अपरा का चौथा जन्मदिन समारोह – 10 जनवरी 2016

कल अपरा का चौथा जन्मदिन था! हर साल की तरह स्कूल के बच्चों और बहुत सारे दोस्तों के साथ इस साल भी शानदार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें स्वादिष्ट खाने का लुत्फ भी लिया गया!

दिन की शुरुआत हुई आश्रम की सजावट के साथ। हमारा इरादा सिर्फ फुग्गे लगाने का था-लेकिन हजारों की संख्या में! इस इरादे से हमने फुग्गे और फुग्गे फुलाने की मशीन खरीदी, जो बिजली से चलती है और पल भर में फुग्गे फुला देती है। अन्यथा हमें कई दिन पहले से मुँह से फुग्गे फुलाने पड़ते! कुछ अनुभवी लोगों ने तड़के सबेरे से फुग्गे फुलाने शुरू किए और फिर उनसे रंगीन तोरणद्वार बनाए और बड़ी-बड़ी सुंदर मालाएँ भी बनाईं।

हमारी अपेक्षा से कुछ देर से रसोइयों ने अपना काम शुरू किया। मेरे खयाल से गलती उनकी नहीं थी, हमारी थी कि हम कुछ ज्यादा उम्मीद कर गए। रसोइयों ने सफाई पेश की: “इतनी ठंड है, कोई भी इतनी जल्दी सबेरे नहीं उठना चाहता!” खैर, आखिर किसी तरह वे जागे और फिर योजना के अनुसार एक से एक स्वादिष्ट खाने की वस्तुएँ बनाने की तैयारी शुरू कर दी।

दस बजे लगभग सारे खास मेहमान पधार चुके थे: यानी हमारे स्कूल के बच्चे! उनके अलावा हमारे कुछ सबसे प्यारे मित्र भी धीरे-धीरे आने लगे-और उसके बाद नाच-गाने के साथ तुरंत ही हमने पार्टी शुरू कर दी। बच्चे जब झूम-झूमकर नाचने-गाने लगते हैं, तो वह समय सबसे खूबसूरत होता है और बड़ों सहित दूसरे सब भी अपनी झिझक और शर्म भूलकर उसमें शामिल हो जाते हैं!

इसी बीच अपरा को भूख लग गई-आखिर जब से उठी थी उसने कुछ नहीं खाया था, क्योंकि वह भी तो सारी तैयारियों में लगी हुई थी और बाद में उपहार ले रही थी, चॉकलेट खा रही थी! तो जब सब लोग गानों की धुनों पर थिरक रहे थे, रमोना उसे लेकर खाने के स्टाल्स की तरफ चली गई, जहाँ नूडल्स थे, पैनकेक थे और कुछ दूसरे नाश्ते और मिठाइयाँ रखी थी और अब भी तैयार किए जा रहे थे, जिससे मेहमानों को गरमागरम नाश्ता प्राप्त हो सके। वहाँ रमोना ने एक प्लेट में अपरा के लिए सबसे पहले नूडल्स निकाले और उसके जर्मन नाना के लिए आलू की टिकिया। धींगामस्ती और होहल्ले के सबसे पीछे बैठकर दोनों ने पार्टी के पहले स्वादिष्ट कौर का स्वाद लिया!

अपरा को पहले ही खिलाकर रमोना ने अच्छा किया क्योंकि जब औपचारिक रूप से नाश्ते का दौर शुरू हुआ तो स्कूल के बच्चे उन पर टूट पड़े और बहुत देर तक कोई दूसरा खानों तक पहुँच ही नहीं सकता था क्योंकि सामने अपनी बारी का इंतज़ार करता हुआ बच्चों का विशाल हुजूम होता था! काफी समय बाद तक वे लोग अपने मुँह में एक से एक स्वादिष्ट नाश्ते लिए फिरते रहे और पेट भरने तक खाते रहे। उनके लिए यह पार्टी का सबसे शानदार दौर होता है और वे उस अत्यंत सुस्वादु नाश्ते को भोजन की तरह खाते हुए बेहद खुश और रोमांचित थे।

केक काटने से पहले कुछ और नाच-गाना हुआ। अपरा ने पहला कट लगाया और बाद में सबको उस अत्यंत स्वादिष्ट केक का एक-एक टुकड़ा प्राप्त हुआ। जब अपरा ने अपना हिस्सा खा लिया, वह भी डांस फ्लोर पर नाच रहे लोगों में शामिल हो गई और अपना खुद का प्रदर्शन भी प्रस्तुत किया-एक डांस जिसे पिछले हफ्ते ही उसने सीखा था।

अंत में, जब बच्चे और हमारे कुछ मेहमान चले गए, अपरा ने अपने उपहार खोलना शुरू किया: सुंदर वस्त्र, रंगीन पेंसिलें और दूसरे खेल-खिलौने!

अंत में हमने आराम से बैठकर सुस्वादु डिनर के साथ पार्टी का समापन किया और शाम का बाकी का समय उन दोस्तों के साथ बढ़िया गपशप में गुज़ारा, जो रात को रुकने वाले थे।

पार्टी बहुत शानदार रही: अपरा के जन्म का चौथा स्मरण और पुराने मित्रों के साथ दोबारा एकत्र होने का सुअवसर!

हमें घनिष्ट रूप से जुड़ना पसंद है – एक कैनेडियन योग दल का आश्रम आगमन – 13 दिसंबर 2015

कैनेडियन योग दल

पिछले हफ्ते हम आश्रम में कुछ बहुत शानदार लोगों के साथ पूरी तरह व्यस्त रहे: हमारे आश्रम में कैनेडा से एक योग-दल आया था! मुझे कहना चाहिए कि एक बार फिर हमें अपना घर कुछ बहुत सुंदर लोगों के साथ साझा करने का अवसर मिला था!

तीन साल पहले एक योग शिक्षिका हमारे आश्रम में आई थी और उसने हमारे योग-अवकाश शिविर में हिस्सा लिया था। उस समय बहुत से दूसरे लोग भी यहाँ आए थे। उन्होंने यहाँ खूब मौज-मस्ती की थी और विश्रांति लेने के बाद तरोताज़ा होकर वापस गए थे। उनमें से दो लोगों का पुनः स्वागत करने का अवसर हमें इसी साल पहले ही मिल चुका था और यह ऐसा तीसरा सुअवसर था! जब से एलेक्सिस यहाँ से गई थी, उसे हरदम लगता था कि वह पुनः हमारे आश्रम अवश्य आएगी और संभव हुआ तो अपने कुछ साथियों को लेकर भी आएगी।

इस तरह बारह लोगों का एक दल, उसी दिन हमारे आश्रम पहुँचा जिस दिन हम खुद अपनी जर्मनी यात्रा से वापस आए थे। यह दल हमारे योग-विश्रांति शिविर में हिस्सा लेने आया था। हमें ऐसे संबंध बनाना बहुत पसंद है और यह और भी अच्छा लगता है, जब वे कई दूसरे लोगों को लेकर भी आते हैं, ऐसे लोगों को, जो शायद अकेले भारत आने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे!

