क्या धरती के मनुष्य एलिएन्स के लिए आकर्षक सेक्स-पार्टनर हैं? – 3 जून 2013

कुछ दिन पहले एक ऑनलाइन वीडियो पर मेरी नज़र पड़ी जिसने मुझे बुरी तरह हंसने पर मजबूर कर दिया और मैं सोचने लगा कि दुनिया अजूबों से खाली नहीं है और यहाँ एक से एक लोग भरे पड़े हैं! एक इंटरव्यू की बात है जिसमें वह महिला दावा करती है कि एलिएन्स का अस्तित्व है और वे इस धरती पर आते हैं और लोगों के साथ संभोग करते हैं। वास्तव में वह स्वयं भी किसी दूसरे सोलर सिस्टम से आने वाले एक एलिएन के साथ अक्सर ऐसा करती रहती है, जिसे उसने ‘ऑक्टोपस मैन’ नाम दिया है।

यह मूर्खतापूर्ण लगता है मगर वह महिला इस बारे में बहुत गंभीर है। वह अपने आपको एक साइकिक बताती है और तमाम तरह के अलौकिक और रहस्यमय लोगों से उसका संबंध है: ‘कैट पीपल’, ‘ऑक्टोपस पीपल’, ‘ग्रेज़’, जो बिल्कुल एलिएन की प्रचलित छवि जैसे लगते हैं और कई दूसरे। वह और ‘उसका ग्रुप’ रात में बाहर निकलता है जब वह सोती रहती है। वह समझाते हुए कहती है कि यह स्वप्न नहीं होता बल्कि उसकी आत्मा एलिएन्स के साथ यूएफ़ओ में बैठकर यात्रा कर रही होती है। वे लोग हमारे सोलर सिस्टम का ही नहीं, उसके परे जाकर ब्रह्मांड के बहुत से स्थानों का अन्वेषण करते हैं!

संभोग के बारे में, जो वह एक बस अड्डे पर भी कर चुकी थी, पूछने पर वह बताती है कि उसका एक बोयफ्रेंड जैसा है या जैसा कि वह बताती है, एक ‘मित्र आत्मा’ जो उसके साथ संभोग करता है। वे सारे अंतरिक्षवासी संभोग करते हैं मगर खासकर ‘कैट पीपल’ इसके लिए सबसे ज़्यादा लालायित रहते हैं और उनमें संभोग शक्ति भी ज़्यादा होती है। मैं आप लोगों को यह इसलिए बता रही हूँ कि अगर आपकी उनसे कहीं मुठभेड़ हो जाए तो ये बातें पहले से पता होना बेहतर है….

इस तरह यह महिला उन लोगों से अलग थी जिनकी ‘एलिएन रिपोर्टें’ आप आम तौर पर देखते-सुनते रहते हैं। आम तौर पर लोग बताते हैं कि उनका अपहरण कर लिया गया, उन पर बलात्कार किया गया, भयंकर लोगों के साथ संभोग करने के लिए मजबूर किया गया और फिर उन पर वैज्ञानिक प्रयोग किए गए! लेकिन यहाँ वह अपने अनुभवों का मज़ा ले रही है, जैसा कि उस शो के दूसरे सहभागी ने कहा जो एक वैज्ञानिक था। उसका कहना था कि उस महिला के ओर्गेझम (यौन क्रिया का चरम सुख) सहित जो भी हो रहा है उसका कोई न कोई स्पष्टीकरण है: यह सब उसके दिमाग में हो रहा है, उसकी फंतासियाँ, कल्पना इन सब एलिएन्स को रच रही हैं, और यह सब वह इतनी शिद्दत के साथ उसे महसूस हो रहा है कि वह सिर्फ कल्पना करके भी ओर्गेझम प्राप्त करने में सफल हो जाती है।

मैं उस व्यक्ति की बात से पूरी तरह सहमत हूँ जो कह रहा है कि यह सब उस महिला के दिमाग की उपज है। एंकर जब उस साइकिक महिला से पूछता है कि ये एलिएन्स सबको दिखाई क्यों नहीं देते ताकि हम भी जान सकें कि उनका अस्तित्व है तो वह महिला समझाते हुए कहती है कि दुर्भाग्य से वे ‘शो ऑफ’ नहीं करते और हमारे पास अपने व्यक्तिगत गाइड होते हैं जो हमें उनसे मिलवाते हैं। अपरिभाषेय का यह अच्छा स्पष्टीकरण है।

अंत में उसके सामने यह चुनौती रखते हुए कि वह बताए कि ड्रेसिंगरूम में रखे एंकर के ब्रीफकेस में क्या है, उससे कहा गया कि अगर वह यह बता दे तो सिद्ध हो सकता है कि एलिएन्स का वाकई कोई अस्तित्व है। ब्रीफकेस के रंग का अनुमान लगाने के अपने बदहवास प्रयास के बाद उसने कहा कि हमारी मर्ज़ी से यह काम नहीं करता और इस वक़्त वह एलिएन आपके प्रश्न का जवाब बताकर उसकी मदद नहीं करना चाहता। खैर, अभी हमें कुछ समय इंतज़ार करना पड़ेगा जब ऑक्टोपस जैसे किसी एलिएन, जो हमारे साथ हमारी स्वप्नवस्था में संभोग करता है, के अस्तित्व का प्रमाण मिल सकेगा!

