2016 में रंगों के त्यौहार, होली की मस्ती में हमारे साथ शामिल हों – 22 अक्टूबर 2015

अगर आपको हमारा न्यूज़-लेटर लगातार मिल रहा है तो आपको उसके साथ हमारा एक निमंत्रण-पत्र भी प्राप्त हुआ होगा: 2016 की होली पर हमारे द्वारा आयोजित ‘होली रिट्रीट 2016’ का निमंत्रण! जबकि पिछले वर्षों में उत्सव की विशेष छूट के साथ हम सभी लोगों को सामान्य रूप से आमंत्रित करते थे, इस बार हमने संपूर्ण ब्यौरेवार कार्यक्रम तैयार करके लोगों को भारत के, हमारे आश्रम के और निश्चय ही, होलिकोत्सव की मौज-मस्ती और उससे जुड़े समारोहों के प्रत्यक्ष अनुभव का अवसर प्रदान करने की योजना बनाई है!

जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दूँ कि होली भारत के दो सबसे बड़े वार्षिक त्योहारों में से एक है! वास्तव में यह रंगों का विशाल समारोह है और जबकि, सारा भारत इसे वसंत ऋतु में सिर्फ एक दिन मनाता है, यहाँ, वृंदावन में सारा शहर पूरे एक सप्ताह तक रंगों में सराबोर रहता है!

साल का यह सबसे अनोखा समय होता है जब आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे आपका बचपन पुनः लौट आया हो! आप एक-दूसरे को छका सकते हैं, मूर्ख बना सकते हैं, अपने कपड़ों की चिंता किए बगैर एक-दूसरे पर रंग डाल सकते हैं, उनके चेहरों पर रंग मल सकते हैं!

हमारे होली रिट्रीट कार्यक्रम के ज़रिए आप भारतीय संस्कृति का आंतरिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे-जिसकी शुरुआत होगी आश्रम में आयोजित स्वागत समारोह से और उसके पश्चात एक गाइड के साथ वृंदावन शहर के विस्तृत भ्रमण का इंतज़ाम भी होगा, जिससे आप उस धार्मिक और ऐतिहासिक शहर को आतंरिक रूप से जान-पहचान सकें, जहाँ आप अगले एक या दो सप्ताह रहने वाले हैं। उसके बाद आप देखेंगे कि वृंदावन के मुख्य मंदिर में होली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है, कैसे हम खुद प्राकृतिक ताज़े रंग तैयार करते हैं और उसके बाद होली के अंतिम दिन, आश्रम में आप स्वयं होली समारोह में हिस्सा ले सकेंगे। हमारे आश्रम के निजी समारोह में आप पूर्णतः सुरक्षित वातावरण में होली की मौज-मस्ती, हुड़दंग और उसकी दीवानगी में सराबोर हो सकेंगे!

होली का त्यौहार संपन्न हो जाने के बाद आपकी छुट्टियाँ कुछ शांतिपूर्वक बीतेंगी किंतु खातिर जमा रखें, ज़रा भी कम रोमांचक नहीं होंगी! अब आप हमारे स्कूल का दौरा करेंगे और स्कूल के बच्चों से मिलेंगे, यशेंदु के साथ प्रश्नोत्तर चर्चा में भाग लेंगे, जहाँ आप अपने मनचाहे सवाल पूछ पाएँगे और निश्चय ही, ताजमहल देखने हेतु आगरा भी जाएँगे! भारतीय मसालों के प्रदर्शन होंगे, जिसमें आप जान सकेंगे कि कौन से मसाले आश्रम के भोजन में ऐसा लाजवाब स्वाद भर देते हैं और आयुर्वेदिक पाक-कार्यशाला में आप इन व्यंजनों को खुद अपने घर में बनाना सीख सकेंगे। समारोह-कार्यक्रम का अंतिम पड़ाव, होगा शाम को यमुना नदी के किनारे आयोजित होने वाले अग्नि अनुष्ठान के साथ और उसके पहले थोड़ी-बहुत खरीदारी होगी और शहर का एक और चक्कर लगाया जाएगा। उसके बाद एक बिदाई पार्टी होगी और फिर आप अपने दिल में यहाँ की सुखद यादों को लेकर अपने-अपने गंतव्य-स्थानों की ओर प्रस्थान करेंगे।

इस बीच हर दिन योग-सत्र आयोजित किए जाएँगे और आपको आश्रम में आराम करने का, आयुर्वेदिक मालिश और इलाज करवाने का, बच्चों के साथ मिलने-जुलने और खेलने का, वृंदावन के बाज़ारों की रंगीनियों में खरीदारी करने का और आसपास के वातावरण का जायज़ा लेने का भरपूर वक़्त भी मिलेगा!

