो अपनी पहचान खोने के लिए तैयार हैं।

योग गुरु कैसे अपने समलैंगिक शिष्यों के मन में आतंरिक कलह पैदा करते हैं! 25 मई 2014

मैंने आपको पहले बताया था कि सन 2006 में मेरा बहुत से समलैंगिकों से संपर्क हुआ था। उनमें से एक पुरुष समलैंगिक मेरा अच्छा दोस्त बन गया था। योग में उसकी बहुत रुचि थी और उसका एक भारतीय योग-गुरु भी था। लेकिन इसी कारण मैं हमेशा देखता था कि उसके भीतर कोई मानसिक उथल-पुथल मची हुई है: उसका गुरु उसकी समलैंगिकता को स्वीकार नहीं करता था।

तब मेरा मित्र 23 साल का युवक था। सालों से उसकी भारत में रुचि रही थी और हालाँकि वह कभी भारत नहीं आया था, वह उसकी संस्कृति परम्पराओं और धर्मग्रंथों से बड़ा प्रभावित और उन पर मोहित था। उसने भारत के बारे में बहुत सी किताबें पढ़ रखी थीं और स्वाभाविक ही उनका उस पर गहरा असर था। वह बहुत शांत-चित्त, ठन्डे दिमाग वाला और आध्यात्मिकता, योग और ध्यान आदि में रुचि रखने वाला युवक था। इन सब बातों ने उसे इस भारतीय गुरु की ओर, जो कई सालों से पश्चिम में रहकर योग और भारतीय दर्शन की शिक्षा दिया करता था, आकृष्ट किया। वह गुरु लोगों को दीक्षित भी किया करता था, लिहाजा मेरे मित्र ने उस गुरु से दीक्षा प्राप्त कर ली और उसका शिष्य बन गया।

सन 2006 की गर्मियों में हमने बहुत सा समय साथ बिताया। वह सिर्फ मुझे देखने मेरे कार्यक्रमों में आता रहता था और एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर यात्रा करते हुए हम लोग कई विषयों पर लम्बी चर्चाएँ किया करते थे। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उसने मुझे बताया कि एक किशोर के रूप में वह कभी भी स्त्रियों की ओर आकृष्ट नहीं होता था। इसके विपरीत पुरुषों की ओर आकृष्ट होना उसे अधिक स्वाभाविक लगता था। किसी स्त्री को देखकर ऐसी भावनाएँ उसके मन में कभी भी नहीं उमड़ती थीं। मैंने महसूस किया कि उसकी समलैंगिकता उसके लिए कितनी सहज और स्वाभाविक थी और यही उसने कहा भी: 'यही मैं हूँ, यही मेरा स्वभाव, मेरी प्रकृति है!'

लेकिन जब भी वह जर्मनी में या गुरु के अमरीका स्थित आश्रम में अपने गुरु से मिलता था, उसे हमेशा एक समस्या का सामना करना पड़ता था: उसका गुरु उससे कहता कि समलैंगिकता एक समस्या है, जिससे वह निजात पा सकता है और उसे ऐसा करना चाहिए। हिन्दू धर्म में और योग की कठिन परंपरा में इसकी मान्यता नहीं है। वह अपने गुरु को चाहता था लेकिन इस समस्या के चलते भ्रमित था और जब भी वह अपने गुरु से सुनता कि यह एक प्रकार की बीमारी है, मस्तिष्क में एक तरह का अवरोध या कुछ अनुचित सी बात है, जिसे ठीक करना ज़रूरी है और जिस पर उसे 'कुछ करना' चाहिए तो वह सहम जाता था और अपने व्यक्तित्व को लेकर उसके मन में द्वंद्व पैदा हो जाता था!

मुझे एहसास है कि गुरु की यह बात उसके भीतर कितना द्वंद्व पैदा करती रही होगी। जिस रास्ते पर वह चल पड़ा था, उस पर चलते हुए वह भीतर ही भीतर बहुत असुरक्षित महसूस करता रहा होगा क्योंकि वह ऐसा रास्ता था जो उसके एक अंश को स्वीकार ही नहीं करता था! उसे अपने गुरु की सहानुभूति और सहायता की ज़रुरत थी, उसके मार्गदर्शन की ज़रुरत थी-आखिर इसीलिए तो उसने उस गुरु का चुनाव किया था-लेकिन साथ ही वह आँख मूंदकर गुरु के हर आदेश का पालन भी नहीं करना चाहता था!

अगर वह कोशिश करता कि गुरु का आदेश मानकर अपने आकर्षण को पुरुषों की ओर से हटाकर महिलाओं की तरफ मोड़ दे तो फिर वह अपने आप के प्रति ईमानदार नहीं रह सकता था! वह संघर्ष करता रहा और मैं यह देखकर खुश हुआ था कि अंततः उसका व्यक्तित्व इस संघर्ष में विजयी होकर निकला! वह अपने सहज-स्वाभाविक प्राकृतिक सत्य को लेकर कोई समझौता नहीं कर सकता था।

लेकिन दुर्भाग्य से उस पूरे समय यह मामला उसके मस्तिष्क में उथल-पुथल मचाए रहा करता था।

और यह उसका एकमात्र संघर्ष या द्वंद्व नहीं था-मगर उसके बारे में बाद में फिर कभी।

महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के लिए अपनी समलैंगिकता को स्वीकार करना ज़्यादा कठिन क्यों होता है! 18 मई 2014

पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था कि सन 2006 में मुझे बहुत सी ऐसी महिलाओं से मिलने का मौका मिला था जो लम्बे समय तक और कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध रखने के बाद अचानक महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने लगीं। दूसरी तरफ वे समलैंगिक पुरुष, जिन्हें जानने का मुझे मौका मिला था, मुझे बताते थे कि वे जीवन में कभी भी महिलाओं की ओर आकृष्ट ही नहीं हुए। जबकि पिछले हफ्ते मैंने अपनी बात को महिला समलैंगिकों के नज़रिए पर केन्द्रित किया था, आज मैं पुरुष समलैंगिकों के रवैये और इस संबंध में उनके दृष्टिकोण से इस विषय पर चर्चा करूंगा।

सर्वप्रथम, मैं पुनः यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि हज़ारों लोगों से मिलकर बात करने के बाद मेरा यह व्यक्तिगत कार्यानुभव है। यह किसी वैज्ञानिक शोध पर आधारित नहीं है लेकिन जितने पुरुष समलैंगिकों से मैं मिला हूँ, उनमें से अधिकतर ने यही कहा कि: 'मैं शुरू से ही समलैंगिक रहा हूँ!'

वे मुझे बताते थे कि उन्होंने जीवन में कभी भी महिलाओं के प्रति आकर्षण महसूस नहीं किया और बचपन से ही वे अपने पुरुष मित्रों, सहपाठियों या आसपास के दूसरे पुरुषों की ओर आकृष्ट होते थे। बहुत पहले ही, अधिकतर किशोर होते-होते ही उन्हें इसका आभास हो गया था कि टीवी पर सुंदरियों और युवा फिल्म अभिनेत्रियों को देखकर वे अपने दूसरे हमउम्र मित्रों की तरह आकर्षित नहीं होते। स्वाभाविक ही, कुछ ऐसे प्रकरण भी सामने आए, जिनमें पुरुषों ने 'महिलाओं के साथ भी कोशिश की' मगर वह उन्हें 'अप्राकृतिक और अनुचित' लगता था। कुल मिलाकर, पुरुष समलैंगिकों ने महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने का कोई अनुभव प्राप्त नहीं किया था। तब यह सवाल उठता है कि समलैंगिक पुरुषों से सुनी बातें महिला समलैंगिकों की बातों से इतनी भिन्न क्यों हैं।

यह भी संभव है कि वास्तव में पुरुष समलैंगिकों की संख्या हमारी जानकारी से काफी अधिक हो-क्योंकि बहुत से ऐसे पुरुष मजबूरन उभयलैंगिक संबंधों के साथ जीते होंगे! मुझे लगता है कि समलैंगिक और उभयलिंगी महिलाएँ अधिक बड़ी संख्या में अपने परम्परागत संबंधों से बाहर निकलकर खुले आम अपनी इच्छाओं और वरीयताओं का स्वीकार करती हैं।

मुझे लगता है कि समाज में महिलाओं के लिए समलैंगिक होना पुरुषों के समलैंगिक होने के मुकाबले अधिक आसान है। पुरुषों के लिए समलैंगिक होना उनके पौरुष पर कलंक जैसा है, कि वह मज़बूत, फौलादी जिस्म का मालिक नहीं है बल्कि एक नर्मो-नाज़ुक इंसान है। वह महिलाओं के दिलों पर छा जाने वाला इश्कबाज़ नहीं है बल्कि उनसे डरकर दूर भागता है। उन्हें लोगों के मज़ाक का केंद्र बनना पड़ता है और न सिर्फ समाज का बहिष्कार झेलना पड़ता है बल्कि कई बार कैरियर में आगे बढ़ने में रुकावटें आती हैं और नौकरी तक से हाथ धोने की नौबत पेश आती है और इस तरह वे आर्थिक रूप से कम सुरक्षित हो जाते हैं। इसके विपरीत, महिलाओं की बात अलग होती है। इस पुरुष-वर्चस्व वाले (पुरुष-सत्तात्मक) समाज में-और दुर्भाग्य से पश्चिमी समाजों में भी आज भी यह स्थिति बनी हुई है-एक महिला का किसी दूसरी महिला का चुम्बन लेना बहुत उत्तेजक और सेक्सी माना जाएगा जबकि किसी पुरुष का किसी दूसरे पुरुष का चुम्बन लेना बहुत बहुत फूहड़ माना जाता है। जहाँ उनका बॉस पुरुष है और जहाँ सारे पुरुष मित्र समलैंगिकों से घृणा करते हैं, वहां एक समलैंगिक पुरुष अपनी यौनेच्छाओं और यौन प्राथमिकताओं की ओर कदम भी रखना नहीं चाहेगा।

इसके अलावा, जैसा कि पिछले हफ्ते मैंने इशारा किया था, मैं मानता हूँ कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएँ आपस में एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खुली होती हैं। वैसे भी वे अपनी सबसे विश्वस्त सहेलियों के साथ अपने सारे रहस्य साझा करती हैं और उनकी आपसी मित्रता पुरुषों के मुकाबले अक्सर बहुत ज़्यादा गहरी होती है। पुरुष अपने मन की बातें दूसरे पुरुषों के सामने उतनी आसानी से उजागर नहीं करते जितनी सहजता से महिलाएँ खोलकर रख देती हैं। शारीरिक खुलेपन की बात करें तो भी महिलाएँ एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खुलकर सामने आती हैं! जिमों में (व्यायामशालाओं में), खेल के मैदानों, तरणतालों या ऐसी ही दूसरी जगहों में अक्सर महिलाओं को बिना किसी विशेष हिचक या शर्मो-हया के नहाते या कपड़े बदलते देखा जा सकता है। मेरे खयाल से, समाज में घुलने-मिलने की सहजता महिलाओं में पुरुषों के मुक़ाबले अधिक मात्रा में पाई जाती है। और इसलिए दो या तीन दशकों तक बिल्कुल अलग तरीके से रहने के बावजूद अपनी आतंरिक इच्छाओं को व्यक्त करना और अपनी वरीयताओं के अनुसार आगे बढ़ना उनके लिए अधिक आसान होता है!