श्री श्री रविशंकर ने बिना समय गंवाए हटा दी अपनी चमत्कारी शक्तियों की कहानी – 19 फरवरी 13

आज फिर एक नया दिन, डायरी के एक नए पन्ने के साथ। साथ ही प्रस्तुत है कल की डायरी में श्री श्री रविशंकर के पाखंड को बेपर्दा करने की मेरी मुहिम से पैदा हुई हलचल की रिपोर्ट। कल मैंने अपनी डायरी में लिखा था कि मैंने श्री श्री की फाउंडेशन ‘आर्ट ऑफ लिविंग‘ की अधिकारिक वेबसाइट पर एक स्टोरी पढ़ी थी जिसमें वे यह दावा कर रहे थे कि उनके भक्त, मात्र उनकी तस्वीर के सामने अपना मोबाइल रखकर उसे चार्ज कर लेते हैं। आज मेरे ब्राउज़र ने स्वतः उसी पेज को खोला क्योंकि मैंने उसे कल इसी सैटिंग में रख छोड़ा था। देखा तो पाया कि उन्होंने उस पूरे पेज को ही मिटा दिया है। अब वहां यह संदेश लिखा हुआ है ‘आप इस पेज पर जाने के लिए अधिकृत नहीं हैं|‘

आप लोगों में से जो कोई भी इस पेज को नहीं पढ़ पाए थे उनकी सुविधा के लिए बता दूं कि हमने इसका एक स्क्रीन शॉट ले लिया था। निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करेंगें तो जो नई विंडो खुलेगी उसमें आप सारी कहानी स्वयं पढ़ सकते हैं :

http://www.jaisiyaram.com/ravishankar-web.htm

यदि एक बार कोई विषयसामग्री इंटरनेट पर आ जाती है तो उसे वहां से हटा पाना मुश्किल होता है, खासकर तब जबकि हजारों लोगों का ध्यान इसकी तरफ आकर्षित हो चुका हो। हमेशा की तरह मैंने कल दोपहर भी अपनी डायरी पोस्ट की और फेसबुक पर अपने पेज पर भी इसे साझा किया। देखते ही देखते यह बात इंटरनेट पर जंगल की आग की तरह फैल गई। जाहिर था श्री श्री रविशंकर तक भी जा पहुंची। उन्होंने ने बिना वक़्त गंवाए उस स्टोरी को वहां से मिटा दिया। मेरी कही हुई बातों के सुबूत मिटाने के लिए उन्होंन यह सब किया। ऑनलाइन हुए किसी भी घटनाक्रम का सुबूत आधुनिक संचार माध्यम बड़ी आसानी से प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। और सुबूत के तौर पर उपरोक्त लिंक आप देख सकते हैं।

सच तो यह है कि मुझे श्री श्री रविशंकर की वेबसाइट पर अंधविश्वास फैलाने वाला ऐसा लेख मिलने की उम्मीद नहीं थी क्योंकि अब तक मेरे दिमाग पर यह छाप थी कि वह अपनी एक अलग छवि प्रस्तुत करना चाहते थे। मुझे यह भी लगता था कि वह दुनिया को यह बताना चाहते थे वह अन्य गुरुओं की तरह पाखंडी नहीं है जो भक्तों को लुभाने के लिए चमत्कार दिखाते हैं और दावा करते हैं कि वह “सर्वज्ञ और सर्वव्यापी“ हैं। मेरे पर्दाफाश करने के बाद श्री श्री और उनकी टीम ने उस लेख को मिटाने का जो फैसला लिया उसके पीछे सच्चाई यह है कि वे यह जानते हैं कि यह कहानी ग़लत है। वे जानते हैं कि यह बात संभव नहीं है, महज़ एक कल्पना है, लोगों को प्रभावित करने के लिए रची गई मनगढ़ंत कहानी है।

वह स्वयं कहते हैं कि यह भारत के एक ग्रामीण हिस्से की कहानी है जहां लोग निहायत अंधविश्वासी हैं, जहां लोगों की सोच वैज्ञानिक नहीं है जो कहानी को तर्क की कसौटी पर कस सके। गांवों के लोग इतने भोले – भाले और धार्मिक हैं कि बिना सोचे – समझे ऐसे पाखंडी गुरुओं का अनुसरण करने लगते हैं जो उन्हें अपनी तथाकथित चमत्कारी शक्तियों का प्रदर्शन करके बरगलाते हैं। भक्तों को अपने से ज्यादा शक्तिसम्पन्न बताकर दरअसल वह उन्हें एक तरह का प्रलोभन दे रहे हैं ताकि उनके दिलों में भी ऐसी शक्तियां अर्जित करने का लालच पैदा हो।