इस होली रिट्रीट में हम चाहते हैं कि होली समारोह की मौज मस्ती के साथ आपको भारत की आश्चर्यजनक संस्कृति में यह एहसास भी हो कि आपका ध्यान रखा जा रहा है-और हम अभी से आपके साथ रंगों में तरबतर होने का इंतज़ार कर रहे हैं!

यहाँ आप होली रिट्रीट-2016 के सभी विवरण प्राप्त कर सकते हैं!

और यहाँ आप पिछले होली समारोह के चित्र देख सकते हैं।

कृपया इसे अवश्य पढ़ें यदि आप रोजमर्रा की जिन्दगी से बचने के लिए छुट्टियाँ मनाने जाते हैं! 2 फरवरी 2015

कल मैंने आपको सारांश में बताया था कि जब मैं छुट्टियाँ बिताने कहीं बाहर जाता हूँ तो मैं क्या महसूस करता हूँ। मैं जानता हूँ कि छुट्टियों के बारे में मैं दूसरों से कुछ अलग विचार रखता हूँ। और मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि कई लोग जब अपनी छुट्टियों के बारे में बताते हैं तो लगता है जैसे वे कुछ गलत काम कर रहे हों। अपनी छुट्टियों को लेकर नहीं बल्कि अपने दिनचर्या को लेकर!

मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मुझे छुट्टियाँ पसंद हैं। मुझे पत्नी के साथ किसी दूसरे शहर जाकर छुट्टियाँ मनाना पसंद है, वहाँ जाकर बिना किसी निश्चित कार्यक्रम के अपनी मर्ज़ी से कुछ दिन गुज़ारना पसंद है, यह सोचकर ही मुझे बड़ा अच्छा लगता है कि अगर हम चाहेंगे तो किसी होटल में सारा दिन अकेले रहकर गुज़ार सकते हैं और अपने मनपसंद रेस्तराँ में रात का खाना खा सकते हैं। मैं ये सब बातें पसंद करता हूँ-लेकिन यह मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। मैं अपनी छुट्टियों के अधीन नहीं हूँ। मेरा पूरा साल मेरी छुट्टियों पर केन्द्रित नहीं है। जब हम वापस लौटते हैं तो हम बात करते हैं कि छुट्टियाँ कितनी अच्छी रहीं और अपने काम पर लग जाते हैं।

मैंने कुछ दिन पहले ही आपको बताया था कि मैं अपने काम से प्यार करता हूँ। सिर्फ काम से ही नहीं, अपने जीवन से, अपने आश्रम से, अपने स्कूल से, अपने चैरिटी के काम से, अपने व्यवसाय से, अपने परिवार, दोस्तों, मिलने-जुलने वालों, बच्चों और अपने मेहमानों से। और मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जो ऐसा महसूस नहीं करते। जो अपने सामान्य जीवन में अपने रूटीन से खुश नहीं हैं।

आश्रम से बिदा लेते समय अकसर लोगों की आँखें भर आती हैं। स्वाभाविक ही हम यह जानकर खुश होते हैं कि आश्रम में उनका समय बहुत अच्छा रहा और दुनिया के इस कोने में बने अपने मित्रों को छोड़कर जाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है और इस कारण उनकी आँखों में आँसू आ गए! लेकिन कभी-कभी ये आँसू निश्चित रूप से यह नहीं बताते कि यहाँ उनका समय अच्छा रहा बल्कि यह बताते हैं कि आगे आने वाला समय अच्छा नहीं होगा! घर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा होता और उन्हें दुख होता है कि अब उन्हें वहीं वापस जाना होगा।

चाहे वह उनका काम हो, व्यवसाय हो, उनकी पारिवारिक स्थिति हों या सामान्य अकेलापन या जीवन से असंतोष हो-उनकी छुट्टियाँ उनके लिए खुशियाँ लेकर आती हैं जब कि सामान्य रूप से अपने जीवन में वे खुश नहीं होते। छुट्टियों को सामान्य जीवन से ‘पलायन’ नहीं होना चाहिए जबकि उन्हें आजकल इसी तरह विज्ञापित किया जा रहा है! जी हाँ, छुट्टियों में आप अपने भीतर ऊर्जा का पुनर्संचार करते हैं और कुछ अलग, नया देखते हैं, कुछ अलग करते हैं और नए लोगों से मिलते-जुलते हैं। लेकिन अपने सामान्य जीवन, अपने रूटीन से भागकर आपको छुट्टियों का कार्यक्रम नहीं बनाना चाहिए!

