जर्मनी के खूबसूरत दौरे से भारत वापसी – 6 दिसंबर 2015

हम अपने घर भारत लौट आए हैं। जर्मनी में बिताया पिछला हफ्ता बड़ा शानदार रहा: हमने वहाँ खूब मस्ती की, हमें बहुत सारे नए अनुभव प्राप्त हुए और वहाँ के बारे में हमें बहुत सी नई जानकारियाँ हासिल हुईं।

सोमवार को हम वापस वीज़बाडेन लौट आए। अपरा की नानी से हम पहले ही, रविवार के दिन बिदा ले चुके थे क्योंकि उन्हें सबेरे जल्दी ही अपने काम पर लगना था। उसके बाद हमने रमोना के पिताजी से एक और भावुक बिदाई ली और अपनी ट्रेन पकड़ी।

हालांकि अपने दूसरे गृहराष्ट्र, जर्मनी के अंतिम दिनों के लिए हमने कोई कार्यक्रम नहीं रखा था, फिर भी सारा वक़्त हम भरपूर व्यस्त रहे: हम इस बार थॉमस के साथ एक अन्य स्वीमिंग पूल में गए, जहाँ फिसल-पट्टियाँ भी थीं, भाप लेने का कमरा भी और मसाज जेट भी। अपरा वहाँ खूब खेलती रही, तैरने की कोशिश की, पानी में उछल-कूद करती रही और बार-बार फिसल-पट्टी पर फिसलती रही।

थॉमस और आइरिस हमें इस दौरे के तीसरे क्रिसमस मार्केट ले गए, वीज़बाडेन वाला। बिजली के लट्टुओं की खूबसूरत सजावट, महीन संगीत और कुल मिलाकर उन बाज़ारों के ख़ास क्रिसमस वातावरण में हम पुनः एक बार सम्मोहित हुए बगैर नहीं रह सके! और हाँ, हिंडोले भी, जिन पर अपरा ने खूब सवारी की! बटन दबाते ही उसका रॉकेट आसमान की ऊँचाइयाँ छूने लगता और तेज़ी से वापस लौटता और वह रोमांच से भर उठती! लेकिन सबसे बेहतरीन सवारी रही, फेरिस व्हील पर, जो शहर की ऊँची से ऊँची इमारत से भी अधिक ऊँचाई तक पहुँच जाता, जहाँ से सारा शहर दिखाई देता था। उस पर बैठकर अपरा नीचे क्रिसमस मार्केट की रौशनी का अद्भुत नज़ारा देखने में मगन हो गई! ओह! अकल्पनीय!

हम और भी कई दोस्तों से मिले, खूब खाना-वाना बनाया, खाया और बच्चों और आश्रम के लिए कुछ खरीदारी भी की।

ख़ास तौर पर उन अंतिम दिनों में रमोना और मैं चर्चा करते रहे कि यह छोटी सी यात्रा कितनी ज़रूरी थी। हमारे मन में हमेशा से यह इच्छा रही है कि अपरा को हम न सिर्फ जर्मन भाषा दें बल्कि उस संस्कृति का एक हिस्सा भी उसके जीवन का हिस्सा बने, जिससे उसमें यह एहसास पैदा हो कि जितना वह भारत में रहने के कारण भारतीय है, उतना ही जर्मन भी है।

स्वाभाविक ही इन तीन हफ़्तों में उसने बहुत से नए शब्द सीखे और पुनः यात्राओं की आदी होने लगी, हवाई यात्रा की, ट्रेन या कार सवारी की। लेकिन सबसे बढ़कर ख़ुशी हमें यह हुई कि वह इस यात्रा में बहुत सी नई बातें सीख पाई, जिनमें बहुत सी बातों को भारत की तुलना में जर्मनी में अलग तरीके से किया जाता है। जैसे, यहाँ पुरानी वस्तुओं को बेसमेंट में रखा जाता है। या, जैसे स्टीरियो में सारे घर के लिए स्पीकर्स लगाए जा सकते हैं। और भी बहुत सी दूसरी बातें!

हमारी वापसी यात्रा से कुछ दिन पहले अपरा ने मुझसे पूछा कि हम पुनः जर्मनी कब आएँगे। मैंने कहा, होली के बाद। और यह बात वह अपने नाना-नानी से और थॉमस और आइरिस को भी बार-बार बताती रही: मैं जल्दी ही फिर आने वाली हूँ!

जर्मनी में उसे बड़ा अच्छा लगता है। लेकिन वह भारत वापस आने के लिए भी लालायित रहती है। वह आश्रम के अपने भाई-बहनों को बड़ा मिस करती है और उसे अपने चाचाओं की, अपने भारतीय दादा, परनानी की भी बहुत याद आती है और सबसे बढ़कर, अपने घर की। इसलिए जब हम अपनी व्यवधान रहित और सुखद फ्लाइट से भारत वापस पहुँचे, जिसमें लगभग 5 घंटे तो वह सोती ही रही, वह पूर्णेंदु को देखकर, जो हमें दिल्ली विमानतल पर लेने आया था, ख़ुशी से चीख पड़ी।

और आज हम यहाँ हैं, वृंदावन में, फिलहाल समयांतर के कारण होने वाले जेटलैग से उबरने की कोशिश करते हुए। लेकिन जर्मनी में यह संक्षिप्त सा अत्यंत सुखद समय गुज़ारकर वापस लौटना भी बड़ा सुखदाई है!

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