कैसे सतत मार्गदर्शन बच्चों के विकास में बाधा पहुँचाता है – 11 अगस्त 2015

अपरा खेल रही थी और मैं और रमोना हमेशा की तरह बच्चों के लालन-पालन संबंधी विषयों पर चर्चा करने लगे कि कैसे आज जो आप बच्चों के साथ कर रहे हैं, उसका भविष्य में उन पर कितना गहरा असर पड़ता है। इस बार हमारी चर्चा इस ओर मुड़ गई कि बच्चों को यह निर्देश देने में कि वे क्या करें या न करें और उन्हें उनकी मर्ज़ी से कुछ भी करने की स्वतंत्रता देने के बीच क्या अंतर है।

मेरा विश्वास है कि दोनों के मध्य तालमेल बनाए रखने की ज़रूरत है लेकिन हम दोनों के दो भिन्न देशों और उनकी संस्कृतियों के बीच तुलना करते हुए हमने पाया कि दोनों ही परिस्थितियों में कई लोग अति कर देते हैं।

अगर आप भारतीय परिवारों में जाएँ तो कई बार आपको पता चलेगा कि घर में वयस्क सदस्य मौजूद हैं लेकिन वे बच्चों के साथ कोई चर्चा नहीं करते, उनके साथ विशेष मेलजोल नहीं रखते। माँ घर के कामकाज निपटा रही होती है, दूसरे सदस्य चर्चा कर रहे होते हैं और बच्चे अपनी मनमर्ज़ी से खेलकूद में लगे होते हैं या इधर-उधर मटरगश्ती कर रहे होते हैं। वे अपने खेल खुद चुनते हैं, उनके खिलौने उनके अपने हैं और कुल मिलाकर बिना किसी निर्देश के वे अपना पूरा समय बिताते हैं- वही तयशुदा खेल या अपवादस्वरूप कोई वयस्क उनके साथ खेलने वाला।

कभी-कभी, और खासकर अनपढ़ परिवारों में, इसके बड़े खतरनाक परिणाम निकलकर आते हैं! बच्चे अपने परिवेश की जाँच-परख करते हैं- परिवेश, जो आवश्यक नहीं कि बच्चों के लिए पूर्ण सुरक्षित हो- और गंभीर शारीरिक चोटें खा बैठते हैं। अगर कोई वयस्क उस समय उनके साथ होता या दूर से ही सही, सिर्फ उनकी ओर ध्यान दे रहा होता तो दुर्घटना टल सकती थी। संयुक्त परिवारों में भी, जहाँ काफी वयस्क और बुज़ुर्ग मौजूद होते हैं और जिनमें से कोई एक बच्चों का ध्यान रख सकता है, ऐसी दुर्घटनाएँ होती रहती हैं।

इसके विपरीत, पश्चिम में मैंने देखा है कि बच्चे हर वक़्त किसी न किसी की नज़र में होते हैं और अधिकतर किसी न किसी वयस्क के साथ मिलकर सक्रिय रूप से कुछ न कुछ कर रहे होते हैं। इससे किसी संभावित दुर्घटना की रोकथाम हो जाती है और वयस्क को भी बच्चे के अंदर छिपी प्रतिभा को जानने और उसे आगे विकसित करने का मौका मिल जाता है।

बहुत छोटी उम्र से ही वहाँ खेलने का बंधा-बंधाया समय होता है। वयस्क उनके खिलौने तैयार करके उन्हें देते हैं कि उन्हीं से खेलें और वे उनसे खेलते हैं और अभिभावक लगातार उन्हें बताते रहते हैं कि कैसे खेलना है या कैसे उनका इस्तेमाल करना है। फिर बच्चे किंडरगार्टेन और स्कूल में पढ़ने जाने लगते हैं, जहाँ सब कुछ बंधा-बंधाया ही होता है। स्कूल से लौटने के पश्चात वाद्ययंत्र सीखने की कक्षाएँ या खेल-कूद का नियत समय होता है और निश्चित ही होमवर्क तो करना ही करना होता है। हर बात के स्पष्ट निर्देश होते हैं कि कब, कैसे और किस क्रम में उन्हें किया जाना है। यहाँ तक कि दोस्तों के साथ खेलने के नियत दिनों में भी मैंने देखा है कि अभिभावक बच्चों को क्या खेलना चाहिए, यह बताना आवश्यक समझते हैं।

बहुत ज़्यादा मार्गदर्शन के साथ मैं जो समस्या देखता हूँ वह यह है कि उससे बच्चे दूसरों के कहे अनुसार काम करने के इतने आदी हो जाते हैं कि वे यह भी नहीं जान पाते कि वास्तव में वे खुद क्या करना चाहते हैं! खास कर परंपरागत शिक्षा विधियों और सख्त लालन-पालन के तरीकों के चलते उन्हें खुद कुछ करके देखने और खोज-बीन करते हुए आगे बढ़ने की कोई प्रेरणा या प्रोत्साहन नहीं मिल पाता! वे गिरते नहीं हैं या गिर नहीं सकते और इसलिए जानते ही नहीं हैं कि गिरने पर चोट लगती है। उन्हें खुद निर्णय लेने का मौका ही नहीं मिल पाता। और फिर वे यह भी समझ नहीं पाते कि वास्तव में वे क्या करना चाहते हैं!

