सम्पूर्ण विश्वास बहुत खतरनाक होता है, सिर्फ दिखावा कीजिए कि आप ईश्वर पर भरोसा करते हैं 4 जुलाई 2013

कल जो दर्दनाक कहानी मैंने आपको बताई थी उस पर मीडिया और इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर काफी चर्चा हो रही है। बहुत से लोग यह कहकर कि वह व्यक्ति और वह परिवार अनपढ़ और मूर्ख था, सीधे-सीधे सारे मामले पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे। एक व्यक्ति ने कहा कि, ‘बहुत ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ और कुछ धार्मिक लोगों ने कहा कि उसे ईश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए थी। मैं इन बातों का और इससे संबन्धित कुछ दूसरी बातों का जवाब देना चाहता हूँ और, आप विश्वास करें या न करें, मैं उस व्यक्ति के इस आत्मघाती कदम के पीछे मौजूद कुछ स्वाभाविक तर्क प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

मैं, एक नास्तिक और अधर्मी, एक ऐसे व्यक्ति के समर्थन में क्यों सामने आना चाहता हूँ, जिसने ईश्वर के दर्शन की लालसा में अपनी और अपने परिवारवालों की हत्या कर दी हो? क्योंकि मुझे लगता है कि ईश्वर के अवतरित होने और उन्हें बचा लेने के विश्वास के बारे में धर्म ने उसे धोखा दिया है! उसकी यह मंशा कतई नहीं थी कि वह मर जाए या अपने परिवार की जान ले ले; वह तो पूरे विश्वास के साथ समझ रहा था कि उन्हें कुछ नहीं होगा, ईश्वर उन्हें बचा लेंगे।

जिन्होंने यह कहा कि वह व्यक्ति मूर्ख था, शायद यह नहीं जानते कि वह व्यक्ति अनपढ़ बिल्कुल नहीं था। वह एक स्वतंत्र (freelance) फोटोग्राफर था, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजने वाला समझदार व्यक्ति था। कम से कम इतना तो था ही कि वह कोई ग्रामीण अनपढ़ नहीं था जिसे आप कुछ भी कह दें और वह मान ले। नहीं, वह मूर्ख और अपढ़ नहीं था। आप उसे अंधविश्वासी कह सकते हैं, मगर बहुत से पढे-लिखे लोग अपने आपको धार्मिक और ईश्वर पर भरोसा करने वाला कहते हैं और अंधविश्वासी भी होते हैं, क्योंकि वे धर्मग्रंथों में वर्णित कथाओं पर विश्वास करते हैं।

और जब कोई कहे कि ‘ज़्यादा अंधविश्वासी होना ठीक नहीं है’ तो इस बात पर तो हंसी आए बगैर नहीं रहती, क्योंकि इसका तात्पर्य यह होता है कि थोड़ा-बहुत अंधविश्वासी होना ठीक है! आप इस व्यक्ति को ‘ज़्यादा अंधविश्वासी’ कहेंगे क्योंकि उसने जहर मिला हुआ प्रसाद अपने परिवार को खिला दिया था और विश्वास किया था कि ईश्वर उन्हें मरने नहीं देंगे। मगर सच्चाई यह है कि ईश्वर का प्रसाद ‘पवित्र’ होता है और उसे खाने से कुछ अच्छा हो सकता है, इतना समझना आपके विचार में उचित है! लेकिन क्या यह भी अंधविश्वास नहीं है? आप भी, जब भी मंदिर जाते हैं तो प्रसाद लेना नहीं भूलते कि उससे आपका कुछ भला हो सकता है-उसने यह सोचा कि प्रसाद जहरीला होने के बावजूद प्रसाद है और उसे ग्रहण करने से उसका भला ही होगा। क्या दोनों बातों में कोई अंतर है?

अंधविश्वास के मूल में धर्म और उसकी कथाएँ हैं जिन्हें आप इस प्रकरण में साफ-साफ देख सकते हैं। धर्मग्रंथ यह कहते हैं कि उनमें लिखी कोई बात मिथ्या नहीं है और यह व्यक्ति दरअसल बहुत ज़्यादा धार्मिक था और धर्मग्रंथों में कही गई बातों पर अक्षरशः विश्वास करता था! ईश्वर पर और उसकी शक्ति पर उसका अटूट विश्वास था; इतना अधिक कि वह समझता था कि विषाक्त प्रसाद ग्रहण करने के बाद भी ईश्वर उसे बचा सकेंगे। यहाँ तक कि दूसरों के सामने अपने विश्वास को प्रमाणित करने के लिए वह सारी घटना की वीडियो शूटिंग भी कर रहा था। उसने वह सभी ग्रंथ पढ़ रखे थे जिनमें बताया गया था कैसे अपने भक्तों को ईश्वर बचा लेते हैं और वह उनके पदचिन्हों पर चल रहा था। आखिर उसकी हत्या किसने की? अंधविश्वास ने या सिर्फ अटूट श्रद्धा ने?

तो क्या आप सभी धार्मिक लोगों को उसे सच्चा आस्तिक मानकर, उसका सम्मान नहीं करना चाहिए? एक ऐसा व्यक्ति, जिसका विश्वास इतना गहरा था कि उसने जहर तक खा लिया? आप तो डर जाते, क्योंकि आपका ईश्वर पर पर्याप्त विश्वास नहीं है, इतना भरोसा नहीं है कि वह आपको जहर खाने के बाद भी बचा लेगा! जैसा इस व्यक्ति ने किया, अगर आप वैसा नहीं कर सकते तो यही कहा जा सकता है कि दरअसल आपमें ईश्वर और धर्मग्रंथों के प्रति सम्पूर्ण विश्वास और सम्मान है ही नहीं!

हम इस सच्ची कहानी से क्या सीख ले सकते हैं? शायद यह कि ईश्वर पर पूरी तरह विश्वास करना ठीक नहीं है क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं तो आप सोचते रह जाएंगे कि वह आकर आपको बचा लेगा और इधर आपकी जान चली जाएगी। हाँ, ईश्वर को आप मूर्ख बना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, यह कहकर कि मैं तुम पर पूरा विश्वास करता हूँ, जबकि आप खुद जानते हैं कि आप उस पर उतना विश्वास नहीं करते!

अगर धर्म को मानने का आपका यही तरीका है तो फिर मेरे लिए यह आश्चर्य का विषय है कि आप अपने आप से और अपने ईश्वर से कितना झूठ बोलते हैं! अगर आप यही करना चाहते हैं तो कीजिए, लेकिन मुझे लगता है कि यह बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है। अगर आप अपने आपको धर्म-परायण कहते हैं तो आपको उस पर और धर्मग्रंथों में लिखी सभी बातों पर 100% विश्वास करना चाहिए, जैसा कि इस व्यक्ति ने किया।

मैं कहता हूँ कि ऐसे धर्मग्रंथों को नष्ट कर दिया जाना चाहिए, विस्मृत कर दिया जाना चाहिए। ये धर्मग्रंथ ऐसे-ऐसे अंधविश्वास फैलाते हैं जिनके कारण परिवार उजड़ जाते हैं और जो लोगों की मौत का कारण बनते हैं। और जब मैं ऐसा कहूँ तो आपको मेरा विरोध भी नहीं करना चाहिए, बल्कि आगे इनकी पुनरावृत्ति न हो, इसके प्रयास में हाथ बटाना चाहिए, जिससे समाज को इनके दुष्प्रभावों से मुक्त किया जा सके!

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