इस तरह अपने सामान्य जीवन को आपकी ऊर्जा पूरी तरह निचोड़ लेने की इजाज़त मत दीजिए! अगर आपको लगे कि आप सिर्फ इसलिए जीवित हैं कि कुछ महीनों बाद कहीं बाहर जाकर छुट्टियाँ बिता सकें, अगर आप अपनी छुट्टियों का इंतजार कर रहे हैं और उनसे पलायन की कल्पना कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपना जीवन नहीं जी रहे हैं। तब शायद साल में आप सिर्फ चार सप्ताह की ज़िंदगी जी रहे हैं!

अपने जीवन को बरबाद न होने दें। उसमें परिवर्तन लाने की कोशिश करें और अभी, इसी समय से यह कोशिश शुरू कर दें!

अपनी छुट्टियों में मैं होटल में रहना क्यों पसंद करता हूँ – 1 फरवरी 2015

अब मैंने हर रविवार को अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में कुछ न कुछ लिखने का फैसला किया है। क्रमबद्ध नहीं और हमेशा यह नहीं कि पिछले हफ्ते क्या हुआ बल्कि जो हुआ उसके बारे में विस्तार से, कि क्यों हुआ और मैंने उस पर क्या महसूस किया और अब भी क्या महसूस कर रहा हूँ। अपनी छुट्टियों के दौरान एक खास मामले में मैं किस बात को वरीयता देता हूँ, आज मैं इस विषय पर लिखना चाहता हूँ: वास्तव में मैं अपने किसी दोस्त के घर पर नहीं बल्कि किसी होटल में रुकना पसंद करता हूँ।

अपनी अमृतसर यात्रा में मैंने अपने एक मित्र से वास्तव में यही कहा था। हमने अपनी दो शामें उसके घर पर बिताई थीं और वह हमारा बहुत अच्छा सुखद समय रहा। जब हम वापस लौटने लगे तो घर की महिला ने हमसे कहा कि अगली बार जब हम वहाँ आएँ तो होटल की बजाय सोने के लिए उनके घर रुकें। तब मैंने ठीक यही जवाब दिया था: जब मैं छुट्टियाँ बिताने कहीं जाता हूँ तो अपनी पत्नी और बेटी के साथ मैं स्वतंत्र समय गुज़ारना चाहता हूँ।

यह जानकार आपको हँसी आती होगी क्योंकि आपने पहले पढ़ रखा है कि मैं कितनी जल्दी मित्र बना लेता हूँ और अक्सर उन्हें अपने घर पर बुलाता भी हूँ और बड़े प्रेम के साथ उनका स्वागत करके मुझे बड़ी खुशी होती है। लेकिन इसका ठीक-ठीक कारण यह है: हम हमेशा ही लोगों के बीच रहते हैं। निश्चय ही, हम खुद भी एक संयुक्त परिवार में रहते हैं लेकिन इसका अर्थ सिर्फ इतना ही नहीं है: अपने भाइयों, पिताजी, नानी और बच्चों के अलावा यहाँ हर वक़्त हमारे आसपास हमारे कर्मचारी, स्कूल के बच्चे और आश्रम आने वाले मेहमान भी होते हैं!

साल भर हमारे यहाँ मेहमान आते रहते हैं और अधिकतर हम उन्हें जानते नहीं होते। हम एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाते हैं, हम एक दूसरे को जानने लगते हैं और स्वाभाविक ही इन सब के बीच हम थोड़ा-बहुत अपना निजी जीवन भी जीते हैं। और हम इसे पसंद करते हैं, हम वाकई ऐसा जीवन पसंद करते हैं।

लेकिन जब हम छुट्टियाँ बिताने कहीं बाहर जाते हैं तब बात कुछ अलग होती है। मैं किसी के घर पर नहीं रहना चाहता क्योंकि तब मैं अपनी पत्नी के कंधे पर सुकून का हाथ रखकर घूमना-फिरना छोड़कर हर किसी की भावनाओं का आदर करते हुए उनकी इच्छाओं का भार नहीं ढोना चाहता। या उनके साथ तालमेल बिठाऊँ कि जब वे सोकर उठें तब उठूँ, जब बाथरूम खाली हो तो नहा लूँ, आदि, आदि। मैं होटल पसंद करता हूँ, जहाँ मुझे आसपास मौजूद लोगों की भावनाओं या इच्छाओं का ध्यान न रखना पड़े।