अपनी शक्तियों का झूठा प्रचार करके न जाने अब तक वह कितने लोगों को अपने जाल में फंसा चुके होंगें, उन्हें धोखा दे चुके होंगें। इससे पहले कि लोग उनकी बताई हुई योग क्रियाओं के हुए फायदों को गिनाते हुए मुझे अपने कॉमेंट्स भेजने लगें, मैं आपको एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि योग, ध्यान और प्राणायाम के फायदों के बारे में मुझे किसी प्रकार का कोई शुबहा नहीं है। हां, मैं इस बात में विश्वास नहीं करता हूं कि कोई पाखंडी गुरु लोगों को अपनी शक्तियों की झूठी कहानियां सुनाकर उनका का भला कर सकता है या लोग उसके भक्त बनकर चमत्कारी शक्तियों को प्राप्त कर सकते हैं।

मेरी डायरी को पढ़ने वाले सभी से मैं यह अपील करना चाहता हूं कि इस एक उदाहरण से आप यह समझ सकते हैं कि इस जैसे गुरु अपने कहे शब्दों को वापिस लेने में एक सेकंड भी नहीं लगाते। आज एक बात कहते हैं तो कल दूसरी। वे ईमानदार नहीं हैं, किसी प्रकार की चमत्कारी शक्तियां उनके पास नहीं हैं और न ही ये कोई प्रबुद्ध आत्माएं हैं। ये आपकी सहायता नहीं करना चाहते। ये आपका पैसा हथियाना चाहते हैं, आपको बेवकूफ बनाना चाहते हैं और चाहते हैं कि आप सदा के लिए उन पर आश्रित हो जाएं। इनके जाल में न फंसें। अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वयं संभालें और इस तरह के पाखंडी गुरुओं से दूरी बनाए रखकर अपना जीवन खुशहाल बनाएं।

श्री श्री रविशंकर कहते हैं मोबाइल फोन चार्ज करें उनकी तस्वीर के सामने रखकर – 18 फरवरी 13

हाल ही में मैंने इंटरनेट पर एक लेख पढ़ा। इस लेख पर अपने विचार आज की डायरी में लिख रहा हूं। यह लेख भारत के सर्वाधिक चर्चित धर्मगुरुओं में से एक श्री श्री रविशंकर के साथ साक्षात्कार की शक्ल में हैं। श्री श्री रविशंकर ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन‘ के संस्थापक और प्रमुख हैं। मैं समझता हूं कि मेरे अधिकांश पाठकों ने उनके विषय में सुन रखा होगा। यदि नहीं तो ‘गूगल’ करें और उनके बारे में सारी जानकारी आपको मिल जाएगी। उन्हें प्रसिद्धि मिली एक प्रकार के प्राणायाम की शिक्षा देकर जिसे उन्होंने ‘सुदर्शन क्रिया‘ का नाम दिया है। उनका संस्थान योग और ध्यान की शिक्षा भी देता है। दुनियाभर में उनके केंद्र हैं और वह अपने अनुयायियों के परम पूज्य गुरु हैं।

जो लेख मैंने उनकी वेबसाइट पर पढ़ा उसकी शुरुआत होती है उनके ही एक अनुयायी के इस प्रश्न से :

“अनेकों घटनाएं इस बात की साक्षी हैं कि आप सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं। मुझे डर लगता है कि आप मेरी सभी ग़लतियों के बारे में जानते हैं।मेरी ग़लतियों के बारे में आपका क्या कहना है? क्या आप नाराज़ होते हैं जब मैं वही ग़लतियां बार – बार दोहराता हूं?”

आपने सुना होगा कि किसी भी पंथ या संप्रदाय के अंधे अनुयायी कुछ इसी प्रकार के प्रश्न अपने गुरुओं से पूछते हैं। वे इन सर्वज्ञ गुरु से किस कदर खौफ खाते हैं, यह उपरोक्त प्रश्न में साफ – साफ दिखाई देता है। सोचिए , गुरु का उत्तर क्या होगा? गुरु परले दरजे का बेवकूफ तो है नहीं जो यह कहेगा वह ‘सर्वव्यापी और सर्वज्ञ‘ नहीं है। आखिरकार भक्तों के दिलों में उसकी नकली और ओढ़ी हुई क्षमताओं का यह खौफ और विस्मय ही तो गुरु को शक्तिशाली बनाता है और उनके जीवन में कदम – कदम पर गुरु की उपस्थिति को अपरिहार्य बना देता है। गुरु जानता है कि कि भक्तों के दिलों में यह भ्रम बना रहना चाहिए कि गुरुजी सर्वज्ञ है और सब कुछ करने में सक्षम हैं। गुरु की महिमा में चार चांद लग जाएं यदि गुरु की करामाती शक्तियों की मनगढ़ंत कहानियों से यह खौफ और अधिक पुख्ता हो जाए ! बस , यही काम श्री श्री रविशंकर कर रहे हैं।

श्री श्री कहते हैं कि वह भक्तों की ग़लतियों की तरफ ध्यान नहीं देते हैं। वे तो यहां तक कहते हैं कि उनके भक्त उनसे ज्यादा शक्तिशाली हैं। एक बार वह एक ऐसे गांव में जा रहे थे जहां वह पहले कभी नहीं गए थे। उन्हें महसूस हुआ कि वहां मौजूद तीन लोगों के मोबाइल फोन खो गए हैं। उन्होंने कार्यक्रम के दौरान पूछा किस किस के मोबाइल फोन खो गए हैं। ठीक तीन लोग खड़े हो गए और उन्होंने उन तीनों को तीन मोबाइल फोन प्रदान किए, जो ‘अंतर्यामी‘ गुरुजी अपने साथ लाए थे। वह यह भी जानते थे कि एक महिला कल रातभर उनकी तस्वीर के सामने बैठकर रोती रही थी।

