समस्याओं के प्रति आपका रवैया-आप उनसे घबराते हैं या उनका डटकर मुकाबला करते हैं? 26 अक्टूबर 2015

आपका देश, आपकी संस्कृति और आपके आसपास का का समाज आपको प्रभावित करते हैं। मुझे लगता है, हम सभी इस बात पर सहमत होंगे। पिछले हफ्ते मैंने बताया था कि कैसे हमारी परवरिश और परिवेश के अनुसार हम सभी का ग्रहणबोध अलग-अलग होता है। क्योंकि यहाँ, आश्रम में विभिन्न देशों के बहुत से लोग आते रहते हैं, हम चीजों और परिस्थितियों को ग्रहण करने के उनके विभिन्न नज़रियों को अक्सर नोटिस करते हैं। और समस्याओं का सामना होने पर उनके व्यवहार में दिखाई देने वाले मूलभूत अंतर को भी। विशेष रूप से यह पहलू मुझे बड़ा रोचक लगता है और मुझे इसका सबसे प्रमुख और निर्णयात्मक असर डालने वाला कारण यह नज़र आता है: आप किसी धनी मुल्क में, संपन्न परिवेश में रहकर बड़े हुए हैं या आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए देश में!

जब आपके सामने कोई बड़ी समस्या पेश आती है तब आप क्या करते हैं? इसकी कई संभावनाएँ हो सकती हैं-आप घबराकर थर-थर काँपने लगें कि अब क्या होगा और हो सकता है, आप बुरी तरह अवसादग्रस्त हो जाएँ। यह भी हो सकता है कि आप हिम्मत बांधकर, शांत मन से समस्या के बीच से गुज़रते हुए कोई न कोई रास्ता निकाल लें और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करें। कुछ लोग समस्याओं को छिपाने की और उनसे बचकर निकलने की कोशिश और उनकी उपेक्षा करते हैं, उनकी ओर से आँखें मूँद लेते हैं, जैसे समस्या मौजूद ही न हो- लेकिन इससे परिस्थितियाँ कतई ठीक नहीं होतीं।

तो आपकी प्रतिक्रिया के पीछे मुख्य रूप से दो ही भावनाएँ होती हैं: या तो आप डर जाते हैं या नहीं डरते।

और जबकि मैंने बहुत से विभिन्न लोगों में दोनो तरह की प्रवृत्तियाँ देखी हैं, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उन देशों में जहाँ आर्थिक सुरक्षा की स्थिति बेहतर है, जो अधिक विकसित हो चुके हैं और प्रथम विश्व का हिस्सा हैं, वहाँ के लोगों में भयभीत होने की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक पाई जाती है।

इसका कारण, हालाँकि बड़ा विचित्र लगता है, परन्तु पर्याप्त समझ में आने वाला है! इन देशों में ज़्यादातर लोग सुख-संपन्नता में जीवन बिताते हैं। उनके लिए कभी भी, जब इच्छा हो या ज़रूरत हो, बाज़ार जाकर सामान खरीद लाना बहुत सहज होता है। संभव है, वे रोज़ माल जाकर नई-नई महंगी चीज़ें न खरीद पाते हों लेकिन सामान्य रूप से किसी के सामने यह परिस्थिति नहीं आती कि वाकई कोई सख्त जरूरत हो और न खरीद सकें और उनके आसपास भी ऐसे लोग बिल्कुल नज़र नहीं आते। यह एक वास्तविकता है कि वहाँ बहुत से लोगों ने कभी कोई नुकसान भी नहीं झेला होता।

और इसीलिए उन लोगों के मन में हर बात में यह प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि ऐसा होने पर न जाने कौन सी मुसीबत आए या ऐसा करूँगा तो पता नहीं उसका क्या नतीजा हो! उनके दिमाग में एक के बाद एक डरावने दृश्य आते रहते हैं और हर वक़्त वे यही सोचते रहते हैं कि भविष्य में क्या होगा और इसलिए उन्हें हमेशा ज़रा सी हलचल पर भी भूचाल का अंदेशा होने लगता है।

उन मुल्कों में जहाँ गरीबी व्याप्त है, लोग हर पल अपने आसपास संघर्ष देखते हैं और इसलिए उन्हें सामान्य परेशानियों और कठिनाइयों का डर नहीं सताता। इसका अर्थ यह नहीं कि वे उन्हें पसंद करते हैं लेकिन वे उन्हें अधिक तर्कसंगत तरीके से देखते-समझते हैं और ज़्यादातर मामलों में उन्हें जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं बना लेते- अर्थात वे सोचते हैं कि, ऐसा हो भी जाए तो भूखों मरने की नौबत तो नहीं आने वाली है! संघर्ष उन्हें सहज रूप से स्वीकार्य होता है और यह संघर्ष उन्हें समस्याओं से पार लगाता है। यह एक ऐसा वैचारिक (भावनात्मक) सुरक्षा-कवच है जो उन्हें सुकून प्रदान करता है।

वास्तविकता समझें: ज़्यादातर समस्याएँ ऐसी नहीं होतीं कि उनसे आपके जीवन में विराम की स्थिति पैदा हो या आपकी दुनिया टूटकर बिखर जाए या आप मौत के मुँह में पहुँच जाएँ। तो भले ही आपकी पृष्ठभूमि आपसे कहती रहे कि इन समस्याओं के सामने आप लाचार हैं, आप इस प्रवृत्ति पर काबू पाएँ और तब आप देखेंगे कि समस्या थी ही नहीं या तब आपको पता चलेगा कि आप उनके बीच से गुजरकर सुरक्षित निकल आए हैं!

एक धनाढ्य कंगाल आदमी – 6 जुलाई 2014

सन 2006 में मुझे यूरोप की बहुत सी जगहों की यात्रा करने का और बहुत से लोगों को जानने का मौका मिला। एक आयोजक से मिलने के बाद मुझे लगा कि मैं ऐसे लोगों से पहले भी मिल चुका हूँ और आने वाले वर्षों में और भी कई ऐसे लोगों से मिलता रहूँगा: ऐसे व्यक्ति, जिनके पास बहुत धन-दौलत है मगर मैं जिन्हें दरिद्र ही कहूँगा!

मेरा यह आयोजक, जो पहले मेरे दो कार्यक्रमों में शामिल हुआ था और फिर अपने घर में मेरे और यशेंदु की कार्यशालाएँ और योग-सत्र आयोजित करना चाहता था, एक चालीस साल का तलाकशुदा अकेला व्यक्ति था। उसका तलाक हो चुका था और बच्चे भी नहीं थे। उस समय तक वह किसी सम्बन्ध में बंधा हुआ भी नहीं था। उसके पास सिर्फ एक चीज़ थी: बहुत सा पैसा!

