हाँ, मुझे सेक्स, पैसा, भौतिक पदार्थ और मेरी पत्नी पसंद हैं और मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है! 19 नवंबर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक ऐसा मेहमान आया, दुनिया के बारे में जिसका बहुत कट्टर नज़रिया था। कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो, आप कुछ भी कहें या करें, आपको नीचा दिखाने की चाह रखते हैं। यह व्यक्ति उसी तरह का व्यक्ति था- और आज मैं उसी व्यक्ति को ऐसे व्यवहार का उदाहरण बनाना चाहता हूँ।

यह व्यक्ति अपने आप को कम्युनिस्ट विचारधारा का नास्तिक कहता था। वह हमेशा बातचीत के लिए सन्नद्ध रहता था-जो अक्सर दूसरों को नीचा दिखाने की कवायत में बदल जाती थी। इसी तरह जब एक बार हम आश्रम में टहल रहे थे तो उसने मेरे कपड़ों के बारे में पूछा। निश्चय ही, यह पहला मौका नहीं था जब किसी ने मुझसे मेरे कपड़ों के बारे में पूछा था। दरअसल यह अक्सर होता है लेकिन इस बार प्रश्न के स्वर में एक प्रकार का आरोप नज़र आता था: अगर मैं खुद को नास्तिक कहता हूँ तो ऐसे कपड़े क्यों पहनता हूँ जिससे कोई अन्य धारणा बनती है?

अपने ब्लॉगों में पहले ही मैं स्पष्ट कर चुका हूँ कि अपने कपड़ों से मैं कोई सन्देश नहीं दे रहा हूँ। जैसे भी हों, मुझे यही कपड़े पसंद हैं और दूसरी तरह के कपड़े मैं नहीं पहनना चाहता।

अपने प्रश्न के इस उत्तर पर उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया: आपको अपने कपड़े पसंद हैं? यानी आपको भौतिक वस्तुएँ पसंद हैं?

जी हाँ, पसंद हैं! मुझे बहुत से साज़ो-सामान पसंद हैं और पैसा कमाना भी पसंद है। मुझे अपने काम से प्यार है और मैं अपनी पत्नी और बेटी से भी प्यार करता हूँ! मैं किसी तरह की धार्मिक जड़ता से या ऐसे किसी अन्य दर्शन से बंधा हुआ नहीं हूँ, जो मुझे सलाह दे कि यह पहनो और वह न पहनो! मैं किसी दूसरे व्यक्ति के विचारों को इजाज़त नहीं देता कि वे मेरी भावनाओं को निर्देशित करने लगें!

बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भौतिक वस्तुओं से अलिप्तता ही सही रास्ता है। बहुत से लोग ब्रह्मचर्य पर विश्वास करते हैं और भावनाओं के प्रति अलिप्तता को भी उचित मानते हैं। भारत में ऐसे लोग अधिकतर धार्मिक साधू होते हैं। पश्चिम में भी ऐसे लोग अध्यात्मवादियों में पाए जाते हैं। वे अधार्मिक हो सकते हैं लेकिन फिर भी उनकी कोई न कोई विचारधारा होती है और साथ ही यह विचार कि आपको क्या प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

ये सारे लोग मानते हैं कि हमें अपने कपड़ों से लगाव नहीं होना चाहिए, पैसे से प्यार नहीं होना चाहिए और हमें अपने करीबी लोगों से अलिप्त रहना चाहिए। उन्हें जो मानना है, मानते रहें लेकिन मैं अपने जीवन का पूरा मज़ा लेना चाहता हूँ! मैं मानता हूँ कि जीवन का आनंद न लेना गलत है इसलिए मुझे अपने वस्त्र पसंद हैं और मैं अपने काम से प्रेम करता हूँ। जैसे मुझे गरीब बच्चों की मदद करना अच्छा लगता है, उसी तरह पैसे कमाना भी बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी बेटी से और पत्नी से प्यार करता हूँ, मुझे सेक्स बहुत पसंद है और मुझे हर तरह की आरामदेह सुविधाओं का उपभोग भी बहुत पसंद है। मैं छुट्टियाँ मनाना पसंद करता हूँ-जैसा कि मैं इस समय जर्मनी में अपने परिवार और बहुत सारे दोस्तों के साथ कर रहा हूँ!

मुझे जीवन का आनंद लेना पसंद है। मुझे जीवन से प्यार है और मानता हूँ कि हम सब को जीवन का हरसंभव अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करना चाहिए। यदि आप कोई इतर विचार रखते हैं, तो बेशक अपने विचार के साथ खुश रहें और उसी के अनुसार जीवन बिताएँ-मुझे अपने विचारों के लिए नीचा दिखाने की कोशिश न करें। इसमें आपको सफलता नहीं मिलेगी और आप बेकार ही मेरा और खुद अपना समय बरबाद करेंगे। मैं आपको सहमत करने की कभी कोशिश नहीं करूँगा। मैं सिर्फ एक सलाह दूँगा: सिर्फ एक बार मेरी तरह जीवन का आनंद लेने और उससे प्यार करने की कोशिश करके देखिए। आप पछताएँगे नहीं!

आश्रम आने के विषय में पूछताछ का एक उदाहरण, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया – 5 नवंबर 2015

कुछ लोगों ने यह जानने में रुचि दिखाई है कि जब हम लोगों को आश्रम न आने के लिए प्रेरित करने की कोशिश करते हैं तो ठीक-ठीक क्या करते हैं। मैं आपके सम्मुख धार्मिक उद्देश्य से वृंदावन आने की इच्छुक एक महिला के साथ हाल ही में हुए वार्तालाप का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

दरअसल ज़्यादातर हम इसी कारण ‘नहीं’ कहते हैं। वैसे आजकल इस बारे में पूछताछ पहले से बहुत कम हो गई है क्योंकि हमने अपनी वेबसाइट पर ही इन बातों को साफ-साफ लिख रखा है। लेकिन फिर भी कभी-कभार हमें ऐसे ईमेल मिल ही जाते हैं और उन्हीं का एक उदाहरण नीचे दे रहा हूँ।

पूछताछ करते हुए उसने हमें ईमेल भेजा जिसमें ‘यहाँ आने का कारण’ लिखा था:

वृंदावन की यात्रा करना सदा से मेरा सपना था। मुझे आशा है कि ईश्वर की कृपा से मैं यह यात्रा कर सकूँगी। आश्रम आकर और कुछ दिन वहाँ आश्रम का जीवन बिताकर मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। मैं वहाँ के मंदिरों में भगवान के दर्शन करना चाहती हूँ, हरिनाम जपना चाहती हूँ और परिक्रमा करना चाहती हूँ।

उसका इतना भर बताना हमारे लिए पर्याप्त था कि हमारी पटरी नहीं बैठ पाएगी। इसलिए हमने उसे यह जवाब भेजा:

आश्रम आने की इच्छा प्रकट करने के लिए हम आपका शुक्रिया अदा करते हैं। हमें आपकी पूरी जानकारी प्राप्त हो गई है।

दुर्भाग्य से हमें नहीं लगता कि हमारा आश्रम आपके निवास के लिए उपयुक्त स्थान होगा। हम अधार्मिक और नास्तिक लोग हैं और ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते।

हमारे यहाँ किसी तरह का कोई धार्मिक समारोह नहीं होता और न ही पूजा-पाठ इत्यादि की कोई व्यवस्था है।

हमे पूरा विश्वास है कि वृंदावन में आपको कई दूसरे स्थान मिल जाएँगे जहाँ आप प्रसन्नतापूर्वक रह सकेंगी क्योंकि वे अपने यहाँ आध्यात्मिक वातावरण और दूसरे धार्मिक व्यक्तियों का साथ सुनिश्चित करते हैं।

