स्त्रियाँ और पुरुष, दोनों रोज़गार करते हैं मगर घर के कामों की ज़िम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों की ही होती है – 10 दिसंबर 2015

कल मैंने दैनिक जीवन में लिंग आधारित भूमिकाओं के बारे में लिखना शुरू किया था और बताया था कि कैसे वे पश्चिमी समाजों में भी आज भी जारी हैं हालांकि उस शिद्दत से नहीं, जिस शिद्दत के साथ भारत में व्याप्त हैं। कल की चर्चा मैंने पुरुषों द्वारा घरेलू काम, जिन्हें पूरी तरह 'जनाना' काम समझा जाता है, न करने संबंधित दबावों पर केन्द्रित की थी लेकिन महिलाओं को भी आज भी लोगों के लिंग आधारित पुरातनपंथी विचारों से लोहा लेना पड़ता है।

निश्चित ही भारत के अधिकांश परिवार महिलाओं से अपेक्षा करते हैं कि वे घर में ही रहें जबकि पश्चिमी समाजों में कई पीढ़ियाँ गुज़र चुकी हैं, जिनमें माएँ बाहर निकलकर काम करती रही हैं- चाहे आधे दिन करें या पूरा दिन! वहाँ महिलाओं से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि विवाहोपरांत घरेलू स्त्रियाँ बनकर रहें। वहाँ कामकाजी महिलाओं के लिए मूलभूत सुविधाएँ बेहतर हुई हैं।

लेकिन वह दोषरहित नहीं है। महिलाएँ लिंग आधारित भूमिकाओं से बरी नहीं हुई हैं और न ही इस दबाव से कि दैनिक जीवन में उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए। अभी भी कई मामलों में उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है: प्रबंधन के रोज़गारों में ऊपरी पायदानों पर पहुँचने के लिए उनके पास कम अवसर उपलब्ध हैं और समान पदों के लिए पुरुष सहकर्मियों की तुलना में उनका वेतन कम होता है! इसके अलावा, लोगों के दिमागों में यह असमानता का भाव अधिक व्यापक रूप से मौजूद है, जिसके कारण खुद महिलाएँ अपनी स्वायत्तता और परिवार या समाज में अपनी भूमिका को लेकर संदेहग्रस्त रहती हैं!

इस बात का प्रमाण आपको पारिवारिक ढाँचे में मिलता है। यह एक सामान्य बात हो सकती है कि माँ भी काम पर जा रही है लेकिन साथ ही आप यह भी देखेंगे कि इसके बावजूद घर के ज़्यादातर दैनिक कार्यों को निपटाने का काम भी वही करती है। अपने उद्यम में काम करते हुए वह कितना भी सख्त हो लेकिन घर में उसे यह उचित ही लगता है कि वह खाना बनाती है या वही बच्चों को स्कूल से लेकर भी आती है। उसका पति उसके बराबर ही काम करके घर लौटता है और सोफे पर पसरकर आराम फरमाता है। अक्सर दोनों ही इस व्यवस्था में कुछ भी गलत नहीं पाते लेकिन फिर अत्यधिक काम और तनाव के कारण अचानक किसी दिन वह क्लांत और शिथिल पड़ जाती है और अंततः तनावग्रस्त होकर अवसाद में चली जाती है। उसने सारे कामों का बोझ अपने ऊपर ले लिया था, एक आधुनिक कामकाजी महिला, एक सुघड़ गृहणी और स्नेहमयी माँ-सब कुछ एक साथ!

मैं बहुत सी महिलाओं से मिला हूँ, जिन्होंने ये सारे के सारे काम अपने सर ले रखे हैं। उन्होंने इस विचार को गले लगाया है कि वे भी आज़ादी की हवा में साँस ले सकती हैं, पुरुषों की बराबरी पर हैं और जितना श्रम पुरुष करते हैं, वे भी कर सकती हैं, जितनी देर तक पुरुष काम करते हैं, वे भी कर सकती हैं-लेकिन साथ ही वे अपने आप से अब भी अपेक्षा करती हैं कि वे घर के वे सारे काम भी करती रहें जो उनकी नानियाँ या दादियाँ अपने वक़्त में करती रही हैं और वह भी उसी सुघड़ता के साथ! वे भूल जाती हैं कि उनकी दादियाँ सिर्फ वही करती थीं, उतना ही करती थीं। यह नहीं कि उसका कोई महत्व नहीं है- लेकिन आप सुपरवूमन नहीं हो सकतीं कि हमेशा पूरी दक्षता के साथ बाहर नौकरी भी करें, घर के कामकाज भी निपटाएँ और बच्चों को भी संभालें!

दुर्भाग्य से पुरुष भी अपने रवैये से इस विश्वास को मज़बूती प्रदान करते हैं: पत्नी सारे काम करती रहे, यह कितना सुविधाजनक है! फिर क्यों परेशान हों, क्यों मदद करें? क्यों उठें और खुद बरतन धोना शुरू कर दें? शर्ट अपनी है मगर उस पर प्रेस खुद क्यों करें जब काम करने के लिए पत्नी मौजूद है?

इसलिए कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं और चाहते हैं कि आपकी बेटी भी आगे चलकर एक मज़बूत महिला बने। खुद घर के काम करके बेटों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं। अपनी बेटियों को दिखाएँ कि पुरुष और महिलाएँ मिलजुलकर और एक-दूसरे की मदद करते हुए न सिर्फ बाहर के बल्कि घर के काम भी पूरी निपुणता के साथ निपटा सकते हैं! घर के कामों की ज़िम्मेदारी उठाएँ-आखिर पत्नी भी पैसे कमाकर परिवार की आर्थिक मदद कर ही रही है!

हम अभी भी पुरानी लैंगिक भूमिकाओं से चिपके हुए हैं और इससे बाहर निकलने में और वास्तविक समानता प्राप्त करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय किया जाना बाकी है। जब तक हम एक के बाद दूसरा कदम आगे रख रहे हैं, एक न एक दिन हम अवश्य अपनी मंज़िल पा लेंगे!

जी नहीं, घर की सफाई करना सिर्फ स्त्रियों का काम ही नहीं है! 9 दिसंबर 2015

कल जब मैं उस स्कूली किताब के बारे में लिख रहा था जिसमें बताया गया था कि आपको परिवार के कम से कम एक सदस्य से डरना चाहिए-जो ज़ाहिर है, अधिकतर पिता ही होंगे-तब मुझे लगा कि लैंगिक भूमिकाओं पर मुझे थोड़ा और विचार करना चाहिए। बहुत सोचने पर मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि आधुनिक देशों में भी आज भी सिर्फ इसलिए कि वे पुरुष हैं या महिला, लोग इस उधेड़बुन में रहते हैं कि किन कामों को करने की उनसे अपेक्षा की जाती है।

स्वाभाविक ही, भारत में लिंग के आधार पर कामों का परंपरागत विभाजन पूरी तरह लागू होता है। पुरुष परिवार का अन्नदाता है। बहुत से परिवारों में महिलाएँ काम के लिए तभी घर से निकलती हैं जब बिल्कुल खाने-पीने के लाले पड़ जाते हैं और पैसे कमाने के लिए बाहर निकलना अवश्यंभावी हो जाता है। हमारे स्कूल के गरीब परिवारों में भी कुछ पिता शर्म से डूब मरेंगे अगर उनकी पत्नी को भी बाहर काम करके परिवार की आमदनी में योगदान देना पड़े! अर्थात वे भूखे पेट सो जाना पसंद करेंगे लेकिन अपनी पत्नियों को बाहर काम करने की इजाज़त नहीं देंगे। तब भी जब खुद पत्नी शिद्दत से चाहती है कि बाहर निकलकर खुद भी परिवार के लिए पैसे कमाए!

निश्चित ही भारत में आज भी विवाह के बाद और बच्चे हो जाने के बाद ज़्यादातर महिलाएँ घर में ही रहती हैं भले ही वे विश्वविद्यालय में पढ़कर डिग्रियाँ हासिल कर चुकी हों उनके पास स्नातकोत्तर डिग्रियाँ हैं लेकिन क्योंकि वे स्त्री हैं, उनका काम सिर्फ घर पर रहकर वहाँ की व्यवस्था बनाए रखना और बच्चों की देखभाल करना भर है।

लेकिन पश्चिम में भी मैंने देखा है कि आज भी पुरुष और महिलाओं में अपनी-अपनी परंपरागत भूमिकाओं को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है और वे उन्हें पूरी तरह छोड़ने में हिचकते हैं। आज भी यह पूरी तरह स्वीकार्य है कि पत्नी बच्चे हो जाने के बाद घर में बैठकर घर के काम-काज देखे और बच्चों की परवरिश करे। अगर यह आर्थिक रूप से संभव है और पत्नी को घर पर रहना पसंद है तो मैं भी उसकी सिफ़ारिश करूँगा उसे प्रोत्साहित करूँगा कि वही करे! लेकिन साथ ही अगर पति यही करना चाहे तो वह भी सबको स्वीकार्य होना चाहिए! पत्नी काम पर जाए और घर के खर्चे उठाए जबकि पति घर के कपड़े धोने से लेकर बच्चों की चड्ढियाँ साफ करे!