हमने उनके लिए ताजमहल देखने का इंतज़ाम किया था, जो दिन भर का आगरा प्रवास था। और एक दिन वे हमारे छोटे से शहर के बाज़ारों में घूमते-फिरते रहे, मंदिर देखे और आसपास के दर्शनीय स्थलों का दौरा किया। लेकिन ज़्यादातर समय वे आश्रम की दिनचर्या का जायज़ा लेते हुए गुज़ारते थे। वे आश्रम की दैनिक गतिविधियों से इतने प्रभावित थे कि न सिर्फ उसे बारीकी से देखने-समझने की कोशिश करते बल्कि खुद भी उसके साथ अंतरंग रूप से जुड़ने की और उसके अनुसार ढलने की कोशिश भी करते। स्कूल देखने के बाद वे बच्चों को खाना परोसने में मदद करने लगे, बच्चों की योग कक्षा में शामिल हुए और निश्चित ही, हमने आश्रम में तैयार सुस्वादु भोजन भी साथ-साथ किया। मैं उन्हें अपना निर्माणाधीन रेस्तराँ दिखाने ले गया और उसे लेकर हमारी योजना की जानकारी दी। इसके अलावा, सबने आयुर्वेदिक मालिश और विश्रांति संबंधी उपचार की सेवाओं का लाभ उठाया और शरीर के उन बिंदुओं पर ख़ास वर्जिश की, जहाँ अक्सर दर्द हो जाया करता है।

हमारे मित्र ने और उनके सहयोगी ने मिलकर अपनी योग कक्षाएँ लीं और कुछ और सामूहिक सत्रों का संचालन किया और एक दिन मैंने भी सत्र में शामिल होकर समूह के सदस्यों के साथ बातचीत की। एक आध्यात्मिक गुरु और उपदेशक के रूप में बिताई गई अपनी पिछली ज़िंदगी के अनुभव उनके साथ साझा किए और बताया कि वहाँ से निकलकर आज तक की-जो कुछ भी मैं बन सका हूँ, उसकी- यात्रा कैसी रही।

वास्तव में उन बहुत ख़ास लोगों के साथ हमारा समय बड़ा शानदार बीता। कल दोपहर बाद कैनेडा की फ्लाइट पकड़ने के लिए उन्होंने आश्रम से बिदा ली। गुडबाय कहते हुए बहुत सी आँखों में एक साथ आँसू आ गए-और हम अभी से सोचने लग गए हैं कि वे जल्द से जल्द यहाँ आएँ और हमें उन लोगों का स्वागत करने का मौका मिले।

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि खुले दिल के, खुशमिजाज़ लोगों से और उन लोगों से, जिनमें नई से नई बातें जानने की उत्सुकता होती है और जो भारत को भीतर से जानना चाहते हैं, मुलाक़ात हमेशा एक अद्भुत अनुभव होती है। वे खुश हैं, भारत में आकर और हमसे मिलकर आनंदित हैं, यही हमारा पुरस्कार है-और मैं जानता हूँ, वे भी आश्रम में बिताए समय की कुछ बेहद अविस्मरणीय यादें लेकर घर जा रहे हैं!

yoga

जर्मनी के खूबसूरत दौरे से भारत वापसी – 6 दिसंबर 2015

हम अपने घर भारत लौट आए हैं। जर्मनी में बिताया पिछला हफ्ता बड़ा शानदार रहा: हमने वहाँ खूब मस्ती की, हमें बहुत सारे नए अनुभव प्राप्त हुए और वहाँ के बारे में हमें बहुत सी नई जानकारियाँ हासिल हुईं।

सोमवार को हम वापस वीज़बाडेन लौट आए। अपरा की नानी से हम पहले ही, रविवार के दिन बिदा ले चुके थे क्योंकि उन्हें सबेरे जल्दी ही अपने काम पर लगना था। उसके बाद हमने रमोना के पिताजी से एक और भावुक बिदाई ली और अपनी ट्रेन पकड़ी।

हालांकि अपने दूसरे गृहराष्ट्र, जर्मनी के अंतिम दिनों के लिए हमने कोई कार्यक्रम नहीं रखा था, फिर भी सारा वक़्त हम भरपूर व्यस्त रहे: हम इस बार थॉमस के साथ एक अन्य स्वीमिंग पूल में गए, जहाँ फिसल-पट्टियाँ भी थीं, भाप लेने का कमरा भी और मसाज जेट भी। अपरा वहाँ खूब खेलती रही, तैरने की कोशिश की, पानी में उछल-कूद करती रही और बार-बार फिसल-पट्टी पर फिसलती रही।

थॉमस और आइरिस हमें इस दौरे के तीसरे क्रिसमस मार्केट ले गए, वीज़बाडेन वाला। बिजली के लट्टुओं की खूबसूरत सजावट, महीन संगीत और कुल मिलाकर उन बाज़ारों के ख़ास क्रिसमस वातावरण में हम पुनः एक बार सम्मोहित हुए बगैर नहीं रह सके! और हाँ, हिंडोले भी, जिन पर अपरा ने खूब सवारी की! बटन दबाते ही उसका रॉकेट आसमान की ऊँचाइयाँ छूने लगता और तेज़ी से वापस लौटता और वह रोमांच से भर उठती! लेकिन सबसे बेहतरीन सवारी रही, फेरिस व्हील पर, जो शहर की ऊँची से ऊँची इमारत से भी अधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता, जहाँ से सारा शहर दिखाई देता था। उस पर बैठकर अपरा नीचे क्रिसमस मार्केट की रौशनी का अद्भुत नज़ारा देखने में मगन हो गई! ओह! अकल्पनीय!

हम और भी कई दोस्तों से मिले, खूब खाना-वाना बनाया, खाया और बच्चों और आश्रम के लिए कुछ खरीदारी भी की।

ख़ास तौर पर उन अंतिम दिनों में रमोना और मैं चर्चा करते रहे कि यह छोटी सी यात्रा कितनी ज़रूरी थी। हमारे मन में हमेशा से यह इच्छा रही है कि अपरा को हम न सिर्फ जर्मन भाषा दें बल्कि उस संस्कृति का एक हिस्सा भी उसके जीवन का हिस्सा बने, जिससे उसमें यह एहसास पैदा हो कि जितना वह भारत में रहने के कारण भारतीय है, उतना ही जर्मन भी है।

स्वाभाविक ही इन तीन हफ़्तों में उसने बहुत से नए शब्द सीखे और पुनः यात्राओं की आदी होने लगी, हवाई यात्रा की, ट्रेन या कार सवारी की। लेकिन सबसे बढ़कर ख़ुशी हमें यह हुई कि वह इस यात्रा में बहुत सी नई बातें सीख पाई, जिनमें बहुत सी बातों को भारत की तुलना में जर्मनी में अलग तरीके से किया जाता है। जैसे, यहाँ पुरानी वस्तुओं को बेसमेंट में रखा जाता है। या, जैसे स्टीरियो में सारे घर के लिए स्पीकर्स लगाए जा सकते हैं। और भी बहुत सी दूसरी बातें!

