दूसरी सफल शल्यक्रिया के बाद मोनिका पुनः स्कूल आने लगी है – 3 जुलाई 2015

आज शुक्रवार के इस ब्लॉग में मैं आपको मोनिका के हालचाल बताना चाहूँगा।

मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि वह अपनी दूसरी शल्यक्रिया करवा चुकी है और शल्यक्रिया पूरी तरह सफल रही थी। पाँच सप्ताह के अंतराल के पश्चात उसने आज से पुनः स्कूल आना शुरू कर दिया है।

जैसा मैंने पहले बताया, बिना किसी दिक्कत के उसकी शल्यक्रिया सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई थी। तथ्य यह है कि शल्यक्रिया के चलते हमारी योजना से ज़्यादा काम सम्पन्न हो गया! मोनिका की बाईं आँख की, जिसे वह पूरी तरह खोल नहीं पाती थी, शल्यक्रिया हो गई। दाहिनी बाँह, जिसे वह पूरी तरह ऊपर उठा नहीं पाती थी, वह ठीक की गई और सीने के कुछ हिस्सों पर डॉक्टरों ने दूसरी जगह से त्वचा निकालकर प्रत्यारोपित कर दी। इस तरह उसके शरीर पर तीन बड़ी-बड़ी पट्टियाँ बंधी रहती थीं: सिर को घेरे हुए, आँख पर, छाती पर, बाँह को घेरकर उसे सीधे ऊपर की ओर स्थिर किए हुए और तीसरी, उसकी जांघ पर, जहाँ से डॉक्टरों ने आँख के आसपास, बाँह और छाती पर प्रत्यारोपण हेतु त्वचा निकाली थी।

शल्यक्रिया के बाद कुछ दिन तो हम उसके साथ रहे मगर फिर उसे स्वास्थ्य लाभ हेतु अस्पताल में छोड़कर हम वापस वृंदावन आ गए। एक सप्ताह बाद जब हम पुनः अस्पताल जाने लगे तो रास्ते में मोनिका की नानी और छोटी बहन, वंशिका को भी साथ ले गए। जैसा पहली शल्यक्रिया के दौरान किया था उसी तरह हमने इस बार भी मोनिका को पास स्थित एक गेस्ट हॉउस में स्थानांतरित कर दिया, जिससे हर दूसरे दिन अस्पताल में उसकी पट्टियाँ बदली जा सकें। इस बार मोनिका की नानी और बहन उसके साथ रहीं और माँ वृंदावन वापस आ गई, जिससे अपने काम पर जा सके और पैसों का नुकसान न हो।

उन्होंने वहाँ बड़ा अच्छा वक़्त गुज़ारा, शानदार ए सी में, जैसे छुट्टियाँ बिताने दिल्ली आए हो, जबकि यहाँ वृन्दावन में लू के थपेड़ों से बुरा हाल था। हमारे लिए मोनिका का वृंदावन में न होना ख़ुशी की बात थी क्योंकि इतनी गर्मी सहन करना, विशेष रूप से उसके लिए, बड़ा मुश्किल होता।

तीन महीने बाद हम उसे गेस्ट हॉउस से लेकर घर आ गए- उसके स्वास्थ्य में काफी सुधार हो चुका था और वह बहुत उल्लसित दिखाई दे रही थी! कुछ दिन बाद आश्रम में उसके लिए एक पैकेट आया: एक कसी हुई जैकेट और सिर के सहारे हेतु एक उपकरण- दोनों का मकसद त्वचा को और उसके नए जोड़ को सहारा देना था, जिससे वे बहुत सख्त न हो जाएँ। उसे इन सभी उपकरणों को छह माह तक 24 घंटे पहनकर रहना होगा।

निश्चित ही अभी उसे और हमें लंबा रास्ता तय करना है। निकट भविष्य में ही एक और कठिन और ज़रूरी शल्यक्रिया की जानी बाकी है और इसके अलावा कुछ लेज़र चिकित्साएँ भी होनी हैं। फिर, अगले कुछ साल तक डॉक्टर उस पर प्रतिरोपण की वही शल्यक्रियाएँ पुनः करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि उसका विकसित होता हुआ शरीर प्रतिरोपित त्वचा के साथ सुचारु रूप से कार्य करता रहे।

फिलहाल मोनिका खुश है कि दूसरा महत्वपूर्ण काम सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लिया गया है। इस दौरान कितना कुछ हासिल किया गया है! अब वह अपनी दोनों आँखें पूरी तरह बंद कर पा रही है, गरदन ऊपर-नीचे और दाएँ-बाएँ हिला-डुला पा रही है और अपनी बाँह ऊपर उठा पा रही है! चेहरे और ऊपरी शरीर की सूजन गायब हो चुकी है। यह कितनी बड़ी बात है कि आधुनिक चिकित्सा लोगों की भलाई के लिए कितना कुछ कर सकती है।

मोनिका अब वापस स्कूल आने लगी है, जहाँ वह पाँचवी कक्षा में दोबारा पढ़ेगी क्योंकि पिछले साल दुर्घटना के चलते पहली छमाही की उसकी पढ़ाई पूरी तरह छूट गई थी। उसके साथ अब उसकी छोटी बहन भी स्कूल आती है।

सफलता की ओर यह हमारा एक और कदम है! हम उन सभी लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं, जिन्होंने इस दौरान हमें पूरा-पूरा सहयोग दिया कि हम इस बच्ची और उसके गरीब परिवार की मदद कर सकें- चाहे वह शल्यक्रिया से संबन्धित हो, चाहे लंबे समय तक उसे दिल्ली में रखने का मामला हो या उसकी शिक्षा और भविष्य की चिंताएँ हों! हम जानते हैं कि भविष्य में और आगे बढ़ने में हम मोनिका की सहायता करते रहेंगे- आशा है आप भी अपना सहयोग जारी रखेंगे!

