अलग-अलग आस्था रखने वाले मित्र – यह मित्रता कैसे निभ सकती है! 4 नवंबर 2014

मित्र

एक मुसलमान, एक हिन्दू, एक ईसाई, एक यहूदी और एक नास्तिक एक रेस्तराँ में जाते हैं। वे वहाँ बहुत मस्ती करते हैं, उनके बीच बड़ी अच्छी चर्चा होती है और वे उस शाम एक-दूसरे के सान्निध्य का भरपूर लुत्फ़ उठाते हैं। और उसके बाद वे सब घर जाकर सुकून के साथ सो जाते हैं।

मैंने ये पंक्तियाँ कहीं पढ़ीं और उन्हें पढ़कर मैं हँस पड़ा। आप सोचेंगे, अलग-अलग धर्मों के लोगों का यह जमावड़ा, जिसमें एक नास्तिक भी मौजूद है, काफी विध्वंसक हो सकता है। मगर ऐसा नहीं है- हम सब एक-दूसरे के साथ शांति के साथ रह सकते हैं, तब तक, जब तक कि हम एक-दूसरे को अपने विचारों से सहमत करने की कोशिश नहीं करते! अपने व्यक्तिगत जीवन में मैं इसी बात को तरजीह देता हूँ।

वाकई मैं किसी को अपनी बात पर सहमत करना नहीं चाहता। जी हाँ, अपने ब्लॉगों में और सोशल मीडिया पर मैं अपने विचार लिखता हूँ। अगर कोई व्यक्ति कुछ बातें पढ़ना नहीं चाहता तो उसे पढ़ने की ज़रुरत नहीं है। मैं नहीं चाहता और न ही किसी पर ज़बरदस्ती कर सकता हूँ कि मेरे शब्द पढ़े या सुने कि मैं क्या कह रहा हूँ। आपकी मर्ज़ी है तो साईट खोलिए और अगर कोई दूसरा विचार जानना चाहते हैं, भिन्न नज़रिए को समझना चाहते हैं तो आपका स्वागत है और हमारे बीच रोचक संवाद संभव हो सकता है। अगर नहीं, तो कोई बात नहीं, मुझे भी धर्म या धार्मिक आस्थाओं पर आपसे बात करने में कोई रुचि नहीं है!

मेरे कुछ दोस्त हैं, जो धार्मिक हैं। मैं उनके साथ उठता-बैठता हूँ और बाल-बच्चों के बारे में, काम-धंधे के बारे में या दैनिक जीवन के बारे में एक या दो घंटे बढ़िया गप-शप करता हूँ। मुझे धर्म का ज़िक्र तक छेड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती। बल्कि अगर वे शुरू भी करते हैं तो मुझे नागवार गुज़रता है क्योंकि हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि इस चर्चा की कोई मंजिल नहीं है।

जी हाँ, यह सच है। जो बहुत धार्मिक सोच रखता है उसके साथ मेरी बातचीत ज़्यादा गंभीर नहीं हो सकती क्योंकि हम अधिकतर विषयों पर पूरी तरह अलग-अलग विचार रखते हैं और उन पर अधिक विस्तार पूर्वक चर्चा करने में मुझे कतई कोई आनंद नहीं आ सकता। लेकिन अगर हमारे बीच प्रेम और मित्रता है तो उन विचार भिन्नताओं के बावजूद वह मित्रता बनी रह सकती है।

कुछ भी हो, मैं सामने वाले को किसी भी हालत में सहमत करने की कोशिश नहीं करूँगा, यहाँ तक कि उसके साथ किसी वाद-विवाद में भी नहीं उलझूँगा। अगर आप मेरा नज़रिया पूछेंगे तो मैं थोड़े से शब्दों में अपनी बात रख दूँगा। अगर आप कुछ अधिक जानना चाहेंगे तो बता दूँगा कि उस नज़रिए का कारण क्या है। अगर आप खुलकर बात करते हैं तो मुझे आपके साथ बात करके प्रसन्नता होगी। अगर आप अपनी बात पर अड़े रहते हैं और सिर्फ इसलिए मुझसे प्रश्न कर रहे हैं कि मेरा विरोध कर सकें, मेरे साथ तर्क-वितर्क कर सकें तो मुझे आपके साथ बात करने में कोई रुचि नहीं होगी। तब मैं शांत हो जाऊँगा, हो सकता है कहीं-कहीं सर हिला दूँ लेकिन कुल मिलाकर चर्चा जारी रखकर मैं बहुत खुश नहीं हो पाऊँगा। मैंने अपने विचार बताए क्योंकि आप जानना चाहते थे और आपने पूछा- कृपया मुझे अपने विचार तब तक न बताएँ जब तक मैं जानना न चाहूँ और आपसे न पूछूँ।

आप जिस बात पर विश्वास करना चाहते हैं, करें या जिस बात पर न करना चाहें, न करें मगर किसी दूसरे को मगर किसी दूसरे को परेशान न करें। अगर आप पसंद नहीं करते तो आप भी मेरा लिखा न पढ़े और न ही उससे परेशान या विचलित हों- और सिर्फ इसलिए कि आप मुझसे झगड़ना चाहते हैं, मुझे भी परेशान न करें!

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