एक दिन एक लड़के ने श्री श्री को अपनी कहानी सुनाई। कहानी यूं थी कि उस लड़के का मोबाइल फोन खो गया था करीब डेढ़ साल पहले। तो उसने अपने फोन को बैटरी सहित गुरुजी की फोटो के सामने रख दिया – आश्चर्यजनक रुप से फोन रात भर में चार्ज हो गया! अब आगे सुनिए :

“ इस लड़के ने मुझे अपना फोन दिखाया और बोला, “देखिए , डेढ़ साल से मैंने चार्जर फेंक दिया है और अब मैं अपना फोन आपकी तस्वीर के सामने रख देता हूं और यह चार्ज हो जाता है। ‘ उस लड़के ने अपना चार्जर फेंक दिया ! मैंने कहा, “ वास्तव में कोई बात तो है। मुझे भी अपना फोन चार्ज करने के लिए चार्जर की ज़रूरत पड़ती है और मेरा भक्त मेरी तस्वीर के सामने रखकर अपना फोन चार्ज कर लेता है। ‘ देखिए कितने शक्तिसंपन्न हैं मेरे भक्त “

अपने भक्त की शक्ति से खुद सर्वज्ञ गुरु भी हैरान हैं!

इस कहानी में श्री श्री रविशंकर अपने भक्त का मखौल नहीं उड़ा रहे है। वह बड़ी चतुराई से भक्तों को यह महसूस करा रहे हैं कि भक्त शक्तिसंपन्न हैं जबकि सच्चाई यह है कि वे सब पूरी तरह गुरुजी के अधीन हैं। गुरु को चार्जर चाहिए फोन चार्ज करने के लिए और चेलों का चार्जर है गुरु की तस्वीर ! वाह , क्या जादुई शक्ति है!

अब मुझे बताइए कि श्री श्री उन नकली गुरुओं से किस प्रकार भिन्न हैं जो चमत्कारी शक्तियों से संपन्न होने का दिखावा करके लोगों को ठगते हैं? एक निर्मल बाबा हैं जो अपनी ‘किरपा‘ बरसाने का दावा करते हैं लेकिन तब जब आप समोसे खाएंगें, सत्य साईं बाबा शून्य में से सोने के अंडे पैदा किया करते थे, श्री श्री रविशंकर के अपने गुरु महर्षि महेश योगी लोगों से कहा करते थे कि यदि वे उनके बताए हुए तरीके से ध्यान करें तो वे हवा में उड़ सकते हैं। जनता का बेवकूफ बनाने के लिए ये सभी जादूगरी का सहारा लेते थे। मज़े की बात तो यह है कि श्री श्री रविशंकर कभी यह नहीं बताते कि वह स्वयं महर्षि महेश योगी के शिष्य हैं – वह खुद को अपने गुरु की ‘उड़ने वाली ध्यान पद्धति‘ से संबद्ध नहीं करना चाहते शायद।

श्री श्री रविशंकर अन्य गुरुओं से किसी भी मायने में भिन्न नहीं हैं। लोग उनकी लुभावनी बातों से, गुरुजी के अन्य अंधभक्तों की मनघड़ंत कहानियों और श्री श्री के विशाल संगठन तथा उसकी सफलता के झांसे में आ जाते हैं।

अगर आपको मेरी बातों पर विश्वास नहीं है तो उनकी तस्वीर का एक प्रिंट आउट निकालिए और अपना फोन उसके सामने चार्ज होने के लिए रख दीजिए। चार्ज हुआ क्या आपका फोन?

हम इस ‘नकली गुरु’ की वेबसाइट से लिंक नहीं होना चाहते परंतु यदि आप इनकी कहानी स्वयं पढ़ना चाहते हैं तो निम्न URL को कॉपी करके अपने ब्राउज़र में पेस्ट करे : http://www.artofliving.org/love-can-even-make-stones-melt

अपडेट:  इस लेख के बाद रविशंकर और उनकी संस्था ने ऊपर दिए गए URL में से इस लेख को हटा दिया, हमें ये पता था, परन्तु हमारे पास उसका स्क्रीनशॉट मौजूद है, और आप उसे नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं|

http://www.jaisiyaram.com/ravishankar-web.htm

शास्त्र बच्चों व वयस्को में जादू और भूत के भय को जन्म देते हैं – 17 जनवरी 2013

कुछ दिन पहले मैं एक धार्मिक हिन्दू से बात कर रहा था । हमारी चर्चा का विषय धर्म, परमेश्वर और अलग अलग मान्यताओं के बारे में था कि इसमें भिन्नता कैसे हो सकती है। बातचीत के दौरान उसके एक प्रश्न पर मैं विचारों के समुन्दर में गोते लगाने लगा, इसलिये मैं चाहता हूं कि इसके बारे में आपको बताऊं। उसका प्रश्न था ‘यदि आप परमेश्वर पर विश्वास करते है तो आप भूत और जादू में भी यकीन करते होंगे‘।

