नास्तिकों के लिए निर्णय लेना और ज़िम्मेदारी स्वीकार करना क्यों आसान होता है? 30 जुलाई 2015

स्वाभाविक ही, पिछले सप्ताह इतने सारे नास्तिकों के साथ एक साथ समय गुज़ारने के बाद, उनके साथ हुए कुछ अनुभव विशेष रूप से याद रह जाते हैं। एक बात यह कि सामान्य रूप से वे ज़िम्मेदारियाँ निभाने और निर्णय लेने के मामले में, मेरे मुलाकाती आस्तिकों की तुलना में, अधिक प्रस्तुत नज़र आते हैं। और यह बात मुझे बहुत सहज, स्वाभाविक और तर्कपूर्ण लगती है!

कल का ही उदाहरण लेना हो तो, किसी दुर्घटना के बाद एक नास्तिक तुरंत सहायता के लिए तत्पर दिखाई देता है, जबकि एक आस्तिक डर के मारे इसमें व्यवधान उपस्थित करता है। ऐसे नास्तिक अक्सर मिलते हैं, जो त्वरित निर्णय लेकर अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी लेने के किए तैयार हो जाते हैं, जिससे किसी ज़रूरतमंद की मदद की जा सके।

मेरा मानना है कि नास्तिक आसानी से ऐसा कर पाते हैं क्योंकि वे पहले ही कंटीली राहों से गुज़रकर यहाँ तक पहुँचे होते हैं। काफी विचार मंथन के बाद वे इस निर्णय पर पहुँचे होते हैं कि उसी बात पर भरोसा करें, जिसका वे शिद्दत के साथ खुद महसूस करते हैं, उस पर नहीं, जो उन्हें उनका परिवार बताता है या परंपरा से उन्होंने सीखा है। आपके करीबी मित्र और रिश्तेदार या दूसरे लोग जो सोच रहे हैं या कर रहे हैं, उससे अलग कुछ करना आसान नहीं है। आपके पास दृढ़निश्चय, इतनी संकल्प शक्ति और प्रवाह के विपरीत चलने पर आने वाली मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। इसलिए एक भारतीय नास्तिक निश्चित ही ऐसा व्यक्ति ही होगा, जिसमें ये सारे गुण मौजूद हों। ऐसा व्यक्ति ही नास्तिक हो सकता है!

इस तरह, भारत के नास्तिक इन सब दिक्कतों का सामना पहले ही कर चुके होते हैं और जानते हैं कि उनके चारों ओर मौजूद कठिनाइयों के बावजूद वे मज़बूती के साथ पैर जमाए खड़े हैं। वे अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए हर समस्या से निपटने के लिए तैयार होते हैं।

इसके विपरीत धार्मिक लोगों का रवैया अक्सर बिलकुल दूसरा होता है: सब कुछ वे ईश्वर पर छोड़ देते हैं। अपने इस विश्वास के चलते कि सब कुछ ईश्वर की मर्ज़ी से होता है, जब त्वरित निर्णय लेना आवश्यक होता है, वे अक्सर अनिच्छुक, बल्कि निष्क्रिय बने रहते हैं। ज़्यादातर आस्थावान लोग किसी समस्या का हल निकालने की ओर स्वतः प्रवृत्त नहीं होते क्योंकि उनका विश्वास होता है कि आखिर समस्या भी ईश्वर प्रदत्त है। समस्या तो होगी ही, समस्या बहुत मुश्किल भी होगी- क्योंकि वह ईश्वर की देन है! ईश्वर परीक्षा लेता है! वे अपनी सामान्य दिनचर्या से बाहर नहीं निकलते क्योंकि वे एक काल्पनिक शक्ति पर निर्भर होते हैं।

इसके अलावा वे भयभीत भी होते हैं। धर्म का सारा कारोबार ही लोगों के भय पर आधारित है। डर न हो तो वह भरभराकर गिर जाएगा। अगर नर्क का डर न हो तो कोई स्वर्ग पर भी विश्वास नहीं करेगा! आपके पाप, पापों के लिए नियत दंड, पश्चाताप और उसके चारों ओर निर्मित बाकी सब कुछ भी! ये सब डर पैदा करने के औज़ार हैं। और एक बार आप डर के आदी हुए तो फिर हमेशा हमेशा के लिए वह आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। जब आप कोई दुर्घटना होते हुए देखते हैं तो आप डर जाते हैं। आप घायल व्यक्ति कि मदद करने के बारे में नहीं सोचते बल्कि आपके मन में दुर्घटना के चलते हो सकने वाली दिक्कतों से अपने आपको बचाने का खयाल आता है!

धार्मिक लोग मुश्किल वक़्त में अपने ईश्वर का आह्वान करते हैं कि वह उन्हें सही निर्णय लेने की शक्ति दे, उचित राह दिखाए। उनका विश्वास होता है कि ईश्वर अवश्य ही कोई न कोई राह निकालेगा-लेकिन मैंने देखा है कि ईश्वर के भरोसे बैठे हुए वे लोग अक्सर कोई निर्णय ही नहीं ले पाते, आगे बढ़कर खुद कुछ करने की जगह वे किसी दैवी शक्ति के निर्देश का इंतज़ार करते रहते हैं, जो कभी सामने नहीं आता!

निश्चित ही, हर चीज़ के अपवाद होते हैं लेकिन सामान्य रूप से लोगों के इस रवैये को मैंने अक्सर नोटिस किया है। भविष्य में इस नजरिए से आस्तिकों और नास्तिकों के रवैयों पर नज़र रखें, आपको भी अंतर स्पष्ट नज़र आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

क्या मैं पैसे कमाने के लिए नास्तिक हो गया – 8 फरवरी 2015

आज रविवार है और मैं आपको एक बार फिर अपने जीवन के विषय में कुछ बताना चाहता हूँ, कुछ ज़्यादा ही व्यक्तिगत और कुछ ऐसा, जिसने आज मुझे अपनी मित्रताओं पर और अपने बीते हुए जीवन पर एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया।

मेरा स्कूल के ज़माने का एक मित्र था। दरअसल वह मुझसे कुछ साल बड़ा था और मुझसे आगे की किसी कक्षा में पढ़ता था लेकिन मैं और मेरा एक और बहुत अच्छा मित्र और वह मित्र बन गए। वह यूरोप चला गया और वहीं स्थायी रूप से बस गया। जब मैं यूरोप गया तो उससे मिलने उसके घर गया था।

हम लोग मित्र तो थे मगर उतने घनिष्ट मित्र नहीं थे। क्योंकि दोनों की ज़्यादातर रुचियाँ एक जैसी नहीं थीं, धीरे-धीरे एक-दूसरे के साथ हमारा संपर्क टूटता गया। बीच-बीच में हमारे बीच संपर्क हो जाता था लेकिन मुझे लगा कि जब मुझे धर्म से विरक्ति होने लगी, तभी से हमारे संबंधों की ऊष्मा भी समाप्त हो गई। बाद में जब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि मेरे विचार उसके विचारों से बिलकुल मेल नहीं खाते और जब मेरा ईश्वर पर विश्वास भी पूरी तरह समाप्त हो गया, हमने जो थोड़ा-बहुत संपर्क था भी, उसे भी पूरी तरह तोड़ लिया।