मजबूरन अपनी भूतपूर्व पत्नी को अच्छी-खासी रकम देने के बाद भी वह एक बड़े, आलीशान मकान में रहता था, एक महँगी कार की सवारी करता था और इतनी अतिरिक्त दौलत उसके पास बची हुई थी कि उसके दैनिक खर्च, ऐयाशियाँ और मनमर्ज़ी के दूसरे खर्च उनसे निकल रहे थे। वह किसी बड़ी कंपनी में प्रबंधन के वरिष्ठ पद पर आसीन था और बड़ी मात्रा में उसके पास पुश्तैनी धन-दौलत भी थी। लेकिन उसके साथ रहते हुए मुझे महसूस हुआ कि ज़्यादा धन-दौलत भी एक समस्या ही बन जाती है: वह उसका उपयोग नहीं कर पाता था, उसका मज़ा नहीं ले पाता था! एक सीमा के बाद उसकी कंजूसी की अति देखकर मैं यह सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर यह व्यक्ति पैसे के वास्तविक महत्व को समझता भी है या नहीं।

यह व्यक्ति छोटे-मोटे खर्चों पर भी बिदकता था। जब खरीदारी करने बाज़ार जाता तो एक से एक सामानों से भरी आलमारियों के सामने घंटों खड़ा रहता और चुनकर सबसे सस्ती चीज़ उठाता-खाने का तेल हो, पानी, चीज़, मक्खन कुछ भी हो-भले ही वह घटिया क्यों न हो। जब भी हम किसी भी बात पर चर्चा करते, उस पर होने वाला संभावित खर्च उसके मन में सर्वोपरि होता। यहाँ तक कि सफ़र में जब कभी उसे टॉयलेट की ज़रुरत महसूस होती वह लम्बी दूरी तय करता मगर किसी पेड टॉयलेट के लिए पैसे खर्च करना उसे मंज़ूर नहीं था! हर बात, हर दैनिक व्यवहार में रुपया उसके सोच का सबसे अहम् मुद्दा होता था!

दरअसल मैं इसे बिना अचरज और कोफ्त के स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था और आखिर उसकी इस आदत के बारे में मैंने पूछ ही लिया। लेकिन उसके लिए यह ऐसी आदत बन चुकी थी कि वह इस तरह सोच ही नहीं पा रहा था, उसे समझने में मुश्किल हो रही थी कि मैं उसे क्या बताना चाह रहा हूँ।

मैं नहीं समझता कि पैसा लोगों को धनवान बनाता है। धनी होने के लिए आपके दिल में प्रेम होना चाहिए, सुंदर विचार होने चाहिए, संवेदनशील मन होना चाहिए, स्नेहिल भावनाएँ होनी चाहिए! और दुर्भाग्य से अगर आप हर चीज़ को पैसे से जोड़ लेते हैं तो आप प्रेम का न तो अनुभव कर सकते हैं और न ही अपना प्रेम प्रदर्शित कर सकते हैं!

दरअसल वह एक कंगाल व्यक्ति था। मैंने उसके साथ अपनी थोड़ी सी दौलत साझा करने की कोशिश की और मुझे लगता है, उसने भी उसे महसूस किया होगा!

प्रेम के साथ जीवन गुजारें या भोग-विलास में – 16 जुलाई 2013

मैंने पहले ही इस समस्या की ओर अपने पाठकों का ध्यान खींचा था और आज उस पर विस्तार से प्रकाश डालने का इरादा कर रहा हूँ। सभी को और विशेषकर अभिभावकों को यह निर्णय लेना ही पड़ता है कि उनके जीवन में ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या है: प्रेम या ऐश-ओ-आराम? आप क्या चुनेंगे?

स्वाभाविक ही, रोमांटिक लोग यही कहेंगे कि प्रेम ही चुनो। प्रेम का चुनाव करना वैसे भी एक आदर्श बात होगी क्योंकि ऐश-ओ-आराम कौन चाहता है? सभी प्रेम चाहते हैं! इसलिए सारे आराम और भोग-विलास भूलकर प्रेम कीजिए!

चलिये, अब इसके व्यावहारिक पहलू पर आते हैं-और यहाँ यह प्रश्न थोड़ा कठिन हो जाता है। आप आसानी से कह देते हैं कि आप प्रेम को आराम से ज़्यादा महत्व देते हैं मगर आखिर आराम शुरू किस बिन्दु से होता है? यह स्पष्ट रूप से एक आराम या सुविधा मानी जाएगी कि कोई साल में पाँच दिन किसी शानदार जगह में छुट्टी बिताने चला जाए, वह भी चार्टर्ड प्लेन में। दूसरी तरफ अधिकांश लोगों के लिए यह तय करना ही बड़ा मुश्किल है कि दिन भर में कितना समय वे काम करें। उनके लिए साल में एक या दो दिन की भी छुट्टी मिल जाए तो बहुत है। सीधा सा प्रश्न यह है कि क्या आपको सिर्फ कुछ ज़्यादा कपड़े खरीदने के लिए या अधिक हाई-टेक उपकरण खरीदने के लिए या बेहतर तकनीकी समाग्री खरीदने के लिए या ज़्यादा आरामदेह यात्रा करने के लिए ज़्यादा काम करना चाहिए? या फिर, क्या आपको कुछ कम काम करके ज़्यादा समय अपने परिवार के साथ बिताना चाहिए?

अगर आप किसी विशेष स्तर का रहन-सहन चाहते हैं तो उसे पाने के लिए आपको एक नियत समय तक काम करना होगा। अगर यह स्तर कुछ ऊंचा है तो कुछ ज़्यादा काम करना होगा। अगर आप ज़्यादा काम करेंगे तो आप अपने बच्चों और परिवार को कम वक्त दे पाएंगे। आप अपने जीवन साथी और बच्चों के साथ प्रेम करते हुए, खेलते हुए, हँसते-गाते और जीवन का आनंद लेते हुए उसी अनुपात में कम समय गुज़ार पाएंगे।

कई संबंध सिर्फ इस कारण से टूट चुके हैं कि दो में से एक साथी समझता है कि उसका साथी काम में इतना व्यस्त रहता है कि प्रेम के लिए उसके पास न तो समय होता है न ही ताकत। इससे भी बड़े विवाद बच्चों और अभिभावकों के बीच खड़े होते हैं। परिवार का मुखिया, जिस पर परिवार के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी भी होती है, काम के बोझ तले इतना दब जाता है कि अपने बच्चों को जान पाने का अवसर ही उसे नहीं मिल पाता। उनके बीच कोई खास संपर्क नहीं रह जाता-भले ही इसके बदले उनके पास सुविधा और ऐश-ओ-आराम की हर वस्तु उपलब्ध हो जाती है।