यह बहुत ही हास्यास्पद बात है कि ऐसे प्रश्न का जवाब क्या हो सकता है? अगर आप पश्चिम (पश्चिमी देशों) में रह रहे हैं और किसी आध्यात्मिक या गूढ़ दृश्य में शामिल नहीं हैं तो आपको यह लग सकता है कि यह बात किसी नास्तिक द्वारा किसी आस्तिक का मजाक बनाने के लिये ही कही गयी है। पश्चिम में भूतों और जादू की बातों को सामान्यतः हास्यापद तरीके से ही लिया जाता है। वहां पर भूत, भूत की कहानियों में, जादू, परियों की कहांनियों में और आधुनिक फंतासी उपन्यासों में ही होता है। पश्चिम के किसी युवा के सामने यदि आप ‘जादू‘ शब्द बोलते हैं तो सबसे पहले उनके मन में जो छवि उभरेगी वह हैरी पॉटर की होगी। एक किताब, उपन्यास, एक फिल्म, या जो भी अवास्तविक हो और जिसे काल्पनिकता से मनोरंजन के लिये ही बनाया गया हो।

भारत में थोड़ी भिन्नता है। यह एक तथ्य है कि बेशक यहां पर जादू और उपन्यास है पर यहां पर धर्म ने लोंगो में जादू के प्रति एक ऐसा अन्धविश्वास पैदा कर दिया है कि वह वास्तव में जादू पर विश्वास करते है। वह भूत और अलौकिक शक्तियों पर विश्वास करते हैं। वे यह नही सोचते कि यह काल्पनिक है। अगर आप परमेश्वर पर विश्वास करते है तो आप भूत और जादू पर भी विश्वास करते है – बेशक शास्त्रों की सभी कहांनियो में उनके आस्तित्व की बात कही गयी है। शास्त्र तो जादू से भरा पड़ा है – एक बार मैं रमोना को शास्त्र की एक कहानी बता रहा था तो उसे हंसी आ रही थी, उसने कहा यह कहानी तो हैरी पॉटर जैसी लगती है। पश्चिम में लोग जानते है कि यह कल्पना है परन्तु यहां इसे इतिहास से जोड़कर बताया जाता है जैसे सच में ऐसा घटित हुआ हो और यहां की यह मान्यता है अगर आप चेतना के उसी स्तर पर पहुंच जाते है तो दोबारा ऐसा हो सकता है।

ऐसा नहीं है कि बच्चे ही भूत और जादू पर विश्वास करते है, बल्कि वयस्क भी मानते है नतीजतन यह डर सिर्फ बच्चों में ही नही अपितु वयस्कों में भी है। हमेशा की तरह धर्म ने लोगो में इस डर को स्थापित कर दिया है क्योकि यह डर लोगों को नियंत्रित करने में मदद करता है। भूतो की कहानियां यह भी बताती है कि ऐसे खतरे आये तो धर्म यह सलाह देता है तब अनुष्ठान व कर्मकाण्ड आदि करना चाहिए।

दुर्भाग्य से वयस्कों ने यह डर अपने बच्चों को भी सिखा दिया है। सभी देशों के बच्चे ऐसी कहांनियों से डरते है परन्तु पश्चिम में माता-पिता अपने बच्चों को प्रारम्भ से ही यह सिखाते है यह सब काल्पनिक और अवास्तविक है। हांलाकि भारत में माता-पिता अपने दरवाजो पर कोई वस्तु लटका देते है जिससे बुरा जादू प्रवेश न कर पाये और वह बच्चो को यह सिखाते है कि हमारी तकिये के नीचे एक चाकू है जिससे भूत डरते है।

जब आप अपने बच्चे को यह बताते कि भूतों के खिलाफ हमें क्या करना चाहिये, तब वास्तव में आप बच्चे को प्रोत्साहित कर रहे होते है कि भूत सच में होते है। एक भयभीत युवा किसी भी कार्य को करने से पहले यह अवश्य ध्यान देता है कि उसने इससे बचने के सारे उपाय कर लिये है या नही, क्योकि यह भय पहले से ही उत्पन्न किया गया है। आप अपने बेटे व बेटी को कर्मकाण्डों और अनुष्ठानों पर निर्भर रहना सिखा देते है, उन पादरियों और लोगो पर विश्वास करना सिखाते हैं जो जादू, भूत, राक्षस और बुरी आत्माओं के बारे में बात करते हैं।

यह तथ्य है और बताने में और भी बुरा लगता है कि उच्च शिक्षित लोग भी इस भय और भ्रम में रहते है। वे अपने बच्चों को विज्ञान व चिकित्सा के बारे में बताते है पर साथ ही वह उनमें डर भी सिखाते है। अपने बच्चों को किसी काम से रोकने के लिये वे यह सिखाते है कि यह मत करो वरना भूत आ जायेगा! वे अपने बच्चों इस बात से भयभीत करते है कि अगर वह अच्छा व्यवहार नही करेंगे तो उन्हें उस गोदाम में बन्द कर दिया जायेगा, जिसमें एक भूत रहता है। यहां तक कि वो उस भूत का एक डरावना नाम भी खोज लेते है जिससे कि वे अपने बच्चों को डरा सकें। कल ही मेरे पिता ने मुझे बताया कि उन्होंने व मेरी मां ने हमें कभी भी डराया नही। उन्होने कभी भी ऐसी धमकियों का सहारा नही लिया और यही कारण है कि हमलोग कभी भी भूत, जादू और अंधेरे से नहीं डरें।