लेकिन कुछ भी हो, मेरे संपर्क में आए लगभग सभी समलैंगिकों ने मुझे बताया कि उन्होंने अब अपने आप को पहचान लिया है। और मैं मानता हूँ कि यही बात महत्वपूर्ण और ज़रूरी है।

पुरुषों के साथ अनुभव लेने के बाद बहुत सी महिलाएँ समलैंगिक क्यों हो जाती हैं! 11 मई 2014

पिछले हफ्ते मैंने आपको सन 2006 में समलैंगिकों के लिए आयोजित कार्यशाला के बारे में बताया था। जिस महिला ने वह कार्यशाला आयोजित की थी, वह समलैंगिक थी। उसने मुझे बताया कि पहले वह शादीशुदा थी मगर अपने पति से तलाक हो जाने के बाद अब वह सिर्फ महिला साथियों के साथ हमबिस्तर होती है। वह अकेली महिला नहीं थी, जिसने मुझे ऐसी कहानी सुनाई थी या जिसने मुझपर यह तथ्य उजागर किया था। लेकिन तुलनात्मक रूप से बहुत कम समलैंगिक पुरुषों ने अपने इस तरह के अनुभवों का ज़िक्र किया। आज मैं इस विषय पर महिलाओं के सन्दर्भ में बात करूंगा- पुरुषों के साथ सम्बन्ध कायम हो जाने के बाद भी क्यों महिलाएँ दूसरी महिलाओं के प्रति आकर्षित होती हैं जबकि पुरुषों के मामले में यह बहुत कम सुनाई पड़ता है?

जैसा कि मैं पहले ज़िक्र कर चुका हूँ, उस समय तक बड़ी संख्या में समलैंगिकों के साथ मेरी मुलाकातें हो चुकी थीं। मैं हजारों की तादात में व्यक्तिगत-सत्र ले चुका था और मैं मानता हूँ कि अधिकांश समलैंगिक आध्यात्मिक विषयों में काफी रूचि रखते हैं-शायद इसलिए कि सिर्फ समलैंगिक होने के कारण पहले ही वे वैचारिक रूप से मुख्यधारा के लोगों से 'अलग' होते हैं। तो, मेरे बहुत से व्यक्तिगत-सत्रों में से कई इन समलैंगिक पुरुषों और महिलाओं के साथ हुआ करते थे। और इन महिला समलैंगिकों में से बहुतों ने मुझसे कहा कि पहले उनके सम्बन्ध पुरुषों के साथ भी रह चुके हैं।

इस तरह मुझे बहुत सी समलैंगिक महिलाओं से मिलने का मौका मिला, खासकर उम्र की चौथी दहाई में प्रवेश कर चुकी महिलाओं से, जिनके वयस्क बच्चे भी थे। जर्मनी, आयरलैंड, आस्ट्रेलिया और बहुत से दूसरे देशों में। उनमें से कुछ उभयलिंगी (बायसेक्सुअल) थे और कहते थे कि इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उनका साबका किसी पुरुष से है या महिला से! चाहे एक रात का सम्बन्ध हो या दीर्घकालीन, वह पुरुष या महिला किसी से भी हो सकता था।

क्या महिलाओं का यह व्यवहार पूरी तरह समझ में आने वाला है क्योंकि एक खास उम्र के बाद उन्हें सिर्फ प्रेम और स्नेह की आवश्यकता होती है, जो उन्हें पुरुषों से प्राप्त नहीं हो पाता और वे समलैंगिक महिलाओं की ओर रुख कर लेती हैं? क्या वे जानती हैं कि पुरुषों के साथ हुए कटु अनुभव के बाद कोई महिला ही यह ज़्यादा अच्छी तरह समझ सकती हैं कि इस दौरान उन्हें क्या-क्या भुगतना पड़ा है और किसी पुरुष के मुकाबले एक महिला ही उनके प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो सकती है? या क्या महिलाओं में बड़ी संख्या में समलैंगिकता का रुझान उनका जन्मजात गुण है?

मेरा विश्वास है- और कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों के बारे में मैंने पढ़ा है, जो मेरे इस विश्वास को सत्य सिद्ध करती हैं- कि समलैंगिकता मनुष्य के जींस में ही मौजूद होती है। मैं वैज्ञानिक नहीं हूँ और इसका विस्तृत विवरण प्रस्तुत नहीं कर पाऊँगा मगर उस अध्ययन का निष्कर्ष यह था कि यह किसी महिला की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर नहीं है कि वह एक महिला को पुरुष से ज़्यादा आकर्षक पाती है। या इसके विपरीत, कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुष को महिला से ज़्यादा आकर्षक पाता है तो वह भी उस पुरुष की व्यक्तिगत इच्छा का प्रश्न नहीं है।

मुझे लगता है कि इसका कारण महिलाओं की सामान्य अनुभूतियों और उनकी प्रतिक्रियाओं और उनके प्रति समाज के आम व्यवहार और उसकी कार्यप्रणाली में निहित है। महिलाएँ अपने वातावरण, माहौल और परिस्थितियों के चलते विवाह करके स्थापित होने और बच्चे पैदा करने का दबाव महसूस करती हैं। और अनजाने ही वे इस दबाव के सामने समर्पण कर देती हैं। इस तरह वे अपनी भावनाओं का दमन करते हुए वही करती हैं, जिसकी समाज को उनसे अपेक्षा होती है।