दुर्भाग्य से जो पुरुष इसकी पहल करते हैं, उनकी हँसी उड़ाई जाती है। इस दिशा में उनके प्रयासों का अनादर किया जाता है-और यह यही दर्शाता है कि आप वास्तव में उन महिलाओं को कितना कमतर आँकते हैं जो पहले ही इन कामों में लगी हुई हैं! अभी भी आप समझते हैं कि घर के काम कम महत्वपूर्ण हैं, कम मुश्किल हैं और उन्हें कोई भी ऐसा व्यक्ति कर सकता है जो अपनी अल्प योग्यता के चलते पैसे कमाने वाले ‘बड़े काम’ नहीं कर सकता! यह हास्यास्पद है! इसका सबसे अच्छा इलाज यह होगा कि ऐसा समझने वाले को खुद ये काम करके देखना चाहिए! चुनौती स्वीकार करें और मुझे दिखाएँ कि आप किस तरह सारे घर की साफ-सफाई करते हैं, बाज़ार जाकर राशन लाते हैं, सारे परिवार के लिए खाना पकाते हैं और सबके मैले कपड़े धोते हैं, जबकि आपके दो छोटे-छोटे बच्चे सारे घर में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं!

क्या यह अविश्वसनीय नहीं है कि आज, 21 वीं सदी के 15 साल गुज़र जाने के बाद भी बहुत से लोग यही मानते हैं कि अपने कपड़े साफ करना, अपने लिए खाना पकाना पुरुषों के करने योग्य काम नहीं हैं-अपनी संतान को खाना खिलाने जैसे कामों की बात तो छोड़ ही दीजिए जबकि ये काम एक दिन आपकी संतान भी आपके लिए करेगी?

और जब लोग यह सोचते हैं कि पुरुषों को रोना नहीं चाहिए, तो इसका कारण भी यही होता है। और, क्योंकि स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के खाते में आता है इसलिए पश्चिम में आप महिलाओं को तो आपस में हाथों में हाथ डाले घूमता हुआ देख सकते हैं लेकिन पुरुषों को नहीं। ऐसा क्यों? क्यों स्नेह का प्रदर्शन महिलाओं के लिए आरक्षित है जबकि पुरुषों के लिए अपनी कोमल भावनाओं को दूसरों से साझा करने की जगह शराब को ही समस्या का समाधान मान लिया जाता है!

एक तरफ लोग महिलाओं की क्षमता का सम्मान नहीं करते, उनकी नज़रों में उसकी कोई कीमत नहीं और दूसरी तरफ पुरुषों के कंधों पर बहुत ज़्यादा भार डाल देते हैं! कृपया ऐसा न करें। महिलाओं के पास उनके अपने बोझ लदे हैं- लेकिन उनके संबंध में कल चर्चा करेंगे।

उन्मुक्त सेक्स संबंध बनाना गलत नहीं है परन्तु मुझे लगता है, वे सफल नहीं हो पाते – 3 दिसंबर 2015

पिछले तीन दिन से खुले संबंधों के बारे में लिखने के बाद और यह बताने के बाद कि क्यों वे अक्सर असफल रहते हैं, आज मैं एक और बात बहुत स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: जबकि मेरा विश्वास है कि वे सफल नहीं हो सकते, अगर लोग इन संबंधों को आजमाना चाहते हैं तो मैं नहीं समझता कि उसमें कुछ भी गलत है।

मैं सामान्य रूप से खुले दिमाग वाला और खुले और स्पष्ट रवैए वाला व्यक्ति हूँ, विशेष रूप से सेक्स को लेकर। मैं मानता हूँ कि यह पूरी तरह आपका चुनाव होना चाहिए कि आप किसके साथ सेक्स संबंध रखना चाहते हैं। अगर आप कई अलग-अलग लोगों के साथ सम्भोग करना चाहते हैं तो कीजिए। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ बंधे नहीं रहना चाहते तो वैसा ही करें। अगर आप किसी एक व्यक्ति के साथ सुदीर्घ और पक्का संबंध रखते हुए आपसी समझौते के तहत अधिक पार्टनर्स रखने की स्वतंत्रता चाहते हैं तो वह भी मेरे लिए पूरी तरह स्वीकार्य है।

सेक्स एक वर्जना बन चुका है, जबकि यह दुनिया में सबसे अधिक आनंददायक कार्य है और इसके साथ तरह-तरह के प्रयोग करना, और नई-नई चीजें आजमाना और भी आनंददायक उत्तेजना प्रदान करता है। शायद इसी आनंद के चलते इसका दमन किया जाता है, जिससे लोगों को अपने काबू में रखा जा सके।

इसकी जगह आप अपने आपको शक्तिशाली बनाने में सेक्स का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन जब मैं यह कहता हूँ तो मेरा मतलब यह नहीं होता कि सिर्फ इसलिए कि समाज इसे वर्जित करता है, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के साथ संभोग करने से आप अधिक शक्तिशाली और कार्यक्षम हो जाते हैं। जी नहीं, मेरा मतलब होता है कि आप अपने दिल की सुनें और अपने शरीर की आवश्यकता तो पूरी करें ही, अपनी भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति भी करें। कि अपनी दिली इच्छाओं के सामने आप परम्पराओं और सामाजिक नियमों को व्यवधान न बनने दें।

लेकिन मेरा विश्वास है कि देर-सबेर अधिकतर लोगों का मन उन्हें बता देगा: यही है वह! वह व्यक्ति, जिसे मैं किसी और के साथ साझा नहीं करना चाहता और जिसके लिए मैं स्वयं एकमात्र व्यक्ति बने रहना चाहता हूँ।

मेरी नज़र में अन्य सभी संबंध सफल नहीं हैं।

एक से अधिक सेक्स पार्टनर के साथ आपसी संबंधों में रोमांच, थ्रिल, उत्तेजना और असफलता – 1 दिसंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे बहुत से खुले संबंध टूटने लगते हैं क्योंकि संबंधित लोग वास्तव में खुला और स्वतंत्र होने के स्थान पर मुख्य पार्टनर के साथ अपने संबंध में लिप्त रहे आते हैं। एक और परिस्थिति है, जिसका सामना होने पर भी अक्सर संबंध टूटते हैं: जब पार्टनरों में से कोई एक अपने साथी में रुचि खो देता है, क्योंकि एक के साथ अधिक समय बिताने के बाद वह उससे बोर होने लगता है!

आप भी जानते हैं कि शुरू में सब कुछ बड़ा उत्तेजक और रोमांचक लगता है लेकिन कुछ हिचकिचाहट भी होती है: इन संबंधों को समाज उचित नहीं मानता अर्थात समाज में यह एक टैबू ही है। इसलिए वे डरते हैं कि लोगों को पता चलने पर वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? या भविष्य में किसी दिन मुझे पता चलेगा कि मैं ज़िन्दगी भर वैश्यागीरी करता रहा? सबसे प्रमुख संबंध यानी जिसके साथ सबसे पहले संबंधों की शुरुआत हुई थी, एक तरह की सुरक्षा जैसा होता है, एक सुरक्षित सहारा-समाज के दूसरे लोगों के सन्दर्भ में भी और खुद अपनी भावनाओं और विचारों के सन्दर्भ में भी। यह एक सुविधाजनक ढाँचा होता है, जिसकी कार्यविधि और व्यवस्था के बारे में आपको पता होता है कि वह कैसे काम करता है और दूसरे सेक्स संबंधों के रोमांच से तुष्ट होकर या ऊबकर आप पुनः जिसके पास निःसंकोच वापस जा सकते है।

लेकिन कुछ समय बाद वे इस रोमांच से आश्वस्त होते जाते हैं। बार-बार पार्टनर बदलने की उन्हें आदत पड़ जाती है बल्कि इस जीवन-शैली को अपनाने वाले ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। आप तुरंत अनुमान लगा सकते हैं कि उसके बाद क्या होता होगा: उन्हें किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती!

नियमित रूप से किसी एक व्यक्ति के साथ रहना बहुत उबाऊ हो जाता है, बहुत से उत्तेजक, विविधतापूर्ण, नए से नए और तैयार विकल्प मौजूद होते हुए किसी एक के साथ रहना! सीधी सी बात है, खुले संबंध में भी सुदीर्घ संबंधों के कारण होने वाली दिक्कतों को क्यों भुगता जाए?

