कल मैंने बताया था कि हमारे कुछ कर्मचारी काम छोड़ कर चले गए क्योंकि वे चेचक से पीड़ित हो गए थे। जब मैंने इस बारे में सोशल मीडिया में लिखा तो प्रत्युत्तर में मुझे बहुत सा फीडबैक मिला। कल मैंने यह भी बताया था कि कुछ लोगों ने मुझसे पूछा कि मैंने उन्हें डॉक्टर के यहाँ क्यों भेजा, जबकि कुछ लोगों ने एक अन्य प्रश्न पर अपनी उलझन व्यक्त की: जब उन्होंने बिना दवा खाए स्वस्थ होकर वापस आने की अनुमति चाही तो हमने उन्हें इंकार कर दिया। क्यों?
अपने इस निर्णय के कारण मुझ पर आरोप लगाए गए कि मैंने सिर्फ इसलिए किसी का रोजगार छीन लिया कि वे उस बात पर विश्वास नहीं करते थे, जिस पर मैं करता हूँ। सबसे पहले मैं इस आरोप का जवाब देना चाहता हूँ। वास्तव में, साधारणतया मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे कर्मचारी किन बातों पर विश्वास करते हैं। वे हिन्दू हों, ईसाई हों, मुसलमान या नास्तिक हों-यह उनकी अपनी मर्ज़ी है और न तो मैं इस बारे में कभी पूछता हूँ और न ही इस मामले में कोई हस्तक्षेप करता हूँ। दुनिया को देखने की उनकी समझ का उनके काम की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता। मैं इस मामले में बहुत पेशेवर रवैया अपनाता हूँ और उनसे भी यही अपेक्षा रखता हूँ।
हमारे आश्रम के, सब नहीं तो अधिकतर कर्मचारी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि हम लोग धार्मिक बिलकुल नहीं हैं। वे यह भी जानते हैं कि हमारे परिवार में सिर्फ एक पूजा करने वाला व्यक्ति है और वह है हमारी नानी। उनका एक पूजाघर भी है, जिसे सिर्फ वही इस्तेमाल करती हैं। वे यह भी जानते हैं कि बड़े से बड़े धार्मिक त्योहारों में भी हम कोई धार्मिक आयोजन नहीं करते और उपवास के दिन भी हम सामान्य रूप से भोजन करते हैं। इसके अलावा आप किसी प्रकार के धार्मिक या जातिगत लक्षण हमारे यहाँ नहीं पाएंगे। लेकिन उन्हें अपनी धार्मिक पूजा-अर्चना करने से हम नहीं रोकते।
यह आपसी समझ दैनंदिन के कार्य-व्यवहार को सुचारु रूप से चलाने में बड़ी सहायक है और कभी कोई समस्या पेश नहीं आती। लेकिन अब हमने बहुत सोच-समझकर एक निर्णय लिया है: यह सही है कि किसी कर्मचारी के विश्वास पर हम कोई असर नहीं डालना चाहते और न ही उनके विश्वास पर कोई निर्णय सुनाना चाहते हैं लेकिन हमारे आश्रम में बहुत से छोटे-छोटे बच्चे रहते हैं, जिनके प्रति हमारी कुछ ज़िम्मेदारियाँ है। इन बच्चों को हमारे यहाँ सिर्फ इसलिए नहीं भेजा गया है कि हम उनके खाने, कपड़े और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करें बल्कि इसलिए भी कि हम उन्हें शिक्षित करें-स्कूल में और घर में भी। आचार-व्यवहार और नैतिक शिक्षा ऐसे विषय हैं, जिन्हें बच्चे अपने घर में व्यवहृत संस्कृति से सीखते हैं और आश्रम इन बच्चों का घर ही है।
हम खुले विचारों वाले लोग हैं और लोगों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील और सहिष्णु हैं। ये बच्चे आसपास मौजूद सांस्कृतिक माहौल से हिन्दू धर्म के बारे में जानेंगे। लेकिन जब यह धर्म खतरनाक अंधविश्वास की ओर बढ़ने लगे तो उसकी एक सीमा तय करना आवश्यक है। हम समझते हैं कि इसी बिन्दु पर हमें दखल देना चाहिए और अपने वचनों और कार्यों से उन्हें बताना चाहिए कि वे चीजों को वैज्ञानिक दृष्टि से देखना सीखें, और यह भी कि दवा और आपके भीतर मौजूद नैसर्गिक शक्ति के कारण बीमारी ठीक होती है न कि पूजा-पाठ और कर्मकांडों से!
हम समझते हैं कि अगर हमारे दो कर्मचारी दवा न लेने का निर्णय लेकर हमें छोड़ कर चले जाएँ और फिर हमारी सम्मति के साथ वापस भी आ जाएँ तो यह बात बच्चों पर गलत असर डालेगी। वही दवा उन बच्चों को भी खानी पड़ी थी। वे कर्मचारी आएंगे और उन्हें अपने अंधविश्वासों की शिक्षा देंगे और जब बच्चे कहेंगे कि उन्होंने भी वे दवाएँ खाई हैं तो यह सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि उन्होंने दवाइयाँ खाकर गलत काम किया है। जिन्होंने दवाइयों का अच्छा असर अपनी आँखों से देखने के बाद भी दवाइयाँ नहीं खाईं और अपने विश्वास की खातिर नौकरी तक छोड़ दी, वे लोग अब और भी ज़्यादा ढीठ और अड़ियल हो चुके होंगे और पूरी शक्ति के साथ दवाओं के विरुद्ध बातें करेंगे और बच्चों पर यह असर डालेंगे कि हमेशा डॉक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती और दूसरी ऊलजलूल बातें भी उनके कोमल मस्तिष्क में ठूँसने की कोशिश करेंगे।
अगर अंधविश्वास अज्ञान के चलते हुआ है तो फिर भी एक बात है मगर जब उस पर अर्थहीन ज़िद्द और अन्धी रूढ़ियों का मुलम्मा भी चढ़ जाए तो यह बहुत ही बुरा होता है। और हम बच्चों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को बहुत गंभीरता से लेते हैं-इसलिए हम उन्हें अंधे, रूढ़िवादी विश्वासों से दूर ही रखना चाहते हैं!
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