12 साल की मोनिका की मदद कीजिए! वह बुरी तरह जल गई है – 15 दिसंबर 2014

आज मैं एक ब्लॉग श्रृंखला शुरू करने जा रहा हूँ। यह पूरा सप्ताह मैं अपने स्कूल की एक लड़की, मोनिका को समर्पित करना चाहता हूँ।

ऊपर दिए गए चित्र में आप मोनिका को देख सकते हैं। बाईं तरफ वाले चित्र में उसका 4 मई 2014 से पहले का चेहरा है और दाहिनी तरफ दस दिन पुराना फ़ोटो है, उसके साथ हुई दुर्घटना के सात माह बाद का चित्र।

मोनिका जब 5 मई 2014 के दिन स्कूल नहीं आई तो हमने सोचा कि वह भी दूसरे कई बच्चों की तरह कुछ दिन पहले से ही गर्मी की छुट्टियों पर चली गई है। कुछ बच्चे हर साल यही करते हैं। उस वक़्त हम बिल्कुल नहीं जान पाए थे कि मोनिका अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी भीषण दर्द में छटपटा रही है।

अपने घर में वह मिट्टी के तेल के स्टोव पर चाय बनाना चाहती थी, जिसकी आँच तेज़ करने के लिए उसे पम्प करना पड़ता है। या तो किसी बात से उसका ध्यान बँट गया या फिर वह किन्हीं ख्यालों में खोई हुई होगी और उसी झोंक में वह कुछ ज़्यादा और तेज़ी के साथ पम्प करती चली गई और दुर्भाग्य से तेल का फव्वारा स्टोव की लौ के साथ उसके चेहरे, हाथ और छाती तक पहुँच गया और वह इतनी बुरी तरह जल गई कि सिर्फ त्वचा ही नहीं, गहराई तक मांस भी झुलस गया।

परिवार उसे तत्काल अस्पताल ले गया मगर उन्हें पहले वृन्दावन फिर वहाँ से मथुरा, फिर आगरा और अंत में दिल्ली तक के चक्कर लगाने पड़े तब जाकर उन्हें ऐसा डॉक्टर मिल पाया, जो आग से जले इतने गंभीर ज़ख्मों को ठीक कर सकता! उस समय के बारे में, एक के बाद दूसरे अस्पताल में भर्ती होने और वहाँ से बाहर निकलने की कहानी मैं आपको कल बताऊँगा।

और अंत में वे वृन्दावन लौट आए। स्कूल का नया सत्र शुरू हो चुका था और स्वाभाविक ही शिक्षकों ने नोटिस किया कि मोनिका अनुपस्थित है, हालांकि वह अकेली अनुपस्थित लड़की नहीं थी। फिर यह कोई अनहोनी बात भी नहीं थी-कुछ बच्चे हर साल नए सत्र में दिखाई नहीं देते: या तो उनका परिवार कहीं और चला जाता है या फिर वे किसी दूसरे स्कूल में पढ़ने लगते हैं। बाद में जब मोनिका की एक सहेली ने बताया कि मोनिका के साथ दुर्घटना हो गई है तो हमारे स्कूल के प्रधानाध्यापक उसके घर गए और पता किया कि वह स्कूल क्यों नहीं आ रही है। उन्होंने मोनिका को स्कूल आने के लिए बहुत प्रोत्साहित किया और कुछ दिनों के बाद वह आने भी लगी। जब तक वह नहीं आई थी, हमें उसके साथ हुए हादसे की गम्भीरता का अंदाज़ा नहीं था!

