हाँ, मुझे सेक्स, पैसा, भौतिक पदार्थ और मेरी पत्नी पसंद हैं और मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है! 19 नवंबर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक ऐसा मेहमान आया, दुनिया के बारे में जिसका बहुत कट्टर नज़रिया था। कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो, आप कुछ भी कहें या करें, आपको नीचा दिखाने की चाह रखते हैं। यह व्यक्ति उसी तरह का व्यक्ति था- और आज मैं उसी व्यक्ति को ऐसे व्यवहार का उदाहरण बनाना चाहता हूँ।

यह व्यक्ति अपने आप को कम्युनिस्ट विचारधारा का नास्तिक कहता था। वह हमेशा बातचीत के लिए सन्नद्ध रहता था-जो अक्सर दूसरों को नीचा दिखाने की कवायत में बदल जाती थी। इसी तरह जब एक बार हम आश्रम में टहल रहे थे तो उसने मेरे कपड़ों के बारे में पूछा। निश्चय ही, यह पहला मौका नहीं था जब किसी ने मुझसे मेरे कपड़ों के बारे में पूछा था। दरअसल यह अक्सर होता है लेकिन इस बार प्रश्न के स्वर में एक प्रकार का आरोप नज़र आता था: अगर मैं खुद को नास्तिक कहता हूँ तो ऐसे कपड़े क्यों पहनता हूँ जिससे कोई अन्य धारणा बनती है?

अपने ब्लॉगों में पहले ही मैं स्पष्ट कर चुका हूँ कि अपने कपड़ों से मैं कोई सन्देश नहीं दे रहा हूँ। जैसे भी हों, मुझे यही कपड़े पसंद हैं और दूसरी तरह के कपड़े मैं नहीं पहनना चाहता।

अपने प्रश्न के इस उत्तर पर उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया: आपको अपने कपड़े पसंद हैं? यानी आपको भौतिक वस्तुएँ पसंद हैं?

जी हाँ, पसंद हैं! मुझे बहुत से साज़ो-सामान पसंद हैं और पैसा कमाना भी पसंद है। मुझे अपने काम से प्यार है और मैं अपनी पत्नी और बेटी से भी प्यार करता हूँ! मैं किसी तरह की धार्मिक जड़ता से या ऐसे किसी अन्य दर्शन से बंधा हुआ नहीं हूँ, जो मुझे सलाह दे कि यह पहनो और वह न पहनो! मैं किसी दूसरे व्यक्ति के विचारों को इजाज़त नहीं देता कि वे मेरी भावनाओं को निर्देशित करने लगें!

बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भौतिक वस्तुओं से अलिप्तता ही सही रास्ता है। बहुत से लोग ब्रह्मचर्य पर विश्वास करते हैं और भावनाओं के प्रति अलिप्तता को भी उचित मानते हैं। भारत में ऐसे लोग अधिकतर धार्मिक साधू होते हैं। पश्चिम में भी ऐसे लोग अध्यात्मवादियों में पाए जाते हैं। वे अधार्मिक हो सकते हैं लेकिन फिर भी उनकी कोई न कोई विचारधारा होती है और साथ ही यह विचार कि आपको क्या प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

ये सारे लोग मानते हैं कि हमें अपने कपड़ों से लगाव नहीं होना चाहिए, पैसे से प्यार नहीं होना चाहिए और हमें अपने करीबी लोगों से अलिप्त रहना चाहिए। उन्हें जो मानना है, मानते रहें लेकिन मैं अपने जीवन का पूरा मज़ा लेना चाहता हूँ! मैं मानता हूँ कि जीवन का आनंद न लेना गलत है इसलिए मुझे अपने वस्त्र पसंद हैं और मैं अपने काम से प्रेम करता हूँ। जैसे मुझे गरीब बच्चों की मदद करना अच्छा लगता है, उसी तरह पैसे कमाना भी बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी बेटी से और पत्नी से प्यार करता हूँ, मुझे सेक्स बहुत पसंद है और मुझे हर तरह की आरामदेह सुविधाओं का उपभोग भी बहुत पसंद है। मैं छुट्टियाँ मनाना पसंद करता हूँ-जैसा कि मैं इस समय जर्मनी में अपने परिवार और बहुत सारे दोस्तों के साथ कर रहा हूँ!

मुझे जीवन का आनंद लेना पसंद है। मुझे जीवन से प्यार है और मानता हूँ कि हम सब को जीवन का हरसंभव अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करना चाहिए। यदि आप कोई इतर विचार रखते हैं, तो बेशक अपने विचार के साथ खुश रहें और उसी के अनुसार जीवन बिताएँ-मुझे अपने विचारों के लिए नीचा दिखाने की कोशिश न करें। इसमें आपको सफलता नहीं मिलेगी और आप बेकार ही मेरा और खुद अपना समय बरबाद करेंगे। मैं आपको सहमत करने की कभी कोशिश नहीं करूँगा। मैं सिर्फ एक सलाह दूँगा: सिर्फ एक बार मेरी तरह जीवन का आनंद लेने और उससे प्यार करने की कोशिश करके देखिए। आप पछताएँगे नहीं!

वार्तालाप के कौशल में वृद्धि हेतु 5 टिप्स – 19 अगस्त 2015

मेरे जीवन में मेरा शब्दों से बड़ा घनिष्ट संबंध रहा है, संभाषण, प्रवचन, वाद-विवाद और सलाहें। बचपन से ही मैं एक व्यावसायिक वक्ता रहा हूँ और हज़ारों लोगों के सामने बोलकर आजीविका कमाता रहा हूँ, छोटे समूहों के सामने भी और किसी से व्यक्तिगत चर्चा में भी। चाहे आप किसी बड़ी सभा को संबोधित कर रहे हों या किसी एक व्यक्ति के साथ बात कर रहे हों, कुछ बातों का आपको हमेशा ध्यान रखना चाहिए और आज मैं उन्हीं बातों के संबंध में लिखना चाहता हूँ।

1) देख लीजिए कि सामने वाला भी बातचीत में वास्तविक रुचि रखता है या नहीं।

क्या आपके सामने कभी ऐसी स्थिति आई है कि कोई आपसे कुछ कह रहा है लेकिन आप उस विषय में अधिक रुचि नहीं रखते, जिसे वह इतना ज़ोर देकर बता रहा है? मैं अक्सर ऐसी परिस्थिति से दो-चार होता रहा हूँ, जब सामने वाला क्या कह रहा है इसमें मेरी कोई रुचि नहीं रही है और मैं दरअसल सोच में पड़ गया हूँ कि आखिर यह व्यक्ति मुझसे यह सब क्यों कह रहा है। ऐसी स्थिति तब पेश होती है जब मैं किसी विषय के साथ जुड़ नहीं पाता, जब मुझे लगता है कि यह ऐसी बात है, जिसे न तो मैं जानना चाहता हूँ और न ही मुझे उस विषय में जानने की कोई ज़रूरत है!