मोनिका और अस्पताल में उसकी रूममेट – खुशी का अलग-अलग नज़रिया – 27 मई 2015

जब हम मोनिका के साथ अस्पताल में थे तो उसके पड़ोस में एक मलावी की 15 साल की लड़की भी भर्ती थी, जो अपनी माँ के साथ अपने दिल के दो वॉल्व बदलवाने भारत आई थी और कुल मिलाकर दो माह यहाँ रहने वाली थी। जब दोनों लड़कियाँ आपस में बात करतीं तो मैं सोचता कि दोनों लड़कियाँ अलग-अलग कारणों से अस्पताल आई हैं और पता नहीं एक-दूसरे की चिकित्सा संबंधी समस्याओं को जानने के बाद दोनों अपने-अपने बारे में क्या महसूस करती होंगी। और दोनों को इतनी विकट समस्याओं से ग्रसित देखने के बाद हमें, हम जैसे ‘स्वस्थ’ लोगों को अपने बारे में क्या और कैसा महसूस करना चाहिए।

दोनों लड़कियाँ अपनी-अपनी समस्याओं से काफी समय से पीड़ित हैं और उनकी बीमारी के कारण उनके परिवार भी बहुत दुखी हैं। दोनों की शल्यक्रियाएँ एक ही अस्पताल में हुई हैं, एक कई देशों को पार करके बेहतर इलाज और अच्छी सेवाओं की आस में यहाँ आई है और दूसरी पास ही से यहाँ पहुँची है। दोनों की शल्यक्रियाएँ सफल रही हैं लेकिन दोनों को पूरी तरह स्वस्थ होने में अभी काफी वक़्त लगेगा।

कौन ज़्यादा तकलीफ में है और कौन कम पीड़ित है?

मोनिका का चकत्तों से भरा चेहरा और बड़ी-बड़ी सफ़ेद पट्टियों में लिपटा शरीर देखकर उस किशोर अफ़्रीकी लड़की के मन में क्या आता होगा, मैं इसकी कल्पना भर कर पा रहा हूँ। सहानुभूति, शायद दया? शायद वह सोचती होगी: ‘मेरे शरीर पर भी दो बड़े-बड़े निशान हैं मगर कम से कम उन्हें कोई देख नहीं सकता!’ मुझे लगता है, निश्चित ही वह अपनी साफ़, बिना जली त्वचा में बड़ी खुश होगी।

दूसरी तरफ मोनिका उसके साथ वाले बिस्तर के पास खड़ी लड़की की ओर देखती है, जो अचानक अपना हाथ अपनी छाती पर दबा लेती है-दर्द उसके चेहरे पर पल भर के लिए उभरता है और फिर सामान्य हो जाता है। अब सिर्फ शल्यक्रिया का ज़ख्म ही दर्द करता है लेकिन इस दर्द से उपजे डर की आप कल्पना कर सकते हैं क्योंकि वह जानती है कि उसका दिल पूरी तरह उसका अपना असली दिल नहीं है बल्कि उसके दो वॉल्व बदले गए हैं और वह अभी भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुआ है! उसकी धड़कन कभी भी रुक सकती है और कृत्रिम अवयव अचानक काम करना बंद कर सकते हैं। ‘कम से कम मेरे ज़ख्म और चकत्ते सिर्फ बाहरी हैं!’ मोनिका महसूस करती होगी। देखने में अच्छे नहीं लगते मगर जान का उसमें कोई जोखिम नहीं है!

दोनों लड़कियाँ जल्द ही ठीक हो जाएँगी, फिर से खेलने-कूदने लगेंगी और जीवन का मज़ा लेंगी-क्योंकि चाहे कुछ भी हो, बच्चे यही करते हैं। दोनों बहुत सुंदर हैं, छोटे, बड़े, दो या कई सारे चकत्तों के बावजूद। दोनों एक-दूसरे की तरफ देखती हैं और अपने-अपने ज़ख़्मों की तुलना दूसरी के ज़ख़्मों से करती हैं। और जब हम उनकी तरफ देखते हैं तो हमें क्या नज़र आता है, हम क्या सोचते हैं और क्या महसूस करते हैं?

सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार अच्छी चीज़ है। यह मोनिका जैसी बच्ची के लिए बहुत लाभकारी हो सकता है, जिसे यह सब कभी न मिल पाता, अगर उसे संवेदनशील लोगों का सान्निध्य नहीं मिलता, उसके आसपास या दुनिया में सहानुभूतिपूर्ण और दयालु लोग नहीं होते!

इस सहानुभूतिपूर्ण रवैये से आपको कुछ वैसा प्राप्त होगा, जिसे सुकून या कृतज्ञता कहा जा सकता है। यह ख़ुशी कि आपके शरीर पर किसी प्रकार के चकत्ते नहीं हैं, यह संज्ञान कि आपकी समस्याएँ, दरअसल, इन किशोरवय लड़कियों की तुलना में कितनी छोटी, कितनी अमहत्वपूर्ण हैं!

मुझे लगता है कि बीच-बीच में हमें इन भावनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करते रहना चाहिए: इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस परिस्थिति से दो-चार हैं, जिसकी आप शिकायत कर रहे हैं, कोई न कोई है, जो उससे भी अधिक विकट परिस्थिति में फँसा हुआ है लेकिन मजबूती और हिम्मत के साथ हँसते हुए उसका सामना कर रहा है! जी हाँ, वह खुश है क्योंकि उसकी सोच सकारात्मक है, वह जानता है कि कैसे जीवन की कदर की जाए, हर हाल में जीवन का मज़ा लिया जाए! आप परेशान हैं क्योंकि आपकी शक्ल वैसी नहीं है, जैसी आप कल्पना करते रहते हैं, अपनी नज़र में आप बदसूरत हैं क्योंकि आपके बाल झड़ते जा रहे हैं, आपकी छातियाँ बहुत छोटी-छोटी हैं या बहुत बड़ी हैं या आपकी मांसपेशियाँ वैसी सुडौल नहीं हैं, जैसी आप चाहते हैं। आप जीवन की छोटी-मोटी बातों के लिए दुखी हैं। अपनी सोच को विस्तार दीजिए, सामने मौजूद विशाल दृश्य पटल पर नज़र दौड़ाइए और यह समझने की कोशिश कीजिए कि आप जैसे भी हैं, आपके पास जो कुछ भी है, वही आपके लिए पर्याप्त है, उतने भर से आप खुश रह सकते हैं!

