भारत में सामाजिक परिस्थिति लगातार बेहद शर्मनाक, शोचनीय और पीड़ादायक हो चली है – 7 अक्टूबर 2015

आम तौर पर मैं अपने ब्लॉग में राजनीति पर नहीं लिखता। उसके लिए मैं सोशल मीडिया का उपयोग करता हूँ लेकिन क्योंकि भारत में सामाजिक परिस्थितियाँ तेज़ी के साथ बिगड़ती जा रही हैं और अब यह विषय लगातार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा रहा है, अगर आप इजाज़त दें तो आज मैं भी अपना खेद और प्रतिरोध दर्ज कराना चाहूँगा।

हाल ही में भारत में हुई एक घटना दुनिया भर के बड़े समाचार-पत्रों की मुख्य खबर बनी। संभव है, आपने भी इसके विषय में सुना हो। एक गाँव के हिन्दू मंदिर में वहाँ के पुजारी ने भारत की सत्ताधारी पार्टी के एक नेता के बेटे ने उससे जो कहा था, जस की तस उसकी घोषणा कर दी। वास्तव में वह महज एक अफवाह थी कि गाँव के एक मुस्लिम परिवार ने गाय का मांस खाया है। यह सुनते ही भीड़ जुट गई और उसने उस परिवार के घर की दिशा में कूच कर दिया, परिवार के पिता और उसके बेटे को घर से बाहर निकालकर उस पर ईटों से हमला किया। हमला इतना जोरदार था कि पिता की मृत्यु हो गई और बेटे को घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जो इस बुरी तरह से घायल हुआ है कि उसकी जान जा सकती है। फिलहाल वह मौत से संघर्ष कर रहा है। जाँच से पता चला है कि उन्होंने गाय का मांस नहीं बल्कि बकरे का मांस खाया था-लेकिन इससे बच्चों का पिता और उनकी माँ का पति वापस नहीं आ सकते!

यह घटना स्वयं में बेहद घृणास्पद थी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने ठीक ही उसे अपने पृष्ठों में प्रमुखता से जगह दी लेकिन उससे भी भयावह सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सदस्यों की प्रतिक्रिया रही! अफवाह फैलाने वाले बीजेपी के नेता के बेटे तथा कुछ और लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन उनकी पार्टी के नेता उस लड़के के व्यवहार को नज़रअंदाज़ करते हुए तरह-तरह के बहाने बना रहे हैं। उनका कहना है कि वे सब भोले-भाले बच्चे हैं, और उत्साह में यह सब कर बैठे हैं! वे हत्या के आरोप में हुई उनकी गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे हैं!

लेकिन साथ ही वे उनके इस कृत्य पर खुले आम यह कहकर मुहर भी लगा रहे हैं कि जो भी गाय का मांस खाए, उसे यही सज़ा मिलनी चाहिए! हमारे देश की सत्ताधारी पार्टी के एक लोकसभा सदस्य ने कहा कि गाय हमारी माँ है और अगर आपने हमारी माँ की हत्या की है तो आपकी हत्या भी जायज़ है! ये लोग सिर्फ गाय का मांस खाने पर किसी की भी हत्या करने पर उतारू हैं!

निश्चित ही ये सभी राजनैतिक नेता पाखंडी हैं! देश के सबसे महंगे रेस्तराँ गाय का मांस बेचते हैं, देश के कई प्रांतों में, वहाँ की स्थानीय जनता के लिए गाय का मांस एक सामान्य भोजन है। इन सब तथ्यों से उन्हें कोई परेशानी नहीं है! लेकिन वे सामान्य, धार्मिक हिंदुओं की गाय के प्रति अत्यंत संवेदनशील भावनाओं का उपयोग जानबूझकर हिंसा फैलाने में कर रहे हैं, जिससे देश की जनता का ध्रुवीकरण हो जाए, वे दो गुटों में विभक्त हो जाएँ और इन नेताओं को अधिक से अधिक वोट मिल सकें!

जी हाँ, यह एक बहुत बड़ी साजिश है। एक और बीजेपी नेता ने प्रांतीय चुनावों से पहले कहा था, ‘अगर दंगे होते हैं तो हम चुनाव जीत जाएँगे’ और अतीत में यह बात सत्य सिद्ध हो चुकी है! राजनैतिक नेता विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच, विशेष रूप से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, हिंसक प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं और इस तरह उन्हें अलग-अलग गुटों में विभक्त कर देते हैं और इस तरह देश के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते हैं। इन दंगों में, निश्चित ही बहुत से लोग मारे जाएँगे। और अंत में उन्हें अधिकांश हिन्दू वोट प्राप्त होंगे और बहुमत मिल जाएगा। जो लोग अभी कुछ साल पहले तक दंगों के आरोपी थे, आज संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं! धर्म और जाति के आधार पर वोट प्राप्त करने और चुनाव जीतने की यह बड़ी आसान सी रणनीति है!

जो थोड़ी बहुत कसर रह गई थी, वह प्रधानमंत्री की चुप्पी ने पूरी कर दी है। उनकी पार्टी विकास का मुद्दा जनता के सामने रखती है लेकिन वह एक प्रहसन से अधिक कुछ भी नहीं है-विकास सिर्फ अमीरों का हो रहा है और वे दिन-ब-दिन और अमीर होते जा रहे हैं जब कि सामान्य गरीब जनता की आर्थिक स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा है! अगर वे धार्मिक हिन्दू नहीं हैं तो उनकी हालत खराब ही हुई है, बल्कि वे संकट में हैं। दुर्भाग्य से दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार होने के कारण अतिवादी और अतिराष्ट्रवादी हिन्दू सत्ता में आ गए हैं और न सिर्फ बहुत शक्तिशाली हो गए हैं बल्कि उन्हें इसके लिए पूरा राजनैतिक समर्थन भी मिलता है कि उन लोगों के विरुद्ध हिंसा भड़का सकें, जिनकी आस्थाएँ अलग हैं और जो उनके अनुसार नहीं सोचते।

इसी कारण जाने-माने तर्कवादियों, नास्तिक लेखकों की हत्या की जा चुकी है और धार्मिक चरमपंथियों ने बाकायदा एक सूची बना रखी है, जिसके अनुसार वे एक के बाद एक बुद्धिजीवियों, तर्कवादियों, धर्मविरोधियों या नास्तिकों को निशाना बनाने का विचार रखते हैं।

इस समय हमारा देश अत्यंत नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है और इसीलिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ कि इस बहुत संवेदनशील समय की एक झलक आपको दे सकूँ। कल मैंने आपको बताया था कि कैसे एक छोटा सा प्रयास भी मददगार साबित हो सकता है और बहुत से प्रख्यात लेखकों का भी यही विचार है। उन्होंने इसके इस आतंकवाद के प्रतिरोध में सरकार को अपने पुरस्कार वापस कर दिए हैं। हमें यह साबित करना होगा कि हम ऐसा भारत नहीं चाहते। यह एक खुला, सांस्कृतिक विविधतापूर्ण, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबके विचारों का सम्मान करने वाला भारत नहीं है, जिसका दावा करते हम नहीं थकते!

भारत में विवाह पवित्र बंधन है इसलिए पति के द्वारा किया गया जबरन सम्भोग बलात्कार नहीं – 6 मई 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ जो सामान्यतः हमारे समाज में चर्चा का सबसे सदाबहार विषय होता है और मैं भी इस पर अपने ब्लॉग में अक्सर लिखता रहता हूँ: भारत में महिलाओं की स्थिति। आज पुनः इस विषय पर लिखने का कारण सरकार के एक मंत्री का वह बयान है, जिसमें उसने कहा है कि भारतीय संस्कृति में विवाह के अंतर्गत बलात्कार के विचार का कोई अस्तित्व नहीं है। अगर यह सच है तो क्या इससे अच्छी कोई बात हो सकती है?