यह दयनीय है कि आज भी लोग ऐसी बकवास बातों पर विश्वास करते हैं और अपने बच्चों को भी सिखाते हैं। ऐसी प्राचीन कहांनियों से आप एक ऐसी विकलांग पीढ़ी पैदा कर रहे है जो उनमें झिझक व अनावश्यक भय को जन्म देती है।

सत्य क्या है और क्या है, महज आस्था और अंधविश्वास? 21 जून 2012

आज मैं आस्था और अंधविश्वास, और साथ-साथ सत्य और तथ्य पर संक्षेप में कुछ कहना चाहता हूँ। विज्ञान हमें उन तथ्यों से अवगत कराता है, जिन्हें सिद्ध किया जा सकता है। इसके विपरीत आस्था को सही सिद्ध नहीं कर सकते और न ही अंधविश्वास को सिद्ध कर सकते हैं। विश्वास या आस्था समय, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। आप देखते ही हैं कि दो अलग-अलग जगहों में अलग-अलग आस्थाएँ या अलग-अलग अंधविश्वास पाए जाते हैं और वे एक-दूसरे के बिलकुल विपरीत आस्थाएँ और विपरीत अंधविश्वास भी हो सकते हैं। इसका कारण यही होता है कि उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता और इसीलिए वे तथ्य नहीं होते, महज विश्वास होते हैं।

लोग अंधविश्वास पर आस्था रखते हैं क्योंकि वह उनके मस्तिष्क को शांति और ढाढ़स पहुंचाता है। यह मानव स्वभाव है कि आप उन्हीं बातों पर भरोसा करना चाहते हैं जो आपके अनुकूल और दिल को सुकून पहुँचाने वाली हों, भले ही उनमें कोई सचाई न हो। तथ्य, निश्चय ही सच होता है मगर वह विक्षोभकारी और विचलित करने वाला भी हो सकता है। इसीलिए लोग अक्सर झूठ पर भरोसा कर लेते हैं और सिर्फ यही कारण है कि झूठ का अस्तित्व बना हुआ है। और, झूठ पर विश्वास करने के लिए हमेशा आपको आंखे बंद रखनी होती हैं क्योंकि अगर आप आँखें खोलकर देखेंगे तो पछतावा हो सकता है। सत्य पर विश्वास करने की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि वह तो यथार्थ है ही। हकीकत हकीकत है। अगर आप उस पर यकीन करते हैं तो वह सत्य है लेकिन अगर आप उस पर यकीन नहीं भी करते, तो भी वह सत्य है। इसी तरह, जो आपकी आँखों के सामने है उसे प्रमाण की आवश्यकता ही क्या है? जैसे आग को आप अपनी आँखों से देख सकते हैं और आग की सचाई यह है कि वह जलायेगी ही, आप विश्वास करें या न करें।

अंधविश्वासियों को खुद अपने आप पर विश्वास नहीं होता। अक्सर ऐसे लोग कहते सुने जाते हैं: मैंने सुना है; ऐसा लिखा है, मैंने पढ़ा है; किसी ने कहा है; लोग यकीन करते हैं और हम भी मानते है, आदि आदि। वे खुद कुछ नहीं जानते, बस मानते हैं। तथ्य यह है कि आप किसी ऐसी चीज़ को जान ही नहीं सकते, जिसका अस्तित्व ही नहीं है; आप उस पर सिर्फ विश्वास कर सकते हैं, अथवा मान सकते हैं। आँखें बंद करो और विश्वास करो (मान लो), इतना काफी है। आपको कुछ पूछने का अधिकार नहीं है और अगर पूछना ही है तो सिर्फ विश्वास (मान्यता) के बारे में पूछो, संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। धर्म आपसे कहता है कि: जो धर्मग्रंथों में लिखा है उस पर विश्वास करो, मान लो उसे, जानने की कोशिश मत करो और संदेह तो बिलकुल नहीं।

जब भी कोई व्यक्ति आपको किसी बात पर विश्वास करने के लिए कहता है तो तुरंत सावधान और सतर्क हो जाएँ। अपनी आँखों का ध्यान रखें कि मूर्ख बनाने की नीयत से कहीं उन पर विश्वास का काला पर्दा तो नहीं डाला जा रहा हैं। जो लोग धर्म, ईश्वर, धर्मग्रंथों, स्वर्ग, अलौकिक उपचारों और दूसरे अंधविश्वासों पर आस्था रखते हैं, आपसे भी यही कहते हैं कि उन पर विश्वास करो, मान लो उन्हें और आँख मूँदकर उनपर विश्वास करो।