हमारी वापसी यात्रा से कुछ दिन पहले अपरा ने मुझसे पूछा कि हम पुनः जर्मनी कब आएँगे। मैंने कहा, होली के बाद। और यह बात वह अपने नाना-नानी से और थॉमस और आइरिस को भी बार-बार बताती रही: मैं जल्दी ही फिर आने वाली हूँ!

जर्मनी में उसे बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन वह भारत वापस आने के लिए भी लालायित रहती है। वह आश्रम के अपने भाई-बहनों को बड़ा मिस करती है और उसे अपने चाचाओं की, अपने भारतीय दादा, परनानी की भी बहुत याद आती है और सबसे बढ़कर, अपने घर की। इसलिए जब हम अपनी व्यवधान रहित और सुखद फ्लाइट से भारत वापस पहुँचे, जिसमें लगभग 5 घंटे तो वह सोती ही रही, वह पूर्णेंदु को देखकर, जो हमें दिल्ली विमानतल पर लेने आया था, ख़ुशी से चीख पड़ी।

और आज हम यहाँ हैं, वृंदावन में, फिलहाल समयांतर के कारण होने वाले जेटलैग से उबरने की कोशिश करते हुए। लेकिन जर्मनी में यह संक्षिप्त सा अत्यंत सुखद समय गुज़ारकर वापस लौटना भी बड़ा सुखदाई है!

जर्मनी में हमारी मौज-मस्ती – 29 नवंबर 2015

जर्मनी में हमारा एक और हफ्ता गुज़र गया और इस हफ्ते भी हमें इतनी बड़ी संख्या में एक से एक बढ़कर अनुभव प्राप्त हुए कि उन्हें सिर्फ एक ब्लॉग में समेटना बड़ा मुश्किल है! फिर भी मैं कोशिश करता हूँ:

पिछले रविवार को हैम्बर्ग में अपने बर्फ़बारी के अनुभव के विषय में मैं पहले ही लिख चुका हूँ। उस रोमांचक दिन के बाद सोमवार को हम एक और ट्रिप पर निकल पड़े, इस बार हैम्बर्ग नहीं बल्कि लुनेबर्ग में ही, उसके निचले हिस्से में स्थित थर्मल बाथ की ओर! जबकि पहले हम खुले स्वीमिंग पूल में कई बार गए हैं, इनडोर स्वीमिंग पूल में तैरने का यह अपरा और मेरा भी पहला अवसर था। यह अपने आप में गज़ब का अनुभव रहा! वहाँ कई अलग अलग पूल थे, एक में तेज़ लहरें उठ रही थीं और भँवर भी थे, एक बिल्कुल नन्हे बच्चों के लिए था और एक और, कुछ बड़े बच्चों के लिए। एक पूल नमकीन गर्म पानी वाला पूल था और वहीं एक खुला स्वीमिंग पूल भी उपलब्ध था! जब अपरा घुटनों तक गहरे पूल के पानी में कुछ अभ्यस्त हो गई तो हम उसे अपने साथ भँवर में फिसलने के लिए भी ले गए और उसे वहाँ खूब मज़ा आया। वह मेरी पीठ पर लेटकर खूब तैरी और कुल मिलाकर हमने वहाँ के रोमांच का भरपूर आनंद लिया!

इसके अलावा कई और तरीकों से हमने लुनेबर्ग के अपने निवास को ढेर सारी खुशियों और आनंद से परिपूर्ण कर दिया! आंद्रिया हमें खेल के मैदान ले गई, फिर हम खरीदारी करने बाज़ार गए थे, जो अपरा के लिए सदा एक रोमांचित कर देने वाला अनुभव होता है और फिर बहुत से दोस्त भी हमसे मिलने घर आए थे! हमने घर में ही एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट खाने-पीने की वस्तुएँ तैयार कीं और शाम के समय साथ बैठकर शांति और सुकून में बहुत खूबसूरत समय गुज़ारा!

और लूनेबर्ग निवास के अंतिम दिन यानी बुधवार को हमने एक और विशेष काम किया: हम लूनेबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। और वहाँ भी अपरा ने जीवन में पहली बार कुछ देखा और जिसे देखना मेरे लिए हमेशा सुखकर अनुभव होता है। वहाँ लोग बहुत अच्छे मूड में थे, वहाँ बहुतेरी मिठाइयाँ थीं, बच्चे झूला झूल सकते थे और हवा में शानदार संगीत झंकृत हो रहा था। मास्क्ड बाल के बारे में अपरा ने किताबों में पढ़ रखा था और अपरा भी अपना मास्क लगाकर हिंडोले पर भी झूली और ट्रेन की सवारी भी की। फिर उसने दिल के आकार की अदरक की ब्रेड खाई और हमारे साथ गरमागरम चॉकलेट का आस्वाद भी लिया!

गुरुवार को हमने आंद्रिया और माइकल से बिदा ली और आउसबर्ग की ट्रेन पकड़ी, जहाँ अपरा के नाना-नानी रहते हैं! यह ट्रेन यात्रा भी बहुत यादगार रही और इसी सफर में मैंने और रमोना ने अपने जर्मन विवाह की पाँचवी सालगिरह मनाई! पाँच साल पहले ही कुछ कागजों पर दस्तखत बनाने हम अपने दोस्तों के साथ वीजबाडेन आए थे-समय कितनी तेज़ी से गुज़र जाता है!