इस मूर्खतापूर्ण वक्तव्य तक हम कैसे पहुँचे, मैं बताता हूँ: संयुक्त राष्ट्र के जनगणना कोष के अध्ययन का हवाला देते हुए एक महिला संसद सदस्य ने कहा कि भारत में 75% विवाहित महिलाओं के साथ उनके पतियों द्वारा बलात्कार किया जाता है। सदस्य ने सरकार से पूछा कि इस बारे में वह क्या कार्यवाही करने जा रही है।

सत्ताधारी पार्टी के एक मंत्री का जवाब यह था कि यह विचार पश्चिम से आया है और भारत में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 'यह विचार हमारे देश के लिए अच्छा नहीं है!' क्योंकि भारत में, उनके मुताबिक, विवाह एक पवित्र ईश्वरीय विधान और मांगलिक संबंध माना जाता है और भारतीयों की धार्मिक आस्थाओं और संस्कृति के कारण ऐसे कुकृत्य होते ही नहीं हैं।

निश्चित ही आप इस वक्तव्य पर स्तब्ध रह गए होंगे! मैं आपको बताना चाहता हूँ कि भारत में हम लोग एक धर्म समर्थक सरकार से, जो भारत की प्राचीन संस्कृति को बचाए रखने के एजेंडे पर काम कर रही है, इससे बेहतर वक्तव्य की अपेक्षा ही नहीं करते! फिर भी एक भारतीय के रूप में हमारे नेताओं की विचारशून्यता और कुबुद्धि पर सोच-सोचकर हैरान रह जाता हूँ जो ऐसी घटिया और हास्यास्पद बातें ज़बान पर लाते हैं!

हमारी प्राचीन संस्कृति में तलाक़ की कोई अवधारणा मौजूद ही नहीं है। तलाक़ शुरू ही हुआ, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई और संविधान बना। हिन्दू कोड बिल में तलाक़ का प्रावधान किया गया और महिलाओं के अधिकारों को दर्ज किया गया। उसके बाद ही एक पत्नी के होते हुए दूसरी महिला के साथ विवाह को गैरकानूनी घोषित किया गया। इसका ज़ोरदार विरोध हुआ, तर्क दिए गए कि पति को छोड़ना यानी तलाक़ लेना हिन्दू संस्कृति के विरुद्ध है क्योंकि हिन्दू धर्म के अनुसार दंपत्ति सात जन्मों के लिए विवाहबद्ध होते हैं। विरोध करने वालों का कहना था कि ऐसे क़ानून हमारी पवित्र और दिव्य हिन्दू धार्मिक संस्कृति को नष्ट कर देंगे।

मुझे लगता है, मंत्री महोदय यह भी भूल गए कि अतीत में हमारी इस महान संस्कृति में पति के मरने के बाद उसकी विधवा को पति के साथ ज़िंदा जला देने की परंपरा थी, जिससे वह पुनर्जन्म लेकर पुनः उसी व्यक्ति की पत्नी बन सके। राजा राममोहन रॉय के प्रयत्नों से इस घृणित परंपरा को क़ानून बनाकर समाप्त किया गया-हालाँकि, उसके बाद भी कई सालों तक हिन्दू संस्कृति के झंडाबरदारों ने इस परंपरा का त्याग नहीं किया क्योंकि वे सोचते थे कि यह क़ानून उनकी संस्कृति को नष्ट कर देगा।

उस समय हिन्दू धर्म में पुरुषों को कई पत्नियाँ रखने की आज़ादी थी और मंदिरों में पुरोहितों, पुजारियों और धर्मगुरुओं की यौनेच्छाओं की पूर्ति के लिए धार्मिक वेश्याएँ रखी जाती थीं, जिन्हें देवदासी कहा जाता था!

यह सब एक समय हमारी संस्कृति थी। आप हमारे समाज की हालत समझ सकते हैं, इस देश की परम्पराओं और इतिहास पर उनके विश्वासों को समझ सकते हैं! और भारतीय इतिहास के हर कालखंड में हिन्दू धर्म ने महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक समझा है। उनकी हैसियत किसी वस्तु से बढ़कर नहीं रही है, वे सिर्फ उपभोग की और बच्चे जनने की मशीने भर रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र कह सकता है कि भारत में 75% शादीशुदा महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं और इसे अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन हमारी राष्ट्रवादी, धार्मिक सरकार इस बात से सहमत नहीं है क्योंकि 'यह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध' है! जी हाँ, इस देश में स्त्रियों को उनकी औकात दिखाने के लिए पुरुष उन पर बलात्कार करते हैं, यह दर्शाने के लिए कि देखो, तुम कमज़ोर हो! और महिलाओं को बलात्कार की शिकायत ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर किसी महिला के साथ बलात्कार होता है तो दोष उसी का होता है-वे अनुपयुक्त कपड़े पहनकर या अपने अनुचित व्यवहार से पुरुषों को बलात्कार के लिए आमन्त्रित करती हैं! अगर आप महिलाओं के प्रति कुछ अधिक दरियादिल हैं, उनके प्रति दया दिखाना चाहते हैं तो आप उनके कपड़ों या व्यवहार पर भले ही टिप्पणी न करें मगर कहेंगे कि 'कभी कभी लड़कों से युवावस्था के जोश में गलती हो ही जाती है', जैसा कि उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के पिता मुलायम सिंह ने कुछ समय पहले कहा था।

परंपरागत भारतीय संस्कृति में एक महिला अपने पति की मिल्कियत होती है। अपनी पत्नी पर उसका सम्पूर्ण अधिकार होता है। महिलाओं को यह शुरू से ही पता होता है। पुरुष अपनी लड़कियों को अनजान लड़कों की तरफ देखने या बात तक करने से मना करते हैं। उनका कन्यादान होता है, विवाह के समय उसे अनजान व्यक्ति को दान कर दिया जाता है और एक ऐसे व्यक्ति के साथ सोने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, जिसे वह जानती तक नहीं होती। क्या बलपूर्वक किया गया यह आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) किसी बलात्कार से कम है?

लेकिन नहीं, विवाह के पश्चात् पति द्वारा पत्नी के साथ बिना सहमति के सम्भोग करना भारत में बलात्कार नहीं माना जाता। निश्चय ही संयुक्त राष्ट्रसंघ गलत होगा। शिकायत करने वाली हर महिला गलत होगी।

गुरु हो या राजनेता कोई फर्क नहीं पड़ता – भारत में मानव भक्ति – 16 फरवरी 2015

कल मैंने बताया था कि पिछले साल मैंने राजनीति के कारण अपने दो पुराने मित्रों को खो दिया। पहले तो मैं विश्वास ही नहीं कर पाया कि ऐसा भी हो सकता है- आखिर, राजनैतिक विचारों से मित्रता अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए! लेकिन फिर मैंने मामले का गहराई से विश्लेषण किया और मुझे लगा कि मैंने ऐसे व्यवहार का कारण समझ लिया है: भारत की प्राचीन काल से चली आ रही मानव भक्ति (व्यक्ति-पूजा) की परम्परा।

जी हाँ, मैं जानता हूँ कि मानव भक्ति (व्यक्ति-पूजा) भारत के इतिहास और उसकी संस्कृति में रची-बसी है और वह आज भी पूरी तरह मौजूद है। आप उन गुरुओं और साधू-संतों पर नज़र दौड़ाइए, जिनके बारे में मैं अक्सर लिखता रहा हूँ। उन पर बलात्कार और हत्याओं के इलज़ाम होते हैं फिर भी उनके भक्त उनके भक्त उनकी पूजा करते ही रहते हैं। यहाँ तक कि उन्हें जेल की सज़ा हो जाती है और उनके भक्त गण जेल के बाहर बैठे पूजा-अर्चना और भजन कीर्तन करते हैं। लेकिन यह धर्म के अलावा दूसरे नेताओं के साथ भी सामान्य रूप से देखी जाती है: चाहे वे आपके पूर्वज हों, फ़िल्म अभिनेता, गायक या राजनेता हों!