मोनिका की दूसरी शल्यक्रिया: उसकी बाईं आँख, दाहिनी बाँह और दाहिनी छाती – 26 मई 2015

कल मैंने आपको बताया था कि हमारा पिछला हफ्ता दिल्ली के पास स्थित गुड़गाँव नामक शहर में गुज़रा, जहाँ हम मोनिका को लेकर अस्पताल गए थे, जहाँ उसकी दूसरी शल्यक्रिया की जानी थी। आज मैं आपको उस शल्यक्रिया के बारे में बताना चाहूँगा और साथ ही यह भी कि अब उसकी हालत कैसी है।

डॉक्टर द्वारा जाँच कर लिए जाने के बाद हमने तय किया कि उसकी शल्यक्रिया जल्द से जल्द करवाई जाए और अगली शल्यक्रिया के लिए हमने पिछले शनिवार, 23 मई का दिन नियत किया। स्वाभाविक ही रमोना और मैं और हमारे साथ अपरा भी पूरे समय मोनिका और उसकी माँ के साथ रहने वाले थे। आश्रम से हम शुक्रवार के दिन चले और दोपहर को मोनिका को अस्पताल में भर्ती करा दिया, रात के भोजन के बाद शल्यक्रिया हो जाने तक उसे कुछ भी खाना-पीना नहीं था।

दो घंटे की शल्यक्रिया के बाद और लगभग इतने समय बाद ही होश आने पर मोनिका को उसके कमरे में स्थानांतरित कर दिया गया। उसके सिर, बाँह और बाँह से होते हुए पूरी छाती पर सफ़ेद पट्टियाँ बंधी थीं। स्वाभाविक ही, उसकी बाईं आँख ढँकी हुई थी और दाहिनी बाँह मजबूत पट्टियों से कसकर बंधी हुई थी, जिसने उसकी बाँह को शरीर से 90 अंश के कोण पर ऊपर उठा रखा था।

लेकिन डॉक्टरों से बात करने पर हमें पता चला कि उन्होंने सिर्फ मोनिका की आँख और बाँह पर ही काम नहीं किया था: उन्हें उसकी दाहिनी छाती के ऊपरी हिस्से में सूजन नज़र आई थी और उन्होंने शल्यक्रिया के दौरान ही निर्णय लिया था कि उस प्रभावित त्वचा को निकालकर, उसे भी जांघ से निकाली जाने वाली त्वचा से प्रतिरोपित कर दें। इस हेतु और बाँह के नीचे किए जाने वाले प्रतिरोपण हेतु उन्होंने पुनः उसकी बाईं जांघ से त्वचा निकाली, जहाँ से पहले भी वे त्वचा निकाल चुके थे। शल्यचिकित्सक ने हमें बताया कि उन्होंने आपस में सलाह मशविरा किया और उसी पैर की त्वचा का इस्तेमाल करने का निर्णय लिया-दूसरी जांघ को बाद में आवश्यक होने पर इस्तेमाल करने के लिए छोड़ दिया, क्योंकि मोनिका पर भविष्य में भी कई शल्यक्रियाएँ की जानी आवश्यक होंगी।

रविवार के दिन हमें झटका सा लगा जब हमने देखा कि मोनिका के पैरों की पट्टियाँ और साथ ही उसकी पैंट और बिस्तर की चादर रक्त से सने हुए हैं! पट्टियाँ बदलने के बाद हमें बताया गया कि यह एक सामान्य घटना है और कुछ देर में सब कुछ ठीक हो जाएगा। बाद में, सोमवार तक पट्टियों पर खून नज़र नहीं आया।

अभी मोनिका को हफ्ते भर और अस्पताल में रहना होगा। गुरुवार को पहली बार मोनिका की पट्टियाँ बदली जाएँगी और उसके बाद हमें देखना होगा कि उसे कब अस्पताल से छुट्टी मिलती है। निश्चित ही पिछली बार की तरह इस बार भी उसे आसपास के किसी गेस्ट हाउस में कुछ समय के लिए रहना होगा, जिससे डॉक्टर हर दूसरे दिन उसका मुआयना कर सकें। पिछली बार की तरह, जब उसकी गरदन पर शल्यक्रिया की गई थी, इस बार उसे पूरे समय बिस्तर पर लेटे नहीं रहना होगा। संभवतः शुक्रवार से वह उठकर बैठ सकेगी और शायद चल-फिर भी सके।

वह अभी से काफी तंदरुस्त लग रही है और माँ से कभी अपने पैरों की, तो कभी हाथों की, तो कभी गरदन की मालिश करने के लिए कहती रहती है। जब डॉक्टर आए तो उसने पूछा कि क्या अब वह ठोस खाना नहीं खा सकती क्योंकि उसे अब तक मिलने वाले सूप ज़्यादा पसंद नहीं हैं-और लो, उसका अनुरोध मान्य कर लिया गया! तो परिस्थितियों के अनुरूप, मोनिका ठीक-ठाक है, तेज़ी के साथ स्वास्थ्य लाभ कर रही है और उसका मन तरोताजा और उत्फुल्ल है!

मोनिका के बारे में मेरे पिछले ब्लॉग आप यहाँ पढ़ सकते हैं और उसकी मदद के हमारे काम में हाथ बंटा सकते हैं!

मोनिका ने डॉक्टरों को बताया कि उसकी पिछली शल्यक्रिया से उसे कितना लाभ हुआ और अब दूसरी शल्यक्रिया की योजना – 25 मई 2015

मैं हाल ही में दिल्ली में एक सप्ताह गुज़ारकर लौटा हूँ। दरअसल, गुड़गाँव में, जहाँ के एक अस्पताल में मोनिका का इलाज चल रहा है। आपको मोनिका याद होगी, जो एक दुर्घटना में बुरी तरह जल गई थी। आप उसके बारे में मेरे ब्लॉग यहाँ पढ़ सकते हैं। पिछले शनिवार के दिन उसकी दूसरी शल्यक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हुई!

मोनिका पर हुई पहली शल्यक्रिया की सफलता के बारे में मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ। उस समय शल्यक्रिया के बाद एक सप्ताह वह अस्पताल में रही थी और फिर एक माह तक पास स्थित एक गेस्ट हाउस में, क्योंकि उसे हर दूसरे दिन पट्टियाँ बदलवाने अस्पताल जाना पड़ता था।

उसके बाद वह वृन्दावन वापस आ गई थी और फिर स्कूल भी आने लगी। वास्तव में समय का यह अचूक सदुपयोग था-एक तरह से वह सर्दियों की छुट्टियों में गई और छुट्टियाँ खत्म होने के कुछ दिन बाद वापस आ गई और इस तरह उसकी स्कूली पढ़ाई ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ!