क्योंकि हम नास्तिक हैं, ईश्वर को नहीं मानते, हमें लगता है कि आप वास्तव में हमारे यहाँ उपलब्ध वातावरण में प्रसन्न नहीं रह सकेंगी। हमारा अनुभव है कि धार्मिक कारणों से वृंदावन आने वाले लोग हमारे यहाँ आकर प्रसन्न नहीं होते और हमारे दूसरे मेहमानों को अपने दृष्टिकोण से प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। उन्हें धार्मिक चर्चा आदि में ज़्यादा रुचि होती है और हमारे यहाँ चर्चा का विषय अक्सर इसके विपरीत होता है। हमारे विचार में यह स्थिति दोनों पक्षों के लिए सुविधाजनक नहीं होगी।

बहुत सादा और स्पष्ट लेकिन इसके बाद भी इतना नम्र और संजीदा कि किसी को बुरा न लगे। तो इस तरह की पूछताछ पर हम उपरोक्त आशय का जवाब लिखने की कोशिश करते हैं।

धर्म, सेक्स, ईश्वर और आपके पूर्वजों के बीच क्या संबंध है? 13 अक्टूबर 2015

आज से नवरात्रि की शुरुआत है, जो हिंदुओं का एक पवित्र त्योहार है और कई दिनों तक चलता है। यह बताने के स्थान पर कि इन नौ दिनों में हिन्दू क्या करते हैं, मैं आज आपको बताऊँगा कि वे क्या नहीं करते: सेक्स। जी हाँ, और इसे 15 दिन और खींचकर लंबा कर दिया जाता है, जो दोनों मिलाकर 24 दिन हो जाते हैं और माना जाता है कि अच्छे, आस्थावान हिन्दू इन 24 दिनों में संभोग नहीं करते। गजब!

असल में इस बात का एहसास मुझे हाल ही में एक मित्र के साथ बातचीत के दौरान हुआ। वह उच्च जाति का धार्मिक व्यक्ति है और हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों का सख्ती के साथ पालन करता है। बातचीत के दौरान उसने बताया कि दो हफ्तों से उसने सम्भोग नहीं किया है। अपने जीवन में वार्षिक श्राद्ध के इन दो हफ़्तों के दौरान उसने कभी सेक्स नहीं किया। तभी मुझे आगामी त्योहारों में होने वाले जश्न का खयाल आया और मैंने पूछा, ‘तब तो नवरात्रि के अगले दस दिन भी तुम सम्भोग नहीं करोगे?’ उसने कहा कि नही, बिल्कुल नहीं-नवरात्रि के दिन तो बहुत पवित्र होते हैं, सम्भोग का सवाल ही नहीं उठता!

न जाने कितने हिन्दू यह पढ़कर मुझे भला-बुरा कहेंगे-नवरात्रि का पहला दिन है और इसे चर्चा के लिए यही विषय मिला!

पिछले 15 दिन का समय हर साल वह समय होता है जब हिन्दू अपने पूर्वजों को याद करते हैं। इन दिनों में वे अपने मृत पूर्वजों के लिए कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। वे मानते हैं कि इस समय उनके मृतक रिश्तेदार उनके करीब होते हैं। इन दिनों में वे कोई नया या शुभ कार्य शुरू नहीं करते क्योंकि वे मानते हैं कि यह समय अशुभ है और इसलिए उस काम में व्यवधान उपस्थित होंगे। इस समय आप जो भी करें, उसे अपने पुरखों के विचार के साथ करें। सेक्स करना उनके प्रति असम्मान होगा, उनकी अवज्ञा मानी जाएगी और ऐसा करके आप अपने माता-पिता, दादा-दादी और दूसरे पूर्वजों का अपमान कर रहे होंगे!

लेकिन आज और आने वाले नौ दिनों की बात बिल्कुल दूसरी है। नवरात्रि का समय शुभ समय है और आम हिन्दू इन दिनों में बहुत से समारोह आयोजित करते हैं, नए काम शुरू करते हैं और मानते हैं कि ईश्वर का आशीर्वाद इन कार्यों के साथ होगा और उनका परिणाम अच्छा और शुभ होगा! और वे सेक्स करके उसकी पवित्र, लाभदायक ऊर्जा को नष्ट नहीं करना चाहेंगे!

जी नहीं, सेक्स एक पाप की तरह है, वह किसी शुभ काम को खराब कर सकता है, जो भी अच्छा काम आप शुरू करना चाहते हैं, उसमें वह व्यवधान उपस्थित कर सकता है! यहाँ, भारत में सेक्स बहुत खराब और अपवित्र काम माना जाता है! आप सोच सकते हैं कि अगर आपके मन में सेक्स को लेकर ऐसी भावनाएँ हैं तो आप सेक्स करते हुए खुद को कितना अपराधी महसूस करेंगे! धर्म के अनुसार भारत में सिर्फ वंशवृद्धि हेतु सेक्स की मान्यता है और अगर आपका उद्देश्य बच्चे पैदा करना नहीं बल्कि प्रेम के वशीभूत अपनी और अपने साथी की शारीरिक क्षुधा शांत करना है तो निश्चित ही वह सर्वथा अनुचित है!

उसके करीब आना, जिसे आप प्रेम करते हैं, उससे लिपटना, चूमना, आनंद लेना और सबसे बढ़कर, अपनी शारीरिक इच्छाओं को संतुष्ट करना आदि हर तरह से बुरा और अनुचित माना जाता है। यहाँ तक कि वे लोग भी, जो सामान्य रूप से सोचने-समझने वाले हैं और समझते हैं कि सेक्स में कोई बुराई नहीं है, सेक्स को लेकर जड़ जमाए बैठी नकारात्मक भावनाओं के चलते सामान्य दिनों में भी अपने साथी के साथ सोते हुए अपराधी महसूस करते हैं। इन पवित्र दिनों में वे सेक्स के बारे में क्या सोचते होंगे, आप कल्पना कर सकते हैं! और यह इन नौ दिनों की ही बात नहीं है, साल भर में यहाँ त्योहारों के इतने सारे शुभ दिन हैं जब-उन लोगों के लिए, जो सेक्स को पाप मानते हैं-प्रेम का यह समारोह वर्जित है।

लेकिन यह इतना गलत विचार है कि मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अपना विरोध ठीक तरह से कैसे व्यक्त करूँ! इस धरती पर मौजूद सबसे शानदार चीज़, प्रेम के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा शारीरिक मिलन, दो शरीरों का पिघलकर एक हो जाना, प्रेम के चलते होने वाली वह इंद्रियजन्य अनुभूति, वह भावना आदि, इन सभी को धर्म ने आसुरी करार दे दिया है। इन सीमाओं से हमें बाहर निकलना होगा-अपने व्यवहार के धरातल पर ही नहीं, बल्कि अपने दिलो-दिमाग से भी इन गलत विचारों को निकाल बाहर करना होगा!

प्रेम और उसकी अभिव्यक्ति गलत नहीं है बल्कि बहुत सुंदर है!

