कभी ईश्वर का अनुभव नहीं किया? कोई बात नहीं, ऐसे आप अकेले नहीं हैं! – 6 जून 2013

हम लोग अभी ल्युनेबर्ग में माइकल, अन्द्रेया और राफाइल के साथ उनके घर पर ठहरे हैं। मैं यहाँ इतनी बार आया हूँ, इतना खुशगवार समय यहाँ बिताया है कि पुनः यहाँ आकर मन गदगद हो गया। हमेशा की तरह इस बार भी माइकल और मैं उसके मरीजों का काम देख रहे हैं। उनमें से एक मरीज के साथ कल बड़ी मज़ेदार बातचीत हुई।

मैं कौन हूँ आदि परिचय की औपचारिकताओं के बाद माइकल के मरीज ने मुझसे पूछा: "क्या आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं?" मैंने कहा, "नहीं, अब नहीं करता।" स्वाभाविक ही अगला प्रश्न था, "क्यों नहीं?" और मेरा सीधा-सादा जवाब था: "क्योंकि मुझे उसकी अनुभूति नहीं होती।"

यह सच है, मुझे ईश्वर का कोई अनुभव नहीं हुआ है और दूसरों का अनुभव मेरे किसी काम का नहीं है। अगर मैं कहीं यह पढ़ लूँ कि ईसा मसीह ने ईश्वर से बात की या मोहम्मद पैगंबर ने ईश्वर का अनुभव किया या सूरदास या तुलसीदास को ईश्वर की अनुभूति हुई तो सिर्फ पढ़कर मैं ईश्वर पर विश्वास क्यों और कैसे करने लगूँ। यहाँ तक कि मेरा दोस्त भी कहे कि उसने ईश्वर का कई बार अनुभव किया है तो भी मैं यह नहीं कह सकता कि मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ- जब तक कि मैं खुद उसका अनुभव नहीं कर लेता! अगर आप डर रहे हैं तो यह ज़रूरी नहीं कि मैं भी डर जाऊँ। अगर आप भोजन करते हैं तो मेरा पेट नहीं भरता। इसी तरह सिर्फ इसलिए कि आप ईश्वर पर विश्वास करते हैं मैं भी ईश्वर पर विश्वास करूँ यह मुझे मंजूर नहीं!

यहाँ हम इस बात पर बहस नहीं कर रहे हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं बल्कि इस बात पर कर रहे हैं कि ईश्वर का अनुभव हुआ या नहीं हुआ। अगर उसका अस्तित्व हो भी, तो मैंने तो उसका अनुभव नहीं किया और जब तक मुझे उसका अनुभव नहीं होता, मैं यह दावा करता रहूँगा कि जो आपने अनुभव किया और विश्वास किया कि वह ईश्वर ही था, महज आपका भ्रम है।

जी हाँ, मुझे लगता है कि धर्म ने ऐसा माहौल बना दिया है कि जब भी लोग किसी बात को समझ नहीं पाते, ईश्वर के अनुभव की बात करते हैं। धर्म ईश्वर की एक छवि निर्मित करता है, एक चित्र; और लोगों को बताता है कि किन परिस्थितियों में वे उसका अनुभव कर सकते हैं। वे पहले ही बता देते हैं कि यहाँ-यहाँ और ऐसे आपको ईश्वर का अनुभव होगा और इसलिए इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि लोग अक्सर ईश्वर का अनुभव करते हैं। जब आप इन सुझावों के घेरे से बाहर निकलेंगे तब आपको भी वही अहसास हो सकेगा जो मुझे होता है: अर्थात, आपने जो अनुभव किया वह ईश्वर नहीं था भले ही धर्म कह रहा है कि आपने ईश्वर का ही अनुभव किया है।

बहुत से लोग कहते हैं कि जब आपका कोई करीबी मृत्यु को प्राप्त होता है तब आप ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं। जब छह माह पहले मेरी माँ का देहांत हुआ, मैं उसके पास ही था। मैंने यह अनुभव किया कि कैसे उसके प्राण उसके शरीर से बाहर निकल रहे थे, कैसे उसके अवयव भारी पड़ते जा रहे थे और कैसे उसका श्वास रुक गया। मैं वहीं था मगर मैंने ऐसा कुछ अनुभव नहीं किया कि ईश्वर उसकी आत्मा को उठाकर ले जा रहे हों, मैंने किसी फरिश्ते को नीचे उतरते नहीं देखा और न ही मैंने किसी छोटे प्रकाश पुंज को किसी विशाल प्रकाशपुंज में विलीन होते देखा। मैं पूरी रात उसके साथ था और उसके दाह संस्कार होने तक उसके साथ बना रहा मगर मुझे कोई ईश्वरीय अनुभूति नहीं हुई।

हो सकता है मेरे आसपास के कुछ लोगों ने अनुभव किया हो। हमारे कर्मचारियों में से कुछ धार्मिक लोगों ने या सबेरे से शोक प्रदर्शित करने आए लोगों में से किसी ने ऐसा कुछ ईश्वरीय अनुभव किया हो। अगर कोई ईश्वर का अनुभव करता है तो भी वह सिर्फ उसका अपना निजी अनुभव ही हो सकता है।

पर मेरी नज़र में वह उसका भ्रम भी हो सकता है, उसके दिमाग की उपज। उसके मस्तिष्क में दूसरों के अनुभवों की बहुत सी जानकारियाँ भरी होंगी कि ऐसे समय में कैसा अनुभव होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह जो अनुभव कर रहा है वह यथार्थ है। कोई नशेड़ी भी ऐसा ही अनुभव कर सकता है। वह फरिश्तों को देखता है, लोगों के और दूसरी चीजों के प्रभामंडल देखता है, यहाँ तक कि वह भी ईश्वर से संवाद कर सकता है। उसके बारे में आप कहेंगे कि वह नशे में है और उसके अनुभव वास्तविक नहीं हैं। आपके बारे में मैं यही कह सकता हूँ-आपकी भावप्रवणता ने, भावुकता ने आपको नशे की हालत में पहुंचा दिया है और आपका अनुभव वास्तविक नहीं है।

यही कारण है कि मैं ईश्वर पर विश्वास नहीं करता। मैं प्रेम में विश्वास करता हूँ क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि कैसे प्रेम बड़े से बड़े, महत्वपूर्ण काम सम्पन्न कर सकता है। मैं महसूस करता हूँ कि प्रेम से ही सभी काम आगे बढ़ते हैं। शायद, जो आपके लिए ईश्वर है वही मेरे लिए प्रेम है। मैं उसका अनुभव करता हूँ और कहता हूँ कि वह मेरे लिए यथार्थ है- और जो कुछ भी आप अनुभव करते हैं वह आपके लिए यथार्थ है!

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