उसने तेज़ी के साथ स्वास्थ्य लाभ किया है लेकिन अपनी गरदन सीधी रखने के लिए उसे सामने की तरफ एक कॉलर पहनना पड़ता है-और गरदन सीधी रखना परम आवश्यक है क्योंकि अन्यथा शल्यक्रिया द्वारा प्रतिरोपित त्वचा नीचे झूल जाएगी और इतने दिनों की मेहनत और आर्थिक व्यय पर पानी फिर जाएगा। वह अपनी जली हुई त्वचा और चकत्तों पर दिन में कई बार तेल लगाती है और माँ रोजाना उसकी त्वचा की मालिश भी करती है।

इस स्कूली सत्र की अंतिम परीक्षा के बाद हम मोनिका को लेकर पुनः डॉक्टर के पास गए थे। पिछले महीने, दागों में सुधार हो रहा है या नहीं, इसकी दोबारा जाँच के लिए डॉक्टर ने उसे पुनः बुलाया था। डॉक्टर उसे देखकर बहुत खुश हुए और पूछा कि शल्यक्रिया के पहले की और बाद की स्थितियों के बीच उसे क्या अंतर महसूस हो रहा है। उसने बताया कि पहले वह अपनी गरदन हिला-डुला नहीं पाती थी और उसे अपनी ठुड्डी नीचे रखनी पड़ती थी और अब ये दोनों हरकतें वह आसानी के साथ कर पाती है और सिर को भी दोनों तरफ और नीचे-ऊपर चला पाती है। यह बहुत बड़ी कामयाबी है और एक सुखद क्षण।

उसी समय हमने अगली शल्यक्रिया की योजना बना डाली थी। डॉक्टर की सलाह थी कि मई में शल्यक्रिया की जाए और हम इस पर सहमत हो गए क्योंकि तब गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी होंगी और स्कूली पढ़ाई में बिना अधिक व्यवधान के उसकी शल्यक्रिया भी हो जाएगी और वह कुछ दिन स्वास्थ्यलाभ भी कर सकेगी। इसके अलावा, वह साल का सबसे गरम समय होगा और उसे यह समय शानदार एयर कंडीशंड कमरों में व्यतीत करने का मौका भी मिल जाएगा! उनके घर में सिर्फ एक पंखा है और जब बिजली चली जाती है तो स्वाभाविक ही, वह भी काम नहीं करता! और निश्चित ही, विशेष रूप से मोनिका के लिए गर्मी बहुत अधिक तकलीफदेह होती है!

जहाँ त्वचा का प्रत्यारोपण किया गया था, उस जगह की जाँच और दूसरे चकत्तों को देखने के बाद डॉक्टर ने पूछा कि उसे बाईं आँख, मुँह और दाहिनी बाँह की इन तीन चिकित्साओं में से कौन सा काम अधिक आवश्यक लगता है, जिसके सम्पन्न हो जाने पर उसकी सामान्य कार्यक्षमता में अधिक से अधिक इजाफा हो सकेगा। उसने उत्तर दिया कि वह सबसे पहले दाहिनी बाँह की, जिसे फिलहाल वह सिर्फ 90 अंश तक ही उठा पाती है, चिकित्सा चाहती है, जिससे वह उसे पूरी तरह उठाने में सक्षम हो जाए।

किन्तु डॉक्टर का कहना था कि आँख भी बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए वह दोनों की एक साथ, मिली-जुली शल्यक्रिया और चिकित्सा करेंगे: बाईं आँख पर काम किया जाएगा, जिससे वह पलकों को बंद कर सके और साथ ही दाहिनी बाँह को भी मुक्त कर सके।

डॉक्टर ने बताया कि जिस तरह गरदन और कॉलर के साथ किया था, शल्यक्रिया के बाद बाँह को भी एक फ्रेम में कसकर रखा जाएगा, जिससे प्रत्यारोपित त्वचा एक साथ खिंचकर झूल न जाए। और इसलिए मोनिका को इस बार फिर कुछ दिन और अस्पताल में रहना होगा और उसके बाद, पिछली बार की तरह, अस्पताल के आस-पास किसी गेस्ट हाउस में भी, जिससे उसकी नियमित जाँच हो सके और पट्टियाँ बदली जा सकें।

कल मैं आपको इस शल्यक्रिया और अपने सप्ताहांत के बारे और भी बहुत कुछ बताऊँगा।

अगर आप भी मोनिका की मदद करना चाहते हैं या उसके इलाज और स्वास्थ्य लाभ के संबंध में कोई आर्थिक मदद करना चाहते हैं तो आप यहाँ पढ़कर अपनी आर्थिक मदद भिजवा सकते हैं। शुक्रिया!

पहले चरण की शल्यक्रिया सम्पन्न: मोनिका घर वापस आई – 6 फरवरी 2015

आज पुनः शुक्रवार है, और हर शुक्रवार को मैं अपने स्कूल के किसी बच्चे के बारे में लिखता हूँ और साथ ही ब्लॉग में उसका एक वीडियो भी लगाता हूँ। शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014 के दिन मैंने आपको बताया था कि मोनिका पर हुई पहली शल्यक्रिया पूर्णतः सफल रही है। उसके बाद शुक्रवार, 23 जनवरी 2015 को हम उसे गेस्ट-हाउस से वृन्दावन ले आए थे और पिछले सोमवार वह स्कूल पढ़ने आ गई! इसलिए आज मैं सगर्व यह लिख पा रहा हूँ कि मोनिका के इलाज का ‘पहला चरण’ सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया है।

जैसी त्वरित सहायता उसे हासिल हो पाई, उसे देखकर मैं आज भी अचंभित रह जाता हूँ- पहली बार जब मैंने मोनिका का उल्लेख अपने ब्लॉग में किया था, उस दिन से, पहले उसकी शल्यक्रिया और अब तक, जब कि वह स्वस्थ होकर अपने घर वापस आ चुकी है! इस बीच मैं आपको लगातार सारी जानकारियाँ देता रहा हूँ और आप जानते हैं कि कैसे सब कुछ अच्छी तरह होता रहा। डॉक्टरों ने उसे अपने पास ही रखा, जिससे वे नियमित रूप से उसकी पट्टियाँ बदलते रह सकें और आखिर, जब उसके जख्म भर गए, वे तैयार हो गए कि हम उसे वृन्दावन वापस ले आएँ।

जब पिछली बार हम उससे मिलने गए थे, डॉक्टर उसकी आँखों की पट्टियाँ हटा चुके थे। पहले और अब में आश्चर्यजनक अंतर दिखाई पड़ता था! आँखों की पलकें जल जाने के कारण पहले मोनिका अपनी आँखों को नम रखने के लिए पुतलियों को ऊपर चढ़ा लेती थी क्योंकि वे हमेशा खुली रहती थीं। वह आँखें खुली रखकर ही सोती थी, दाहिनी आँख की हालत बाईं आँख से भी ज़्यादा खराब थी। अब वह दाहिनी आँख की पलकें भी पूरी तरह बंद कर पा रही है। आँखों का झपकना भी अब संभव हुआ है, जिसका अर्थ यह है कि अब आँखें सूखी नहीं रहेंगी-जिसके कारण पहले उसे बहुत तकलीफ हुआ करती थी और नींद आना मुश्किल था।

