भारतीय क्यों सोचते हैं कि बच्चों को अपने अभिभावकों से डरना चाहिए? 8 दिसंबर 2015

हमारे स्कूल के बच्चों की छमाही परीक्षाएँ शुरू हो गई हैं। वे पढ़ाई में बहुत व्यस्त हैं, उत्साहित हैं कि परीक्षा में किसी तरह उनके सारे सवाल सही हों और इंतज़ार कर रहे हैं कि कब अगले दो सप्ताह बीतेंगे और परीक्षाएँ समाप्त होंगी। एक दिन अगली परीक्षा के लिए रमोना आश्रम में ही रहने वाले एक बच्चे, प्रांशु को पढ़ा रही थी कि एक पुस्तक पलटते हुए उसकी नज़र इस सवाल पर पड़ी: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?' उसे विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा प्रश्न भी किसी पाठ्य पुस्तक में हो सकता है!

‘नैतिक शिक्षा’ विषय का यह प्रश्न था। अधिकतर हमें यह विषय बच्चों के लिए काफी उपयोगी और महत्वपूर्ण लगता है। यह विषय उन्हें समझ प्रदान करता है कि एक-दूसरे के साथ कैसा सुलूक किया जाना चाहिए और अपने पर्यावरण और खुद अपने आप के प्रति आपका रवैया कैसा होना चाहिए। पाठ हैं, जिनमें नम्रता सिखाई जाती है और दूसरों का आदर करने की शिक्षा दी जाती है। कुछ पाठों में काम की महत्ता दर्शाई जाती है और यह भी कि कैसे कक्षा में अपने विवादों को मिलजुलकर सुलझाना चाहिए। इस विषय की एक ही समस्या है कि पाठ्य पुस्तक और शिक्षक भी अनिवार्य रूप से पाठों पर बहुत सी मनगढ़ंत बातें भी सिखाने लगते हैं और उन बातों से मैं हमेशा सहमत हो जाऊँ यह मुमकिन नहीं हो पाता।

प्रस्तुत प्रकरण में उस पुस्तक का एक पाठ बच्चों को यह बताता है कि घर का हर सदस्य महत्वपूर्ण है। दादा-दादी इसलिए कि वे आपको अपने संस्मरण सुनाते हैं, माता-पिता इसलिए कि दोनों बाहर जाकर काम करते हैं और पैसे कमाते हैं और बच्चे भी, इसलिए कि वे भी घर के कामों में मदद कर सकते हैं और बड़े-बूढ़ों की सहायता कर सकते हैं। यहाँ तक ठीक है। लेकिन उसके बाद प्रश्नावली में इस तरह के प्रश्न हैं, जिनके उत्तर बच्चों को अपनी परिस्थितियों और अनुभव के आधार पर लिखने हैं: आपके परिवार में कितने सदस्य हैं?, आपके घर में होमवर्क कौन करता है? इत्यादि।

और उसके बाद यह प्रश्न: 'घर में आप सबसे ज़्यादा किससे डरते हैं?'

भारत के घरों की स्थिति के बारे में जो बात मैं हमेशा से लिखता रहा हूँ, यह पाठ और यह प्रश्न उसे पूरी तरह सही ठहराता है: अर्थात, भारतीय घरों में हिंसा होती है और डर भी व्याप्त होता है! अभिभावक सोचते हैं कि उनके बच्चे तभी उनकी बात मानते हैं जब उनके मन में डर होता है। अगर उन्हें शिष्टाचार और सदाचार सिखाना है तो उन्हें डराकर रखा जाना ज़रूरी है। अगर वे नहीं डरते तो उनकी पिटाई भी होती है। और अंत में…उपरोक्त प्रश्न का आदर्श उत्तर क्या होना चाहिए? स्वाभाविक ही: पिता!

माँएँ, चाचियाँ और दादा-दादियाँ सारा दिन घर के बच्चों को इसी तरह धमकाती रहती हैं: 'आने दो तुम्हारे पिताजी को!' या, 'तुमने कहना नहीं माना तो पिताजी से शिकायत कर दूँगी!' स्वाभाविक ही इन धमकियों में शारीरिक सज़ा का पूरा इंतज़ाम होता है!

आखिर कब भारतीय पिता अपने बच्चों के साथ एक स्वस्थ संबंध विकसित कर पाएँगे? वह दिन भर घर में नहीं रहता, उसे पैसे कमाने बाहर निकलना ही पड़ता है और जब वह घर आता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दिन भर तजवीज की गई सज़ाओं को एक जल्लाद की तरह अंजाम देगा! आप बच्चों के मन में क्या भरना चाहते हैं?

एक पिता के रूप में मुझे यह बड़ा भयानक लगता है और मेरे परिवार में कोई ऐसी बात मेरी बेटी से पूछने की कल्पना भी नहीं कर सकता। हमारे यहाँ शिक्षा में डर के लिए कोई जगह नहीं है-लेकिन ज़्यादातर भारतीय परिवारों में यही स्थिति पाई जाती है और इसलिए स्कूलों में भी, किताबों में भी!

लेकिन हमारे स्कूल में हमने यह सुनिश्चित कर लिया है कि पाठ्य पुस्तकों से इस प्रश्न को हटा दिया जाए और यह भी कि शिक्षक भी जानें कि हमने ऐसा क्यों किया है: क्योंकि बच्चों को डरना नहीं बच्चों को उनके घर तथा स्कूल में सबसे सुरक्षित वातावरण प्राप्त होना चाहिए और उनके अभिभावक और शिक्षक उनसे प्रेम करते हैं और उन्हें खुश देखना चाहते हैं।

आपके हवाई जहाज़ पर एक बच्चा रो रहा है? क्या करना चाहिए और क्या नहीं? 17 नवंबर 2015

पिछले शुक्रवार को 7 घंटे की हवाई यात्रा के बाद आज मैं आपसे सिर्फ यूँ ही एक बात पूछना चाहता हूँ: क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी हवाई यात्रा में किसी रोते हुए बच्चे के आसपास बैठे हों या वह आपके साथ वाली सीट पर ही बैठा हो? सिर्फ इतना करें कि आपकी किसी हरकत से बच्चे के रोने की असुविधाजनक स्थिति में फँसे माँ-बाप पर कायम मानसिक दबाव और अधिक न बढ़े!

यह न समझें कि अपरा हल्ला मचा रही थी इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ। जी नहीं, जैसा मैंने पहले बताया, वह तो पूरे हवाई सफर में सोती रही थी! लेकिन यह सच है कि इस हवाई सफर में हमारे साथ बहुत से बच्चे थे, शायद इसलिए कि दो दिन पहले ही दीवाली के समारोह समाप्त हुए थे। बहुत कम लोग इतनी जल्दी भारत छोड़कर जा पाए होंगे और जो परिवार अब जाने लगे थे, उनके साथ, स्वाभाविक ही, बहुत से छोटे-छोटे बच्चे थे!

विमान में हमारे आसपास लगभग पाँच बच्चे थे और पीछे से भी कुछ बच्चों की आवाज़ें आ रही थी। जिन लोगों ने बहुत सारे छोटे बच्चों के साथ हवाई यात्रा की है, जानते होंगे कि उनमें से किसी न किसी एक बच्चे को प्लेन में चढ़ना ही बहुत अप्रिय लग रहा होता है। वह अपना असंतोष तेज़ और तीखे स्वर में चीखते-चिल्लाते हुए व्यक्त करता है-और उसका रोना किसी तरह सोने की कोशिश कर रहे सहयात्रियों के मनोरंजन का साधन बन जाता है।

ऐसी परिस्थिति में निश्चित ही आपको आसपास के लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सुनने को मिलेंगी: उनमें से कुछ तो जैसे कान बंद कर लेते हों या बहरे हो, विमान में पहले से व्याप्त कोलाहल में एक और स्वर के योग से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता-वे लोग अपने काम में लगे रहते हैं और बगल में हो रही चीख-चिल्लाहट से पूरी तरह अलिप्त रहे आते हैं। कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि अधिकांश माँओं-बापों को ऐसे लोग सबसे अधिक भाते होंगे!

एक और तरह की प्रतिक्रिया होती है, जिसे भी सामान्यतया पसंद किया जाता है: आसपास का कोई अजनबी न जाने किस कारण से रोते हुए बच्चे का ध्यान बँटाने के लिए तरह-तरह के उपाय करता नज़र आता है। कभी-कभी यह उपाय काम कर जाता है लेकिन कई बार समस्या उससे बदतर होती है, अरुचि भयंकर होती है, प्रयास विफल ही नहीं होते, कई बार समस्या और बिगड़ जाती है। ज़्यादातर अभिभावक आपके प्रयासों पर खुश ही होंगे इसलिए एकाध बार यह प्रयास अवश्य कर सकते हैं!