लेकिन मेरा वह दूसरा घनिष्ठ मित्र उसका मित्र बना रहा और जब वह उससे मिलने के बाद वृन्दावन आता तो उससे उस भूतपूर्व मित्र की खैर-खबर मिल जाती थी।

काफी समय बाद, इसी तरह मैंने सुना कि वह भी मेरे बारे में पूछता रहता है। मुझे यह भी पता चला कि इस व्यक्ति ने, जो पहले मेरा मित्र रह चुका था, मेरे इस मित्र से कहा कि उसके अनुसार मैं हमेशा हर काम व्यापार के नज़रिए से ही करता रहा हूँ। उसकी नज़र में एक धर्मोपदेशक के रूप में मेरा काम, मेरा लंबा गुफा-निवास, सब कुछ सिर्फ पैसा कमाने के उद्देश्य से किए जाने वाले उपक्रम थे। उसने कहा कि वह पहले से जानता था कि मैं धार्मिक नहीं हूँ, कि मैं सदा से एक नास्तिक था और यह भी कि मैंने अपने नास्तिक होने की घोषणा उपयुक्त समय देखकर, बाद में इसलिए की कि मैंने सोचा ऐसा करने से और भी ज़्यादा पैसा कमाया जा सकता है।

उसकी बात पर मुझे विश्वास नहीं हुआ और फिर मैं हँसे बिना नहीं रह सका! एक ऐसे व्यक्ति के मुँह से यह सुनना, जो मुझे अच्छी तरह जानता है! गुफा-गमन तक और उससे पहले मैं बहुत अधिक धार्मिक, आस्थावान और ईश्वर के लिए समर्पित व्यक्ति था! मैं ईमानदारी के साथ इन सब बातों पर विश्वास करता था और इसीलिए गुफा में मंत्रोच्चार करते हुए मैं तीन साल तक एकांतवास कर सका। अगर सिर्फ पैसे के लिए यह कर रहा होता तो कुछ महीनों में ही पागल हो गया होता! सिर्फ अंधश्रद्धा ही आपसे इस तरह के सनकी कार्य करवा सकती है!

और मुझे नास्तिक होकर क्या मिला? ईमानदारी की बात यह है कि आर्थिक दृष्टिकोण से मेरे लिए धर्म का परित्याग करने और ईश्वर पर विश्वास न करने से अधिक मूर्खतापूर्ण कार्य कोई हो ही नहीं सकता था क्योंकि इन्हें छोड़ने का अर्थ था, अपने अच्छे-खासे जमे-जमाए व्यवसाय से और असंख्य भक्तों से हाथ धोना! अगर मैं हर वक़्त पैसे के बारे में ही सोचता रहता हूँ तो अब धर्म और ईश्वर से कोई लेना-देना न होने के बावजूद मैं आज भी गुरु ही बना रह सकता था, जो मैं पहले से था ही।

मुझे लगता है कि इससे यह पता चलता है कि मेरा दोस्त धर्म के बारे में क्या विचार रखता है: कि सिर्फ व्यापार-व्यवसाय की खातिर ही लोग धर्म को अपनाते हैं और उसमें इतनी सक्रियता से हिस्सा लेते हैं और नाटक और ढोंग करके लोगों को मूर्ख बनाते हैं। शायद इससे धर्म के प्रति उसका रवैया भी उजागर हो जाता है-या क्या वह यह कहना चाहता है कि हर कोई इसे गलत तरीके से कर रहा है और वही सिर्फ ठीक तरीके से कर रहा है?

इस धार्मिक अहंमन्यता के बारे में कल मैं और विस्तार से लिखूँगा। आज के लिए इतना कहना ही काफी है कि न तो मेरे धार्मिक होने का पैसा कमाने से कोई संबंध था और न ही मेरे नास्तिक होने का उससे कोई संबंध है!

जब मैं पारंपरिक विवाह समारोह में शिरकत करता हूँ तो क्या मैं दहेज प्रथा का समर्थन करता हूँ? 25 दिसंबर 2014

कल मैंने कुछ परिस्थितियों का वर्णन किया था, जिसमें मैंने कहा था कि यदि अस्पृश्यता और दहेज प्रथा जैसी हानिकारक और पूरी तरह अन्यायपूर्ण परम्पराओं का पालन न करने की बात हो तो हमें अपने आधुनिक विचारों पर अडिग रहना चाहिए। एक भारतीय ने कुछ दिन पहले मुझसे कहा कि वह भी पेशोपेश में है कि क्या उसकी परिस्थिति भी उसी श्रेणी में आती है। उसका मित्र विवाह कर रहा था और वह जानता था कि मित्र के विवाह में दहेज लिया जाएगा, जिसका वह दृढ़ता पूर्वक विरोध करता था। अब वह पेशोपेश में था कि क्या उसे अपने मित्र के विवाह में शामिल होना चाहिए या नहीं यानी क्या वह वहाँ जाकर दहेज प्रथा का समर्थन कर रहा होगा!

जब इस तरह के मामले सामने आते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि मैं बहुत सख्त हूँ। और वास्तव में मैं अपने शब्दों का शब्दशः पालन करता हूँ और जो लिखता हूँ या कहता हूँ, उस पर पूरा अमल करता हूँ। लेकिन साथ ही मैं इन दो स्थितियों में अंतर कर सकता हूँ कि कब अपने विश्वास या अविश्वास को सबके सामने रखना चाहिए और कब उनसे मुझे एक मित्र की तरह मिलना चाहिए क्योंकि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं।

मेरे विचार में यहाँ भी वही मामला है। अगर वह आपका घनिष्ठ मित्र है तो शायद आपने अपना मंतव्य ज़ाहिर कर दिया है। अगर वह आपका करीबी रिश्तेदार है और आपको इस मामले में उससे कुछ कहना है तो मैं कहूँगा कि आपको दहेज के इंतज़ाम या उसके ‘लेन-देन’ को रोकने के लिए, जो भी आपसे बन पड़े, करना ही चाहिए।

आप कितना भी करीबी रूप से दूल्हा या दुल्हन से जुड़े हों, दहेज के मुद्दे पर आपके विवाह समारोह में न जाने पर विवाह नहीं रुकने वाला। अगर आप रिश्तेदार नहीं हैं, करीबी मित्र भी नहीं हैं तो फिर आपको समारोह में बुलाने वाले इसका बुरा नहीं मानेंगे बल्कि हो सकता है आपके न आने को नोटिस तक न लें और तब आपका विरोध अलक्षित रह जाएगा। अगर आप करीबी रिश्तेदार या मित्र हैं तो आपके न आने पर वे विचलित होंगे और उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी और आप उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे होंगे।

आपका यह व्यवहार आपके आपसी रिश्तों को तो नुकसान पहुँचाएगा मगर आपके मित्रों या रिश्तेदारों को अपनी दकियानूसी और नुकसानदेह परंपराओं का पालन करने से नहीं रोक पाएगा। जब आप उनके सामने अपने विचार रखकर कुछ नहीं कर पाए तो ऐसा करके भी कुछ हासिल नहीं कर पाएँगे।

और यहाँ मैं आपसे यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है: आपका अहं, जोकि उनके द्वारा आपके विचारों का अनुपालन न करने के कारण आहत हुआ है या उनके प्रति आपका स्नेह? आपका विश्वास या आपकी मित्रता?