आप मुझे गलत न समझें। इस बार भी जब हम अमृतसर में थे और तब भी जब और कहीं छुट्टियाँ बिताने जाते हैं, हम वहाँ रहने वाले अपने मित्रों से अवश्य मिलते हैं। हम उनके साथ काफी समय गुज़ारते हैं, उनके साथ उनके स्नेहासिक्त हाथों से बनाया हुआ भोजन करते हैं और घंटों गपशप करते हैं। वह हमारा बड़ा खुशनुमा समय होता है-लेकिन फिर भी रमोना, अपरा और मुझे एक साथ अपने होटल के एकांत में रहना भी बहुत पसंद है, अपने आप में मस्त!

तो जब मैं आपके शहर आऊँ और आपके यहाँ न रहूँ तो कृपा करके न तो आश्चर्यचकित हों और न ही अपमानित महसूस करें- मैं आपसे मिलकर बहुत खुश होऊँगा लेकिन रहना चाहूँगा वहीं-अपने होटल में!

सुन्दर द्वीप, ग्रान कनारिया को बिदाई – 30 जून 2014

आज हम ग्रान कनारिया से बिदा ले रहे हैं। बल्कि इस वक़्त जबकि मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, हम लोग जर्मनी वापस जाने के लिए हवाई जहाज़ पर सवार हो चुके हैं। अपरा मेरे साथ वाली सीट पर लेटी हुई है और उसके पैर मेरी गोद पर टिके हुए हैं। दरअसल वह नींद की गोद में समा चुकी है। इस सुन्दर द्वीप पर हमने बहुत शानदार वक़्त गुज़ारा और हमारी मित्र बेट्टी के सौजन्य से हम लोग बड़ी संख्या में कनारिया के बाशिंदों से मिल सके, बल्कि कहें, उन्हें और उनकी संस्कृति को करीब से जान-समझ सके। बेट्टी की बदौलत हम जान सके कि किसी द्वीप पर लोगों का जीवन हमसे बिलकुल अलग होता है!

स्वाभाविक ही, पहली बात तो यह कि आप हर वक़्त समुद्र के बहुत करीब होते हैं। ग्रान कनारिया पर इसका अर्थ यह है कि यहाँ आप कहीं पर भी हों, कार में एक घंटा किसी भी दिशा में निकल जाएँ, आप समुद्र किनारे होंगे-या तो वह खूबसूरत, रेतीला, मंथर लहरों वाला समुद्री बीच होगा या सीधे समुद्र में उतरने वाला पथरीला, सीढ़ीदार समुद्र किनारा या फिर काले गोल पत्थरों (पेबल्स) वाला बीच।

विशेषकर ग्रान कनारिया में, जोकि महाद्वीपों का लघुरूप है, आप लगभग सभी मौसमों और तरह-तरह के भूदृश्यों का आनंद ले सकते हैं: पहाड़ों पर चले जाइए, एक तरफ आल्प्स जैसा दृश्य होगा तो दूसरी तरफ चट्टानें होंगी, जो विशाल पथरीले पहाड़ों की याद दिलाएँगी। और बाकी जगहों में आपको लगेगा, आप ज्वालामुखी के द्वीपों पर खड़े हैं क्योंकि वहाँ आप लावा से बने हुए पहाड़ों को देखेंगे, जो आपको पिघलते आइसक्रीम जैसे नज़र आएँगे। मैंने सुना है कि यहाँ के एक द्वीप पर एक ज्वालामुखी दो साल पहले तक सक्रिय था!

लेकिन अगर आप कुछ अधिक दूर तक जाना चाहते हैं, आप किसी दूसरे देश की यात्रा करना चाहते हैं और अगर आप सीमा पार करके लम्बी यात्रा पर निकलना चाहते हैं तो आपको पानी का जहाज़ या हवाई जहाज़ लेना होगा। कोई दूसरा उपाय नहीं है। यहाँ जर्मनी की तरह नहीं है, जहाँ आप एक ही कार में सफ़र करते हुए कुछ घंटों में फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड, डेनमार्क और यहाँ तक कि इटली की यात्रा कर सकते हैं! यहाँ आपको हवाई जहाज़ या पानी का जहाज़ पकड़ना होगा। इस कारण आपको न सिर्फ अधिक पैसा खर्च करना होगा बल्कि समय का तालमेल भी रखना होगा, जिससे समय के अपव्यय से भी आप बच नहीं सकते। यहाँ पिछले हफ्ते हमें पता चला कि इसी कारण कनारिया निवासी सप्ताहांत अपने द्वीपों में गुज़ारना ही ठीक समझते हैं!