हर बार, जब भी हम उससे मिलते थे, हम देखते कि मोनिका की छाती और गरदन के इर्द-गिर्द पट्टियाँ कम से कमतर होती जा रही हैं। दो सप्ताह पहले डॉक्टरों ने मेरी आँखों के सामने पट्टियाँ बदली थीं और मैंने देखा कि शल्यक्रिया के सारे ज़ख्म भर चुके हैं। उन्होंने उसकी जांघ की त्वचा निकालकर उसे छाती और ठुड्ढी पर लगाई थी और अब इन धब्बों के किनारे पूरी तरह ठीक हो चुके हैं और आसपास की त्वचा अच्छी तरह जुड़ गई है। निश्चित ही आप तुरंत देख सकते हैं कि काफी परिवर्तन हुआ है: ठुड्ढी और गरदन को जोड़ने वाली जली हुई त्वचा ही सिर्फ नहीं जुड़ी है बल्कि अब उसकी ठुड्ढी साफ़ नज़र आने लगी है! अब वह आसानी से अपना सिर हिला-डुला सकती है और उसे पूरा ऊपरी धड़ मोड़ना नहीं पड़ता!

अगले पाँच माह अपनी ठुड्ढी को ऊपर, सीधा रखने के लिए मोनिका को एक कॉलर बांधना पड़ेगा, जिससे जुड़ी हुई त्वचा लचीली रही आए और वज़न से खिंचकर पुनः झूल न जाए। बिना कॉलर के कुछ ही हफ्तों में त्वचा झूल जाएगी और शल्यक्रिया में किया गया सारा प्रयास व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए इस खतरे के बारे में हमने पहले ही मोनिका को बता दिया है, जिससे वह इसकी अनिवार्यता समझे और हर वक़्त यह कॉलर पहनना सुनिश्चित करे।

स्वाभाविक ही यह लड़की खुश है। एक शुरुआत हुई है। और आप जानते हैं? उसने अब आईने में अपना चेहरा देखना भी शुरू कर दिया है! पहले वह अपना जला हुआ चेहरा देखकर डर जाती थी लेकिन अब इतनी उत्सुक हो चुकी है कि हिम्मत करके देख लेती है। वह स्कूल भी आने लगी है। इस पूरे वक़्त में उसने सिर्फ एक सप्ताह के आसपास का स्कूल मिस किया है क्योंकि बाकी समय वैसे भी ठंड के कारण स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थीं! अब वह कक्षा में सहपाठियों के साथ बैठती है और उसने पढ़ना-लिखना शुरू कर दिया है। यह भविष्य की ओर उठा उसका एक और कदम है!

फिर भी यह एक पहला चरण ही है। मोनिका के डॉक्टरों के साथ बातचीत में उन्होंने अगले चरण की शल्यचिकित्सा के लिए, जिसमें उसके मुँह और दूसरी आँख पर शल्यक्रिया होनी है, चार या पाँच माह रुकने के लिए कहा है। उस शल्यक्रिया के बाद वह दोनों आँखें बंद कर सकेगी और पूरा मुँह भी खोल सकेगी। हम गर्मी की छुट्टियों में यह शल्यक्रिया करवाने का कार्यक्रम बना रहे हैं, जिससे उसकी स्कूल की पढ़ाई का कम से कम नुकसान हो!

एक और कदम! मोनिका की सहायता के हमारे काम में आप भी मददगार हो सकते हैं!

मोनिका के स्वास्थ्य-लाभ की जानकारी – फिर से खड़ा होना और चलना – 13 जनवरी 2015

मैंने आपको बताया था कि कल हम मोनिका के यहाँ गए थे– और यह भी कि उसे देखकर हमें बड़ा संतोष हुआ और खुशी भी हुई! इस बीच उसने अच्छी प्रगति की है!

मोनिका के मामले में आगे और क्या किया जाना है, यह जानने के लिए जब मैं डॉक्टरों से मिलने अस्पताल गया तो मोनिका भी वहीं मिल गई। वह अपनी पट्टियाँ बदलवाने अस्पताल आई थी इसलिए मैं भी यह देख सका कि पट्टियों के नीचे के जख्म किस हालत में हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि अगर आधुनिक दवाओं का इस्तेमाल सही तरीके से हो तो वे कितनी जल्दी असर करती हैं! एक बार मुझे फिर उसकी माँ की बात याद आ गई कि गर्मियों में कैसे सरकारी अस्पतालों में जब पट्टियाँ बदली जाती थीं तो हर बार ज़ख़्मों से भलभलाकर खून निकलने लगता था! इस बार ज़ख़्मों को देखने से पता चलता है कि जांघ से त्वचा निकालकर आँखों, छाती, गरदन और ठोढ़ी पर लगाते समय बड़ी सावधानी बरती गई है और बहुत सुघड़ता के साथ टाँके लगाए गए हैं। बूंद भर रक्त बाहर निकला, पीप नहीं था और बस जख्म लगभग साफ हो चला था!

एंबुलेंस में मोनिका के साथ बैठकर ही हम होटल आए और इसलिए रमोना और उसके पिताजी भी मेरी इस प्रसन्नता में सहभागी हो सके: मोनिका चलने लगी है! वह सतर्कतापूर्वक धीरे-धीरे पैर बढ़ाते हुए एंबुलेंस से नीचे उतरी और उतरते ही इतनी आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी कि खुद चलकर भीतर गई।

निश्चय ही हमें फोन पर इसकी जानकारी मिल चुकी थी। तीन दिन पहले उसकी माँ ने हमें बताया था कि डॉक्टरों ने उससे बैठने के लिए कहा है और जब वह बैठी तो बड़ी सतर्कता के साथ खड़ा होने की कोशिश की और उसमें सफल भी हो गई। लेकिन इसे अपनी आँखों से देखना अलग ही बात थी। अब न सिर्फ वह कमरे में कुछ कदम चलती है बल्कि सारे गेस्ट हाउस में चहल-कदमी करती रहती है! यहाँ तक कि उसने बगल वाले कमरे में कुछ यूरोपियन पर्यटकों से दोस्ती भी गाँठ ली है!