मेरे विचार से विवाह में आपका सम्मिलित होना उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण, उनके लिए सबसे सुखद और आत्मीय अवसर पर आपका उनके साथ रहना है! उनके प्रेम में सहभागी होने के लिए आप एक शाम इस बात को भुलाकर कि उनके विचार आपसे नहीं मिलते या वे दक़ियानूसी और नुकसानदेह हैं, उनके साथ मिलकर सिर्फ अवसर का आनंद उठाएँ!

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आपको पूरे समय वहाँ बैठकर सारे कर्मकांडों में उपस्थित रहना है, अगर आप उस अवसर के धार्मिक अंशों के विरुद्ध हैं तो उनसे दूर रहिए! यह आवश्यक नहीं है और यदि वे आपका नज़रिया जानते हैं तो कोई भी इस बात से परेशान नहीं होगा कि आप विवाह समारोह के उस हिस्से में अनुपस्थित रहे। लेकिन पार्टी में वे आपको अवश्य ही मिस करेंगे-और निश्चय ही आप भी उन्हें मिस करेंगे!

तो ऐसे सवालों से अपने आपको परेशान करने की ज़रूरत नहीं है, जो आपकी दिली इच्छा हो वही कीजिए और अपने परिवार और दोस्तों के साथ खुला व्यवहार कीजिए! जीवन का आनंद लीजिए-उसे बहुत ज़्यादा जटिल मत बनाइए!

और उसी जज़्बे के साथ, भले ही मेरा क्रिसमस से या उसकी परम्पराओं से या उसके महत्व से कोई लेना-देना नहीं है, मैं अपने पाठकों और मित्रों के लिए, जिन्होंने कल या आज क्रिसमस मनाया या कल मनाएँगे, क्रिसमस की शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ कि उनके जीवन में सदा सुख-शांति बनी रहे! अपनी छुट्टियाँ और त्योहार मनाते रहें, परिवार वालों को खूब गले लगाएँ और ज़्यादा खाना न खाएँ भले ही वह कितना भी सुस्वादु क्यों न हो!

जब परिवार वाले अस्पृश्यता पर अमल करें तब उनके प्रति आप सहिष्णु नहीं रह सकते – 24 दिसंबर 2014

कल मैंने एक ऐसी स्थिति का वर्णन किया था, जिससे बहुत से भारतीय नौजवानों को दो-चार होना पड़ता है: वे स्वयं प्रगतिशील हैं और आधुनिक विचार रखते हैं जबकि उनके परिवार वाले अभी भी उन्हीं दकियानूसी परंपराओं और आडम्बरों का पालन करते हैं, जिन्हें वे नौजवान अब बिलकुल पसंद नहीं करते। वे इस परिस्थिति पर शर्मिंदा होते हैं और मित्रों और अपने परिवार वालों के बीच किसी भी संपर्क को टालने की कोशिश करते हैं। कल मैंने यह भी कहा था कि आपको इतना संवेदनशील और सहिष्णु होना चाहिए कि दोनों के बीच शांति और सद्भावपूर्ण मिलाप का कोई रास्ता निकल सके। लेकिन कुछ ऐसी स्थितियाँ हो सकती हैं जहाँ मैं भी समझता हूँ कि यह संभव नहीं है। परिस्थितियाँ, जहाँ मैं कतई सहिष्णु नहीं हो सकता और दूसरों से भी यही कहूँगा कि इन मामलों में अपने विचारों पर ज़रा सा भी डगमगाए बगैर, दृढ़ता के साथ अड़े रहें!

इस तरह की समस्याएँ सिर्फ युवकों तक ही सीमित नहीं है, हर उम्र के लोग इस तरह की मुश्किलों में पड़ सकते हैं। अगर आपका परिवार और आपके प्रियकर बहुत परंपरावादी हैं जबकि आप उन दक़ियानूसी और मूर्खतापूर्ण परम्पराओं के सख्त विरोधी हैं तब किसी भी उम्र में ऐसी समस्याओं का सामना हो सकता है: जैसे जातिप्रथा के अंतर्गत आज भी जारी छूआछूत।

अगर आपके मित्र निचली जातियों से आते हैं और आपका परिवार आज भी उन्हें अछूत मानता है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपस में मिलने पर उनके बीच भारी समस्याएँ पेश आएँगी। परिवार वाले अपने उन दोस्तों को घर लाने का समर्थन नहीं करेगे। वे उन्हें अलग गिलासों में पानी देंगे और जब आपके दोस्त चले जाएँगे तब उन सभी वस्तुओं को अग्नि में पवित्र करेंगे जिन्हें उन्होंने छुआ होगा। उनसे मिलने पर वे उनसे हाथ नहीं मिलाएँगे- वैसे यह ठीक ही होगा क्योंकि यह अभिवादन या स्वागत का भारतीय तरीका नहीं है- लेकिन वे भूल से भी उन्हें छूने से बचेंगे।

इससे आपको कितना बुरा लगेगा! इससे बुरी बात यह कि आपके मित्र को कितना बुरा लगेगा!

या अगर आपके परिवार के लोग सोचते हैं कि जो लड़कियाँ जींस या-उससे बढ़कर, स्कर्ट-पहनती हैं वे अश्लील या चरित्रहीन होती हैं जबकि ऐसी कई लड़कियाँ आपकी मित्र हैं तो आपको अपने परिवार वालों से नैतिकता के पाठ पढ़ने पड़ सकते हैं। हो सकता है कि आपकी माता-पिता आपसे कहें कि ‘ऐसे लोगों’ के साथ मत रहा करो! वे मानते हैं कि ऐसे लोगों का साथ आपके लिए नुकसानदेह है-लेकिन आप क्या सोचते हैं?

या हो सकता है, आपके माता-पिता अपनी जाति में आपका विवाह करना चाहते हों और इसके लिए दहेज़ लेना या देना चाहते हों, जिसके आप सख्त खिलाफ हों! क्या आप इसे भी अपने साथ की जा रही ज़्यादती नहीं मानेंगे?

ये ऐसे ही मामले हैं और ऐसे बहुत से दूसरे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं। जब आप जानते हैं कि आपका परिवार ऐसी दकियानूसी परंपराओं में यकीन रखता है और उनके संस्कारों में पुरानी घृणित आदतों का बोलबाला है जो आपके जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं तो आपको दृढ़ता के साथ अपने विचारों पर अडिग रहना चाहिए। आप क्या स्वीकार कर सकते हैं इसकी एक सीमा है और उसके भीतर ही आप बिना पाखंड और दोगलेपन के जीवन गुज़ार सकते हैं!

मैं जानता हूँ कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं: या तो वे आपकी बात मान लेंगे या फिर आपके और आपके परिवार के बीच दूरियाँ पैदा हो जाएँगी। इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है-क्योंकि हमें संवेदनशील और सहिष्णु तो होना चाहिए मगर साथ ही हमें अपने जीवन की लगाम ऐसे व्यक्तियों के हाथ में नहीं सौंपनी चाहिए, जिनके जीवन मूल्य आपके विचारों से मेल नहीं खाते या जो दक़ियानूसी और हानिकारक परम्पराओं का अनुपालन करते हैं!