कुछ व्यक्ति तीसरी श्रेणी में आते हैं और मैं विनती करना चाहता हूँ कि इस श्रेणी में आपकी गिनती कभी न हो! वे लोग जो, स्वाभाविक ही, नाराज़ होने लगते हैं। देखिए, मैं समझ सकता हूँ कि आप थके होंगे, न तो आप सो पा रहे हैं और न ही शांतिपूर्वक हवाई यात्रा में मनोरंजनार्थ उपलब्ध अपना मनपसंद कार्यक्रम ही देख पा रहे हैं। वहाँ मौजूद लोगों में कोई भी ऐसा नहीं कर पा रहा है। बहरहाल, बच्चे के अभिभावक भी नहीं कर पा रहे हैं। वे इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि उनके बच्चे का तेज़ स्वर में रोना-चिल्लाना आपको परेशान कर रहा है और वे भरसक कोशिश कर रहे हैं कि बच्चा किसी तरह बहल जाए। लेकिन उनकी ओर बार-बार ताकती आपकी गुस्साई नज़रें, जानबूझकर गहरी साँसें भरकर अपनी हताशा का प्रदर्शन या उन्हें सुनाते हुए आपका कोई कटाक्ष करना, इत्यादि समस्या में ज़रा सा भी सुधार नहीं ला सकते!

इसके विपरीत, आपकी एकमात्र उपलब्धि यह होती है कि आप बच्चे के एक अभिभावक को चिंताग्रस्त कर देते हैं और दूसरे को नाराज़ और इस प्रकार आप दोनों पर अतिरिक्त मानसिक बोझ डाल देते हैं और नतीजतन बच्चा और अधिक रोने-चिल्लाने लगता है। असल में बच्चे इस बात को ठीक-ठीक महसूस कर लेते हैं कि कब उनके माता-पिता आपा खो रहे हैं और यह उन्हें असुरक्षित कर देता है और वे घबरा जाते हैं-कुल मिलाकर नतीजा यह होता है कि आप अपने व्यवहार से बच्चे को और अधिक रोने-धोने के लिए उद्यत कर देते हैं!

तो कृपया इस बात को समझें कि बच्चा बेहद थक गया है, आसपास इतने सारे लोगों को देखकर, कर्कश आवाज़ों के कारण और अजनबी वातावरण में बुरी तरह डर गया है। हो सकता है, आम तौर पर बच्चों को हवाई यात्रा में पेश आने वाली इअर प्रेशर की समस्या का सामना हो या सम्भव है, वह यह न समझ पा रहा हो कि उसके प्यारे माता-पिता इस भयानक जगह क्यों आ गए हैं जबकि घर में गर्म और नरम बिस्तर सहित सारी सुख-सुविधाएँ हासिल थीं!

हर व्यक्ति जानता है कि एक नन्हे बच्चे के लिए यह कतई आदर्श परिस्थिति नहीं है। कोई भी अभिभावक अत्यधिक प्रसन्न और संतुष्ट होगा यदि उनका बच्चा शोरगुल और सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच ज़रा सी बंद जगह में बिना किसी नखरे के या बिना रोए-धोए यात्रा कर ले। इसलिए एक-दूसरे के साथ सौजन्यता के साथ पेश आएँ, एक दूसरे को और एक-दूसरे की परिस्थितियों को थोड़ा बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करें और संयत और शांतचित्त बने रहें। मैँ आपको विश्वास दिलाता हूँ कि बच्चा भी इस बात को समझेगा और थोड़ी देर में स्थिरचित्त हो जाएगा! फिर वह हम सब लोगों के लिए सुखद और आरामदेह विमान-यात्रा सिद्ध होगी। जमकर बैठिए, शांत रहिए, शोर को बाहर भगाइए और हर तरह के रोमांच और उत्तेजना के साथ जीवन का मज़ा लीजिए!

चिल्लाएँ नहीं – बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार करें! 10 नवम्बर 2015

कल ही मैंने आपको बताया कि अपरा अपनी नृत्य प्रस्तुति से कितनी खुश है, और जब उसने पुरस्कार के रूप में मिला अपना कप और मैडल हमें दिखाए तो हमने भी उतना ही गौरवांवित महसूस किया। लेकिन जब वह हमें कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताने लगी तो हमने महसूस किया कि उसके दिमाग में दर्शक और सराहना या खुद अपने प्रदर्शन से अधिक कोई और बात घुस गयी है, जिसने उसकी उपलब्धि और उसके गौरव को दागदार कर दिया है: एक व्यक्ति उस पर और आश्रम के उसके प्रिय भाई पर बेवजह चिल्लाया।

शुरू में तो वह बड़े उत्साह से अपने प्रदर्शन के बारे में बताती रही लेकिन जल्द ही विचारमग्न हो गई और कहा: "वहाँ एक आदमी था, जिसने मुझे और गुड्डू से कहा, 'क्या कर रहे हो तुम लोग यहाँ? चलो भागो, यहाँ से!' हमने कुछ नहीं किया था, सिर्फ बैठना चाहते थे!"

रमोना उत्तर देने से पहले थोड़ा झिझकी क्योंकि उसे अच्छे से पता था कि बच्चों ने कुछ नहीं किया होगा और वह आदमी बस उन बच्चों को वहाँ से भगाना चाहता रहा होगा। शुरू करते हुए उसने कहा “अरे, शायद उस आदमी का मूड खराब होगा", किन्तु उसने तुरंत आगे कहा, "लेकिन उसे तुम्हारे साथ ऐसा दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए था, यह अच्छा नहीं है।‘ क्योंकि महज खराब मनोदशा होने के कारण अशिष्ट आचरण और दुर्व्यवहार करना ठीक नहीं।

अपरा का मन इस घटना को भूल नहीं पा रहा था। कुछ ही देर बाद उसने उस घटना का सारा ब्यौरा ज्यों का त्यों मेरे सामने रख दिया। रमोना की तरह मैं उतना सौम्य नहीं रह पाया और मैंने सीधे कहा: “क्योंकि वह अच्छा व्यक्ति नहीं था!”

बात यह है कि बच्चों के प्रति इस तरह के व्यवहार को भारत में हम अक्सर देखते रहते हैं। लोग बच्चों को सुधारने के लिए अधिकतर नरमी का व्यवहार नहीं करते बल्कि सीधा उन पर चिल्लाने लगते हैं, ज़ोर-ज़ोर से डांटते-डपटते हैं और उन्हें अपनी बात समझाने का अवसर नहीं देते, न ही यह बताते हैं कि जो भी वे कर रहे हैं, वह उन्हें क्यों नहीं करना चाहिए।

स्वाभाविक ही यह बच्चों के प्रति आम भारतीयों के गलत रवैये की झलक दिखाता है। इसमें एक तरह का सकारात्मक भाव भी नज़र आता है कि कोई भी संसार के बच्चों को उचित व्यवहार सिखा सकता है और बता सकता है कि क्या उनके लिए सही है और क्या गलत। यह बहुत अच्छा है, क्योंकि इससे भारतीय समाज के इस नज़रिए का पता चलता है कि बच्चों की ज़िम्मेदारी केवल अभिभावकों की ही नहीं है। लेकिन साथ ही इसका दोष यह है कि लोग अक्सर बच्चों से ऐसे बात करने लगते हैं जैसे वे मूर्ख हों। अधिकतर उन्हें इस बात का एहसास नहीं होता कि हम सबकी तरह बच्चों की भी कुछ भावनाएँ होती हैं, बल्कि हमसे कहीं अधिक तीव्र और गहन भावनाएँ होती हैं।

और इस तरह अपने आठ साल के भाई के साथ मेले में आई हमारी चार-साला नृत्य-सितारा बेटी की कोमल भावनाओं की परवाह किए बगैर यह व्यक्ति उसके साथ मनचाहा दुर्व्यवहार करता है जबकि वे दोनों सिर्फ इस व्यक्ति के साथ वाली सीट पर बैठना चाहते हैं। वह सरल भाषा में कह सकता था कि वहाँ न बैठे, वह उसकी पत्नी की सीट है और वह कभी भी आ सकती है। वह उन्हें प्यार से बता सकता था कि देखो, सारे बच्चे वहाँ कतार में इंतज़ार कर रहे हैं और वहाँ जाकर इंतज़ार करो। चाहता तो वह उन्हें वहीं बैठा रहने दे सकता था क्योंकि वे उसे परेशान नहीं करने वाले थे और जब पत्नी आ जाती तो उठ भी जाते!