परसों हम म्यूनिख के लिए रवाना हुए। म्यूनिख के म्यूज़ियम में बच्चों के देखने लायक बहुत सी दर्शनीय वस्तुएँ हैं लेकिन हम वहाँ का शानदार म्यूज़ियम देखने ही नहीं बल्कि रमोना के दूसरे कुछ रिश्तेदारों से मिलने भी गए थे, विशेष रूप से उसके चचेरे भाई का बेटा, जो कुछ दिन बाद ही तीन साल का होगा! हमारे लिए भी और अपरा के लिए भी फिर से एकत्र होने का सुअवसर! वह उपहार लेने और देने के मामले में बड़ी उत्साहित रहती है तो यह भी किया गया! रमोना और उसके चचेरे भाई ने एक लट्टू चलाकर देखा और अपरा उसे देख-देखकर बड़ी खुश और रोमांचित होती रही।

कल घर वापस लौटने के बाद जब हम सोकर उठे तो अपने आपको जर्मन सर्दियों के हिमाच्छादित आश्चर्यलोक में पाया! सुबह लगातार बर्फ़बारी होती रही और हमें बर्फ का स्नोमैन तैयार करने का मौका मिल गया। यह हम पिछले सप्ताह की बर्फ़बारी में नहीं कर पाए थे और रमोना, उसके पिता और अपरा ने मिलकर खेल-खेल में एक सुंदर स्नोमैन बना डाला! और उसमें गाजर की नाक भी लगाई!

दोपहर में अपरा ने आइस स्केटिंग करने की कोशिश की! उनके घर के ठीक सामने एक कृत्रिम आइस फील्ड है, जहाँ किराए पर स्केट्स मिल जाते हैं-और मुझे कहना पड़ेगा कि अगर अपरा रोज़ वहाँ अभ्यास के लिए जाए तो वह जल्द ही बढ़िया स्केटिंग करने लगेगी!

अंत में हम अपरा की जर्मन नानी, नाना और मौसी के साथ आउसबर्ग के क्रिसमस मार्केट गए। सारे शहर में मोमबत्तियाँ लगाई गई हैं, जो देखने में बड़ी भली लगती हैं। शाम छह बजे सब टाउन हाल के सामने इकट्ठा हुए, यह देखने के लिए कि किस तरह नन्हे बच्चे, किशोर और युवा, फरिश्तों की तरह वस्त्र पहनकर और अपने-अपने हार्प, बांसुरियाँ और ऑर्गन लेकर खिड़कियों पर, बालकनियों पर आकर खड़े हो जाते हैं। फिर वे अपने अपने वाद्य यंत्रों को बजाने लगे और कुछ लोग अपने स्वर्गिक स्वरों में गाने भी सुनाने लगे-लेकिन अपरा का एक ही प्रश्न था: वे उड़ क्यों नहीं रहे हैं? 🙂

अब देखते हैं कि आज हम क्या करने वाले हैं-कल हमें वापस वीज़बाडेन भी निकलना है इसलिए हम यह सुनिश्चित करेंगे कि दिन का बचा हुआ समय परिवार के साथ हँसते-खेलते गुज़ारें। हम इस समय बेहद सुंदर अवकाश यात्रा पर हैं और अपनी प्यारी नन्ही परी को जर्मनी की स्वच्छंद सैर करवा रहे हैं!

दोस्तों और अपरा के साथ जर्मन रोमांच! 22 नवंबर 2015

आज रविवार है और उसके साथ ही यह बताने का वक़्त कि इस समय मेरे जीवन में क्या चल रहा है-और निश्चित ही, बताने के लिए बहुत कुछ है! हम अपरा के साथ जर्मनी की यात्रा जारी रखे हुए हैं और अपने इस छोटे से अवकाश को बड़ी मौज मस्ती के साथ गुज़ार रहे हैं!

पिछले सप्ताह हम वीज़बाडेन पहुँचे और एक बहुत उत्तेजक सप्ताहांत के बाद इस सप्ताह की शुरुआत एक साथ कई गतिविधयों के साथ शुरू हुई, जिनकी योजना हम पहले ही, जब भारत में ही थे, बनाकर आए थे! सोमवार को हम पीटर और हाइके से मिलने गए, जो अभी कुछ सप्ताह पहले ही आश्रम आए थे। यह बड़ी शानदार यात्रा रही, हम लोग शहर से हटकर गाँवों की ओर निकल गए थे। हमने साथ मिलकर खाना बनाया-खाया और इस दौरान अपरा उनकी बिल्ली के साथ खेलती रही। यह बिल्ली बिल्कुल शर्मीली नहीं है और अपरा उसे पूरे समय दुलारती रही और थपकियाँ देती रही लेकिन उसने ज़रा भी प्रतिरोध नहीं किया! सिर्फ एक बार वह डरकर भाग गई थी जब अपरा अचानक लड़खड़ाई और जैसे ही उसने बिल्ली की कुर्सी का सहारा लिया, कुर्सी गिर पड़ी और बिल्ली कूदकर कहीं चली गई!

मंगलवार को हम एक किंडरगार्टन में गए जहाँ कभी थॉमस भी काम किया करता था। हमारे लिए उनके काम का जायज़ा लेना अत्यंत रोचक रहा जबकि अपरा वहाँ दौड़-भाग करने और बच्चों के साथ खेलने-कूदने में व्यस्त रही।

फिर बुधवार को हम वीज़बाडेन से निकले और एरकलेंज के लिए ट्रेन पकड़ी। गज़ब! कितना मज़ा आया! हमने साल भर पहले भी जर्मनी में ट्रेन से यात्रा की थी मगर, साल भर बाद, अपरा के लिए जैसे वह पुनः एक नए अनुभव जैसा रहा। टिकिट चेकर ने उसे 'बच्चों का टिकिट' दिया था, जिसके साथ उसे रंगीन पेंसिलें और एक टॉय ट्रेन भी मिली थी। इसके आलावा हमने वहाँ के बहुत से फोटो भी लिए और वीडियो भी बनाए, जिससे आश्रम पहुँचकर अपरा उन्हें अपने भाई-बहनों को दिखा सके।

एरकलेंज में हमने अपने बहुत पुराने मित्रों सोनिया और पीटर के साथ बड़ा शानदार समय गुज़ारा जबकि अपरा उनकी दो शर्मीली बिल्लियों के पीछे लगी सारे घर में दौड़-भाग करती रही! हमें दूसरे दिन ही लुनेबर्ग के लिए निकलना था इसलिए उनके साथ हम बहुत थोड़े समय ही रह पाए।

लुनेबर्ग आना हमेशा की तरह बेहद आनंददायक अनुभव रहा! अपने सबसे पुराने जर्मन मित्र माइकल और निश्चय ही, उसकी पत्नी, आन्द्रिया से मिलना हमेशा बड़ा भावपूर्ण और रोमांचक होता है। हम पुराने दिनों को और उस समय के रोमांच और मौजमस्ती को याद कर-करके आह्लादित होते रहे और नए रोमांच की प्लानिंग करते रहे और नए रोमांच के कार्यक्रम बनाते रहे। इसके अलावा, एक-दूसरे के जीवनों में इस बीच आए बदलाव और विकास की चर्चा करते रहे। यहाँ उत्तरी जर्मनी में हमारे कई और भी मित्र हैं इसलिए शुक्रवार और शनिवार को हम वैसे भी मिलने आने वाले दोस्तों के साथ बहुत व्यस्त रहे! रमोना के स्कूली दिनों की एक मित्र तथा दूसरे कई, जो इसी साल मार्च में ही आश्रम आए थे, हमारे साथ खाना खाने और कुछ समय हमारे साथ गुजारने आए थे!