और यह भी नहीं है कि अचानक एक विशेष दिन कोई किशोर लड़की सोकर उठे और अनुभव करे कि वह समलैंगिक है। यह संभव है कि वह अपनी सहेलियों की तरफ आकृष्ट हो मगर यह न समझ पाए कि यह पूरी तरह सामान्य बात है। यह संभव है कि वह यह न समझ पाए कि क्यों नहीं वह दूसरी महिलाओं की तरह अपने पति की ओर आकृष्ट नहीं है। लेकिन जब वे समाज के दबावों से मुक्त होती हैं तब वे वाकई बंधन-मुक्त हो जाती हैं। और तभी अपनी वास्तविक यौन संबंधी प्राथमिकताओं (orientation) के अनुसार वे अपना निर्णय ले पाती हैं।

कितनी समलैंगिक महिलाओं के पुरुषों के साथ वर्षों यौन सम्बन्ध रहे, इसे जानने के बाद 2006 में मैं इस नतीजे पर पहुंचा था। अगले सप्ताह मैं पुरुष समलैंगिकों और उनके द्वारा अपनी यौन प्राथमिकताओं या पसंद-नापसंद को कार्यरूप में परिणत करने के तरीकों पर अपने विचार रखूँगा।

समलैंगिक – अलग मगर उतने अलग भी नहीं – 4 मई 2014

2006 में यूरोप यात्रा के दौरान भी मेरी ध्यान-योग की कार्यशालाएं और व्यक्तिगत सत्र लगातार जारी रहे और हमेशा की तरह मुझे तरह-तरह के लोगों से मिलने का मौका मिला। पिछले सालों की तरह इस बार भी मैं बहुत से समलैंगिकों से मिला लेकिन इस बार मुझे उनके संगठन को, जिसे वे LGBT कम्यूनिटी कहते हैं, कुछ अधिक करीब से देखने और जानने का मौका मिला।

भारत में समलैंगिक सम्बन्ध अवैध हैं। पश्चिम के आधुनिक देशों में रहने वालों को यह मूर्खतापूर्ण और कुत्सित लग सकता है कि सेक्स जैसी चीज़ पर, जो हमारे जींस की संरचना पर आधारित होती है, इस तरह पाबन्दी लगाई जा सकती है। लेकिन यही दुखद सत्य है और जबकि समलैंगिक शब्द का प्रयोग एक अपमान की तरह किया जाता है, वे लोग जो समलिंगी पुरुष या महिला की ओर आकृष्ट हो जाते हैं, समाज से छिपते फिरते हैं। आप समलैंगिक पुरुषों के विषय में चर्चा सुन सकते हैं, आप अफवाह सुन सकते हैं कि फलां व्यक्ति समलैंगिक है लेकिन वे भी अपने संबंधों को गुप्त ही रखते हैं। महिलाओं के सन्दर्भ में बात दूसरी हो जाती है: भारत में ऐसे संबंधों का ज़िक्र तक नहीं किया जाता, जैसे किसी महिला का किसी दूसरी महिला के प्रति यौन आकर्षण संभव ही नहीं है।

जब मैं पश्चिमी देशों में गया तो मैं पहले से जानता था कि यहाँ मामला बिल्कुल दूसरा है। मैं जानता भी था और इससे मुझे कोई फर्क भी नहीं पड़ता था। जब पहले-पहल मैं देश से बाहर निकला, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वहां किसी महिला से मेरा किसी तरह का सम्बन्ध बन सकता है-और पुरुषों में मेरी कोई रूचि वैसे भी नहीं थी। और जिन्हें थी, उन पुरुषों के लिए, मैं भला क्यों परेशान होता? और अगर कोई महिला पुरुष की जगह किसी दूसरी महिला के साथ हमबिस्तर होती है तो उससे मुझे क्या फर्क पड़ता है? तो, मैंने नोटिस किया कि यहाँ समलैंगिक सम्बन्ध बहुत आम हैं और जिन शहरों में मैं गया, पाया कि वहाँ इन संबंधों को खुले आम जिया जाता है। और यह बात मेरे लिए महज एक सूचना थी, एक तथ्य था, जिसे मैंने उसी सहजता के साथ स्वीकार कर लिया जैसे यह एक तथ्य था कि कुछ लोग फल और सब्जियां हाट-बाज़ार से नहीं सुपरमार्केट से खरीदते हैं और जिसे मैंने सहजता के साथ स्वीकार कर लिया था।

मेरे व्यक्तिगत सत्रों में समलैंगिक पुरुष और महिलाएं आया करती थीं और अपनी साझेदारियों और अपने साथी के साथ सहजीवन के बारे में उनके वही प्रश्न होते थे, जो साधारण दम्पतियों द्वारा अक्सर पूछे जाते थे। जर्मनी में मेरा मेरे कई कार्यक्रमों में गाने-बजाने वाला एक संगीतज्ञ समलैंगिक था और हम लोग अच्छे, सामान्य मित्र थे। एक समलैंगिक महिला, जो हमारे अंतर्राष्ट्रीय योग प्रशिक्षण कार्यक्रम में यशेंदु और मेरे लिए अनुवाद का काम करती थी, के साथ भी मेरा काफी नजदीकी कारोबारी सम्बन्ध था और हम अच्छे मित्र भी बन गए थे। मेरे लिए यह बिल्कुल सामान्य बात थी और बहुत समय तक वह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं बनी मगर एक दिन एक समलैंगिक महिला ने, जो पहले मेरे लुनेबर्ग प्रवास के दौरान मेरे पास सलाह लेने आई थी, और जब मैं कोपेनहेगन में था तब उसने मुझे पत्र लिखा।

मेरी सलाह उसे रास आई थी और मुझे लगता है कि उसे मुझसे कुछ और प्रश्न पूछने थे और इसलिए वह एक कार्यशाला आयोजित करना चाहती थी। अपने समलैंगिक मित्रों के लिए कार्यशाला! यह एक नई बात थी लेकिन मुझे यह विचार अच्छा लगा था। और क्यों न लगता?