ऐसी हालत में हम बड़ी तादात में ऐसे युवाओं को देखते हैं, जो वास्तव में यह भी नहीं जानते कि अपने समय का क्या सदुपयोग किया जाए। वे स्कूल से पढ़कर निकले हुए युवा बच्चे होते हैं, जो अब भी मार्गदर्शन के लिए अभिभावकों का मुँह जोहते हैं कि वे बताएँ कि नौकरी के लिए कहाँ आवेदन किया जाना ठीक होगा या किसी शिक्षक का, जो यह बताए कि अपने जीवन का आगे क्या किया जाना चाहिए। उन्हें बताई गई बातों का ही वे अनुसरण करते हैं क्योंकि वे उसी में आसानी महसूस करते हैं।

मुझे लगता है कि हमें बच्चों को स्वतन्त्रता पूर्वक अपनी मर्ज़ी से विकसित होने की आज़ादी देनी चाहिए। उनका मार्गदर्शन बहुत सहजता के साथ किया जाना चाहिए कि वे सीखें अवश्य लेकिन उनके लिए इतना मौका भी छोड़ना चाहिए कि वे समझ सकें कि वे क्या सीखना चाहते हैं! हमें उनकी सुरक्षा का खयाल अवश्य रखना चाहिए मगर इस तरह कि बिना किसी व्यवधान के वे खुद अपने अनुभव प्राप्त कर सकें।

अपनी साढ़े तीन साल की बच्ची, अपरा के बगैर पहली बार माँ और पा – 14 जुलाई 2015

कल मैंने आपको अपरा के पहले लंबे सफर के बारे में बताया था, जिसमें हम दोनों साथ नहीं थे: तीन दिन और दो रातें- अपने चाचा और परनानी के साथ खजुराहो घूमने! उसका समय तो बड़ा शानदार गुज़रा- लेकिन हमारा क्या? माँ और पा की क्या हालत हुई?

मैंने पहले ही बताया कि जाने से पहले हमने अपरा से अच्छी तरह बात कर ली थी कि रात को उसे हमारे बगैर सोना होगा। हम जानते थे कि उसके लिए यह सबसे मुश्किल वक़्त होगा। हमने उसे समझाया कि हम वहाँ उसके साथ नहीं होंगे और वह हमारे पास तुरंत आ भी नहीं सकेगी- लेकिन वह निश्चिंत थी कि उसे कुछ नहीं होगा, कोई परेशानी नहीं होगी। हम जानते थे कि दिन में वह हमें भूली रहेगी मगर यही अपने बारे में हम नहीं कह सकते थे!

जब वे सब चले गए, हमारी अजीब हालत हो गई: साढ़े तीन साल में पहली बार अपरा हमारे साथ नहीं थी! और तब हमें समझ में आया कि वह हमारी कितनी छोटी-छोटी बातों में शामिल थी, हमारे मामूली से मामूली कामों के पीछे यही होता था कि उसे तकलीफ न पहुँचे, उसे दिक्कत न हो! आज ऑफिस में उसकी कोई छेड़-छाड़ नहीं होने वाली थी, हमारा ध्यान अपनी ओर खींचने वाला आज यहाँ नहीं था और खाना खाते समय तो ऐसी निस्तब्धता थी कि पूछो मत! लेकिन वास्तव में हम पल-पल उसकी अनुपस्थिति का एहसास कर रहे थे और बहुत छोटी-छोटी, मामूली बातें हमें उसकी याद दिलाती थीं कि हम उसे कितना मिस कर रहे हैं: वह उठ न जाए इसलिए आज भी सबेरे हम फुसफुसाहटों में बात करते रहे, जबकि… वह बिस्तर पर नहीं थी। फोन पर बात करते हुए मैं आदतन दूसरे कमरे में चला जाता था कि कहीं वह आकर कान में चीखने न लगे और मैं फोन पर कुछ सुन न पाऊँ! यह सब सहज हो जाता था मगर हर बार तुरंत अपरा का खयाल आता था कि अरे, वह तो यहाँ नहीं है!

जी हाँ, हम उसे बुरी तरह मिस कर रहे थे। मैं जानता हूँ कि बहुत से अभिभावक कहते हैं कि बच्चों से मुक्त सप्ताहांत कितना स्वच्छंद और सुखद होता है! लेकिन हम ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं करते। मेरे विचार में इसका मुख्य कारण यह है कि उसके होते हुए भी हम किसी चीज़ से वंचित नहीं रहते। जो हम करना चाहते हैं, सब कुछ उसकी उपस्थिति में भी करते हैं और उसके साथ हम हर बात का आनंद लेते हैं! ऐसी कोई बात हमारे साथ नहीं होती कि वह चली गई है इसलिए ‘अब मौका मिला है, इसे निपटा लें’!

स्वाभाविक ही, पहले दिन रात को उसे रोता देखकर हम दुखी हुए थे लेकिन उससे अधिक हमें गर्व हो रहा था कि इतनी सी उम्र में वह हमारे बगैर बाहर चली गई और हालांकि शुरू में थोड़ा बिसूर रही थी लेकिन बाद में ठीक से सो गई और दूसरी रात तो हमें उतना मिस भी नहीं किया और बिना रोए सो गई। और अब वह आ गई है- रोमांचित, उत्साह से भरी और वहाँ की हर बात बताने के लिए बेताब!