माइकल और आंद्रिया को अपरा पहले से जानती है और अपनी प्रारम्भिक झिझक से वह बहुत जल्दी पार पा गई! अब वह सारा समय उनके घर के कोने-कोने में जाकर जाँच-पड़ताल में लगी रहती है और अपनी नई-नई खोजों के बारे में उनसे बड़ी गंभीरता के साथ चर्चा करती है! यहाँ उसके लिए कई चीज़ें बिल्कुल नई हैं: जैसे डिशवाशर, विशालकाय आलमारियों में रखे विभिन्न उपभोक्ता सामान, जहाँ खरीदने के लिए हजारों विकल्प मौजूद हैं, डिनर टेबल पर रखी जाने वाली मोमबत्तियाँ, स्पीकर्स, जिनमें से घर के हर कमरे में आवाज़ आती है, आदि, आदि।

साल के इस समय और नवंबर के महीने में जर्मनी के अत्यंत ठंडे मौसम की आशंका के बावजूद इस दौरे की योजना बनाकर हमने अच्छा किया और हम बेहद खुश हैं! हम बहुत शानदार और रोमांचक समय बिता रहे हैं और निश्चय ही, अपरा भी- जिसके कारण हम इस दौरे को किसी भी कीमत पर टालना नहीं चाहते थे!

अब हमारा अगला पड़ाव होगा, हैम्बर्ग, जहाँ के लिए हम आज ही रवाना होने वाले हैं। आज कुछ घंटे हम वहाँ बिताएँगे। निश्चित ही, आपको उस दौरे का आँखों देखा हाल और हमारे अनुभवों का अहवाल जल्द ही प्राप्त होगा!

अपने दूसरे घर, जर्मनी में अपरा से साथ मस्ती – 15 नवम्बर 2015

आज आपको हमारी जर्मनी यात्रा की पहली रिपोर्ट प्राप्त होगी! हम लोग यहाँ सकुशल पहुँच गए थे और अभी से हमारे दूसरे गृहराष्ट्र, जर्मनी में हमारे रोमांचक अनुभवों की शुरुआत हो चुकी है!

सबसे पहले, हमारी यात्रा के बारे में: एक बार फिर से यह एक कमाल की निर्विघ्न यात्रा का अनुभव था। दिल्ली के यातायात के जाम को ध्यान में रखते हुए, हम लोग थोड़ा जल्दी ही निकल आए थे। लेकिन हम लोग आराम से पहुँच गए और इसलिए हमारे पास हवाई-अड्डे पर बिताने के लिए काफी समय था। हम इस समय का उपयोग न केवल आश्रम से लाया शानदार नाश्ता करते हुए बिता सकते थे बल्कि अपरा को बहुत-सी नयी चीज़ें भी दिखा सकते थे। वह वेंडिंग मशीन (विक्रय मशीन) देखकर मंत्रमुग्ध हो गई थी। काँच की खिड़कियों से बाहर झाँककर हवाई जहाज़ देखने और रोलिंग-फ्लोर पर चलने और आगे-पीछे होकर धमाचौकड़ी मचाने में भी उसे बड़ा मज़ा आ रहा था!

इन सब आकर्षणों के कारण उसे बोर होने का समय ही नहीं मिला और विमान पर चढ़ने का वक़्त हो गया। गज़ब! अपरा ने वहाँ जो मस्ती की है! हर चीज़ को देखकर वह रोमांचित हो उठती, चीज़ें कैसे काम करती हैं, यह देखना, खिड़की से बाहर झाँकना, बार-बार सीट की पेटी को बांधकर और फिर खोलकर देखना, सामने के फोल्डिंग टेबल को खोलना और बंद करना, एंटरटेनमेंट सिस्टम को ऑन और ऑफ करना, आदि, आदि। अपनी इन सब गतिविधियों से वह बहुत उत्साहित थी। आखिर विमान में मिले भोजन को चखने के बाद वह सो गयी और उसके बाद विमान-यात्रा का ज़्यादातर समय उसने सोते हुए ही बिताया!

समय के अंतर यानी जेटलैग की वजह से जब शाम को हम जर्मनी पहुँचे तो हम लोग कुछ थक से गए थे और निस्संदेह वहाँ हमारे हिसाब से मौसम भी काफी ठंडा था। परंतु पुनः जर्मनी आकर हमें बहुत अच्छा महसूस हो रहा था! बाहर की शान्ति, हवा में एक अलग तरह की गंध मुझे अत्यंत प्रिय है और ऊपर से चारों तरफ खुली हरियाली-पूछो मत! यह सुंदरता मन मोह लेती है! और हाँ, हम सभी मित्रों से बहुत प्यार करते हैं, जैसे थॉमस और आइरिस, जर्मनी में जिनका घर हमारा मुख्य आवास होता है और जहाँ ठीक इस वक़्त हम आनंदपूर्वक अपना समय बिता रहे हैं और मैं यह ब्लॉग लिख रहा हूँ!

कल एक लंबे जर्मन नाश्ते के साथ अद्भुत सुबह की शुरुआत हुई। उसके बाद हम सब अपनी एक और खूबसूरत मित्र, मेलनी से मिलने उसके घर गए। वही मेलनी जो पहले हमारे यहाँ भारत आ चुकी है। दो वर्ष पहले, जब अपरा पहली बार जर्मनी आई थी, हम उसके घर गए थे और अपरा ने उसके दो में से एक घोड़े की सवारी की थी! अब अपरा थोड़ी बड़ी हो गई है-घोड़े तो वही हैं परंतु उन्हें वह बिल्कुल अलग तरह से देख रही है, उनके साथ उसे एक अलग तरह का अनुभव हो रहा है, जो देखने में बड़ा खूबसूरत लगता है! आप कल्पना कर सकते हैं कि अपरा के लिए उन घोड़ों को थपथपाना, उनकी साफ़-सफाई में मदद करना और फिर उनकी सवारी करना कितना आनंददायक रहा होगा! और उसे ऐसा करते हुए देखना, हमारे लिए!

आज सुबह रमोना के स्कूल की एक पुरानी मित्र अपने पुरुषमित्र के साथ आई और एक बार पुनः शानदार नाश्ता लिया गया और उसके बाद हम लोग एक पार्क में स्थित खेल के मैदान में टहलने चले गए।

वहीं हमने नोटिस किया कि अपरा भी विमान-यात्रा के कारण होने वाले समयांतर यानी जेटलैग से प्रभावित हुई है और शायद थोड़ी थकावट महसूस कर रही है! सबेरे हम सब जल्दी उठ गए थे और दोपहर में भी वह बहुत थक गयी थी इसलिए सो गई थी, जबकि पिछले कई महीनों से दोपहर में वह झपकी तक नहीं ले रही है!