और इस तरह कुछ हफ़्तों बाद मैं एक बड़े से हॉल में महिला और पुरुष समलैंगिकों, उभयलिंगियों और शायद परिवर्तित-लिंगी पुरुषों और महिलाओं (transgender men and women) की भीड़ के सामने बैठा था और जीवन की सबसे जीवंत कार्यशाला संचालित कर रहा था। और उसका विषय क्या था? निश्चित ही सेक्स! यौन सम्बन्ध और उनसे जुडी समस्याएँ! आपसी, अन्तरंग सम्बन्ध, सेक्स और स्वतंत्रता, प्रेम आदि, आदि, जो विपरीतलिंगियों (यानी सामान्य लोगों) के लिए जितने रुचिकर हो सकते हैं उतने ही इन लोगों के लिए भी थे।

उन्हें कार्यक्रम में बड़ा मज़ा आया, मुझे भी आया और सच तो यह है कि वह किसी भी तरह दूसरे सामान्य कार्यक्रमों से अलग नहीं था, सब कुछ सामान्य दिनों की तरह था। तो वही प्रश्न फिर उपस्थित होता है: सेक्स और उससे सम्बंधित मामलों में छोटी-छोटी बातों पर हम हौवा क्यों खड़ा कर देते हैं?

तुम्हारी पेशकदमी को नज़रअंदाज़ करता हूँ, इसका मतलब यह नहीं कि मैं समलैंगिक हूँ! 25 अगस्त 2013

पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था कि 2005 में मेरे आस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान मेरी आयोजक ने मेरे लिए एक व्यक्तिगत नृत्य प्रदर्शन किया था। इस अश्लील नृत्य से मेरे अंदर उसके प्रति कोई रुचि तो जागृत नहीं हो पाई मगर मैं एक अजीबोगरीब स्थिति में फंस ज़रूर गया। वह जो काम कर रही थी उसे वह तंत्र कहती थी और कार्यशिविरों और मसाज-सत्रों का, जो, उसके अनुसार, यौन-तंत्र को उत्तेजित करते थे, आयोजन करती थी। पहले ही मैं उसके केंद्र में अपने कार्यक्रम के आयोजन को लेकर शंकित था और अब मैं यह भी जानता था कि मेरे इंकार पर वह मुझसे खफा भी है। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं थी लेकिन रात में अपने बिस्तर पर यह सोचते हुए कि अब किया क्या जाए, मैंने तय किया कि इस स्थिति को ऐसा मोड़ दिया जाए कि कम से कम नुकसान हो। दुर्भाग्य से यह भी मेरी योजना के अनुरूप नहीं हो पाया!

मैंने अपने दिन की शुरुआत इस तरह की, जैसे रात में कुछ हुआ ही न हो। मुझे खुशी हुई, जब मैंने देखा कि वह भी अपनी निराशा से उबर चुकी है। उसने मुझसे हमारे कार्यक्रमों के बारे में बातचीत की और बताया कि शाम को सामूहिक योग-सत्र भी चलाया जाएगा। मैंने अपना काम शुरू कर दिया।

उस केंद्र में मेरी आयोजक का एक सहयोगी भी था जो सबेरे आया और जो लोग मुझसे मिलने आ रहे थे, उनके स्वागत के दौरान मेरी सहायता करता रहा और फिर समयानुसार कार्यक्रम के संचालन में भी लगा रहा। मेरे कुछ व्यक्तिगत-सत्र भी थे और स्वाभाविक ही, अपनी आयोजिका के साथ मेरी कुछ बातें भी हुईं। फिर दोपहर में, यह उत्सुक, खुशमिजाज़ सी दिखने वाली महिला फिर मेरे पास आई और साफ शब्दों में यह व्यक्तिगत प्रश्न पूछा- "मैंने सुना है आप महिलाओं से ज़्यादा पुरुषों में रुचि रखते हैं! क्या यह सच है?" मैं सन्न रह गया। पल भर रुककर मैंने उससे कहा कि मैं पुरुषों के प्रति बिल्कुल आकर्षित नहीं हूँ। लेकिन मैं समझ गया कि मेरी आयोजक क्यों इस तरह की अफवाहें फैला रही है। मैंने उसके स्पष्ट प्रलोभन को ठुकरा दिया था और उसकी नज़र में उसका तार्किक अर्थ यही था कि मैं समलैंगिक हूँ!

इस वार्तालाप ने मुझे एक ईमेल का पुनः स्मरण करा दिया, जो कुछ देर पहले ही मुझे मिला था: यह एक पुरुष का ईमेल था, जो, ईमेल के अनुसार, मेरे प्रति आकर्षण महसूस करता था; लेकिन उसकी स्वच्छंद भाषा ऐसी थी कि अगर उसे पुस्तकाकार में छपवा दिया जाए तो उसे पढ़ना किसी समलैंगिक अश्लील (पॉर्न) साहित्य को पढ़ने जैसा होगा। यह पता चलने के बाद कि मेरे बारे में किस तरह की अफवाहें फैली हुई हैं, मैं समझ गया कि यह ईमेल मेरे इनबॉक्स में कैसे पहुंचा!