भारत में राजनीति चर्चा का सबसे लोकप्रिय विषय है। जर्मन पत्नी होने के कारण हम लोग आपस में अक्सर जर्मनी और भारत की राजनीति के बीच तुलना किए बगैर नहीं रह पाते: जर्मनी में बहुत कम लोग राजनीति की चर्चा करते हैं और जब करते भी हैं तो निश्चय ही वह भारत जैसी उत्कट नहीं होती। सम्भव है, यह उनके अधिक धीर-गंभीर स्वभाव और फितरत के कारण होता होगा-इसके प्रमाण स्वरूप जर्मनी और भारत में होने वाले संसदीय सत्रों की तुलना करना पर्याप्त होगा-लेकिन सिर्फ यही कारण नहीं है। जर्मनी में किसी राजनैतिक नेता की पूजा होते हुए मैंने नहीं देखा। वे किसी एक को सबसे बेहतर मानते हुए, उसे सबसे अधिक प्रतिभाशाली, सर्वगुणसंपन्न, लाखों में एक मानते हुए, उसके साथ किसी देवता (फरिश्ते या आदर्श) की तरह व्यवहार करते नहीं देखा जैसा कि भारतीय अकसर करते हैं! और निश्चय ही वे राजनीति के कारण अपनी दशकों पुरानी मित्रता नहीं तोड़ेंगे!

मज़ेदार बात यह है कि सिर्फ भक्त ही ऐसा करते नज़र आते हैं-खुद नेताओं का ऐसा खयाल नहीं होता। वे अपने व्यक्तिगत लक्ष्य पर एकाग्र होते हैं और यहाँ तक कि खुद अपनी कही बातों को अपने भक्तों जितना महत्व न देते हुए वही करते हैं जो उन्हें जीवन में आगे ले जा सकता है। यानी उनसे अधिक उनके भक्त उनकी बातों को अधिक महत्व देते हैं। और यही बात मैं राजनैतिक नेताओं के इन भक्तों के सामने स्पष्ट करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि वे अधिक अच्छी तरह, अधिक ईमानदारी और एकाग्रता के साथ अपने देवता (आदर्श) के पदचिह्नों पर चलें!

अक्सर भारत के चुनाव प्रचार बेहद उत्तेजक, आवेशपूर्ण और कटु होते हैं। दिल्ली विधान सभा के पिछले चुनावों में एक पार्टी के मुख्य मंत्री पद के उम्मीदवार, अरविन्द केजरीवाल के लिए मौजूदा प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने बड़े भद्दे शब्दों का प्रयोग किया, उन्हें खुले आम नक्सली, पाकिस्तानी एजेंट, देशद्रोही और न जाने क्या-क्या कहा गया! हालाँकि, फिर भी वह जीत गए- बल्कि शायद इसीलिए कि लोगों को ऐसा गंदा दुष्प्रचार अच्छा नहीं लगा, विशेष रूप से 'देश के सर्वोच्च नेता' द्वारा किया गया दुष्प्रचार। अब चुनावों के बाद, प्रधानमंत्री ने दिल्ली के नए मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया और उसके साथ चाय पीते हुए चित्र को ट्वीट भी किया। क्या आपको आश्चर्य हो रहा है कि वे आपस में गले मिले, साथ में चाय पी और पूर्ण सामंजस्य के साथ भरपूर वक़्त गुज़ारा?

इस व्यक्ति के अनुयायी उसके लिए 20-30 साल की मित्रता और संबंध पल भर में तोड़ देते हैं। ये अनुयायी यह नहीं देख पाते कि उनके नेताओं के लिए यह सब नाटकबाज़ी था! कि पर्दे के पीछे वे सभी एक ही हैं, कि वे इस बात को कोई अहमियत नहीं देते कि पहले उन्होंने क्या कहा या किया था और आज क्या कह या कर रहे हैं!

मैं इन राजनेताओं के सभी भक्तों से अपील करना चाहता हूँ कि कृपा करके अपने संबंधों को इन नेताओं के लिए समाप्त न करें। किसी भी संबंध को, जहाँ प्रेम है और किसी भी ऐसे संबंध को, जिसमें प्रेम के साथ विकसित होने की संभावना है। क्योंकि जीवन में कभी न कभी, किसी न किसी समय आपको किसी और मनुष्य की ज़रुरत पड़ेगी-और उस समय न तो मोदी होगा न ही आपका कोई दूसरा राजनेता! उनके पास आप जैसे लाखों-करोड़ों लोग हैं। आप उन्हें हमेशा पहचानेंगे लेकिन वे न तो आपका चेहरा पहचानेंगे और न ही आपका नाम याद रखेंगे।

हर चुनाव के साथ राजनेता आते-जाते रहते हैं। वास्तविक जीवन में आवश्यकता पड़ने पर मदद के लिए और आपको सहारा देने के लिए आपके मित्र ही मौजूद रहेंगे, मोदी नहीं रहेगा।

इसलिए आप किसी भी तरह के नेता के प्रति कितने भी समर्पित क्यों न हों, अपने इस समर्पण को इस बात की इजाज़त मत दीजिए कि वह आपकी मित्रताओं को किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाने लगे!

जब एक राजनेता के प्रति अपने समर्पण और भक्ति को पुरानी मित्रता से अधिक महत्व दिया जाता है -15 फरवरी 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जिसे मैं बहुत समय से महसूस कर रहा हूँ। पिछले हफ्ते मैंने अपने एक भूतपूर्व मित्र के बारे में लिखा था, जिसे मेरे अधार्मिक होने से समस्या थी। एक बिल्कुल अलग मामला भी मेरे साथ पेश आया, जिसमें कुछ मित्रों ने राजनीति के कारण मुझसे मित्रता समाप्त कर दी!

पिछले साल कुछ बहुत पुराने मित्रों के साथ मुझे दो बार यह अनुभव हुआ। उनमें से एक तो मेरे पिताजी के 50 साल पुराने मित्र थे और जब भी वृन्दावन आते, हमसे मिलने आश्रम अवश्य आते थे। दूसरा मेरा एक मित्र था, जिसे मैं 20 साल से जानता था। मैं कभी-कभी उससे और उसके परिवार से फोन पर बात कर लिया करता था और हम एक-दूसरे के घर भी हो आए थे। दोनों मामलों में ये मित्र राजनीति पर मेरी लिखी बातों से आहत हो गए, विशेष रूप से सोशल मीडिया में, भारत के वर्त्तमान प्रधान मंत्री, मोदी के बारे में मेरे विचार पढ़कर।

जी हाँ, अलग विचार रखने के कारण मुझे अपने मित्रों से, बहुत पुराने मित्रों से हाथ धोना पड़ा है।

मैं हतप्रभ रह गया था। वास्तव में मैं सोच भी नहीं सकता था कि जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से अच्छी तरह जानता था, जिनके साथ मेरा निकट का प्रेम सम्बन्ध था- एक ऐसा सम्बन्ध, जो वर्षों, बल्कि दशकों के परिचय के कारण बहुत पुख्ता हो चुका था- ऐसे व्यक्तियों के साथ भी ऐसा हो सकता है! वह भी सिर्फ राजनैतिक मतभेद के कारण! क्योंकि वे एक राजनैतिक पार्टी के, विशेष रूप से उस पार्टी के एक नेता के समर्थक थे और मैं कतई नहीं था।

मैं राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूँ। शुरू से मेरी दृढ मान्यता रही है कि राजनीति सिवा नाटक-नौटंकी के कुछ नहीं है, महज फार्स (प्रहसन)। राजनैतिक नेता, जब उनके कैरीयर या उनकी प्रगति, सफलता या लाभ का सवाल आता है, पार्टी बदल लेते हैं। वे ऐसे वादे करते हैं, जो उन्हें चुनाव जितवा सकें और चुनाव जीतने के बाद उन्हें भूलकर कोई दूसरी बात शुरू कर देते हैं। वे असंवेदनशील होते हैं और करते कुछ हैं और उनके दिल में कुछ और होता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि देश में जो कुछ भी हो रहा है उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है! मैं भारतीय राजनीति में दिलचस्पी लेता हूँ, उसकी पूरी जानकारी रखता हूँ और उस पर अपना नज़रिया भी कायम करता हूँ। लेकिन मैं किसी एक पार्टी का समर्थक नहीं हूँ-और इसलिए मैं सभी पार्टियों और उनके नेताओं के मूर्खतापूर्ण कामों और बयानों पर सोशल मीडिया में लिखता हूँ क्योंकि मेरा ब्लॉग बहुत से गैर भारतीय पढ़ते हैं, जो भारत की राजनीति के बारे में न तो अधिक कुछ जानते हैं और न ही उससे उन्हें ख़ास मतलब होता है। ऑनलाइन यह सुविधा तो होती ही है कि आप अपनी पसंद की या अपने मतलब की विषयवस्तु ऑनलाइन छाँटकर पढ़ सकते हैं और जिन्हें नहीं पढ़ना चाहते, उनकी उपेक्षा कर सकते हैं।