जी हाँ, यह सच है और हमें यह दिलचस्प लगा। दरअसल जर्मनी में भी आजकल इसका चलन शुरू हो गया है: अपने ही देश में छुट्टियाँ मनाने का चलन। लेकिन इसका अर्थ यह होता है कि आप आठ घंटे की सड़क-यात्रा करके उत्तरी समुद्र पहुँचिए और बीच के किनारे कोई होटल ले लीजिए। या इसके विपरीत, दक्षिण में एल्प्स की चोटियों पर स्कीइंग कीजिए! भारत में तो खैर तीन घंटे की हवाई यात्रा के बाद भी आप उसी देश में होते हैं!

ग्रान कनारिया द्वीपों पर लोगों को लम्बी सड़क यात्रा नहीं करनी पड़ती: वे सिर्फ अपनी कार निकालते हैं और एक या डेढ़ घंटे में किसी मनपसंद जगह पहुँचकर एक फ़्लैट किराए पर ले लेते हैं! यह जगह राजधानी में ही कहीं हो सकती है या सूर्य-किरणों से रोशन किसी समुद्री बीच पर या द्वीप के उत्तरी भाग में तूफानी समुद्र के किनारे स्थित मछुआरों की बस्ती में या पहाड़ की किसी चोटी पर, वहाँ के अद्भुत नज़ारों के बीच।

वे घर से बाहर रहते हैं इसलिए उसे छुट्टियाँ कहा जा सकता है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत में और यहाँ जर्मनी में भी, जहाँ मैं खुद को अजनबी नहीं समझता, दो घंटे की दूरी पर होने पर भी शाम को आप घर लौटना ही ठीक समझेंगे! यह सोचने का अपना-अपना तरीका है। इसके अलावा यह परिस्थितिजन्य भी है। यह सब आपके मस्तिष्क में घटित होता है। और इस तरह सोचने पर कहा जा सकता है कि आप अपने घर में भी छुट्टियाँ मना सकते हैं, बिस्तर से कदम नीचे रखे बगैर!

बस अपने नज़रिये को बदलने की ज़रूरत है-शायद दिमाग को ‘द्वीप-दृष्टि’ से देखना होगा! 🙂

सप्ताहांत में वनविहार – 20 अप्रैल 2014

जब मैं सन 2006 में जर्मनी में था तो स्वाभाविक ही मैं कई लोगों से मिला, जो मेरी पिछली यात्राओं में मेरे घनिष्ठ मित्र बन चुके थे। उनमें से एक समूह के साथ मैं एक हॉलिडे-होम में पूरा सप्ताहांत बिताने के लिए राज़ी हो गया था। सिर्फ मज़े के लिए और हंसी-खुशी समय बिताने के लिए और मौके का लाभ उठाने के इरादे से। मैंने सोचा कि यह एक नया और रोचक अनुभव होगा।

मेरे साथ मेरे युवा मित्रों का समूह था, जो आध्यात्मिकता में रुचि रखता था। मैं उन्हें तब से जानता था, जब पिछले साल वे मेरे ध्यान-सत्र में शामिल हुए थे। उस समय भी, अपने आयोजक के घर पर हमने लंबी शामें एक साथ बातचीत करते हुए बिताई थीं। उनके बीच कुछ गाने-बजाने वाले संगीतज्ञ भी थे, जो भारतीय संगीत में भी रुचि रखते थे और जब मैं जर्मनी से बाहर रहता था तब भी उनके साथ ईमेल के जरिये संपर्क बना रहता था।

इस बार उन्होंने मेरे मोबाइल पर सूचना दी और हमने बात करके कार्यक्रम पक्का कर लिया। उनके किसी परिचित के पास वन में कोई केबिन उपलब्ध था और सप्ताहांत के लिए हमने वो केबिन किराये पर ले लिया था। वे मुझे ले जाने और वापस छोड़ने के लिए आने वाले थे और मैं उनका इंतज़ार कर रहा था।