दोपहर की नींद से उसे शक्ति मिली होगी और जब कुछ और दोस्त मिलने आए तब वह पूरी तरह फिट थी! पवन नामक एक भारतीय, जो वीज़्बाडेन में एक भारतीय रेस्तराँ चलाता है, अपनी जर्मन पत्नी और बच्चों के साथ हमसे मिलने आया था। उस समय अपरा पूरी तरह चैतन्य थी और उसने एक डांस भी करके दिखाया!

मुझे लगता है कि आप अच्छी तरह देख पा रहे होंगे कि हम यहाँ कितने खुश हैं और कितना अच्छा समय गुज़ार रहे हैं!

आजकल हम एक साथ बहुत से कार्यक्रमों की तैयारी में व्यस्त हैं! 8 नवंबर 2015

मैं जानता हूँ कि मैं आपको कई बार बता चुका हूँ कि इस समय हम लोग कितने व्यस्त हैं-और यह व्यस्तता कल अचानक और बढ़ गई! जर्मनी से आठ बड़े खूबसूरत लोगों का एक दल हमारे यहाँ दो हफ्ते होने वाले समारोह का आनंद लेने आ पहुँचा है! हम इस समय पूरी तरह व्यस्त हैं-और हमें यह अच्छा लग रहा है!

पिछले कुछ दिनों से हम अपने सामान्य कामों में और इस दल के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में गले-गले तक व्यस्त रहे। इस दल में कई महिलाएँ और पुरुष शामिल हैं, जिनमें से दो लोग आश्रम में पहले भी दो बार आ चुके हैं। वे अब हमारे मित्र बन चुके हैं और हमें शुरू से पता था कि उन लोगों के साथ और उनके साथ आए दूसरे मेहमानों के साथ हमारा समय शानदार गुज़रेगा।

उनके आने के बाद शाम को फ़्रांस से आई मित्र मेलनी द्वारा प्रस्तुत फायर शो से उनका स्वागत किया गया। मेलनी हमारे साथ ही है और अभी काफी समय हमारे साथ रहेगी। आज प्रातः उन्होंने योग कक्षा का आनंद लिया और इस समय बाजार में खरीदारी करने और वृंदावन का थोड़ा-बहुत जायज़ा लेने गए हैं!

अगले कुछ दिनों में वे आयुर्वेदिक पाकशाला में हिस्सा लेंगे, वृंदावन, मथुरा और आगरा की सैर करेंगे और उसके पश्चात्, स्वाभाविक ही, दीपावली समारोह में भी शामिल होंगे, जो सिर्फ तीन दिन बाद यहाँ आयोजित किया गया है!

लेकिन सिर्फ जर्मनी से आए दल की अगवानी और दीपावली समारोह की तैयारियों में ही हम व्यस्त नहीं हैं! दीवाली के तुरंत बाद, 13 नवंबर को अपरा, रमोना और मैं जर्मनी जाने के लिए कार द्वारा आश्रम से दिल्ली विमानतल की ओर रवाना हो जाएँगे!

लगभग डेढ़ साल हो चुके हैं और अपरा ने अपनी माँ के देश को नहीं देखा है और हम उस समय का और अधिक इंतज़ार नहीं कर सकते जब वह वहाँ का अनुभव प्राप्त करे, वहाँ के शानदार दोस्तों और परिवार के सदस्यों से मिले-जुले और वहाँ के जीवन का आनंद ले! गर्मियों में हम अपने रेस्तराँ को रंग-रूप देने में व्यस्त थे इसलिए वहाँ नहीं जा पाए लेकिन हम पूरा साल वहाँ जाए बगैर नहीं रह सकते लिहाजा दो माह पहले हमने अपने कार्यक्रमों का कैलेंडर चेक किया तो पता चला कि इन दो समूहों के बीच हमारे पास सिर्फ तीन हफ़्तों का समय है, जिन्हें हम जर्मनी में गुज़ार सकते हैं!

दिल्ली में ख़ास तौर पर एक दिन हमने गर्म कपड़ों की खरीदारी के किए नियत किया, जिससे जर्मनी जाने के बाद वहाँ की ठंड से बच सकें। जर्मनी में अपरा को इस बार हम स्नो फॉल दिखाने वाले हैं, जिसे वह अपने जीवन में पहली बार देखेगी। हम क्रिसमस मार्केट भी जाएँगे और वहाँ हॉट चॉकलेट और स्ट्राबेरी आईस्क्रीम भी खाएँगे।

अपनी इस रोमांचकारी यात्रा का विवरण मैं आपको नियमित रूप से देता रहूँगा!

क्या सकारात्मक नज़रिया आपको फूड पॉयज़निंग से बचा सकता है? 1 नवंबर 2015

कल के स्वादिष्ट व्यंजन के बाद मैं आज भोजन संबंधी एक और ब्लॉग लिखना चाहता हूँ। ठीक-ठीक कहें तो, भारतीय भोजन संबंधी। बल्कि कहें कि भारत में सड़क के किनारे मौजूद ठेलों पर मिलने वाले भोजन के संबंध में, तो अधिक उचित होगा। सामान्य रूप से वह भोजन और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ग्रहण करना उचित होगा या नहीं, इस संबंध में।

पिछले हफ्ते हमारे मेहमानों के साथ हुई चर्चा में यह प्रश्न उभरकर सामने आया था। शहर की सड़कों पर उड़ने वाली धूल को इंगित करते हुए एक महिला अतिथि ने कहा कि वह बाहर सड़क पर मौजूद ठेलों पर कभी कोई चीज़ नहीं खाएगी क्योंकि वहाँ के खाने की गुणवत्ता और साफ़-सफाई संतोषजनक नहीं होती, कि सस्ती चाट के ठेले वाले आपको उच्चस्तरीय और साफ़-सुथरा भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते। दूसरे मेहमान का तर्क था कि यह महज एक मानसिक स्थिति है, दिमाग की व्यर्थ कुशंका है और यदि आप सकारात्मक नज़रिया रखें तो ठेलों पर खाने से आपके सामने कोई समस्या पेश नहीं आएगी!

