तापमान 48 डिग्री और एक पंखा तक नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे – 2 मई 2014

परोपकार

आज मैं आपको योगमाया और नीरज से मिलवाना चाहता हूँ, जो क्रमशः 12 और 10 साल के हैं।

योगमाया और नीरज की 13 साल की एक बड़ी बहन और 8 साल का छोटा भाई भी है। उनकी बड़ी बहन ने हमें बताया कि वह तीसरी कक्षा तक स्कूल गई थी लेकिन वहाँ शिक्षक क्या पढ़ा रहे हैं, कुछ समझ ही नहीं पाती थी इसलिए उसने स्कूल छोड़ दिया। मगर उसे स्कूल छूटने का कोई गम नहीं है-अब वह घर के कामों में माँ की मदद करती है और इस स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट है। चौथी कक्षा में पढ़ रही योगमाया पढ़ाई में अपनी बड़ी बहन से काफी आगे निकल चुकी है और यहाँ तक कि नीरज भी, जो अभी पहली कक्षा में है, अपनी सबसे बड़ी बहन की तुलना में ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ पढ़ और लिख पा रहा है।

बच्चों का पिता एक मजदूर है, जो ईंटों की ढुलाई का काम करता है। ईंट के भट्ठों से रोजाना हजारों ईंटें भवन-निर्माण-स्थलों तक लाई जाती हैं और उन्हें एक-एक कर ट्रैक्टरों पर चढ़ाने-उतारने का श्रमसाध्य काम वह करता है। इतना कठिन काम होने के बावजूद उसे रोज़ एक नया ठेकेदार ढूँढ़ना पड़ता है। शाम को उसे मजदूरी मिलती है और जिस दिन काम नहीं होता, वह खाली हाथ घर लौटता है।

ऐसे मौकों पर उनकी भैंस उनके बहुत काम आती है। वे हिसाब लगाते हैं कि उसका कितना दूध बेचकर उन्हें कितनी अतिरिक्त आमदनी हो सकती है। दुर्भाग्य से दो साल पहले बच्चा देने के बाद उसने अब तक कोई और बच्चा नहीं जना है। इस समय वह सिर्फ एक लीटर दूध देती है, जिसे वे घर में ही बच्चों के पीने के लिए या घी, दही आदि बनाने के लिए रख लेते हैं।

आजकल भैंस सामने पड़ी ज़मीन पर खड़ी पगुराती रहती है। यह ज़मीन बहुत पहले उनके परिवार ने इस उम्मीद में खरीदी थी कि आगे चलकर वे उस पर एक ठीक-ठाक मकान बनवा सकेंगे। फिलहाल वे जिस घर में रह रहे हैं, वह ईंटों का बना महज एक कमरा है, जिसका सामने का हिस्सा एक टिन की चादर से ढंका रहता है और दरवाजे के नाम पर सामने एक पुराना कंबल लटका (टंगा) रहता है। योगमाया बताती है कि वह और उसकी बहन अपने घर में नहीं सोतीं क्योंकि पंखा न होने के कारण इस गर्मी में सोना मुश्किल होता है। वे दोनों अपनी दादी के यहाँ जाकर सोती हैं क्योंकि उनके यहाँ पंखा है।

उनके घर पर नज़र पड़ते ही हम समझ गए कि यही लोग हैं, जिनके लिए हम अपना स्कूल चला रहे हैं। बच्चे, जिनके परिवार दूसरे किसी स्कूल का खर्च वहन नहीं कर सकते और पढ़ने के लिए जिन्हें हमारे स्कूल की वाकई ज़रूरत है। योगमाया पढ़ाई में काफी अच्छी है हालांकि वह बहुत बातूनी भी है। नीरज दिन भर ऊधम करता रहता है और परीक्षा में उसके नंबर भी यही ज़ाहिर करते हैं। लेकिन दोनों की ही पढ़ाई में उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है और उनकी शिक्षिकाएँ जानती हैं कि उनके लिए पढ़ना-लिखना कितना ज़्यादा ज़रूरी है। हम उनके मस्तिष्क में विद्या का संचार करना चाहते हैं, जो उन्हें अपना भविष्य बेहतर बनाने में उनकी मदद करेगा।

योगमाया और नीरज जैसे बच्चों की मदद करने के हमारे महती काम में अगर आप भी हाथ बटाना चाहते हैं तो किसी एक बच्चे को प्रयोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके आप ऐसा कर सकते हैं। धन्यवाद!

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