भारत में सामाजिक परिस्थिति लगातार बेहद शर्मनाक, शोचनीय और पीड़ादायक हो चली है – 7 अक्टूबर 2015

आम तौर पर मैं अपने ब्लॉग में राजनीति पर नहीं लिखता। उसके लिए मैं सोशल मीडिया का उपयोग करता हूँ लेकिन क्योंकि भारत में सामाजिक परिस्थितियाँ तेज़ी के साथ बिगड़ती जा रही हैं और अब यह विषय लगातार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा रहा है, अगर आप इजाज़त दें तो आज मैं भी अपना खेद और प्रतिरोध दर्ज कराना चाहूँगा।

हाल ही में भारत में हुई एक घटना दुनिया भर के बड़े समाचार-पत्रों की मुख्य खबर बनी। संभव है, आपने भी इसके विषय में सुना हो। एक गाँव के हिन्दू मंदिर में वहाँ के पुजारी ने भारत की सत्ताधारी पार्टी के एक नेता के बेटे ने उससे जो कहा था, जस की तस उसकी घोषणा कर दी। वास्तव में वह महज एक अफवाह थी कि गाँव के एक मुस्लिम परिवार ने गाय का मांस खाया है। यह सुनते ही भीड़ जुट गई और उसने उस परिवार के घर की दिशा में कूच कर दिया, परिवार के पिता और उसके बेटे को घर से बाहर निकालकर उस पर ईटों से हमला किया। हमला इतना जोरदार था कि पिता की मृत्यु हो गई और बेटे को घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जो इस बुरी तरह से घायल हुआ है कि उसकी जान जा सकती है। फिलहाल वह मौत से संघर्ष कर रहा है। जाँच से पता चला है कि उन्होंने गाय का मांस नहीं बल्कि बकरे का मांस खाया था-लेकिन इससे बच्चों का पिता और उनकी माँ का पति वापस नहीं आ सकते!

यह घटना स्वयं में बेहद घृणास्पद थी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने ठीक ही उसे अपने पृष्ठों में प्रमुखता से जगह दी लेकिन उससे भी भयावह सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सदस्यों की प्रतिक्रिया रही! अफवाह फैलाने वाले बीजेपी के नेता के बेटे तथा कुछ और लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन उनकी पार्टी के नेता उस लड़के के व्यवहार को नज़रअंदाज़ करते हुए तरह-तरह के बहाने बना रहे हैं। उनका कहना है कि वे सब भोले-भाले बच्चे हैं, और उत्साह में यह सब कर बैठे हैं! वे हत्या के आरोप में हुई उनकी गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे हैं!

लेकिन साथ ही वे उनके इस कृत्य पर खुले आम यह कहकर मुहर भी लगा रहे हैं कि जो भी गाय का मांस खाए, उसे यही सज़ा मिलनी चाहिए! हमारे देश की सत्ताधारी पार्टी के एक लोकसभा सदस्य ने कहा कि गाय हमारी माँ है और अगर आपने हमारी माँ की हत्या की है तो आपकी हत्या भी जायज़ है! ये लोग सिर्फ गाय का मांस खाने पर किसी की भी हत्या करने पर उतारू हैं!

निश्चित ही ये सभी राजनैतिक नेता पाखंडी हैं! देश के सबसे महंगे रेस्तराँ गाय का मांस बेचते हैं, देश के कई प्रांतों में, वहाँ की स्थानीय जनता के लिए गाय का मांस एक सामान्य भोजन है। इन सब तथ्यों से उन्हें कोई परेशानी नहीं है! लेकिन वे सामान्य, धार्मिक हिंदुओं की गाय के प्रति अत्यंत संवेदनशील भावनाओं का उपयोग जानबूझकर हिंसा फैलाने में कर रहे हैं, जिससे देश की जनता का ध्रुवीकरण हो जाए, वे दो गुटों में विभक्त हो जाएँ और इन नेताओं को अधिक से अधिक वोट मिल सकें!

जी हाँ, यह एक बहुत बड़ी साजिश है। एक और बीजेपी नेता ने प्रांतीय चुनावों से पहले कहा था, ‘अगर दंगे होते हैं तो हम चुनाव जीत जाएँगे’ और अतीत में यह बात सत्य सिद्ध हो चुकी है! राजनैतिक नेता विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच, विशेष रूप से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, हिंसक प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं और इस तरह उन्हें अलग-अलग गुटों में विभक्त कर देते हैं और इस तरह देश के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते हैं। इन दंगों में, निश्चित ही बहुत से लोग मारे जाएँगे। और अंत में उन्हें अधिकांश हिन्दू वोट प्राप्त होंगे और बहुमत मिल जाएगा। जो लोग अभी कुछ साल पहले तक दंगों के आरोपी थे, आज संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं! धर्म और जाति के आधार पर वोट प्राप्त करने और चुनाव जीतने की यह बड़ी आसान सी रणनीति है!

जो थोड़ी बहुत कसर रह गई थी, वह प्रधानमंत्री की चुप्पी ने पूरी कर दी है। उनकी पार्टी विकास का मुद्दा जनता के सामने रखती है लेकिन वह एक प्रहसन से अधिक कुछ भी नहीं है-विकास सिर्फ अमीरों का हो रहा है और वे दिन-ब-दिन और अमीर होते जा रहे हैं जब कि सामान्य गरीब जनता की आर्थिक स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा है! अगर वे धार्मिक हिन्दू नहीं हैं तो उनकी हालत खराब ही हुई है, बल्कि वे संकट में हैं। दुर्भाग्य से दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार होने के कारण अतिवादी और अतिराष्ट्रवादी हिन्दू सत्ता में आ गए हैं और न सिर्फ बहुत शक्तिशाली हो गए हैं बल्कि उन्हें इसके लिए पूरा राजनैतिक समर्थन भी मिलता है कि उन लोगों के विरुद्ध हिंसा भड़का सकें, जिनकी आस्थाएँ अलग हैं और जो उनके अनुसार नहीं सोचते।

इसी कारण जाने-माने तर्कवादियों, नास्तिक लेखकों की हत्या की जा चुकी है और धार्मिक चरमपंथियों ने बाकायदा एक सूची बना रखी है, जिसके अनुसार वे एक के बाद एक बुद्धिजीवियों, तर्कवादियों, धर्मविरोधियों या नास्तिकों को निशाना बनाने का विचार रखते हैं।

इस समय हमारा देश अत्यंत नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है और इसीलिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ कि इस बहुत संवेदनशील समय की एक झलक आपको दे सकूँ। कल मैंने आपको बताया था कि कैसे एक छोटा सा प्रयास भी मददगार साबित हो सकता है और बहुत से प्रख्यात लेखकों का भी यही विचार है। उन्होंने इसके इस आतंकवाद के प्रतिरोध में सरकार को अपने पुरस्कार वापस कर दिए हैं। हमें यह साबित करना होगा कि हम ऐसा भारत नहीं चाहते। यह एक खुला, सांस्कृतिक विविधतापूर्ण, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबके विचारों का सम्मान करने वाला भारत नहीं है, जिसका दावा करते हम नहीं थकते!

जीवन आपका है, निर्णय भी आपके होने चाहिए-आपको क्या करना है, इस पर धर्म के दबाव का प्रतिरोध कीजिए – 17 सितंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि धर्म विचार रखने और कोई धारणा बनाने की आपकी स्वतंत्रता का हनन करता है। वास्तव में धर्म आपको निर्देशित करना चाहता है कि आपको क्या करना चाहिए और दावा करता है कि ये निर्देश देने का उसे हक़ हासिल है। सारे धर्म दावा करते हैं कि वे जानते हैं कि मनुष्य को कैसा आचरण करना चाहिए। यहाँ तक कि वह अपने अनुयायियों को हत्या करने का निर्देश भी दे सकता है। और यही समस्या की जड़ है!

पहले जब मैं गुरु हुआ करता था तो लोग मुझसे वास्तव में अपेक्षा करते थे कि मैं उन्हें बताऊँ कि वे क्या करें। एक धर्मोपदेशक के रूप में, जिसका लोग अनुगमन करते हैं, यह भी मेरी एक भूमिका हुआ करती थी। लोग अपने प्रश्न या अपनी समस्याएँ लेकर मेरे पास आते थे और मैं भी अपने लिए यह उचित मानता था कि उन्हें बताऊँ कि उस विशेष परिस्थिति में वे ठीक-ठीक क्या करें। मैं भी उनके सामने अपने विचार रख देता था और जानता होता था कि वे वैसा ही करेंगे। अपने निर्णयों की पूरी ज़िम्मेदारी वे मुझे सौंप देते थे, जिनमें से कुछ तो जीवन के बड़े अहम निर्णय होते थे।

फिर मुझमें परिवर्तन आया। गुफा में रहने के बाद मुझे लगा कि मुझे यह सब नहीं चाहिए। मैं दूसरों से बड़ा नहीं बल्कि उनके बराबर होना चाहता था। इसका यह अर्थ भी था कि मैं दूसरों के निर्णयों की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहता था! सिर्फ मैं अपना जीवन जीना चाहता था। अपने अनुभवों और विचारों से अगर मैं किसी की मदद कर सकता था तो ऐसा करके खुश होता था लेकिन चाहता था कि वे अपने निर्णय स्वयं लें, अपनी भावनाओं पर विश्वास करें और सीखें कि उनके अनुसार किस तरह आगे बढ़ा जाए!