संभवतः आप अपने मित्र के विचार पहले से जानते हैं और इसके बावजूद उसकी टिप्पणी पर इतना परेशान होते हैं। क्यों? क्योंकि वह उस व्यक्ति की आलोचना करता है, जो आपका आदर्श है, एक ऐसा राजनैतिक नेता, जिसका आप समर्थन ही नहीं करते बल्कि जिसके प्रति आप समर्पित और निष्ठावान हैं। आपके और उसके बीच भक्त और आराध्य का रिश्ता बन चुका है-दुर्भाग्य से यही बात है, जिसकी मैं अकसर आलोचना किया करता हूँ। कि आप किसी की आराधना न करें, चाहे वह धर्मगुरु हो या राजनैतिक नेता! आप किसी के अंध-समर्थक न हों, इतने अनुगामी या अंध-भक्त न हो जाएँ कि अपने गुरु की हर गलती, हर अपराध पर आँखें मूँद लें। मैं जानता हूँ कि आपको अपने लिए 'भक्त' शब्द के प्रयोग पर एतराज़ हो सकता है। शायद आप उनके ‘प्रशंसक’ कहलाना पसंद करते लेकिन उनकी आलोचना पर इतना उद्वेलित होना, यहाँ तक कि अपनी इतनी पुरानी मित्रता तोड़ लेना आपको यही प्रमाणित करता है: निश्चय ही, एक भक्त!

मैं चाहता हूँ कि आप आँखें खोलें और इस तथ्य को देखें और समझें कि गुरुवाद ने मुझसे मेरे मित्र छीन लिए- पहले धर्म के कारण और अब राजनीति के कारण भी! लेकिन ऐसे लोगों का आपसे दूर चले जाना ही ठीक है, उन्हें खोकर बेकार परेशान होना व्यर्थ है। मित्रता और प्रेम से भक्ति कहीं ज़्यादा मजबूत होती है!

मेरे मन में इस विषय पर और भी बहुत से विचार हैं और इसलिए कल भी मैं इस बारे में लिखना जारी रखूँगा।

जर्मनी की चुनाव-प्रक्रिया भारत की तुलना में अधिक न्यायपूर्ण और जनतान्त्रिक क्यों है! 21 मई 2014

शायद आप जानते ही होंगे कि हाल ही में हमारे देश में लोकसभा के चनाव हुए हैं। जनसंख्या के लिहाज से भारत दुनिया का दूसरा बड़ा देश है और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यही कारण है कि सारे देश में चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने में पाँच सप्ताह का लम्बा समय लगा। यहाँ मैं चुनाव के नतीजों की चर्चा नहीं करने वाला हूँ क्योंकि मैं अपने ब्लॉग को फिलहाल राजनीति से दूर रखना चाहता हूँ। मैं भारत की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बारे में भी लिखना नहीं चाहता और हालाँकि सरकार के निर्णयों पर बाद में कभी लिख सकता हूँ मगर आज चुनाव नतीजों पर आगे कुछ नहीं लिखुंगा। इसकी जगह मैं चुनाव-व्यवस्था के बारे में लिखना चाहता हूँ!

भारत में, जिस पार्टी ने भारत की जनता के सिर्फ 31% वोट पाए हैं उसने अगले पांच साल के लिए देश पर राज करने का हक़ प्राप्त कर लिया है क्योंकि उसे लोकसभा में सीटों का बहुमत प्राप्त हुआ है। इसका अर्थ यह है कि 69% लोगों ने इस पार्टी को नकार दिया है। ऐसा इसलिए होता है कि भारत में हम स्थानीय उम्मीदवारों को वोट देते हैं। स्थानीय स्तर पर जो बहुमत में वोट हासिल करता है वह लोकसभा के लिए चुन लिया जाता है और बाकी के वोट व्यर्थ हो जाते हैं। वह एक वोट से भी जीत सकता है और भारी बहुमत से भी, लेकिन उसकी पार्टी को एक सीट मिल जाती है। इस तरह, भले ही 69% वोटर उस पार्टी का शासन नहीं चाहते, हमारी चुनाव-व्यवस्था की खामी के कारण इस पार्टी ने संसद में बहुमत पा लिया है और उसके लिए देश पर शासन करना आसान हो गया है-और इस कारण हमारा लोकतंत्र वास्तव में लोकतंत्र नज़र ही नहीं आता।


भारत की जनसंख्या


1 270 000 000 (2014)


कुल मतदाता


815 000 000(2014)


पार्टी


प्राप्त मत


प्राप्त सीटें


भाजपा


17,16,57,549


282


कांग्रेस


10,69,38,242


44


बीएसपी


2,29,46,182


0


टीएमसी


2,12,59,681


34


एसपी


1,86,72,916


5


एआईडीएमके


1,81,15,825


37


सीपीएम


1,79,86,773


9


टीडीपी


1,40,94,545


16


एएपी


1,13,25,635


4

 

जब मैंने यह सब अपने जर्मन मित्रों को बताया तो उन्होंने मुझसे कहा कि जर्मन चुनाव-व्यवस्था में यह संभव नहीं होता। जब मैंने पूछा कि क्यों और कैसे तो आयरिस ने बहुत विस्तार से मुझे समझाया। उसने बताया कि यह थोड़ा जटिल अवश्य है लेकिन वह बहुत न्यायसंगत है, बल्कि दुनिया भर की चुनाव-व्यवस्था में सबसे अधिक युक्तियुक्त और न्यायसंगत है-और मुझे उससे सहमत होना पड़ा!

जबकि भारत में हम लोग मत-पत्र पर एक निशान लगाते हैं, जर्मनी में दो लगाए जाते हैं। पहले वे चुनाव में शामिल पार्टियों में से किसी एक पार्टी को, जिसके कार्यक्रमों को वे सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं, वोट देते हैं। उसके बाद वे किसी विशेष स्थानीय उम्मीदवार को वोट देने के लिए एक और निशान लगाते हैं। अगर यह उम्मीदवार चुनाव जीत लेता है तो वह सीधे संसद में पहुँच जाता है। इस तरह वे ऐसे स्थानीय उम्मीदवार को भी चुन सकते हैं, जो उस पार्टी का, जिसे उन्होंने पहले वोट दिया है, नहीं होता।

जब वोट गिने जाते हैं तो पहला वोट यह बताता है कि लगभग 600 सीटों की जर्मन संसद में कितने प्रतिशत सीटें किस पार्टी को मिली हैं।

साथ ही हर इलाके से चुना गया उम्मीदवार भी सीधे संसद में पहुँच जाता है। दूसरे वोट से यह पता चल जाता है।

इस तरह यदि एक पार्टी ने 30% वोट प्राप्त किए हैं तो उस पार्टी को संसद में 30% सीटें प्राप्त होती हैं। ये सीटें उन उम्मीदवारों द्वारा भरी जाती हैं, जो अपने-अपने क्षेत्रों से चुनकर आए हैं। अगर उस पार्टी के पर्याप्त संख्या में स्थानीय उम्मीदवार चुनकर नहीं आए हैं तो बची हुई सीटों को क्रमानुसार उसी पार्टी के चुने हुए उम्मीदवारों से भरा जाता है। इस क्रम की घोषणा चुनावों से पहले ही की जाती है और उसमें ऐसी व्यवस्था होती है कि न्यायसंगत संख्या में हर जर्मन प्रान्त के उम्मीदवार जर्मन संसद में पहुंच सकें।