अलग-अलग आस्था रखने वाले मित्र – यह मित्रता कैसे निभ सकती है! 4 नवंबर 2014

एक मुसलमान, एक हिन्दू, एक ईसाई, एक यहूदी और एक नास्तिक एक रेस्तराँ में जाते हैं। वे वहाँ बहुत मस्ती करते हैं, उनके बीच बड़ी अच्छी चर्चा होती है और वे उस शाम एक-दूसरे के सान्निध्य का भरपूर लुत्फ़ उठाते हैं। और उसके बाद वे सब घर जाकर सुकून के साथ सो जाते हैं।

मैंने ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ीं और उन्हें पढ़कर मैं हँस पड़ा। आप सोचेंगे, अलग-अलग धर्मों के लोगों का यह जमावड़ा, जिसमें एक नास्तिक भी मौजूद है, काफी विध्वंसक हो सकता है। मगर ऐसा नहीं है- हम सब एक-दूसरे के साथ शांति के साथ रह सकते हैं, तब तक, जब तक कि हम एक-दूसरे को अपने विचारों से सहमत करने की कोशिश नहीं करते! अपने व्यक्तिगत जीवन में मैं इसी बात को तरजीह देता हूँ।

वाकई मैं किसी को अपनी बात पर सहमत करना नहीं चाहता। जी हाँ, अपने ब्लॉगों में और सोशल मीडिया पर मैं अपने विचार लिखता हूँ। अगर कोई व्यक्ति कुछ बातें पढ़ना नहीं चाहता तो उसे पढ़ने की ज़रुरत नहीं है। मैं नहीं चाहता और न ही किसी पर ज़बरदस्ती कर सकता हूँ कि मेरे शब्द पढ़े या सुने कि मैं क्या कह रहा हूँ। आपकी मर्ज़ी है तो साईट खोलिए और अगर कोई दूसरा विचार जानना चाहते हैं, भिन्न नज़रिए को समझना चाहते हैं तो आपका स्वागत है और हमारे बीच रोचक संवाद संभव हो सकता है। अगर नहीं, तो कोई बात नहीं, मुझे भी धर्म या धार्मिक आस्थाओं पर आपसे बात करने में कोई रुचि नहीं है!

मेरे कुछ दोस्त हैं, जो धार्मिक हैं। मैं उनके साथ उठता-बैठता हूँ और बाल-बच्चों के बारे में, काम-धंधे के बारे में या दैनिक जीवन के बारे में एक या दो घंटे बढ़िया गप-शप करता हूँ। मुझे धर्म का ज़िक्र तक छेड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती। बल्कि अगर वे शुरू भी करते हैं तो मुझे नागवार गुज़रता है क्योंकि हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि इस चर्चा की कोई मंजिल नहीं है।

जी हाँ, यह सच है। जो बहुत धार्मिक सोच रखता है उसके साथ मेरी बातचीत ज़्यादा गंभीर नहीं हो सकती क्योंकि हम अधिकतर विषयों पर पूरी तरह अलग-अलग विचार रखते हैं और उन पर अधिक विस्तार पूर्वक चर्चा करने में मुझे कतई कोई आनंद नहीं आ सकता। लेकिन अगर हमारे बीच प्रेम और मित्रता है तो उन विचार भिन्नताओं के बावजूद वह मित्रता बनी रह सकती है।

कुछ भी हो, मैं सामने वाले को किसी भी हालत में सहमत करने की कोशिश नहीं करूँगा, यहाँ तक कि उसके साथ किसी वाद-विवाद में भी नहीं उलझूँगा। अगर आप मेरा नज़रिया पूछेंगे तो मैं थोड़े से शब्दों में अपनी बात रख दूँगा। अगर आप कुछ अधिक जानना चाहेंगे तो बता दूँगा कि उस नज़रिए का कारण क्या है। अगर आप खुलकर बात करते हैं तो मुझे आपके साथ बात करके प्रसन्नता होगी। अगर आप अपनी बात पर अड़े रहते हैं और सिर्फ इसलिए मुझसे प्रश्न कर रहे हैं कि मेरा विरोध कर सकें, मेरे साथ तर्क-वितर्क कर सकें तो मुझे आपके साथ बात करने में कोई रुचि नहीं होगी। तब मैं शांत हो जाऊँगा, हो सकता है कहीं-कहीं सर हिला दूँ लेकिन कुल मिलाकर चर्चा जारी रखकर मैं बहुत खुश नहीं हो पाऊँगा। मैंने अपने विचार बताए क्योंकि आप जानना चाहते थे और आपने पूछा- कृपया मुझे अपने विचार तब तक न बताएँ जब तक मैं जानना न चाहूँ और आपसे न पूछूँ।

आप जिस बात पर विश्वास करना चाहते हैं, करें या जिस बात पर न करना चाहें, न करें मगर किसी दूसरे को मगर किसी दूसरे को परेशान न करें। अगर आप पसंद नहीं करते तो आप भी मेरा लिखा न पढ़े और न ही उससे परेशान या विचलित हों- और सिर्फ इसलिए कि आप मुझसे झगड़ना चाहते हैं, मुझे भी परेशान न करें!

प्रियजन को खोना आपके विश्वास की जड़ों को हिला देता है – 12 अक्टूबर 2014

मैंने आपको मेरी बहन, परा की सितम्बर 2006 में हुई मृत्यु का ज़िक्र करते हुए बताया था कि किस तरह हमारा पूरा परिवार बहुत दिनों तक उस सदमे से उबरने की कोशिश करता रहा। हिन्दू धर्म में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के पश्चात् कुछ धार्मिक कर्मकांड किए जाने आवश्यक माने जाते हैं। इन कर्मकांडो पर हमारी प्रतिक्रिया दर्शाती है कि किस हद तक परा की मृत्यु ने मेरे और मेरे परिवार के धार्मिक विश्वासों और हमारी आंतरिक दुनिया को बदलकर रख दिया था।

मेरे परिवार ने कर्मकांड करवाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं थीं। हममें से कोई भी दिखावे में यकीन नहीं रखता और हम पर दुखों का पहाड़ भी टूटा हुआ था लिहाजा कोई बड़ा कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया था। फिर भी उन्होंने कुछ परम्परागत कर्मकांड शुरू किए- और मैंने तुरंत अपनी नापसंदगी ज़ाहिर कर दी। सच बात तो यह है कि मैं अच्छा-ख़ासा नाराज़ हुआ। कोई भी काम मेरी बहन को वापस नहीं ला सकती थी! कितनी भी प्रार्थनाएँ आप कर लें, कितनी भी पूजा-अर्चनाएँ आप करवा लें, दान-दक्षिणाएँ दे लें, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। वह पुनर्जीवित नहीं होने वाली थी!