इस यात्रा में उसने कितना कुछ सीखा! उसे दूरी की अवधारणा का बेहतर ज्ञान हुआ और वह यह समझने लगी कि कार में लंबे समय तक सफर करने पर पर शाम को मर्ज़ी होने पर आप माँ और पा के पास तुरत-फुरत नहीं पहुँच सकते। उसने सीखा कि कुछ पल आसपास चाचा न हो तो और किसी को पुकारकर मदद ली जा सकती है। उसने यह भी जाना कि बिना किसी को बताए कहीं भी नहीं चल देना चाहिए…और हर माता-पिता मानेंगे कि यह जीवन का बहुत बहुमूल्य पाठ उसने पढ़ा! इसके अलावा उसने हजारों छोटी-छोटी बातें सीखी होंगी, जिन्हें आप तब सिर्फ अनुभव करते हैं, जब घर पर नहीं होते।

मेरे विचार में जैसी स्वतन्त्रता मैं अपनी बेटी को देना चाहता हूँ, उस ओर उसका यह पहला कदम है। मैं चाहता हूँ कि वह जाने कि कुछ भी हो, हम हमेशा उसके साथ हैं, जब भी उसकी इच्छा हो, लौटकर अपने सुरक्षित स्वर्ग में आ सकती है। एक भरोसेमंद आसरा- लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह भरोसेमंद है, यह आसरा पाँव की बेड़ी नहीं बनेगा। उसे बाहर निकलकर दुनिया को करीब से देखने की आज़ादी मिलनी चाहिए। इस यात्रा के रोमांच को और उससे प्राप्त नए अनुभवों के रोमांच को उसे सदा बरकरार रखना रखना चाहिए। इस तरह, मेरा विश्वास है कि वह दुनिया के बारे में उससे कहीं अधिक जान सकेगी, जितना हम आश्रम में बैठकर उसे बता सकते हैं! निश्चित ही, हम भी उसके साथ यात्राओं पर जाएँगे, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब वह अपने चाचाओं के साथ ही नहीं, खुद अकेली घूमेगी-फिरेगी।

मैं जानता हूँ कि उस दिन मुझे गर्व का अनुभव होगा- और यह भी जानता हूँ कि मैं उसे बहुत मिस करूँगा!

आश्रम में धूम्रपान पर पाबंदी है लेकिन धूम्रपान करने वालों पर न तो पाबंदी है, न ही उनकी निंदा की जाती है! 26 अप्रैल 2015

मैंने आदत बना ली है कि रविवार के दिन अपने जीवन की ताज़ा घटनाओं के बारे में आपको बताता हूँ। आज बारी है, अपने मेहमानों के साथ कल हुई बातचीत से उद्भूत कुछ विचारों की। आश्रम की एक मेहमान सकारात्मक रूप से अचंभित रह गई, जब हमने कहा कि अगर वह धूम्रपान करती है या कॉफी पीती है, तो हमें कोई एतराज़ नहीं होगा!

हमारा आश्रम पूरी तरह अपारंपरिक, अपरंपरागत काफी हद तक स्वच्छंद और अधार्मिक आश्रम है। हमारे यहाँ आपके आम व्यवहार को लेकर कोई खास नियम नहीं है और न ही इस बात का कोई नियम है कि आप किस समय क्या करते हैं। हमारे यहाँ सिर्फ शराब और ड्रग्स पर पाबंदी है और कमरों में या बगीचे में धूम्रपान करने की मनाही है। अगर आप धूम्रपान करते हैं तो उससे हमें कोई दिक्कत नहीं हैं, बस, आश्रम से बाहर निकलिए और चाहें तो गेट के सामने ही खड़े होकर सिगरेट पीजिए। वास्तव में बहुत से मेहमान ऐसा करते भी हैं और हमें उससे कोई परेशानी नहीं होती!

कई बार लोग इस तनाव के साथ यहाँ आते हैं कि भारत आने का और हमारे आश्रम में रुकने का निर्णय तो कर लिया लेकिन अब यहाँ आकर धूम्रपान कहाँ करेंगे-क्योंकि इन लोगों को निकोटीन की लत होती है! जब उन्हें इस बारे में हमारे रवैये का पता चलता है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उन्हें कितनी राहत मिलती होगी-और अक्सर वे आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

इसका कारण यह है कि बहुत से आश्रम हैं, जहाँ आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इस बारे में बहुत सख्त नियम और बहुत संकीर्ण नजरिया होता है। स्वाभाविक ही, इसकी जड़ में उनकी आस्था, अक्सर उनके गुरुओं के नज़रिए और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित हिन्दू धर्म होता है! अगर उनके संगठन का उपदेश या आदेश है कि चॉकलेट नुकसानदेह है तो उस आश्रम में किसी को भी चॉकलेट खाने की इजाज़त नहीं होती!

यही बात कॉफी पर भी लागू होती है और हमारे आश्रम में यह एक आश्चर्य का विषय होता है, जब हम पूछते हैं, "कॉफी लेंगे या चाय"! वास्तव में हम अक्सर कुछ आयुर्वेदिक मसालों के साथ उबालकर चाय बनाते हैं और वही पेश करते हैं।

मैं आपका आकलन इन छोटी-छोटी सी सामान्य बातों से क्यों करूँगा? मैं धूम्रपान न करने की सिफारिश ज़रूर करूँगा क्योंकि वह आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकर है, जब आप धूम्रपान कर रहे होंगे, मैं आपके पास खड़ा रहना पसन्द नहीं करूँगा क्योंकि मैं अपने लिए कोई नुकसान नहीं चाहता और वैसे भी तम्बाकू का धुआँ मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता। लेकिन इसके बावजूद, सिर्फ धूम्रपान करने के कारण आपको बुरा व्यक्ति नहीं समझूँगा!