पिता होने के नाते मुझे गुस्सा आया कि उसने मेरी बच्ची की बहुत सुखद शाम पर एक काला धब्बा लगा दिया। एक पिता के रूप में मैं पूछता हूँ कि आप लोग अपने आस-पास के बच्चों के साथ विनम्र व्यवहार क्यों नहीं कर सकते! और एक इंसान होने के नाते मैं सोचता हूँ कि अपने से दुर्बल व्यक्तियों के साथ चीखने-चल्लाने जैसा ऐसा बेहूदा व्यवहार अक्सर लोग सहन कैसे कर लेते हैं।

भला व्यवहार कीजिए। बच्चों के साथ और अपने आसपास के सभी लोगों के साथ!

जब अपरा ने शेर को नहलाया – 28 सितंबर 2015

कुछ दिन पहले दोपहर के समय अपरा ने धड़धड़ाते हुए हमारे ऑफिस में प्रवेश किया। रमोना कंप्यूटर पर काम कर रही थी और अपरा की आहट सुनकर उसने पलटकर देखा। अपरा ने अपने कपड़ों से हाथ बचाते हुए हाथ आगे कर दिए और कहा, 'माँ, मुझे हाथ धोना है!'

रमोना ने उसके हाथों की ओर देखा- वे तो साफ़ थे। फिर भी वह उसके साथ बाथरूम की ओर जाने लगी और रास्ते में पूछा, 'तुमने अपने हाथ कहाँ गंदे कर लिए?’

‘मैं अपने शेर को धो रही थी,’ उसने जवाब दिया। उसका इशारा उसके कमरे में भूसा भरकर रखे बड़े से स्टफ़्ड शेर की तरफ था।

‘काहे से?’ रमोना ने पूछा, जैसे वास्तव में जानना चाहती हो। ‘पानी से?’

‘अरे नहीं। ऐसे ही,’ दरवाजे से बाथरूम में प्रवेश करते हुए अपरा ने कहा।

‘लेकिन काहे से? कपड़े से, ब्रश से या किसी और चीज़ से? काहे से?’ रमोना ने ज़ोर देकर कहा कि बच्ची कुछ विस्तार से बताए।

‘हाँ, कपड़े से,’ पुनः संक्षिप्त सा जवाब आया और अब अपरा एक कुर्सी खींचकर बेसिन के सामने कुर्सी पर चढ़कर खड़ी हो गई थी।

‘गीले कपड़े से?’ रमोना ने आगे पूछा। हालांकि उसके जवाब का अनुमान वह लगा चुकी थी, जवाब उसके अनुमान से अधिक विस्तृत था:

‘हाँ, गीले कपड़े से और साबुन लगाकर! अब उसे छूना मत नहीं तो तुम्हारे हाथ भी गंदे हो जाएँगे!’ बेटी ने आगाह करते हुए कहा।

इस बिन्दु पर मैं भी वहाँ पहुँच गया था और रमोना ने, जो अपने काम के बीचोंबीच उठकर आई थी, मुझसे कहा, ‘क्या तुम इस शेर वाली समस्या को देख सकते हो?’ 🙂

खैर, एक समर्पित पति और पिता को क्या-क्या नहीं करना पड़ता? स्वाभाविक ही, शेर की सफाई करना उसके काम का ही हिस्सा है!

तब अपरा, प्रांशु और गुड्डू की संयुक्त कमान लेकर हम उस विशाल शेर को बाथरूम तक लेकर आए और साबुन में सनी उसकी पूँछ को तब तक धोते रहे जब तक कि पूँछ से साबुन का फोम निकलना बंद नहीं हो गया। उसके बाद अपरा ने एक टॉवल लेकर उसकी पूँछ को सुखाया और लड़कों ने कमरे को सुखाया। अब वह किसी स्वीमिंग पूल के शावर रूम जैसा नहीं लग रहा था!

अपने लिए निर्धारित लक्ष्य प्राप्त कर लेने के बाद अपरा बहुत संतुष्ट है: शेर अब बहुत साफ-सुथरा नज़र आ रहा है और अपरा भी इतना मज़ेदार और रोमांचक समय बिताकर बहुत खुश है!

कुछ बच्चे पढ़ने में कमज़ोर होते हैं लेकिन मार-पिटाई से उनमें कोई परिवर्तन नहीं होगा! 24 सितंबर 2015

कल मैंने आपको बताया था कि भारत में बहुत से लोग यह मानने के लिए तैयार नहीं होते कि मार-पीट या कभी-कभार एकाध चाँटा मार देना भी बच्चे के लिए नुकसानदेह है। चाहे घर में हो या स्कूल में। मैंने बताया था कि कैसे यह पूरी तरह गलत है। शिक्षक यह नहीं समझना चाहते कि शिक्षा और स्कूल का अर्थ सिर्फ नंबर, परीक्षा और परीक्षा-परिणाम के आँकड़ों से कहीं बढ़कर है। इसका अर्थ बच्चों को ज़िम्मेदार नागरिक बनाना है जिससे वे आगे चलकर समाज, देश और संसार का बहुमूल्य हिस्सा बन सकें। और भय के वातावरण में आप यह काम नहीं कर सकते!

सभी जानते हैं कि हम सब एक जैसे नहीं हैं। हम सभी अलग-अलग जींस लेकर पैदा हुए हैं और हर एक की अलग-अलग प्रतिभा और अलग-अलग क्षमता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कुछ व्यक्तियों के पास बिना किसी समस्या के झटपट सीखने-समझने का और किसी भी जानकारी या किसी भी बताई गई बात को ग्रहण करने और उसे अच्छी तरह याद रखने का जन्मजात गुण होता है। लेकिन बहुत से दूसरे लोग होते हैं, जिनके पास यह गुण विद्यमान नहीं होता और उन्हें चीजों को ग्रहण करने के लिए दृश्यात्मक चित्रण की ज़रूरत पड़ती है, याद रखने के लिए बार-बार दोहराने की या किसी संदर्भ से उन्हें जोड़ने की जरूरत पड़ती है।

उन्हें डरा-धमकाकर आप उनकी कोई मदद नहीं कर रहे होते। कक्षा के तीस से पचास बच्चों को एक छड़ी से नहीं हाँक सकते, जो बच्चा आपके सिखाए शब्दों को क्रमानुसार दोहरा नहीं पा रहा है, उसे मार-पीट कर आप ठीक-ठीक दोहराने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। इसके विपरीत आप उन्हें भयभीत, बेचैन और अधीर कर देते हैं, जिसके कारण कुछ सीखने के स्थान पर उनके मन में नकारात्मक परिणामों का विचार घर कर लेता है। जिसे सीखने की वाकई उन्होंने कोशिश की थी, उसे सीख न पाने के कारण आप उन्हें पीड़ा पहुँचा रहे हैं।

यह बच्चे का दोष नहीं है कि वह सीख नहीं पाया! ऐसा नहीं है कि वह जानबूझकर याद नहीं करना चाहता। और यह कोई अपराध नहीं है कि उसे सीखने में दिक्कत पेश आ रही है- लेकिन बच्चे को मारना-पीटना अपराध है! क्या आप यह नहीं देख पा रहे हैं कि आप उसे सिखाने में असमर्थ रहे हैं। आप अपना कर्तव्य ठीक तरह से निभा नहीं पा रहे हैं? कक्षा के सभी बच्चों को पढ़ाना आपका काम है और आप सिर्फ पिटाई करके बच्चों के दिमाग में जानकारियाँ ठूँसना चाहते हैं जबकि उनमें से कुछ बच्चे उन जानकारियों को दूसरों के मुक़ाबले तुरत-फुरत ग्रहण कर पाने में असमर्थ हैं।

इससे ज़्यादा से ज़्यादा आप यह कर पाएँगे कि बच्चों को तोते की तरह कोई बात रटा देंगे लेकिन उन शब्दों का वास्तविक अर्थ वे ग्रहण नहीं कर पाएँगे। बच्चे उन्हें बहुत जल्दी भूल जाएँगे क्योंकि आपने उन्हें सिर्फ उथली जानकारी दी है, उसके मर्म को समझाने की गंभीर कोशिश नहीं की है, उस बात का महत्व नहीं बताया है। आप ज़ोर-जबरदस्ती करके उन्हें सिखा रहे हैं लेकिन वे सीखने के आनंद से वंचित हो रहे हैं। आपकी हिंसा उनके अंदर भी हिंसा का संचार कर रही है, उन्हें इतना आक्रामक बना रही है कि या तो वे खुद को नुकसान पहुँचा लेंगे या फिर दूसरों को नुकसान पहुँचाएँगे।