तय सप्ताहांत पर वे मुझे लेने आए और लगभग दो घंटे की यात्रा के बाद हम एक वन में थे। सड़क अब एक बहुत धूल भरे, कच्चे और ऊबड़-खाबड़ रास्ते में तब्दील हो गई थी और हमें घने जंगल की ओर ले जा रही थी। आखिर एक जगह रास्ता बंद हो गया और हमें भी अपनी कारों से निकलकर आगे पैदल अपने गंतव्य तक पहुँचना था। तब मैंने देखा कि वे लोग अपनी पेटियों में क्या-क्या लेकर आए हैं: बर्तन, चम्मच, प्लेटें, सब्जियाँ, दाल, चावल, पानी, योग-मैट्स, कंबल और निश्चय ही अपने-अपने वाद्य-यंत्र भी। हम कुल 15 लोग थे और चार कारों में आए थे। सबने कुछ न कुछ उठाया और हम घने जंगल की ओर बढ़ चले।

गंतव्य ज़्यादा दूर नहीं था और हम एक छोटी सी खुली, साफ जगह पर आ गए, जहां एक तरफ एक लकड़ी का छोटा सा घर था और दूसरी तरफ आग जलाने का इंतज़ाम था। चारों तरफ खूबसूरती बिखरी पड़ी थी और जब हम अपना-अपना सामान उतारकर फुरसत हुए तो तुरंत आसपास के इलाके का मुआयना करने लगे।

जब सूरज नीचे आने लगा तो समूह के कुछ लोगों ने आग जला दी और कुछ दूसरे लोगों ने मिल-जुलकर एक स्टोव पर खाना पकाना शुरू किया। ऐसा भोजन अतुलनीय होता है-बाहर खुले आसमान के नीचे, जलती हुई आग के पास और डायनिंग-टेबल की औपचारिकताओं से मुक्त।

खाना खाने के बाद गाने-बजाने वालों संगीतज्ञों ने अपना कुछ संगीत सुनाया। हम सब गाए, गप-शप की और शाम का लुत्फ उठाया। युवा पुरुष और महिलाओं को कुछ और अंतरंग होने का मौका मिल गया और वे जोड़े बनाकर, आग से कुछ दूर, झुरमुटों में इधर-उधर बिखर गए।

कुछ लोग तो काफी रात होने तक वही पड़े रहे और मैं उस कुटिया में आकर, योग-मैट्स का कामचलाऊ बिछौना बनाकर सो गया। दो कमरों में से एक मैंने हथिया लिया था-बाकी के अधिकांश लोग बाहर खुले आसमान के नीचे सोते रहे।

सुबह, सूरज निकलने के बहुत बाद, हमने अपना सामान दोबारा पैक किया और इस तरह उस बेहतरीन शाम का पूरा आनंद लेकर हम सब वापस लौटे। मुझे वहाँ बहुत मज़ा आया-लेकिन फिर दूसरे दिन रात को एक सामान्य बिस्तर पर सोने का आनंद भी कुछ कम नहीं था!

वृन्दावन से लखनऊ यात्रा का हमारा अपूर्व अनुभव – 23 दिसंबर 2013

हम अभी-अभी सप्ताहांत की छुट्टियाँ बिताकर लखनऊ से लौटे हैं। हम यानी रमोना, अपरा और मैं। दो साल लंबे अर्से से हमने भारत में इस तरह की कोई यात्रा नहीं की थी। जी हाँ, आखिरी बार जब रमोना गर्भवती थी तब हम ऐसी यात्रा पर निकले थे। यानी अपरा के साथ भारत में यह पहली ऐसी यात्रा है। जैसा कि अनुमान था, यह यात्रा शुरू से आखिर तक बेहद रोमांचक और सुखद रही!

हमने रेल का आरक्षण काफी पहले करवा लिया था क्योंकि अक्सर ट्रेनों में भीड़ होती है और ज़रा देर करने पर सीट/बर्थ मिलना मुश्किल हो जाता है। तो हमने गुरुवार, रात 10 बजे की ट्रेन का आरक्षण करा लिया। ठंड का मौसम है और ट्रेनें कई बार लेट होती रहती हैं इसलिए इंटरनेट पर ऑनलाइन चेक करके कि हमारी ट्रेन लेट नहीं है, हम निकले। इस तरह हम काफी पहले मथुरा रेलवे स्टेशन पहुँच गए कि ट्रेन पर चढ़ने में कोई दिक्कत न हो। लेकिन हम कुछ ज़्यादा ही जल्दी पहुँच गए थे क्योंकि डिस्प्ले हो रहा था कि ट्रेन 4 घंटा देर से आएगी, शायद धुंध की वजह से! रेलवे की वेबसाइट को धुंध से और खुद को लगातार अपडेट करते रहने से क्या मतलब! लेट होने के उपरान्त ट्रेन के आने का आधिकारिक समय 2 बजे रात का था लेकिन स्टेशन पर रेलवे कर्मचारी बता रहे थे कि कल वाली यही ट्रेन 6 बजे सबेरे मथुरा आई थी! अब हम क्या करें? घर वापस जाकर फिर 2 बजे आएँ और पता चले कि ट्रेन और लेट हो गई है! यहीं इंतज़ार करते रहें तो हो सकता है, आठ घंटे या उससे भी ज़्यादा इंतज़ार करना पड़े!