पहला मुख्य पार्टनर जो दे सकता है, वह अब इतना आकर्षक नहीं रह गया है कि उसी के साथ रहने की कोई मजबूरी हो। अगर दोनों एक जैसा महसूस कर रहे हों तो ये संबंध आपसी समझौते के तहत बिना किसी बड़ी मुसीबत के समाप्त हो जाते हैं और दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर निकल पड़ते हैं। अगर दोनों की जीवन शैली यही है तो भविष्य में वे एक रात के साथियों की तरह मिल भी सकते हैं लेकिन इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

लेकिन अगर दोनों में से सिर्फ एक की जीवन शैली ऐसी है तो दूसरे का दुखी होना अपरिहार्य है और पता चलते ही वह इन खुले संबंधों को कोसना शुरू कर देगा और उसका अहं यह सोचकर चोट खा सकता है कि सामने वाले को कभी भी उससे अधिक प्रिय व्यक्ति नहीं मिल सकेगा! पूरी संभावना होती है कि ऐसा व्यक्ति स्थिर संबंध की ओर वापस लौट आए, जिसमें इतना अनुशासन होगा कि अपने मुख्य संबंध के बाहर किसी और से सम्भोग का त्याग कर दे। जब आप इस दर्द का अनुभव कर लेते हैं तो उसके बाद उन्हीं खुले संबंधों के अनुभव को आप दोहराना नहीं चाहेंगे!

लेकिन इस प्रकरण के सन्दर्भ में मूल समस्या दूसरी है: जब लोग सेक्स को प्यार से नहीं जोड़ते। लेकिन उस विषय पर विस्तार से कल…

भारतीय स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली क्रूरतापूर्वक शारीरिक प्रताड़ना का वीडियो सहित पर्दाफाश – 18 सितंबर 2015

आप पवन को जानते होंगे- या तो आप कभी आश्रम आए होंगे या मेरे ब्लोगों को नियमित पढ़ते होंगे और आपको पता चला होगा कि वह यहाँ, आश्रम में पिछले छह साल से रह रहा है। हम उसे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं और इसलिए जब हमें पता चला कि उसके नए स्कूल में उसके साथ क्या हो रहा है तो हमें उतनी ही तकलीफ हुई, जितनी किसी भी दूसरे, सगे माता-पिता को होती।

इस साल जून में, जब गर्मी की छुट्टियाँ समाप्त हुईं तो पवन बड़ा उत्साहित था: जुलाई की शुरुआत से उसके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत होने वाली थी। जब से वह आश्रम आया है, स्वामी बालेंदु ई व्ही प्राथमिक शाला में पढ़ता रहा है लेकिन इस साल नए सत्र की शुरुआत से वह वृंदावन के इंडियन पब्लिक स्कूल नामक एक दूसरे स्कूल में पढ़ने जाने वाला था। रोज़ वहाँ जाने के लिए हमने उसके लिए साइकल खरीदी थी, उसकी प्रवेश फीस भरी थी, उसकी वर्दियाँ और किताब-कापियाँ खरीदी थीं।

यह सब अत्यंत रोमांचक था लेकिन उसे वहाँ भर्ती कराते वक़्त ही हमने प्रधानाध्यापक से पूछा था कि क्या उनके यहाँ शिक्षक बच्चों को मारते-पीटते हैं, क्या उनके यहाँ बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और उनकी तरफ से यह पक्का आश्वासन ले लिया था कि ऐसा नहीं होगा। आप सभी जानते हैं कि हमारे स्कूल खोलने का प्रमुख कारण ही यह था: हम सुनिश्चित करना चाहते थे कि हमारे स्कूल में आकर बच्चे पिटाई को लेकर निश्चिंत हो सकें। ज़्यादा से ज़्यादा मुफ्त स्कूल खोलने और उन्हें अपने रेस्तराँ से जोड़ने के इरादे के पीछे भी यही कारण था कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चे पिटाई के डर से मुक्त होकर वहाँ मुफ्त शिक्षा प्राप्त कर सकें! अहिंसा और प्रेममय वातावरण बच्चों को उपलब्ध कराना हमारे स्कूल के प्रमुख मूल्य रहे हैं! उस स्कूल ने भी हमें आश्वस्त किया था कि वहाँ बच्चों के साथ किसी तरह की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। इस वचनबद्धता के पश्चात ही हमने अपने बच्चे को वहाँ भर्ती कराया था।

हम सोच भी नहीं सकते थे कि वे लोग ज़बान देकर किस हद तक अपने शब्दों के विरुध्द आचरण कर सकते हैं!

अगर आप कभी पवन से मिले हों तो जानते होंगे कि स्वभाव से ही वह बहुत शांत बालक है। उस नए स्कूल में कुछ हफ्ते गुज़ारने के बाद से ही हमने नोटिस किया कि उसके व्यवहार में कुछ तब्दीली आ रही है। हमने सीधे उसी से पूछा: ‘क्या हो गया है तुम्हें? स्कूल में कुछ हुआ है?’ और तब हमें सारी कहानी पता चली।

वहाँ जाना शुरू करने के पहले हफ्ते से ही उसने देखा कि शिक्षक उसके सहपाठियों की पिटाई कर रहे हैं। हाथ पर छड़ियाँ, और कभी-कभी पैरों पर, पीठ पर और जहाँ शिक्षक का हाथ पहुँच सकता हो, वहाँ पर! उसे भी पहले भी मार पड़ चुकी थी और उस दिन भी पड़ी थी। उसने अपने हाथ दिखाए- मार खाकर लाल-गुलाबी हो रहे थे और उनमें इतना दर्द हो रहा था कि ठीक होने में दो दिन लगे।

वहाँ की जो कहानियाँ उसने बताईं, उन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं: हर शिक्षक के पास एक छड़ी है और जब भी वे पाते हैं कि किसी बच्चे ने होमवर्क नहीं किया है या कोई गलती की है तो किसी बच्चे से वह छड़ी मँगवाते हैं। उसके बाद गलती करने वाले बच्चे को अपना हाथ शिक्षक के सामने खोलकर रखना होता है। सामान्यतया छड़ी हाथ पर पड़ती है मगर यदि शिक्षक कुछ ज़्यादा ही गुस्से में हुआ तो वह कहीं भी उसकी बरसात कर सकता है। अक्सर इस हिंसा का कोई विशेष कारण भी नहीं होता।

हमने पूछा कि क्या उसने प्रधानाध्यापिका से शिकायत की तो हमें और भी बहुत कुछ जानने को मिला: प्रधानाध्यापिका खुद स्कूल का चक्कर लगाती है और मौका मिलते ही, खुद भी बच्चों की पिटाई करती है! ऐसी प्रधानाध्यापिका से शिकायत करने की हिम्मत कौन करेगा? हमें बहुत दुःख हुआ और हम क्रोध से भर उठे! हमारे दिल को ठेस लगी थी कि जिस बच्चे को हमने अपने स्कूल में इतने साल मार-पीट से दूर रखा, जिसे स्कूली पिटाई को कोई अनुभव नहीं है, उसे इस प्रताड़ना से गुज़रना पड़ रहा है! मुझे अपने स्कूली दिनों की याद हो आई और उस समय बच्चों के साथ होने वाली हिंसा पर अपनी खीझ, गुस्से और हताशा की भी

हमें क्या करना चाहिए?

यह सोचकर कि बच्चे को वहाँ से निकालकर किसी दूसरे स्कूल में भर्ती करवा देते हैं, हमने कुछ दूसरे स्कूलों के विषय में विस्तृत जानकारियाँ प्राप्त करने की कोशिश की। समस्या यह थी कि वैसे भी बच्चों के प्रति शारीरिक हिंसा के मसले पर सभी स्कूल साफ़ झूठ बोल देते हैं और ऐसी स्थिति में हम कैसे विश्वास करते कि किसी अन्य स्कूल में भी ऐसा ही नहीं होगा? जिनके बच्चे स्कूलों में पढ़ते थे, उनके अभिभावक मित्रों से पता किया और वही बात सामने आई जिसका हमें शक था- हमें पता चला कि कमोबेश सभी स्कूलों में बच्चों का शारीरिक दंड दिया जाता है!

एक और विकल्प था: घर में पढ़ाना। हमने सोचा यह हमारे लिए एक और विकल्प हो सकता है- लेकिन उससे उस स्कूल के बच्चों को क्या लाभ मिलेगा जिन्हें रोज़ ब रोज़ शिक्षकों की पिटाई बर्दाश्त करनी पड़ती है, चाहे वह किसी भी विषय की पढ़ाई हो, कोई भी शिक्षक हो! इस प्रकरण के बाद क्या हमारे लिए इतना पर्याप्त होगा कि सिर्फ अपने आश्रम के बच्चों को हम पहले अपने स्कूल में पढ़ायें और फिर आगे की पढाई भी उन्हें आश्रम में ही रख कर कराई जाये?