परीक्षा में पाठों को दोहरा दें, इस उद्देश्य से स्कूल में पढ़ाने से अधिक ज़रूरी है यह सिखाना कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, किस तरह दूसरों के साथ शांतिपूर्ण वार्तालाप करना चाहिए, किस तरह मिल-जुलकर विवादों का समाधान ढूँढ़ना चाहिए, किस तरह अपनी भावनाओं को और अपने अभिमत को व्यक्त करना चाहिए और किस तरह दूसरों के विचारों का भी सम्मान करना चाहिए। बच्चों को बेहतर इंसान बनाना स्कूलों और शिक्षकों का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।

हर चाँटा आपके बच्चे को थोड़ा सा और तोड़ देता है! 23 सितंबर 2015

कल मैंने बताया था कि बहुत से शिक्षकों के लिए किस तरह बिना शारीरिक सज़ा दिए बच्चों को पढ़ाना कल्पनातीत है। यहाँ तक कि बच्चों के प्रति वृंदावन के एक स्कूल में जारी हिंसा का खुलासा करते हुए हमारे वीडियो की प्रतिक्रिया में भी कई लोगों ने कहा कि अगर बच्चों को छड़ी और डंडे से अकारण मारना-पीटना सज़ा की अति है तो भी एक सीमा तक बच्चों के प्रति हिंसा बच्चों के लालन-पालन के लिहाज से न सिर्फ अच्छी है बल्कि काफी हद तक ज़रूरी भी है। दरअसल बच्चों के प्रति हिंसा का यह विचार भारतीय समाज में गहरे जड़ जमाए हुए है- लेकिन है यह पूरी तरह गलत विचार!

जी हाँ, अगर किसी स्कूल में को बच्चों लात-घूसों से मारा-पीटा जाता है, अगर उन्हें अकारण शारीरिक दंड दिया जाता है तब तो लोग कहते हैं कि गलत हो रहा है मगर जब बच्चा हल्ला कर रहा है और शिक्षक या शिक्षिका उसे एक चाँटा जड़ देती है तो लोग कहेंगे, इतना तो होना ही चाहिए। हमारा वीडियो उनके लिए कुछ अधिक उग्र था लेकिन इससे भी खराब वीडिओज़ हर साल कई बार समाचारों में आते रहते हैं, जिनमें दहला देने वाले पिटाई के दृश्य होते हैं। यहाँ तक कि ऐसी खबरें भी अक्सर आती हैं, जहाँ बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए और कुछ प्रकरणों में उनकी मृत्यु भी हो गई है। इसलिए यह कोई बड़ा मामला नहीं है- अगर शिक्षक के पास छड़ी नहीं होती, अगर वह सिर्फ हाथ से ही मार लेता तो शायद यह खबर नहीं बनती, इसका वीडियो इस तरह वाइरल नहीं होता। क्यों? क्योंकि लोग इसके आदी हो चुके हैं और वास्तव में समझते हैं कि यह अनुचित नहीं है।

क्योंकि यही वे अपने बच्चों के साथ भी करते हैं! और इसलिए चाँटा मारने को उचित सिद्ध करने का, हिंसा को सही ठहराने का वे कोई न कोई तरीका ढूँढ़ ही निकालते हैं।

जी हाँ, गाल पर एक चाँटा या, जैसा कि बहुत से अभिभावक स्वयं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ करते हैं, चूतड़ पर मारना भी हिंसा में ही शामिल है। मैं भारतीय अभिभावकों और शिक्षकों, और इस दुनिया में रहने वाले हर उस व्यक्ति से, जो समझता है कि इतनी हिंसा बच्चों के उचित लालन-पालन के लिए ज़रूरी है, उनकी शिक्षा के लिए ज़रूरी है, अपील करता हूँ कि आप जो कर रहे हैं वह आपके बच्चों और विद्यार्थियों के लिए नुकसानदेह है!

अपने आसपास रहने वाले व्यक्तियों के लिए आप एक उदाहरण हैं, विशेष रूप से किशोर और युवकों के लिए, जो आपको देखकर, आपके व्यवहार से प्रेरणा लेकर सीखते हैं कि उन्हें ऐसी परिस्थिति में कैसा व्यवहार करना है! इसका अर्थ है, आप भी उन्हें हिंसा की शिक्षा दे रहे हैं। आप उन्हें सिखा रहे हैं कि आपको यानी उम्र में उनसे बड़े और शक्तिशाली लोगों को छोटे और कमजोर लोगों को मारने का अधिकार हासिल है। जो सबसे शक्तिशाली होगा वह दूसरों की पिटाई कर सकता है।

ऐसी स्थिति में, कोई शक नहीं कि आपका बच्चा भी अपने छोटे भाई-बहनों को मारेगा-पीटेगा। कक्षा के बड़े बच्चे अपने से छोटे और कमजोर बच्चों पर हाथ उठाएँगे। क्योंकि यही आपने उन्हें शुरू से सिखाया है! इसका अर्थ यह हुआ कि जब वे आपसे बड़े और शक्तिशाली हो जाएँगे तो वे आपको भी मार सकते हैं! क्या आप यही कहना चाहते हैं?

कुछ लोग हमसे पूछते हैं, ‘लेकिन अगर दो बच्चे लड़ रहे हों तो उन्हें अलग करने के लिए आपको उन्हें पीटना ही होगा!’ इससे अधिक अर्थहीन बात कुछ नहीं हो सकती! मार-पीट करने वाले बच्चों को आप मार-पीट करके ही समझाना चाहते हैं कि मार-पीट करना उचित नहीं है! आप उसे मारते हैं, जो खुद मार रहा है। इसका अर्थ सिर्फ इतना है मार-पीट करने वाला बदल गया है- अब आप मारने वाले बन गए हैं- और आपको मारने वाला कौन है?

और विडंबना यह कि आप सोचते हैं कि आप यह इसलिए कर रहे हैं कि यह उनके लिए अच्छा है। ठीक? लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि यह मार-पीट आपके बच्चे को नुकसान ही पहुँचाती है। जी हाँ, अगर आप मुझ पर और मेरे तर्कों पर विश्वास न करना चाहें और अपनी हिंसा जारी रखना चाहें तो कम से कम उन वैज्ञानिकों पर भरोसा करें, जिन्होंने यह तथ्य दुनिया के सामने रख दिया है। ऐसे बच्चों का विकास बाधित हुआ और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है: एक बच्चा आप पर विश्वास करता है, मार्गदर्शन के लिए आपकी तरफ देखता है। आपका हर चाँटा बच्चे को थोड़ा सा और तोड़ देता है और आपके आपसी संबंध को भी नुकसान पहुँचाता है। जी हाँ, यह सिद्ध हो चुका है।

यह समझिए कि यह गलत है और बच्चों के प्रति अपने व्यवहार में बदलाव लाइए!

एक अहिंसक स्कूल खोलने का अर्थ है पहले शिक्षकों को शिक्षित करना! 22 सितंबर 2015

कल अपने ब्लॉग में मैंने यह स्पष्ट किया था कि कैसे स्कूल खोलने के पीछे हमारे लिए शारीरिक दंड एक प्रमुख कारण रहा। हम समझ गए थे कि सिर्फ तभी हमारा ज़ोर शिक्षकों पर तभी चल सकता है कि वे बच्चों के साथ मार-पीट न करें, जब हम स्वयं स्कूल के संचालक हों। लेकिन निश्चित ही उसके लिए भी बहुत सा प्रयास करने की ज़रूरत थी और इस दिशा में एक लंबी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही हम आज यहाँ तक पहुँचे हैं कि आज हम एक अहिंसक स्कूल चला रहे हैं।

तो हम जानते थे कि किसी स्कूल का प्रबंधन, प्रधानाचार्य, प्रबंधक और ऊँचे पदाधिकारी ही तय करते हैं कि स्कूल के बच्चों के साथ शिक्षकों का व्यवहार कैसा होगा। वही इस बात की सलाह देते हैं कि बच्चों को कैसे नियंत्रित किया जाना है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि हमारे स्कूल के शिक्षकों ने पहले दिन से ही स्वतः हमारे दिशा-निर्देशों का पालन करना शुरू कर दिया या हमारे विचारों से तुरंत सहमत हो गए या वे जानते थे कि बिना शारीरिक दंड दिए बच्चों को शिक्षा कैसे प्रदान की जा सकती है क्योंकि परंपरा से ही वे बच्चों के साथ हिंसा के आदी होते थे!