यह आपका निर्णय है और अपने शरीर के साथ आप जो भी करते हैं, अपनी ज़िम्मेदारी पर करते हैं। जब तक आप दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते और अपने आसपास के लोगों के साथ आपका व्यवहार प्यार भरा और शालीन है, आपका आश्रम में हार्दिक स्वागत है। आप जो हैं, वैसे ही बने रहिए और जीवन के मज़े लीजिए-मेरा वादा है, इन आदतों के आधार पर मैं आपका आकलन नहीं करूँगा!

‘आइए, सेक्स के बारे में बातें करें’ का अर्थ ‘आइए, अश्लील चित्र देखें’ नहीं है! 7 अगस्त 2014

कल मैंने इस विषय पर चर्चा की थी कि सिर्फ यौन सम्बन्ध स्थापित करने पर, सेक्स का आनंद लेने पर, सेक्स के बारे में सोचने पर या सेक्स सम्बन्धी किसी भी बात पर चर्चा करने या सोचने-विचारने पर धर्म कैसे लोगों में अपराधबोध भर देता है। वास्तव में कई लोगों के लिए सेक्स इतना बड़ा मामला बन गया है कि वे इस विषय में किसी भी तार्किक चर्चा के काबिल नहीं रह गए हैं। उनके लिए सेक्स सम्बन्धी हर बात विकाराल रूप ले चुकी है।

मेरे एक ब्लॉग पर एक भारतीय मित्र से चर्चा हो रही थी। उस ब्लॉग में मैंने लिखा था कि सेक्स के बारे में हमें बच्चों से भी, उनकी आयु के लिहाज से उपयुक्त तरीके से, खुलकर बात करनी चाहिए। मैंने उससे कहा कि मैं अपनी बेटी से भी सेक्स सम्बन्धी बात करूँगा। मैं चाहूँगा कि मेरी बेटी को अपना साथी चुनने की पूरी आज़ादी मिले और वह किसके साथ सोना चाहती है, इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करे। यह सिर्फ और सिर्फ उसका चुनाव होगा कि कौन उसके बिस्तर पर सोएगा- इसमें मेरा कोई दखल नहीं होगा!

उसके जवाब से मैं स्तब्ध रह गया। उसने कहा, "लेकिन मैं अपनी बेटी के साथ पोर्न (अश्लील) विडिओ नहीं देख सकता!"

दरअसल मैं मानता हूँ कि आप में से ज़्यादातर लोग चकरा गए होंगे और ताज्जुब कर रहे होंगे कि वास्तविक मुद्दे से इस बात का क्या ताल्लुक हो सकता है। लेकिन उसकी इस बात पर आगे सोचते हुए मैं कह सकता हूँ कि इसके परिणामों को लेकर, उसके वक्तव्य के पीछे मौजूद विचारधारा को समझकर मैं भौंचक रह गया। मुझे समझ में आ रहा था कि सेक्स के बारे में चर्चा करते हुए वास्तव में इन लोगों का दिमाग इस ओर मुड़ जाता है।

वास्तव में, ऐसा कौन करेगा? कौन अपनी बेटी के साथ सोफे पर बैठकर अश्लील विडिओ देखेगालेकिन इसके बारे में बात ही कौन कर रहा है? जैसे "सेक्स के बारे में बातचीत करना" और "अश्लील विडिओ देखना" एक ही बात हो! भाई मेरे, दोनों में ज़मीन और आसमान का अंतर है!

मुझे लगता है कि लोग, खासकर धार्मिक लोग, सेक्स को लेकर बुरी तरह बंधनों में जकड़े होते हैं और सेक्स शब्द का भूले-भटके भी इस्तेमाल करते हैं तो खुद ही कामोत्तेजित हो उठते हैं! जैसे ही वे किसी नंगे शरीर को देखते हैं, उनकी सारी दमित कामुकता बाहर फूट निकलती है। नंगापन, सेक्स, सेक्स सम्बन्धी बातचीत, यह सभी बातें उन्हें बेकाबू कर देने के लिए पर्याप्त होते हैं! सेक्स के बारे में वे सामान्य रूप से बात ही नहीं कर पाते- और इसलिए सोचते हैं, कोई दूसरा भी ऐसा नहीं कर सकता!

लेकिन- आश्चर्य! जब मैं कहता हूँ कि मैं बेटी के साथ सेक्स के बारे में बात करूँगा तो कोई मैं उसे काम-मुद्राओं की जानकारी देने नहीं जा रहा हूँ, शरीर के कामोद्दीपक हिस्सों की तरफ उसका ध्यान नहीं खींचने वाला हूँ या कामोत्तेजक साहित्य की ओर संकेत नहीं करने वाला हूँ- उसके साथ बैठकर अश्लील फ़िल्में देखने की बात तो छोड़ ही दें! वह पिता और बेटी के बीच का एक सामान्य वार्तालाप होगा। मन की सामान्य इच्छाओं, कामनाओं के बारे में, शारीरिक प्रतिक्रियाओं के बारे में कि किस तरह ये बातें हमारे नैसर्गिक शारीरिक गुण है और इस संबंध में उसकी जिम्मेदारियों के बारे में भी।