पवन के साथ बात करके हमने कोई ठोस कार्यवाही करने का निर्णय किया, जिससे इस स्थिति में बदलाव लाया जा सके। हमने एक गुप्त कैमरा खरीदकर पवन को दिया, जिसे वह अगले सात या दस दिन तक स्कूल ले जाता रहा। जो वीडियो क्लिप्स वह लेकर आया है, वे उसकी बताई कहानियों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं। आप उन्हें नीचे देख सकते हैं और आप भी अगर हम जैसे संवेदनशील हुए तो हमारी भाँति द्रवित हुए बगैर नहीं रह पाएँगे!

उनकी कक्षाध्यापिका एक दिन कक्षा में आई और पूरी कक्षा को एक सिरे से मारना शुरू कर दिया, सिर्फ इसलिए कि कुछ दूसरे शिक्षकों ने कक्षा के बारे में उससे शिकायत की थी! हर किसी को डंडे से मारा गया, सबकी पिटाई हुई। कुछ बच्चे उसी समय कक्षा में आए थे, उनकी भी पिटाई हुई और उन्हें समझ में तक नहीं आया कि उन्हें क्यों मारा-पीटा जा रहा है! एक लड़के को उसने कुछ लाने के लिए भेजा था, जब वह वापस आया तो उसे भी नहीं छोड़ा गया! और अंत में उसने बच्चों को धमकाया भी, कि एक हफ्ते तक वह इन सज़ाओं को रोज़ दोहराएगी, जिससे वे कुछ सीख ले सकें और अगर वे उससे भी नहीं सीख पाए तो उसके बाद दिन भर के लिए उन्हें 'मुर्गा' बनने की सजा देगी!

वीडियो क्लिप्स अलग-अलग शिक्षिकाओं द्वारा, अकारण या छोटी-मोटी गलतियों पर लड़के और लड़कियों, दोनों की क्रूर मार-पीट, यहाँ तक कि कभी-कभी शिक्षिकाओं को बच्चों के सिर पर चोट करते हुए भी दिखाती हैं। साथ ही उन्हें बुरी तरह अपमानित भी किया जाता है। एक क्लिप में आप एक शिक्षिका को यह कहते हुए सुन सकते हैं, ये गाँव वाली हेकड़ी, गाँव में ही छोड़कर आना तुम, और इतने बेशर्म हो कि इतनी पिटाई के बाद कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आदत पड़ी हुई है रोज रोज पिटते आ रहे हो ठुकते आ रहे हो! लात-घूँसे खाकर भी तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा!

हमें पवन पर गर्व है कि पकड़े जाने और पीटे जाने का खतरा होने के बावजूद भी उसने बाल उत्पीड़न के ये प्रमाण हमें उपलब्ध कराए। अगर उन्हें पवन के पास कैमरा मिल जाता तो वे उसके साथ न जाने क्या करते?

जब हमें कुछ वीडियो क्लिप्स मिल गईं तो हमने उनके आधार पर तुरंत कार्यवाही करने का निर्णय लिया। मैंने उत्तर प्रदेश की बाल-आयोग की अध्यक्ष, श्रीमती जूही सिंह से काफी देर बातचीत की और उन्हें सारी घटनाओं का ब्योरा दिया।

मुझे उनसे समुचित कार्यवाही का आश्वासन प्राप्त हुआ है।

अगले दिन हम उस स्कूल की प्रधानाध्यापिका से मिले। शुरू में तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया मगर जब हमारा संबल पाकर पवन ने ज़ोर देकर वही बात कही तो उसने अपनी दो शिक्षिकाओं को बुलवाया। और उन्होंने वे सारे तथ्य क़ुबूल किए, जिन्हें हमने इन वीडियो क्लिप्स में देखा था। कक्षाध्यापिका ने क़ुबूल किया कि उसने कक्षा के सारे बच्चों की पिटाई की थी क्योंकि उसे यह पता नहीं चल पा रहा था कि कौन बदमाशी या शैतानी कर रहा है। तो आपको दोषी का पता नहीं चला इसलिए आप सभी निर्दोषों को सज़ा देंगी? आप वहाँ की हालत समझ सकते हैं, जहाँ शिक्षिकाएँ खुले आम, बिना किसी पश्चाताप या अपराधबोध के सब कुछ स्वीकार करने की ढिठाई कर सकती हैं! जब प्रधानाध्यापिका उनसे कहने लगी कि शैतानी करने वाले बच्चे को उनके पास भेजना चाहिए था, तो हमने प्रतिवाद किया कि वे स्वयं भी बच्चों के साथ मार-पीट करती हैं! इस सच्चाई के सामने कुछ कहना उनके लिए असंभव था।

हमने साफ़ कहा कि बच्चों को शारीरिक दंड देना कानूनन अपराध है और इसके लिए आपको जेल की सज़ा भी हो सकती है! हमने उन्हें सी बी एस ई (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल) द्वारा जारी 'शारीरिक दंड की रोकथाम हेतु दिशानिर्देशों' की पुस्तिका दी क्योंकि वह स्कूल भी सी बी एस ई से ही सम्बद्ध है!

उत्तर? 'जी हाँ, लेकिन नियम तो बहुत सारे हैं- अगर हम उन सभी नियमों का पालन करते रहे तो और कुछ नहीं कर पाएँगे!' प्रधानाध्यापिका अपने आपराधिक कामों को उसी तरह जायज़ ठहरा रही थी जैसा हमारे स्कूल की पूर्व-शिक्षिकाएँ किया करती थीं और जिन्हें हमने सिर्फ एक बार बच्चे पर हाथ उठाने पर निकाल बाहर किया था: 'आप क्या करेंगे जब बच्चा पूरी तरह हाथ से निकल जाए? 'प्रधानाध्यापिका, जिसकी छड़ी उसके पास ही रखी हुई थी, तर्क करती ही चली जा रही थी, 'चलिए माना कि छड़ी से पिटाई करना गलत है लेकिन बच्चों को काबू में रखने के लिए आपको 'कुछ न कुछ' तो करना ही पड़ेगा!'

यह वादा करते हुए कि भविष्य में बच्चों की पिटाई बंद कर दी जाएगी वे हमें इस बात पर सहमत करने की पूरी कोशिश करते रहे कि हम पवन को उनके स्कूल में भेजना जारी रखें। लेकिन मामला सिर्फ उसका नहीं था, दूसरे सभी बच्चों का था! जब हमने उनसे यह लिखकर देने के लिए कहा कि भविष्य में किसी बच्चे पर हाथ नहीं उठाया जाएगा तो वह इसके लिए राज़ी नहीं हुई।

प्रधानाध्यापिका ने हमें स्कूल के संचालक के पास भेज दिया, जो उसका पति ही था और प्रधानाध्यापिका के साथ उस स्कूल का मालिक था। यह मुलाक़ात बहुत छोटी सी थी क्योंकि वह बहुत रूखा और अशिष्ट था। उसने हमसे बैठने तक के लिए नहीं कहा और हर बात से इंकार करता रहा। अंत में उसने कहा, 'जाइए, जो बन पड़े कर लीजिए!' स्वाभाविक ही, उसे पता नहीं था कि हमारे पास उनके अपराधों का पक्का प्रमाण भी मौजूद है। हम चुपचाप चले आए। उसके साथ आगे बात करना ही व्यर्थ था।

जब हम आश्रम वापस आए, हमें अपने एक भूतपूर्व पड़ोसी का फोन मिला, जिन्हें वे लोग भी जानते हैं। उसने कहा, 'आप इनसे पंगा क्यों लेते हो? जानते हैं, इस डायरेक्टर का भाई एक बार एक व्यक्ति के सिर पर पिस्तौल तानकर खड़ा हो गया था?' यह प्रकारांतर से हमारे पास भेजी गई धमकी थी। हमने जवाब दिया कि वह हम सबको गोली मार सकता है लेकिन हम वही करेंगे जो हमारा दिल चाहता है और जो किया जाना चाहिए।

हमारा अगला कदम मीडिया से सम्पर्क करना था। उन्होंने उनके इंटरव्यू लिए और हमने वीडियो क्लिप्स उन्हें थमा दी। हमने एक वीडियो तैयार किया है और वे अपने कार्यक्रम में उसे दिखाकर इस अपराध को जनता के सामने रखेंगे।

हमारे लिए यह सिर्फ इन शिक्षिकाओं, इस प्रधानाध्यापिका या इस स्कूल की बात नहीं है। मामला समाज और देश के बच्चों से संबंधित है! लोग सोचते हैं कि बच्चे कुछ सीख सकें, इसके लिए हिंसा ज़रूरी है! बच्चे कुछ कहते हुए घबराते हैं, अभिभावक शिकायत करते हुए डरते हैं। अभिभावक समझते हैं, उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, बच्चे को उस स्कूल से निकाल लें तो उसकी पढ़ाई का एक साल बरबाद होगा।

हिंसा या भय का वातावरण सीखने में कोई मदद नहीं करता। विपरीत इसके, वह उन्हें नुकसान पहुँचाता है, स्वस्थ तरीके से विकसित होने में रुकावट बनता है! सकारात्मक और स्नेहिल वातावरण में बच्चे उससे कहीं अधिक सीख पाते हैं और उनका समग्र विकास संभव होता है!