तो जब भी आप किसी दूसरे व्यक्ति के साथ बात कर रहे हों तो कृपया इस बात की जाँच कर लें कि जो बात आप कह रहे हैं, उसे सामने वाला सुन भी रहा है या नहीं! आप इस बात को उनके चेहरे पर पढ़ सकते हैं, आप उनके शरीर की मुद्रा से पता कर सकते हैं! अगर वे बोर हो रहे होंगे तो आप तुरंत अपनी बात को विराम दें।

2) स्पष्ट बात करें और विषय से बहकें नहीं

जब आपके पास विषय पर कहने के लिए कुछ सार्थक हो, तभी कहें। बहुत से वक्ता कहना शुरू करते हैं और एक विषय से दूसरे पर और वहाँ से और कहीं निकल जाते हैं और बात को लंबा खींचते चले जाते हैं। वे कभी भी किसी स्पष्ट नतीजे पर नहीं पहुँचते और फिर मूल बात, जहाँ से उन्होंने बोलना शुरू किया था और जो वे वास्तव में कहना चाहते थे, उनकी वाचालता में कहीं गुम हो जाती है।

मेरी उन पचासों विषयों में कोई रुचि नहीं है, जिन पर आप बोले चले जा रहे हैं इसलिए कृपया अपनी बात को इतना न बढ़ाएँ कि आपका संभाषण बनावटी लगने लगे।

3) बात को भरसक संक्षिप्त रखें

अगर आप अपना संदेश लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं तो उसे बहुत न खींचें! जिसके साथ आप बात कर रहे हैं, संभव है उसके पास उतना समय न हो, जितना आपके पास है। इससे बढ़कर: जितना संक्षिप्त आप बोलेंगे उतना ही अधिक वह प्रभावोत्पादक होगा! वह बिना किसी अलंकृत शब्दावलियों के सुनने वाले के मस्तिष्क में सीधा प्रवेश करेगा!

इसलिए अगर आप अपने विचार किसी के सामने व्यक्त करना चाहते हैं और चाहते हैं कि आपका संदेश वे ग्रहण कर सकें तो उसे कम से कम शब्दों में व्यक्त करें- यह अधिक संतुलित और कारगर होगा!

4) किसी पहले से चल रही चर्चा के बीच व्यवधान पैदा न करें

यह मैं अक्सर देखता हूँ: दो लोग बात कर रहे हैं और तीसरा आता है और सीधे चर्चा में शामिल हो जाता है। आप कभी भी ऐसा न करें! दूसरों की चर्चा में व्यवधान उपस्थित न करें!

हालांकि दुनिया भर में यह सामान्य शिष्टाचार के अंतर्गत आता है, मैंने पाया है कि पश्चिम में इसका बहुत ध्यान रखा जाता है। भारत में बहुत से लोग बोलने के लिए बहुत उतावले रहते हैं और इस बात का कतई खयाल नहीं रखते कि उस समय कोई दूसरा बोल रहा है। यह बहुत अशिष्ट लगता है, भद्दा दिखाई देता है और बहुत बुरा महसूस होता है!

5) दूसरे की बात सुनें

इसके अलावा, अंतिम बिन्दु, जो कि बहुत महत्वपूर्ण भी है: सिर्फ अपने विचार ही व्यक्त न करें, खुद अपने आपको बोलते हुए न सुनते रहें। दूसरे को भी बात करने का मौका दें! दूसरा क्या कह रहा है, उसके संभाषण में भी रुचि लें! तभी सामने वाला बाद में कभी आपकी बात सुनने के लिए पुनः उपलब्ध होगा!

मेरी जर्मन पत्नी और हमारा अन्तरसांस्कृतिक संबंध – 5 जुलाई 2015

पिछले दो हफ़्तों से मैं भारतीय पुरुषों और पश्चिमी महिलाओं से बने जोड़ों के बारे में लिखता रहा हूँ। मैंने भारतीय पुरुष और पश्चिमी महिला के मध्य होने वाली ऑनलाइन चैटिंग से अपनी बात शुरू की थी– क्योंकि उन महिलाओं में से अधिकांश उस वक़्त निराश हो जाती हैं, जब उन्हें पता चलता है कि भारतीय पुरुष उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। उसके बाद मैंने उन दंपतियों के सामने, जो वास्तव में अपने संबंधों के प्रति गंभीरतापूर्वक सोच रहे हैं, अपने कुछ विचार रखे थे, जिनमें उन समस्याओं के बारे में बताया गया था, जिनका सामना उन नवदंपतियों को करना पड़ सकता है। स्वाभाविक ही, मुझे ये ब्लॉग लिखने की प्रेरणा न सिर्फ उन दंपतियों से प्राप्त हुई थी, जिन्होंने अपने अनुभव मुझे सुनाए बल्कि खुद अपने दांपत्य जीवन से भी प्राप्त हुई थी। कुल मिलाकर मुझे यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि दूसरे बहुत से अंतरराष्ट्रीय दंपतियों की तुलना में मेरी जर्मन पत्नी, रमोना और मेरे लिए निश्चित ही बहुत आसान रहा!

इसकी शुरुआती सच्चाई यह है कि हमारी मुलाक़ात वास्तव में ऑनलाइन हुई ही नहीं। निश्चय ही हमारे बीच सबसे पहला संपर्क उसके द्वारा भेजा गया एक ईमेल था मगर उसके तुरंत बाद हम रूबरू मिले थे- और फिर एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानने-समझने का पर्याप्त मौका भी हमें मिलता रहा था। हालांकि हमारे बीच भी एकाध बार ऑनलाइन चैटिंग और टेलीफोन पर बातचीत हुई, परन्तु हमें कभी भी इस बात पर शक करने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि सामने वाला अपने बारे में सही बता रहा है झूठ, क्योंकि हम जानते थे कि हम जल्द ही मिलने वाले हैं और हमें एक दूसरे के बारे में सच्चाई तथा और भी दूसरी जानकारियाँ प्राप्त हो ही जाएँगी। इसका अर्थ यह था कि हम कभी भी उस तरह असुरक्षित महसूस नहीं किया, जैसा कि ऑनलाइन संबंध बनाने वाले लोग अक्सर महसूस करते हैं- क्योंकि हमारे संबंध की शुरुआत वास्तविक जीवन के ठोस धरातल पर हुई थी।

उस समय हम दोनों ही सशरीर जर्मनी में उपस्थित थे। वास्तव में, उससे मिलने से पहले ही मैं अपने जीवन के सात साल पश्चिमी देशों में गुज़ार चुका था और मुझे वहाँ के लोगों के साथ काम करने, उन्हें जानने-समझने और उनकी मानसिकता के बारे में परिचय प्राप्त करने का पर्याप्त मौका मिलता रहा था। मेरे कई जर्मन मित्र थे और इसलिए मुझे हमारे बीच मौजूद सांस्कृतिक और परंपरागत अंतर का पहले ही काफी अनुभव था। और अक्सर उनकी प्रशंसा करता था, इसलिए मैंने भी मेरी पत्नी के देशवासियों की कुछ चारित्रिक विशेषताओं को अपने जीवन में उतार लिया था। अतः, जब मेरी पत्नी एक भारतीय से पहली बार मिली तो उससे बात करते समय मैं उसके मन को पढ़ सकता था और जान सकता था कि वह किस दिशा में सोच रही होगी।