उसे देखने के बाद हमें लगा कि उसके इलाज के लिए तुरंत हरकत में आने की आवश्यकता है। फ़ोटो में आप उसकी जलकर बदरंग हुई त्वचा तो देख सकते हैं मगर उससे आपको यह अनुमान नहीं हो पाता कि दरअसल वह अपनी गरदन तक घुमाने में असमर्थ है! नीचे दिए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि उसकी गरदन की गतिविधि में कितना ज़्यादा असर हुआ है! उसकी त्वचा इतनी जकड़ गई है कि वह दाएँ और बाएँ देख तो पाती है मगर देखने के लिए उसे शरीर का ऊपरी हिस्सा दाएँ-बाएँ सरकाना पड़ता है। अपनी ठुड्डी भी वह नीचे-ऊपर नहीं कर पाती। उसके हाथ की भी यही स्थिति है क्योंकि उसकी काँख की त्वचा भी जल चुकी है। सिर्फ 90 डिग्री तक ही (यानी फर्श के समान्तर) वह अपना हाथ उठा पाती है, इससे अधिक नहीं-और इतना करने में भी उसे अत्यंत पीड़ा होती है!

मोनिका ने उसके साथ हुई सारी घटना की जानकारी देते हुए बताया कि उसकी आँखों और त्वचा में आज भी दर्द होता है। दर्द कुछ कम हो इसके लिए वह रोज़ नियमित रूप से नारियल का तेल लगाती है। हमने चर्चा के लिए उसकी माँ को स्कूल बुलाया और उसके परिवार के रहन-सहन और आर्थिक स्थिति का जायज़ा लेने उसके घर भी गए। उनकी हालत देखकर हम स्तब्ध रह गए और मैंने बिना किसी का नाम लिए उसकी माँ पर एक ब्लॉग लिखा। हमने तुरन्त दिल्ली के नज़दीक के एक अस्पताल में वहाँ के प्लास्टिक सर्जन के साथ अपॉइंटमेंट लिया। पिछले कई माह से वह किसी डॉक्टर के पास नहीं गई थी क्योंकि न तो उसकी माँ के पास उसे दिल्ली ले जाने लायक पैसे थे और न ही उसकी माँ इतने दिन तक काम छोड़ सकती थी। इसके अलावा, उसे डॉक्टर के पास ले जाने वाला कोई दूसरा उपलब्ध नहीं था।

पिछले सप्ताह, बुधवार के दिन हम मोनिका को अस्पताल ले गए, आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुड़गाँव। हमने यह अस्पताल क्यों चुना, यह मैं आपको कल बताऊँगा। मोनिका के लिए क्या किया जा सकता है, तीन प्लास्टिक सर्जनों की एक टीम से चर्चा करके हमने पता किया कि मोनिका के इलाज के संबंध में क्या किया जा सकता है।

उसके शरीर की कार्यक्षमता पुनर्स्थापित करने के लिए मोनिका पर अब पाँच सर्जरीज़ या शल्यचिकित्साएँ की जानी आवश्यक हैं। दोनों आँखों के लिए एक, क्योंकि अभी वह आँखों की पलकें झपकाने पर भी आँखें पूरी तरह बंद नहीं होतीं, जिसके चलते आँखें सूखती हैं और उसे तकलीफ होती है। एक उसकी गरदन पर, जिससे वह उसे फिर से हिला-डुला सके। एक और, उसके मुँह पर, जिसे वह अभी पूरा खोल नहीं पाती और बहुत छोटे-छोटे कौर ही ले पाती है। और अंत में उसकी बाँह पर एक, जिससे वह आसानी के साथ, स्वतंत्रतापूर्वक अपना हाथ चला सके। डॉक्टरों ने बताया कि इन सब कामों के लिए वे उसकी जाँघ से त्वचा निकालकर आवश्यक स्थानों पर प्रतिरोपित करेंगे। इतना हो जाने के बाद ही वे चेहरे, छाती और बाहों के जले हिस्सों पर लेसर चिकित्सा शुरू करेंगे।