इसके बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है: क्या हो अगर किसी पार्टी के स्थानीय रूप से जीते हुए उम्मीदवारों की संख्या उस पार्टी द्वारा प्रथम वोट से प्राप्त प्रतिशत के अनुसार निर्धारित सीटों से ज्यादा हो? ऐसी स्थिति में ही 'Uberhangmandate' सीटों यानी अतिरिक्त जनादेश या हाथ उठाकर (overhand) सीटों की व्यवस्था संसद में करना पड़ती है। ये सभी उम्मीदवार भी संसद में जाएंगे और इस कारण दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों को भी उसी अनुपात में संसद में प्रवेश मिल जाता है, जिससे हर पार्टी के सांसदों का कुल प्रतिशत चुनाव में प्राप्त प्रतिशत के बराबर ही बना रहे। इस तरह संसद-सदस्यों की संख्या बढ़ जाती है मगर उनके सदस्यों का प्रतिशत वही बना रहता है।

स्थानीय रूप से जीते हुए सभी उम्मीदवार संसद में जाने के हकदार होंगे। इसके अलावा हर वोट गिने जाने के बाद प्राप्त वोटों की संख्या के अनुपात में उतनी प्रतिशत सीटें हर पार्टी के लिए सुनिश्चित हो जाएंगी।

मुझे लगता है कि यह न्यायसंगत है। मुझे लगता है कि यह भारतीय चुनाव-व्यवस्था से ज़्यादा न्यायसंगत और तार्किक है, यह ज़्यादा जनतांत्रिक है और ज़्यादा लोगों की इच्छाओं और पसंद का प्रतिनिधित्व करती है।

जनतंत्र का अतिरेक – 20 मई 2014

मुझे विश्वास है कि हम सब इस बात पर सहमत होंगे कि वर्तमान समय में जनतंत्र सबसे अच्छी राज्य-व्यवस्था है। लोगों के पास अपनी बात कहने का अधिकार होता है और जिस बात को लोग बहुमत से स्वीकार कर लेते हैं, उसे सब मान लेते हैं। दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र, भारत के चुनावों पर मैं बाद में कभी लिखना चाहूंगा मगर आज मैं जनतंत्र के एक दूसरे पहलू पर अपने विचार आपके सामने रखूँगा: इस एहसास पर कि कभी-कभी जनतंत्र का अतिरेक हो जाना भी संभव है!

जी हाँ, यह मैं पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ-हालाँकि, मुझे हँसी आती है खुद अपने जनतंत्र पर, मेरी प्रिय पत्नी के जनतंत्र पर, जब सारे उपस्थित लोगों के नज़रिए जानने के चक्कर में बहुत मज़ेदार स्थितियां पैदा हो जाती हैं, चाहे मामला बहुत मामूली सा ही क्यों न हो। हम इस रेस्तराँ में जाएँ या उसमें? मैं उसमें जाना चाहूंगी, और आप? चलो, इससे भी पूछ लेते हैं, और उससे भी, और हाँ, उन बीस लोगों से भी, जो साथ आने का कार्यक्रम बना रहे हैं! आप कल्पना कर सकते हैं कि निर्णय लेने की यह प्रक्रिया कितनी लम्बी चल सकती है!

हमारे मित्र, थॉमस को अपने स्कूल में अक्सर ऐसी ही स्थितियों का अनुभव होता रहा है और उन्होंने एक बार मुझसे कहा कि अपने जीवन में मैं इतना ज़्यादा जनतंत्र कतई नहीं चाहता। एक उदाहरण देता हूँ: एक कमरे में 16 लोग बैठे हैं और उनका मुख्य काम यह तय करना है कि ऑफिस में आईं नमूने की कुछ कुर्सियों में से उनके लिए कौन सी नई कुर्सी ठीक रहेगी।

थॉमस के स्कूल में कुछ मीटिंग्स होती हैं, जिसमें उन्हें शामिल होना होता है और यह भी ऐसी ही एक मीटिंग थी। उन्हें इस मीटिंग में शामिल होना आवश्यक है, जिससे बहुमत किसी एक कुर्सी के लिए हाँ या नहीं कह सके, चाहे वे उस मामले को महत्वपूर्ण मानते हों या न मानते हों। अपने जीवन का कम से कम एक घंटे का समय बरबाद करना, जिसमें दूसरे लोग कुर्सी की ऊँचाई, उसकी मजबूती और कुर्सी की चारों तरफ मुड़ने की क्षमता (rollability) पर विचार करते रहेंगे।

अधिकतर यह इस तरह होगा दिखाई देगा: नंबर एक व्यक्ति, प्राचार्य या कोई शिक्षक, जिसे यह काम सौंपा गया है, विभिन्न कुर्सियों के बारे में और उनकी खूबियों और कमियों के बारे में सबको बताएगा। अंत में वह कहेगा: "मेरे विचार में यह कुर्सी ठीक रहेगी।" वही सबकी स्वाभाविक पसंद होगी और सब उस पर सहमत भी हो जाएंगे। लेकिन रुकिए, नहीं, इस तरह सबका सहमत होना पर्याप्त नहीं है! अभी वहाँ बैठे उन सबको अलग अलग कहना होगा: "हाँ, मैं उसकी इस बात से सहमत हूँ" बल्कि बेहतर होगा, अगर यह भी बताएं कि आप क्यों सहमत हैं।

जब थॉमस को इस मीटिंग का न्योता मिला तो उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने प्राचार्य से कहा: "आप मेरे प्राचार्य हैं, मुझे भरोसा है कि आप इस विषय में उचित निर्णय कर करेंगे कि हमारे लिए कौन सी कुर्सी ठीक रहेगी!" फिर उन्होंने हमसे कहा कि इन मीटिंगों में व्यर्थ समय बरबाद करने की जगह मैं आँगन में झाडू लगाऊंगा या कोई दूसरा उपयोगी काम करूंगा।

लेकिन यह भी सच है बाद में कोई यह शिकायत नहीं कर सकता कि उसे कुर्सियों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई!

आप क्या चाहेंगे-आपको बिना बताए लिया गया निर्णय या जनतंत्र का अतिरेक?

भारत! सिर्फ कुँवारों पर नहीं! यौन क्रियाओं पर ही पूर्ण प्रतिबंध लगा दो – 26 मार्च 13

पिछले दिनों भारत में एक बड़ा महत्वपूर्ण और दिलचस्प सवाल जेरेबहस था: किस उम्र के बाद संभोग कानून-सम्मत हो? ‘सहमति की उम्र’, जो कि इसके लिए एक प्रचलित उक्ति है, को कम करके 16 साल किए जाने के प्रयास चल रहे थे। यह उम्र दुनिया के कई देशों में भी इस हेतु मान्य है। लेकिन, आखिर में भारत की दकियानूस जमातों को विजय प्राप्त हुई जब सरकार ने निर्णय लिया कि अभी भी 18 साल से ऊपर की उम्र प्राप्त व्यक्तियों को ही यौन संबंध स्थापित करने की कानूनी मंजूरी होगी। सोशल नेटवर्क पर हुई ओजस्वी चर्चा में कुछ वक्त सक्रिय रहने के बाद अपनी डायरी में भी इस संबंध में कुछ दर्ज करना समीचीन होगा।

भारत में इससे संबंधित कानून के बारे में सबसे बड़ा विवाद यह है कि वह औरत को 18 साल की और पुरुष को 21 साल की उम्र से पहले विवाह की अनुमति नहीं देता। इस तरह यह सवाल खड़ा हो जाता है कि कहीं नए कानून-संशोधन विवाह-पूर्व यौन संबंधों को, जिन्हें धर्म, परंपरा, संस्कृति और समाज वर्जित मानता है, बढ़ावा तो नहीं देंगे?