तो इस तरह मैं नास्तिक बन गया और आज यहाँ बैठकर सिर्फ अपने विचार लिखता हूँ। कोई भी पाठक उनके बारे में अपने तई सोचने के लिए और उनके आधार पर अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। अपने सलाह-सत्रों में मैं यह बात बिल्कुल स्पष्ट कर देता हूँ: मैं आपको सिर्फ अपना नज़रिया बता सकता हूँ लेकिन अपने निर्णय आपको खुद लेने होंगे और परिणामों ज़िम्मेदारी भी आपकी होगी!

लेकिन धर्म है ही इसलिए कि लोगों को बताए कि क्या सोचना है और क्या करना है। धर्म विभिन्न विचारों को सुनने और उन पर विचार करने में भरोसा नहीं करता। धर्म आपको यह स्वतंत्रता नहीं देता कि आप अपने लिए कोई अलग चुनाव कर सकें। धर्म आपको आदेश देता है कि यह करो।

धर्मगुरु विश्वास करते हैं कि उन्हें यह हक हासिल है और जहाँ तक इस्लामी रूढ़िवादियों का सवाल है, वे तो यह भी सिखाते हैं कि जो उनकी बातों का अनुसरण नहीं करते, उनकी हत्या करना जायज़ है! इस्लाम के धार्मिक नेता अपने अनुयायियों से कहते हैं कि अपनी कमर में बम लगाकर सैकड़ों की संख्या में दूसरे लोगों की जान लो और खुद इस्लाम की राह में शहीद हो जाओ।

कुछ लोग होते हैं जो चाहते हैं कि कोई उन्हें बताए कि उन्हें क्या करना चाहिए। वे ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते और अपने धर्म पर या उपदेशक, गुरु या किसी पर भी, जो उन्हें बता सके कि क्या करना चाहिए, अपने कामों की ज़िम्मेदारी डाल देते हैं।

कोई भी सोचने-समझने वाला व्यक्ति महज धर्म के लिए आतंकवादी, खुदकुश बमबार या हत्यारा नहीं बन सकता। वास्तव में यह धर्म का छल है जो उन्हें इस सीमा तक झाँसा देने में कामयाब होता है। ऐसी मनःस्थिति से, जहाँ वे अपने निर्णय खुद नहीं लेना चाहते से शुरू होकर वे वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ वे हर वह काम करने को तैयार हो जाते हैं, जिन्हें वे कभी नहीं करते अगर अपने निर्णय और उनकी ज़िम्मेदारी खुद ले रहे होते। दूसरों को नुकसान पहुँचाना, उनकी हत्या करना, दुनिया को शोक और संताप में झोंक देना!

मैं आपको सलाह देना चाहता हूँ कि अपने लिए सोचें। अपने जीवन की ज़िम्मेदारी लें और धर्म को इसकी इजाज़त न दें कि वह आपको बहला-फुसला सके, झाँसा दे सके और मजबूर कर सके कि आप वह सब करने के लिए तैयार हो जाएँ जो आप कभी नहीं करते, अगर अपने निर्णय खुद ले रहे होते।

जब चुनाव, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को धर्म सीमित करता है – 16 सितंबर 2015

कल इस्लाम के विषय में लिखते हुए मैंने आपके सामने स्पष्ट किया था कि कैसे मैं इस्लाम के प्रति पूर्वग्रह नहीं रखता। लिखते हुए मेरे मन में, धर्म की कौन सी बातें मुझे पसंद या नापसंद हैं, इस विषय में कुछ और विचार आ रहे हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि न तो मैं किसी से कहना चाहता हूँ कि उन्हें क्या सोचना चाहिए और न ही मैं पसंद करूँगा कि कोई मुझसे कहे कि मैं क्या सोचूँ। मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक स्वतंत्रता में विश्वास रखता हूँ और धर्म इस विषय में पूरी तरह भिन्न विचार को प्रश्रय देता है!

आप जानते हैं कि मैं एक नास्तिक व्यक्ति हूँ। मैं काफी समय तक धार्मिक रहा था और अब मैं उसे पूरी तरह छोड़ चुका हूँ- यहाँ तक कि अब मैं ईश्वर पर भी विश्वास नहीं रखता। लेकिन आपको एक बात बताऊँ? मुझे इससे कोई समस्या नहीं है कि आप किसी धर्म के अनुयायी हैं! आप जिसे चाहें, पूजते रहें, सप्ताह में एक, दो या तीन दिन मौन व्रत रखें, उपवास करें, कोई दूसरा काम न करें-सिर्फ बैठकर दस बार या सौ बार पूजापाठ करें, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे भी धर्म यही कहता है कि वह सिर्फ आपके लिए है, जिससे आप अपनी धार्मिक क्रियाओं को अपनी चार-दीवारी तक सीमित रख सकें! सिर्फ इतनी कृपा करें कि जिस पर आप विश्वास कर रहे हैं, मुझे उस पर विश्वास करने पर मजबूर न करें! इसके अलावा एक बात और: मुझे अपनी बात कहने से रोकने की कोशिश न करें!

मैं एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र का नागरिक हूँ, मेरा जनतंत्र पर प्रगाढ़ विश्वास है और, जैसा कि मैंने कहा, मेरा विचार है कि सभी को यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वे अपने विचार बिना किसी संकोच या डर के व्यक्त कर सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे बीच असहमति है, हमें आपस में किसी वाद-विवाद में पड़ने की ज़रूरत ही नहीं है! दुनिया भर में मेरे बहुत से मित्र हैं जो विभिन्न धर्मों को मानते हैं और इसके बावजूद कि उनकी आस्थाओं के बारे में मेरे विचार उनसे बहुत अलग हैं, मेरे उन सभी लोगों के साथ बहुत स्नेहपूर्ण संबंध हैं!

जब तक हम दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते या उन्हें परेशान नहीं करते, हम एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हुए, एक-दूसरे को मनपसंद चुनाव की, अपने विचार रखने की और उन्हें अभिव्यक्त करने की आज़ादी प्रदान करते हुए बड़े मज़े में एक साथ रह सकते हैं-लेकिन दुर्भाग्य से धर्म इसके आड़े आ जाता है और इस बात पर सहमत नहीं होता या इस सिद्धांत पर काम नहीं करता!

सिर्फ कुछ धर्मों के धर्मप्रचारकों के कामों पर नज़र दौड़ाने की ज़रूरत है। ये लोग दुनिया भर के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं और एक समय था जब सिर्फ ईसाई धर्मप्रचारकों का बोलबाला था और वही दुनिया भर में लोगों का धर्म-परिवर्तन किया करते थे और अगर वे स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन नहीं करते थे और बप्तिस्मा नहीं करवाते थे तो उनसे जबर्दस्ती ऐसा करवाते थे। लेकिन यह न समझें कि यह अब बंद हो गया है!