मैं जिस स्थिति में फंस गया था वह दिलचस्प थी लेकिन मैंने सोचा कि यह बात कि मैं समलैंगिक हूँ, मुझे किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा रही है और न ही इससे सीधे-सीधे मेरा कोई अपमान ही हो रहा है-लिहाजा, मैंने इसे भी तूल न देने का निश्चय किया।

लेकिन शाम को मेरा एक ऐसी बात से सामना हुआ, जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई: जब लोग ध्यान के लिए आते हैं तो आयोजक मेरी फ्लायर-शीट्स और ब्रोशर्स एक टेबल पर प्रदर्शित कर देते हैं। मैंने देखा कि मेरे ब्रोशर्स पर संपर्क-सूत्र वाली जगह पर, जिसमें मेरी वैबसाइट, ईमेल, फोन नंबर आदि की जानकारियाँ होती हैं, उसे मिटाकर, एक दूसरा कागज़ स्टेपल कर दिया गया था और जिससे मेरे संपर्क की जानकारी कोई पढ़ नहीं सकता था। मैं इस बात से बहुत विचलित हुआ क्योंकि अब कोई भी सीधे मुझसे संपर्क नहीं कर सकता था, न ही मेरी वैबसाइट पर जा सकता था!

ध्यान से पहले हमारे पास ज़्यादा वक़्त नहीं था और जब मैंने अपनी आयोजक से इस बारे में पूछा तो उसने उड़ता सा जवाब दिया- "मैं आपके आस्ट्रेलियाई कार्यक्रमों के स्वत्वाधिकार (exclusive rights) प्राप्त करना चाहती हूँ! मैं सारे देश में आपकी बुकिंग आदि किया करूंगी-हम इस बारे में बाद में बात करते हैं…!" अब तो ये कुछ जादा ही हो गया था और यह मुझे किसी कदर मंजूर नहीं था, मगर मैं शांत और सामान्य बना रहा। मैंने अपना प्रवचन सत्र बहुत से लोगों के साथ, सुचारू रूप से सम्पन्न किया।

लोग उसके संपर्क-विवरण वाली मेरी फ्लायर-शीट्स ले गए थे और लोगों के वापस चले जाने के बाद भी बार-बार उसका फोन बज उठता था। लोग धड़ाधड़ बुकिंग किए जा रहे थे। मैं बैठा रहता था और फोन आने पर वह बाहर निकलकर बात करती थी। एक बार मैं ज़रा-सी झपकी ले रहा था कि मैंने बाहर उसकी आवाज़ सुनी। वह किसी से बात कर रही थी और इसी बात को सुनकर अंततः मैंने उससे संबंध विच्छेद करने का निर्णय किया।

फोन पर दूसरी तरफ कोई पुरुष था और स्वाभाविक ही, व्यक्तिगत सत्र का इच्छुक था। मेरी आयोजक उससे कह रही थी- "उनके साथ आपको यह सत्र अवश्य करना चाहिए। जो लोग उनके साथ ऐसे सत्रों में शामिल हुए हैं, उनसे मैंने सुना है कि वे हवा में तैरता महसूस कर रहे थे और उनमें अद्भुत तांत्रिक शक्ति का संचार हो गया था! उन्हें ऐसा अद्भुत और आनंददायक अनुभव जीवन में पहले कभी नहीं हुआ था! मैंने सुना है कि वे पुरुषों को तरजीह देते हैं, इसलिए उनके साथ खास तौर से आपका व्यक्तिगत-सत्र बहुत आनंददायक होगा!"

इस वक़्त तक मेरे सामने यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी थी कि वह किस तरह का काम करती है और जब वह ये बातें कर ही रही थी, मैंने तय कर लिया कि अब किसी भी सूरत में इस महिला के साथ काम नहीं करना है! वह मेरे कार्य-शिविरों को यौन संबंधी तांत्रिक-शिविर की तरह बेचना चाहती थी, जब कि मैं सिर्फ ध्यान और योग के कार्यक्रम करता हूँ! इसके अलावा और भी बहुत सी ऊलजलूल बातें वह मेरे बारे में फैला सकती थी!

निर्णय तो ले लिया गया-मगर अब मैं करूँ क्या? इस बात को उसे कैसे समझाया जाए और अगर बात करने के बाद मैं वहाँ न रहना चाहूँ तो जाऊंगा कहाँ? मुझे परेशान करने वाले ये सवाल अंततः हल कैसे हुए, इसके बारे में मैं आपको अगले सप्ताह बताऊंगा!