सच तो यह है कि मुझे आशा है कि हम अपनी बेटी का लालन-पालन इस तरह करेंगे कि बाद में उसके साथ सेक्स के बारे में बात करते हुए हमें शर्मिंदा न होना पड़े। लेकिन हम अपनी बेटी के साथ अश्लील बातें करेंगे, यह सोच ही हमारे समाज की बीमारी का मूल कारण है, इसी ने उसे बीमार कर रखा है।

संकीर्ण मानसिकता के चलते नैसर्गिक इच्छाओं का दमन। सेक्स विषयक किसी शब्द के उच्चारण में भी गजब की हिचक! छोटा-मोटा विचार आने पर ही कामोत्तेजित हो जाना और फिर उसका अपराधबोध, इस विषय में भयंकर शर्म-इन्हीं सब बातों पर यह बीमार मानसिकता निर्भर होती है और इसे हम भारत में बहुतायत से देखते हैं। स्वयं का यौनिक दमन ही अंततः महिलाओं के विरुद्ध यौन दुराचार में तब्दील हो जाता है।

क्योंकि आप हर वक़्त यह सुनते हैं कि "अश्लील वीडियो देखें" जबकि मैं कह रहा हूँ कि "सेक्स के बारे में बात करें"।

अब गंदा दिमाग किसका है, आपका या मेरा?

किसी से प्रेम करना आपकी आज़ादी का हनन नहीं है – 3 जुलाई 2014

कल मैंने एक महिला का ज़िक्र किया था, जो अपने रिश्ते में कुछ समय का अवकाश लेने का विचार लेकर मेरे पास व्यक्तिगत-सलाह-सत्र में आई थी। उसी दिन एक पुरुष भी आया था, जो अपनी महिला मित्र से अलग हो जाना चाहता था। लेकिन उसकी परिस्थिति बिल्कुल भिन्न थी और इस बात से मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि व्यक्तिवाद, जो कि पश्चिम में इतना लोकप्रिय है, वास्तव में लोगों के दिलों के प्रति बेहद निष्ठुर सिद्ध हुआ है।

इस व्यक्ति ने मुझे बताया कि वह 20 साल तक विवाहित रहा था और उसकी पत्नी और बच्चे भी थे लेकिन फिर उसने अपनी पत्नी से तलाक ले लिया और अपने परिवार को छोड़ दिया। कारण? "वह मेरे लिए बहुत मुश्किल था!" उसने समझाने की कोशिश की। उसे लगता था कि वह अपने परिवार में इतना लिप्त हो चुका है कि अपनी आज़ादी खो बैठा है। जीवन में वह और भी बहुत कुछ करना चाहता था, यहाँ तक कि दैनिक जीवन में भी, और परिवार के होते हुए, बच्चों के साथ और दूसरी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ वह सब संभव नहीं हो पा रहा था! "मैं अपना आध्यात्मिक जीवन जीना चाहता था, आत्म-साक्षात्कार की शक्तियों को व्यक्त करना चाहता था और ज़्यादा से ज़्यादा योगिक जीवन जीना चाहता था!" इसलिए उसने सब कुछ छोड़ दिया।

अकेले रहते हुए जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो उसकी मुलाक़ात एक और महिला से हुई। उसके साथ उसके खुले सम्बन्धों की शुरुआत हो गई। वे दोनों अलग घरों में रहते थे, वह अपना काम करती थी और वह अपना जीवन जीता था लेकिन बावजूद इसके उनके संबंध खुले और प्रगाढ़ थे। खुले, यानी स्पष्ट शब्दों में यह कि वे दोनों ही किसी अन्य व्यक्ति के साथ भी शारीरिक संबंध रखने के लिए आज़ाद थे। इससे तो यही समझ में आता था कि उसे यौन आनंद के साथ अपनी सम्पूर्ण आज़ादी भी उपलब्ध थी। लेकिन नहीं! वह ऐसा नहीं समझता था। उसे लगता था कि यह भी वही सालों पुराने वैवाहिक जीवन जैसा ही है!

उसे महसूस हो रहा था कि यह महिला उस पर अधिकाधिक आश्रित होती जा रही है और इस कारण उस पर बहुत ज़िम्मेदारियाँ आ गई हैं, भले ही वे अलग घरों में रहते हों, भले ही बाल-बच्चों का कोई झंझट न हो। वह उसके प्रति अनुरक्त होती जा रही थी और बावजूद इसके कि वे दोनों किसी अन्य के साथ संबंध रखने के लिए आज़ाद थे, वह ऐसे संबंधों से परहेज़ करती थी। उसने कहा "मैं फिर उसी परिस्थिति में जकड़ गया हूँ!" लेकिन उसे सम्बन्ध तोड़ने में संकोच हो रहा था। "अगर अब मैं इस हालत में उसे छोड़ देता हूँ तो वह पूरी तरह टूट जाएगी! वह तहस-नहस हो जाएगी और उसकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है! वह पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी!"

उसने अंत में संक्षेप में कहा: "मैं उसे इस तरह चोट नहीं पहुँचाना चाहता-लेकिन मैं अपनी आज़ादी भी चाहता हूँ!"

मैंने उससे पूछा: "क्या तुम उससे प्यार करते हो?"

दो मिनट खामोशी छाई रही, जिसमें वह मेरे सामने आँखें बंद किए बैठा रहा फिर धीमे और लरज़ते स्वर में बोला: "हाँ, मुझे लगता है, मैं उससे प्यार करता हूँ!"