सच तो यह है कि यहाँ सामान्य रूप से लोगों की मानसिकता यही होती है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए बीच-बीच में कभी-कभी चाँटा मार देना या उँगलियों पर चोट पहुँचाना ज़रूरी होता है। वे घर से ही यही सीखकर आते हैं, अभिभावक खुद अपने छोटे-छोटे बच्चों को सिखाने का यही तरीका अपनाते हैं। बच्चे भी बचपन से यही जानते हैं कि जब वे स्कूल जाएँगे तो मार खानी होगी, बाद में स्कूल में भी उन्हें इसी बात का अनुभव होता है और आखिर तक उन्हें इसके विकल्प के बारे में बताने वाला कोई नहीं होता। वे कैसे जानेंगे कि पढ़ाने-लिखाने का कोई और तरीका भी हो सकता है?

यह तरीका हमने उन्हें बताया। जी हाँ, अधिकांश शिक्षकों के लिए शायद हम पहले लोग होंगे जो ऐसी बात कह रहे थे कि बच्चों को मारना-पीटना वर्जित है। छड़ी से नहीं, रूलर से नहीं और न ही हाथ से। न ही उन्हें असुविधाजनक स्थिति में खड़ा रखा जाए और न ही खड़े रहने के लिए मजबूर किया जाए। उन्हें आप कक्षा से बाहर भी नहीं कर सकते।

मेरे पश्चिमी पाठकों को यह बहुत सहज-स्वाभाविक बात लग रही होगी क्योंकि अपने स्कूलों में उनका यही अनुभव रहा होगा। लेकिन यहाँ शिक्षक आपकी बात सुनेंगे और आपकी तरफ ताकते हुए पूछेंगे, ‘जब वे बहुत उदण्ड हो जाएँ तो उन्हें नियंत्रित करने के लिए हम क्या करें?’

वास्तव में इन थोड़े से वर्षों में सिर्फ इसी कारण हमें कई शिक्षकों को निकालना पड़ा कि वे ठीक वही करते थे, जिसे हमने पूर्णतः वर्जित किया हुआ था, विशेष रूप से शुरू में। इसकी जानकारी प्राप्त करना कोई मुश्किल काम नहीं है: बहुत से विद्यार्थी होते हैं जो खुलकर इसकी चर्चा करते हैं और आम तौर पर शिक्षक भी इस बात से इंकार करने की ज़रूरत नहीं समझते- क्योंकि वे दिल से इसे ज़्यादा अनुचित मानते ही नहीं। लेकिन इसका अर्थ यह होता है कि उन्हें तुरंत नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। सिर्फ एक तमाचा, जो दूसरे स्कूलों में कतई अनोखी बात नहीं मानी जाती, हमें किसी दूसरे शिक्षक या शिक्षिका की खोज में लगा देता है। लेकिन पुराने शिक्षकों या शिक्षिकाओं से नए शिक्षक या शिक्षिकाएँ आखिर जान ही जाती हैं कि हम इस मामले में बहुत सख्त हैं।

लेकिन यह प्रश्न अब भी मौजूद है: ‘अगर कोई बच्चा अपना काम करके नहीं लाता तो मैं क्या करूँ?’

तो हमने उन्हें कुछ मूलभूत बातें सिखाना शुरू किया। आपको बच्चों को वही सम्मान देना होगा, जिसकी अपेक्षा आप उनसे करते हैं। उनके साथ प्यार से बात करें। उन पर झल्लाएँ नहीं। उनकी उपलब्धियों पर ज़्यादा फोकस रखें न कि उनकी गलतियों पर। अपने अनुचित व्यवहार का स्पष्टीकरण देने के लिए उन्हें पर्याप्त समय दीजिए। उनका उत्साहवर्धन करें। बच्चों के साथ खेलें, प्रकृति से या ऐसी किसी चीज़ से, जिसे वे छू सकें, देख सकें या अनुभव कर सकें, उदाहरण लेकर अपने पाठों को बच्चों के लिए रुचिकर बनाएँ। उनके साथ प्रयोग करें और उन्हें ‘महज बच्चे’ न समझें बल्कि सामान्य मनुष्य, हमारी अगली पीढ़ी के सदस्य समझें।

बच्चे खेल-खेल में सीख सकें, उन्हें पढ़ने-लिखने में मज़ा आए, इसके लिए शिक्षकों को पढ़ाने का सही तरीका आना चाहिए, स्नेहपूर्ण वातावरण निर्मित करना आना चाहिए और इस दिशा में हम अपने शिक्षकों की हर संभव मदद करते हैं। और मेरा विचार है कि मानसिकता-परिवर्तन के अलावा यह दूसरी बात है जो अधिकांश स्कूलों में अनुपस्थित हैं: अपना काम भिन्न तरीके से, सही तरीके से अंजाम दे सकें, इस उद्देश्य से शिक्षकों का समुचित प्रशिक्षण।

हमें गर्व है कि हम यहाँ तक पहुँच सके। हम यह दावा कर सकते हैं कि हमारे स्कूल में बच्चों को किसी प्रकार का शारीरिक दंड नहीं दिया जाता।

स्कूलों में शारीरिक प्रताड़ना: अपना खुद का स्कूल खोलने का सबसे मुख्य कारण – 21 सितंबर 2015

शुक्रवार के दिन अपने लंबे ब्लॉग में, जिसमें मैंने हमारे शहर के एक स्कूल में बच्चों के विरुद्ध जारी क्रूर मार-पीट का पर्दाफाश किया था, मैंने ज़िक्र किया था कि अपना स्कूल खोलने के पीछे अहिंसा एक प्रमुख कारण रहा था। मुझसे पूछा गया है कि इससे मेरा ठीक-ठीक मतलब क्या है। इसका उत्तर बहुत सीधा सा है: हम बच्चों की मदद करना चाहते थे लेकिन ऐसे स्कूल में नहीं जहाँ उन्हें मारा-पीटा जाए!

स्कूल खोलने के बहुत समय पहले से हमने गरीब बच्चों की मदद करने का काम शुरू कर दिया था। सबसे पहले भारत के विभिन्न इलाकों से संस्कृत की पढ़ाई करने आने वाले गरीब बच्चों को हम अपने आश्रम में रहने की जगह उपलब्ध कराते थे, उनके खाने-कपड़े और मुफ्त पढ़ाई का इंतज़ाम करते थे और बाद में, जब वे हमसे मदद मांगते थे तो उनकी फीस इत्यादि भी भरते थे। अंत में हमने खुद अपने आश्रम में कक्षाएँ शुरू कीं। इसके लिए हम अपने इलाके के सबसे अच्छे संस्कृत शिक्षक को ऊँची फीस देकर अपने यहाँ नियुक्त करते थे और मेरी बहन बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ाती थी।

उस समय मैं अधिकांशतः विदेशों में ही यात्राएँ करता था लेकिन एक बार, जब मैं भारत में घर पर था तो एक स्थानीय व्यक्ति मुझसे मिलने आया और पूछा कि क्या मैं कुछ गरीब बच्चों की मदद करना चाहूँगा, जिनके माता-पिता उनके प्राथमिक स्कूल की फीस भरने में असमर्थ हैं और मदद न मिलने की स्थिति में वे पढ़ाई छोड़ देंगे। मेरे परिवार ने और मैंने खुशी-खुशी मदद का हाथ बढ़ाया! इस तरह सन 2006 तक हमने लगभग 160 बच्चों को प्रायोजित किया था, जो वृंदावन के दूसरे स्कूलों में पढ़ते थे। हम उनकी फीस भरते थे और उनकी वर्दियों और किताब-कापियों का इंतज़ाम करते थे। अपनी यात्राओं में मैं लोगों को इस विषय में बताया करता था और उनमें से कुछ लोग धीरे-धीरे बच्चों को प्रायोजित करने लगे!