क्रूर धर्म किस तरह अपने अनुयायियों को यातना देते हैं – 10 अप्रैल 2013

कल मैंने धर्म से उपजी शारीरिक क्रूरता के बारे में लिखा था, जोकि आज भी इस धरती पर व्यापक रूप से पायी जाती है। हालांकि यह सच है और स्पष्ट ही बहुत भयानक भी है, मगर क्रूरता का एक और रूप भी है जो हमारे और भी नजदीक मौजूद है, हमारे घर के आसपास और वह है मानसिक क्रूरता।

शारीरिक हिंसा क्रूरता का सबसे आम तरीका है। जब आप धार्मिक हिंसा के बारे में कुछ कहते हैं तो आप महिलाओं को कोड़े मारने वाले इस्लामिक कट्टरपंथियों की हिंसा के बारे में सोचते हैं क्योंकि उन्हें पथभ्रष्ट माना जाता है। हो सकता है आपको क्रूसेड्स के समय की ईसाइयों की हिंसा की याद आ जाए, जो हर एक को अपने धर्म में दीक्षित करना चाहते थे। या आप हिंदुओं की सती प्रथा के बारे में सोच सकते हैं जिसमें मृत पति के साथ उनकी विधवाओं को ज़िंदा जला दिया जाता था। आपको आतंकवाद, बम धमाके और आत्मघाती हमलों की याद आ सकती है।

यह सब शारीरिक हिंसा है मगर हिंसा का एक और रूप मौजूद है और वह है मानसिक हिंसा। अक्सर यह हिंसा और भी ज़्यादा क्रूर हो सकती है! जब आप अपने विचारों में घृणा और हिंसा से भरे हुए होते हैं तो आप किसी को शारीरिक हमले से भी ज़्यादा बुरी तरह ज़ख़्मी कर सकते हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध एक बार जब यह मानसिक हिंसा संस्कृति में समाकर वहाँ सूक्ष्म अवस्था में मगर मजबूती के साथ पैर जमाए बैठ जाती है तब वह बेहद खतरनाक हो सकती है।

अगर आप अब भी नहीं समझे कि मैं किस हिंसा की बात कर रहा हूँ तो मुझे कुछ उदाहरणों की सहायता से अपनी बात रखनी होगी। जैसे हमारा देश भारत, इतने अर्से बाद भी जाति प्रथा को समाप्त नहीं कर पाया है। इस प्रथा की जड़ें धर्म में हैं और धर्म के कारण आज भी बहुत से लोग हैं जिन्हें अछूत समझा जा रहा है। क्या किसी इंसान से यह कहना कि तुम मेरा हाथ मत छुओ क्योंकि तुमने एक अछूत परिवार में जन्म लिया है, एक भयानक बात नहीं है? उस व्यक्ति को कैसा लगेगा जब उसे पता चलेगा कि जैसे ही उसने आपको छुआ आपने अपने आपको शुद्ध करने के लिए नहाने का निर्णय ले लिया है?

मुस्लिम औरतों के बारे में सोचें जिन्हें अपने आपको बुर्के में छिपाना पड़ता है, अपना सिर, अपने बाल, अपना चेहरा और अपना पूरा शरीर! कुछ लोग कह सकते हैं कि यह उनका अपना चुनाव है, अपना निर्णय है, वे बुर्के में अपने आपको सुरक्षित महसूस करती हैं, उन्हें यही उचित लगता है; मगर उनका क्या जिन्हें यह अच्छा नहीं लगता फिर भी मजबूरन पहनना पड़ता है? क्या यह मानसिक यातना नहीं है कि आप किसी औरत से कहें कि वह एक निम्न कोटि की प्राणी है जो अपना चेहरा दिखाकर मर्दों को रिझाने की कोशिश करती है। जब कोई मुस्लिम औरत बलात्कार का शिकार होती है, इस्लाम का नियम यह कहता है कि उसे चार गवाह प्रस्तुत करने होंगे अन्यथा फैसला उसके विरुद्ध सुनाया जाएगा। कल्पना कीजिए, बलात्कार की शारीरिक प्रताड़ना के बाद उसे मानसिक रूप से ध्वस्त करने का पूरा इंतज़ाम है।

इसाइयत भी कोई कम क्रूर नहीं है! आज भी बहुत से ईसाई हैं जो यह समझते हैं कि समलैंगिकता एक बीमारी है या उससे बढ़कर एक पाप कर्म है! किसी समलैंगिक पुरुष या महिला से पूछिए; वे बताएंगे कि उनके पास कोई चारा नहीं है, विपरीत लिंगी व्यक्ति की ओर उन्हें यौन आकर्षण हो ही नहीं पाता। इसके बावजूद लोग उनके साथ अपराधी का सा व्यवहार करते हैं, उन्हें घृणास्पद मानते हैं और अपने बच्चों को भी उनके बारे में यही बताते हैं! वे यह घृणा उन समलैंगिक जोड़ों द्वारा गोद लिए बच्चों के सामने भी व्यक्त करते हैं जिससे वे भी अपने माँ-बाप के प्रति घृणा महसूस करें। इससे ज़्यादा क्रूर बात क्या होगी कि आप छोटे-छोटे बच्चों को यह बताएं कि तुम्हारा लालन-पालन करने वाले माँ-बाप पापी हैं?

यह सब आपके घर के सामने हो रहा है! अब आप इन्हें यह कहकर अनदेखा नहीं कर सकते कि ये सब सुदूर दुनिया की सचाइयाँ हैं। यह सब आपके आसपास हो रहा है, आपके चारों तरफ और मैं आपको सिर्फ उनसे आगाह करना चाहता हूँ! मैं चाहता हूँ कि आप देखें कि कैसे दुनिया मैं फैल रही आपसी घृणा, डर और हिंसा समाज पर धर्म के बुरे असर का परिणाम है।

कोई धर्म नहीं है जो हिंसक नहीं रहा है, अगर शारीरिक स्तर पर नहीं तो मानसिक स्तर पर है। औरतों के विरुद्ध पक्षपात और भेदभाव बौद्ध धर्म में भी मौजूद है और इस तरह वह भी किसी न किसी तरह की हिंसा से अछूता नहीं है।

मैं नहीं कहता कि आप अपना धर्म छोड़ दें। मैं नहीं कहता कि आप अपने विश्वास को तिलांजलि दे दें। मैं आपसे सिर्फ यह अपेक्षा करता हूँ कि आप सोचें कि आप क्या करना पसंद करेंगे-हिंसा और क्रूरता का पक्ष लेना या परंपरा के चक्र को तोड़ने की पहल करना और प्रेम का प्रसार करना? अब यह आप पर निर्भर है कि आप अपने हित में इस प्रश्न का क्या जवाब देते हैं!