मैं उन बच्चों की मदद करना चाहता हूँ जो स्कूलों में मार खाते हैं। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यह गैरकानूनी है, कि इसकी शिकायत कहाँ और कैसे की जाए- और यदि आप ऐसा करते हैं तो आपका नाम गुप्त रखा जाएगा!

प्रिय अभिभावकों, विश्वास कीजिए, यह आपके बच्चे के लिए हानिकारक है। जब भी आपको पता चले कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हो रहा है तो चुप न बैठें! प्रतिरोध में आवाज़ बुलंद करें, शिक्षकों से, स्कूल प्रबंधन से, दूसरे अभिभावकों से मिलकर चर्चा करें। इन घटनाओं को जनता के सामने लेकर आएँ, इस प्रताड़ना का सक्रिय प्रतिरोध करें!

प्यारे बच्चों, अपनी बात कहने से कभी न घबराएँ! आपके साथ जो हो रहा है अपने अभिभावकों को अवश्य बताएँ, खुद भी सक्रिय हों, जो कुछ आपके साथ हो रहा है, उसकी सूचना अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

मैं भी आपकी मदद के लिए यहाँ मौजूद हूँ। जब भी ज़रूरत हो, मुझसे संपर्क करें। मैं आपके समर्थन में खड़ा रहूँगा और हर संभव मदद करने का प्रयास करूँगा।

बच्चों की खातिर हमें इस देश में और समाज में परिवर्तन का सूत्रपात करना है।

पश्चिमी महिला के लिए क्यों भारत में सामाजिक जीवन बनाने में दिक्कतें पेश आ सकती हैं – 2 जुलाई 2015

पिछले कुछ ब्लॉगों में मैं उन चुनौतियों के विषय में लिखता रहा हूँ, जिनका सामना उन पश्चिमी महिलाओं को करना पड़ सकता है, जो अपने भारतीय पति के साथ भारत में रहने का इरादा रखती हैं। मैंने यह भी बताया कि इन चुनौतियों का फैलाव काफी विस्तृत है- अपनी भारतीय सास के साथ पैदा होने वाले मतभेदों से लेकर इस प्रश्न तक कि आप किस हद तक अंधविश्वास से परिपूर्ण भारतीय परंपराओं को स्वीकार करेंगी, या घरेलू हिंसा को, यहाँ तक कि आपके बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहारों को आप कहाँ तक सहन करेंगी। आज मैं कुछ और आगे जाकर इस विषय में अपने विचार रखना चाहता हूँ- आपके घरेलू संबंधों से परे, अपने संयुक्त परिवार के बाहर की दुनिया से आपके संबंध कैसे होंगे? आपका सामाजिक जीवन कैसा होगा?

स्वाभाविक ही, जब आप किसी दूसरे देश में बसती हैं और अपने लिए एक सामाजिक जीवन तैयार करने की कोशिश करती हैं तब आपको लगभग शून्य से शुरुआत करनी पड़ती है। 'लगभग' मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आपका पति और उसका परिवार इस काम में आपकी मदद कर सकते हैं। शायद! भारत की जनसंख्या इतनी अधिक है कि यह समस्या नहीं होती कि आपको लोग कहाँ मिलेंगे- लेकिन सवाल यह है कि क्या आप उनके साथ नज़दीकी बढ़ाना चाहेंगी!

पश्चिम में पली-बढ़ी होने के कारण और इस कारण कि वहाँ के खुले समाज में आपका लालन-पालन और विकास हुआ है, एक औसत भारतीय की तुलना में आप बिल्कुल अलग ढंग से सोच रही होती हैं। सिर्फ यही बात आपके लिए भारत में कुछ परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने में बाधक हो सकती हैं।

एक उदाहरण लें: आप अपने पति के साथ बाज़ार में घूम रही हैं और अचानक पति की एक परिचित महिला से आप लोगों की मुलाक़ात हो जाती है। आप गपशप करने लगती हैं और आपको लगता है कि यही भारत में आपका सबसे पहला संपर्क है। शायद आपकी पहली मित्र। वह भी आपसे मिलकर उल्लसित दिखाई दे रही है। आपके बीच मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान होता है और वह वादा करती है कि सप्ताहांत में वह आपके पास आएगी। आप भी व्यग्र हो उठती हैं और नाश्ते की तैयारियाँ शुरू करते हुए इस बात की आदत डालने का प्रयास करने लगती हैं कि ‘सप्ताहांत’ का अर्थ कोई एक खास दिन नहीं है, वह कभी भी धमक सकती हैं!

लेकिन क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि जब रविवार की शाम तक भी आपके यहाँ कोई न आए तो आपको कैसा लगेगा?

अधिकतर भारतीय खुद अपनी कही बात को कोई विशेष महत्व नहीं देते, खासकर इस तरह की मुलाकातों में कही बातों को। पश्चिम में आपकी आदत होती है कि आप मुलाक़ात का एक निश्चित दिन और समय तय करते हैं और अगर सामने वाले का कार्यक्रम किसी कारण स्थगित होता है तो वह अपने न आ पाने की सूचना देता है। पहली बात तो भारतीय लोग इसे बहुत गंभीर नहीं मानते! इसलिए उसके बारे में उन्हें कोई अफसोस भी नहीं होता-यह भिन्न विचारों और समझ की बात है! उनका फोकस दूसरी बातों पर होता है और कुल मिलाकर चीजों को देखने का नज़रिया भी बिल्कुल अलग प्रकार का होता है।

स्वाभाविक ही, बातचीत के विषय भी बिल्कुल अलग होंगे क्योंकि हर एक की रुचियाँ उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी निर्भर होती हैं। बहुत सी महिलाओं के पास बातचीत के लिए इसके अलावा कोई दूसरा विषय नहीं होता कि उसका पहला बच्चा कब होने वाला है या वह कितने बच्चे पैदा करेगी- जब कि आप कुछ अधिक गंभीर विषयों पर बात करना चाहेंगी!

ज़्यादातर भारतीय परिवारों में व्याप्त अंधविश्वास के बारे में आपको मैंने पहले ही बताया। आपका भारतीय परिवार बहुत असाधारण रूप से प्रगतिशील ही क्यों न ही क्यों न हो और मिथ्या अंधविश्वासों पर भरोसा न भी करता हो तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आपके आसपास के अन्य सभी लोगों में अंधविश्वास इस तरह कूट-कूटकर भरा होता है कि हर चर्चा में उसका प्रभाव दिखाई देता है! क्या आप मुहूर्त, व्रत-उपवास, धार्मिक समारोहों से सम्बंधित प्रश्नो से बचना चाहते हैं? उन्हें सुनने की आदत डालिए या फिर दोस्तों से बातचीत बंद कर दीजिए। आपको बुरा लग रहा है? किसी बिंदु पर आकर आप स्वयं अनुभव करेंगे कि इस मित्रता के लिए बहुत सारी ऊर्जा और बहुत सारा समय व्यर्थ करने में आप रुचि नहीं रखते।

मैंने घरेलू हिंसा के बारे में लिखा था और यह भी कि कैसे आपको अपने बच्चों के विरुद्ध किसी तरह की हिंसा स्वीकार नहीं करनी चाहिए। लेकिन आप अपने मित्रों और उनके घरों में होने वाली हिंसा का क्या करेंगे? क्या आप उनके घरों में जाना पसंद करेंगे कि आपके बच्चे उनके बच्चों के साथ खेलें और फिर उन्हें अपने माता-पिता से गालियाँ खाता या पिटता देखें? आप इसे पसंद नहीं करेंगे, आप नहीं चाहेंगे कि आपका बेटा या आपकी बेटी यह सब नज़ारा देखे और उनका संवेदनशील मन इन कटु बातों का अनुभव करे! फिर आप अपने बच्चे को अपने तरीके से, अपने परिवेश में पालना-पोसना शुरू कर देंगी।

हो सकता है कि भारत के बड़े शहरों में, जहाँ लोग अधिक खुले दिमाग वाले होते हैं और अलग तरह का जीवन व्यतीत करते हैं, ये बातें कुछ भिन्न हों। लेकिन बहुत भिन्न भी नहीं और फिर सारे लोग भी वैसे खुले दिमाग के नहीं होते! तथ्य यह है कि आज भी भारत में जीवन के प्रति अपरंपरागत रवैया रखने वाले इने-गिने लोग ही दिखाई पड़ते हैं।

अपनी जर्मन पत्नी के साथ हुए अपने निजी अनुभव के आधार पर कहना चाहता हूँ कि बहुत प्रयासों के बाद भी आपको बहुत थोड़े लोग ही मिल पाते हैं, जिनके साथ आप वास्तव में अपना समय गुज़ारना पसंद करेंगी। लेकिन फिर- यह सबकी व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करता है और इस पर भी कि आप ठीक-ठीक क्या चाहती हैं। तो आगे बढ़िए, मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं!