यह एक बड़ी लंबी प्रक्रिया होगी। डॉक्टरों ने बताया कि कुछ सर्जरियाँ एक साथ भी की जा सकती हैं और तब सिर्फ तीन सर्जरियाँ ही करनी पड़ेंगी। लेकिन इसके बाद भी दो सर्जरियों के बीच कम से कम चार से पाँच माह का अंतराल रखना ज़रूरी है, जिससे वह पूरी तरह स्वस्थ हो सके! इतना ही नहीं, जब वह बड़ी होगी, तब अगले पाँच से दस साल बाद उसे पुनः यही सर्जरियाँ करवानी होंगी क्योंकि जली हुई त्वचा शरीर के विकास के साथ उसी अनुपात में फिर कभी विकसित नहीं हो पाएँगी! इन सर्जरियों के बिना भविष्य में उसके कुछ अंगों के सामान्य परिचालन की संभावना नहीं रहेगी। इस पृष्ठ पर आप डॉक्टरों द्वारा प्रस्तावित मोनिका पर की जाने वाली सर्जरियों के विभिन्न चरणों का और उन पर होने वाले अनुमानित व्यय का विवरण देख सकते हैं।

जैसे ही हमने स्कूल में मोनिका को देखा, हमने सोच लिया था कि हम उसकी मदद करेंगे। दरअसल इसका निर्णय पहले ही लिया जा चुका है, अब तो हम सिर्फ उसके क्रियान्वयन के विभिन्न पहलुओं पर बारीकी से विचार कर रहे हैं कि किस तरह उसकी मदद की जाए।

हमने मोनिका की मदद करने का निर्णय कर लिया है-और आप भी हमारे इस काम में हाथ बँटा सकते हैं! हम चाहते हैं कि उसकी पहली सर्जरी के लिए जल्द से जल्द पर्याप्त रकम जमा हो जाए! आपका चंदा या दान इस मामले में बहुत मददगार साबित हो सकता है!

सहायता भेजने संबंधी विस्तृत जानकारी यहाँ प्राप्त करें!

एक डॉक्टर और एक कलाकार – बचपन के दोस्त की मदद – 29 जून 2014

अपने 2006 के विदेश दौरे में मैं न सिर्फ नई जगहों में गया बल्कि अपने उन आयोजकों और मित्रों के साथ उनके घरों में भी रहा, जिनके यहाँ मैं अपनी पिछली यात्राओं के दौरान भी नियमित रूप से रहता आया था। उनमें से एक जर्मन मित्र, जो डॉक्टर और मनश्चिकित्सक था और लुनेबर्ग नामक स्थान में रहता था। जब मैं उसके साथ रह रहा था, मुझे उसके उदार और मददगार स्वभाव को एक बार फिर करीब से देखने का अवसर मिला। दूसरों की मदद करने की आदत को जिस तरह उसने अपनी ज़िन्दगी में उतारा था उसकी प्रशंसा किए बगैर मैं नहीं रह सका।

उसकी एक बचपन की मित्र थी, एक लड़की, जो उसके पड़ोस में रहकर ही बड़ी हुई थी और एक किशोर के रूप में वह उसके साथ खेलता रहा था। एक तरफ उसने कॉलेज जाना शुरू किया, पढ़ाई की और पहले डॉक्टर और फिर एक मनश्चिकित्सक बना और दूसरी तरफ उसकी मित्र ने दूसरा रास्ता चुना: वह एक कलाकार बन गई, अगर और स्पष्ट करना हो तो, एक पेंटर। जैसा कि अधिकतर लोग जानते होंगे, कला आर्थिक रूप से उतना प्रतिफल देती नहीं है जितना कि डॉक्टरी का पेशा और इसलिए वह महिला बड़ी मुश्किल से गुज़र-बसर के लायक कमाने के संघर्ष में जुटी हुई थी, जबकि हमारा मित्र जीवन में एक सफल डॉक्टर के रूप में स्थिर हो रहा था और उसका भविष्य सुरक्षित था।