मैं यह पहले से जानता था। मेरा प्रश्न वास्तव में प्रश्न था ही नहीं, सिर्फ उसे उसके प्रेम का एहसास कराने के लिए एक उत्प्रेरक भर था! मेरा विश्वास है कि जब आप किसी की इतनी चिंता करते हैं तो वह वास्तव में उसके प्रति आपका प्रेम ही होता है और संबंध तोड़ने में उसकी हिचकिचाहट, उसे तकलीफ पहुँचाने का डर, उसके संभावित दर्द को महसूस करने की संवेदना यह ज़ाहिर कर रहे थे कि वह उसके प्रेम में डूबा हुआ है। "तो फिर तुम उसे इतना कष्ट क्यों देना चाहते हो"? मैंने पूछा। ऐसा करने पर न सिर्फ वह दुखी होगी बल्कि तुम खुद भी दुखी होगे! क्योंकि आप कितना भी खुले क्यों न हों, अगर आपके किसी के साथ इतने घनिष्ठ सम्बन्ध हैं, अगर आप दिल से किसी के इतना करीब हैं तो फिर समझिए, वहाँ प्रेम भी मौजूद है। और जब आप ह्रदय के इस बंधन को तोड़ने की कोशिश करते हैं तो कष्ट पहुँचता ही है!

प्रेम दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण नेमत है। किसी के साथ अनुरक्त होने में डर कैसा?-वह आपकी आज़ादी नहीं छीनती! आप प्रेम करते हुए भी आज़ाद रह सकते हैं!

अब आप जो चाहें कर सकते हैं लेकिन अगर मैं आपकी जगह होता तो मैं प्रेम का चुनाव करता, डर का नहीं!

मेरी पत्नी, रमोना के साथ मेरे संबंधों के विषय में कुछ बातें- 12 फरवरी 2014

दो दिन पहले मैंने आपको बताया था कि हमारे यहाँ, आश्रम में एक हनीमून दंपति आए थे और हमारे साथ उनकी अच्छी चर्चा हुई। अन्य बातों के अलावा हमारे बीच एक ऐसे विषय पर भी चर्चा हुई, जो उस नव-दंपति के लिए विशेष रुचिकर थी और वह विषय था आपसी संबंध। उन्होंने मेरे और रमोना के बीच सम्बन्धों के बारे में पूछा और मैंने खुशी-खुशी हमारे बीच मौजूद प्रेम और आनंद के बारे में उन्हें बताया!

उनका पहला प्रश्न था: रमोना के साथ आपके सम्बन्धों की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?

मैंने उन्हें बताया कि हम आज तक एक रात भी अकेले नहीं रहे हैं। हम हमेशा साथ रहे हैं और जहां भी जाते हैं साथ-साथ ही जाते हैं। हम साथ में भोजन करते हैं, एक बिस्तर पर सोते हैं, अक्सर हम साथ ही नहाते भी हैं और ‘अक्सर’ इसलिए कि साल में चार बार जब अपरा नहाना नहीं चाहती और न ही किसी और के साथ खेलना चाहती है बल्कि चाहती है कि हममें से किसी एक के साथ ही खेलेगी, तब हम साथ नहीं नहा पाते।

वे आश्चर्यचकित रह गए और वह प्रश्न पूछा जो दूसरे भी आपस में हमारी इतनी निकटता देखकर अक्सर पूछते हैं: क्या आपके बीच कभी कोई समस्या पेश नहीं आती? कोई वाद-विवाद या मतभेद या तू-तू मैं-मैं?

मैं ईमानदारी और गर्व के साथ कह सकता हूँ कि कभी नहीं, हमारे बीच कभी कोई समस्या पेश नहीं आई। कभी-कभी हमारे बीच विचार-भिन्नता होती है लेकिन वह सिर्फ विचारों की भिन्नता है और उसकी वही सीमा भी होती है, वह विवाद का कारण कभी नहीं बनती। उसे पास्ता पसंद है और मुझे नहीं। मुझे ईलायची पड़ी मिठाई पसंद है और उसे नहीं। विचार-भिन्नता होना स्वाभाविक और सामान्य बात है।

तो आप अपनी विचार-भिन्नता का क्या हल निकालते हैं?

तब हम यह करते हैं कि एक ही प्लेट से वह अपना पास्ता खाती रहती है और मैं अपनी मिठाइयाँ। मैं यह नहीं पूछता कि वह पास्ता क्यों पसंद करती है और वह भी इस बात का ख्याल रखती है कि पास्ता मेरे खाने में न मिल जाए। उसे भी इस बात से कोई शिकायत नहीं होती कि मैं इलायची वाली मिठाइयां खाता हूँ और मैं इस बात का ध्यान रखता हूँ कि कुछ उसके पसंद की मिठाई भी रखी हो।

अगर कभी कोई ऐसा विषय सामने आ जाता है जिस पर हम एकमत नहीं हैं तो हम उसके बारे में विस्तृत चर्चा करते हैं, थोड़ा बहुत विवाद भी होता है पर वह पाँच मिनट से ज़्यादा देर नहीं टिकता और फिर हम उस विषय का हल खोज लेते हैं। हम एक-दूसरे पर चीखते-चिल्लाते नहीं हैं और न ही कोई बात दिल में छिपाकर रखते हैं। जो बात हममें से किसी एक को चुभ रही होती है तो हम उसे दूसरे से कह देते हैं। यह बात साझा करते हैं कि इस बारे में हम क्या महसूस कर रहे हैं और तब दूसरे का सिर्फ हमारी बात सुनना, या तो उसे स्वीकार करना या फिर यह कह देना कि वह कुछ अलग महसूस कर रहा है: बस, इतना ही दूसरे को संतुष्ट करने के लिए काफी होता है। अंत में हम यह बात निश्चित रूप से जानते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे को स्वीकार कर ही लेंगे, भले ही दूसरा कुछ भी सोचता, करता या कहता हो।

यह कितना प्रेरणास्पद है- आप बिल्कुल अलग संस्कृतियों से आए हैं! आपका आपसी प्रेम हमारे लिए एक उदाहरण है!