यहाँ, भारत में यह अभी भी हो रहा है। ईसाई, हिन्दू और मुस्लिम धर्म-प्रचारक इस काम में एक-दूसरे से होड़ ले रहे हैं! गरीब और सुविधाओं से महरूम लोग भोजन, छत और काम के लालच में उनके झाँसे में आ जाते हैं लेकिन सिर्फ एक शर्त पर: उन्हें धर्म-परिवर्तन करना होगा। बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने एक ही जीवन में कई बार धर्म-परिवर्तन किया है-क्योंकि वे ऐसा करने को मजबूर हैं! ज़िंदा रहने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ता है क्योंकि उन्हें बार-बार यह विकल्प उपलब्ध कराया जाता है। उनके लिए धर्म इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि उसके लिए जान दे दें!

इसीलिए संकटग्रस्त इलाकों के लोग आई एस के बारे में भी ऐसा ही महसूस कर सकते हैं, हालांकि इस्लाम इस मामले में और भी अधिक चरमपंथी है: उनका बाकायदा एक सोचा-समझा कार्यक्रम है- दूसरे धर्म को मानने वाले हर व्यक्ति का या तो धर्म-परिवर्तन करना होगा या उनकी हत्या कर दी जाएगी! यह एक असंभव कार्य है-अपने अंदर ठीक इन रूढ़िवादियों की तरह की आस्था पैदा करना असंभव है! आप कुछ भी कर लें, पूरी संभावना होगी कि आप बहुत जल्द उस वर्ग में शामिल हो जाएँ जिनकी हत्या कर दी गई।

और यही वह बिन्दु है जहाँ दूसरों के प्रति धर्म कतई सहिष्णु नज़र नहीं आता। इसके विपरीत, वह दूसरे धर्मावलम्बियों की हत्या करता है या उनका जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन करके उन्हें अपनी आस्था पर यकीन लाने को मजबूर करता है।

जी नहीं, मैं इसके बरक्स नास्तिकता और जनतंत्र को वरीयता दूँगा!

यह कहना कि इस्लाम शांति का धर्म नहीं है, क्यों इस्लाम के विरुद्ध पूर्वग्रह नहीं है – 15 सितंबर 2015

कल मैंने यूरोपियन सरकारों से अपील करते हुए अपने ब्लॉग में गुजारिश की थी कि धर्म को अपने पैर पसारने का मौका न दें और सिर्फ इसलिए कि मुसलमानों की संख्या बढ़ गई है, बड़ी संख्या में मस्जिदों की तामीर की इजाज़त न दें। शायद बहुत से लोग मेरे इस विचार से यह सोच सकते हैं कि मैं इस्लाम के विरुद्ध पूर्वग्रह से ग्रस्त हूँ। मैं उनके इस सोच का प्रतिवाद करते हुए इस पर थोड़ी चर्चा करना चाहता हूँ।

पहली बात तो यह कि मैं इस्लाम या मुसलमानों के विरुद्ध पूर्वग्रह नहीं रखता लेकिन कुछ समय पहले मैंने कहीं पढ़ा कि यह कह देना इस्लाम विरोधी चर्चा को रोक देने का सबसे अच्छा उपाय है-क्योंकि कोई भी भला व्यक्ति यह कहलाना पसंद नहीं करेगा! लेकिन मैं परस्पर संवाद बंद नहीं करूँगा क्योंकि मेरे विचार में यही वह बात है जो सबसे अधिक ज़रूरी है!

मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: जी हाँ, आतंकवाद का मुख्य कारण धर्म ही है। और इस्लाम शांति का धर्म नहीं है। हिंसा खुद उसमें मौजूद है!

कुरान की इन आयतों पर गौर करें:

जो लोग अल्लाह और उसके पैगंबर के विरुद्ध युद्ध छेड़ते हैं और पूरी शक्ति से उनके विरुद्ध काम करते हैं, उनकी सज़ा है: वध, या फाँसी देना या विपरीत हिस्से के हाथ और पैर काट दिया जाना या अपने भूभाग से निर्वासन: इस दुनिया में यही उनका अपयश है और मरणोपरांत जीवन में बहुत बुरी सज़ा उनका इंतज़ार कर रही है। 5:33

जैसे दूसरे हैं, उसी तरह ये भी धर्म का त्याग करना चाहते हैं, जिससे वे उनके बराबर हो जाएँ: लेकिन ऐसे लोगों को तब तक अपना दोस्त मत बनाओ जब तक वे अल्लाह की राह पर वापस न आ जाएँ (अर्थात जिस बात की मनाही की गई है उससे दूर न रहें)। लेकिन अगर वे फिर भी झूठे, मक्कार और विश्वासघाती बने रहते हैं, तो जहाँ भी वे मिलें, उन्हें गिरफ्तार करके उनका कत्ल करो; और किसी भी हालत में उनसे मित्रता न करो और न ही उनसे मदद लो। 4:89

जो लोग अल्लाह पर और आखिरत पर विश्वास नहीं रखते और न ही अल्लाह और उसके पैगंबर द्वारा वर्जित चीजों को वर्जित नहीं समझते और न ही इस सच्चे धर्म को मानते हैं तो (भले ही वे किताब में वर्णित लोग हों) उनसे तब तक युद्ध करो, जब तक कि वे हारकर और जलील होकर आत्मसमर्पण न कर दें और खुद होकर जज़िया देने के लिए मजबूर न हो जाएँ। 9:29

ये और दूसरी बहुत सी आयतें ही समाचारों में अक्सर दिखाई देने वाली भयानक हिंसा का मूल आधार हैं और जो हमें बुरी तरह डराती और चिंताग्रस्त कर देती हैं। इसी प्रकार इन आयतों से उद्भूत हिंसा ही मुसलामानों के प्रति हमारे मन में संदेह पैदा करती है, भले ही वे हमारे आसपास बिना किसी को नुकसान पहुँचाए शांतिपूर्वक जीवन गुज़ार रहे हों।

लेकिन वे उस पुस्तक पर विश्वास तो करते ही हैं, वे यही कहते हैं कि वह स्वयं ईश्वर के मुँह से निकले शब्द हैं और, मेरी जानकारी में, दूसरे किसी धर्म से अधिक इस बात का दावा भी करते हैं कि वह न सिर्फ पवित्रतम किताब है बल्कि उसके शब्द अटल और पूर्ण सत्य हैं।

और, मेरे शांतिप्रेमी मुसलमानों, यही समस्या है! आप यह दावा नहीं कर सकते कि इस पुरातन किताब का हर शब्द सही या उचित भी है और फिर यह कि इस्लाम शांति का धर्म भी है! आप उसी पुस्तक पर ईमान लाते हैं, जिस पर उन लोगों का भी यकीन है, जो इस धरती के विशाल हिस्से को आतंक के साए में लपेटे हुए है। स्वाभाविक ही, दूसरे सभी धर्मग्रंथों की तरह कुरान में भी कुछ अच्छी बातें भी दर्ज हैं! लेकिन बहुत सारी दकियानूसी, क्रूर, भयानक और अमानुषिक बातें भी लिखी हुई हैं, जिन पर मुसलामानों के लिए चलना अनिवार्य है।

ऐसी विषयवस्तु या पाठ दूसरे धर्मों के धर्मग्रंथों में भी मौजूद हैं लेकिन उनके धर्मावलंबी इस बात का दावा नहीं करते कि उनमें लिखी सारी बातें अटल और अंतिम सत्य हैं या यह कि अब भी वे ग्रंथ अप्रासंगिक नहीं हैं! वे अपने धर्मग्रंथों को समय के संदर्भ में देखते हैं, जैसा करने में इस्लाम असफल रहता है।

यहाँ हम किसी आयत की गलत व्याख्या नहीं कर रहे हैं, न ही हमारी समझ कोई चूक हुई है और न ही इसमें किसी अन्योक्ति, उपमा या अलंकार का हम कोई अनुचित अर्थ ले रहे हैं। सब कुछ स्पष्ट लिखा है। दरअसल इस ग्रंथ की विषयवस्तु उस समय की है जो समय बेहद कुरूप, क्रूर और रक्तरंजित रहा है। और जब तक आप इस किताब से चिपके रहेंगे, तब तक लोग उसे अक्षरशः ग्रहण करेंगे और दूसरे मतावलंबियों की गर्दन उतारने पर आमादा होते रहेंगे!