अगर आप अपने बच्चों के साथ ज़्यादा वक़्त गुजारना चाहते हैं तो आपको कुछ सुविधाओं और आराम की कुछ वस्तुओं के बगैर काम चलाना होगा। हमने ऐसा करने का निर्णय लिया है। अगर हम चाहते कि हम ज़्यादा रुपया कमाएं तो मुझे ज़्यादा सफर करना पड़ता, विदेश जाकर महीनों रहना पड़ता, वहाँ बहुत सी कार्यशालाएँ और सेमिनार आयोजित करने पड़ते। हम अभी जितना कमाते हैं, विदेशों में यह सब करके उससे कई गुना ज़्यादा कमा सकते थे, लेकिन हमने निर्णय किया कि अतिरिक्त रुपया कमाने की जगह हम अपनी बेटी के साथ ज़्यादा समय गुजारेंगे। हम अब भी काम करते हैं, और काफी मेहनत के साथ अपना काम करते हैं लेकिन हम स्वतंत्र हैं कि जब चाहें काम से अवकाश ले लें और अपनी बेटी अपरा के साथ खेलना शुरू कर दें। हमने एक बीच का रास्ता अपना लिया है।

इस चर्चा से यह निष्कर्ष निकलता है कि हर एक को अपने लिए ऐश-ओ-आराम की एक सीमा निर्धारित करनी पड़ती है और उसी के अनुपात में उस समय सीमा का भी निर्धारण करना पड़ता है जिसे वह अपने परिवार और बच्चों के साथ बिताना चाहता है। आप इसे किसी भी तरह से साधें, एक बात कभी न भूलें: अपने और परिवार के भोग-विलास को इतना ज़्यादा महत्व न दें कि प्रेम की अनदेखी हो जाए, उसका तिरस्कार हो जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बच्चों की अवहेलना या उनका तिरस्कार न हो। बच्चे आपका प्यार चाहते हैं, भले ही उनके पास एकाध खिलौना कम हो, भले ही छुट्टियाँ बिताने किसी हिल स्टेशन पर न जा पाएँ या महंगे कपड़े न खरीद पाएँ। उन्हें आपकी ज़रूरत है, न कि इन अतिरिक्त वस्तुओं या सुविधाओं की।

देशों और संस्कृतियों की तुलना करनी चाहिए मगर यह काम बहुत मुश्किल है – 15 जुलाई 2013

बच्चों की परवरिश के विषय में पिछले हफ्ते मैंने बहुत कुछ लिखा था और लोगों से अपनी महत्वाकांक्षाओं पर लगाम रखने की गुजारिश की थी। इसके अलावा यह भी कहा था कि वे अपनी आवश्यकताओं का भी यथार्थपरक अनुमान लगाएँ जिससे वे पैसा कमाने में ज़्यादा समय न लगाएँ और बचा हुआ समय बीबी-बच्चों के साथ बिता सकें। मेरी इस बात पर एक माँ ने मुझसे अपनी परिस्थिति बयान करते हुए कहा, "मैं जानती हूँ कि भारत के गरीब परिवारों की तुलना में मेरे पास बहुत कुछ है और…" उसके इस वाक्य ने मुझे ऐसी तुलनाओं के विषय में सोचने के लिए मजबूर कर दिया और अपने उन विचारों को मैं आज आपके सामने रख रहा हूँ।

मुख्य प्रश्न है: क्या आप भारत जैसे विकासशील देश की तुलना विकसित पश्चिमी देशों से कर सकते हैं? या क्या इन देशों के लोगों की आपस में तुलना करना ज़्यादा उचित होगा?

निश्चय ही एक हद तक आप ऐसा कर सकते हैं और यह अक्सर अच्छा ही होता है। जब आप दोनों देशों में रह रहे होते हैं और आपका उनसे लगातार संपर्क बना रहता है तो यह स्वाभाविक रूप से और अक्सर ही होता रहता है। दोनों देशों के लोगों का रहन-सहन कैसा है, उनके विचार क्या हैं, वे कितना कमाते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है, उनके जीवन में किस बात का कितना महत्व है और किन चीजों की उन्हें परेशानी होती है और उनकी आदतें क्या हैं? आदि आदि।

पश्चिमी देशों की नज़र से गरीब देशों को देखने का अर्थ है कि वास्तविकता से दो-चार होना। आपको समझ में आता है कि दरअसल आप बहुत सी ऐसी बातों से भी परेशान हो जाते हैं जो दरअसल जीवन में बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। आपको हमेशा लगता रहा है कि आपके पास पर्याप्त कपड़े नहीं हैं मगर फिर आपको पता चलता है कि दूसरों के पास सिर्फ एक या दो जोड़ी कपड़े ही हैं। यह आपके लिए जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं है कि आपका व्यापार कुछ मंदा चल रहा है जबकि दूसरे बहुत से लोगों के पास दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल से हो पाता है और अगर परिवार का मुखिया कुछ दिन बीमार हो जाए तो खाने के लाले पड़ जाते हैं। दुनिया के कई मुल्कों के लोग भुखमरी का सामना कर रहे हैं, उनका धर्म, जाति और लिंग के नाम पर दमन किया जा रहा है और समाज में उनके जीवन की कोई कीमत नहीं रह गई है और हर वक्त मौत का खौफ खाए जाता है।

तो, इस तरह की तुलना से आप अपने जीवन को बेहतर तरीके से और एक मौलिक नज़रिये से समझ पाते हैं। तब आप अपने जीवन से संतुष्ट हो पाते हैं और हो सकता है कि आप अपने आसपास के लोगों के साथ अपने व्यवहार पर भी पुनर्विचार करके उसे बेहतर बनाने के प्रयास करें।

शायद ऐसी तुलना उचित ही है और शायद इनका सकारात्मक असर भी होता होगा मगर दोनों के मध्य के विशाल अंतर को देखते हुए किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए यह तुलना निरर्थक ही सिद्ध होती है। ऐसी बहुत सी बाते हैं जो दो देशों या दो संस्कृतियों को देखने के आपके नज़रिये को प्रभावित करती हैं और उन बातों पर अलग से कई लंबे-लंबे लेख लिखे जा सकते हैं।

मैं एक उदाहरण देना चाहता हूँ। आप कहते हैं कि गरीब भारतीय लोगों के पास आपकी तुलना में बहुत कम साधन उपलब्ध है क्योंकि आप एक विकसित देश में रहते हैं। यह बिल्कुल ठीक होगा अगर आप सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से इसका आकलन कर रहे हों मगर आप निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते कि ये गरीब लोग आपसे ज़्यादा परेशान हैं। उनका जीवन पैसे के मामले में तो बहुत कठिन है मगर मानसिक रूप से वे आप लोगों से बहुत कम तनाव में रहते हैं। आपके पीछे कई तरह की जिम्मेदारियाँ और महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं जिन्हें आपको पूरा करना होता है। आपको हर काम अपनी मर्ज़ी से करना होता है और पूरी तरह सही काम करना होता है अन्यथा गलत काम के आप अकेले जिम्मेदार ठहराए जाते हैं, परिवार या समाज का कोई सदस्य आपकी मदद के लिए नहीं आने वाला।

आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि यह बात बहुत से गरीबों के लिए कितना मानसिक सुकून पहुँचाने वाली होती है कि उनके पास खोने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है। जिनके पास थोड़ा-बहुत धन है, वे भी आप लोगों से ज़्यादा मानसिक शांति में जीवन बिताते हैं क्योंकि उन्हें भी भौतिक सुविधाओं और संपत्ति से उतना मोह नहीं होता। इसके अलावा एक विशाल परिवार उनके पीछे खड़ा होता है जो उनके भीतर आपसी सुरक्षा और मानसिक संबल की भावना पैदा करता है।

आप यह न समझें कि मैं आपसे किसी खास दृष्टिकोण से दुनिया को देखने के लिए कह रहा हूँ। आप स्वयं यह निर्णय करें कि आप किस तरह या किस नज़रिये से उसे देखना चाहते हैं। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि मेरे पास किसी देश या समाज या संस्कृति को बेहतर और किसी दूसरे को कमतर समझने का कोई कारण नहीं है। पहली बात तो ऐसी तुलना करना बहुत मुश्किल होता है और फिर आपको किसी देश या समाज और उसकी संस्कृति को जानने के लिए वहाँ बहुत समय बिताना पड़ता है तभी आप ऐसी किसी तुलना की शुरुआत करने के काबिल हो सकते हैं।

कैसे संस्कृतियों का भेद गरीबी की परिभाषा बदल देता है – 14 जून 2013

पिछले दिनों मैंने यूनिसेफ के अनुसार पश्चिमी बच्चों की न्यूनतम जरूरतों और उनके साथ भारतीय बच्चों की जरूरतों की तुलना की थी। कुछ बिन्दु रह गए थे जिनका विवेचन नीचे प्रस्तुत है।

12. दो जोड़ी उनके पैरों के नाप के जूते (हर मौसम में पहनने योग्य जूतों सहित)

यह बहुत महत्वपूर्ण बात है और मुझे लगता है कि अभिभावकों पर इसका इतना बोझ होता है कि इसे कम आँकने की भूल नहीं की जानी चाहिए। बच्चों के पैर जल्दी-जल्दी बढ़ते हैं और उन्हें नियमित रूप से बीच-बीच में नए जूतों की आवश्यकता पड़ती रहती है जिससे वे ठीक तरह से चल सकें, दौड़ सकें और कूद-फांद कर सकें। सौभाग्य से भारत के इस भाग में, जहां हम रहते हैं, मौसम ऐसा होता है कि आप बिना जूतों के ही सारा साल दौड़-भाग कर सकते हैं। लेकिन सड़कों के बन जाने और आबादी के बढ़ जाने के कारण अब न तो यह इतना आसान रह गया है न ही स्वास्थ्य के लिए ही ठीक है। हम अपने स्कूल के बच्चों को काले स्कूल के जूते और स्कूल यूनिफ़ोर्म मुहैया कराते हैं और हम देखते हैं कि बच्चे उन्हीं जूतों को सारा दिन पहने रहते हैं क्योंकि उनके पास दूसरे जूते नहीं होते। गर्मी के मौसम में अवश्य वे उन्हें निकालकर रखना पसंद करते हैं। फिर रबर की हल्की और सस्ती चप्पलें होती हैं जिसका आकार इतना लचीला और मुलायम होता है कि आप बच्चों को बड़े या छोटे साइज़ की चप्पलों में घूमते देख सकते हैं। मैं तो जूतों की संख्या को एक ही रखना उचित समझता हूँ मगर भारत में अगर किसी के पास एक भी जूता नहीं है तो उसे गरीब की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

13. कभी कभार अपने घर में दोस्तों को न्योता देने, उनके साथ खेलने और भोजन करने की सुविधा

यह एक और बिन्दु है जिसके संदर्भ में, मेरे विचार में, अधिकांश भारतीय बच्चे अमीर देशों के उन बच्चों से ज़्यादा अमीर साबित होते है जिनके बारे में यह अध्ययन किया गया है। भारत में गरीब से गरीब बच्चा भी अपने दोस्तों को घर आमंत्रित करता है। हमारे स्कूल के बच्चे जब मर्ज़ी होती है, एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं और वहाँ नाश्ता करते हैं, खाना भी खाते हैं। यह अतिथि-सत्कार की भारतीय परंपरा के कारण भी हो सकता है जिसके अनुसार, जो भी थोड़ा-बहुत आपके पास है, दूसरों के साथ खुशी-खुशी साझा करना अच्छा माना जाता है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि पश्चिमी गरीब अभिभावक अपनी गरीबी पर भारतीय गरीबों से ज़्यादा शर्मिंदा होते हों। भारत में गरीबों की संख्या इतनी ज़्यादा है कि भारतीय गरीबों में गरीबी की उतनी कुंठा नहीं पाई जाती।

14. विशेष अवसरों पर जैसे जन्मदिन, नेम डे और अन्य धार्मिक त्योहारों पर खुशी मनाने की सुविधा

मैं ऐसे कई लोगों से मिल चुका हूँ जो यह जानकार दंग रह गए कि हमारे स्कूल के अधिकांश बच्चे यह भी नहीं जानते कि उनका जन्मदिन किस दिन पड़ता है। यह उनके अभिभावक भी नहीं जानते क्योंकि जन्मदिन को इतना महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। इसके पीछे हमारी अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हाथ हो सकता है या फिर यह हो सकता है कि ऐसे अवसरों पर वे कोई विशेष आयोजन कर पाने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं।

लेकिन धार्मिक आयोजन बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। कितना भी गरीब हो, त्योहार, जैसे दीवाली आदि, ज़रूर मनाएगा। एक दिया ही जलाए, लक्ष्मीजी से अगले वर्ष कुछ बेहतर आर्थिक लाभ की प्रत्याशा करते हुए छोटी-मोटी पूजा ही कर पाए मगर दिवाली अवश्य मनाएगा।

उनके ऐसा करने को मैं अच्छा या बुरा नहीं कह रहा हूँ क्योंकि बहुत छोटे और साधारण आयोजन से लेकर विशाल और बहुत सारे, उपहार और पार्टियों से युक्त बहुत ख़र्चीले आयोजन तक इन त्योहारों पर किए जाते हैं। क्या इन आयोजनों में सिर्फ त्योहार की मौज-मस्ती ही होती है क्योंकि सारा वातावरण ही त्योहारमय नज़र आता है? या फिर सारा परिवार और दूसरे नाते-रिश्तेदार इकट्ठा हो जाते हैं, इसलिए यह महत्वपूर्ण है? क्या यह बिना पैसे के, बिना इतने दिखावे और तड़क-भड़क के नहीं किया जा सकता?