लेकिन अगर आप अपने भारतीय पति के साथ अपने देश में बसना चाहती हैं तो अगले सोमवार से मेरे ब्लॉग पढ़ना शुरू कीजिए क्योंकि मैं उन समस्याओं पर लिखने जा रहा हूँ, जिनसे उसकी मुठभेड़ हो सकती है, क्योंकि उसके लिए वह वातावरण बिल्कुल अपरिचित और नया होगा!

जब भगवान भी बलात्कार करते हैं – हिन्दू मिथकों का भारतीय समाज पर असर – 3 नवंबर 2014

आज भी एक त्यौहार है और वृन्दावन में धार्मिक लोग परिक्रमा लगाकर इसे मनाते हैं। हिन्दू मिथकों के अनुसार इस दिन भगवान चार महीनों की लम्बी नींद से जागते हैं। यह विष्णु और तुलसी के विवाह का दिन भी है और भारत में आज के दिन से पुनः विवाहों के मौसम की शुरुआत होती है। आज के ब्लॉग में मैं इन धार्मिक कथाओं पर नज़दीकी नज़र डालते हुए भारतीय संस्कृति पर हुए उनके असरात का जायज़ा लेना चाहूँगा।

संक्षेप में पौराणिक कथा से मैं इसकी शुरुआत करता हूँ:

धर्मग्रंथों के अनुसार जलंधर नाम का एक दैत्य था। उसके पास अपना रूप बदलने की शक्ति थी, जिसके चलते वह किसी भी व्यक्ति का शरीर धारण कर सकता था। अपनी इस शक्ति का प्रयोग वह औरतों पर करता और उनके पतियों का रूप धरकर धोखे से उनका शीलभंग करने में सफल हो जाता। पता चलने पर जब पति उससे लड़ने आते तो कोई भी उसे मार न पाता। यह अद्भुत शक्ति उसे उसकी पत्नी के पतिव्रता होने के कारण प्राप्त थी। जी हाँ, पत्नी की स्वामिभक्ति के कारण वह दैत्य बलात्कार पीड़िता स्त्रियों के पतियों के हाथों मारा जाने से बच जाता।

सारे पति मिलकर विष्णु के पास, जिन्हें सबसे बड़ा परमेश्वर माना जाता है, गए और उससे मदद मांगी। विष्णु ने जलंधर को हराने के लिए उसी के तरीके को आजमाने का निश्चय किया: उन्होंने जलंधर का रूप धरा और दैत्य की पत्नी से सम्भोग करने में सफल रहे। वृंदा पतिव्रता नहीं रही और इस तरह उसके दैत्य पति की शक्ति जाती रही। अंततः विष्णु जलंधर को मारने में सफल रहे।

इस तरह धोखा देने के कारण वृंदा विष्णु पर बहुत क्रोधित हुई और उन्हें पत्थर हो जाने का श्राप दिया। फिर वह मृत जलंधर के साथ सती हो गई।

फिर वही वृंदा पुनर्जन्म लेकर पवित्र तुलसी का पौधा बनी और आखिर तुलसी और शालिग्राम, यानी पत्थर के रूप में विष्णु, का विवाह सम्पन्न हुआ।

इस पौराणिक कथा को हर कोई जानता है। अब मैं वर्तमान काल में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं पर इस कथा के परिणामों पर नज़र डालते हुए चार बिन्दुओं में अपनी बात रखना चाहता हूँ। स्वाभाविक ही इन्हें समाज पर धर्म के बड़े दुष्परिणामों के रूप में देखा जा सकता है:

1) अगर कोई किसी महिला पर बलात्कार करता है तो आप उसकी पत्नी के साथ बलात्कार कर सकते हैं क्योंकि आपके भगवान ने भी तो यही किया था।

आज इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ लोग बलात्कारी के परिवार की स्त्रियों पर बलात्कार करके बदला लेते हैं।

2) अपने धोखेबाज़, बलात्कारी पति की रक्षा के लिए स्त्रियों को वफादार और पवित्र होना चाहिए।

आज के भारतीय समाज में यह आम बात है कि स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वह तो पवित्रता की मूर्ति बनी रहे भले ही उसका पति बाहर जाकर कहीं भी मुँह मारता रहे, नजर आने वाली हर लड़की के साथ छेड़छाड़ करता रहे।

3) पति की मृत्यु के बाद पत्नी को आत्महत्या कर लेनी चाहिए।

दो सौ साल पहले तक यह एक सामान्य बात थी। इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता है और इस तरह आत्महत्या करना बड़े गर्व की बात होती थी क्योंकि यह काम उसकी स्वामिभक्ति का सबूत माना जाता था। राजा राममोहन रॉय ने एक कानून बनवाकर इस प्रथा को समाप्त करवाया लेकिन मेरी किशोरावस्था तक भी हम समाचार-पत्रों में ऐसे प्रकरणों के समाचार पढ़ते रहते थे। आज भी राजस्थान में ऐसे मंदिर हैं, जहाँ सती हुई स्त्रियॉं की पूजा की जाती है।

4) बलात्कार पीड़िता को अपने बलात्कारी उत्पीड़क के साथ विवाह रचाना चाहिए।

भारत में गाँवों की पंचायतों में कई बार ऐसे निर्णय आज भी सुनाए जाते हैं। दोनों परिवार अकसर इस बात पर राज़ी होते हैं कि बलात्कार की यही तार्किक परिणति हो सकती है।

इस चर्चा से आप भारतीय संस्कृति में महिलाओं की स्थिति का स्पष्ट अनुमान लगा सकते हैं। उसे बलात्कार के कारण बलात्कार झेलना पड़ता है, अपने पति के दीर्घ जीवन और संरक्षण के लिए प्रयास करने पड़ते हैं, उसे अपने पति के लिए खुद भी जीवन से हाथ धोना पड़ता है और अंत में, उसे खुद पर बलात्कार करने वाले अत्याचारी अपराधी के साथ विवाह करना पड़ता है और जीवन भर पत्नी बनकर उसकी सेवा भी करनी पड़ती है।

और इस देश के इस पाखंडी धर्म में कहा जाता है कि यहाँ स्त्रियॉं का इतना आदर किया जाता है कि उन्हें देवी का दर्जा हासिल है। ऐसे धर्म और ऐसी संस्कृति का आदर करने की आप मुझसे अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

पुनश्च: इन शब्दों के लिए मुझे गाली देने की जिनकी तीव्र इच्छा हो रही हो, वे पहले अपने धर्मग्रंथों को पढ़ें और सबसे पहले उन्हें गाली दें, जिन्होंने इन ग्रन्थों को लिखा है। मैं सिर्फ उनका हवाला देकर उसके दुष्परिणामों की ओर इशारा भर कर रहा हूँ….

दो इंच की बिकनी से क्या फर्क पड़ता है? 22 अक्टूबर 2014

पिछली बार जर्मनी में मैं और रमोना जब एक समुद्री बीच पर टहल रहे थे तो हम न्यूडिस्ट बीच की 'सीमा रेखा' पर पहुँच गए थे। जर्मनी में बीचों पर सूचना-पट्ट लगे होते हैं, जिन पर साफ़ लिखा होता है कि इसके आगे वह इलाका है, जहाँ नग्न घूमने-फिरने की छूट है। मैंने कहा कि यह बड़ी हास्यास्पद बात है- आखिर बिकनी भर पहन लेने से कितना फर्क पड़ता है? वह शरीर का सिर्फ कुछ इंच हिस्सा ही तो ढँकती है!

कुछ देर बाद भी वे वाक्य मेरे दिमाग में गूँज रहे थे। मैं जानता हूँ, मुझे यह कहता देखकर कुछ लोगों को मेरे बारे में ग़लतफ़हमी हो सकती है। वे सोच सकते हैं कि मैं बिकनी पहनने के खिलाफ हूँ बल्कि उससे बढ़कर, वे सोच सकते हैं कि कि मैं शरीर को ज़्यादा से ज़्यादा ढँककर रखने के पक्ष में हूँ! विश्वास कीजिए, ऐसा कुछ मैं बिल्कुल नहीं सोच रहा हूँ!

