प्रियजन को खोना आपके विश्वास की जड़ों को हिला देता है – 12 अक्टूबर 2014

मेरा जीवन

मैंने आपको मेरी बहन, परा की सितम्बर 2006 में हुई मृत्यु का ज़िक्र करते हुए बताया था कि किस तरह हमारा पूरा परिवार बहुत दिनों तक उस सदमे से उबरने की कोशिश करता रहा। हिन्दू धर्म में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के पश्चात् कुछ धार्मिक कर्मकांड किए जाने आवश्यक माने जाते हैं। इन कर्मकांडो पर हमारी प्रतिक्रिया दर्शाती है कि किस हद तक परा की मृत्यु ने मेरे और मेरे परिवार के धार्मिक विश्वासों और हमारी आंतरिक दुनिया को बदलकर रख दिया था।

मेरे परिवार ने कर्मकांड करवाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं थीं। हममें से कोई भी दिखावे में यकीन नहीं रखता और हम पर दुखों का पहाड़ भी टूटा हुआ था लिहाजा कोई बड़ा कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया था। फिर भी उन्होंने कुछ परम्परागत कर्मकांड शुरू किए- और मैंने तुरंत अपनी नापसंदगी ज़ाहिर कर दी। सच बात तो यह है कि मैं अच्छा-ख़ासा नाराज़ हुआ। कोई भी काम मेरी बहन को वापस नहीं ला सकती थी! कितनी भी प्रार्थनाएँ आप कर लें, कितनी भी पूजा-अर्चनाएँ आप करवा लें, दान-दक्षिणाएँ दे लें, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। वह पुनर्जीवित नहीं होने वाली थी!

जब वह पुरोहित आया, जिसे सारे कर्मकांड निपटाने थे तो वास्तव में मैं बेहद क्रोधित हुआ और तुरंत उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया। स्वाभाविक ही पुरोहित स्तब्ध रह गया होगा मगर यह देखकर कि मैं उसे या मेरे परिवार वालों को किसी भी प्रकार का धार्मिक आयोजन करने देने वाला नहीं हूँ, वह चला गया। गुस्से के आवेग में मैंने साफ़-साफ़ कह दिया कि मेरे विचार में यह सब महज फूहड़ नौटंकी के सिवा कुछ भी नहीं है।

मेरे अभिभावकों की क्या प्रतिक्रिया रही और उन्होंने क्या महसूस किया, यह जानकार आप आश्चर्य करेंगे। मेरे पास यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि मुझे संसार में इससे अच्छा परिवार प्राप्त नहीं हो सकता था: उन्होंने मेरी बात मान ली। उन्होंने कोई तर्क नहीं किया, नाराज़ होने की तो बात ही छोड़िए। वे समझ गए कि मैं क्या कह रहा हूँ- और कोई एतराज़ नहीं जताया।

यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि मेरी बहन की मृत्यु ने मेरी और मेरे परिवार की धार्मिकता को झंझोड़कर रख दिया था। अगर हम तब भी गहरे धार्मिक विश्वासों में जकड़े होते तो हम उसकी आत्मा की और उसके मृत्यु उपरांत जीवन की चिंता कर रहे होते और भरसक अच्छे से अच्छे तरीके से और विशाल पैमाने पर सारे कर्मकांड आयोजित करवाते। लेकिन परा की मृत्यु ने बहुत कुछ बदल दिया था।

मेरी बहन की मृत्यु धार्मिक विश्वासों पर मेरी श्रद्धा टूटने के पीछे का एक प्रमुख कारण रहा। यह इतना बड़ा सदमा था कि उसने उन सारे स्तंभों को ढहा दिया, जिन पर मैं अटूट विश्वास रखता था। इतनी दुखद घटना होने पर छोटी बातों से शुरू करते हुए आप बहुत से विश्वासों पर पर प्रश्नचिह्न लगाना शुरू कर देते हैं: मैंने उसकी कुंडली का अध्ययन किया था और उसमें कहीं भी उसकी असामयिक मृत्यु का संकेत नहीं था! हमारे साथ यह कैसे हो सकता है- धर्म-कर्म से जुड़े एक ऐसे पक्के धार्मिक परिवार के साथ, जो दूसरों को भी धर्म में विश्वास करने का उपदेश देता रहा है? और उसके साथ- आखिर उसने ऐसा क्या किया था कि ईश्वर ने उसे ऐसी सज़ा का पात्र समझा?

स्वाभाविक ही, धर्म और रूढ़ियों से दूर होते जाने की यह कहानी एक दिन में संभव नहीं हुई थी। यह एक लम्बी प्रक्रिया थी, जिसे मैंने गुफा के अपने एकांतवास से बाहर आने के बाद शुरू किया था और जो उसके बाद कुछ सालों तक जारी रही थी। इस सफ़र में बहन की मृत्यु एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई थी। मैंने अपना गुरु का चोला उतार फेंका था और धर्म से दूरी बनाना शुरू कर चुका था; हालाँकि मुझमें आ रहे इस परिवर्तन के प्रति मैं जागरूक नहीं था और नहीं जानता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं ईश्वर को भी छोड़ दूँगा।

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