कलाकारों का जीवन कैसा होता है, आप जानते हैं। उनमें एक तरह का जुनून होता है और जबकि अपने काम में वे निमग्न रहते हैं, उसमें उन्हें ख़ुशी मिलती है मगर उससे उन्हें गुज़र-बसर करने लायक आमदनी नहीं हो पाती। दूसरे बहुत से कलाकारों की तरह वह महिला भी सरकार की ओर से थोड़ी-बहुत मदद पाती थी, मासिक अर्थ-वृत्ति, जिससे उसका खर्च बड़ी मुश्किल से निकल पाता था। उसे अपनी पेंटिंग्ज़ बेचने में सफलता नहीं मिल पाती थी- दो पेंटिंग्ज़ जो उसकी बिकी थीं, वह मेरे उसी डॉक्टर मित्र द्वारा खरीदी गई थीं!

जब भी मैं एक सप्ताह के लिए उसके क्लीनिक में आता था तो देखता अक्सर वह महिला उससे पैसे माँगकर ले जाती है। नहीं, भीख नहीं। वह हमेशा जोर देकर कहती, "कुछ उधार दे दो, जब मेरी पेंटिंग्ज़ बिकेंगी, वापस कर दूँगी!"

निश्चय ही वह समय कभी नहीं आया। इसका जो ईनाम उसे मिला वह था सड़क किनारे खिले फूलों का गुलदस्ता। फिर भी मेरे मित्र ने मुझसे कहा, "पिछले तीस सालों में हर दूसरे हफ्ते मैं उसे कुछ न कुछ देता रहा हूँ और मैंने उसका कोई हिसाब भी नहीं रखा है कि कुल कितनी रकम मैं उसे दे चुका हूँ क्योंकि मैं उससे एक दमड़ी भी वापस पाने की अपेक्षा नहीं रखता। मैं उसके चेहरे की हँसी और प्रेम देखकर बहुत खुश होता हूँ।" और उसने यह भी जोड़ा: पैसे के रूप में मैं भी उसे प्रेम ही देता हूँ।

उसका रवैया देखकर और उसकी बातें सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। उसका कहना था कि उसकी मदद करके वह गरीब नहीं हो जाता लेकिन इतना जानता है कि उसे रुपयों की सख्त ज़रुरत होती है। तो यहाँ-वहाँ से मदद मिल जाने पर वह अपना गुज़र कर पाती है और साथ ही उसे अपने स्वप्न को जीने का अवसर भी प्राप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में आप उसकी मदद क्यों नहीं करना चाहेंगे?

यही एक कारण है कि मैं कहता हूँ कि मेरे मित्र ने एक विशाल ह्रदय पाया है। और यह एक उदहारण है कि कैसे आप लोकसेवा के संकल्प को अपने दैनिक जीवन में उतार सकते हैं!

एक पोल डांसर की तांत्रिक जकड़ से छुटकारा- 1 सितंबर 2013

पिछले हफ्ते आपने पढ़ा कि कैसे मैंने अपनी आस्ट्रेलियन आयोजक का साथ छोडने का निर्णय लिया था क्योंकि वह मेरे काम को भी अपने काम की तरह विज्ञापित कर रही थी, जिसमें ‘तंत्र’ लेबल के अलावा पश्चिम में ‘तंत्र’ शब्द के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी यौन संबंधी बातें भी संयुक्त थीं। मैंने उसके साथ काम न करने का निर्णय तो कर लिया लेकिन इस बात ने मुझे भावनात्मक रूप से परेशान कर दिया। उस देश में, जहां मैं सिर्फ दूसरी बार आया हूँ और जहां मैं किसी को ठीक तरह से जानता भी नहीं, आखिर मैं कहाँ जाऊंगा?