आवश्यकता और विलासिता – भारत और पश्चिमी देशों के अलग-अलग मानदंड – 13 जून 2013

कल और परसों मैंने अमीर देशों में मौजूद गरीब बच्चों के बारे में यूनिसेफ के विचारों पर बिन्दुवार जानकारी दी थी। ये विचार भारत जैसे देश के संदर्भ में कितने मौजूं हैं? आगे पढ़िये:

8. शालाओं द्वारा आयोजित यात्राओं में और दूसरे कार्यक्रमों में शामिल होने में लगने वाला खर्च

इसका तो छोटा सा जवाब है: भारत में एक तरफ कुछ परिवार ऐसे हैं जो अपने बच्चों को किसी निजी स्कूल में पढ़ाने में, किताबें और यूनीफ़ोर्म खरीदने में और फीस अदा करने में सक्षम हैं तो दूसरी तरफ ऐसे परिवार भी हैं जो इतना खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकते। ऊपर से स्कूल ट्रिप वगैरह का खर्च अधिकांश गरीब परिवारों के लिए कुछ ज़्यादा ही कहा जाएगा।

यह बताते हुए हमें गर्व हो रहा है कि हमारे आश्रम के उत्सवों में कस्बे के सभी गरीब बच्चों को हम अच्छे से अच्छा भोजन उपलब्ध कराते हैं। उत्सवों के दौरान आसपास मिलने वाले बेहतरीन मिठाई आदि भी भोजन में शामिल किए जाते हैं।

9. होमवर्क करने के लिए प्रकाश युक्त, शांत और एकांत कमरे

इस मामले में भी अधिक आवश्यक जरूरतों का ध्यान हमें पहले रखना होगा और होम वर्क के लिए अलग कमरे का नंबर बहुत बाद में आएगा। चार, पाँच या और भी ज़्यादा सदस्यों वाले बहुत से भारतीय परिवार एक या दो कमरों वाले किराए के मकानों में रहते हैं। एक ही कमरा उनकी बैठक, रसोई, सोने का कमरा, ऑफिस, वर्कशॉप, बच्चों का कमरा, वार्डरोब, सब कुछ होता है। अगर हम वह स्तर प्राप्त कर लें जहां इन कामों के लिए अलग-अलग कमरे उपलब्ध हों तो ऐसे लोग गरीब ही नहीं माने जाएंगे।

10. इंटरनेट कनेक्शन

सूची में यह बिन्दु देखकर मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ था लेकिन अब मैं समझता हूँ कि यह भी आज अध्ययन का और दुनिया भर की जानकारी से अद्यतन रहने का एक महत्वपूर्ण साधन बन गया है। पश्चिम में बहुत सा होमवर्क आजकल इंटरनेट पर ही किया जाता है और सामाजिक जीवन भी बहुत हद तक ऑनलाइन स्थानांतरित हो गया है। जिसके पास इंटरनेट नहीं है उसे दुनिया से कटा हुआ ही माना जाएगा।

लेकिन ऐसी जगह जहां 48 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान के बावजूद अधिकांश लोगों के पास अभी फ्रिज या सीलिंग फ़ैन भी नहीं है, इंटरनेट का उपलब्ध न होंगा गरीबी का सटीक उदाहरण नहीं हो सकता।

11. कुछ नए कपड़े (अर्थात, सेकंड हैंड नहीं)

हमसे लोग अक्सर पूछते रहते हैं कि क्या वे आश्रम आते समय बच्चों के लिए कपड़े लेकर आएँ और हम हमेशा उनकी इस सहायता को कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं। थोड़ा-थोड़ा ही सही हम उन्हें तब तक इकट्ठा करते रहते हैं जब तक कि हमारे पास इतना न हो जाए कि हम अपने सभी बच्चों और उनके अभिभावकों को पर्याप्त कपड़े खुले हाथों न बाँट सकें। आप कल्पना नहीं कर सकते कि ये परिवार इन सेकंड हैंड कपड़ों को पाकर कितना प्रसन्न होते हैं। वैसे दूसरों के उतरे हुए कपड़े पहनने में क्या हर्ज हो सकता है? वे लगभग नए के नए होते हैं, फटे नहीं होते और गला देने वाली ठंड में उन्हें ऊष्मा और सुरक्षा प्रदान करते हैं।

पश्चिम के मानदंडों के अनुसार, जहां धनी परिवार के बच्चों का भी ब्रांडेड कपड़े न पहनने पर मज़ाक बनाया जाता है, मैं इसे समझ सकता हूँ। लेकिन मेरा विचार है कि वहाँ भी अपेक्षाओं और स्तर को थोड़ा नीचा करने की आवश्यकता है। बच्चों का ध्यान बाहरी तड़क-भड़क से हटाकर आंतरिक मूल्यों की तरफ मोड़ना उचित होगा!

भारतीय और पश्चिमी बच्चों के खेलों की तुलना – 12 जून 2013

यूनिसेफ द्वारा घोषित अमीर देशों के बच्चों के लिए आवश्यक सुविधाओं की सूची पर मैंने कल से लिखना शुरू किया था। दो या उससे अधिक सुविधाओं से वंचित यूरोपीय बच्चों को यूनिसेफ ने गरीब घोषित किया है। भारत की परिस्थिति से मैं बिन्दुवार उनकी तुलना कर रहा हूँ।

6. फुरसत के समय नियमित व्यायाम के साधन और सुविधाएं, जैसे तैरना, वाद्य बजाना या युवा संगठनों में कार्य की सुविधा

यह पहली सुविधा है जिसे मैं मानता हूँ कि वह यूरोपीय देशों में तो आवश्यक हो सकती है मगर भारत में उनकी आवश्यकता ही नहीं है। पश्चिमी देशों, यूरोप और अमरीका और आस्ट्रेलिया में कई वर्ष तक यात्राएं करने के कारण मैं जानता हूँ कि वहाँ बच्चे अधिकांश समय घर में रहते हैं, टीवी के सामने बैठे रहते हैं और उनका इधर-उधर घूमना-फिरना बहुत कम होता है। यह गरीबी की समस्या नहीं है। बच्चों को कभी-कभार वैसे ही बाहर निकलकर खुली हवा में घूमने-फिरने और कई दूसरे कामों में मन लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, भारत में बच्चे सारा दिन बाहर ही रहते हैं। हो सकता है खेलने की, तैरने की और कुछ सीखने की उतनी संगठित सुविधाएं भारत में बच्चों को प्राप्त न हों मगर बच्चों को उनकी आवश्यकता भी नहीं होती। वे बाहर निकलते हैं, यार-दोस्तों से मिलते-जुलते हैं, सड़क पर खेलते-कूदते हैं और जो कुछ भी उन्हें दिखाई देता है या मिल जाता है उसी का उपयोग खेल और मनोरंजन के लिए कर लेते हैं। जब हम छोटे थे, नदी किनारे बहुत सारे दूसरे लड़के हमें मिल जाते थे जिनके साथ हम दिन भर तैरते रहते थे। हमारे आश्रम के बच्चों को सिर्फ एक गेंद चाहिए या ज़्यादा से ज़्यादा एक क्रिकेट बैट, और वे दिन भर खेलते रह सकते हैं। इतने सारे खेल हैं जिनमें बहुत सारे साजो-सामान की ज़रूरत नहीं होती। एक लाठी, जूता या कुछ भी न हो तो भी काम चल जाता है। भारत में इतनी अधिक तादात में बच्चों का होना भी इसका कारण हो सकता है। जर्मनी में मैंने पाया है कि बच्चों को साथ के लिए बराबरी के बच्चे मिलना कितना मुश्किल होता है इसलिए अगर उनके लिए खेलने या किसी दूसरी गतिविधि के लिए यूथ क्लब या बच्चों के संगठन न हों तो वे अकेलापन अनुभव कर सकते हैं। भारत की आबादी इतनी ज़्यादा है कि आपको बच्चों की कमी कभी भी महसूस नहीं हो सकती। सड़क पर, मैदानों में, नदी किनारे, सब जगह हर उम्र के बच्चे खेलने या दूसरी गतिविधियों के लिए मिल जाएंगे।

7. बंद कमरों में खेलने के उपकरण और सुविधाएं (कम से कम प्रति शिशु एक, बच्चों के शिक्षाप्रद खिलौने, बिल्डिंग ब्लोक्स, बोर्ड गेम्स, कंप्यूटर गेम्स आदि.