बीच-बीच में हम उन स्कूलों का दौरा भी किया करते थे, विशेष रूप से तब जब ये प्रायोजक हमारे आश्रम में मेहमान बनकर आते थे और देखना चाहते थे उनके बच्चों की शिक्षा की क्या व्यवस्था की गई है। वहाँ जाने के बाद, चाहे पढ़ाई कितनी भी अच्छी क्यों न चल रही हो, हर बार मुझे एक बात से बड़ी परेशानी होती थी: शिक्षक या शिक्षिका के पीछे दीवार पर टंगी छड़ी! मैं शिक्षकों प्रधानाध्यापकों से प्रतिवाद करता था और उनके जवाब बड़े हैरान करने वाले होते थे: ‘छड़ी? कौन सी छड़ी? वह तो हम ब्लॅकबोर्ड पर लकीर खींचने के लिए रखते हैं…’ या ‘अरे नहीं, छड़ी तो सिर्फ बच्चों को डराने के लिए रखी जाती है, मारने के लिए नहीं!’ या फिर यही कि ‘हम वादा करते हैं कि भविष्य में बच्चों की पिटाई नहीं की जाएगी!’ हालांकि अंतिम बात तभी की जाती थी जब हम उन्हें धमकाते थे कि उनके स्कूल से बच्चों को निकालकर कहीं और भर्ती करा दिया जाएगा- लेकिन इसके बावजूद वे अपने वादे पर कभी कायम नहीं रहते थे।

हमारे इन प्रयासों का कोई असर नहीं हो रहा था। मैं जानता होता था कि जिन लड़कों को हम वहाँ भेजते हैं, उनकी भी कक्षा में पिटाई जारी है। यह बिल्कुल उचित नहीं लगता था: हम उन बच्चों का भविष्य बनाना चाहते थे, हम चाहते थे कि वे स्कूल में पढ़े-लिखें, मस्ती करें, न कि इस तरह स्कूल जाएँ जैसे कोई काम करने निकले हों। और सबसे बढ़कर हम चाहते थे कि उनके मन में किसी बात का डर न बैठ जाए और न ही उनके साथ किसी तरह की मार-पीट की जाए। इससे क्या भला हो सकता है? हम जानते थे कि हिंसा उनके मस्तिष्क को विकृत करेगी और जितना उन्हें पढ़ाई से लाभ होगा शायद उससे भी अधिक नुकसान हो जाएगा।

लेकिन स्कूल प्रबंधन को प्रभावित करना या अपनी जायज बात मानने पर आमादा करना हमें असंभव लग रहा था- वे हमारे मुँह पर सीधा झूठ बोल देते थे क्योंकि वे इस बात पर पूरी तरह यकीन करते थे कि बच्चों को अनुशासित रखने और उनमें डर पैदा करने के लिए उन्हें शारीरिक दंड दिया जाना अनिवार्य है। और उनकी नज़र में डर के बिना बच्चे कुछ भी नहीं सीख सकते। यही कारण था कि हमें अपना खुद का स्कूल खोलना पड़ा क्योंकि हम चाहते थे कि स्कूल में अपने बच्चों के प्रति सौहार्द्र और अहिंसा सुनिश्चित की जा सके।

इस तरह सन 2007 में हमने यही किया: खुद अपना स्कूल खोल लिया।

एक स्कूल में शारीरिक दंड का पर्दाफाश करने के बाद टीवी परिचर्चाएँ, फोन इंटरव्यू तथा और भी बहुत कुछ – 20 सितंबर 2015

मैंने आपसे कहा था कि रविवार के ब्लॉग में मैं अपने जीवन में उस समय घटित हो रही घटनाओं के विषय में लिखा करूँगा। अगर आपने मेरा परसों का ब्लॉग देखा होगा तो जानते होंगे कि पिछले कुछ सप्ताहों से मेरे मन में क्या चल रहा होगा। स्वाभाविक ही, भारतीय स्कूलों में जारी शारीरिक दंड, पवन द्वारा लाए गए वीडिओज़ और उसके परिणाम, हमारा उस स्कूल की प्रधानाध्यापिका के पास जाना, फिर मीडिया से मुलाक़ात और अंत में पाठकों और दर्शकों की प्रतिक्रियाएँ।

आप कल्पना कर सकते हैं कि जब हमें पवन ने अपने स्कूल में उसके साथ हुई मार-पीट के बारे में बताया होगा तो हमें कितना बुरा लगा होगा। वह हमारा बच्चा है, बहुत समय पहले से है, और हम इस बात को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे कि उसके साथ स्कूल में मार-पीट की जाए। इसके अलावा उन वीडिओज़ को देखना भी बड़ा मुश्किल था-लेकिन उनसे कम से कम हम इतना तो निश्चित हो गया कि अब हम इसके खिलाफ कुछ कर सकते हैं। वास्तव में हम शिक्षकों और अभिभावकों के बीच जागरूकता पैदा करके उस स्कूल के और संभवतः दूसरे स्कूलों के रवैए में बदलाव ला सकते थे।

प्रधानाध्यापिका से बात करने के बाद जब हमें यह लिखित आश्वासन नहीं मिला कि उनके स्कूल में किसी भी बच्चे को भविष्य में शारीरिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया जाएगा, हमने मीडिया से संपर्क किया। कुछ ही घंटों में बहुत से संवाददाता हमारे यहाँ उन वीडियोज़ को देखने तथा पवन और मेरा इंटरव्यू लेने आ गए। यह अच्छा लगा कि हमने अगला कदम तुरंत लिया और अब हम देखना चाहते थे कि ये पत्रकार इन वीडियो क्लिप्स का कैसा उपयोग करते हैं और उनका क्या असर होता है।

जब टीवी चैनल ने प्रसारण शुरू किया, हमारे पास दिल्ली से एक फोन आया, जिसमें उन्होंने पवन और मुझे दिल्ली में उनके स्टूडिओ में आमंत्रित किया था। वे चाहते थे कि वीडियो क्लिप्स दिखाने के बाद हम दोनों उनके साथ लाइव चर्चा में भाग लें।

तो मैं और पवन दिल्ली गए। हमारा नवोदित हीरो बहुत उल्लसित था लेकिन सब कुछ बड़े खुलूस और ज़िम्मेदारी के साथ निभा रहा था। एक घंटे तक उस एंकर ने पवन से और मुझसे घटना के बारे में तरह-तरह के प्रश्न पूछे, हमारा अभिमत लिया और हमारे इलाके के कई राजनीतिज्ञों को भी फोन लाइन पर लिया। कार्यक्रम बहुत अच्छा रहा और घटना के अलावा बच्चों और अभिभावकों में भरे हुए डर के एहसास के बारे में और बच्चों के प्रति शिक्षकों के रवैये में उचित परिवर्तन हेतु प्रशिक्षण की ज़रूरत आदि से संबंधित हमारे सारे बिन्दु उसमें शामिल किए गए।

अभी हम स्टूडियो में ही थे और पूर्णेन्दु और यशेन्दु के पास कई दूसरे मीडिया चैनलों के फोन आने शुरू हो गए थे, जो इस विषय में हमसे बात करना चाहते थे! वापसी में कार में ही मैंने फोन पर एक और चैनल के लिए इंटरव्यू रिकार्ड कराया। अंत में जब हम वापस आश्रम पहुँचे, स्थानीय चैनलों की दो टीमें हमारा इंतज़ार कर रही थीं।

कल शाम को पवन और मैं सारा दिन पत्रकारों और संवाददाताओं के साथ बात कर-करके बुरी तरह थक गए थे-लेकिन खुश भी थे, क्योंकि हमें लग रहा था कि अब हमने उस तरफ पहला कदम रख दिया है, जहाँ से निश्चय ही बदलाव की शुरुआत होगी! कम से कम उस स्कूल में, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि दूसरे स्कूल भी भविष्य में स्कूल के परिचालन-नियमों और दिशा-निर्देशों के पालन की दिशा में अधिक सतर्क होंगे!

आज हमारे शहर के तीन मुख्य समाचार-पत्रों में पूरे वाकए के विस्तृत समाचार थे और मेरे ब्लॉग को भी प्रमुखता से छापा गया था। इसके अलावा हमारा वीडियो नेट पर भी बहुत लोकप्रिय हुआ है। अभी आगे भी इसका प्रचार-प्रसार होगा।

यह हमारा पहला कदम है और मेरा पक्का इरादा है कि हम इसे और आगे ले जाएँगे!