उस शाम उसे किसी ग्राहक से बात करते हुए सुनकर मैं बहुत परेशान हो गया। मैंने रात को में भारत फोन लगाया कि अपने परिवार से पूरी स्थिति के बारे में चर्चा कर सकूँ। मुझे याद है कि अपनी हालत के बारे में सोचकर मैं रो पड़ा और अपने छोटे भाई से कहा कि मैं किसी भी हालत में जल्द से जल्द यहाँ से निकलना चाहता हूँ। मैं यहाँ काम नहीं कर सकता, यह मेरे लिए ठीक जगह नहीं हैं, मेरे आयोजक ठीक लोग नहीं हैं और ग्राहक ऐसे हैं जिनकी अपेक्षाएँ मैं किसी भी हालत में पूरी नहीं कर पाऊँगा!!

परिवार से बात करके मुझे कुछ अच्छा लगा और मेरे छोटे भाइयों ने मुझे कुछ विवेकपूर्ण सलाह भी दी: मेरे पास पहले ही गोल्ड कोस्ट के लिए विमान में आरक्षण था, जहां एक हफ्ते के भीतर मुझे अपना अगला कार्यक्रम प्रस्तुत करना था। मतलब, अगर मैं इस महिला के तंत्र-केंद्र को छोड़ भी दूँ तो भी मुझे अगले चार दिन यहीं बिताने थे। अगर मैं वहाँ किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं भी जानता था कि उसके यहाँ रह सकूँ तो इतने समय के लिए मैं किसी होटल में रह सकता था और यूं ही समय व्यतीत कर सकता था।

पिछली यात्रा के दौरान परिचित मेरा कोई मित्र उस इलाके में नहीं रहता था क्योंकि पिछली बार मैंने बिल्कुल अलग इलाके में अपने कार्यक्रम किए थे लेकिन एक महिला थी, जिससे मेरा नेट पर संदेशों के आदान-प्रदान भर का परिचय था और जो करीब ही कहीं रहती थी। तो मैंने उस महिला को, जिससे मेरा कुछ ईमेल संदेश का भर परिचय था, फोन लगाया और उससे कहा कि इस परेशानी में मेरी कुछ मदद करे। मैंने पूरा प्रकरण उसे नहीं बताया, सिर्फ इतना कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है और यह जगह छोडना मेरे लिए बहुत ज़रूरी है और यह भी कि क्या वह यहाँ आकर मुझे ले जा सकती है जिससे मैं कुछ दिन उसके यहाँ व्यतीत कर सकूँ?

आप मेरी खुशी की कल्पना कर सकते हैं, जब उसने कहा, "जी हाँ, बिल्कुल! परेशान न हों, मैं डेढ़ घंटे की दूरी पर हूँ और कल मैं आऊँगी और आपको ले चलूँगी! मेरा घर छोटा सा है और मेरे दो बच्चे हैं लेकिन आप जब तक चाहें मेरे यहाँ रुक सकते हैं!" मैंने उसे दिल की गहराइयों से धन्यवाद कहा और बताया कि मुझे सिर्फ चार दिन ही रहना है।

यह इंतज़ाम करके मैं एक बार फिर कमरे से बाहर निकला तो देखा कि मेरी आयोजक अभी जग रही है। मैंने उसे बताया कि मैं आयोजित कार्यशाला और सत्र नहीं कर पाऊँगा और कल ही वहाँ से चला जाऊंगा।

मैंने उसे शांतिपूर्वक समझाने की कोशिश की कि हमारे आचार-विचार मेल नहीं खाते। मैं नहीं चाहता कि वह पूरे आस्ट्रेलिया के लिए मेरी आयोजक बने और उसके काम करने के तरीके से मैं कोई सामंजस्य नहीं बिठा पाऊँगा। इसके अलावा मैं ‘तांत्रिक’ कार्यशाला और व्यक्तिगत सत्र के साथ कोई भी संबंध नहीं रखना चाहता और इस तरह का काम करना मेरे लिए संभव नहीं है।