लेकिन विज्ञान आपके दरवाजे पर यह कहने नहीं आएगा कि "आप मुझ पर विश्वास कर लो।" आपको विश्वास करना पड़ेगा, कोई दूसरा चारा नहीं है। धर्म और अंधविश्वास इसी कारण थोड़ी अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए कहते हैं: धार्मिक कर्मकांड और विश्वास तभी कारगर होते हैं जब विश्वास पक्का और अटूट हो, जब काम न हो तो समझिए आपके विश्वास में ही कमी थी। यह ढुलमुल आस्तिकों के लिए नहीं है। क्या शानदार स्पष्टीकरण है! आस्थाएं विश्वास का आग्रह करती हैं और वो भी अंधे विश्वास का, शक न करना और उस पर भी तुर्रा ये कि यदि शक किया तो ये काम नहीं करेंगी! फिर परेशानी क्या है? विश्वास करना बिलकुल छोड़ दीजिए और सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी।

हम अक्सर देखते हैं कि धार्मिक लोग ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं और इसके ठीक विपरीत नास्तिक उसके अनस्तित्व को प्रमाणित करने का प्रयास करते देखे जाते हैं। लेकिन वैज्ञानिक ईश्वर के अनस्तित्व को प्रमाणित करने में अपना समय बरबाद नहीं करते। क्या आपने किसी प्रसिद्ध वैज्ञानिक को इस तरह के विवाद या चर्चा में उलझते देखा? निश्चित ही आप अपनी इंद्रियों से ईश्वर को जान नहीं पाएंगे। लेकिन, दुर्भाग्य से बहुत से नास्तिक अपनी पूरी शक्ति और बहुमूल्य समय यह प्रमाणित करने में लगा देते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। कितना अच्छा हो कि वे जमीनी हकीकत को समझें, समाज में घुलें-मिलें और देखें कि लोगों की समस्याएँ क्या हैं। लोग धर्म में आस्था रखते हैं क्योंकि उन्हें कुछ चाहिए, क्योंकि वे मुसीबत में हैं या डरे हुए हैं। बार-बार उन्हें यह बताना कि ईश्वर नहीं है, उन्हें कोई लाभ नहीं पहुंचाता। इस प्रश्न पर कि ईश्वर है या नहीं, लिखकर और चर्चा करके समय बरबाद करने से बेहतर यह होगा कि वे लोगों के बीच जाएँ और उनकी समस्याओं का कोई हल खोजने में अपनी ऊर्जा और समय का इस्तेमाल करें।

कुछ धार्मिक लोग आधुनिक दिखाई देने के चक्कर में इन दोनों का घालमेल करने की कोशिश करते हैं क्योंकि वे जान गए हैं कि धर्म के बगैर तो जीवन संभव है मगर विज्ञान के बगैर नहीं। लेकिन, धर्म और विज्ञान एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत अवधारणाएँ हैं। उनका मेल संभव नहीं है!

हर धर्म एक सत्य को स्थापित करने की कोशिश करता है और उस धर्म को मानने वाले समझते हैं कि सत्य को सिर्फ वही जानते हैं। वे सब अपने-अपने काल्पनिक सत्य की वकालत करने में लगे हुए हैं। लेकिन हकीकत यह है कि सिर्फ असत्य को प्रमाणित करने के लिए वकीलों की जरूरत पड़ती है। सत्य तो सत्य है और वह अपने आपको स्वयं प्रमाणित करता है। आग लगी है तो उससे ज्वालाएँ उठेंगी, आप विश्वास करें या न करें (मानें या न मानें)। आप खुद जान जाएंगे, उस पर विश्वास (मानने) करने की ज़रूरत नहीं है!

आस्था समाप्त होने पर धर्म का व्यवसाय मत करो – ईमानदार बनो – 12 अक्तूबर 2011

पश्चिमी देशों के निवासियों द्वारा सिद्धि, और अन्य चमत्कार प्रदर्शित करने वाले गुरुओं पर विश्वास करने का क्या कारण है इसपर चिंतन करते समय मुझे कुछ अन्य विचार आयें। मैंने बहुत सारे लोगों को देखा है और मिला हूं जो अंदर से जानते हैं कि यह धोखा है और सिर्फ छलावा है तब भी वे दूसरों को यह दिखाते हैं कि वे उसमें विश्वास करते हैं और यहां तक कि उन ट्रिकों को और उनकी परंपराओं को अपने व्यवसाय के लिये उपयोग करते हैं।

बहुत सारे लोग धर्म से सम्बंधित व्यवसाय करते हैं और सब प्रकार की चीजें बेचते हैं। वे इस व्यवसाय में कैसे आते हैं? उनमें से बहुतेरे वास्तव में किसी गुरु या स्वामी के शिष्य और अनुयायी के रुप में शुरुआत करते हैं। वे गुरु एवं उनके अन्तरंग शिष्यों का कुछ समय तक अध्ययन करते हैं। कुछ समय बाद वे गुरु द्वारा बिक्री के लिये दिये गये माला, पुस्तकें और दूसरी वस्तुओं को बेचना शुरु कर देते हैं, और इससे कुछ कमीशन प्राप्त करते हैं। कुछ समय बाद और थोड़े अधिक अनुभव के साथ वे स्वयं छोटे अनुष्ठान करवाना, आशीर्वाद देना और प्रार्थना करना शुरु कर देते हैं।