इस बिन्दु पर कुछ लिखने के लिए मुझे थोड़ी सी दिमागी मशक्कत करनी पड़ी। इसलिए नहीं कि मुझे इस बात का शक है कि यह बिन्दु भारत के संदर्भ में प्रासंगिक है या नहीं, बल्कि इसलिए कि मैं इस जटिल बात को बेहतर ढंग से रखना चाहता हूँ जिससे आप उसे ठीक तरह से समझ सकें। यूनिसेफ ने उदाहरण देते हुए ‘शिक्षाप्रद’ शब्द का उपयोग किया है। बात यह है कि इससे उसका क्या मतलब हो सकता है? भारत में भी हर सक्षम परिवार अपने बच्चों को उसके लायक खिलौने देने की कोशिश तो करता ही है। गरीब परिवारों में यह फटे कपड़ों से बनाई जाने वाली गुड़िया हो सकती है। बच्चे के पास खिलौना होगा लेकिन क्या वह ‘शिक्षाप्रद’ है? तब फिर अभिभावकों की शिक्षा का प्रश्न उपस्थित हो जाता है। एक गुड़िया बच्चों को बहुत सी बातें सिखा सकती है लेकिन तभी जब बच्चों को गुड़िया देने वाले अभिभावक उन्हें कुछ सिखा सकें!

इसके अलावा, घर और बाहर का विचार ही भारत में, जहां जर्मनी या पश्चिमी देशों के अनिश्चित मौसम के मुक़ाबले गर्मी बहुत ज़्यादा पड़ती है, कुछ दूसरा ही है। जहां एक जर्मन बच्चे के लिए बिल्डिंग ब्लोक्स आवश्यक हो सकते हैं, भारतीय बच्चा, मान लीजिए एक गरीब मजदूर का बच्चा, किसी भवन निर्माण की साइट पर बैठकर वास्तविक ईंटों और पत्थरों के टुकड़ों से यही काम ले सकता है और अपना मनोरंजन कर सकता है।

इस परिभाषा के अनुसार भारतीय बच्चों के लिए भी ये खिलौने उतने ही आवश्यक हैं मगर गरीब से गरीब बच्चे के लिए भी यह सुविधा भारत में उपलब्ध होती है!

तीन बार भोजन – क्या यह बच्चों के लिए विलासिता है? – 11 जून 2013

मैंने कल यूनिसेफ द्वारा अमीर मुल्कों, खासकर यूरोपीय देशों में मौजूद गरीब बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के बारे में चर्चा की थी। अध्ययन में 14 प्रकार के अभावों की एक तालिका दी गई है जिनमें से किन्हीं दो या अधिक की अनुपलब्धता उस बच्चे को गरीब मानने का पर्याप्त कारण हो सकती है। इस सूची को पढ़ते हुए मैं अपने देश, भारत के बच्चों के बारे में सोचे बगैर नहीं रह सका; आश्रम में रह रहे बच्चों के बारे में और उससे ज़्यादा उन बच्चों के बारे में जो आश्रम के स्कूल में पढ़ने आते हैं मगर अपने गरीब परिवार के साथ वहीं आसपास रहते हैं। स्पष्ट ही यूनिसेफ ने यह सूची विकसित देशों के गरीबों को ध्यान में रखकर बनाई है लेकिन उनकी आवश्यकताओं से युक्त इस सूची की तुलना भारत के गरीबों के लिए बनाई गई काल्पनिक सूची से करते हुए यह देखना कि उस सूची में कौन से बिन्दु होंगे और कौन से नहीं होंगे, बहुत रोचक हो सकता है। मैंने सोचा कि क्रमवार एक-एक बिन्दु को ध्यान में रखते हुए अपने विचार आज और कल की डायरियों में दर्ज करूँ।

1. तीन बार भोजन

2. कम से कम रोज़ एक वक्त मांस या मछली युक्त भोजन (या समतुल्य निरामिष आहार)

3. रोज़ ताज़ी सब्जियाँ और फल

अगर हम इन पहले तीन बिन्दुओं पर दृष्टिपात करें तो मैं कह सकता हूँ बहुत से भारतीय परिवार पहले बिन्दु पर ही संघर्ष करते नज़र आएंगे। दूसरे बिन्दु को पाना उनके लिए टेढ़ी खीर या लगभग असंभव होगा और तीसरे बिन्दु को तो भारत के संदर्भ में पूरी तरह छोड़ देना ही उपयुक्त है। भारत में ताज़े फल और सब्जियाँ बहुत महंगे होते हैं। आलू सबसे सस्ता होता हैं और अक्सर भोजन में पाया जाता है। भोजन की दूसरी वस्तुएँ कभी-कभार, विशेष आयोजनों पर थाली में दिखाई देती हैं। मौसमी सब्जियाँ और फल, जो सस्ते मिल जाते हैं सिर्फ अपने मौसमों में भोजन का हिस्सा बनते हैं।

फिर भी हर परिवार अपने बच्चों से प्रेम करता है और भरसक कोशिश करता है कि अपने बच्चों को अच्छे से अच्छा खाना खिलाए। हमारे स्कूल में जो बच्चे पढ़ने आते हैं उनके माता पिता भी इस आशा में ही अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं कि कम से कम यहाँ उन्हें भरपेट अच्छा भोजन प्राप्त होगा, जोकि स्कूल में उन्हें प्राप्त होता ही है। ऐसा होने पर उनकी कम से कम एक समस्या का समाधान हो जाता है। कम से कम उनके बच्चों का पेट भरा हुआ होता है!