न तो मैं न्यूडिस्ट हूँ और न ही शरीर का हर इंच कपड़ों से ढँककर रखने का समर्थक हूँ। वास्तव में मैं स्वाभाविक जीवन जीने का समर्थक हूँ और अगर लोग तैरने वाले कपड़ों में बीचों पर घूमते हैं या वहाँ नंगे बैठे या लेटे रहते हैं तो इसमें मुझे कुछ भी गलत नहीं लगता। भले ही मैं स्वयं इतने सारे लोगों के सामने नंगा नहीं बैठता लेकिन अगर कोई दूसरा ऐसा करना चाहता है तो मुझे कोई एतराज़ भी नहीं है।

लेकिन शरीर के प्रदर्शन के सम्बन्ध में एक बात मुझे पसंद नही है: जब महज दिखावा करने की नीयत से ऐसा किया जाता है, दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचने के उद्देश्य से अपने शरीर को उघाड़कर दिखाया जाता है और फिर दूसरों से एक ख़ास तरह की प्रतिक्रिया की अपेक्षा की जाती है। यह सहज-स्वाभाविक नहीं है, नैसर्गिक नहीं है और इसलिए मुझे यह प्रदर्शन अक्सर थोड़ा अजीब सा लगता है।

यह ऐसा विषय है, जिस पर बात करते समय अपने शब्दों को लेकर बड़ी सतर्कता बरतनी चाहिए: मैं आपसे यह नहीं कह रहा हूँ कि अपने वक्ष के ऊपरी हिस्से को खुला मत रखिए या छोटी स्कर्ट मत पहनिए- लेकिन अपने अंगों का प्रदर्शन सिर्फ इस उद्देश्य से मत कीजिए कि…कि जैसे, सिर्फ अंग प्रदर्शन के लिए ही आपने ऐसे कपड़े पहने हों! मेरी इस बात से कहीं भी यह अर्थ नहीं निकलता कि मेरे विचार में आपको अपना शरीर पूरी तरह ढँककर रखना चाहिए, जिससे पुरुष आपका सम्मान करें या आपके साथ छेड़-छाड़ न करें! मेरे विचार में होना तो यह चाहिए कि आप बिना कपड़ों में बाहर निकलें और उसके बाद भी आपको सम्मान की नज़रों से देखा जाए और आपको परेशान करने की किसी की हिम्मत न हो! यह आपके सम्मान की बात है कि आप अपने शरीर का इस्तेमाल इस तरह न करें कि खुद ही अपने शरीर तक महदूद रह जाएँ! सहज, स्वाभाविक रहें!

प्रसंगवश कहना चाहूँगा कि यह बात पुरुषों के लिए भी उतनी ही सच है! यह अच्छी बात है कि आपने घंटों जिम में मेहनत की है, कसरत करके बदन बनाया है, शानदार मांसपेशियाँ और खूबसूरत सिक्स-पैक्स तैयार किए हैं। यह भी बड़ी अच्छी बात है कि आपने अपनी खुराक का ध्यान रखा, खाया कम और प्रोटीन युक्त पेय ग्रहण करते रहे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप शर्ट उतारकर, कहीं भी, कभी भी, इधर-उधर घूमें!

अंत में बिकनी पर वापस आते हुए कहना चाहूँगा कि मुझे आश्चर्य होता है कि समाज में ऐसा कब और कैसे हो गया कि महिलाओं की गरिमा या प्रतिष्ठा को इतना गिरा दिया गया कि वह इतने छोटे से आकार में सिमट गई, जिसे दो इंच के कपड़े से ढँका जा सकता है- हालांकि पुरुषों के मामले में थोड़े बड़े कपड़े की ज़रुरत होगी! उस छोटी सी चिंदी के बगैर वह एक लांछन जैसा होगा- और उसके साथ, तैरते वक़्त पहना जाने वाला साधारण कपड़ा!

मानव मात्र की गरिमा यानी एक खासा नाज़ुक मसला!

पूरब और पश्चिम में स्तनपान कराना और स्तनपान छुड़ाना – एक तुलनात्मक चर्चा – 27 अगस्त 2014

अपरा की बीमारी और इस दौरान उसके साथ हुए रोमांचक अनुभवों के बारे में बताने के बाद आज मैं आपको अपरा द्वारा अभी हाल ही में उठाए गए एक और बड़े कदम के बारे में बताना चाहता हूँ: उसने माँ का दूध पीना छोड़ दिया है, अंग्रेज़ी में कहें तो "Apra is now fully weaned"। क्योंकि यह बड़ी आसानी से हो गया, हमारी अपेक्षा से अधिक आसानी से, इसलिए यह कैसे हुआ, इसका विवरण मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। लेकिन ऐसा करने से पहले आइए देखते हैं कि रमोना और मेरी परम्पराओं में यानी पश्चिमी और भारतीय संस्कृतियों में, जिनका मिला-जुला रूप हम अपरा को प्रदान कर रहे हैं, स्तनपान का क्या स्वरूप है और दोनों में क्या भिन्नताएँ या समानताएँ हैं।

पश्चिम में महिलाएँ सामान्यतः मुश्किल से छह माह तक बच्चों को स्तनपान कराती हैं। बहुत सी महिलाएँ तीन माह के बाद ही बंद कर देती हैं और कुछ स्तनपान कराती ही नहीं हैं। गर्भावस्था के समय ही महिलाएँ यह तय कर लेती हैं कि बच्चा होने के बाद वे स्तनपान कराएँगी या नहीं, कराएँगी तो कितने समय के लिए कराएँगी या अपने नवजात बच्चे को शुरू से सिर्फ बच्चों को पिलाने वाला नुस्खा पिलाएँगी। स्वाभाविक ही कई औरतों में दूध न आने की समस्या होती है और जिनके बच्चों को माँ का दूध नहीं मिल पाता मगर यह भी सच है कि बड़ी संख्या में पश्चिमी औरतें शारीरिक रूप से सक्षम होते हुए भी अपने नवजात शिशुओं को स्तनपान न कराने का निर्णय लेती हैं।

उनका काम इसके आड़े आता है। औरतें बहुत जल्दी काम पर चली जाती हैं क्योंकि पेशे के प्रति निष्ठा उन्हें अपने काम से अधिक समय के लिए दूर नहीं रहने देती। सिर्फ कुछ माह बाद ही दूध छुड़ाने की कष्टसाध्य प्रक्रिया को झेलने की कल्पना से कुछ महिलाओं को स्तनपान कराना ही व्यर्थ लगने लगता है। कुछ महिलाएँ ब्रेस्ट-पंप की सहायता से अपना दूध निकालकर बोतल में दूध पिलाने का विकल्प अपनाती हैं, जिससे बच्चे को अपनी माँ के दूध का लाभ बराबर मिलता रहे। दूसरी महिलाएँ शुरू से ही बाज़ार में मिलने वाला नवजात शुशुओं के लिए विशेष रूप से तैयार नुस्खा (बेबी-फार्मूला) पिलाती हैं। लेकिन यह तथ्य मुझे विचलित कर देता है क्योंकि स्तनपान न सिर्फ बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करता है-जोकि कोई भी नुस्खा नहीं कर सकता-बल्कि वह माँ और बच्चे के बीच घनिष्ठ रिश्ता कायम होने के लिए बहुत ज़रूरी होता है।

तो यह तो वस्तुस्थिति हुई मगर अलग तरह के विचार रखने वाले लोगों में-योग और दूसरी कोई वैकल्पिक जीवन पद्धति अपनाने वाले या आध्यात्मिकता और नैसर्गिक जीवन में यकीन करने वाले लोगों में-ऐसी औरतें मिल ही जाती हैं, जो तब तक स्तनपान कराती रहती हैं जब तक कि बच्चा खुद स्वेच्छा से दूध छोड़ न दे। जब तक कि माँ के दूध से उसे विरक्ति न हो जाए। मूलतः मैं इस विचार का समर्थक हूँ लेकिन फिर ऐसे बच्चे तीन, चार, छह, यहाँ तक कि आठ साल तक भी दूध पीते रह सकते हैं! माँ की छाती से लगकर दूध पीने के लिए निश्चय ही यह उम्र कुछ ज़्यादा ही कही जाएगी!