आप जानते हैं, मैं स्वयं सकारात्मक रवैया रखने का कायल हूँ। उसके बगैर न सिर्फ बहुत सी चीज़े उससे अधिक खराब नज़र आती हैं, जितनी कि वे वास्तव में होती हैं बल्कि वे और बदतर होती चली जाती हैं। निश्चय ही सकारात्मक होना आपको स्वस्थ रहने में मदद करता है। यदि आप अत्यंत नकारात्मक हैं तो आप ज़रा-ज़रा सी बात पर कुशंकाएँ करेंगे और भयभीत होंगे। उसके चलते आपका शरीर और मन और उनकी पूरी कार्यप्रणालियाँ हर वक़्त तनावग्रस्त रहेंगी। तनाव का मुकाबला करने में आपकी बहुत सारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खर्च होती है जो अन्यथा आपके शरीर की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली को मज़बूती प्रदान करती। इसलिए तनावग्रस्त होने पर रोगों से लड़ने वाले इम्यून सिस्टम को मज़बूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। रोगों या व्याधियों का आक्रमण होने पर आपका शरीर पूरी शक्ति के साथ उनका मुकाबला नहीं कर पाता, जैसा सामान्यतया उसे करना चाहिए-और इसलिए आप आसानी से और जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते रहते हैं। इसके अलावा, आपके नकारात्मक रवैये के चलते आपको मामूली चीजें और घटनाएँ ज़रूरत से ज़्यादा गंभीर लगती हैं!

स्वास्थ्य और सकारात्मकता के बारे में मेरे सोच का यह संक्षिप्त और तात्कालिक विवरण है। लेकिन कुछ इससे अधिक गंभीर कारक भी होते हैं, जैसे, जीवाणु, विषाणु और नुकसानदेह रसायन और ये कारक इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आप सकारात्मक रवैया रखते हैं या नहीं!

महज सकारात्मक होने के कारण आप ज़हर नहीं खा सकते! मैं बहुत से सकारात्मक लोगों को जानता हूँ, जिन्हें सकारात्मक रवैया रखने के बावजूद तरह-तरह की बीमारियों का मुकाबला करना पड़ता है, खान-पान संबंधी ही नहीं, दूसरी भी! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि महज सकारात्मक रवैया आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से दूर नहीं रख सकता!

अब अगर आप भारत दौरे पर हैं और मुझसे या हमसे सलाह चाहते हैं तो मैं भी आपसे यही कहूँगा कि सड़क पर खोमचे या ठेले वालों के यहाँ मत खाइए। मैं खुद वहाँ कभी नहीं खाता क्योंकि मैं इस बात का पूरा ख़याल रखता हूँ कि कौन-कौन से और कैसे खाद्य पदार्थ मेरे पेट में और मेरे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे आश्रम आने वाले बहुत से मेहमान जब तक यहाँ आश्रम का भोजन ग्रहण करते रहे, स्वस्थ रहते हैं लेकिन जैसे ही वे घूमने निकलते हैं और जहाँ, जैसा खाना मिलता है, खा लेते हैं तो वे बीमार पड़ जाते हैं।

भारतीय लोग उनका सेवन कर सकते हैं क्योंकि उनके शरीर उन बैक्टेरिया के आदी हो चुके हैं, जो इन ठेलों के खानों के ज़रिए पेट में पहुँचते होंगे। जीवन की शुरुआत से वे वहाँ हर तरह का भोजन, चाट-पकौड़े इत्यादि खाते रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बैक्टेरिया उनके लिए अच्छे हैं-लेकिन आप लोग, जो पश्चिमी देशों से कुछ दिन के लिए यहाँ आते हैं और जिनके पेट ने पहले कभी ऐसे भोजन का अनुभव नहीं लिया, उन्हें खाकर अवश्य बीमार पड़ जाएँगे!

सकारात्मक रवैया होना निश्चय ही बड़ी अच्छी बात है लेकिन साथ ही आपको इस बात की सावधानी भी रखनी चाहिए कि आप कहाँ खा-पी रहे हैं और क्या और कैसा खा रहे हैं। सड़क के किनारे ठेलों पर खाने के स्थान पर किसी अच्छे रेस्तराँ में भोजन या नाश्ता-पानी कीजिए। सड़क पर खड़े होकर फलों का रस भी मत लीजिए, भले ही फल आपके सामने रखे हों और ताज़े ही क्यों न दिखाई दे रहे हों-आप नहीं जानते, कहाँ के पानी से उन्हें धोया गया है और जूसर में कौन-कौन से बैक्टेरिया पहले से मौजूद हैं!

मेरा उद्देश्य किसी को भयभीत करना नहीं है लेकिन यह बात हर टूरिस्ट गाइड बुक में निरपवाद रूप से लिखी होती है। कृपया अपने शरीर का ख़याल रखिए, भले ही आप कितना ही सकारात्मक रवैया रखते हों!

हम इतने नकारात्मक हैं कि हमें हर जगह लिंगभेद और दूसरी बुराइयाँ दिखाई देती हैं – 25 अक्टूबर 2015

आज मैं लैंगिक समानता, नारीवाद और हर चीज़ में कोई न कोई नुस्ख निकालने वाले लोगों के रवैये पर अपने विचार लिखने जा रहा हूँ। इसके अलावा मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि इन सब बातों का हमारे आश्रम की रसोई से क्या ताल्लुक है।

आज आश्रम के कुछ मेहमान हमारी आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में सम्मिलित हुए। सुबह उन्होंने पनीर बनाना सीखने से शुरुआत की और दोपहर में सारे लोग प्रवेश हाल में इकट्ठे बैठकर पालक की पत्तियाँ चुन रहे थे। खुशनुमा माहौल था और तीन महिला कर्मचारियों के अलावा मेरी नानी और हमारे महिला मेहमान साथ बैठे थे। मुझे लगा, यह बड़ा सुंदर दृश्य है और मैंने एक फोटो ले लिया।

जब मैंने उसे फेसबुक पर पोस्ट किया तो बहुत सारे सकारात्मक टिप्पणियाँ प्राप्त हुईं मगर दो एक जैसी थीं:

"क्या आपके आश्रम में सिर्फ महिलाओं से ही रसोई का काम कराया जाता है?" और "आपकी पिछली पोस्ट्स देखकर मैं आशा कर रही थी कि आपके आश्रम में पुरुष भी खाना बनाने के काम में हिस्सा लेते होंगे!"

निश्चित ही इन दोनों टिप्पणीकारों ने आश्रम संबंधी एक चित्र को, फोटो में कैद एक पल को देखकर यह मान लिया था कि जो महिलाएँ पालक चुन रही हैं, वही सारा भोजन भी तैयार करती होंगी। कि खाना पकाने की सारी ज़िम्मेदारी सिर्फ महिलाओं के सिर पर डाल दी गई है।

मैंने आश्रम की रसोई का एक दूसरा चित्र, जिसमें बहुत से पुरुष कर्मचारी रोटियाँ बेल और सेंक रहे थे, पोस्ट करके बताने का प्रयत्न किया कि पुरुष भी रसोई में काम करते हैं। मैंने चुटकी लेते हुए कहा कि अब यह चित्र यह विवाद न खड़ा कर दे कि रसोई में महिलाओं का प्रवेश क्यों वर्जित है!