अधिक बारीकी के साथ देखने पर पता चलता है कि आँख पर लगी उसकी पट्टी कुछ ऊपर खसका दी गई है, जिससे नीचे से वह बाहर देख सके और अपनी उस आँख को, जिस पर शल्यक्रिया की गई है, झपका सके। अब वह अपनी पलकों की शक्ति से उसे बंद कर सकती है। गरदन की पट्टियों के कारण अभी वह अपनी ठुड्डी नीचे नहीं कर पाती मगर खुशी की बात है कि वह उसे ऊपर उठा पाती है। जली हुई त्वचा के कारण पहले वह ऐसा भी नहीं कर पाती थी।

मुझे लगता है कि यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि पहले से वह सिर्फ शारीरिक रूप से ही बेहतर नहीं है! वह अब अच्छे मूड में भी है, हालांकि हमें लगा कि सामान्य दिनों में गेस्ट-हाउस में भी उसे कभी-कभी बहुत ऊब होती होगी। हालाँकि उसके कमरे में टीवी था-लेकिन सिर्फ टीवी का मनोरंजन ही पर्याप्त नहीं होता इसलिए हम उसके लिए कुछ उपहार भी लेकर आए थे: बोर्ड गेम का एक सेट, कुछ रंगीन पेंसिलें, क्रेयोन्स, एक किताब और एक नोटबुक, जिससे वह कुछ लिख सके या चित्र इत्यादि बना सके! मकसद यह कि वह अपने आपको उनमें व्यस्त रख सके।

और हाँ, जब हमने पूछा कि खाने के लिए उसे कुछ खास चाहिए क्या तो उसने उसी वस्तु की मांग की, जिसकी मांग आश्रम से बाहर होने पर अक्सर अपरा भी करती रहती है: चाओमिन, सब्जियों वाला चाइनीज़ नाश्ता! सेब, आम और अनार के रस के अलावा उसके लिए हम वह भी लेकर आए! निश्चित ही कल रात उसने अच्छी-ख़ासी पार्टी की होगी!

वहाँ से निकलने से पहले हम उसे खुद तैयार किया हुआ अपरा के जन्मदिन की पार्टी में आए बच्चों और शिक्षिकाओं का वीडियो और कुछ चित्र दिखाना नहीं भूले: उसमें उन्होंने अपना संदेश रिकार्ड कर रखा था-“मोनिका जल्दी ठीक हो जाओ!” यह और दुनिया भर के लोगों की सदिच्छाओं ने एक बार फिर उसके चेहरे पर मुस्कान ला दी!

डॉक्टरों ने फिर कहा कि मोनिका की पट्टियाँ अभी दो या तीन हफ्तों तक हर दूसरे या तीसरे दिन बदलनी पड़ेंगी। यानी तब तक मोनिका को वहीं गेस्ट-हाउस में रहना होगा-और अगले हफ्ते जब मैं वहाँ जाऊँगा तब वहाँ की अगली रिपोर्ट आपको दूँगा!

मोनिका के विषय में जानकारियाँ सार्वजनिक करने के 4 कारण – 7 जनवरी 2015

मोनिका वह लड़की है, जो पिछले साल एक दुर्घटना में जल गई थी और जब से हमें इस अपघात का पता चला है तभी से मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से उसके विषय में लगातार ताज़ा जानकारियाँ देता रहता हूँ। हमने आपको बताया था कि उसके साथ क्या हुआ था। हमने उसकी माँ की कहानी बताई, उसके परिवार के बारे में, उस पर हुई पहली शल्यक्रिया के बारे में और अंत में कल उसे किस तरह एक होटल के कमरे में लाया गया, यह बताया। निश्चय ही सोशल मीडिया में भी मैं ये ताज़ा जानकारियाँ साझा करता हूँ और कुछ दिन पहले मुझसे किसी ने पूछा: काम तो आप बहुत अच्छा कर रहे हैं मगर इसका इस तरह प्रचार क्यों करते हैं?' मैं आपको बताता हूँ कि क्यों करता हूँ!

असल में उस व्यक्ति ने और विस्तार से लिखते हुए हमें बताया कि और भी बहुत से लोग हैं, जो इस तरह का अच्छा सेवाकार्य कर रहे हैं मगर वे चुपचाप करते हैं, उसका प्रचार नहीं करते। उसने हमें सलाह भी दी कि हम भी जो करना है, करें लेकिन उसे अपने ब्लॉग के माध्यम से और फेसबुक या ट्विटर के माध्यम से सार्वजनिक न करें। मोनिका की तस्वीरें या उसके इलाज और स्वास्थ्य-लाभ संबंधी वीडियो आदि भी प्रदर्शित करने की ज़रुरत नहीं है।

यहाँ, इन चार बिंदुओं में मैं इसका उत्तर दे रहा हूँ:

1) संख्या में बल है – साथी हाथ बढ़ाना – मिलकर बोझ उठाना

(संख्या में बल है – एक होकर हम किसी भी समस्या का सामना कर सकते हैं – मिलजुलकर हम हर काम सफलता पूर्वक कर सकते हैं)

ऊपर तीन कहावतें दी गई हैं और तीनों का एक ही अर्थ है: जब एक अकेला कोई काम करता है तो वह उसे अच्छे तरीके से कर सकता है। जब बहुत से लोग उसी काम को एक साथ करते हैं तो उस काम को बेहतर ढंग से कर सकते हैं, तेज़ी के साथ कर सकते हैं और ज़्यादा काम कर सकते हैं। चैरिटी के कामों में यही बात लागू होती है और विशेष रूप से मोनिका जैसे मामलों में।

बहुत से लोग हैं, जिनकी बड़ी इच्छा होती है कि लोगों की मदद करें- चाहे मोनिका की हो, हमारे स्कूल के बच्चों की हो या किसी और चैरिटी कार्य में सहयोग हो। हो सकता है कि वे सिर्फ अपना समय या श्रम ही इन कामों में लगा सकते हों और कोई आर्थिक मदद न कर सकते हों। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी होते हैं जिनके पास पैसा तो होता है लेकिन समय की कमी होती है, वे शारीरिक रूप से अशक्त होते हैं या उन्हें जानकारी ही नहीं होती!

तो, अगर हम मोनिका और उसके अपघात के बारे में सबको बताते हुए उसके इलाज की अपनी परियोजना सबके सामने रखते हैं तो मुझे लगता है कि हम इस पीड़ित बच्ची के जीवन में बदलाव लाने हेतु सिर्फ दुनिया भर के लोगों के श्रम, ऊर्जा और धन को एकजुट कर रहे होते हैं। और जितना अधिक हम एकजुट होंगे, मिलकर काम करेंगे, उतना ही अधिक हम उसके लिए कर पायेंगे!