भारत में ज़्यादातर बच्चों को दो या तीन साल तक स्तनपान कराया जाता है। परंपरागत रूप से अक्सर औरतें काम पर नहीं जातीं और जाती भी हैं तो तब, जब बच्चे बड़े हो जाते हैं। यानी माँएँ बच्चों के लिए घर पर ही उपलब्ध रहती हैं और बच्चो को स्तनपान करा सकती हैं। बड़े परिवारों में अक्सर बहुत से नवजात बच्चे होते हैं और इसलिए कई औरतें न सिर्फ अपने बच्चे या बच्ची को बल्कि अपने भतीजों और भतीजियों को, यहाँ तककि आस-पड़ोस के बच्चों तक को अपना दूध पिलाती हैं! स्वाभाविक ही इससे न तो माँ के दूध की आपूर्ति कभी रुकती है और न ही वह कभी कम होती है।

जबकि परंपरा से यह अक्सर होता रहा है और लोग इसके आदी हैं लेकिन शहरों में अब, स्वाभाविक ही, स्थिति बदल रही है। औरतें अब बड़ी संख्या में नौकरियाँ कर रही हैं, जहाँ जर्मनी की तरह नौकरी की सुरक्षा की गारंटी नहीं हैं कि एक निश्चित संख्या में कुछ महीनों का सवैतनिक अवकाश मिल सके। यहाँ अधिकांश कंपनियों में अगर आप नौकरी पर नहीं आए हैं तो अक्सर वेतन से आपके पैसे काट लिए जाते हैं और अगर साल भर तक आपका यही रवैया रहा तो संभव है आपको नौकरी से ही हाथ धोना पड़ जाए। तो आधुनिक भारतीय महिलाएँ दूध जल्दी छुड़ा देती हैं और अगर वे नौकरी करते रहना चाहती हैं तो बाज़ार में मिलने वाले नुस्खों से काम चलाती हैं।

आप हमारे स्कूल के बच्चों की माँओं जैसी गरीब औरतों के बारे में सोच रहे होंगे, जिन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अक्सर कोई न कोई काम करना पड़ता है। भारत में ऐसी औरतों और उनके होने वाले बच्चों के लिए काम करने की जगह पर मातृत्व अवकाश का कोई प्रावधान नहीं होता और न ही बच्चों के लिए कोई सुविधा या अभिभावकों के लिए किसी निधि की व्यवस्था होती है। यह कटु यथार्थ है कि गरीब औरतें गर्भावस्था में या बच्चा हो जाने के बाद काम से ज़्यादा समय तक दूर नहीं रह सकतीं। वे बच्चा होते ही जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ी हो जाती हैं और अपने नवजात शिशु को एक कपड़े में लपेटकर काम पर ले आती हैं और वहाँ कठोर से कठोर काम करने के लिए मजबूर होती हैं। बच्चा हर वक़्त माँ के शरीर की गर्माहट महसूस करता रहता है और फसल काटते हुए या लकड़ी बीनते हुए या बालू ढोते हुए वह छोटे-छोटे अवकाश ले लेती है और बच्चे को स्तनपान कराती है।

मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई बात गलत या सही है। आपको अपनी परिस्थिति के अनुसार अपने लिए सही या गलत का निर्णय करना होता है कि आप क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। लेकिन मैं दिल से चाहता हूँ कि जो लोग सक्षम हैं वे स्तनपान द्वारा प्राप्त होने वाले प्रेम और सुरक्षा के एहसास को, माँ और बच्चे के बीच उसके ज़रिए पैदा होने वाले स्नेहासिक्त संपर्क और जुड़ाव को पैसे और अपने काम से ज़्यादा महत्वपूर्ण मानें। हाँ, तभी जब आप खुद उससे संतोष और खुशी महसूस करें।

अपरा का दूध छुड़ाने के अपने निर्णय के बारे में मैं आपको कल बताऊँगा और यह भी कि कैसे उसे क्रियान्वित करना हमारी अपेक्षा से ज़्यादा आसान रहा।

‘आइए, सेक्स के बारे में बातें करें’ का अर्थ ‘आइए, अश्लील चित्र देखें’ नहीं है! 7 अगस्त 2014

कल मैंने इस विषय पर चर्चा की थी कि सिर्फ यौन सम्बन्ध स्थापित करने पर, सेक्स का आनंद लेने पर, सेक्स के बारे में सोचने पर या सेक्स सम्बन्धी किसी भी बात पर चर्चा करने या सोचने-विचारने पर धर्म कैसे लोगों में अपराधबोध भर देता है। वास्तव में कई लोगों के लिए सेक्स इतना बड़ा मामला बन गया है कि वे इस विषय में किसी भी तार्किक चर्चा के काबिल नहीं रह गए हैं। उनके लिए सेक्स सम्बन्धी हर बात विकाराल रूप ले चुकी है।

मेरे एक ब्लॉग पर एक भारतीय मित्र से चर्चा हो रही थी। उस ब्लॉग में मैंने लिखा था कि सेक्स के बारे में हमें बच्चों से भी, उनकी आयु के लिहाज से उपयुक्त तरीके से, खुलकर बात करनी चाहिए। मैंने उससे कहा कि मैं अपनी बेटी से भी सेक्स सम्बन्धी बात करूँगा। मैं चाहूँगा कि मेरी बेटी को अपना साथी चुनने की पूरी आज़ादी मिले और वह किसके साथ सोना चाहती है, इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करे। यह सिर्फ और सिर्फ उसका चुनाव होगा कि कौन उसके बिस्तर पर सोएगा- इसमें मेरा कोई दखल नहीं होगा!

उसके जवाब से मैं स्तब्ध रह गया। उसने कहा, "लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ पोर्न (अश्लील) विडिओ नहीं देख सकता!"

दरअसल मैं मानता हूँ कि आप में से ज़्यादातर लोग चकरा गए होंगे और ताज्जुब कर रहे होंगे कि वास्तविक मुद्दे से इस बात का क्या ताल्लुक हो सकता है। लेकिन उसकी इस बात पर आगे सोचते हुए मैं कह सकता हूँ कि इसके परिणामों को लेकर, उसके वक्तव्य के पीछे मौजूद विचारधारा को समझकर मैं भौंचक रह गया। मुझे समझ में आ रहा था कि सेक्स के बारे में चर्चा करते हुए वास्तव में इन लोगों का दिमाग इस ओर मुड़ जाता है।

वास्तव में, ऐसा कौन करेगा? कौन अपनी बेटी के साथ सोफे पर बैठकर अश्लील विडिओ देखेगालेकिन इसके बारे में बात ही कौन कर रहा है? जैसे "सेक्स के बारे में बातचीत करना" और "अश्लील विडिओ देखना" एक ही बात हो! भाई मेरे, दोनों में ज़मीन और आसमान का अंतर है!

मुझे लगता है कि लोग, खासकर धार्मिक लोग, सेक्स को लेकर बुरी तरह बंधनों में जकड़े होते हैं और सेक्स शब्द का भूले-भटके भी इस्तेमाल करते हैं तो खुद ही कामोत्तेजित हो उठते हैं! जैसे ही वे किसी नंगे शरीर को देखते हैं, उनकी सारी दमित कामुकता बाहर फूट निकलती है। नंगापन, सेक्स, सेक्स सम्बन्धी बातचीत, यह सभी बातें उन्हें बेकाबू कर देने के लिए पर्याप्त होते हैं! सेक्स के बारे में वे सामान्य रूप से बात ही नहीं कर पाते- और इसलिए सोचते हैं, कोई दूसरा भी ऐसा नहीं कर सकता!

लेकिन- आश्चर्य! जब मैं कहता हूँ कि मैं बेटी के साथ सेक्स के बारे में बात करूँगा तो कोई मैं उसे काम-मुद्राओं की जानकारी देने नहीं जा रहा हूँ, शरीर के कामोद्दीपक हिस्सों की तरफ उसका ध्यान नहीं खींचने वाला हूँ या कामोत्तेजक साहित्य की ओर संकेत नहीं करने वाला हूँ- उसके साथ बैठकर अश्लील फ़िल्में देखने की बात तो छोड़ ही दें! वह पिता और बेटी के बीच का एक सामान्य वार्तालाप होगा। मन की सामान्य इच्छाओं, कामनाओं के बारे में, शारीरिक प्रतिक्रियाओं के बारे में कि किस तरह ये बातें हमारे नैसर्गिक शारीरिक गुण है और इस संबंध में उसकी जिम्मेदारियों के बारे में भी।

सच तो यह है कि मुझे आशा है कि हम अपनी बेटी का लालन-पालन इस तरह करेंगे कि बाद में उसके साथ सेक्स के बारे में बात करते हुए हमें शर्मिंदा न होना पड़े। लेकिन हम अपनी बेटी के साथ अश्लील बातें करेंगे, यह सोच ही हमारे समाज की बीमारी का मूल कारण है, इसी ने उसे बीमार कर रखा है।

संकीर्ण मानसिकता के चलते नैसर्गिक इच्छाओं का दमन। सेक्स विषयक किसी शब्द के उच्चारण में भी गजब की हिचक! छोटा-मोटा विचार आने पर ही कामोत्तेजित हो जाना और फिर उसका अपराधबोध, इस विषय में भयंकर शर्म-इन्हीं सब बातों पर यह बीमार मानसिकता निर्भर होती है और इसे हम भारत में बहुतायत से देखते हैं। स्वयं का यौनिक दमन ही अंततः महिलाओं के विरुद्ध यौन दुराचार में तब्दील हो जाता है।

क्योंकि आप हर वक़्त यह सुनते हैं कि "अश्लील वीडियो देखें" जबकि मैं कह रहा हूँ कि "सेक्स के बारे में बात करें"।

अब गंदा दिमाग किसका है, आपका या मेरा?