हम दोनों अपने आपसी प्रेम और संबंध पर फोकस कर सकते थे- और हमें ‘भारत में बसने’ के बारे में सोचने की ज़रूरत ही नहीं थी। हमने अपना पहला साल दुनिया की सैर करते हुए बिताया और हम किसी एक देश में तीन या चार माह से अधिक कभी नहीं रहते थे। हम जर्मनी से भारत आए और फिर कई दूसरे देशों की यात्राएँ कीं। हम बिना इसकी चिंता किए कि हमें किन परिस्थितियों में जीवन गुज़ारना होगा, एक दूसरे के करीब आते चले गए, प्रेम में गहरे आबद्ध होते चले गए। वास्तव में रमोना को उत्प्रवास की वैसी छलांग लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि सब कुछ क्रमशः, धीरे-धीरे होता चला गया, एक साथ, अकस्मात नहीं।

लेकिन आश्रम में कुछ माह रहने के बाद और हमारे इस निर्णय के बाद भी कि अब सफर कम से कम किया जाए और ज़्यादातर समय घर में रहा जाए, हम असाधारण रूप से बहुत अच्छी परिस्थिति में ही रहे आए। क्यों? क्योंकि हमारा परिवार एक असाधारण परिवार है! जी हाँ, मैं इसे बार-बार दोहरा सकता हूँ और इसीलिए मुझे अपने भाइयों पर, अपने माता-पिता पर अपनी नानी पर गर्व है और मैं उन सबसे इतना प्यार करता हूँ। वे मेरी पत्नी के प्रति इससे ज़्यादा प्रेम और आदर प्रदर्शित नहीं कर सकते थे!

मैं भाग्यशाली हूँ कि मैं एक खुले विचारों वाले परिवार में पलकर बड़ा हुआ। सामने आने वाली किसी भी नई बात को सहजता से ग्रहण करने और उसे जानने-समझने के उनके उत्साह ने यह संभव किया कि मेरी पत्नी उन सभी के दिल में जगह बना सकी और तुरंत सबका प्यार पा सकी। किसी ने कोई प्रश्न नहीं पूछा, किसी नियम के पालन की बाध्यता नहीं थी, कोई शर्त सामने नहीं रखी गईं। इस महिला से मैं प्रेम करता था इसलिए वे भी उससे प्रेम करने लगे।

मुझे लगता है कि मेरी पत्नी और माँ के मध्य संबंध कैसा था, इस विषय में मुझे एक भी अतिरिक्त शब्द लिखने की ज़रूरत नहीं है। वह बहुत प्यार भरा, स्नेहिल संबंध था, जिसके विषय में आप माँ की मृत्यु के बाद लिखे गए मेरी पत्नी के ब्लॉग में पढ़ सकते हैं

मैं यह सब आपको यह बताने के लिए लिख रहा हूँ कि जहाँ लोगों के अपने व्यक्तिगत अनुभवों के चलते मैंने ये ब्लॉग लिखे, वहीं मुझे इस बात की खुशी है कि अपनी पत्नी के साथ मुझे इन बातों का सामना नहीं करना पड़ा। न ही मेरी पत्नी को मेरे परिवार के साथ उन्हें भुगतना पड़ा। दूसरी तरफ, ये ब्लॉग लिखते हुए मैंने एक बार फिर नोटिस किया कि हम कितने भाग्यवान हैं- और रविवार के दिन, जब मैं अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में लिखता हूँ, निश्चय ही आज का रविवार यह सब लिखने के लिए बहुत उपयुक्त सिद्ध हो रहा है!

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं कि आप किसी भी तरह के संबंध में हों, चाहे अंतरसांस्कृतिक हो, अंतर्राष्ट्रीय हो या सिर्फ दो इन्सानों के बीच का संबंध हो, आप भी वैसे ही भाग्यशाली सिद्ध हों जैसे कि हम हमेशा से रहे हैं और आज भी हैं!

अपने वास्तविक मित्रों के साथ मिलकर बदलावों को अनुभव करने का सुखद एहसास – 29 मार्च 2015

कल थॉमस और आयरिस आश्रम आ गए! उनका आना हमेशा ही बड़ा सुखद होता है और इस बार भी उनके आने से सिर्फ अपरा ही खुश नहीं हुई!

हमारे पिछले कुछ माह न सिर्फ बहुत से मेहमानों की आमद से रोशन रहे बल्कि रेस्तराँ के काम की व्यस्तता के चलते हम सब आम दिनों से ज़्यादा अस्तव्यस्त हो गए थे। पिछले दो माह तो कुछ ज़्यादा ही व्यस्त रहे-और बड़े आनंददायक भी, क्योंकि हेयर ड्रेसर्स का एक दल यहाँ आया हुआ था, जिनमें से कुछ लोग पिछले साल भी यहाँ आ चुके थे। वे कुछ कार्यशालाओं में और व्यक्तिगत सत्रों में सम्मिलित हुए, योग और आयुर्वेद शिविरों में भाग लिया और निश्चित ही बहुत सी मस्ती भी की।

अब हम हिमालय यात्रा की तैयारी कर रहे हैं लेकिन अपने यात्री-समूह को लेकर यशेंदु के रवाना होने से पहले हमारे पास कुछ ही दिन हैं, जिनमें हम सब यार-दोस्त एक साथ होंगे और हमें पता है कि ये थोड़े से दिन कितनी मस्ती भरे और सुखद होंगे!

इस बार एक साल से ज़्यादा समय के बाद थॉमस और आयरिस आश्रम आए हैं। पिछले साल सितंबर में उनके साथ मेरी रूबरू मुलाक़ात हुई थी और जबकि स्काइप और फोन पर हम लोगों का सम्पर्क बना हुआ था फिर भी आमने-सामने बैठकर आपस में गपशप करना, उससे कई गुना सुखद है!

उनके जीवन में परिवर्तन आया है, हमारे जीवनों में भी भारी परिवर्तन हुए हैं और क्योंकि पिछले सप्ताह से, जैसा कि, अगर आप मेरे ब्लॉग पढ़ते हों तो जानते होंगे, मेरे दिमाग में परिवर्तन संबंधी यह विषय लगातार घूम रहा है, और इन परिवर्तनों के बीच से गुज़रते हुए मैं एक बार फिर अपनी मित्रता के महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। परिवर्तन बाहर से हुए हैं, भीतर से हुए हैं और चारों ओर से, हर तरफ से हुए हैं।

और हम सबने परिवर्तन की उस धारा के साथ बहने के लिए अपने आप को खुला छोड़ दिया है। इन परिवर्तनों के बीचोंबीच दोस्तों के साथ शाना-ब-शाना मौजूद होना कितना खुशगवार है। आप बीते दिनों के विषय में बातें करते हैं, अपने कुछ पुराने विचारों पर हँसते हैं, याद करते हैं कि तब आप कैसे दिखते थे, अपने कामों पर मंद-मंद मुस्कुराते हैं और भावुक बातों पर गले लगकर आँखें गीली कर लेते हैं। आप एक-दूसरे को अपने-अपने वर्तमान के बारे में बताते हैं और फिर एक-दूसरे की ख़ुशियों, उल्लास, प्रेम और सुख-शांति और संतोष में खुद भी हर्षोल्लास से भर उठते हैं।

स्वाभाविक ही, भविष्य के बारे में भी सोचा जाता है-और आपस में मिलकर भविष्य की योजनाएँ बनाने से बढ़कर क्या हो सकता है? अपने दिलोदिमाग में भविष्य का खाका खींचना, सपने देखना और उन सपनों को साकार करने का संकल्प लेना! इससे अधिक उज्ज्वल भविष्य नहीं हो सकता और मैं जानता हूँ कि हम सब कदम से कदम मिलाकर उस भविष्य की ओर रवाना होंगे, भले ही हज़ारों किलोमीटर की भौगोलिक दूरी हमारे बीच हो!