जब वह पुरोहित आया, जिसे सारे कर्मकांड निपटाने थे तो वास्तव में मैं बेहद क्रोधित हुआ और तुरंत उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। स्वाभाविक ही पुरोहित स्तब्ध रह गया होगा मगर यह देखकर कि मैं उसे या मेरे परिवार वालों को किसी भी प्रकार का धार्मिक आयोजन करने देने वाला नहीं हूँ, वह चला गया। गुस्से के आवेग में मैंने साफ़-साफ़ कह दिया कि मेरे विचार में यह सब महज फूहड़ नौटंकी के सिवा कुछ भी नहीं है।

मेरे अभिभावकों की क्या प्रतिक्रिया रही और उन्होंने क्या महसूस किया, यह जानकार आप आश्चर्य करेंगे। मेरे पास यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि मुझे संसार में इससे अच्छा परिवार प्राप्त नहीं हो सकता था: उन्होंने मेरी बात मान ली। उन्होंने कोई तर्क नहीं किया, नाराज़ होने की तो बात ही छोड़िए। वे समझ गए कि मैं क्या कह रहा हूँ- और कोई एतराज़ नहीं जताया।

यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि मेरी बहन की मृत्यु ने मेरी और मेरे परिवार की धार्मिकता को झंझोड़कर रख दिया था। अगर हम तब भी गहरे धार्मिक विश्वासों में जकड़े होते तो हम उसकी आत्मा की और उसके मृत्यु उपरांत जीवन की चिंता कर रहे होते और भरसक अच्छे से अच्छे तरीके से और विशाल पैमाने पर सारे कर्मकांड आयोजित करवाते। लेकिन परा की मृत्यु ने बहुत कुछ बदल दिया था।

मेरी बहन की मृत्यु धार्मिक विश्वासों पर मेरी श्रद्धा टूटने के पीछे का एक प्रमुख कारण रहा। यह इतना बड़ा सदमा था कि उसने उन सारे स्तंभों को ढहा दिया, जिन पर मैं अटूट विश्वास रखता था। इतनी दुखद घटना होने पर छोटी बातों से शुरू करते हुए आप बहुत से विश्वासों पर पर प्रश्नचिह्न लगाना शुरू कर देते हैं: मैंने उसकी कुंडली का अध्ययन किया था और उसमें कहीं भी उसकी असामयिक मृत्यु का संकेत नहीं था! हमारे साथ यह कैसे हो सकता है- धर्म-कर्म से जुड़े एक ऐसे पक्के धार्मिक परिवार के साथ, जो दूसरों को भी धर्म में विश्वास करने का उपदेश देता रहा है? और उसके साथ- आखिर उसने ऐसा क्या किया था कि ईश्वर ने उसे ऐसी सज़ा का पात्र समझा?

स्वाभाविक ही, धर्म और रूढ़ियों से दूर होते जाने की यह कहानी एक दिन में संभव नहीं हुई थी। यह एक लम्बी प्रक्रिया थी, जिसे मैंने गुफा के अपने एकांतवास से बाहर आने के बाद शुरू किया था और जो उसके बाद कुछ सालों तक जारी रही थी। इस सफ़र में बहन की मृत्यु एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई थी। मैंने अपना गुरु का चोला उतार फेंका था और धर्म से दूरी बनाना शुरू कर चुका था; हालाँकि मुझमें आ रहे इस परिवर्तन के प्रति मैं जागरूक नहीं था और नहीं जानता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं ईश्वर को भी छोड़ दूँगा।

अंधविश्वास के प्रति सहिष्णुता बरक्स बच्चों को अंधविश्वास से दूर रखना- 9 अक्टूबर 2013

कल मैंने बताया था कि हमारे कुछ कर्मचारी काम छोड़ कर चले गए क्योंकि वे चेचक से पीड़ित हो गए थे। जब मैंने इस बारे में सोशल मीडिया में लिखा तो प्रत्युत्तर में मुझे बहुत सा फीडबैक मिला। कल मैंने यह भी बताया था कि कुछ लोगों ने मुझसे पूछा कि मैंने उन्हें डॉक्टर के यहाँ क्यों भेजा, जबकि कुछ लोगों ने एक अन्य प्रश्न पर अपनी उलझन व्यक्त की: जब उन्होंने बिना दवा खाए स्वस्थ होकर वापस आने की अनुमति चाही तो हमने उन्हें इंकार कर दिया। क्यों?

अपने इस निर्णय के कारण मुझ पर आरोप लगाए गए कि मैंने सिर्फ इसलिए किसी का रोजगार छीन लिया कि वे उस बात पर विश्वास नहीं करते थे, जिस पर मैं करता हूँ। सबसे पहले मैं इस आरोप का जवाब देना चाहता हूँ। वास्तव में, साधारणतया मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे कर्मचारी किन बातों पर विश्वास करते हैं। वे हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान या नास्तिक हों-यह उनकी अपनी मर्ज़ी है और न तो मैं इस बारे में कभी पूछता हूँ और न ही इस मामले में कोई हस्तक्षेप करता हूँ। दुनिया को देखने की उनकी समझ का उनके काम की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं इस मामले में बहुत पेशेवर रवैया अपनाता हूँ और उनसे भी यही अपेक्षा रखता हूँ।

हमारे आश्रम के, सब नहीं तो अधिकतर कर्मचारी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि हम लोग धार्मिक बिलकुल नहीं हैं। वे यह भी जानते हैं कि हमारे परिवार में सिर्फ एक पूजा करने वाला व्यक्ति है और वह है हमारी नानी। उनका एक पूजाघर भी है, जिसे सिर्फ वही इस्तेमाल करती हैं। वे यह भी जानते हैं कि बड़े से बड़े धार्मिक त्योहारों में भी हम कोई धार्मिक आयोजन नहीं करते और उपवास के दिन भी हम सामान्य रूप से भोजन करते हैं। इसके अलावा आप किसी प्रकार के धार्मिक या जातिगत लक्षण हमारे यहाँ नहीं पाएंगे। लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक पूजा-अर्चना करने से हम नहीं रोकते।

यह आपसी समझ दैनंदिन के कार्य-व्यवहार को सुचारु रूप से चलाने में बड़ी सहायक है और कभी कोई समस्या पेश नहीं आती। लेकिन अब हमने बहुत सोच-समझकर एक निर्णय लिया है: यह सही है कि किसी कर्मचारी के विश्वास पर हम कोई असर नहीं डालना चाहते और न ही उनके विश्वास पर कोई निर्णय सुनाना चाहते हैं लेकिन हमारे आश्रम में बहुत से छोटे-छोटे बच्चे रहते हैं, जिनके प्रति हमारी कुछ ज़िम्मेदारियाँ है। इन बच्चों को हमारे यहाँ सिर्फ इसलिए नहीं भेजा गया है कि हम उनके खाने, कपड़े और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करें बल्कि इसलिए भी कि हम उन्हें शिक्षित करें-स्कूल में और घर में भी। आचार-व्यवहार और नैतिक शिक्षा ऐसे विषय हैं, जिन्हें बच्चे अपने घर में व्यवहृत संस्कृति से सीखते हैं और आश्रम इन बच्चों का घर ही है।

हम खुले विचारों वाले लोग हैं और लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील और सहिष्णु हैं। ये बच्चे आसपास मौजूद सांस्कृतिक माहौल से हिन्दू धर्म के बारे में जानेंगे। लेकिन जब यह धर्म खतरनाक अंधविश्वास की ओर बढ़ने लगे तो उसकी एक सीमा तय करना आवश्यक है। हम समझते हैं कि इसी बिन्दु पर हमें दखल देना चाहिए और अपने वचनों और कार्यों से उन्हें बताना चाहिए कि वे चीजों को वैज्ञानिक दृष्टि से देखना सीखें, और यह भी कि दवा और आपके भीतर मौजूद नैसर्गिक शक्ति के कारण बीमारी ठीक होती है न कि पूजा-पाठ और कर्मकांडों से!