दूसरे दिन मेरी वह ईमेल फ्रेंड आई और मैंने अपनी आयोजक से गुड-बाई कहा और जाकर कार में बैठ गया। किसी जगह को छोड़ते हुए इतना अच्छा मुझे कभी नहीं लगा था! रास्ते में मैंने पूरी आपबीती उस महिला मित्र को सुनाई और बताया कि क्यों मुझे इतनी हड़बड़ी में उसकी मदद की ज़रूरत पड़ी।

जी हाँ, मैं इस भूतपूर्व पोल-डांसर को, जो चोला बदलकर ‘तांत्रिक योगी’ बन गई थी, जीवन में कभी भूल नहीं पाऊँगा। मैंने यह सीख पाई कि अपने आयोजकों का चुनाव करने से पहले मुझे उनके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और कुछ अधिक सतर्क रहना चाहिए। उम्मीद है, भविष्य में ऐसी अप्रिय स्थितियों से मैं अपने आपको दूर रख सकूँगा!

एक नयी परियोजना: बच्चों के लिए नए योग-वस्त्र और चटाइयाँ!-19 अगस्त 2013

अगर आप हमारे सूचना-पत्र के नियमित पाठक हैं तो संभवतः आपको इस बारे में जानकारी होगी, जिसे आज मैं आगे बता रहा हूँ। हमने एक नयी योजना शुरू की है: हमें अपने स्कूल के बच्चों को योग करने के दौरान इस्तेमाल होने वाली चटाइयाँ और योग-वस्त्र उपलब्ध कराने हैं-और इस कार्य में हम आपका सहयोग पाकर प्रसन्न होंगे!

साल भर हमारे आश्रम में मिलने-जुलने वाले आते रहते हैं। वे हमारे स्कूल आते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं, वे उन्हें भोजन करता देखते हैं और अपनी कक्षाओं में उन्हें रोज़ योग करता हुआ देखकर खुश होते हैं। चाहे वे योग-विश्रांति शिविर में आएँ चाहे आसपास के इलाकों में घूमने-फिरने या चाहे सिर्फ आराम फरमाने आएँ, सभी को बच्चों से खुशी-खुशी मिलवाया जाता है। स्कूल की योग कक्षाएँ हमें पसंद हैं और इस बात पर हमें गर्व है कि हमारे बच्चे योग भी सीखते हैं-लेकिन उनके योग-वस्त्र और योग में इस्तेमाल होने वाली चटाइयाँ बहुत खराब हो गई हैं और देखने में अच्छी नहीं लगतीं!

हमने सन 2010 में योग कक्षाएँ शुरू की थीं। हमारे स्कूल में जिम नहीं था कि बच्चों के खेल-कूद का कोई इंतज़ाम हो सके, मगर शारीरिक व्यायाम भी ज़रूरी था-इस तरह योग कक्षाएँ शुरू करने का हमारा निर्णय तर्कसम्मत ही था। स्पष्ट ही, योग करने में उस तरह, बहुत बड़े स्थान की आवश्यकता नहीं होती जैसी कि दूसरे व्यायामों में होती है। बच्चों के लिए सिर्फ एक चटाई की आवश्यकता होती है। यही हमने किया-और हमारा वह प्रयास बहुत सफल भी हुआ। बच्चों ने उसे बहुत पसंद किया, हमारे मेहमान भी उन्हें योग करता देखकर बड़े खुश होते हैं और कई तो उनके साथ योग करना भी शुरू कर देते हैं।

अंग-संचालन के अलावा योग मानसिक रूप से भी बच्चों के लिए बड़ा लाभप्रद है। योग सिर्फ शारीरिक व्यायाम ही नहीं है बल्कि एकाग्रता, याददाश्त और विचारों को केन्द्रित करने में भी वह बड़ा लाभप्रद साबित होता हैं। इसके अलावा, जब कि दूसरे खेल बच्चों में प्रतियोगिता की भावना का संचार करते हैं, जिसमें हमेशा दूसरों पर और दूसरों के विकास पर ध्यान देना पड़ता है, योग में खुद पर ही ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। वैसे ही, भविष्य में बच्चों को तीव्र प्रतिस्पर्धा का सामना करना है-स्कूल और ‘खेल’ की कक्षाओं में इसकी आवश्यकता नहीं है।