अगर आपको मित्रता का ऐसा एहसास हो रहा है तभी आप जान सकते हैं कि आपके पास सच्चे मित्र हैं!

पूरी शिद्दत के साथ प्रेम का आनंद लीजिए!

स्वतंत्र और भ्रष्टाचार-मुक्त मीडिया का स्वप्न – ‘इंडिया संवाद’ – 23 मार्च 2015

आजकल मेरे जीवन में कुछ नया और अनोखा घटित हो रहा है और उसमें मैं व्यक्तिगत रूप से संलग्न हो चुका हूँ: मैंने कुछ लोगों के एक समूह से जुड़ने का, उसका हिस्सा बनने का फैसला किया है, जो एक नया, भ्रष्टाचार-मुक्त समाचार चैनल शुरू करने की परिकल्पना के साथ काम करने में जुटा हुआ है। यह समाचार चैनल सामान्य लोगों के लिए, सामान्य लोगों द्वारा संचालित किया जाएगा।

मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है। मीडिया समाज में, लोगों के जीवनों में, वास्तव में जीवन के हर पहलू में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है! मीडिया लोगों का अभिमत तैयार करता है, उनकी समझ विकसित करता है, उनके दिमागों को प्रभावित करता है और फिर उसी आधार पर वे अपने निर्णय लेते हैं। किसी विषय में ये निर्णय सकारात्मक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी! और स्वाभाविक ही जब वे लोग, वे कंपनियाँ या वे संगठन जो मीडिया केंद्र चलाते हैं, स्वार्थी हो जाएँ और अपने प्रभावों का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए नहीं बल्कि अपने निजी लाभ के लिए करते हैं तो परिणाम बहुत बुरे होते हैं!

यह मैंने अमरीका में होता हुआ सुना है और हम सब यहाँ भारत में साफ-साफ होता हुआ देख ही रहे हैं: सिर्फ गिने-चुने कुछ लोग हैं जो मीडिया को नियंत्रित करते हैं और अपने स्वार्थ के लिए उसका बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका मकसद लोगों को समाचार देना या उनकी जानकारी में वृद्धि करना नहीं होता बल्कि वे पहले अपना लाभ देखते हैं और फिर उसके अनुसार ही निर्णय लेते हैं कि किसी खास समाचार या जानकारी को जनता तक पहुँचाना है या नहीं।

भारत के पिछले आम चुनाओं में यह बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दिया था: देश के सबसे बड़े कार्पोरेट घराने भाजपा के समर्थन में उतर आए थे। वास्तव में इन कार्पोरेट घरानों ने भाजपा के लिए खूब पैसा खर्च उँड़ेला था जिसे वे प्रेस और मीडिया घरानों के ज़रिए बार-बार अपने विज्ञापन प्रसारित करवाने में और भाजपा और मोदी की खबरें प्रसारित करवाने में करते थे। इन कार्पोरेट घरानों ने पैसे के बल पर अर्जित अपने दूसरे प्रभावों का इस्तेमाल भी मीडिया को भाजपा के पक्ष में मोड़ने के उद्देश्य से किया था। और अंततः देश में टीवी विज्ञापनों वाली सरकार बन गई।

चुनावों के बाद मीडिया के इस व्यवहार की कड़ी आलोचना भी हुई-विशेष रूप से सोशल मीडिया में, जहाँ हर कोई अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र और सक्षम होता है। दरअसल ऐसा लग रहा था जैसे देश में कोई नैतिकता बची नहीं रह गई है, सब कुछ सिर्फ पैसे का खेल है। और स्पष्ट हो चुका है कि क्या चल रहा है:’नेटवर्क 18’ खरीदकर मुकेश अंबानी देश के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्कों में से एक का मालिक बन चुका है और अब वह एक और चैनल खरीदने जा रहा है, सन टीवी! अब वह कुछ समाचारों को प्रसारित करने हेतु पैसा देगा और कुछ के लिए नहीं। सरकार के पास कार्पोरेट घरानों को लाभ पहुँचाने के कई तरीके होते हैं और मोदी के समर्थन में जो पैसा अंबानी ने निवेश किया था, उसे अब वह कई तरीकों से सरकार से वसूल करेगा।

ऐसा लगता है जैसे पैसा ही दुनिया को चला रहा है। जो पैसा खर्च कर सकते हैं वे मीडिया का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर सकते हैं और जनता क्या देखे तथा क्या न देखे, इस बात का निर्णय कर सकते हैं। गरीबों के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है। उनकी तकलीफ़ें, उनकी समस्याएँ, उनकी आहें, उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है।

बड़े-बड़े प्रसिद्ध मीडिया घरानों में उच्च पदों पर आसीन कई पत्रकार देख रहे थे कि क्या चल रहा है। पैसा ही हर बात का फैसला कर रहा था: जो समाचार उनके सामने रखा हुआ है, उसका प्रसारण किया जाना है या नहीं, इसका फैसला भी। यह उनकी पत्रकारीय नैतिकता को ठेस पहुंचाने वाली बात थी, पत्रकार के रूप में यह उनके लिए बेहद अपमानजनक था। उनकी निगाह में यह अनैतिक था, यह सब करने वे पत्रिकारिता के क्षेत्र में नहीं आए थे। वे उद्विग्न थे और उनमें से कुछ ने अच्छे-खासे वेतन वाली अपनी नौकरियाँ छोड़ दीं और एक नया ध्येय, एक नया और अलग स्वप्न लिए वहाँ से बाहर निकल आए:

वे अब एक ऐसा मीडिया चैनल शुरू करने का विचार कर रहे हैं जो इन सब समस्याओं से मुक्त हो। क्या हम कोई ऐसा मीडिया केंद्र विकसित कर सकते हैं जो किसी विशेष राजनैतिक पार्टी या कार्पोरेट घराने की मिल्कियत न हो और न ही उनसे प्रभावित हो बल्कि जनता उसकी मालिक और कर्ता-धर्ता हो? वास्तविक पत्रिकारिता के लिए समर्पित, तटस्थ और जिसे खरीदा न जा सके, ऐसा ईमानदार, पत्रकारिता के उच्च आदर्शों के लिए समर्पित, तटस्थ मीडिया केंद्र?