लेकिन अधिकतर एक बिंदु पर पहुंच कर अपने गुरु से निराश हो जाते हैं। वे समझ जाते हैं कि वह ईमानदार और ऐसा व्यक्ति नहीं है जैसा कि वह दिखावा करता है और जो वे उसमें देखना चाहते थे, वह वैसा नहीं है। अंततः वे उसे त्याग देते हैं।

लेकिन अब क्या? अगर वे खुद के साथ सौ प्रतिशत ईमानदार होते तो वे अपने गुरु की सिद्धियों में भी विश्वास नहीं करते। फलस्वरूप उन्हें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए की वे इस गुरु के द्वारा मूर्ख बनाये गए और उन्हें इस गुरु तथा उससे जुड़ी सभी चीजों से उन्हें मुंह मोड़ लेना चाहिए। इसका सीधा मतलब यह होता कि उस व्यवसाय को त्याग देना जिसे अपने गुरु के माध्यम से उन्होंने स्थापित किया था। उनमें से अधिकांशतः ऐसा नहीं करते बल्कि सिर्फ कुछ छोटे बदलावों के साथ अपने व्यवसाय को जारी रखते हैं। वे इस स्वामी की पुस्तकें लेते है या अन्य स्वामी की पुस्तकों को लेकर दूसरे तरीके से इसे प्रस्तुत करते हैं। वे अब इस स्वामी की तस्वीर नहीं बेचते या अपनी आय को अपने पूर्व गुरु को नहीं भेजते। लेकिन इस तरीके से पैसा कमाना जारी रखते हैं। वे बिना गुरु का नाम लिये उसी धार्मिक अनुष्ठानों को करना जारी रखते है जिसे गुरु ने उन्हें सिखाया था|

मैं सामान्यतः इसके खिलाफ़ नहीं हूं कि ऐसे लोग अपने अनुभवों से दूसरे की मदद करते हुये अपना काम करे और पैसे कमायें। इसके विपरीत, मैं प्रशंसा करता यदि वे ईमानदार होते और दूसरों से कहते कि उन्होंने क्या देखा और सुना।

किन्तु यह वैसा नहीं है जैसा वे करते हैं। बल्कि जिस तरह वे खुद मूर्ख बने है उसी तरह दूसरों को मूर्ख बनाते हैं। मुझे पता है आपमें से कुछ के लिये यह कड़वा है परन्तु बहुत लोगों के साथ मेरा यही अनुभव है। अपने दिल में वे अब विश्वास नहीं करते कि वे सारे अनुष्ठान, धार्मिक कृत्य जो उन्होंने अपने गुरु के साथ किये वाकई लाभप्रद थे। वे अपने गुरु में अपना विश्वास खो चुके है लेकिन चाहते है कि उनका ग्राहक उनमें (अनुष्ठान, धार्मिक कृत्य) विश्वास करे। यह धूर्तता है लेकिन यह उनका व्यवसाय है इसलिये वे इसे त्यागना नहीं चाहते। उन्होंने देखा है कि यह सब फ़र्जी है लेकिन वे खुद इसमें शामिल हैं। यह आवश्यक है उनके व्यवसाय के लिये और अब इससे ही उनका जीवनयापन हो रहा है।

मुझे व्यक्तिगत रुप से इसका अनुभव अपने जीवन में हुआ है। यह थोड़ा अलग था, क्योंकि मैं कभी अनुयायी नहीं रहा लेकिन मैं स्वयं गुरु व्यवसाय में था और मैंने इसे त्यागने का निर्णय लिया। मैं बहुत सारी चीजों में विश्वास करता था जैसे अनुष्ठान, धार्मिक कृत्य, राशिफल और हमें इससे आय होती थी। किन्तु जब हमारा विश्वास बदला, हमने यह भी निर्णय लिया कि हम ईमानदारी के साथ जीवनयापन चाहते हैं और कुछ ऐसा न बेचें, जिसमें हम खुद विश्वास नहीं करते। बेशक इस निर्णय से हमारे कारोबार में कमी आई और हमारी आय प्रभावित हुई। कुछ समय के लिये अपने चैरिटी को चलाते रहना अधिक कठिन था क्योंकि अब उतना पैसा नहीं आ रहा था। निश्चित रूप से हमने यह महसूस किया, लेकिन यह सही फैसला था| हमने अपने विश्वास के अनुकूल अपने आय का तरीका बदला। गुरु के रुप में मैं और अधिक कमा सकता था परन्तु मैंने ईमानदारी के रास्ते को चुना।

मैं उन सबसे कहना चाहता हूं जो ऐसे हालात में है जिसका मैंने वर्णन किया, प्लीज ऐसा कुछ न बेचें जिसमें आप विश्वास न करते हों। आप कुछ और कर सकते हैं। अगर आपमें क्षमता थी जादू के करतब, मंत्र और अन्य फर्जी चमत्कार के बारे में दूसरों को समझाने की, आप अन्य चीजें भी बेच सकते हो! आप किसी अन्य क्षेत्र में जा सकते हैं! आप कुछ और कर सकते हैं, आपको बस इसकी शुरुआत करनी है! और मुझे विश्वास है जो अनुभव आपने पाया है वह भविष्य में आपके लिये मददगार होगा।