जो लोग मेरे संपर्क में हैं और जो डायरियों में दर्ज मेरे विचारों को जानते हैं आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि मौका मिलने पर मैं किस प्रस्ताव के समर्थन में अपना वोट दूँगा-‘सहमति की उम्र’ को घटा कर 16 साल किए जाने वाले प्रस्ताव पर। क्यों? क्योंकि हम एक नए वक्त में रह रहे हैं, क्योंकि मैं आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) की परंपरा में विश्वास नहीं करता और सबसे ऊपर इस कारण कि यह पहले से ही सारे भारत में हो रहा है। जी हाँ, यह हो रहा है। कोई इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि यह समाज अभी भी इसे अनैतिक मानता है मगर युवा, अविवाहित जोड़े यौन संबंध स्थापित करते हैं-और अक्सर वे बहुत सारा यौन अनुभव प्राप्त करने के बाद काफी बड़ी उम्र में विवाह करते हैं।

एक सामान्य भारतीय आपसे यही कहेगा कि विवाह से पहले यौन संबंध गलत है और इसका कारण यह है कि वह समझता है कि यौन-क्रिया एक घिनौना कार्य है। धर्म ने उसे अपनी कामेच्छाओं पर शर्म करने की शिक्षा दी है, भले ही वह विवाहित क्यों न हों। और विवाह पूर्व तो यह पाप है ही। इसलिए एक ऐसा व्यक्ति जो कौलेज के अपने उन्मत्त दिनों में दोस्तों के साथ पार्टियों में आनंद लाभ करते हुए, अपने माता-पिता से दूर रहते हुए, या पहली बार सम्पूर्ण स्वतंत्रता का मज़ा लेते हुए अविवाहित होने के बाद भी यौन अनुभव प्राप्त कर चुका है, वह भी यही कहेगा कि ऐसा करना पाप है। उसके मन में इस कार्य के लिए अपराधबोध भी होगा मगर वह यह किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेगा कि वह भी ऐसा कर चुका है। अगर आप फेरे लेते हुए जोड़ों से इसके बारे में जानकारी लेना शुरू करें तो पाएंगे कि हर भारतीय विवाह से पूर्व कुंवारा ही होता है!

और यह सब तब जबकि हमारी संस्कृति में आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) की प्रथा है। या कहीं इसी कारण तो नहीं? आखिर अगर पता चल जाए कि आपने बिना विवाह किए यौन संबंध स्थापित किए हैं तो आपकी शादी-बाज़ार में कीमत ही क्या रह जाएगी! एक छोकरीबाज़ को कौन अपनी लड़की देगा और एक बदचलन लड़की से कौन अपने बेटे का विवाह करना चाहेगा! आयोजित विवाह (अरेंज्ड मैरेज) वाकई पाखंड के खुले प्रदर्शन के सिवा कुछ नहीं!

मेरे विचार में यौन भावना का विवाह से कोई संबंध नहीं है और नैतिकता का पैमाना मानते हुए उसे विवाह से जोड़ना व्यर्थ है। देश में ऐसे अनगिनत प्रकरण सामने आते रहते हैं जहां लोगों को उचित जोड़ा न मिल पाने के कारण विवाह नहीं हो पाते। इनके पीछे त्वचा का रंग, आर्थिक स्थिति, जाति या धर्म या और भी कई कारण होते हैं जिनके चलते माँ-बाप अपने बच्चों के विवाह हेतु उपयुक्त वर या वधू नहीं ढूंढ पाते। क्या यह सोचना उचित होगा कि ऐसे लोगों को जिनका किसी कारण विवाह नहीं हो पाया, यौन सुख से वंचित किया जा सकता है?

एक और बात: उनका क्या होगा जो विवाह करना ही नहीं चाहते? जो विवाह के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं? या जो सिर्फ उसी से विवाह करना चाहते हैं जिससे उन्हें प्रेम हुआ हो, ढ़ोर बकरियों की तरह बाज़ार में जो बिकने के लिए तैयार नहीं हैं, जैसा कि आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) में अक्सर होता है? भारत एक स्वतंत्र देश है। विवाह की कानूनी उम्र 18 साल (या उससे ऊपर)है इसलिए आप ‘सहमति की उम्र’ को घटाकर 16 साल नहीं करते क्योंकि ऐसा करना आपको अनैतिक लगता है। इसलिए आप इसे जीवन में और आगे ले जाकर यह कानून भी बना देंगे कि जो अविवाहित है उसका किसी भी प्रकार का यौन संबंध वर्जित है। फिर तो आपको यही कानून बना देना चाहिए कि सिर्फ उसी व्यक्ति को यौन संबंध रखने की अनुमति होगी जो विवाहित है। लेकिन आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि भारत एक स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है! तो फिर युवा वयस्कों कि लिए भी इस नैतिक मूल्यों को लागू मत कीजिए!

भारतीय माता-पिता ऐसी नैतिक शिक्षा अपने बच्चों को देते हैं, यह सोचकर कि यह परंपरा से चली आ रही उचित और वैज्ञानिक समझ है। वे यह नहीं सोचते कि अपने जीवन में उन्होंने अपने माता-पिता की इन्हीं नैतिक और नियमबद्ध शिक्षाओं का कितना पालन किया।

व्यक्तिगत रूप से मैं ऐसी किसी विचारधारा को मंजूर नहीं कर सकता जो कहे कि आप तभी यौन संबंध बनाएँ जब आप विवाह कर लें। और इसलिए अपने बच्चों पर भी मैं उसे लागू नहीं होने दुंगा। मैं अपने बच्चों को स्वतंत्रता और समादर की शिक्षा दुंगा। मैं उन्हें किसी के साथ हमबिस्तर होने के नतीजों के बारे में समझाऊँगा और यह भी कि ऐसा करने पर आप पर क्या ज़िम्मेदारियाँ आयद होंगी और उनसे बचने के लिए कौन सी सावधानियाँ उन्हें रखनी चाहिए। लेकिन यह सिर्फ और सिर्फ उनका निर्णय होगा कि वे किसके साथ हमबिस्तर होना चाहते हैं और किसके साथ विवाह करना चाहते हैं।

हर माँ-बाप का दिल अपने बच्चों के लिए सिर्फ अच्छा ही सोचता है। लेकिन यह एक बिल्कुल व्यक्तिगत समझ होती है कि किसी के लिए ‘सबसे अच्छा’ क्या है। निश्चित रूप से मैं चाहूँगा कि काम प्रवृत्ति के बारे में मेरे बच्चों की एक नैसर्गिक समझ हो, स्वाभाविक रूप से उसके साथ चल सकने वाला एक जानकार और शिक्षित दृष्टिकोण हो और फिर सबसे बढ़कर अपने किए की ज़िम्मेदारी उठाने का साहस और स्वनिर्णय का आत्मविश्वास हो।

धर्म: बदल न सकने वाले तानाशाही और दकियानूसी कानूनों की निरंकुश सत्ता- 22 जून 2012

मैं धर्म के विकास के बारे में पहले ही लिख चुका हूँ कि कैसे डर और अज्ञानता के चलते उसकी उत्पत्ति हुई और लोगों ने कैसे और क्यों एक अव्याख्येय विचार (अवधारणा) की व्याख्या करने की आवश्यकता महसूस की।

समाज में सुव्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से धर्म ने कुछ नियम बनाए और उन्हें धर्मग्रंथों में कानूनों के रूप में दर्ज कर दिया गया। धर्म एक तरह से न्याय देने वाली सत्ता है और उसके द्वारा गढ़े गए धर्मग्रंथ उनके कानूनों की किताब। ये किताबें आपको बताती हैं कि आप अपने दैनंदिन जीवन में क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। इसका यह अर्थ नहीं है कि वे सारे कानून न्याय-संगत और उचित हैं! धर्म अपनी सत्ता और अपना वर्चस्व खोना नहीं चाहता था और इसी कारण उन सत्ताधारियों ने एक और कानून बनाया: इन क़ानूनों को बदला या सुधारा नहीं जा सकता। धर्मग्रंथ पवित्र हैं और उनमें कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता!