इस विचार के बारे में मुझे ऑनलाइन पता चला और जब मैंने इस योजना का समर्थन करने की इच्छा व्यक्त की तो उन्होंने मुझसे संपर्क किया। मुझे लगता है कि यह आवश्यक है-विशेष रूप से मीडिया के साथ मेरे कई निराशाजनक अनुभवों के बाद। वह एक और कहानी है जिस पर मैं बाद में कभी चर्चा करूँगा। बहरहाल, मैं उनके प्रयासों में शामिल हुआ और हम आपस में कई बार मिले भी।

तो चैनल की स्थापना और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए अब एक सार्वजनिक ट्रस्ट कायम हो चुका है। हमारा मुख्य आदर्श यह है कि वह भ्रष्टाचार विरोधी और भ्रष्टाचार से मुक्त चैनल हो। हमारी दूसरी मीटिंग में मैंने कहा कि सामान्य जनता, जिनका यह चैनल होगा, न सिर्फ समाचारों के उपभोक्ता हों बल्कि स्वयं संवाददाता भी हों! वे सब लोग, जो सामान्य परिस्थितियों में अपना जीवन गुज़ार रहे हों और जिनके पास भले ही पत्रकारिता में कोई डिप्लोमा न हो। अपने आसपास व्याप्त भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने का उनमें हौसला होना चाहिए।

इस ट्रस्ट और इस मिशन का नाम होगा, ‘इंडिया संवाद’ और आज, भगत सिंह के शहीदी दिवस, 23 मार्च, 2015 के दिन हमने ‘www.indiasamvad.co.in’ नाम से अपनी वेबसाइट लांच कर दी है। अभी इसकी यह पहली झलक भर है और समय के साथ इसे और विकसित किया जाएगा तथा हिन्दी में भी शुरू किया जाएगा। शुरू से ही सामान्य लोगों के लिए इसमें यह सुविधा उपलब्ध की गई है कि वे अपने समाचार साइट पर साझा कर सकें और हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को इससे जोड़ने के लिए कटिबद्ध हैं-इस वेबसाइट पर, फेसबुक पेज पर और फेसबुक ग्रुप बनाकर। स्वाभाविक ही हम लगातार तब तक इस प्रयास में लगे रहेंगे जब तक कि एक नए समाचार चैनल की स्थापना नहीं कर लेते- जनता द्वारा, जनता के लिए!

और क्योंकि समाचारों को प्रसारित करना या न करना पैसे पर निर्भर नहीं होगा इसलिए हमारे पास इतनी क्षमता और इतना हौसला होगा कि हर तरह के सच्चे, ईमानदार और जनता से जुड़े हुए समाचार हम प्रसारित कर सकें और दिखा सकें कि वास्तव में देश में क्या चल रहा है और देश में जो कुछ भी हो रहा है उसकी वास्तविकता उजागर कर सकें!

मैं इस विचार को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ और उनका समर्थन और सहयोग प्राप्त करना चाहता हूँ। कृपया इस ग्रुप से जुड़िये, उनकी साइट पर जाकर पढ़िए, अपने समाचार साझा कीजिए और जो भी मदद आप करना चाहें, कर सकें, करें। मेरा विश्वास है कि यह देश के लिए बहुत अच्छा होगा कि जनता को असली समाचार, व्यापक बहुमत के समाचार जानने का मौका मिले, न कि मुट्ठी भर सत्ताधारी, धनाढ्य और संपन्न लोगों के समाचार।

हर साल उत्तरोत्तर अधिक मौज-मस्ती – अपरा का होली समारोह – 5 मार्च 2015

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि वृन्दावन में होली की शुरुआत हो चुकी है। और अपरा इस समारोह के केंद्र में है! उसे बड़ा मज़ा आ रहा है-और हमें उससे भी ज़्यादा!

महीनों से नहीं तो भी कई हफ्तों से वह होली समारोह का इंतज़ार कर रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से उसका जोशोखरोश बढ़ता ही जा रहा है। वह लोकप्रिय होली-गीतों के वीडियो देख रही है, उन पर नाच रही है और हमें अक्सर बताती रहती है कि कैसे वह होली के दिन हम सबको रंगों से सराबोर कर देगी।

और आखिर होली का दिन आ ही गया! जब मैं अपरा को होली खेलता देखता हूँ तो मैं भी अपने बचपन की स्मृतियों में डूब जाता हूँ। जब मैंने अपने भाइयों से पूछा तो पता चला, वे भी ऐसा ही महसूस करते हैं। पिछले हफ्ते एक दिन सबेरे उठते ही अपरा ने पूछा, "आज होली है?" और जब हमने बताया कि तीन दिन बाद है तो उसने प्रश्न दाग दिया: "क्या तीन दिन बाद, आज नहीं है?" होली के पहले दिन शाम को अचानक उसके मन में क्या आया कि वह परेशान सी मेरे पास आई और दुखी स्वर में पूछा: "अब होली खतम हो गई क्या?"

मुझे भी अपने बचपन की याद आती है जब सबेरे उठते ही हम सड़क पर निकल पड़ते थे और होली खेलने लगते थे! हमारा घर मुख्य मंदिर के पास ही था, जहाँ हर वक़्त भीड़-भाड़ रहा करती थी, हर तरफ रंग-गुलाल होता था और हर वक़्त कोई न कोई होता था, जिस पर हम रंग डाल सकते थे या उस पर गुलाल फेंक सकते थे। हम सारा दिन बाहर सड़क पर होली खेलते हुए गुज़ार देते थे और सिर्फ खाना खाने घर वापस आते थे।

रात को, जब हम सोते थे तो अपनी पिचकारी हाथों में लिए ही सो जाते थे। रात भर के लिए भी उससे अलग होना हमें गवारा नहीं होता था!

वृन्दावन में होली कई दिन मनाई जाती है और होली के पहले ही दिन से ही अपरा रंगों से खेल रही थी! सड़क के नज़दीक जाकर पहले वह गुलाल से होली खेलती रही। दूसरे दिन हमारे आश्रम में कई तरह के रंगों के युद्ध का खेल खेला जा रहा था-और न सिर्फ अपरा और दूसरे लड़के बल्कि रमोना, यशेंदु और मैं भी रंगों में सराबोर हो गए थे। उसके अगले दिन हमने सोचा उसकी पिचकारी पहली बार रंगीन गरम पानी से भर दी जाए-और उससे मौज-मस्ती में और इजाफा हो गया! कल उसका चाचा पूर्णेन्दु वापस आया और हमारे साथ होली के खेल में शामिल हो गया। इसके अलावा बहुत से मेहमान तो थे ही। मैं तो आज की रंगीन धींगा-मस्ती और आमोद-प्रमोद का इंतज़ार कर रहा हूँ और उसके बाद कल तो इस हुड़दंग और मौज-मस्ती का चरमोत्कर्ष होना ही है!

मुझे यह भी याद आया कि जब होली -समारोह का समापन हो जाता था तो हम किस कदर दुखी हो जाते थे-लेकिन, फिलहाल, दुखी तब होंगे जब वह समय आएगा! अभी तो अपनी सलोनी बच्ची को लेकर अपने आपको रंगों में झोंक देने का समय है, होली की शुरुआत है! अब वह इतनी बड़ी हो गई है कि खुद अपने दोस्त ढूँढ़कर उनके साथ होली खेलती है! इस होली में वह त्यौहार को बेहतर समझने लगी है और हर साल यह आनंद बढ़ते ही चले जाना है!