4. उम्र के मुताबिक उपयुक्त पुस्तकें और जानकारियाँ (पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त)

गरीब भारतीय अभिभावकों की शिक्षा का स्तर यूरोप के अभिभावकों के मुक़ाबले बहुत नीचा होता है। शायद ही यूरोप में कोई अशिक्षित व्यक्ति होगा जब कि, उदाहरण के लिए, हमारे प्रदेश में हर दूसरा व्यक्ति अनपढ़ है। ऐसे लोग अपने बच्चों के लिए स्कूली किताबों के अलावा दूसरी किताबें क्यों खरीदेंगे? बच्चों को पढ़कर कौन सुनाएगा? वे स्कूली किताबें खरीद पाए यही उनके लिए पर्याप्त संतोष की बात होती है, और इतना भी कर पाना अधिकांश परिवारों के लिए काफी मुश्किल होता है। इसीलिए हमारे स्कूल में स्कूली किताबें मुफ्त मुहैया कराई जाती हैं, और कुछ कहानियों की किताबें भी होती हैं जिससे बच्चे कम से कम यहाँ पढ़ने में आनंद का अनुभव कर सकें।

5. खेलने के मैदान और उपकरण जैसे साइकिल, रोलर स्केट्स आदि

यह बिन्दु ‘विश्रांति’ के बारे है। हर व्यक्ति को विश्रांति की आवश्यकता होती है, अपने मन के मुताबिक खेलने की या थोड़ा-बहुत मौज-मस्ती करने की; लेकिन इसके उपकरण भारत में मूल आवश्यकता की सूची में नहीं आ सकते। इस देश में जहां भूख और बाल-मजदूरी के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है आपके रोलर स्केट्स और साइकिलें भारत के संदर्भ में गरीबी का पैमाना नहीं बन सकते।

एक अप्रासंगिक बात और! मैं अभी उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब भारत की सड़कों पर पहला व्यक्ति रोलर स्केटिंग करेगा। गुड लक!

अमीर देशों के गरीब बच्चे – 10 जून 2013

कुछ दिनों पहले रमोना ने यूनिसेफ द्वारा यूरोप के गरीब बच्चों के विषय में कराए गए अध्ययन की एक रपट पढ़ी थी। नतीजे बताते हैं कि कितने बच्चे आज भी अपने परिवार के साथ गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। यह भी कि किस यूरोपीय देश में, कितने बच्चों को वे आवश्यक वस्तुएँ और सुविधाएं नहीं मिल पातीं जो एक विकसित और सम्पन्न देश के बच्चों को मिलनी चाहिए। हमने इस अध्ययन को और उसके नतीजों को महत्वपूर्ण समझा और इसलिए उसे यहाँ साझा कर रहे हैं।

अध्ययन में कुल 14 वस्तुएँ और सुविधाएं हैं जो उन देशों के बच्चों को, जिन्हें अमीर मुल्क समझा जाता है, प्राप्त होनी चाहिए।

  1. तीन बार भोजन
  2. कम से कम रोज़ एक वक्त मांस या मछली युक्त भोजन (या समतुल्य निरामिष आहार)
  3. रोज़ ताज़ी सब्जियाँ और फल
  4. उम्र के मुताबिक उपयुक्त पुस्तकें और जानकारियाँ (पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त)
  5. खेलने के मैदान और उपकरण जैसे साइकिल, रोलर स्केट्स आदि
  6. फुरसत के समय नियमित व्यायाम के साधन और सुविधाएं, जैसे तैरना, वाद्य बजाना या युवा संगठनों में कार्य की सुविधा
  7. बंद कमरों में खेलने के उपकरण और सुविधाएं (कम से कम प्रति शिशु एक, बच्चों के शिक्षाप्रद खिलौने, बिल्डिंग ब्लोक्स, बोर्ड गेम्स, कंप्यूटर गेम्स आदि)
  8. शालाओं द्वारा आयोजित यात्राओं में और दूसरे कार्यक्रमों में शामिल होने में लगने वाला खर्च
  9. होमवर्क करने के लिए प्रकाश युक्त, शांत और एकांत कमरे
  10. इंटरनेट कनेक्शन
  11. कुछ नए कपड़े (अर्थात, सेकंड हैंड नहीं)
  12. दो जोड़ी उनके पैरों के नाप के जूते (हर मौसम में पहनने योग्य जूतों सहित)
  13. कभी कभार अपने घर में दोस्तों को न्योता देने, उनके साथ खेलने और भोजन करने की सुविधा
  14. विशेष अवसरों पर जैसे जन्मदिन, नेम डे और अन्य धार्मिक त्योहारों पर खुशी मनाने की सुविधा

इस अध्ययन से यह बात सामने आई कि इन विकसित देशों में बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिन्हें ऊपर उल्लिखित वस्तुओं या सुविधाओं में से कम से कम दो वस्तुएँ या सुविधाएं प्राप्त नहीं हैं। उदहरणार्थ: ब्रिटन में 5.5 प्रतिशत बच्चे इस श्रेणी में आते हैं। जैसी कि आपको उम्मीद होगी, स्केंडेनेवियन देशों, जैसे आइसलैंड, स्वीडन और नार्वे सबसे ऊपर हैं और उनके ठीक बाद हैं, फ़िनलैंड और डेनमार्क जहां सिर्फ 3 प्रतिशत बच्चे ही इस हालत में हैं। पूर्वी यूरोप के कई देश जैसे बल्गारिया और रोमानिया सबसे नीचे हैं जहां 72.6 प्रतिशत तक बच्चे ऊपर दी गई कम से कम दो सुविधाओं से महरूम हैं। जर्मनी में यह प्रतिशत 8.8 और फ्रांस में 10.1 है!

क्या यह शर्मनाक नहीं है कि फ्रांस और जर्मनी में हर दसवां बच्चा दो जोड़ी जूतों से महरूम है या उसे तीन बार भोजन प्राप्त नहीं हो पाता? इन विकसित देशों में, जहां भारत जैसी समस्याएँ नहीं हैं, इतनी बड़ी संख्या में गरीब बच्चे मौजूद हैं? मैं यह तो जनता था कि इन देशों में भी गरीबी है मगर ये आंकड़े इस विषय में बेहतर और ज़्यादा विस्तृत जानकारी मुहैया कराते हैं।

यह बहुत भयानक बात है कि ऐसे देशों में जहां सामाजिक सुरक्षा की इतनी अच्छी व्यवस्था है, जहां गरीबों की सहायता के बेहतरीन इंतजामात हैं, बच्चे भूखे रहें! मैंने हमेशा सुना है और खुद भी देखा है कि इन देशों में कई तरह से खुद सरकारें जरूरतमंदों को मदद मुहैया कराती हैं। मैं विक्षुब्ध हूँ कि यह सरकारी सहायता बच्चों तक नहीं पहुँच पाती।