जब आप कानून की बात करते हैं तो स्वाभाविक ही, राजनीति की बात भी निकल ही आती है। दोनों का आपस में घनिष्ठ संबंध है। और अगर धर्म ने कानून बनाए हैं तो धर्म की अपनी राजनीति भी होगी। लेकिन धर्म जनतंत्र नहीं है। उसने हमेशा निरंकुश शासक की तरह अपना काम किया है। लोगों का शोषण करके, उनके डर का लाभ उठाकर उन्हें अपने क़ानून मानने के लिए मजबूर करके। बिलकुल एक तानशाह की तरह धर्म भी यह बिलकुल नहीं चाहता कि आप सुख-शांति से रहें क्योंकि तब आप पर नियंत्रण रखना उनके लिए मुश्किल हो जाएगा। वह कानून बनाता है और आपके पास उसे बदलने का कोई उपाय नहीं है।

वास्तविकता यह है कि आप अनंतकाल के लिए एक ही कानून लागू नहीं रख सकते। संभव है, जो आप आज कह रहे हैं वह बीस साल बाद मान्य न हो सके। हो सकता है साल भर बाद ही वह अपनी प्रासंगिकता खो बैठे! इसलिए जब धर्म कट्टर होने की कोशिश करता है, लचीला नहीं होता, बदलने की इजाज़त नहीं देता तो विद्रोही पैदा होते हैं, जैसे बुद्ध और लूथर, जो क्रांति का आह्वान करते हैं। उन्हें तानशाह अपनी सीमाओं से बाहर खदेड़ देते हैं। तब ये विद्रोही उन्हीं पुराने नियमों-क़ानूनों में कुछ बदलाव करके एक नया धर्म शुरू कर देते हैं। तो, इस तरह समय बीतने के साथ, छोटे-छोटे अंतरालों में नए-नए धर्म पैदा होते जाते हैं।

लेकिन अंततः अपने निष्कर्ष और परिणाम में वे एक ही होते हैं। सब अपनी सुविधा के अनुसार अपने क़ानून बना लेते हैं। इसीलिये कई तरह के धर्म, जीने के तौर तरीके और धर्मों की विभिन्न शाखाएँ विकसित हो गए। वे टूटते हैं, फैलते हैं और नए-नए रूपों में सामने आते हैं। यह अतीत में भी हुआ, अब भी हो रहा है और आगे भी होता रहेगा।

तो एक तरफ कुछ स्थानों में पुरातन काल के देवता भी नज़र आ जाते हैं तो कुछ दूसरे स्थानों में, दूसरे लोगों ने, अपने-अपने तरीके से उसका कुछ बदला हुआ रूप गढ़ लिया है। इस तरह देवताओं और ईश्वरों की इतनी सारी किस्में हमें दिखाई देती हैं: छोटे देवता, बड़े देवता, देवता जिनकी मूर्तियाँ होती हैं और देवता, जिन्हें चित्रों या मूर्तियों में प्रदर्शित नहीं किया जाता। कुछ ईश्वर-विहीन धर्म की बात करते हैं और कुछ कहते हैं कि वे किसी पर विश्वास नहीं करते।

व्यक्तिगत रूप से मैं आस्तिकों के ईश्वर से ज़्यादा नास्तिकों के ईश्वर को पसंद करता हूँ। वह एक विचार है, एक अच्छा विचार और मेरे दिल में है, मेरे दिमाग में है। मैंने स्वयं उसका निर्माण किया है। जिस तरह का ईश्वर मैं चाहता था वैसा ही मैंने उसे अपने लिए निर्मित कर लिया। वह मेरा अपना ईश्वर है। और इसीलिए मैं उससे प्रेम करता हूँ और उस पर विश्वास भी करता हूँ।

मेरे लिए ऐसे किसी ईश्वर पर विश्वास करना मुमकिन नहीं है, जो स्वर्ग में बैठा रहता है, जिसे मैं देख नहीं सकता, जो मुझसे बात नहीं करता, जिसे मैं छू नहीं सकता, जो सोना-चांदी धारण किए और फूलों से सुसज्जित मंदिरों में स्थापित है और जिसे कभी-कभी चोर चुराकर ले जाते हैं और वह कुछ नहीं कर पाता। अगर वह अपनी रक्षा खुद ही नहीं कर पाता तो कैसे वह मेरी रक्षा करेगा?

कोई भी निरंकुश शासन पसंद नहीं करता मगर जब लोग विश्वास करते हैं तो यह समझ नहीं पाते कि वे निरंकुश शासन में ही रह रहे हैं। मैं उन क़ानूनों पर विश्वास नहीं कर सकता, जो हजारों साल पहले बनाए गए थे। मैं जनतंत्र पसंद करता हूँ, जनता का शासन। मैं बदलाव पसंद करता हूँ और पसंद करता हूँ स्वतन्त्रता!

3 समूह जो जाति-प्रथा को बनाए रखना चाहते हैं और उनके कारण – 20 जून 2012

कल मैंने 5 विचार पेश किए थे जो जाति प्रथा को समाप्त करने में कारगर हो सकते हैं। अगर विचारों से ही कुछ हो पाता तो मुझे विश्वास है अब तक हमारे समाज से जाति प्रथा कब की मिट चुकी होती। अगर वास्तव में सभी चाहते हैं कि यह प्रथा समाप्त हो जाए तो फिर निस्संदेह उसे आज ही समाप्त हो जाना चाहिए! मगर ऐसा नहीं है। आज मैं उन तीन समूहों के बारे में लिखूँगा जो नहीं चाहते कि जाति प्रथा कभी भी समाप्त हो।

1) राजनीतिज्ञ – क्योंकि वह उनके लिए उपयोगी है

मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि राजनीतिज्ञ और सरकारें कभी भी मेरे विचारों को अमल में लाना नहीं चाहेंगी। क्योंकि ऐसा करने से कई राजनीतिज्ञों का वह आधार ही नष्ट हो जाएगा जिस पर पैर जमाकर वे लोकसभाओं और विधानसभाओं की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। अपने इलाकों में वे इसलिए नहीं जीतते कि उनकी विचारधारा या देश के लिए उनकी योजनाएं लोगों को रास आती है बल्कि इसलिए कि वे उसी जाति के हैं जिसका उस इलाके में बहुमत है। राजनीतिज्ञ जानते हैं कि लोग और विशेषकर अनपढ़ जनता इसी आधार पर वोट देती हैं, और वे उनके वोट खोना नहीं चाहते। अगर वे जाति को ध्यान में रखकर चुनाव न लड़ें तो जीतने के लिए उन्हें अधिक मेहनत करना होगी, लोगों की भलाई के लिए कुछ करके दिखाना होगा। तो, भले ही राजनीतिज्ञ स्वयं न मानते हों कि जाति प्रथा ईश्वर की मर्ज़ी से कायम है, मगर वे अपने मतलब के लिए उसका दोहन करने से नहीं चूकते।

2) ऊंची जातियाँ – क्योंकि वे ईमानदारी से जाति प्रथा पर विश्वास करते हैं या वे उससे प्राप्त सुविधाओं को खोना नहीं चाहते

जाति प्रथा की समाप्ति न चाहने वाला जो दूसरा समूह है वह बिल्कुल सुस्पष्ट है: ऊंची जातियों में शामिल लोग जो जाति प्रथा में अटूट विश्वास करते हैं। स्वाभाविक ही ये ब्राह्मण हैं, इस प्रथा की संरचना में सबसे ऊपर बैठे लोग। मगर वे अकेले नहीं हैं; दूसरे ऊंची जातियों वाले भी हैं। इसे आजकल की भाषा में 'ब्राह्मणवादी मानसिकता' कहा जाता है क्योंकि आज कई ब्राह्मण हैं जो जाति प्रथा में विश्वास नहीं करते और कई दूसरी जातियों वाले हैं जो इसे पूरी तरह बरकरार रखना चाहते हैं।

यह बड़ी अजीब बात है कि आज भी ऐसे लोग हैं जो वास्तव में समझते हैं कि जाति प्रथा एक जायज़ व्यवस्था है, कि उसे बना रहना चाहिए और यह भी कि दरअसल वह कभी समाप्त न होने वाली अटल व्यवस्था है। कुछ लोग दूसरों के लिए अछूत बने रहें, यह हरि-इच्छा है, ईश्वरीय आदेश है। वे पूरी गंभीरता के साथ ऐसा विश्वास करते हैं।

हो सकता है कि ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले दूसरे लोग इस बात पर पूरा विश्वास न करते हों। वे यह नहीं मानते कि ईश्वर ऐसा चाहता है मगर वे इस व्यवस्था में मिली अपनी हैसियत को बरकरार रखना चाहते हैं। इसमें उनका लाभ है और वे उसे लागू रखना चाहते हैं। वे जाति प्रथा में ईमानदारी से विश्वास रखने वाले लोग नहीं हैं, सिर्फ अपने मतलब और लाभ के लिए इस बुरी व्यवस्था से चिपके हुए हैं।