मैं घर से किया जाने वाला अपना काम (व्यवसाय) क्यों पसंद करता हूँ – 22 जनवरी 2015

जबकि काम के बारे में लिखते हुए कल ही मैंने आपको बताया था कि क्यों आपको अपने काम से प्रेम होना चाहिए, मुझे लगता है कि खुद मुझे भी अच्छी तरह सोच-समझकर अपनी परिस्थिति का आकलन करना चाहिए। क्योंकि मैं इस बात में विश्वास रखता हूँ कि हर एक को सकारात्मक समाचार और सुखद अनुभूतियों को दूसरों के साथ साझा करना चाहिए, मैं आज अपने विचार और भावनाएँ आपके साथ साझा करना चाहता हूँ!

सबसे पहली बात तो यह कि मुझे यह बड़ा अच्छा लगता है कि काम करने के लिए मुझे कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता। यहाँ मैं विदेशों में आयोजित अपनी कार्यशालाओं या व्याख्यानों के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ- वैसे भी वह अब मेरा मुख्य काम नहीं रह गया है। मुख्यतः मैं अपने घर से ही, कंप्यूटर पर अपना काम करता हूँ और आश्रम आए हुए मेहमानों के संपर्क में रहता हूँ और उनके साथ काम करता हूँ।

कुछ लोग कहते हैं कि वे कभी भी घर से अपना काम या व्यवसाय करना नहीं चाहेगे। वे अपनी कार्यालयीन ज़िंदगी और अपनी निजी ज़िंदगी के बीच स्पष्ट दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। मेरे खयाल से इसीलिए कुछ लोगों के दोहरे व्यक्तित्व होते हैं: एक अपने काम के लिए और दूसरा अपनी निजी ज़िंदगी के लिए! ये लोग अपने कार्यालय में ऐसे मित्र नहीं बनाते जो उनकी निजी ज़िंदगी में भी मित्र हो सकें!

मेरे लिए मेरा सारा घर ही मेरा काम है और मेरा काम ही मेरा घर है। क्या आपको इसमें कुछ अतिरेक नहीं लगता? यदि हाँ, तो इसलिए कि आप अपने काम से उस तरह प्यार नहीं करते जिस तरह मैं करता हूँ!

काम करने की मेरी कोई तय समय-सीमा नहीं है। स्वाभाविक ही, इसका अर्थ यह होता है कि मैं अक्सर कार्यालय में काम या व्यवसाय करने वाले सामान्य लोगों से अधिक काम करता हूँ; लेकिन साथ ही इसका यह भी अर्थ है कि मैं अपरा से खेलने का या शाम को यूँ ही आग तापने का समय पा जाता हूँ। लेकिन फिर यह भी एक तरह का काम ही होता है-क्योंकि वहाँ मैं आश्रम आए मेहमानों और अपने ग्राहकों के साथ बैठता हूँ, उनसे मिलता-जुलता हूँ, बातचीत करता हूँ-तो इसे आप इस तरह भी देख सकते हैं।

मैं अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर किसी दूसरे के पैसों के लिए काम नहीं कर रहा हूँ बल्कि दूसरों की भलाई के लिए काम कर रहा हूँ। आश्रम आए मेहमानों के स्वास्थ्य के लिए, विश्राम करने आए सहभागियों के लिए, अपने स्कूल के बच्चों की मदद के लिए, बाल-श्रम और गरीबी के विरुद्ध मेरा काम है।

स्वाभाविक ही, चैरिटी से आपको संतुष्टि प्राप्त होती है। और यही तब भी होता है जब आप दूसरों के स्वास्थ्य के लिए और उनकी ख़ुशी के लिए काम करते हैं: जब लोग आश्रम से प्रसन्नतापूर्वक बिदा होते हैं, हमें धन्यवाद कहते हैं और दोबारा वापस आना चाहते हैं तो हमें बहुत ख़ुशी होती है! और क्योंकि यह अक्सर होता है, हम न सिर्फ काम करते समय खुश रहते हैं बल्कि उसके नतीजों को देखकर भी हमें बड़ी ख़ुशी मिलती है।

और सबसे बड़ी बात यह कि मैं अपना काम अपने परिवार के साथ मिलकर कर रहा होता हूँ, पत्नी और भाइयों के साथ। हम एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह जानते हैं कि कई बार यह महसूस होता है जैसे आपके पास काम करने के लिए चार-चार शरीर हैं। साथ ही अगर आप किसी बात को समझ नहीं पा रहे हैं तो आपके पास उस पर सोचने के लिए चार दिमाग भी हैं!

दुनिया भर से आने वाले ऐसे मेहमानों को पाना जो मित्र बन गए, घर पर रहकर अपना काम और व्यवसाय करना और अपने सभी मित्रों को अपने जीवन के समारोह में आमंत्रित करना और उनकी मेज़बानी का सौभाग्य हासिल करना, ये कुछ और बिंदु हैं जो मेरी इस धारणा को और भी मज़बूत करते हैं:

मैं अपने काम और व्यवसाय से प्यार करता हूँ!

पिछले साल पर एक नज़र – जुलाई से दिसंबर 2014 – 1 जनवरी 2015

नए साल की पहली सुबह मेरा अभिवादन स्वीकार करें! हमने यहाँ अमृतसर में आज रात सन 2014 से बिदा ली और बड़े शानदार ढंग से सन 2015 में प्रवेश किया। आशा है नए साल की आपकी शुरुआत भी अच्छी रही होगी। अब पिछले साल के बचे हुए महीनों की समीक्षा के साथ मैं इस साल की शुरुआत करना चाहता हूँ:

जुलाई

जब हम कैनेरी द्वीप समूह से वापस आए तो जर्मनी में भी हमारी यात्रा के बहुत से पड़ाव सामने उपस्थित थे। हमें एरकेलेंज में सोनिया और पीटर के यहाँ, लुनेबर्ग में माइकल और आंद्रिया के यहाँ, केम्नित्ज़ में आन्या के यहाँ और दूसरी बहुत सी जगहों पर बहुत से दोस्तों से मिलने जाना था और हम इन सब शहरों और कस्बों में जाकर अपने मित्रों से मिले। मौसम बहुत सुहाना था और इन शहरों, कस्बों, बीचों, खेल के मैदानों, चिड़ियाघरों आदि में जब हम अपरा की मौज-मस्ती देखते थे, जब वह नए-पुराने मित्रों से मिलकर ख़ुशी से झूम उठती थी तो उसे देखना बड़ा आह्लादकारी होता था और हमारा मन भी ख़ुशी से भर उठता था!

इस बीच हमारा संपर्क भारत से लगातार बना हुआ था और बीच-बीच में हम पूर्णेन्दु से वहाँ की ताज़ा जानकारियाँ लेते रहते थे और वह हमें रेस्तराँ की इमारत के निर्माण में हो रही प्रगति के बारे में बताता रहता था-इसके अलावा वह समय भी नज़दीक आ रहा था जब हम उसे अपनी आँखों से देखते!

अगस्त

यशेंदु का जन्मदिन हमने जर्मनी में ही मनाया और उसके तुरंत बाद हम भारत वापस लौटे। यशेंदु न सिर्फ अपने जन्मदिन के तोहफे लेकर वापस आया बल्कि एक जर्मन लड़की, इफा को भी लेकर आया, जिसके साथ वह प्रेम करने लगा था। परिवार में इस नए इजाफे से बहुत से लोगों को बड़ी खुशी हुई!

