जब मैं पारंपरिक विवाह समारोह में शिरकत करता हूँ तो क्या मैं दहेज प्रथा का समर्थन करता हूँ? 25 दिसंबर 2014

भारतीय संस्कृति

कल मैंने कुछ परिस्थितियों का वर्णन किया था, जिसमें मैंने कहा था कि यदि अस्पृश्यता और दहेज प्रथा जैसी हानिकारक और पूरी तरह अन्यायपूर्ण परम्पराओं का पालन न करने की बात हो तो हमें अपने आधुनिक विचारों पर अडिग रहना चाहिए। एक भारतीय ने कुछ दिन पहले मुझसे कहा कि वह भी पेशोपेश में है कि क्या उसकी परिस्थिति भी उसी श्रेणी में आती है। उसका मित्र विवाह कर रहा था और वह जानता था कि मित्र के विवाह में दहेज लिया जाएगा, जिसका वह दृढ़ता पूर्वक विरोध करता था। अब वह पेशोपेश में था कि क्या उसे अपने मित्र के विवाह में शामिल होना चाहिए या नहीं यानी क्या वह वहाँ जाकर दहेज प्रथा का समर्थन कर रहा होगा!

जब इस तरह के मामले सामने आते हैं तो कुछ लोग कहते हैं कि मैं बहुत सख्त हूँ। और वास्तव में मैं अपने शब्दों का शब्दशः पालन करता हूँ और जो लिखता हूँ या कहता हूँ, उस पर पूरा अमल करता हूँ। लेकिन साथ ही मैं इन दो स्थितियों में अंतर कर सकता हूँ कि कब अपने विश्वास या अविश्वास को सबके सामने रखना चाहिए और कब उनसे मुझे एक मित्र की तरह मिलना चाहिए क्योंकि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं।

मेरे विचार में यहाँ भी वही मामला है। अगर वह आपका घनिष्ठ मित्र है तो शायद आपने अपना मंतव्य ज़ाहिर कर दिया है। अगर वह आपका करीबी रिश्तेदार है और आपको इस मामले में उससे कुछ कहना है तो मैं कहूँगा कि आपको दहेज के इंतज़ाम या उसके ‘लेन-देन’ को रोकने के लिए, जो भी आपसे बन पड़े, करना ही चाहिए।

आप कितना भी करीबी रूप से दूल्हा या दुल्हन से जुड़े हों, दहेज के मुद्दे पर आपके विवाह समारोह में न जाने पर विवाह नहीं रुकने वाला। अगर आप रिश्तेदार नहीं हैं, करीबी मित्र भी नहीं हैं तो फिर आपको समारोह में बुलाने वाले इसका बुरा नहीं मानेंगे बल्कि हो सकता है आपके न आने को नोटिस तक न लें और तब आपका विरोध अलक्षित रह जाएगा। अगर आप करीबी रिश्तेदार या मित्र हैं तो आपके न आने पर वे विचलित होंगे और उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी और आप उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे होंगे।

आपका यह व्यवहार आपके आपसी रिश्तों को तो नुकसान पहुँचाएगा मगर आपके मित्रों या रिश्तेदारों को अपनी दकियानूसी और नुकसानदेह परंपराओं का पालन करने से नहीं रोक पाएगा। जब आप उनके सामने अपने विचार रखकर कुछ नहीं कर पाए तो ऐसा करके भी कुछ हासिल नहीं कर पाएँगे।

और यहाँ मैं आपसे यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है: आपका अहं, जोकि उनके द्वारा आपके विचारों का अनुपालन न करने के कारण आहत हुआ है या उनके प्रति आपका स्नेह? आपका विश्वास या आपकी मित्रता?

मेरे विचार से विवाह में आपका सम्मिलित होना उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण, उनके लिए सबसे सुखद और आत्मीय अवसर पर आपका उनके साथ रहना है! उनके प्रेम में सहभागी होने के लिए आप एक शाम इस बात को भुलाकर कि उनके विचार आपसे नहीं मिलते या वे दक़ियानूसी और नुकसानदेह हैं, उनके साथ मिलकर सिर्फ अवसर का आनंद उठाएँ!

इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आपको पूरे समय वहाँ बैठकर सारे कर्मकांडों में उपस्थित रहना है, अगर आप उस अवसर के धार्मिक अंशों के विरुद्ध हैं तो उनसे दूर रहिए! यह आवश्यक नहीं है और यदि वे आपका नज़रिया जानते हैं तो कोई भी इस बात से परेशान नहीं होगा कि आप विवाह समारोह के उस हिस्से में अनुपस्थित रहे। लेकिन पार्टी में वे आपको अवश्य ही मिस करेंगे-और निश्चय ही आप भी उन्हें मिस करेंगे!

तो ऐसे सवालों से अपने आपको परेशान करने की ज़रूरत नहीं है, जो आपकी दिली इच्छा हो वही कीजिए और अपने परिवार और दोस्तों के साथ खुला व्यवहार कीजिए! जीवन का आनंद लीजिए-उसे बहुत ज़्यादा जटिल मत बनाइए!

और उसी जज़्बे के साथ, भले ही मेरा क्रिसमस से या उसकी परम्पराओं से या उसके महत्व से कोई लेना-देना नहीं है, मैं अपने पाठकों और मित्रों के लिए, जिन्होंने कल या आज क्रिसमस मनाया या कल मनाएँगे, क्रिसमस की शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ कि उनके जीवन में सदा सुख-शांति बनी रहे! अपनी छुट्टियाँ और त्योहार मनाते रहें, परिवार वालों को खूब गले लगाएँ और ज़्यादा खाना न खाएँ भले ही वह कितना भी सुस्वादु क्यों न हो!

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