क्या सकारात्मक नज़रिया आपको फूड पॉयज़निंग से बचा सकता है? 1 नवंबर 2015

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कल के स्वादिष्ट व्यंजन के बाद मैं आज भोजन संबंधी एक और ब्लॉग लिखना चाहता हूँ। ठीक-ठीक कहें तो, भारतीय भोजन संबंधी। बल्कि कहें कि भारत में सड़क के किनारे मौजूद ठेलों पर मिलने वाले भोजन के संबंध में, तो अधिक उचित होगा। सामान्य रूप से वह भोजन और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कारणों से ग्रहण करना उचित होगा या नहीं, इस संबंध में।

पिछले हफ्ते हमारे मेहमानों के साथ हुई चर्चा में यह प्रश्न उभरकर सामने आया था। शहर की सड़कों पर उड़ने वाली धूल को इंगित करते हुए एक महिला अतिथि ने कहा कि वह बाहर सड़क पर मौजूद ठेलों पर कभी कोई चीज़ नहीं खाएगी क्योंकि वहाँ के खाने की गुणवत्ता और साफ़-सफाई संतोषजनक नहीं होती, कि सस्ती चाट के ठेले वाले आपको उच्चस्तरीय और साफ़-सुथरा भोजन उपलब्ध नहीं करा सकते। दूसरे मेहमान का तर्क था कि यह महज एक मानसिक स्थिति है, दिमाग की व्यर्थ कुशंका है और यदि आप सकारात्मक नज़रिया रखें तो ठेलों पर खाने से आपके सामने कोई समस्या पेश नहीं आएगी!

आप जानते हैं, मैं स्वयं सकारात्मक रवैया रखने का कायल हूँ। उसके बगैर न सिर्फ बहुत सी चीज़े उससे अधिक खराब नज़र आती हैं, जितनी कि वे वास्तव में होती हैं बल्कि वे और बदतर होती चली जाती हैं। निश्चय ही सकारात्मक होना आपको स्वस्थ रहने में मदद करता है। यदि आप अत्यंत नकारात्मक हैं तो आप ज़रा-ज़रा सी बात पर कुशंकाएँ करेंगे और भयभीत होंगे। उसके चलते आपका शरीर और मन और उनकी पूरी कार्यप्रणालियाँ हर वक़्त तनावग्रस्त रहेंगी। तनाव का मुकाबला करने में आपकी बहुत सारी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा खर्च होती है जो अन्यथा आपके शरीर की सम्पूर्ण कार्यप्रणाली को मज़बूती प्रदान करती। इसलिए तनावग्रस्त होने पर रोगों से लड़ने वाले इम्यून सिस्टम को मज़बूती प्रदान करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। रोगों या व्याधियों का आक्रमण होने पर आपका शरीर पूरी शक्ति के साथ उनका मुकाबला नहीं कर पाता, जैसा सामान्यतया उसे करना चाहिए-और इसलिए आप आसानी से और जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते रहते हैं। इसके अलावा, आपके नकारात्मक रवैये के चलते आपको मामूली चीजें और घटनाएँ ज़रूरत से ज़्यादा गंभीर लगती हैं!

स्वास्थ्य और सकारात्मकता के बारे में मेरे सोच का यह संक्षिप्त और तात्कालिक विवरण है। लेकिन कुछ इससे अधिक गंभीर कारक भी होते हैं, जैसे, जीवाणु, विषाणु और नुकसानदेह रसायन और ये कारक इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आप सकारात्मक रवैया रखते हैं या नहीं!

महज सकारात्मक होने के कारण आप ज़हर नहीं खा सकते! मैं बहुत से सकारात्मक लोगों को जानता हूँ, जिन्हें सकारात्मक रवैया रखने के बावजूद तरह-तरह की बीमारियों का मुकाबला करना पड़ता है, खान-पान संबंधी ही नहीं, दूसरी भी! मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि महज सकारात्मक रवैया आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से दूर नहीं रख सकता!

अब अगर आप भारत दौरे पर हैं और मुझसे या हमसे सलाह चाहते हैं तो मैं भी आपसे यही कहूँगा कि सड़क पर खोमचे या ठेले वालों के यहाँ मत खाइए। मैं खुद वहाँ कभी नहीं खाता क्योंकि मैं इस बात का पूरा ख़याल रखता हूँ कि कौन-कौन से और कैसे खाद्य पदार्थ मेरे पेट में और मेरे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे आश्रम आने वाले बहुत से मेहमान जब तक यहाँ आश्रम का भोजन ग्रहण करते रहे, स्वस्थ रहते हैं लेकिन जैसे ही वे घूमने निकलते हैं और जहाँ, जैसा खाना मिलता है, खा लेते हैं तो वे बीमार पड़ जाते हैं।

भारतीय लोग उनका सेवन कर सकते हैं क्योंकि उनके शरीर उन बैक्टेरिया के आदी हो चुके हैं, जो इन ठेलों के खानों के ज़रिए पेट में पहुँचते होंगे। जीवन की शुरुआत से वे वहाँ हर तरह का भोजन, चाट-पकौड़े इत्यादि खाते रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे बैक्टेरिया उनके लिए अच्छे हैं-लेकिन आप लोग, जो पश्चिमी देशों से कुछ दिन के लिए यहाँ आते हैं और जिनके पेट ने पहले कभी ऐसे भोजन का अनुभव नहीं लिया, उन्हें खाकर अवश्य बीमार पड़ जाएँगे!

सकारात्मक रवैया होना निश्चय ही बड़ी अच्छी बात है लेकिन साथ ही आपको इस बात की सावधानी भी रखनी चाहिए कि आप कहाँ खा-पी रहे हैं और क्या और कैसा खा रहे हैं। सड़क के किनारे ठेलों पर खाने के स्थान पर किसी अच्छे रेस्तराँ में भोजन या नाश्ता-पानी कीजिए। सड़क पर खड़े होकर फलों का रस भी मत लीजिए, भले ही फल आपके सामने रखे हों और ताज़े ही क्यों न दिखाई दे रहे हों-आप नहीं जानते, कहाँ के पानी से उन्हें धोया गया है और जूसर में कौन-कौन से बैक्टेरिया पहले से मौजूद हैं!

मेरा उद्देश्य किसी को भयभीत करना नहीं है लेकिन यह बात हर टूरिस्ट गाइड बुक में निरपवाद रूप से लिखी होती है। कृपया अपने शरीर का ख़याल रखिए, भले ही आप कितना ही सकारात्मक रवैया रखते हों!

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