नास्तिकों के लिए निर्णय लेना और ज़िम्मेदारी स्वीकार करना क्यों आसान होता है? 30 जुलाई 2015

नास्तिकता

स्वाभाविक ही, पिछले सप्ताह इतने सारे नास्तिकों के साथ एक साथ समय गुज़ारने के बाद, उनके साथ हुए कुछ अनुभव विशेष रूप से याद रह जाते हैं। एक बात यह कि सामान्य रूप से वे ज़िम्मेदारियाँ निभाने और निर्णय लेने के मामले में, मेरे मुलाकाती आस्तिकों की तुलना में, अधिक प्रस्तुत नज़र आते हैं। और यह बात मुझे बहुत सहज, स्वाभाविक और तर्कपूर्ण लगती है!

कल का ही उदाहरण लेना हो तो, किसी दुर्घटना के बाद एक नास्तिक तुरंत सहायता के लिए तत्पर दिखाई देता है, जबकि एक आस्तिक डर के मारे इसमें व्यवधान उपस्थित करता है। ऐसे नास्तिक अक्सर मिलते हैं, जो त्वरित निर्णय लेकर अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी लेने के किए तैयार हो जाते हैं, जिससे किसी ज़रूरतमंद की मदद की जा सके।

मेरा मानना है कि नास्तिक आसानी से ऐसा कर पाते हैं क्योंकि वे पहले ही कंटीली राहों से गुज़रकर यहाँ तक पहुँचे होते हैं। काफी विचार मंथन के बाद वे इस निर्णय पर पहुँचे होते हैं कि उसी बात पर भरोसा करें, जिसका वे शिद्दत के साथ खुद महसूस करते हैं, उस पर नहीं, जो उन्हें उनका परिवार बताता है या परंपरा से उन्होंने सीखा है। आपके करीबी मित्र और रिश्तेदार या दूसरे लोग जो सोच रहे हैं या कर रहे हैं, उससे अलग कुछ करना आसान नहीं है। आपके पास दृढ़निश्चय, इतनी संकल्प शक्ति और प्रवाह के विपरीत चलने पर आने वाली मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। इसलिए एक भारतीय नास्तिक निश्चित ही ऐसा व्यक्ति ही होगा, जिसमें ये सारे गुण मौजूद हों। ऐसा व्यक्ति ही नास्तिक हो सकता है!

इस तरह, भारत के नास्तिक इन सब दिक्कतों का सामना पहले ही कर चुके होते हैं और जानते हैं कि उनके चारों ओर मौजूद कठिनाइयों के बावजूद वे मज़बूती के साथ पैर जमाए खड़े हैं। वे अपनी बुद्धि का प्रयोग करते हुए हर समस्या से निपटने के लिए तैयार होते हैं।

इसके विपरीत धार्मिक लोगों का रवैया अक्सर बिलकुल दूसरा होता है: सब कुछ वे ईश्वर पर छोड़ देते हैं। अपने इस विश्वास के चलते कि सब कुछ ईश्वर की मर्ज़ी से होता है, जब त्वरित निर्णय लेना आवश्यक होता है, वे अक्सर अनिच्छुक, बल्कि निष्क्रिय बने रहते हैं। ज़्यादातर आस्थावान लोग किसी समस्या का हल निकालने की ओर स्वतः प्रवृत्त नहीं होते क्योंकि उनका विश्वास होता है कि आखिर समस्या भी ईश्वर प्रदत्त है। समस्या तो होगी ही, समस्या बहुत मुश्किल भी होगी- क्योंकि वह ईश्वर की देन है! ईश्वर परीक्षा लेता है! वे अपनी सामान्य दिनचर्या से बाहर नहीं निकलते क्योंकि वे एक काल्पनिक शक्ति पर निर्भर होते हैं।

इसके अलावा वे भयभीत भी होते हैं। धर्म का सारा कारोबार ही लोगों के भय पर आधारित है। डर न हो तो वह भरभराकर गिर जाएगा। अगर नर्क का डर न हो तो कोई स्वर्ग पर भी विश्वास नहीं करेगा! आपके पाप, पापों के लिए नियत दंड, पश्चाताप और उसके चारों ओर निर्मित बाकी सब कुछ भी! ये सब डर पैदा करने के औज़ार हैं। और एक बार आप डर के आदी हुए तो फिर हमेशा हमेशा के लिए वह आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। जब आप कोई दुर्घटना होते हुए देखते हैं तो आप डर जाते हैं। आप घायल व्यक्ति कि मदद करने के बारे में नहीं सोचते बल्कि आपके मन में दुर्घटना के चलते हो सकने वाली दिक्कतों से अपने आपको बचाने का खयाल आता है!

धार्मिक लोग मुश्किल वक़्त में अपने ईश्वर का आह्वान करते हैं कि वह उन्हें सही निर्णय लेने की शक्ति दे, उचित राह दिखाए। उनका विश्वास होता है कि ईश्वर अवश्य ही कोई न कोई राह निकालेगा-लेकिन मैंने देखा है कि ईश्वर के भरोसे बैठे हुए वे लोग अक्सर कोई निर्णय ही नहीं ले पाते, आगे बढ़कर खुद कुछ करने की जगह वे किसी दैवी शक्ति के निर्देश का इंतज़ार करते रहते हैं, जो कभी सामने नहीं आता!

निश्चित ही, हर चीज़ के अपवाद होते हैं लेकिन सामान्य रूप से लोगों के इस रवैये को मैंने अक्सर नोटिस किया है। भविष्य में इस नजरिए से आस्तिकों और नास्तिकों के रवैयों पर नज़र रखें, आपको भी अंतर स्पष्ट नज़र आएगा!

यहाँ आप नास्तिकों के सम्मेलन के चित्र देख सकते हैं

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