भारतीय स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली क्रूरतापूर्वक शारीरिक प्रताड़ना का वीडियो सहित पर्दाफाश – 18 सितंबर 2015

आप पवन को जानते होंगे- या तो आप कभी आश्रम आए होंगे या मेरे ब्लोगों को नियमित पढ़ते होंगे और आपको पता चला होगा कि वह यहाँ, आश्रम में पिछले छह साल से रह रहा है। हम उसे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं और इसलिए जब हमें पता चला कि उसके नए स्कूल में उसके साथ क्या हो रहा है तो हमें उतनी ही तकलीफ हुई, जितनी किसी भी दूसरे, सगे माता-पिता को होती।

इस साल जून में, जब गर्मी की छुट्टियाँ समाप्त हुईं तो पवन बड़ा उत्साहित था: जुलाई की शुरुआत से उसके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत होने वाली थी। जब से वह आश्रम आया है, स्वामी बालेंदु ई व्ही प्राथमिक शाला में पढ़ता रहा है लेकिन इस साल नए सत्र की शुरुआत से वह वृंदावन के इंडियन पब्लिक स्कूल नामक एक दूसरे स्कूल में पढ़ने जाने वाला था। रोज़ वहाँ जाने के लिए हमने उसके लिए साइकल खरीदी थी, उसकी प्रवेश फीस भरी थी, उसकी वर्दियाँ और किताब-कापियाँ खरीदी थीं।

यह सब अत्यंत रोमांचक था लेकिन उसे वहाँ भर्ती कराते वक़्त ही हमने प्रधानाध्यापक से पूछा था कि क्या उनके यहाँ शिक्षक बच्चों को मारते-पीटते हैं, क्या उनके यहाँ बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और उनकी तरफ से यह पक्का आश्वासन ले लिया था कि ऐसा नहीं होगा। आप सभी जानते हैं कि हमारे स्कूल खोलने का प्रमुख कारण ही यह था: हम सुनिश्चित करना चाहते थे कि हमारे स्कूल में आकर बच्चे पिटाई को लेकर निश्चिंत हो सकें। ज़्यादा से ज़्यादा मुफ्त स्कूल खोलने और उन्हें अपने रेस्तराँ से जोड़ने के इरादे के पीछे भी यही कारण था कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चे पिटाई के डर से मुक्त होकर वहाँ मुफ्त शिक्षा प्राप्त कर सकें! अहिंसा और प्रेममय वातावरण बच्चों को उपलब्ध कराना हमारे स्कूल के प्रमुख मूल्य रहे हैं! उस स्कूल ने भी हमें आश्वस्त किया था कि वहाँ बच्चों के साथ किसी तरह की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। इस वचनबद्धता के पश्चात ही हमने अपने बच्चे को वहाँ भर्ती कराया था।

हम सोच भी नहीं सकते थे कि वे लोग ज़बान देकर किस हद तक अपने शब्दों के विरुध्द आचरण कर सकते हैं!

अगर आप कभी पवन से मिले हों तो जानते होंगे कि स्वभाव से ही वह बहुत शांत बालक है। उस नए स्कूल में कुछ हफ्ते गुज़ारने के बाद से ही हमने नोटिस किया कि उसके व्यवहार में कुछ तब्दीली आ रही है। हमने सीधे उसी से पूछा: ‘क्या हो गया है तुम्हें? स्कूल में कुछ हुआ है?’ और तब हमें सारी कहानी पता चली।

वहाँ जाना शुरू करने के पहले हफ्ते से ही उसने देखा कि शिक्षक उसके सहपाठियों की पिटाई कर रहे हैं। हाथ पर छड़ियाँ, और कभी-कभी पैरों पर, पीठ पर और जहाँ शिक्षक का हाथ पहुँच सकता हो, वहाँ पर! उसे भी पहले भी मार पड़ चुकी थी और उस दिन भी पड़ी थी। उसने अपने हाथ दिखाए- मार खाकर लाल-गुलाबी हो रहे थे और उनमें इतना दर्द हो रहा था कि ठीक होने में दो दिन लगे।

वहाँ की जो कहानियाँ उसने बताईं, उन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं: हर शिक्षक के पास एक छड़ी है और जब भी वे पाते हैं कि किसी बच्चे ने होमवर्क नहीं किया है या कोई गलती की है तो किसी बच्चे से वह छड़ी मँगवाते हैं। उसके बाद गलती करने वाले बच्चे को अपना हाथ शिक्षक के सामने खोलकर रखना होता है। सामान्यतया छड़ी हाथ पर पड़ती है मगर यदि शिक्षक कुछ ज़्यादा ही गुस्से में हुआ तो वह कहीं भी उसकी बरसात कर सकता है। अक्सर इस हिंसा का कोई विशेष कारण भी नहीं होता।

हमने पूछा कि क्या उसने प्रधानाध्यापिका से शिकायत की तो हमें और भी बहुत कुछ जानने को मिला: प्रधानाध्यापिका खुद स्कूल का चक्कर लगाती है और मौका मिलते ही, खुद भी बच्चों की पिटाई करती है! ऐसी प्रधानाध्यापिका से शिकायत करने की हिम्मत कौन करेगा? हमें बहुत दुःख हुआ और हम क्रोध से भर उठे! हमारे दिल को ठेस लगी थी कि जिस बच्चे को हमने अपने स्कूल में इतने साल मार-पीट से दूर रखा, जिसे स्कूली पिटाई को कोई अनुभव नहीं है, उसे इस प्रताड़ना से गुज़रना पड़ रहा है! मुझे अपने स्कूली दिनों की याद हो आई और उस समय बच्चों के साथ होने वाली हिंसा पर अपनी खीझ, गुस्से और हताशा की भी

हमें क्या करना चाहिए?

यह सोचकर कि बच्चे को वहाँ से निकालकर किसी दूसरे स्कूल में भर्ती करवा देते हैं, हमने कुछ दूसरे स्कूलों के विषय में विस्तृत जानकारियाँ प्राप्त करने की कोशिश की। समस्या यह थी कि वैसे भी बच्चों के प्रति शारीरिक हिंसा के मसले पर सभी स्कूल साफ़ झूठ बोल देते हैं और ऐसी स्थिति में हम कैसे विश्वास करते कि किसी अन्य स्कूल में भी ऐसा ही नहीं होगा? जिनके बच्चे स्कूलों में पढ़ते थे, उनके अभिभावक मित्रों से पता किया और वही बात सामने आई जिसका हमें शक था- हमें पता चला कि कमोबेश सभी स्कूलों में बच्चों का शारीरिक दंड दिया जाता है!

एक और विकल्प था: घर में पढ़ाना। हमने सोचा यह हमारे लिए एक और विकल्प हो सकता है- लेकिन उससे उस स्कूल के बच्चों को क्या लाभ मिलेगा जिन्हें रोज़ ब रोज़ शिक्षकों की पिटाई बर्दाश्त करनी पड़ती है, चाहे वह किसी भी विषय की पढ़ाई हो, कोई भी शिक्षक हो! इस प्रकरण के बाद क्या हमारे लिए इतना पर्याप्त होगा कि सिर्फ अपने आश्रम के बच्चों को हम पहले अपने स्कूल में पढ़ायें और फिर आगे की पढाई भी उन्हें आश्रम में ही रख कर कराई जाये?

पवन के साथ बात करके हमने कोई ठोस कार्यवाही करने का निर्णय किया, जिससे इस स्थिति में बदलाव लाया जा सके। हमने एक गुप्त कैमरा खरीदकर पवन को दिया, जिसे वह अगले सात या दस दिन तक स्कूल ले जाता रहा। जो वीडियो क्लिप्स वह लेकर आया है, वे उसकी बताई कहानियों की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं। आप उन्हें नीचे देख सकते हैं और आप भी अगर हम जैसे संवेदनशील हुए तो हमारी भाँति द्रवित हुए बगैर नहीं रह पाएँगे!

उनकी कक्षाध्यापिका एक दिन कक्षा में आई और पूरी कक्षा को एक सिरे से मारना शुरू कर दिया, सिर्फ इसलिए कि कुछ दूसरे शिक्षकों ने कक्षा के बारे में उससे शिकायत की थी! हर किसी को डंडे से मारा गया, सबकी पिटाई हुई। कुछ बच्चे उसी समय कक्षा में आए थे, उनकी भी पिटाई हुई और उन्हें समझ में तक नहीं आया कि उन्हें क्यों मारा-पीटा जा रहा है! एक लड़के को उसने कुछ लाने के लिए भेजा था, जब वह वापस आया तो उसे भी नहीं छोड़ा गया! और अंत में उसने बच्चों को धमकाया भी, कि एक हफ्ते तक वह इन सज़ाओं को रोज़ दोहराएगी, जिससे वे कुछ सीख ले सकें और अगर वे उससे भी नहीं सीख पाए तो उसके बाद दिन भर के लिए उन्हें 'मुर्गा' बनने की सजा देगी!

वीडियो क्लिप्स अलग-अलग शिक्षिकाओं द्वारा, अकारण या छोटी-मोटी गलतियों पर लड़के और लड़कियों, दोनों की क्रूर मार-पीट, यहाँ तक कि कभी-कभी शिक्षिकाओं को बच्चों के सिर पर चोट करते हुए भी दिखाती हैं। साथ ही उन्हें बुरी तरह अपमानित भी किया जाता है। एक क्लिप में आप एक शिक्षिका को यह कहते हुए सुन सकते हैं, ये गाँव वाली हेकड़ी, गाँव में ही छोड़कर आना तुम, और इतने बेशर्म हो कि इतनी पिटाई के बाद कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आदत पड़ी हुई है रोज रोज पिटते आ रहे हो ठुकते आ रहे हो! लात-घूँसे खाकर भी तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा!