वह सुंदर महिला मुझे अच्छी लगी फिर भी मैंने सेक्स से इंकार किया! क्यों? 26 जनवरी 2014

अपने 2006 के आस्ट्रेलियाई दौरे पर सोचते हुए मुझे एक और घटना याद आती है, जिसे आज मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। यह घटना अंतरंगता, गोपनीयता और चिकित्सकीय पेशे के कुछ नैतिक मूल्यों से संबंध रखती है।

एक कस्बे में मेरा एक हफ्ते का कार्यक्रम था और हमेशा की तरह कुछ कार्यशालाएँ और शाम को ध्यान-सत्र आयोजित किया गया था। जैसा की अक्सर होता रहा है, कुछ चेहरे बार-बार दिखाई दे जाते थे, सिर्फ किसी एक कार्यक्रम में नहीं और इस तरह कई लोग हमारे व्यक्तिगत सत्रों में भी आए। उनमें से एक थी वह खूबसूरत महिला, जो लगभग मेरी ही उम्र की थी। मैंने उसे अपने कार्यक्रमों में देखा था मगर अधिक बात करने का अवसर नहीं मिल पाया था क्योंकि उन कार्यक्रमों में अक्सर आसपास बहुत से लोग हुआ करते थे। दो चार शब्दों का लेनदेन ही हो पाता था लेकिन फिर एक दिन मैंने उसे अपने सामने बैठा हुआ पाया, वहाँ, जहां मैं अपने व्यक्तिगत सत्र दिया करता था।

वह एक सलाह-सत्र था, जिसमें हमने उसकी मानसिक अवस्था पर गहराई से लंबी चर्चा की क्योंकि वह आई ही थी, अपनी कुछ पारिवारिक समस्याएँ लेकर। हमने विभिन्न तरीकों से उसकी समस्या पर चर्चा की कि कैसे वह उनसे बेहतर ढंग से निपट सकती है और कैसे आज की तुलना में उस पर इन समस्याओं का कम से कम असर पड़े। चर्चा से उसे लाभ हो रहा था।

लेकिन इतनी चर्चा के बाद उसने एक बिलकुल दूसरी ही बात शुरू कर दी। निष्कपट स्वर में उसने साफ-साफ कहा कि वह मुझ पर आसक्त है। मैं उसे आकर्षक और अच्छा व्यक्ति लगा था और वह चाहती थी कि इस आकर्षण की गहराई में उतरा जाए। मेरे व्याख्यान के शब्दों को उद्धृत करते हुए उसने कहा कि इसमें कोई बुरी बात नहीं होगी यदि कोई दो व्यक्ति, बिना किसी संबंध में बंधे, बिना किसी वचनबद्धता के, चाहें तो, आपस में अंतरंग संबंध स्थापित कर लें! वैसे भी लोग जानते थे कि मेरा ब्रह्मचर्य में कोई विश्वास नहीं है इसलिए इसमें कोई अनहोनी बात भी नहीं होने वाली थी! उसने कहा कि वह मुझ लेने आ जाएगी और वे कहीं किसी होटल में, या रिसोर्ट में या फिर उसके घर के एकांत में एक शानदार अंतरंग और आत्मीय समय गुजारेंगे।

वह एक सुंदर और बहुत शालीन महिला थी और जिस तरह उसने यह बात कही वह किसी भी तरह से अश्लील नहीं लग रही थी। बल्कि मुझे उसका इतना खुलापन बहुत अच्छा लगा और मैं उसके इस तर्क से पूरी तरह सहमत भी था हम दोनों ही अविवाहित थे और इसलिए बिना किसी परेशानी के कुछ समय एकांत में मौज-मस्ती कर सकते थे। वास्तव में अगर मेरे मन में एक और विचार ने उसी वक़्त जन्म न ले लिया होता तो शायद मैं उसके साथ जहां वह कहती, चला जाता: जिसका अभी-अभी मैं परामर्शदाता रहा हूँ, जिसका थोड़ी देर पहले मैं चिकित्सक रहा हूँ, उसके साथ मैं शारीरिक संबंध नहीं बना सकता।

मुझे अपनी ये भावनाएँ व्यक्त करने में थोड़ा समय लगा। मैंने उससे कहा कि मैं उसके साथ ऐसा नहीं कर सकता और इसकी वजह यह है कि हम जिस तरह से मिले हैं, जिस तरह के हमारे संबंध रहे हैं उसमें मेरे लिए यह संभव नहीं है। अगर यह सब कुछ अलग तरह से होता तो हो सकता है मैं उसका प्रस्ताव मान लेता। लेकिन इस परिस्थिति में मुझे ऐसा करने में बिलकुल रुचि नहीं है, मैं ऐसा कर ही नहीं सकता।