इसीलिए हमारे लिए यह आवश्यक हो जाता है कि इस धर्म को और अधिक फैलने से रोकें। ऐसी किसी काम की इजाज़त न दें, ऐसी कोई संस्था स्थापित करने की अनुमति न दें, जहाँ इस धर्म का प्रचार किया जाता हो, जिससे रूढ़िवादियों, कट्टरपंथियों और इस्लामी चरमपंथियों के प्रशिक्षण पर लगाम लगाई जा सके। और ऐसी जगहें मुख्य रूप से दुनिया भर में फैली मस्जिदें हैं, जहाँ ये धर्मग्रंथ अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाते हैं।

यह विचार इस्लाम के प्रति किसी पूर्वग्रह या दुर्भावना से उद्भूत नहीं है बल्कि इन धर्मग्रंथों से निकली एक सहज-सामान्य निष्पत्ति है और मैं जानता हूँ कि, आपके शांतिप्रेमी धर्म-भाइयों के लिए मन में हर तरह की शुभाकांक्षा होने के बावजूद, बहुत से दूसरे लोग भी इसी नतीजे पर पहुँचे हैं!

यूरोपियन सरकारों से अपील – शरणार्थियों की मदद करें लेकिन मजहब और मस्जिदों पर सख्त पाबंदी लगाएँ – 14 सितंबर 2015

दो सप्ताह पहले मैंने शरणार्थियों की हृदयविदारक परिस्थिति का वर्णन किया था और यूरोपियन देशों द्वारा दिल खोलकर किए जा रहे उनके स्वागत पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी। हफ्ते भर बाद, पहले भारतीय अखबारों में पढ़ा और उसके बाद जर्मन ऑनलाइन समाचारों में देखा कि इन शरणार्थियों के लिए सऊदी अरब ने जर्मनी में 200 मस्जिदें बनवाने का प्रस्ताव रखा है। उसी आलेख में यह भी ज़िक्र किया गया था कि जर्मनी में आई एस के समर्थक पहले ही उन शरणार्थियों के साथ घुलने-मिलने की कोशिश कर रहे हैं, जो वहाँ अकेले आए हैं। इस बिंदु पर मैं यूरोपियन सरकारों से, और विशेष रूप से जर्मन सरकार से एक गुजारिश करना चाहता हूँ: धर्म को पैर पसारने का मौका कतई न दें। यह उनके लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को यह थोड़ा अतिवादी या चरमपंथी विचार लग रहा होगा। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी तरह बहुत से लोग इस विषय में चिंतित हैं हालांकि कहने में कतराते हैं क्योंकि वे क्रूर नहीं लगना चाहते, वे नहीं चाहते कि उन्हें भी चरम-दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थक समझ लिया जाए, वे नहीं चाहते कि उन्हें भी जातिवादियों के साथ एक ही टोकरी में रख दिया जाए। लेकिन वे चिंतित हैं, क्योंकि आई एस के समर्थकों की संख्या बढ़ती जा रही है-और उनमें से बहुत से लोग वास्तव में यूरोप के नागरिक ही हैं!

ऐसे बच्चे भी हैं, जो यूरोपियन माता-पिता की संतानें हैं, यूरोपियन मूल्यों के अनुसार और अक्सर ईसाई मूल्यों के अनुसार जिनका लालन-पालन हुआ है, इस्लाम की ओर आकृष्ट हो जाते हैं, चरमपंथी विचार अपना लेते हैं और अंततः देश छोड़कर एक ऐसे धर्म और ईश्वर की खातिर जिहाद के लिए निकल पड़ते हैं जो खुद उनके अभिभावकों के लिए भी पराया है। वे सीरिया और दूसरे युद्धग्रस्त देशों से, ठीक आतंकवादियों के गढ़ों के बीचोबीच, हाथों में बम के गोले लिए वीडियो मैसेज भेजते हैं कि वे उन शहरों और देशों को उड़ा देंगे, जहाँ रहकर वे बड़े हुए हैं!

लड़कों और लड़कियों को भर्ती किया जाता है, जबरदस्ती उनका मतपरिवर्तन करवाया जाता है और भयंकर धर्मयुद्ध में झोंक दिया जाता है। यूरोपियन परिवारों के किशोरों को, जिनकी कोई इस्लामी पृष्ठभूमि नहीं रही है, युवक-युवतियों को, जो पूरी तरह यूरोपीय जीवन में घुले-मिले नज़र आते हैं लेकिन, स्वाभाविक ही उन इलाकों में रहते हैं, जहाँ इस्लाम के मानने वालों का विशाल बहुमत है और जहाँ उस देश की भाषा कोई नहीं बोलता, जहाँ वे रह रहे हैं। बाद में वे खुद ही इन जिहादियों की भर्ती करने वाले बन जाते हैं और अपने दोस्तों को भी अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश करते हैं।

हमें सतर्क रहना होगा कि यह आतंकवाद न फैले। यह धार्मिक आतंकवाद है, इसकी जड़ में धर्म है। मैं जानता हूँ कि ऐसे विचार रखने वाला मैं अकेला व्यक्ति नहीं हूँ। हमें हर इंसान की मदद करनी चाहिए, हर एक की जान बचाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए और यह संभव किया जाना चाहिए कि वे भी हमारे साथ मिल-जुलकर रह सकें-लेकिन हमें आतंकवाद के विस्तार के लिए ज़मीन मुहैया नहीं करानी चाहिए।

हम पहले ही इंग्लैंड के उन इलाकों के वीडिओज़ और फोटो देख चुके हैं, जहाँ इस्लाम के अनुयायी निवास करते हैं और अपने अलग नियमों का प्रचार करते हैं। इन इलाकों को वे देश के दूसरे इलाकों से काटकर रखने की कोशिश करते हैं जिससे अपना एक अलग क्षेत्र बनाकर वहाँ शरिया क़ानून लागू कर सकें। वे स्थानीय खुली संस्कृति को अपने अनुयायियों के लिए वर्जित करके अपने इलाके की महिलाओं पर दबाव डालते हैं कि उन्हें क्या पहनना चाहिए और कैसा व्यवहार करना चाहिए! मैं बिल्कुल नहीं चाहूँगा कि यूरोप के किसी इलाके में लोग शरिया क़ानून लागू करने का दावा करें!

आप जानते हैं कि सामान्य रूप से मैं धर्म का विरोधी हूँ और इसमें सभी धर्म शामिल हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि जर्मनी में ज़्यादातर लोग बहुत धार्मिक नहीं हैं और जो हैं भी, वे ईसाइयत में विश्वास रखते हैं-वह धर्म, जिसके अनुयायी हाल-फिलहाल में इस बात के लिए नहीं जाने जाते कि दल बनाकर किसी विस्फोटक सामूहिक हिंसा में शामिल होते हों!

और ऐसी स्थिति में सऊदी अरब का इन देशों में मस्जिदें बनवाने का प्रस्ताव अत्यंत विडंबनापूर्ण और गंदा मज़ाक लगता है! खुद उसने और दूसरे मुस्लिम देशों ने, जो इस संकटग्रस्त इलाके के काफी करीब हैं, एक भी शरणार्थी को अपने यहाँ शरण नहीं दी है, जब कि ये शरणार्थी उनके स्वधर्मी भी हैं! वे अपने देश में शरण देकर उनकी मदद नहीं कर सकते-लेकिन जर्मनी में उनके लिए 200 मस्जिदें बनवा सकते हैं!? यह अत्यंत हास्यास्पद है और जब कि मैंने समाचारों में पढ़ा है कि जर्मन राजनीतिज्ञ पहले ही इसका विरोध कर रहे हैं, मुझे पूरी आशा है कि जर्मन सरकार का आधिकारिक उत्तर भी वैसा ही दो टूक होगा!