हम समझते हैं कि अगर हमारे दो कर्मचारी दवा न लेने का निर्णय लेकर हमें छोड़ कर चले जाएँ और फिर हमारी सम्मति के साथ वापस भी आ जाएँ तो यह बात बच्चों पर गलत असर डालेगी। वही दवा उन बच्चों को भी खानी पड़ी थी। वे कर्मचारी आएंगे और उन्हें अपने अंधविश्वासों की शिक्षा देंगे और जब बच्चे कहेंगे कि उन्होंने भी वे दवाएँ खाई हैं तो यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि उन्होंने दवाइयाँ खाकर गलत काम किया है। जिन्होंने दवाइयों का अच्छा असर अपनी आँखों से देखने के बाद भी दवाइयाँ नहीं खाईं और अपने विश्वास की खातिर नौकरी तक छोड़ दी, वे लोग अब और भी ज़्यादा ढीठ और अड़ियल हो चुके होंगे और पूरी शक्ति के साथ दवाओं के विरुद्ध बातें करेंगे और बच्चों पर यह असर डालेंगे कि हमेशा डॉक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती और दूसरी ऊलजलूल बातें भी उनके कोमल मस्तिष्क में ठूँसने की कोशिश करेंगे।

अगर अंधविश्वास अज्ञान के चलते हुआ है तो फिर भी एक बात है मगर जब उस पर अर्थहीन ज़िद्द और अन्धी रूढ़ियों का मुलम्मा भी चढ़ जाए तो यह बहुत ही बुरा होता है। और हम बच्चों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को बहुत गंभीरता से लेते हैं-इसलिए हम उन्हें अंधे, रूढ़िवादी विश्वासों से दूर ही रखना चाहते हैं!

आस्था और अंधविश्वास में कोई फर्क नहीं – अपनी आस्था पर विश्वास करना बंद करें! 5 जुलाई 2013

कल वाले विषय पर बहुत से धार्मिक व्यक्ति मुझसे कहते हैं कि मैं इन दो बातों को गड्ड-मड्ड कर रहा हूँ: आस्था और अंधविश्वास। मुझसे कहा जाता है कि मैं धार्मिक आस्था को अंधविश्वास न कहूँ क्योंकि दोनों में बहुत अंतर हैं और मुझे इन बातों को बारीकी से समझने के लिए दोनों के बीच के अंतर को समझना चाहिए। अपने ब्लॉग की आज की प्रविष्टि में मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं 'अंधविश्वास' शब्द को लेकर बिल्कुल गफलत में नहीं हूँ और न ही इस आस्था और अंधविश्वास के बीच कोई घालमेल करने की मेरी मंशा है। मैं इस बात को समझ रहा हूँ जो आप मुझसे कह रहे हैं लेकिन मैं आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मेरे विचार में धर्म और अंधविश्वास के बारे में आपके सभी विचार एक ही श्रेणी में रखे जा सकते हैं। कैसे, मैं समझाने की कोशिश करता हूँ।

यह तो स्पष्ट ही है कि ऐसी बातें सिर्फ धार्मिक और ईश्वर पर विश्वास करने वाले लोग ही किया करते हैं। क्यों? इसलिए कि उन्हें अंधविश्वासी समझा जाना अच्छा नहीं लगता! जब मैं कहता हूँ कि धार्मिक कृत्य दरअसल में अंधविश्वास ही हैं तो उन्हें बुरा लग जाता है। उनके अनुसार भगवान के चरणों में फूल चढ़ाना आस्था है जब कि दुष्ट शक्तियों से या बुरी नज़र से बचने के लिए दरवाजे पर नींबू और मिर्ची टांगना अंधविश्वास है! मेरी नज़र में, दोनों में कोई बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है- दोनों ही बातें इस विश्वास पर आधारित हैं कि कोई न कोई अलौकिक शक्ति मौजूद है जो आपके इन कामों पर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। आपको उस पर विश्वास करने के लिए कहा गया है, जब कि उसका कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। आपको किसी की पूजा करनी है जिसके अस्तित्व के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इसे आप आस्था कहते हैं और मैं कपोल-कल्पित कथा कहता हूँ।

इसी संदर्भ में मुझसे एक बार किसी ने पूछा कि क्या मंदिर जाना भी अंधविश्वास ही है। मैंने कहा कि आप स्वयं इसका उत्तर दे सकते हैं! मंदिर क्या है? वह एक घर या कमरे जैसा होता है जिसकी दीवारें सोने और चाँदी से मढ़ी होती हैं और बीचोंबीच पूजाघर होता है जहां एक सिंहासन पर पत्थर या सोने या चाँदी के भगवान विराजमान होते हैं। आप वहाँ जाते हैं और उस मूर्ति के सामने कुछ खाने का सामान रखते हैं और घंटी बजाते हैं। आप यह काम जीवन भर करते रहते हैं और आप अच्छी तरह जानते हैं कि खाने के सामान को आज तक कभी भी भगवान द्वारा छूआ तक नहीं गया। भोजन कम कभी नहीं हुआ। फिर भी आप दावा करते हैं कि भगवान हर बार उसे खाते हैं और वह आपके लिए पवित्र प्रसाद हो जाता हैं जिसे आप श्रद्धापूर्वक स्वयं खाते हैं और लोगों में बांटते हैं कि इससे आपका कुछ भला होगा। अगर आपने उसे ईश्वर को नहीं चढ़ाया होता तो वह भोजन उतना अच्छा नहीं होता। क्या यह सब अंधविश्वास नहीं है?

मंदिर जाने का विचार ही मूलतः अंधविश्वास से परिपूर्ण है। आपका धर्म आपसे कहता है कि ईश्वर हर जगह निवास करता है। अगर यह सच है तो उससे मिलने के लिए आपको मनुष्य द्वारा निर्मित किसी इमारत तक क्यों जाना पड़ता है? हिन्दू धर्म के संदर्भ में कहें तो ईश्वर को उसे नहलाने-धुलाने, कपड़े पहनाने, खाना खिलाने और यहाँ तक कि उसकी रक्षा करने के लिए नौकरों की ज़रूरत क्यों पड़ती है? अगर वे नौकर उसकी ठीक तरह से देखभाल न करें, अगर उनके हाथ गंदे हों या अगर वे उसकी सेवा में कोई चूक कर दें तो समझा जाता है कि यह उनके लिए अशुभ होगा। क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है?

यह सब आपके धर्म का हिस्सा है लेकिन मैंने आपको बताया कि कैसे यह अंधविश्वास भी है। मैं एक और बात आपको बताता हूँ: आपका धर्म आपको मेरे जैसे लोगों से वाद-विवाद करने से रोकता भी है। अपने धर्मग्रंथ पढ़ें, वहाँ लिखा हुआ है! क्यों? क्योंकि आप, वैसे भी, कुछ सिद्ध नहीं कर पाएंगे। लेकिन धर्म पर विश्वास करने वाले इससे कोई सबक नहीं लेते। वे तर्क करते हैं और अपने प्रयास में दो-तीन बार असफल हो जाने के बाद पैर पीछे खींच लेते हैं और गोलमोल सी कुछ बातें कहते हैं, "ईश्वर की लीला अपरंपार है, रहस्यमय है", या "दिल में प्रेम हो तो भ्रम दूर हो जाते हैं और सब ठीक नज़र आता है!"