रेस्तराँ के भवन-निर्माण कार्य की तेज़ प्रगति देखकर हम बहुत खुश हुए। बहुत जल्दी आश्रम के सामने का दृश्य बदल गया था और अब पहचान में ही नहीं आता था!

सितंबर

सितंबर का पूरा माह हमारे आयुर्वेद प्रशिक्षण शिविर के लिए निर्धारित था। शिविर के कार्यक्रमों को सभी सहभागियों ने बहुत पसंद किया; हालांकि रमोना, अपरा और मैं कुछ दिनों के लिए वहाँ से खिसक लिए थे। हम एक हफ्ते के लिए माइकल का जन्मदिन मनाने जर्मनी चले गए थे! जन्मदिन बड़ा शानदार रहा, यह शायद हमारा थोड़ा पागलपन ही था मगर कभी-कभी ऐसा पागलपन ज़रूरी और सुखद होता है!

अक्टूबर

अक्टूबर में कई बार हमारा दिल्ली जाना-आना होता रहा। रेस्तराँ के इंटीरियर डिज़ाइन का सामान, फर्नीचर, बहुत सारे बर्तन भांडे और बहुत सी दूसरी चीज़ें खरीदने में ही सारा अक्टूबर निकल गया। इन व्यस्तताओं के चलते मैंने अपने जन्मदिन की पार्टी स्थगित कर दी-और दीवाली का समारोह सामने था ही!

इफा इस प्रकाश-पर्व का आनंद लेने खास तौर पर यहाँ आई थी और आराम करने आए कुछ मेहमान भी आश्रम में मौजूद थे। अपरा के साथ आश्रम की सजावट का आनंद अभूतपूर्व रहा! वह सारा दिन काम करती रही और हमारे लिए यह एक और अविस्मरणीय समय रहा!

उसके तुरंत बाद ही अपरा का जर्मन परिवार मिलने आया और अपरा ने आसपास की हर चीज़ से और अपनी छोटी सी दुनिया से उन्हें रूबरू कराया!

नवंबर

नवंबर में कुछ दिनों के लिए हमारे आश्रम में एक और बड़ा समूह आया था, जिससे हमें और भी कई लोगों को मित्र बनाने का अवसर प्राप्त हुआ। और जैसे-जैसे रेस्तराँ का काम धीरे-धीरे प्रगति कर रहा था, हमें उसके बारे में सोचने-विचारने का मौका भी मिला कि पूरा निर्माण हो जाने पर हम उसे किस रूप में देखना चाहेंगे।

इस वर्ष नवंबर माह में भी मौसम काफी गरम रहा और थोड़े से मेहमानों के साथ बड़ी शांति से माह का अंत हो गया।

दिसंबर

अंत में दिसंबर की शुरुआत में माइकल और आंद्रिया आश्रम आए! वे कुछ दिन ही यहाँ रहे लेकिन उतना समय ही सघन भावनाओं से ओत-प्रोत और बहुत शानदार रहा!

एक छोटी सी जान ने साल के बचे हुए दिनों को अपनी उपस्थिति से भर दिया। इस छोटी सी, प्यारी सी बच्ची का नाम मोनिका है, जिसने हम सबके दिलों में बहुत बड़ी जगह बना ली है। उसकी कहानी, उसका इलाज और उसकी मदद का विचार हमारे मन में इस कदर हावी थे कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यह माह उसके नाम रहा-और हम भविष्य में भी उसके साथ और उसके लिए बहुत सारा समय बिताएँगे, इसमें कोई शक नहीं!

क्योंकि हमारा रेस्तराँ इस साल बनकर तैयार नहीं हो पाएगा इसलिए स्वाभाविक ही अगले साल भी हमें इस बड़ी परियोजना पर काफी समय व्यतीत करना होगा।

हमें और भी कई शानदार कहानियों, परियोजनाओं और मित्रताओं की आहट अभी से मिलनी शुरू हो गई है और हम 2015 को बड़ी आशाभरी नज़रों से देख रहे हैं। आप सब के लिए भी नया साल शुभ हो, यही कामना है!

सन 2014 का लेखा-जोखा – जनवरी से जून – 31 दिसंबर 2014

आज, साल 2014 के आखिरी दिन और कल, नए साल के पहले दिन मैं चाहता हूँ कि अपने व्यक्तिगत जीवन में इस साल किए गए कामों की समालोचना करूँ। ऐसा करना मुझे बहुत पसंद है और अपने ब्लोगों में हर साल मैं ऐसा करता रहा हूँ। आप भी मेरे साथ इसका जायज़ा ले सकते हैं:

जनवरी

हमने साल की शुरुआत अपरा के जन्मदिन की भव्य पार्टी की तैयारी से शुरू की! हमने उसका पहला जन्मदिन धूमधाम से नहीं मनाया था और पिछले साल उसके जन्मदिन से कुछ ही पहले मेरी माँ का देहांत हो गया था इसलिए इस साल हमने उसका जन्मदिन खूब धूमधाम से और ज़ोर-शोर के साथ मनाने का मन बनाया था। पार्टी के दिन को एक बार बदलना पड़ा-क्योंकि मौसम बहुत खराब था-लेकिन बाद में बहुत से यार-दोस्तों और जर्मनी से आए हुए अपरा के नाना के साथ उसका जन्मदिन बहुत शानदार तरीके से मनाया गया।

जनवरी का बाकी का महीना इस साल की हमारी सबसे बड़ी परियोजना के बारे में सोचने-विचारने, योजनाएँ बनाने और उसकी वृहद तैयारियों में बीता।

फरवरी

और फरवरी में थॉमस और आइरिस तथा कई दूसरे मित्र हमारे यहाँ, आश्रम आ गए और हमारी परियोजना का काम शुरू हुआ: हमारे आयुर्वेदिक रेस्तराँ की इमारत का काम! पिलर्स के लिए शुरुआती गड्ढे तभी खुदवाए गए और जल्द ही ऐसा लगने लगा कि आश्रम में एक बड़ा और भव्य परिवर्तन होने जा रहा है!

निश्चय ही आश्रम में योग अवकाश पर मेहमान आते रहे, स्वेच्छा से मदद करने और इसके अलावा और भी कई बातें होती रहीं।

मार्च

इनमें से कुछ मेहमान यहीं रह गए लेकिन जो वापस चले गए उनकी जगह मार्च में और भी कई दूसरे मेहमान आते रहे क्योंकि यह समय भारत घूमने के लिहाज से सबसे अनुकूल होता है। और इसमें आश्चर्य क्या कि इसी माह में होली भी पड़ती है, रंगों का सबसे बड़ा समारोह! हमेशा की तरह इस अवसर पर आश्रम में बहुत बड़ी, रंगीन पार्टी का आयोजन किया गया! इस साल अपरा को होली खेलते देखना और भी सुखद था क्योंकि अब वह थोड़ा बड़ी हो गई है और खुद भी, कुछ ज़्यादा ही, रंगों का मज़ा लेने लगी है!