3) निचली जातियाँ – जाति अभिमान और प्रताड़ित मनोभावना वश

फिर वह वर्ग है जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते कि वह भी जाति प्रथा का समर्थक हो सकता है। वे हैं निचली जातियों और सबसे नीची जाति में शामिल लोग। जी हाँ, निचली जातियों में भी ऐसे लोग पाए जाते हैं जिनकी कोई रुचि नहीं होती कि जाति प्रथा समाप्त की जानी चाहिए।

इसे समझने के लिए आपको इस बात पर गौर करना होगा कि हर जाति अपने समूह पर एक तरह का गर्व महसूस करती है। यहाँ तक कि नीचतम जातियों ने, अछूतों ने भी अपने मन में अपनी जाति के लिए एक तरह के स्वाभिमान की भावना विकसित कर ली है। यह मानवीय मनोवृत्ति है। वे एक जाति में अपने आपको शामिल करके सुरक्षित महसूस करते हैं, वह उनकी पहचान बन जाती है और वे अपने लोगों के साथ, अपने समाज के साथ एकात्म होकर गर्व का अनुभव करते हैं। जाति प्रथा की समाप्ति उनके लिए अपने अस्तित्व के एक हिस्से को खोने जैसा होगा। यह एक तरह की भ्रांति, मरीचिका है मगर उनके लिए यही यथार्थ भी है।

निचली जातियों के जाति प्रथा की समाप्ति का विरोधी होने का दूसरा और शायद सबसे बड़ा कारण यह है कि वे पीड़ित महसूस करने में आनंद का अनुभव करने लगे हैं। मैंने पहले भी ऐसे लोगों के बारे में लिखा है जिनके लिए पीड़ा ही आनंद का कारण बन जाती है और बहुत से निचली जातियों के लोग इसी श्रेणी में आते हैं। वे न्याय न मिलने की शिकायत करेंगे, अपना दुखड़ा रोते रहेंगे, अधिक पाने की याचना करेंगे लेकिन अंततः अपनी हालत को बदलने में कोई रुचि नहीं लेंगे। कैसी विडंबना है कि ऐसी हालत में भी वे भेदभाव बर्दाश्त करने के लिए तैयार होते हैं मगर इतना साहस नहीं जुटा पाते कि इस दुरावस्था से बाहर निकलने की कोशिश करें।

तो आपने देखा कि एक तरफ पता नहीं कितने कर्मठ सुधारक, मेरे जैसे कितने लोग हैं, जो जाति प्रथा से इतनी घृणा करते हैं और उसे हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ अनगिनत ऐसे लोग भी हैं जो सोचना भी नहीं चाहते कि ऐसा किया जा सकता है। जब तक ऐसी हालत है, जब तक राजनीतिज्ञ और ब्राह्मण सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं, जब तक लोग मूर्खतावश या अज्ञान के चलते यह विश्वास करते हैं कि ऐसा ही चलता रहेगा और यही ईश्वर की मर्ज़ी है और जब तक निचली जातियों के लोग प्रताड़ित होना नहीं छोड़ते तब तक जाति प्रथा बरकरार रहेगी। परिवर्तन समाज के भीतर से आएगा। मैं उसके लिए बिल्कुल तैयार हूँ, क्या आप भी हैं?

गांधी को भूले अन्ना – अन्ना हजारे ने किया शराबियों को पीटने का समर्थन – 28 नवम्बर 11

अन्ना को आधुनिक महात्मा गांधी कहा जाता है। उनमें गांधी की छवि देखी जाती है। रामलीला मैदान में हुए अनशन के दौरान मंच पर लगी महात्मा गांधी की भव्य प्रतीमा इस बात की साक्षी है। पर गांधीवादी अन्ना के विचारों में द्वंद देखा गया। उन्होंने नशे के आदी लोगों को पीटने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि उनके गाँव में शराबियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता था।

अन्ना हजारे ने कहा कि नशे के आदी लोगों को तीन बार चेतावनी देनी चाहिए कि, ये उनकी सेहत के लिए अच्छी नहीं है। अगर वो नहीं छोड़ता, तो उसे मंदिर में ले जाकर भगवान की कसम दिलानी चाहिए कि आज के बाद वो शराब को हाथ भी नहीं लगाएगा। इस पर भी वो न माने, तो सार्वजनिक स्थान पर एक खंभे से बांधकर उसकी पिटाई की जानी चाहिए।

ये वही शख्स है जिनमें लोगों ने अहिंसावादी महात्मा गाँधी की छवि देखी थी। यह शराबियों के लिए हिंसा की बात कर रहे हैं। कांग्रेस और बीजेपी अभी तक कह रहे थे कि हम अन्ना के खिलाफ नहीं हैं। अन्ना के इस बयान के बाद कह रहे हैं कि हम लोगों के साथ हिंसा का समर्थन नहीं करते। जो लोग अभी तक अन्ना हजारे के अभियान से डरे हुए थे, अब उन्हें एक अच्छा मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि ये तालिबानी तरीका है। अगर इस तरीके को लागू किया गया तो आधा केरला, तीन चौथाई आंध्र प्रदेश और लगभग चौथे-पाँचवें पँजाब के भाग को पीटा जाएगा। मेरा मानना है अन्ना को गाँधी के रूप में देखने की छवि अब पूरी तरह धूमिल हो गई है।

मैं अपने लेखन के माध्यम से लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई में शामिल था। मैंने अन्ना को पत्र लिखा। मनमोहन सिंह को पत्र लिखा और लोगों से अपील की कि अन्ना को न रोके। हमें आज भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर चलना है। हालांकि मैंने शुरु से ही कहा है कि किसी इंसान को पूजना ठीक नहीं है, भ्रष्टाचार को समाप्त करने पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। यहां गौर करने वाली बात है कि अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए थे। मैंने उनमें अहम भी देखा। मीडिया भी मुद्दे पर ध्यान देने के बजाय अन्ना हजारे पर ध्यान दे रही थी। मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई के साथ था न कि किसी व्यक्ति के साथ। मैं उनके बयान का समर्थन नहीं करता।

उन्होंने उन सभी लोगों को निराश किया है जो उनको धर्मात्मा मानने लगे थे। अगर आप व्यक्ति से धर्मात्मा के रूप में कार्य की अपेक्षा करेंगे तो आप निराश ही होंगे। उन्होंने वही कहा है जो वो सोचते हैं। बेशक उन्होंने राजघाट पर बैठकर ध्यान किया था, लोग उनकी तुलना महात्मा गाँधी से करने लगे थे। क्या आपको लगता है कि महात्मा गाँधी कभी शराबी को पीटने के पक्ष में होते? शराबी वैसे ही कमजोर होते हैं। उनकी लत की वजह से उनको पीटकर या समाज में डराकर प्रताड़ित करने से समस्या का हल नहीं निकलेगा। आपको ये समझना होगा कि वो कैसे इसका आदी हुआ। आप उसकी समस्या समझ जांएगे तो उसके लिए कुछ कर भी सकते हैं। जबकि हिंसा इस मामले में कोई सहायता नहीं कर सकती। जो लोग नशा छोड़ना चाहते हैं उन्हें अन्ना ने ध्यान करने को कहा होता तो अच्छा होता।

एक ओर अन्ना ने राष्ट्रीय समस्याओं और उनके हल के बारे में बात की तो दूसरी ओर नशे के आदी लोगों के लिए हिंसा का समर्थन किया। गाँव में समस्याओं से निपटने का यही तरीका रहा है। गाँव की अदालत में कुछ गिने-चुने लोग सजा सुना देते हैं। इन सजाओं में ज्यादातर पीटना शामिल होता है। आधुनिक समय में यह तरीका ठीक नहीं बैठता। अन्ना ने इस बयान के बाद अपनी प्रतिष्ठा खो दी है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जाने वाली जंग अब समाप्त हो गई है। क्योंकि ये अन्ना हजारे की बात नहीं थी। लोग और मीडिया उन्हें मुक्तिदाता के रूप में देखे इससे भी फर्क नहीं पड़ता। मुद्दा है भ्रष्टाचार, लोगों में क्षमता है कि वो एकजुट होकर फिर से उठें और इसे जड़ से समाप्त कर दें।