निश्चित ही ये टिप्पणीकार हमारे यहाँ कभी नहीं आए और न तो मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और न ही उन्हें हमारे आश्रम की कार्यप्रणाली की, हमारे कर्मचारियों और मेरे परिवार की रत्ती भर जानकारी है।

जो भी ये फोटो देख रहे हैं, खातिर जमा रखें कि हर क्षेत्र में पुरुष और महिलाएँ दोनों मिल-जुलकर अपने-अपने हिस्से का काम करते हैं! इस समय हमारी रसोई का मुख्य रसोइया पुरुष है। उसके सहायक पुरुष और महिलाएँ, दोनों हैं। सभी सब्जियाँ काटते हैं, बरतनों में सब्जियाँ चलाते हैं और टेबल पर खाना परोसते हैं! हमें इस बात से कोई परेशानी नहीं होगी अगर कल को कोई महिला रसोई की मुखिया बन जाती है! जब मेरी माँ ज़िंदा थीं, वही रसोई का इंतज़ाम देखती थीं और उनके जाने के बाद मेरे भाइयों और मैंने वह ज़िम्मेदारी वहन कर ली है-इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे यहाँ काम करने वाला कोई कर्मचारी महिला है या पुरुष, इतना काफी है कि उसे पता हो कि उसे क्या काम दिया गया है और वह उस काम को अच्छी तरह अंजाम दे!

इसलिए लिंग भेद का प्रश्न मेरे दिमाग से बहुत जल्दी निकल गया क्योंकि मैं जानता हूँ कि हम यहाँ किसी के साथ किसी प्रकार का भेद नहीं करते-लेकिन मेरे मन में उन टिप्पणीकारों की मानसिकता के बारे में कई तरह के खयाल आते-जाते रहे। मैं सोचता हूँ कि जब आप हर बात में किसी नकारात्मकता की तलाश करते हैं तो वह आपके मन को प्रतिबिम्बित करता है। बिना अधिक जानकारी प्राप्त किए आप किसी चीज़ का गलत अर्थ लगा लेते हैं।

कुछ बातों को आप सामान्य रूप से क्यों नहीं ले सकते? क्यों नहीं आप एक रोचक चित्र का आनंद लेकर, उसमें नुस्ख निकालने कि जहमत उठाए बिना उसे जस का तस ग्रहण करते?

दोस्तों के साथ मौजमस्ती से भरपूर समय बिताना – 18 अक्टूबर 2015

गज़ब! कितना मज़ेदार, सुखद समय! जी हाँ, वाकई शानदार-हम सब बहुत व्यस्त हैं, लोग आ रहे हैं, जा रहे हैं, रोज़ एक नया समारोह चल रहा है और इस वक़्त हमारे यहाँ, आश्रम में हमारे बहुत करीबी और बेहद शानदार मित्र आए हुए हैं और हम उनके साथ अपना सर्वश्रेष्ठ समय गुज़ार रहे हैं!

शुक्रवार को थॉमस और आइरिस हमारे साझा मित्र, पीटर और हाइके, उनके बेटे और अपने दो और मित्रों के साथ आए। एक दिन आराम करने के बाद कल हमारे यहाँ शानदार बर्थडे पार्टी हुई! हमने कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं किया था कि बहुत सारी तैयारियों की ज़रूरत हो, लेकिन फिर भी वह वाकई बहुत ख़ास पार्टी रही: शाम को सुस्वादु भोजन की व्यवस्था की गई थी और उसके बाद थोड़ा नाच-गाना हुआ! फिर सबके लिए चॉकलेट केक और फिर से थोड़ा सा नृत्य वगैरह! अपरा, प्रांशु और गुड्डू, हमारे सबसे छोटे बच्चों ने अपने-अपने नृत्य प्रस्तुत किए-दिखाया कि उन्होंने इस बीच क्या-क्या नया सीखा है-और उसके बाद फ़्रांस से आई हमारी मित्र, मेलनी ने अपना फायर डांस प्रदर्शित किया। अंत में जर्मन मित्रों द्वारा लाए गए विभिन्न वाद्ययंत्रों पर निबद्ध संगीत कार्यक्रम के साथ शाम के कार्यक्रम का समापन हुआ।

वह बहुत खूबसूरत शाम थी और हम सबने उसका भरपूर आनंद लिया-परिवार के सदस्यों ने, दोस्तों और हमारे अतिथियों ने! हमारी तीन महिलाओं के लिए राजस्थान यात्रा पर निकलने से पूर्व आश्रम में वह अंतिम शाम थी। हमने उनकी राजस्थान यात्रा का इंतज़ाम किया था और आज तड़के वे तीनों जयपुर के लिए रवाना हो गईं, जहाँ से वे जैसलमेर जाएँगी और फिर अंत में दिल्ली लौटेंगी, जहाँ से उनमें से एक घर चली जाएगी और दो यहाँ, वृंदावन वापस आएँगी।

इस तरह आज हमारे यहाँ मेहमानों और मित्रों की संख्या कुछ कम है लेकिन हम सब साथ बैठकर इस दौरान एक-दूसरे के जीवनों में घटित घटनाओं का जायज़ा ले रहे हैं, पुराने समय को याद कर रहे हैं और निकट भविष्य में कुछ रोमांचक कार्यक्रमों की योजना तैयार करते हुए समय का पूरा आनंद उठा रहे हैं।

थॉमस यहाँ आए हुए हैं इसलिए अपरा ख़ुशी से फूली नहीं समा रही है और वह सारा दिन उनके साथ खेलती-कूदती रहती है। कभी वह हमें बताती है कि उन दोनों ने मिलकर दिन भर क्या-क्या किया तो कभी बताती है कि आगे क्या-क्या करने वाले हैं। जब घर लोगों से भरा-पूरा होता है तब वह बहुत खुश रहती है और विशेष रूप से तब, जब अनजान लोगों के साथ बहुत से वे दोस्त भी होते हैं, जिनके साथ वह लगभग हर हफ्ते स्काइप पर रूबरू बात करती है!

इन सब बातों के अलावा हमारे सभी जर्मन मित्र अपरा और आश्रम के दूसरे बच्चों के लिए बहुत सारे उपहार भी लेकर आए हैं। हर बच्चा नए-नए खिलौनों को आजमाकर देखने और उनसे खेलने में व्यस्त हैं और साथ ही एक से एक बढ़कर स्वादिष्ट जर्मन मिठाइयों का आस्वाद भी ले रहे हैं! वास्तव में हम सब बहुत सुखद और शानदार समय बिता रहे हैं!

वाकई जीवन बहुत सुंदर है!