नहीं, वे कुछ नहीं सीखेंगे और यह भी अंधविश्वास का ही एक और चिह्न हैं। क्योंकि कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए आपको विश्वास ही करना पड़ता है, भले ही वह तर्कहीन और अक्सर गलत सिद्ध होने वाली बात ही क्यों न हो!

इस चर्चा के बाद आस्था और अंधविश्वास उतने भिन्न दिखाई नहीं देते! आपका क्या विचार है?

सम्पूर्ण विश्वास बहुत खतरनाक होता है, सिर्फ दिखावा कीजिए कि आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं 4 जुलाई 2013

कल जो दर्दनाक कहानी मैंने आपको बताई थी उस पर मीडिया और इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर काफी चर्चा हो रही है। बहुत से लोग यह कहकर कि वह व्यक्ति और वह परिवार अनपढ़ और मूर्ख था, सीधे-सीधे सारे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे। एक व्यक्ति ने कहा कि, ‘बहुत ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ और कुछ धार्मिक लोगों ने कहा कि उसे ईश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए थी। मैं इन बातों का और इससे संबन्धित कुछ दूसरी बातों का जवाब देना चाहता हूँ और, आप विश्वास करें या न करें, मैं उस व्यक्ति के इस आत्मघाती कदम के पीछे मौजूद कुछ स्वाभाविक तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

मैं, एक नास्तिक और अधर्मी, एक ऐसे व्यक्ति के समर्थन में क्यों सामने आना चाहता हूँ, जिसने ईश्वर के दर्शन की लालसा में अपनी और अपने परिवारवालों की हत्या कर दी हो? क्योंकि मुझे लगता है कि ईश्वर के अवतरित होने और उन्हें बचा लेने के विश्वास के बारे में धर्म ने उसे धोखा दिया है! उसकी यह मंशा कतई नहीं थी कि वह मर जाए या अपने परिवार की जान ले ले; वह तो पूरे विश्वास के साथ समझ रहा था कि उन्हें कुछ नहीं होगा, ईश्वर उन्हें बचा लेंगे।

जिन्होंने यह कहा कि वह व्यक्ति मूर्ख था, शायद यह नहीं जानते कि वह व्यक्ति अनपढ़ बिल्कुल नहीं था। वह एक स्वतंत्र (freelance) फोटोग्राफर था, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजने वाला समझदार व्यक्ति था। कम से कम इतना तो था ही कि वह कोई ग्रामीण अनपढ़ नहीं था जिसे आप कुछ भी कह दें और वह मान ले। नहीं, वह मूर्ख और अपढ़ नहीं था। आप उसे अंधविश्वासी कह सकते हैं, मगर बहुत से पढे-लिखे लोग अपने आपको धार्मिक और ईश्वर पर भरोसा करने वाला कहते हैं और अंधविश्वासी भी होते हैं, क्योंकि वे धर्मग्रंथों में वर्णित कथाओं पर विश्वास करते हैं।

और जब कोई कहे कि ‘ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ तो इस बात पर तो हंसी आए बगैर नहीं रहती, क्योंकि इसका तात्पर्य यह होता है कि थोड़ा-बहुत अंधविश्वासी होना ठीक है! आप इस व्यक्ति को ‘ज़्यादा अंधविश्वासी’ कहेंगे क्योंकि उसने जहर मिला हुआ प्रसाद अपने परिवार को खिला दिया था और विश्वास किया था कि ईश्वर उन्हें मरने नहीं देंगे। मगर सच्चाई यह है कि ईश्वर का प्रसाद ‘पवित्र’ होता है और उसे खाने से कुछ अच्छा हो सकता है, इतना समझना आपके विचार में उचित है! लेकिन क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है? आप भी, जब भी मंदिर जाते हैं तो प्रसाद लेना नहीं भूलते कि उससे आपका कुछ भला हो सकता है-उसने यह सोचा कि प्रसाद जहरीला होने के बावजूद प्रसाद है और उसे ग्रहण करने से उसका भला ही होगा। क्या दोनों बातों में कोई अंतर है?

अंधविश्वास के मूल में धर्म और उसकी कथाएँ हैं जिन्हें आप इस प्रकरण में साफ-साफ देख सकते हैं। धर्मग्रंथ यह कहते हैं कि उनमें लिखी कोई बात मिथ्या नहीं है और यह व्यक्ति दरअसल बहुत ज़्यादा धार्मिक था और धर्मग्रंथों में कही गई बातों पर अक्षरशः विश्वास करता था! ईश्वर पर और उसकी शक्ति पर उसका अटूट विश्वास था; इतना अधिक कि वह समझता था कि विषाक्त प्रसाद ग्रहण करने के बाद भी ईश्वर उसे बचा सकेंगे। यहाँ तक कि दूसरों के सामने अपने विश्वास को प्रमाणित करने के लिए वह सारी घटना की वीडियो शूटिंग भी कर रहा था। उसने वह सभी ग्रंथ पढ़ रखे थे जिनमें बताया गया था कैसे अपने भक्तों को ईश्वर बचा लेते हैं और वह उनके पदचिन्हों पर चल रहा था। आखिर उसकी हत्या किसने की? अंधविश्वास ने या सिर्फ अटूट श्रद्धा ने?

तो क्या आप सभी धार्मिक लोगों को उसे सच्चा आस्तिक मानकर, उसका सम्मान नहीं करना चाहिए? एक ऐसा व्यक्ति, जिसका विश्वास इतना गहरा था कि उसने जहर तक खा लिया? आप तो डर जाते, क्योंकि आपका ईश्वर पर पर्याप्त विश्वास नहीं है, इतना भरोसा नहीं है कि वह आपको जहर खाने के बाद भी बचा लेगा! जैसा इस व्यक्ति ने किया, अगर आप वैसा नहीं कर सकते तो यही कहा जा सकता है कि दरअसल आपमें ईश्वर और धर्मग्रंथों के प्रति सम्पूर्ण विश्वास और सम्मान है ही नहीं!

हम इस सच्ची कहानी से क्या सीख ले सकते हैं? शायद यह कि ईश्वर पर पूरी तरह विश्वास करना ठीक नहीं है क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं तो आप सोचते रह जाएंगे कि वह आकर आपको बचा लेगा और इधर आपकी जान चली जाएगी। हाँ, ईश्वर को आप मूर्ख बना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, यह कहकर कि मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ, जबकि आप खुद जानते हैं कि आप उस पर उतना विश्वास नहीं करते!