हम अपनी तीन दिन की छुट्टियों को इस तरह बरबाद होता नहीं देख सकते थे, लिहाजा हमने तुरंत सबेरे की फ्लाइट बुक करा ली। अपरा इस नए प्लान से खुश नहीं थी। दिन भर हम उसे बताते रहे थे कि कल हम ट्रेन से जाएंगे और अब, जब हम रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं, सामने ट्रेनें आ-जा रही हैं और हम उनमें सवार होने की जगह अब हवाई जहाज से जाएंगे; ये भी कोई बात हुई! आखिर उसने जिद पकड़ ली कि उसे ट्रेन में बैठना है और जब हम उसे समझा रहे थे कि हमें वापस जाना होगा तो वह इस खयाल से बेहद निराश हो गई!

तो हमने यही किया। हमारे पास काफी वक़्त था और घर आकर हमने एकाध झपकी भी ले ली और एक बजे रात को दिल्ली के लिए निकले, जहां से हवाई जहाज की हमारी बुकिंग थी। दिल्ली पहुँचकर पता चला कि फ्लाइट भी दो घंटे लेट है। हम चेक-इन के लिए समय पर आ गए थे। अभी साढ़े तीन बजे थे अर्थात, जहाज़ आने तक हमें 5 घंटे एयरपोर्ट पर गुज़ारने थे!

घर में और फिर कार में सोने के बाद अपरा तरोताजा हो गई थी और खुद को एयरपोर्ट पर पाकर नए दिन की शानदार शुरुआत से पूरी तरह रोमांचित! खुशी और उत्साह में उसकी किलकारियाँ निकल रही थीं। कभी वह एक्वेरियम की तरफ भागती तो कभी एस्केलेटर को देखकर जर्मनी की याद करते हुए उछल पड़ती, "अपरा जर्मनी जा रही है!" जर्मनी में उसने हर जगह माल में एस्केलेटर देखे हुए थे और यहाँ भी उसने एस्केलेटर पर ऊपर-नीचे कई चक्कर लगाए। हमने इडली का नाश्ता किया।

हमारी हवाई यात्रा आरामदेह और सुखद रही और अपरा ने भी उसका भरपूर मज़ा लिया क्योंकि वह "चंदामामा के घर" आ गई थी। ट्रेन से चलने पर जिस समय पहुँचते उससे तीन घंटा देर से हम होटल पहुंचे।

कोई कह सकता है कि पारिवारिक छुट्टियों की यह बहुत बुरी शुरुआत थी लेकिन हमने उसका पूरा मज़ा लिया, प्लान में परिवर्तन, ट्रेन छोड़कर फ्लाइट बुक कराना, दिल्ली जाना और एयरपोर्ट पर इंतज़ार करना, सब कुछ। हमने सकारात्मक रवैया अपनाया और पक्का निर्णय किया कि हमें खुश ही होना है और किसी भी नकारात्मक स्थिति में न तो तनावग्रस्त होना है न ही झल्लाना है। और फिर अपरा तो हर हाल में खुश थी ही!

हम इस बात से भी खुश थे कि समय रहते हमने हवाई जहाज़ का टिकिट लेने का निर्णय किया क्योंकि दूसरे दिन किसी ने बताया कि जिस ट्रेन से हम लोग आने वाले थे वह नियत समय से 12 घंटे की देरी से आई थी! कुछ भी हो, हवाई यात्रा ही ठीक रही।

लखनऊ में बिताए इस लंबे सप्ताहांत के विषय में कल और उसके बाद कुछ दिन तक मैं आपको बताता रहूँगा।

हिमालय यात्रा की शुरुआत – 28 मार्च 2013

होली-पार्टी की थकान मिटाने हेतु छोटा सा अवकाश लेने के बाद हमारे मेहमानों का दल हिमालय की ओर निकल गया! जी हाँ। सबेरे सबेरे यशेंदु और दूसरे सात लोग अपने बैग, सूटकेस, जूते, योग की चटाइयाँ वगैरह लेकर नीचे मुख्य कक्ष में आए। एक छोटी बस में उन्होंने सारा समान लादा-बहुत सा पानी और नाश्ते का सामान पहले ही रखा जा चुका था-हम लोगों से ‘गुडबाय’ कहा और बस में बैठ गए। हिमालय यात्रा, जिसे लेकर वे बहुत समय से बड़े उत्साहित थे, आखिर आज शुरू हो गई।