मस्जिदें तामीर करने के लिए जगह उपलब्ध कराने के किसी भी प्रयास का मैं विरोधी हूँ। इन मस्जिदों में उनके धर्मग्रन्थ पढ़ाने वाले इस्लामिक स्कूल होंगे-और पढ़ाया जाने वाले पाठ्यक्रम पर किसी का कोई अंकुश नहीं हो सकता! पुलिस कार्यवाहियों में न जाने कितनी बार सामने आया है कि इन जगहों में आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों को छिपाया जाता है। आतंकवादी हमलों के बाद कितनी ही बार हमने सुना है कि इन मस्जिदों में रहकर और इन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते हुए उनका वास्तविक लक्ष्य उसी देश के विरुद्ध काम करना था, जहाँ के वे नागरिक हैं और उन्हीं लोगों को नुकसान पहुँचाना था, जिनके साथ वे रहते हैं।

लेकिन फिर भी यह अपील सरकार से है, उन लोगों से है, जो इस विषय में कुछ कर सकते हैं, जनता और देश की सुरक्षा संबंधी निर्णय लेते हैं। दूसरे सभी लोगों का, सामान्य जनता का कर्तव्य यही है कि इंसानियत के नाते इन शरणार्थियों की ज़्यादा से ज़्यादा मदद करें। इसलिए इन लोगों की हर संभव मदद करें, जहाँ भी, जैसे भी संभव हो, जितना भी आपसे बन सके। खुद इंसान बनें और दूसरों के साथ भी इंसानियत का व्यवहार करें।

सिर्फ इस बात का खयाल रखें कि मजहब को अपने पैर पसारने का मौका न मिले।

संथारा की मूर्खतापूर्ण परंपरा की वजह से आत्महत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता! 26 अगस्त 2015

सोमवार को मैं एक टी वी परिचर्चा के लिए बहुत लघु-सूचना पर दिल्ली गया था। चर्चा का विषय था, संथारा, जो जैन समुदाय की एक धार्मिक प्रथा है। पहले मैं आपको बताता हूँ कि ठीक-ठीक यह प्रथा है क्या और इस विषय पर अभी अचानक टी वी चर्चा क्यों आयोजित की गई और इस पर मेरा रुख क्या रहा, यह भी स्पष्ट करूँगा।

संथारा, जिसे सल्लेखना भी कहते हैं, जैन धर्म में आस्था रखने वालों की एक प्रथा है, जिसके अनुसार 75 साल से अधिक उम्र वाले लोग स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। जैन धर्म का कोई वृद्ध व्यक्ति यदि यह महसूस करता है कि जीने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है, अगर वह मुक्ति चाहता है, अगर उसे लगता है कि संसार को उसकी ज़रूरत नहीं है या स्वयं उसे संसार की ज़रूरत नहीं रह गई है तो वह व्यक्ति खाना-पीना छोड़ देता है। अब वह एक कौर भी मुँह में नहीं डालेगा, न ही एक घूँट पानी पीएगा। वह भूख और प्यास सहन करते हुए मौत को गले लगाएगा-और उसके सधर्मी नाते-रिश्तेदार और मित्र उसकी प्रशंसा करेंगे।

अतीत में इसी तरह से उनके संतों ने प्राण त्यागे थे और मरने के इसी तरीके को जैन धर्म गौरवान्वित करता है। लेकिन हाल ही में हाई कोर्ट ने इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी है क्योंकि कोर्ट उसे आत्महत्या मानता है।

स्वाभाविक ही, जैन समुदाय इससे नाराज़ है और न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने का विचार कर रहा है, जिससे इस पाबंदी को हटवाया जा सके। उनका कहना है कि कोर्ट या क़ानून प्राचीन समय से चली आ रही इस प्रथा और परंपरा को वर्जित घोषित नहीं कर सकते।

तो इस विषय पर मैं इन पाँच महानुभावों के साथ टी वी पर बहस कर रहा था। मैंने साफ शब्दों में कहा कि यह आत्महत्या के सिवा और कुछ नहीं है-और इसीलिए कोर्ट ने उस पर पाबंदी लगाई है! भारत में हर साल लगभग 200 लोग इस तरीके से खुद अपनी जान ले लेते हैं! अगर कोई भूख-हड़ताल पर बैठता है तो सरकार उसे मरने नहीं देती- बल्कि वह उसे ज़बरदस्ती खाना खिलाती है! और इधर आप खाना-पीना छोड़ देते हैं कि मर जाएँ-क्या फर्क है, दोनों में?

मेरी बात का ज़बरदस्त विरोध हुआ- यह कहते हुए कि यह आत्महत्या नहीं है बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाने वाला तप है। आत्मा जानती है कि उसका समय पूरा हो गया है और पुनर्जन्म के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी है।

मैंने उनके इस जवाब का खण्डन करते हुए कहा कि यह महज बकवास है और आत्मा या पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ नहीं होती। अगर आप उन्हें खुद की हत्या की इजाज़त देते हैं तो आपको सभी को आत्महत्या की इजाज़त देनी होगी। फिर ऐसा कानून बनाइए कि सभी अपनी मर्ज़ी से मृत्यु का वरण कर सकें- तब हर कोई, जब उसकी मरने की इच्छा होगी, अपनी हत्या का निर्णय ले सकेगा। लेकिन आप यह अधिकार सिर्फ अपने लिए रखना चाहते हैं क्योंकि दूसरों को इसकी इजाज़त ही नहीं है! और ऐसी मौत को आप गौरवान्वित कर रहे हैं, जिससे लोग उनका अनुसरण करने लगें! आप उन्हें आत्महत्या करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं!

उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज भी सदा से इस प्रथा का पालन करते रहे हैं। एक वकील ने, जो इस पाबंदी का विरोध कर रहे हैं, दावा किया कि यह आत्महत्या है ही नहीं क्योंकि आत्मा समय आने पर ही अपने शरीर का त्याग करेगी। इस तरह लोग बिना खाए-पिए महीनों और सालों पड़े रहते हैं। इसके अलावा युवकों को संथारा लेने के लिए नहीं कहा जाता, सिर्फ 75 साल से अधिक उम्र वाले ही संथारा ले सकते हैं।

मेरे विचार से यह कोई तर्क नहीं है कि 'हमारे पूर्वज यही किया करते थे'! इसका अर्थ यह नहीं है कि यह ठीक है और सिर्फ इसलिए कि अतीत में वे कोई गलत बात कर रहे थे इसलिए आपको भी वही करते चले जाना चाहिए! यही तर्क हिंदुओं की सती प्रथा के लिए भी दिया जाता था, जिसमें पति की चिता के साथ पत्नी भी आत्महत्या कर लेती थीं! जब तक उस पर पाबंदी नहीं लगी थी, वास्तव में उन्हें इस परंपरा का अनुपालन करने के लिए मजबूर किया जाता था यहाँ तक कि जबर्दस्ती मृत पति की चिता में झोंक दिया जाता था! तब भी बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया था- लेकिन आखिर किसी देश के क़ानून धर्म या परंपरा के अनुसार नहीं बनाए जा सकते!