जब बारिश नहीं होती थी, स्कूल आने पर बच्चे रोज़ योग किया करते थे। वे अपने सामान्य कपड़े पहनकर योग करते थे और सप्ताहांत में उन्हें धो लेते थे। वे अपनी चटाइयाँ रोज़ उठाते और उन्हें एक साथ रख देते। इस बात को तीन साल हो चुके हैं, उन्हीं चटाइयों में और उन्हीं योग-वस्त्रों में उन्होंने तीन साल योग किया। स्वाभाविक ही बच्चे बड़े हो चुके हैं। कुछ पतलूनें अब कैप्री जैसी दिखाई देती हैं क्योंकि बच्चे ऊंचे हो चुके हैं, वस्त्रों का रंग उड़ गया है और उन पर छपी आकृतियाँ खराब हो चुकी हैं। घर्षण से चटाइयाँ, उन जगहों पर बुरी तरह घिस गई हैं, जहां हाथ और पैर ज़्यादा पड़ते हैं। कुछ चटाइयाँ पूरी तरह फट चुकी हैं और फेंक दी गई हैं।

मुझे लगता है कि आप वस्तुस्थिति समझ रहे हैं और अब अगर मैं आपसे कहूँ कि हमारे यहाँ इस साल बहुत से नए विद्यार्थी भी आ गए हैं, और जो सबसे छोटे हैं उन्हें योग नहीं करना चाहिए क्योंकि सबके लिए पर्याप्त चटाइयाँ उपलब्ध नहीं हैं तो आपके सामने परिस्थिति की गंभीरता और भी अधिक स्पष्ट हो जाएगी। इसीलिए नई चटाइयाँ और नए योग-वस्त्र खरीदने की हमारी यह परियोजना प्राथमिकता के साथ पूरी की जानी ज़रूरी है। दूसरी अति आवश्यक वस्तुओं की खरीद के मद्देनजर-जैसे भोजन और शिक्षण के मद में होने वाला खर्च-अब तक हम इन वस्तुओं की खरीद को मुल्तवी करते रहे हैं, लेकिन आज हम आपसे गुजारिश करते हैं कि बच्चों को अच्छे योग वस्त्रों में और नई चटाइयों पर योग करने की सुविधा प्रदान करने के हमारे इस अभियान में आप भी सहभागी बनें!

योग-वस्त्रों और चटाइयों की अनुमानित लागत कुल 1500 यूरो है। एक व्यक्ति के लिए यह बहुत बड़ी राशि है और एक ही मद में इतनी बड़ी राशि खर्च करना हमारे लिए संभव नहीं है। लेकिन अगर आप सब थोड़ी-थोड़ी राशियों से हमारी मदद करेंगे तो मुझे विश्वास है कि हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।

यहाँ आप इस संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अपना अंशदान भी कर सकते हैं

हमारी मदद कीजिए! आपके सहयोग की न सिर्फ हम कद्र करते हैं बल्कि योग परिवार के बीच या ऐसे व्यक्तियों के बीच, जो बच्चों के लिए योग के लाभों के प्रति जाग्रत है, इस परियोजना के प्रचार के लिए किए जाने वाले आपके प्रयासों के लिए भी हम आभार व्यक्त करते हैं। योगी, योग शिक्षक, योग विद्यार्थी और सभी जिनके दिल बच्चों के लिए धड़कते हैं-हम उन सभी से अंशदान प्राप्त करके प्रसन्न होंगे!

मैं आप सबको अग्रिम धन्यवाद देता हूँ और एक बार यह परियोजना पूरी हो जाए, फिर मैं बच्चों के नए योग-वस्त्र और नई चटाइयाँ आपको दिखाने हेतु प्रस्तुत रहूँगा!