अगर धर्म को मानने का आपका यही तरीका है तो फिर मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय है कि आप अपने आप से और अपने ईश्वर से कितना झूठ बोलते हैं! अगर आप यही करना चाहते हैं तो कीजिए, लेकिन मुझे लगता है कि यह बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है। अगर आप अपने आपको धर्म-परायण कहते हैं तो आपको उस पर और धर्मग्रंथों में लिखी सभी बातों पर 100% विश्वास करना चाहिए, जैसा कि इस व्यक्ति ने किया।

मैं कहता हूँ कि ऐसे धर्मग्रंथों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए, विस्मृत कर दिया जाना चाहिए। ये धर्मग्रंथ ऐसे-ऐसे अंधविश्वास फैलाते हैं जिनके कारण परिवार उजड़ जाते हैं और जो लोगों की मौत का कारण बनते हैं। और जब मैं ऐसा कहूँ तो आपको मेरा विरोध भी नहीं करना चाहिए, बल्कि आगे इनकी पुनरावृत्ति न हो, इसके प्रयास में हाथ बटाना चाहिए, जिससे समाज को इनके दुष्प्रभावों से मुक्त किया जा सके!

कभी ईश्वर का अनुभव नहीं किया? कोई बात नहीं, ऐसे आप अकेले नहीं हैं! – 6 जून 2013

हम लोग अभी ल्युनेबर्ग में माइकल, अन्द्रेया और राफाइल के साथ उनके घर पर ठहरे हैं। मैं यहाँ इतनी बार आया हूँ, इतना खुशगवार समय यहाँ बिताया है कि पुनः यहाँ आकर मन गदगद हो गया। हमेशा की तरह इस बार भी माइकल और मैं उसके मरीजों का काम देख रहे हैं। उनमें से एक मरीज के साथ कल बड़ी मज़ेदार बातचीत हुई।

मैं कौन हूँ आदि परिचय की औपचारिकताओं के बाद माइकल के मरीज ने मुझसे पूछा: "क्या आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं?" मैंने कहा, "नहीं, अब नहीं करता।" स्वाभाविक ही अगला प्रश्न था, "क्यों नहीं?" और मेरा सीधा-सादा जवाब था: "क्योंकि मुझे उसकी अनुभूति नहीं होती।"

यह सच है, मुझे ईश्वर का कोई अनुभव नहीं हुआ है और दूसरों का अनुभव मेरे किसी काम का नहीं है। अगर मैं कहीं यह पढ़ लूँ कि ईसा मसीह ने ईश्वर से बात की या मोहम्मद पैगंबर ने ईश्वर का अनुभव किया या सूरदास या तुलसीदास को ईश्वर की अनुभूति हुई तो सिर्फ पढ़कर मैं ईश्वर पर विश्वास क्यों और कैसे करने लगूँ। यहाँ तक कि मेरा दोस्त भी कहे कि उसने ईश्वर का कई बार अनुभव किया है तो भी मैं यह नहीं कह सकता कि मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ- जब तक कि मैं खुद उसका अनुभव नहीं कर लेता! अगर आप डर रहे हैं तो यह ज़रूरी नहीं कि मैं भी डर जाऊँ। अगर आप भोजन करते हैं तो मेरा पेट नहीं भरता। इसी तरह सिर्फ इसलिए कि आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं मैं भी ईश्वर पर विश्वास करूँ यह मुझे मंजूर नहीं!

यहाँ हम इस बात पर बहस नहीं कर रहे हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं बल्कि इस बात पर कर रहे हैं कि ईश्वर का अनुभव हुआ या नहीं हुआ। अगर उसका अस्तित्व हो भी, तो मैंने तो उसका अनुभव नहीं किया और जब तक मुझे उसका अनुभव नहीं होता, मैं यह दावा करता रहूँगा कि जो आपने अनुभव किया और विश्वास किया कि वह ईश्वर ही था, महज आपका भ्रम है।

जी हाँ, मुझे लगता है कि धर्म ने ऐसा माहौल बना दिया है कि जब भी लोग किसी बात को समझ नहीं पाते, ईश्वर के अनुभव की बात करते हैं। धर्म ईश्वर की एक छवि निर्मित करता है, एक चित्र; और लोगों को बताता है कि किन परिस्थितियों में वे उसका अनुभव कर सकते हैं। वे पहले ही बता देते हैं कि यहाँ-यहाँ और ऐसे आपको ईश्वर का अनुभव होगा और इसलिए इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लोग अक्सर ईश्वर का अनुभव करते हैं। जब आप इन सुझावों के घेरे से बाहर निकलेंगे तब आपको भी वही अहसास हो सकेगा जो मुझे होता है: अर्थात, आपने जो अनुभव किया वह ईश्वर नहीं था भले ही धर्म कह रहा है कि आपने ईश्वर का ही अनुभव किया है।

बहुत से लोग कहते हैं कि जब आपका कोई करीबी मृत्यु को प्राप्त होता है तब आप ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं। जब छह माह पहले मेरी माँ का देहांत हुआ, मैं उसके पास ही था। मैंने यह अनुभव किया कि कैसे उसके प्राण उसके शरीर से बाहर निकल रहे थे, कैसे उसके अवयव भारी पड़ते जा रहे थे और कैसे उसका श्वास रुक गया। मैं वहीं था मगर मैंने ऐसा कुछ अनुभव नहीं किया कि ईश्वर उसकी आत्मा को उठाकर ले जा रहे हों, मैंने किसी फरिश्ते को नीचे उतरते नहीं देखा और न ही मैंने किसी छोटे प्रकाश पुंज को किसी विशाल प्रकाशपुंज में विलीन होते देखा। मैं पूरी रात उसके साथ था और उसके दाह संस्कार होने तक उसके साथ बना रहा मगर मुझे कोई ईश्वरीय अनुभूति नहीं हुई।

हो सकता है मेरे आसपास के कुछ लोगों ने अनुभव किया हो। हमारे कर्मचारियों में से कुछ धार्मिक लोगों ने या सबेरे से शोक प्रदर्शित करने आए लोगों में से किसी ने ऐसा कुछ ईश्वरीय अनुभव किया हो। अगर कोई ईश्वर का अनुभव करता है तो भी वह सिर्फ उसका अपना निजी अनुभव ही हो सकता है।

पर मेरी नज़र में वह उसका भ्रम भी हो सकता है, उसके दिमाग की उपज। उसके मस्तिष्क में दूसरों के अनुभवों की बहुत सी जानकारियाँ भरी होंगी कि ऐसे समय में कैसा अनुभव होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह जो अनुभव कर रहा है वह यथार्थ है। कोई नशेड़ी भी ऐसा ही अनुभव कर सकता है। वह फरिश्तों को देखता है, लोगों के और दूसरी चीजों के प्रभामंडल देखता है, यहाँ तक कि वह भी ईश्वर से संवाद कर सकता है। उसके बारे में आप कहेंगे कि वह नशे में है और उसके अनुभव वास्तविक नहीं हैं। आपके बारे में मैं यही कह सकता हूँ-आपकी भावप्रवणता ने, भावुकता ने आपको नशे की हालत में पहुंचा दिया है और आपका अनुभव वास्तविक नहीं है।

यही कारण है कि मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं करता। मैं प्रेम में विश्वास करता हूँ क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि कैसे प्रेम बड़े से बड़े, महत्वपूर्ण काम सम्पन्न कर सकता है। मैं महसूस करता हूँ कि प्रेम से ही सभी काम आगे बढ़ते हैं। शायद, जो आपके लिए ईश्वर है वही मेरे लिए प्रेम है। मैं उसका अनुभव करता हूँ और कहता हूँ कि वह मेरे लिए यथार्थ है- और जो कुछ भी आप अनुभव करते हैं वह आपके लिए यथार्थ है!