आपका यह तर्क भी, कि संथारा सिर्फ वृद्ध व्यक्ति ही ले सकते हैं, एक बेहद कमजोर तर्क है! क्योंकि इस बात का निर्णय कौन करेगा कि कौन वृद्ध है और कौन वृद्ध नहीं है? यह दावा कौन कर सकता है कि वृद्ध लोग समाज के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं या उस पर बोझ बन गए हैं? आप उनके मन में यह विचार क्यों डालना चाहते हैं कि आप 75 साल के हो गए हैं इसलिए अब आपको मरना होगा? बहुत से राजनीतिज्ञ और दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अस्सी-अस्सी साल से ज़्यादा उम्र के हो चुके हैं और अपना काम भलीभाँति अंजाम दे रहे हैं! यह देखते हुए कि मेरी नानी मेरी बेटी के लिए कितनी मूल्यवान है, मैं इस मूर्खतापूर्ण परंपरा की खातिर उसे खोना नहीं चाहूँगा! वह इस समय 95 साल की है, शायद उससे भी अधिक- यानी इस तरह हम उसे 20 साल पहले ही खो चुके होते!

और मैं इस बात का जवाब भी देना पसंद नहीं करूँगा कि कोई व्यक्ति एक घूँट पानी पिए बगैर भी एक माह तक ज़िंदा रह सकता है- सालों जीवित रहने की बात तो छोड़ ही दीजिए! यह बकवास के सिवा कुछ नहीं है और मेरी नज़र में पाखंडियों का बहुत बड़ा कपटपूर्ण दावा है- आखिर धार्मिक धोखेबाज़ों का तो काम ही यही है!

मेरा विश्वास है कि यह पाबंदी बनी रहेगी और मेरे खयाल से यह अच्छा ही है कि आखिरकार यह प्रथा भी समाप्त हो जाएगी।

स्कूलों में बच्चों को ईश्वर और धर्म से क्यों प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए – 25 अगस्त 2015

यदि आपने कल का ब्लॉग पढ़ा है तो आपको पता चल गया होगा कि किस तरह हम बच्चों को समानता का पाठ पढ़ाते हैं और आजकल उनसे मिलकर विभिन्न विषयों पर चर्चा भी कर रहे हैं। स्वाभाविक ही कई विषयों में एक विषय नास्तिकता का भी होता है, या कहें कि हम उनके सामने प्रदर्शित करते हैं कि कैसे धर्म कई प्रकार से गलत बात करता है, यहाँ तक कि कई प्रकार से हमें हानि पहुँचाता है। इससे उन्हें एक नए नजरिए से परिचित होने का मौका मिलता है और जहाँ बहुत से स्कूल कई तरह से बच्चों को धार्मिक और पारंपरिक शिक्षा प्रदान करते हैं, मेरा मानना है कि धर्म का स्कूलों में कतई कोई स्थान नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से बहुत से शिक्षकों का नजरिया इससे बिल्कुल विपरीत होता है और बहुत सी पाठ्य पुस्तकें भी धार्मिक शिक्षा का समर्थन करती प्रतीत होती हैं!

पिछले साल हमने नोटिस किया कि हमारे स्कूल की कई पाठ्य पुस्तकों में कई बार ईश्वर का ज़िक्र आता है। विशेष रूप से 'नैतिक शिक्षा' या मॉरल साइंस नामक विषय की पुस्तकों में तो सब कुछ यही है कि क्या ईश्वर स्वीकार करेगा और क्या नहीं तथा क्या वह चाहता है कि आप करें या न करें। यही कारण रहा कि इस साल हमने अपना प्रकाशक ही बदल दिया है!

अब हमने उन्हीं पुस्तकों को रखा है जिनमें ईश्वर का ज़िक्र कम से कम आता है- और हमने अपने शिक्षकों से भी कह रखा है कि वे उन पाठों को को छोड़ दें। उदाहरण के लिए ‘हिन्दी’ विषय में एक और ‘अंग्रेज़ी’ में भी एक प्रार्थना है। आम तौर पर इन प्रार्थनाओं को विद्यार्थियों को कंठस्थ करने के लिए कहा जाता है और परीक्षाओं में उन्हें मौखिक सुनाने के लिए कहा जाता है। इसी तरह एक पाठ का एक पैरा पूरी तरह हटा दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि हमारे दिन का एक हिस्सा सिर्फ प्रार्थनाओं और पूजा-अर्चना में खर्च किया जाना चाहिए और यह भी कि अच्छे बच्चे रोज़ ईश्वर की प्रार्थना करते हैं।

मैं नहीं जानता कि ऐसी पुस्तकें भारत में उपलब्ध हैं या नहीं, जिनमें इन बातों का ज़िक्र नहीं होता। अगर मुझे शिक्षकों से पाठ्य पुस्तकों के कुछ भागों को न पढ़ाने के लिए न कहना पड़े तो मुझे अच्छा लगेगा! बल्कि अगर उनमें धार्मिक गुरुओं और बाबाओं और उनकी कारगुजारियों के विषय में आलोचनात्मक लेख या पाठ हो तो मुझे और खुशी होगी! यदि मेरा कोई नास्तिक मित्र प्राथमिक कक्षाओं के लिए उपयुक्त ऐसी पाठ्य पुस्तकों के बारे में जानता हो तो मुझे भी उनके बारे में जानकर प्रसन्नता होगी!

अपने बच्चों को मैं वे संभावनाएँ उपलब्ध कराना चाहता हूँ जो उन्हें अन्यथा तथा अन्यत्र उपलब्ध नहीं होतीं: पढ़ते-लिखते हुए और सीखते हुए किसी विषय का आलोचनात्मक दृष्टि से अध्ययन करना, प्रश्न पूछना, दिमाग खुला रखना और चीजों को बिना किसी धार्मिक पूर्वाग्रहों के जानने-समझने की कोशिश करना। दरअसल इन बच्चों के मस्तिष्क को आस्था और परंपरा के बादलों ने आच्छादित कर रखा है और मेरा विश्वास है कि एक न एक दिन ये काले बादल अवश्य छँटेंगे और वे अपने चारों ओर देख सकेंगे और अलग तरह से सोच-विचार कर सकेंगे।

तब वे यह समझ पाने में समर्थ हो सकेंगे कि ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है और आप बिना उसकी दैनिक पूजा-अर्चना किए भी एक अच्छे इंसान हो सकते हैं। वे इस बात को समझेंगे कि नैतिक व्यवहार सिर्फ धार्मिक लोगों की बपौती नहीं है! एक दिन ये बच्चे यह देखने में सक्षम होंगे कि अपनी प्रगति के लिए वे ईश्वर की मर्ज़ी पर निर्भर नहीं हैं।

मैं पहले ही आपको बता चुका हूँ कि हमारे रेस्तराँ की शुरुआत और उसके हमारे स्कूल को आर्थिक सहारा देने लायक हो जाने के बाद हम स्कूलों से जुड़े हुए और भी कई रेस्तराँ खोलने की योजना बना रहे हैं। ये स्कूल पूरी तरह मुफ्त होंगे- और वे भी इसी स्कूल की तरह बच्चों में शुरू से ही तर्कवाद को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य सामने रखकर ही खोले जाएंगे।

इस स्वप्न को यथार्थ में परिणत करने के लिए हमें कई तर्कवादी शिक्षकों की भी आवश्यकता होगी। अन्यथा बच्चों को विज्ञान और तर्कशास्त्र समझाना कठिन होगा और यह बताना भी मुश्किल होगा कि धर्म और आस्था में तर्क और विज्ञान का अभाव होता है। क्योंकि धार्मिक शिक्षक स्वयं भी उन्हीं बातों में आस्था रखने वाले होंगे!

फिलहाल हमारे संसाधन सीमित हैं और चाहते हुए भी मैं एक साथ इतने सारे कदम नहीं उठा सकता, लेकिन समय के साथ भविष्य में मुझे पूरा विश्वास है कि बच्चों को यह शिक्षा देने की दिशा में कि वे ईश्वर, धर्म और परम्पराओं के पीछे न भागें, मैं बहुत दूर तक की यात्रा करने के लिए सन्नद्ध हूँ।