2) सहयोगकर्ता जानना चाहते हैं कि उनका पैसा कहाँ खर्च किया गया

यह एक तथ्य है कि जब आप कोई चैरिटी कार्य कर रहे होते हैं तो स्वाभाविक ही, लोग जानना चाहते हैं कि आपने उन पैसों का क्या किया जो उन्होंने आपको दिए थे।

3) वास्तव में लोग मोनिका के बारे में जानना चाहते हैं

ऊपर दिया गया कारण तथ्य तो है और महत्वपूर्ण भी है मगर महज उथला तथ्य है। यहाँ जो कारण मैं बताने जा रहा हूँ, दरअसल वह लोगों के दिल से निकली हुई चाह है: वास्तव में वे मेरा लिखा पढ़ना चाहते हैं। जो लोग हमें और हमारे आश्रम और स्कूल के बारे में जानते हैं- चाहे वे हमें इंटरनेट के माध्यम से जानते हों, चाहे अपने घर में या यहाँ, भारत में हमसे मिले हों- वे वास्तव में हमारी चिंता करते हैं, नियमित रूप से हमारी खोज-खबर लेते रहना चाहते हैं! हमारे स्कूल के बच्चों से उनका गहरा जुड़ाव है और वे दिल से महसूस करते हैं कि हम सब मिलकर इस बच्ची की मदद करके बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं!

इसलिए जब मैं बताता हूँ कि हमारी मदद और बहुत से लोगों के सहयोग से उसकी पहली शल्यक्रिया सम्पन्न हुई है तो यह अपने अच्छे काम की डींग हाँकना नहीं है- असल में इसके पीछे इस खुशखबर को आप सबके साथ साझा करने की मंशा होती है!

4) कम से कम एकाध किसी व्यक्ति को इस अच्छे काम के लिए प्रेरित कर पाने की संभावना

और अंत में यह बिन्दु: हो सकता है कि कोई इन बातों को पढ़कर स्वयं भी दूसरों की भलाई करने की ओर उद्यत हो जाए।

मोनिका को अस्पताल से होटल लेकर आना – 6 जनवरी 2015

मैंने कल आपको मोनिका के अतिरेकी भय के बारे में बताया था, जिसके चलते डॉक्टरों को दो बार उसकी पट्टियाँ बदलने से पहले बेहोश करने की दवा देनी पड़ी थी। अब यह बताते हुए मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही है कि कल उसने बिना एनिस्थिसिया लिए पट्टियाँ बदलवा लीं-और निश्चय ही उसे बिल्कुल दर्द नहीं हुआ! लेकिन ठहरिए, क्या, कब और कैसे हुआ, मुझे सब कुछ क्रमवार बताने दीजिए।

मैंने आपको बताया था कि हम मोनिका और उसकी माँ के लिए अस्पताल के पास एक जगह के इंतज़ाम की कोशिश कर रहे थे। डॉक्टरों ने हमसे कहा था कि कम से कम तीन से चार सप्ताह हर दूसरे या तीसरे दिन मोनिका को पट्टियाँ बदलने के लिए अस्पताल आना होगा और उसी वक़्त हम यह भी देख लेंगे कि उसके ज़ख़्म ठीक तरह से भर रहे हैं या नहीं। स्वाभाविक ही, इस स्थिति में उसे 150 किलोमीटर दूर वृन्दावन लेकर आना व्यर्थ होता।

काफी मशक्कत के बाद आखिर हमें एक गेस्टहाउस मिला, जो अस्पताल से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित था और जिसके कमरों में भीतर ही संडास और बाथरूम का इंतज़ाम भी था। इसके अलावा गेस्टहाउस में ही एक कैंटीन की व्यवस्था थी, जहाँ से मोनिका और उसकी माँ अपने लिए खाना वगैरह मँगवा सकते थे। मोनिका की माँ खुद खाना बनाए यह उसकी देखभाल के चलते आसान नहीं था और उसके मुक़ाबले खाना मंगाना ज़्यादा उपयुक्त था। अगर हम एक कमरे का फ्लॅट लेते तो शायद वह खाना बना सकती लेकिन तब हमें सारे बरतन-भांडे, राशन-पानी, स्टोव आदि का इंतज़ाम भी करना पड़ता! और क्योंकि हम हर समय वहाँ नहीं रह सकते थे, उसे खुद इन चीजों की व्यवस्था करनी होती और मोनिका को अकेला छोड़ना पड़ता-और तब यह आवश्यकता से अधिक परेशानी का बायस बन सकता था!

बाद में यह समझ में आया कि अस्पताल के पास किसी होटल में कमरा लेना बेहतर विकल्प रहा। डॉक्टरों ने पहले हमें बताया था कि वे मोनिका को खड़ा करके और चलाकर देखेंगे लेकिन जब उसकी छुट्टी का समय आया तो पता चला कि गरदन की मांसपेशियों की कमजोरी की वजह से एकाध हफ्ते या दस दिन तक वह उठ भी नहीं पाएगी! इसका अर्थ यह था कि उसे एंबुलेंस के जरिए स्थानांतरित किया जाएगा!

इस तरह 3 जनवरी की शाम को, अस्पताल की लंबी डिस्चार्ज प्रक्रिया निपटाने के बाद एक एंबुलेंस गेस्टहाउस के सामने आकर खड़ी हुई और कुछ नर्सें उसे स्ट्रेचर पर रखकर कमरे में लेकर आईं। उन्होंने उसे बिस्तर पर लिटाया-और इसी तरह कल वे फिर गेस्टहाउस आये, उसे अस्पताल लेकर गए और वापस यहाँ लाकर छोड़ा।

मोनिका ने शाम को हमें फोन किया और कहा: "मैंने आपसे वादा किया था कि मैं बिना बेहोशी की दवा लिए अपनी पट्टियाँ बदलवा लूँगी! मैंने अपना वादा नहीं तोड़ा!" उसे गर्व था कि वह ऐसा कर पाई-और हमें भी! यह छोटी सी बच्ची, इतनी तकलीफ़ें झेलने के बाद खुश थी कि उसमें इतनी हिम्मत आ गई है कि अपने डर पर काबू पा सके!