हमें पवन पर गर्व है कि पकड़े जाने और पीटे जाने का खतरा होने के बावजूद भी उसने बाल उत्पीड़न के ये प्रमाण हमें उपलब्ध कराए। अगर उन्हें पवन के पास कैमरा मिल जाता तो वे उसके साथ न जाने क्या करते?

जब हमें कुछ वीडियो क्लिप्स मिल गईं तो हमने उनके आधार पर तुरंत कार्यवाही करने का निर्णय लिया। मैंने उत्तर प्रदेश की बाल-आयोग की अध्यक्ष, श्रीमती जूही सिंह से काफी देर बातचीत की और उन्हें सारी घटनाओं का ब्योरा दिया।

मुझे उनसे समुचित कार्यवाही का आश्वासन प्राप्त हुआ है।

अगले दिन हम उस स्कूल की प्रधानाध्यापिका से मिले। शुरू में तो उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया मगर जब हमारा संबल पाकर पवन ने ज़ोर देकर वही बात कही तो उसने अपनी दो शिक्षिकाओं को बुलवाया। और उन्होंने वे सारे तथ्य क़ुबूल किए, जिन्हें हमने इन वीडियो क्लिप्स में देखा था। कक्षाध्यापिका ने क़ुबूल किया कि उसने कक्षा के सारे बच्चों की पिटाई की थी क्योंकि उसे यह पता नहीं चल पा रहा था कि कौन बदमाशी या शैतानी कर रहा है। तो आपको दोषी का पता नहीं चला इसलिए आप सभी निर्दोषों को सज़ा देंगी? आप वहाँ की हालत समझ सकते हैं, जहाँ शिक्षिकाएँ खुले आम, बिना किसी पश्चाताप या अपराधबोध के सब कुछ स्वीकार करने की ढिठाई कर सकती हैं! जब प्रधानाध्यापिका उनसे कहने लगी कि शैतानी करने वाले बच्चे को उनके पास भेजना चाहिए था, तो हमने प्रतिवाद किया कि वे स्वयं भी बच्चों के साथ मार-पीट करती हैं! इस सच्चाई के सामने कुछ कहना उनके लिए असंभव था।

हमने साफ़ कहा कि बच्चों को शारीरिक दंड देना कानूनन अपराध है और इसके लिए आपको जेल की सज़ा भी हो सकती है! हमने उन्हें सी बी एस ई (केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल) द्वारा जारी 'शारीरिक दंड की रोकथाम हेतु दिशानिर्देशों' की पुस्तिका दी क्योंकि वह स्कूल भी सी बी एस ई से ही सम्बद्ध है!

उत्तर? 'जी हाँ, लेकिन नियम तो बहुत सारे हैं- अगर हम उन सभी नियमों का पालन करते रहे तो और कुछ नहीं कर पाएँगे!' प्रधानाध्यापिका अपने आपराधिक कामों को उसी तरह जायज़ ठहरा रही थी जैसा हमारे स्कूल की पूर्व-शिक्षिकाएँ किया करती थीं और जिन्हें हमने सिर्फ एक बार बच्चे पर हाथ उठाने पर निकाल बाहर किया था: 'आप क्या करेंगे जब बच्चा पूरी तरह हाथ से निकल जाए? 'प्रधानाध्यापिका, जिसकी छड़ी उसके पास ही रखी हुई थी, तर्क करती ही चली जा रही थी, 'चलिए माना कि छड़ी से पिटाई करना गलत है लेकिन बच्चों को काबू में रखने के लिए आपको 'कुछ न कुछ' तो करना ही पड़ेगा!'

यह वादा करते हुए कि भविष्य में बच्चों की पिटाई बंद कर दी जाएगी वे हमें इस बात पर सहमत करने की पूरी कोशिश करते रहे कि हम पवन को उनके स्कूल में भेजना जारी रखें। लेकिन मामला सिर्फ उसका नहीं था, दूसरे सभी बच्चों का था! जब हमने उनसे यह लिखकर देने के लिए कहा कि भविष्य में किसी बच्चे पर हाथ नहीं उठाया जाएगा तो वह इसके लिए राज़ी नहीं हुई।

प्रधानाध्यापिका ने हमें स्कूल के संचालक के पास भेज दिया, जो उसका पति ही था और प्रधानाध्यापिका के साथ उस स्कूल का मालिक था। यह मुलाक़ात बहुत छोटी सी थी क्योंकि वह बहुत रूखा और अशिष्ट था। उसने हमसे बैठने तक के लिए नहीं कहा और हर बात से इंकार करता रहा। अंत में उसने कहा, 'जाइए, जो बन पड़े कर लीजिए!' स्वाभाविक ही, उसे पता नहीं था कि हमारे पास उनके अपराधों का पक्का प्रमाण भी मौजूद है। हम चुपचाप चले आए। उसके साथ आगे बात करना ही व्यर्थ था।

जब हम आश्रम वापस आए, हमें अपने एक भूतपूर्व पड़ोसी का फोन मिला, जिन्हें वे लोग भी जानते हैं। उसने कहा, 'आप इनसे पंगा क्यों लेते हो? जानते हैं, इस डायरेक्टर का भाई एक बार एक व्यक्ति के सिर पर पिस्तौल तानकर खड़ा हो गया था?' यह प्रकारांतर से हमारे पास भेजी गई धमकी थी। हमने जवाब दिया कि वह हम सबको गोली मार सकता है लेकिन हम वही करेंगे जो हमारा दिल चाहता है और जो किया जाना चाहिए।

हमारा अगला कदम मीडिया से सम्पर्क करना था। उन्होंने उनके इंटरव्यू लिए और हमने वीडियो क्लिप्स उन्हें थमा दी। हमने एक वीडियो तैयार किया है और वे अपने कार्यक्रम में उसे दिखाकर इस अपराध को जनता के सामने रखेंगे।

हमारे लिए यह सिर्फ इन शिक्षिकाओं, इस प्रधानाध्यापिका या इस स्कूल की बात नहीं है। मामला समाज और देश के बच्चों से संबंधित है! लोग सोचते हैं कि बच्चे कुछ सीख सकें, इसके लिए हिंसा ज़रूरी है! बच्चे कुछ कहते हुए घबराते हैं, अभिभावक शिकायत करते हुए डरते हैं। अभिभावक समझते हैं, उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, बच्चे को उस स्कूल से निकाल लें तो उसकी पढ़ाई का एक साल बरबाद होगा।

हिंसा या भय का वातावरण सीखने में कोई मदद नहीं करता। विपरीत इसके, वह उन्हें नुकसान पहुँचाता है, स्वस्थ तरीके से विकसित होने में रुकावट बनता है! सकारात्मक और स्नेहिल वातावरण में बच्चे उससे कहीं अधिक सीख पाते हैं और उनका समग्र विकास संभव होता है!

मैं उन बच्चों की मदद करना चाहता हूँ जो स्कूलों में मार खाते हैं। मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यह गैरकानूनी है, कि इसकी शिकायत कहाँ और कैसे की जाए- और यदि आप ऐसा करते हैं तो आपका नाम गुप्त रखा जाएगा!

प्रिय अभिभावकों, विश्वास कीजिए, यह आपके बच्चे के लिए हानिकारक है। जब भी आपको पता चले कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हो रहा है तो चुप न बैठें! प्रतिरोध में आवाज़ बुलंद करें, शिक्षकों से, स्कूल प्रबंधन से, दूसरे अभिभावकों से मिलकर चर्चा करें। इन घटनाओं को जनता के सामने लेकर आएँ, इस प्रताड़ना का सक्रिय प्रतिरोध करें!

प्यारे बच्चों, अपनी बात कहने से कभी न घबराएँ! आपके साथ जो हो रहा है अपने अभिभावकों को अवश्य बताएँ, खुद भी सक्रिय हों, जो कुछ आपके साथ हो रहा है, उसकी सूचना अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

मैं भी आपकी मदद के लिए यहाँ मौजूद हूँ। जब भी ज़रूरत हो, मुझसे संपर्क करें। मैं आपके समर्थन में खड़ा रहूँगा और हर संभव मदद करने का प्रयास करूँगा।

बच्चों की खातिर हमें इस देश में और समाज में परिवर्तन का सूत्रपात करना है।