यह बड़े दुख की बात है। बच्चे इस ब्रह्मांड का भविष्य हैं और यह हमारा कर्तव्य है कि उनकी क्षमता और प्रतिभा को विकसित होने देने का हर संभव अवसर उन्हें मुहैया कराएं। खासकर इन विकसित देशों में यह जानना बहुत आसान है कि भूखे और ज़रूरतमन्द बच्चों की संख्या कितनी है और वे कहाँ निवास करते हैं। उन तक मदद पहुंचाना संभव है और अगर सरकार ऐसा नहीं कर पा रही है तो व्यक्तिगत रूप से लोग अपने आस-पड़ोस में मौजूद ऐसे बच्चों की सहायता कर सकते हैं। यह हो सकता है कि आपको एहसास हो जाए कि आपको एक अतिरिक्त कार की ज़रूरत नहीं है। यह संभव है कि आप अपना तीसरा टीवी बेचकर उससे प्राप्त रकम को ऐसी किसी चैरिटी संस्था को दान कर दें जो ऐसे महरूम बच्चों की सहायता करती है। आप कई और तरीकों से भी इन बच्चों की सहायता कर सकते हैं, जैसे ऐसे वंचितों को खेलने के लिए कोई खुली जगह मुहैया करा सकते हैं, संगीत की मुफ्त शिक्षा प्रदान कर सकते हैं।

उठ खड़े होइए और शुरू हो जाइए! यह आपके देश के बच्चों का मामला है, यह आपके भविष्य का मामला है।

मुफ्त आध्यात्मिक विवाह कराइए: बस गुरु की दुकान से महँगे कपड़े खरीदने होंगे – 9 जून 2013

मैंने आपको एक आयरिश महिला के बारे में बताया था जिससे मेरी मुलाक़ात डब्लिन में सन 2005 में हुई थी और जिसे वर्षों की खोज के बाद अंततः एक उपयुक्त साथी मिल गया था। मैं खुश था कि आखिर उसकी बदहवासी दूर हुई थी और उसने ‘कोई अपना’ प्राप्त कर लिया था। हालांकि उसकी असुरक्षा और उसके पति की कुछ समस्याएँ उन्हें परेशानियों में डालते ही रहते थे। गुरु बनने के लिए और उसकी जिम्मेदारियों और उसके निर्णयों में साझा होने के लिए मेरे मना करने के बाद वह कुछ दूसरे गुरुओं की शरण लेती ही रहती थी। यह अच्छा हुआ कि वह मेरे संपर्क में बनी रही और बीच-बीच में हम आपस में हल्की-फुल्की, दोस्ताना बातें कर लिया करते थे। स्वाभाविक ही मैं बहुत खुश हुआ था जब उसने बताया कि वह और उसका साथी विवाह बंधन में बंध गए हैं। लेकिन जब मुझे पता चला कि उनका विवाह किन परिस्थितियों में और किस तरीके से हुआ है, तो मैं सोच में पड़ गया।

महिला और उसके साथी के सम्बन्धों में विवाह से पहले कई बार बीच-बीच में उतार-चढ़ाव आते रहते थे। एक बार जब उनकी प्रिय गुरु आयरलैंड आयी हुई थी, उनका प्रेम अपने चरम पर था और उन्होंने तय किया कि इस भारतीय गुरु द्वारा ही अपना विवाह सम्पन्न कराया जाए।

पता नहीं कहाँ से यह विचार उनके मन में आया; हो सकता है, गुरु के किसी शिष्य ने इस संभावना के बारे में उन्हें बताया हो। उस गुरु द्वारा दी जा रही बहुत सी सेवाओं में से यह भी एक थी। यहाँ तक कि विवाह संस्कार कराने की गुरु कोई फीस भी नहीं लेते थे और न ही दक्षिणा वगैरह स्वीकार करते थे!

अब आप सोच रहे होंगे और ठीक ही सोच रहे होंगे कि मैं इस आध्यात्मिक गुरु द्वारा दो प्रेमियों के फ्री में कराए गए विवाह को ऐसी शक की निगाह से क्यों देख रहा हूँ जब कि उसमें रुपए-पैसे का कोई मामला भी नहीं था। बात यह है कि रुपए-पैसे मामला था और काफी बड़ी रकम का मामला था! उस दंपति से गुरु ने विवाह संस्कार सम्पन्न कराने का तो कोई पैसा नहीं लिया मगर समारोह में लगने वाली आवश्यक वस्तुओं की खरीद उन्हें उस गुरु की संस्था से ही करनी पड़ी, यहाँ तक कि विवाह के अवसर पर पहने जाने वाले वर और वधू के वस्त्र भी उन्हीं की दुकान से खरीदने पड़े। ये सारी वस्तुएँ गुरु द्वारा अभिमंत्रित की गई थीं और कई वस्त्रों को गुरु द्वारा पहले पहना जा चुका था। कुछ अति-अंधभक्त शिष्य उन वस्त्रों को पवित्र मानते थे और समझा जाता था कि उन्हें पहनना सौभाग्य की बात होती है।

इस तरह उन्होंने गुरु की उतरन खरीदकर और उसे पहनकर अपना आध्यात्मिक विवाह बाकायदा समारोह पूर्वक उस गुरु के हाथों सम्पन्न कराया मगर उन वस्त्रों पर, मेरे विचार से, कुछ ज़्यादा ही, लगभग अकल्पनीय धन, खर्च कर दिया था। लेकिन ठहरिए, सिर्फ विवाह के वस्त्रों पर किया गया खर्च ही मुझे अनोखा नहीं लगा क्योंकि वैसे भी विवाह के वस्त्र महंगे होते ही हैं। दरअसल मुझे अजीबोगरीब लगी विवाह के लिए गुरु की दुकान से ही सारा सामान खरीदने की शर्त। यह बात तो विवाह कराने की फीस अदा करने की तरह ही थी! आखिर दोनों में फर्क ही क्या था?

निस्संदेह मैंने उस नव-विवाहित जोड़े से अपने ये विचार नहीं कहे। बस मुझे लगा कि एक और आधुनिक गुरु का पता चला जो अपने पश्चिमी शिष्यों को यह धोखा देकर कि वह मोह-माया से निर्लिप्त है, पैसा कमाने में लगा हुआ है। ये पश्चिमी शिष्य उसका पाखंड समझ तो पाते ही नहीं, बल्कि खुश होते हैं! खैर मैं मनाता रहा कि जो हुआ सो हुआ, अब यह महिला, जो समय गुजरने के साथ मेरी अच्छी मित्र बन चुकी थी, अपने विवाह में खुश रहे।

लेकिन मैंने उसकी असुरक्षा के बारे में आपसे ज़िक्र किया था, न? हाँ, तो संक्षेप में यह कि उनके लिए इतना ही काफी नहीं था। अपना आधात्मिक विवाह तो उन्होंने करवा लिया मगर उनका अलग होना और फिर एक हो जाना जारी रहा। और आखिर में उन्होंने एक बार और उसे दोहराने का विचार किया; इस बार ज़्यादा परंपरागत तरीके से। वे कैथोलिक चर्च गए और वहाँ अपना विवाह पुनः सम्पन्न कराया। इस बार सारे परिवार की उपस्थिति में, दुल्हन सफ़ेद वस्त्रों में और दूल्हा परंपरागत सूट (टक्सिडो) में।

और मैं आज की डायरी अंग्रेज़ी की इस कहावत के साथ समाप्त करूंगा: और वे जीवन भर सुख से रहे क्योंकि अंत भला तो सब भला!