और एक तरफ आश्रम के सामने गड्ढे कुछ और गहरे होते जा रहे थे तो दूसरी तरफ हमारे रेस्तराँ की इमारत के काम में थोड़ा परिवर्तन हुआ और उसे थोड़ा आगे बढ़ाना पड़ा।

माह के अंत में हमारे आश्रम में बालों के फैशन-विशेषज्ञों का एक दल आया, जिसने सिर और बालों को केंद्र में रखते हुए योग और आयुर्वेद की कक्षाएँ लीं और यही समय था जब कई शानदार मित्रताओं का बीज पड़ा!

अप्रैल

इस माह गर्मी बढ़ती जाती है और मेहमानों का आना कम हो जाता है इसलिए यशेंदु, रमोना, अपरा और मैं जर्मनी जाने की तैयारियों में लग गए। सबसे पहले यशेंदु को जाना था और योजनानुसार वह रवाना हो गया। इसी समय मैं सोच रहा था कि मैं हवाई यात्रा कर भी सकूँगा या नहीं क्योंकि मेरे घुटने का ऑपरेशन हुआ था और वह बहुत दर्द कर रहा था। मज़ेदार बात यह थी कि इसी जगह पर दस साल पहले भी मेरा ऑपरेशन हुआ था! अस्पताल जाना पड़ा और कुछ दिन बाद मैं अपने लिगामेंट के इलाज के लिए दूसरी बार ऑपरेशन टेबल पर पड़ा था। इधर अस्पताल में अपरा धमाचौकड़ी मचाती रही। वह इस नए अनुभव का पूरा मज़ा ले रही थी! उड़ान की तारीखें बदलनी पड़ीं, जर्मनी के कुछ कार्यक्रमों में परिवर्तन करना पड़ा और मैंने अपने इलाज पर पूरा ध्यान लगाया, जिससे जख्म जल्द से जल्द भर सके!

मई

प्रवास पर निकलने की तारीख निकट आने तक मैं भी स्वस्थ होकर जाने के लिए तैयार हो गया! अपने एक क्रच की सहायता से और घुटने के लिए थोड़ा सहारा लेकर मैं बिना किसी तकलीफ के जर्मनी तक की उड़ान पूरी करने में कामयाब रहा। उसके बाद कुछ ही हफ्तों में मैंने बहुत जल्द पर्याप्त शक्ति अर्जित कर ली और अपने दोनों सहारे छोड़ दिए।

जर्मनी में हम इतने खुश थी कि हमने एक लंबी यात्रा का कार्यक्रम बनाया: अपरा, जोकि तब तक हिन्दी अच्छी तरह बोल लेती थी और जर्मन भी पूरी तरह समझने लगी थी मगर बोलने में हिचकती थी और माँ के उकसाने पर ही बोलती थी, जर्मनी आकर अचानक बहुत जर्मन बोलने लगी क्योंकि वहाँ अधिकांश जर्मन लोगों से उसे जर्मन भाषा में ही बात करनी पड़ती थी! उसका जर्मन परिवार, हमारे मित्र-गण और आसपास इतने सारे जर्मन बोलने वाले लोग-जर्मन भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के उसके सामने बहुत से अवसर उपलब्ध थे। और हाँ, उस यात्रा में अपरा ने जो धमाचौकड़ी मचाई है, नई जगह पर नए-नए लोगों के साथ जो मस्ती की है, संक्षेप में उसका वर्णन करना असंभव है!

जून

और जून माह में ग्रान कैनेरी के लिए निकलने के बाद अपरा की मौज-मस्ती में पल भर के लिए भी व्यवधान नहीं आया! वहाँ हमारी तीन सप्ताह का कार्यक्रम था और उसके अलावा भी बहुत कुछ था लेकिन फिर भी हमें समुद्र किनारे, बीच पर जाकर समय बिताने का काफी मौका मिलता रहा। यहाँ तककि हमने एक छोटी सी ट्रिप टेनेराइफ की लगा ली और ग्रान कैनेरी के उत्तर में एक ऐसी जगह पर भी गए, जहाँ एक ज़ू में डॉलफिंस और व्हेल का शो होता है और आसपास साफ स्वच्छ पानी में मज़े करने का भी काफी अवसर मिल जाता है।

मैंने वहाँ अपने स्पेनिश शब्दभंडार में कुछ इजाफा भी कर लिया। पहले मैं ‘होला’ शब्द ही जानता था मगर अब ‘वामोस’ यानी ‘चलो चलते हैं’ और ‘वेंगा, वेंगा, वाले, वाले’ यानी ‘सब ठीक है’ आदि शब्द-समूह भी सीख लिए! 🙂

मैं कामना करता हूँ कि साल की यह आखिरी रात आप सभी के लिए सुखमय हो!

मुझे बदलाव पसंद हैं और मैं अपनी गलतियाँ भी स्वीकार करता हूँ! 10 नवंबर 2014

मैंने अपने जीवन में परिवर्तन की लंबी यात्रा तय की है और इसमें मेरे दस साल से अधिक खर्च हुए हैं। इस लंबी प्रक्रिया मे बाद मैं आध्यात्मिक गुरु से एक नास्तिक में तब्दील हुआ हूँ। अपनी भावनाओं और वक़्त के तकाजे के अनुसार मैंने सदा से ईमानदारी का दामन थामा है। मैं जड़ नहीं होना चाहता और अपनी जिद पर अड़ा नहीं रहना चाहता और न ही बचपन में जानी-समझी हुई बातों से चिपककर रहना चाहता हूँ। मैंने अपना दिमाग खुला रखा, दुनिया भर में खूब घूम-फिरा, उसे गौर से देखा-समझा है और नतीजतन आज मैं वह हूँ जैसा आपको दिखाई दे रहा हूँ।

इस वेबसाइट पर आप मेरे अतीत के बारे में पढ़ सकते हैं। अगर आप फ़ोटो गैलरी पर नज़र दौड़ाएँ तो उससे भी आपको पता चलेगा और अगर 7 साल से चल रहे मेरे ब्लॉग के पुराने ब्लॉग आपने पढ़े हैं तो भी आपको मुझमें क्रमशः होते रहे परिवर्तनों के प्रमाण मिल जाएँगे। मैंने कुछ भी छिपाया नहीं और स्वाभाविक ही, आज भी आपको मेरे अतीत के चिह्न दिखाई देते होंगे। मैं खुली घोषणा करता हूँ और स्वीकार करता हूँ कि यह मैं हूँ और यही मेरा इतिहास है।

मैं बहुत भावुक व्यक्ति भी हूँ तथा बदलावों से घबड़ाता नहीं बल्कि उन्हें पसंद करता हूँ और कभी जल्दबाजी में भी निर्णय ले लेता हूँ! अधिकांशतः मैं अपने निर्णयों से प्रसन्न रहता हूँ परन्तु कभी-कभार मैं उन पर पछताता भी हूँ. मुझे लगता है कि ये वो क्षण होते हैं जबकि मुझे उनसे अपने अहम को नहीं जोड़ना चाहिए! यदि मुझसे कोई गलती हुई तो उसे स्वीकार भी करना चाहिए।

मैं अपनी गलतियों को स्वीकार करता हूँ और यदि संभव है तो अपने निर्णयों को वापिस लेता हूँ और इस तरह जिन्दगी चलती रहती है।