आस्था और अंधविश्वास में कोई फर्क नहीं – अपनी आस्था पर विश्वास करना बंद करें! 5 जुलाई 2013

अन्धविश्वास

कल वाले विषय पर बहुत से धार्मिक व्यक्ति मुझसे कहते हैं कि मैं इन दो बातों को गड्ड-मड्ड कर रहा हूँ: आस्था और अंधविश्वास। मुझसे कहा जाता है कि मैं धार्मिक आस्था को अंधविश्वास न कहूँ क्योंकि दोनों में बहुत अंतर हैं और मुझे इन बातों को बारीकी से समझने के लिए दोनों के बीच के अंतर को समझना चाहिए। अपने ब्लॉग की आज की प्रविष्टि में मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं 'अंधविश्वास' शब्द को लेकर बिल्कुल गफलत में नहीं हूँ और न ही इस आस्था और अंधविश्वास के बीच कोई घालमेल करने की मेरी मंशा है। मैं इस बात को समझ रहा हूँ जो आप मुझसे कह रहे हैं लेकिन मैं आपसे यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मेरे विचार में धर्म और अंधविश्वास के बारे में आपके सभी विचार एक ही श्रेणी में रखे जा सकते हैं। कैसे, मैं समझाने की कोशिश करता हूँ।

यह तो स्पष्ट ही है कि ऐसी बातें सिर्फ धार्मिक और ईश्वर पर विश्वास करने वाले लोग ही किया करते हैं। क्यों? इसलिए कि उन्हें अंधविश्वासी समझा जाना अच्छा नहीं लगता! जब मैं कहता हूँ कि धार्मिक कृत्य दरअसल में अंधविश्वास ही हैं तो उन्हें बुरा लग जाता है। उनके अनुसार भगवान के चरणों में फूल चढ़ाना आस्था है जब कि दुष्ट शक्तियों से या बुरी नज़र से बचने के लिए दरवाजे पर नींबू और मिर्ची टांगना अंधविश्वास है! मेरी नज़र में, दोनों में कोई बहुत ज़्यादा अंतर नहीं है- दोनों ही बातें इस विश्वास पर आधारित हैं कि कोई न कोई अलौकिक शक्ति मौजूद है जो आपके इन कामों पर अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। आपको उस पर विश्वास करने के लिए कहा गया है, जब कि उसका कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। आपको किसी की पूजा करनी है जिसके अस्तित्व के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इसे आप आस्था कहते हैं और मैं कपोल-कल्पित कथा कहता हूँ।

इसी संदर्भ में मुझसे एक बार किसी ने पूछा कि क्या मंदिर जाना भी अंधविश्वास ही है। मैंने कहा कि आप स्वयं इसका उत्तर दे सकते हैं! मंदिर क्या है? वह एक घर या कमरे जैसा होता है जिसकी दीवारें सोने और चाँदी से मढ़ी होती हैं और बीचोंबीच पूजाघर होता है जहां एक सिंहासन पर पत्थर या सोने या चाँदी के भगवान विराजमान होते हैं। आप वहाँ जाते हैं और उस मूर्ति के सामने कुछ खाने का सामान रखते हैं और घंटी बजाते हैं। आप यह काम जीवन भर करते रहते हैं और आप अच्छी तरह जानते हैं कि खाने के सामान को आज तक कभी भी भगवान द्वारा छूआ तक नहीं गया। भोजन कम कभी नहीं हुआ। फिर भी आप दावा करते हैं कि भगवान हर बार उसे खाते हैं और वह आपके लिए पवित्र प्रसाद हो जाता हैं जिसे आप श्रद्धापूर्वक स्वयं खाते हैं और लोगों में बांटते हैं कि इससे आपका कुछ भला होगा। अगर आपने उसे ईश्वर को नहीं चढ़ाया होता तो वह भोजन उतना अच्छा नहीं होता। क्या यह सब अंधविश्वास नहीं है?

मंदिर जाने का विचार ही मूलतः अंधविश्वास से परिपूर्ण है। आपका धर्म आपसे कहता है कि ईश्वर हर जगह निवास करता है। अगर यह सच है तो उससे मिलने के लिए आपको मनुष्य द्वारा निर्मित किसी इमारत तक क्यों जाना पड़ता है? हिन्दू धर्म के संदर्भ में कहें तो ईश्वर को उसे नहलाने-धुलाने, कपड़े पहनाने, खाना खिलाने और यहाँ तक कि उसकी रक्षा करने के लिए नौकरों की ज़रूरत क्यों पड़ती है? अगर वे नौकर उसकी ठीक तरह से देखभाल न करें, अगर उनके हाथ गंदे हों या अगर वे उसकी सेवा में कोई चूक कर दें तो समझा जाता है कि यह उनके लिए अशुभ होगा। क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है?

यह सब आपके धर्म का हिस्सा है लेकिन मैंने आपको बताया कि कैसे यह अंधविश्वास भी है। मैं एक और बात आपको बताता हूँ: आपका धर्म आपको मेरे जैसे लोगों से वाद-विवाद करने से रोकता भी है। अपने धर्मग्रंथ पढ़ें, वहाँ लिखा हुआ है! क्यों? क्योंकि आप, वैसे भी, कुछ सिद्ध नहीं कर पाएंगे। लेकिन धर्म पर विश्वास करने वाले इससे कोई सबक नहीं लेते। वे तर्क करते हैं और अपने प्रयास में दो-तीन बार असफल हो जाने के बाद पैर पीछे खींच लेते हैं और गोलमोल सी कुछ बातें कहते हैं, "ईश्वर की लीला अपरंपार है, रहस्यमय है", या "दिल में प्रेम हो तो भ्रम दूर हो जाते हैं और सब ठीक नज़र आता है!"

नहीं, वे कुछ नहीं सीखेंगे और यह भी अंधविश्वास का ही एक और चिह्न हैं। क्योंकि कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए आपको विश्वास ही करना पड़ता है, भले ही वह तर्कहीन और अक्सर गलत सिद्ध होने वाली बात ही क्यों न हो!

इस चर्चा के बाद आस्था और अंधविश्वास उतने भिन्न दिखाई नहीं देते! आपका क्या विचार है?

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