रात को हम रमोना के पिता को दिल्ली विमानतल से लाने गए थे-और अगले सप्ताह मोनिका से मिलने फिर दिल्ली जाएँगे। हम यह देखने के लिए लालायित हैं कि उस समय तक वह कितना स्वस्थ हो गई है-और वह भी यहाँ वापस आने के लिए मचल रही होगी। स्वाभाविक ही, क्योंकि अब तक सिर्फ उसकी माँ का भाई और उसकी माँ का चाचा भर उससे मिलने अस्पताल आए हैं।

शल्यक्रिया से कुछ दिन पहले मोनिका की बड़ी बहन का फोन आया था कि उनके पिता उसे घर पर अकेला छोड़कर दिल्ली गए हैं। लेकिन मोनिका से मिलने नहीं। उनका पिता अभी अपने बड़े भाई के यहाँ रह रहा है जबकि उसकी एक किशोर-वय लड़की घर पर अकेली है क्योंकि आसपास रहने वाले उसके चाचा-चाचियों के साथ उनके अच्छे संबंध नहीं हैं और दूसरी एक कठिन शल्यक्रिया करवाने के बाद स्वस्थ हो रही है!

इस तरह सिर्फ हम होंगे जो मोनिका के पास होंगे। हमारी शुभकामनाएँ तो उसके साथ हैं ही, हम आपकी, अपने मित्रों की, मददगारों की, पाठकों की, मिलने-जुलने वालों की और सभी भला चाहने वाले लोगों की शुभकामनाएँ भी साथ ले जा रहे हैं! उन सभी लोगों का एक बार फिर बहुत-बहुत शुक्रिया जो हमारे इस अभियान में सहायक बने-कि इस छोटी सी बच्ची द्वारा भोगी गयी इतनी भयानक यातनाओं के बाद उसके चेहरे पर मुस्कान देख सकें और यही हमारा सबसे बड़ा पारितोषिक होगा!

पिछले अनुभव से मोनिका को लगे मानसिक आघात के बारे में – 5 जनवरी 2015

शुक्रवार को मैंने आपको बताया था कि मुझे गुड़गाँव में एक दिन और रुकना पड़ा क्योंकि डॉक्टरों ने मोनिका की पट्टियाँ एक बार और बदलने और फिर उसे खड़ा करके और चलाकर देखने के बाद 3 जनवरी को छुट्टी देने का फैसला किया था। आज और कल मैं आपको इस बात के बारे में विस्तार से बताऊँगा कि वास्तव में मोनिका के साथ क्या हुआ और क्या हो रहा है।

3 जनवरी की सुबह हमारे पास मोनिका की माँ का फोन आया, जिसमें उसने मुझसे कहा कि मोनिका मुझसे बात करना चाहती है। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि तब तक उसने कभी मुझसे बात करने के लिए फोन नहीं किया था। उसने कहा: 'कृपा करके डॉक्टरों को पट्टियाँ बदलते समय मुझे बेहोश करने के लिए कहें!' मैंने कहा, तुम ऐसा क्यों सोच रही हो? तब उसने बताया कि उसे डर है कि पट्टियाँ बदलते समय उसे बहुत दर्द होगा। मैं कुछ देर उसे दिलासा देता रहा और फिर फोन रमोना को दे दिया क्योंकि उसके साथ भी मोनिका का बहुत लगाव हो गया है। हम दोनों ने उससे कहा कि इसमें डरने की कोई बात नहीं है मगर हम दोनों ही सोच रहे थे कि आखिर यह ख़याल उसके मन में आया कैसे कि सिर्फ पट्टी बदलने के लिए भी डॉक्टर उसे बेहोश करने की दवा देंगे!

हमें इसका कारण कुछ देर बाद पता चला जब हम खुद अस्पताल पहुँचे: मोनिका दर्द की कल्पना से बहुत डरी हुई थी इसलिए बिना एनिस्थिशिया लिए डॉक्टरों को पट्टियाँ बदलने नहीं दे रही थी। जब डॉक्टर इस छोटे से काम के लिए आए वह बुरी तरह घबरा गई थी।

डॉक्टर ने मुझसे कहा कि इस काम में बिल्कुल दर्द नहीं होता। उसे महसूस तो होगा मगर यह दर्द पैदा बिल्कुल नहीं करेगा। दो साल के बच्चे को तो हम एनिस्थिशिया देते हैं मगर तीन या चार साल के बच्चे यह काम आसानी से करवा लेते हैं। वे आम तौर पर बच्चे को बातचीत में लगा देते हैं लेकिन मोनिका तो आँख भी मिलाना नहीं चाहती। वह सिर्फ अपनी माँ की तरफ ध्यान लगाए हुए है और उससे कह रही है कि हमें वहाँ से जाने के लिए कहे और कहे कि वे यह काम न करें; बस, बेकार डर रही है। और इस तरह दो बार- 31 दिसम्बर 2014 और उस दिन यानी 3 जनवरी 2015 को- डॉक्टरों ने एनिस्थिशिया देकर ही उसकी पट्टियाँ बदली हैं।

डॉक्टर ने बताया कि वास्तव में यह डर पहले कभी हुए भीषण दर्द के अनुभव के कारण है। शायद उसने पहले किसी अस्पताल में पट्टियाँ बदलवाते समय बहुत दर्द महसूस किया होगा। और वाकई गर्मियों में मोनिका का इलाज एक अन्य अस्पताल में हुआ था और हमें उसकी माँ ने बताया था कि उस अस्पताल में ज़ख्म साफ़ करने वाला कोई नहीं होता था इसलिए बिना किसी अनुभवी मददगार के खुद वही ज़ख्म साफ़ करने और मरहम पट्टी करने का काम किया करती थी। हम कल्पना कर सकते हैं कि मोनिका को उस वक़्त कितना दर्द होता होगा कि जिसका भय आज दर्द की एक मानसिक व्याधि में तब्दील हो गया है!

मोनिका के डॉक्टर के साथ बातचीत में उसने मुझसे कहा कि मैं मोनिका से बातचीत करके उसे मानसिक रूप से तैयार करूँ कि वह बिना एनिस्थिशिया लिए पट्टियाँ बदलवाने के लिए तैयार हो जाए। क्योंकि हर बार बेहोश करने वाले डॉक्टर (एनिस्थीटिक) को बुलवाना पड़ेगा जो न सिर्फ ज़्यादा खर्चीला होगा बल्कि उसके शरीर के लिए भी इतनी अधिक मात्रा में ये दवाएँ लेना नुकसानदेह होगा!

मैंने उससे बात की। रमोना ने की। और उसका क्या नतीजा निकला, अब मोनिका कहाँ है, क्या उसने आज बिना बेहोश हुए पट्टियाँ बदलवा लीं, यह सब मैं कल ही बता पाऊँगा।