जब भी हम ऐसी यात्राएं आयोजित करते हैं, हर बार उसमें कुछ न कुछ खास होता ही है। पिछले साल सहभागी यात्रियों को अपरा के जन्मोत्सव में शामिल होने का अवसर मिला था और इस साल वे ऐसे मौके पर पधारे थे कि होली की मस्ती का पूरा आनंद उन्हें प्राप्त हो सका।

होली पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ मनाने के बाद वे अब ऋषिकेश जा रहे हैं, जिसे ‘हिमालय का प्रवेश-द्वार’ भी कहा जाता है। पिछले यात्री समूह के दो व्यक्तियों से भी वे आगे मिलेंगे और इस तरह कुल दस यात्री हो जाएंगे। वे आज रात को गंगा के तट पर होंगे और अपने चारों तरफ हिमालय की वादियों का नज़ारा करेंगे।

कल उनके पास न सिर्फ ऋषिकेश शहर और गंगा नदी पर बने पुलों और सारे शहर में फैले योग-व्यापार को देखने का मौका होगा बल्कि उसके आसपास की प्राकृतिक छटाओं, गुफाओं, जंगली रास्तों को आँखों में भर लेने का मौका भी होगा, बशर्ते वे आसपास बिखरे दर्शनीय स्थानों के जानकार किसी स्थानीय व्यक्ति को साथ लेकर शहर से ज़रा बाहर निकलें।

उसके बाद वे सब ऋषिकेश से आगे के लिए प्रस्थान करेंगे और पहाड़ चढ़ते हुए, सैलानियों के लिए आम तौर पर अनजानी जगहों, जैसे, भटवारी, बारसु वगैरह में अपना डेरा जमाएँगे जहां प्रकृति की गोद और शानदार भूदृश्य होंगे। यहाँ से वे अपनी पहली लंबी पदयात्रा की शुरुआत करेंगे, जो उन्हें एक सुंदर झील तक ले आएगी जिसके किनारे वे आज पिकनिक करेंगे और हो सकता है संगीत और नाच-गाने का आनंद भी उठाएँ।

शायद वे लोग ऐसे प्राकृतिक वातावरण में थोड़ा-बहुत योग करना भी पसंद करें और उसके बाद आगे गंगाजी के उद्गम-स्थल, गंगोत्री की ओर अपनी चढ़ाई प्रारंभ करेंगे। इन सहभागियों में से कुछ हमारे साथ पिछले साल वहाँ की यात्रा कर चुके हैं मगर दोबारा गंगा के तट पर विश्राम करने की, गंगा के साफ, स्वच्छ पानी में पैर डाले, उसकी शक्तिशाली लहरों के थपेड़ों का आनंद उठाने की लालसा लिए हुए हैं। अगर रास्ता खुला मिला तो वे गौमुख, जहां गंगा का मूल स्रोत, ग्लेशियर स्थित है, तक ट्रैकिंग कर पाने की जुगत भी भिड़ाएँगे।

वापस उतरते हुए मनेरी में हमारे सहभागियों का पड़ाव मनेरी झील के किनारे होगा, जहां वे पहाड़ की वादियों में फिर एक बार एकांत और शांति का सुख उठाएँगे और उसके बाद वापस नीचे की ओर ऋषिकेश के लिए प्रस्थान करेंगे जो उनकी यात्रा का प्रथम पड़ाव भी था और अब अंतिम पड़ाव भी होगा।

हमारे इस बार के यात्रियों के लिए यह एक अनोखा आश्चर्य होगा कि ऋषिकेश से मथुरा तक की यात्रा वे छोटी-मोटी बस से नहीं बल्कि रेल से पूरी करेंगे! यह उनकी सबसे लंबी यात्रा होगी और अब वे रेल की खिड़की से पीछे छूटते भूदृश्यों का अवलोकन करते हुए, थोड़ी बहुत चहलकदमी कर सकेंगे और चढ़ाई की थकान भी मिटा सकेंगे।

अंत में वे सब वृंदावन पहुंचेंगे। यहाँ आश्रम में हम सब उनके मुख से इस अभियान का विवरण सुनने के लिए आतुर हैं और उनके स्वागत के लिए आंखे बिछाए बैठे हैं।