जब बात सेक्स की हो तो सवाल उठता है स्वतंत्रता और सहिष्णुता का – 1 मार्च 13

पिछले दिनों मेरे द्वारा लिखे गए डायरी के पन्नों पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं मिलीं। उनमें से कुछ मेरी बात से सहमत नहीं थे। यह कोई नई बात नहीं है और न ही यह ग़लत या असामान्य है। हम सबकी अपनी अलग राय हो सकती है। मैंने भी अपनी राय ज़ाहिर की है और आप इसके विरोध में बोलने के लिए स्वतंत्र हैं और मुझे इस बात की भी आजादी है कि मैं यह जानते हुए भी कि आप मेरी बात का विरोध कर रहे हैं, अपनी बात पर कायम रहूं। आज मैं इसी विषय पर लिखना चाहूंगाः लोगों को न केवल इस बात की आजादी हो कि वे जो कहना चाहें कहें बल्कि जो भी वे करना चाहे, उसकी पूरी छूट उन्हें मिलें बशर्ते कि उनके इस काम से दूसरे को कोई नुकसान न पहुंचे।

हां, मैं कहता हूं कि हम सभी को मनचाहा काम करने की आजादी है बशर्ते कि वह काम गैरकानूनी न हो और उससे किसी को नुकसान न पहुंचता हो। कुछ लोग इस बात में यकीन नहीं रखते। वे कहते हैं कि हम सभी को मनचाहा काम करने की आजादी है बशर्ते समाज इसे स्वीकार करता हो, बशर्ते यह मेरे धार्मिक विश्वास के अनुरूप हो या फिर अन्य कुछ ऐसी ही बंदिशें वे लगाते हैं। सच्चाई यह है कि देश का कानून सर्वोपरि होता है और हम अपने नैतिक मूल्यों को दूसरों पर थोप नहीं सकते।

यदि आप मानते हैं कि एक रात की हमबिस्तरी ग़लत है तो आप यह काम मत करिए। अग़र आपको लगता है कि ‘स्वच्छंद प्रेमसंबंध’, जिसमे हर कोई जिसके साथ चाहे यौनसंबंध रख सकता है, अनैतिक हैं तो आप इस प्रकार के संबंध मत रखिए। कुछ लोगों का मानना है कि समलैंगिकता नैतिक तौर पर ग़लत है या औरतों का घर से निकलकर बाहर काम पर जाना ग़लत है। यदि आप भी उनमें से एक हैं तो आप ऐसा सोचने और मानने के लिए स्वतंत्र हैं । कोई आपको समलैंगिक बनने या कामकाजी महिला से विवाह करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

लेकिन याद रहे कि आप लोगों पर अपनी नैतिकता या ग़लत – सही की अवधारणा को थोप नहीं सकते। जब वे आपकी ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं तो आपको भी उनकी आजादी में दख़ल देने का कोई अधिकार नहीं रह जाता। यदि आप इस बात को स्वीकार कर लें तो हम सभी शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं।

मेरी राय में जब दो व्यक्ति मिलते हैं, एक दूसरे को पसंद करते हैं और आपसे में शारीरिक संबंध बनाना चाहते हैं तो इस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए बशर्ते कि वे ऐसा करके अपने किसी और साथी को धोखा न दे रहे हों। यदि वे एक हफ्ते बाद या फिर अगले ही दिन यह मन बनाते हैं कि वे किसी और नए व्यक्ति के साथ सेक्स करना चाहते हैं तो यह उनका व्यक्तिगत मामला है। बेहतर होगा कि वे ऐसा करते हुए कंडोम का इस्तेमाल करें ताकि बीमारियों से सुरक्षित रहें।

अग़र आप इस बात से असहमत हैं तो कोई बात नहीं। अपने नैतिक मूल्यों को स्वयं तक सीमित रखें। कोई भी ऐसा काम न करें जिसके लिए आपकी अंतरात्मा ग़वाही न दें। लेकिन इस बात को समझें कि दूसरे लोग इसी काम को करते हुए किसी प्रकार के अपराधबोध से ग्रस्त नहीं होते और न ही उनके इस काम से आपको कोई नुकसान होता है। तो फिर आप क्यों इसका विरोध कर रहे हैं?

बेशक हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का हक़ है। इसी प्रकार आपको भी यह कहने और करने का हक़ है कि आप एक साल में दो से ज्यादा या जितने आप निश्चित करें, व्यक्तियों के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाएंगें। लेकिन आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि आपके क्रियाकलापों और शब्दों से उन लोगों को आघात न पहुंचे जो आपसे अलग विचार रखते हैं। आप अपने विचार व्यक्त करें यह जानते हुए कि दूसरों को आपकी बात से असहमत होने का पूरा अधिकार है। अभद्र भाषा का प्रयोग न करें। शिष्टाचार का पालन करें।

इसी को सहिष्णुता कहते हैं। यदि आप लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहते हैं, अपनी स्वतंत्रता में यकीन रखते हैं और अपने नैतिक मूल्यों को केवल अपने तक सीमित रखते हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं तो आपको सहिष्णु बनना ही होगा और उन लोगों को स्वीकार करना होगा जो आपसे भिन्न मत रखते हैं।