हम मित्रों की तरह बिदा हुए।

मेरे लिए यह देखना खासा मोहक था कि भले ही यह मुलाक़ात कुछ दूसरा ही गुल खिला सकती थी, भले ही इस मुलाक़ात के बाद हम यौन संबंध स्थापित कर चुके होते और भले ही ऐसा नहीं हुआ था, फिर भी हमारे बीच कोई कटुता नहीं पैदा हो पाई। वह बहुत निराश हो सकती थी या अपने आपको ठुकराई गई महसूस कर सकती थी और उसे बुरा लग सकता था, जैसा कि मैं पहले अनुभव कर चुका था, लेकिन जिस तरह उसने खुले मन से यह प्रस्ताव रखा था उसी खुले मन से उसने मेरे इंकार को स्वीकार किया। और ऐसा ही होना चाहिए।

अपनी स्वाधीनता और ज़िम्मेदारी: परिवार का समर्थन और प्रोत्साहन- 1 दिसंबर 2013

मैं आपको पहले बता चुका हूँ कि सन 2005 में, जब मैंने अपने पिताजी से यह कहा कि मैं अब गुरु का काम नहीं करना चाहता और यह कि जिन धर्मग्रंथों का अनुसरण और अनुपालन मैं अतीत में किया करता था, अब नहीं करना चाहता तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी। उन्होंने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा था कि अगर ऐसा करके मैं खुश हूँ तो सारा परिवार खुशी-खुशी मेरे साथ है। मुझे उनकी इस प्रतिक्रिया से कोई आश्चर्य नहीं हुआ था।

दरअसल मैं पहले से जानता था कि वे यही कहेंगे। मुझे थोड़ी सी भी आशंका नहीं थी कि वे कोई दूसरी बात कह सकते हैं और जब मैंने उनके शब्द सुने तो मैं याद कर रहा था कि कैसे पहले भी अपने निर्णयों में मुझे उनका समर्थन और प्रोत्साहन मिलता रहा था।

जब मैं सिर्फ 13 साल का था, मैंने अपना काम शुरू कर दिया था और क्रमशः अधिकाधिक व्यस्त होता जा रहा था। कभी-कभी मैं अपने पिताजी के साथ उनके कार्यक्रमों में भी चला जाता था मगर अब मैं स्वतंत्र रूप से अकेले ही देश भर में घूम-घूमकर अपने कार्यक्रम भी करने लगा था। स्वाभाविक ही ऐसे कार्यक्रम सिर्फ स्कूल की छुट्टियों में ही नहीं होते थे इसलिए मुझे अक्सर स्कूल में अनुपस्थित रहना पड़ता था।

उस वर्ष अपने किसी कार्यक्रम के बाद जब मैं स्कूल आया तो मेरे एक शिक्षक ने पूछा कि मैं कहाँ था और मैं स्कूल क्यों नहीं आता। मैंने उन्हें बताया कि मैं दूसरे प्रांत, मध्य प्रदेश प्रवचन करने गया हुआ था। उन्हें पहले से पता था कि मैं क्यों स्कूल में अनुपस्थित रहता हूँ इसलिए उन्होंने पूछा: "जब तुम अक्सर स्कूल नहीं आते तो स्कूल आना पूरी तरह क्यों नहीं छोड़ देते?" उनकी बात का अर्थ यह था कि मैंने जब अपने पेशे का चुनाव कर लिया है तो स्कूल की चिंता छोड़कर पूरा ध्यान उस पर लगाना चाहिए।

मुझे कुछ समझ में नहीं आया। दरअसल यात्राओं में मैं हमेशा अपने साथ अपनी कोर्स की किताबें भी साथ रखता था और स्कूल की पढ़ाई भी करने की पूरी कोशिश करता था। नतीजतन, स्कूल से दूर रहने के बावजूद मैं पढ़ाई में कभी खराब विद्यार्थी नहीं रहा! अब मेरे शिक्षक कह रहे थे कि मैं स्कूल ही न आऊँ। समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए।

उस दिन जब मैं घर आया तो मेरे मन में यह बात घूम रही थी और मैंने अपने अभिभावकों से इस विषय में क्या करना चाहिए, पूछा। मेरे पिताजी ने जवाब दिया: वही करो, जो तुम्हें उचित लगता है।

आप कह सकते हैं कि एक 13 साल के बच्चे के लिए इस बात का निर्णय करना बड़ा मुश्किल था। लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा। बल्कि मैं उत्साह से भर गया कि मेरे पिताजी मुझ पर इतना विश्वास करते हैं, उन्हें लगता है कि मैं अपने बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम हूँ और अपने दिल का कहा मानकर अपने बारे में कोई भी निर्णय लेने की मुझे स्वतन्त्रता है। और मैंने वही किया। मैंने अपना पेशा चुना, स्कूल नहीं।

इस बात ने मुझे एक साथ स्वतन्त्रता और ज़िम्मेदारी प्रदान की, अपनी प्रसन्नता और अपने हितों की रक्षा करने की मुझमें शक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। उस समय सीखे हुए इस सबक के लिए मैं अपने अभिभावकों का सदा-सदा के लिए ऋणी रहूँगा। लगभग बीस साल बाद मेरे पिता ने फिर वही किया। जिन्होंने अपना जीवन ही धर्म की नीव पर खड़ा किया था और स्वयं एक धर्मगुरु थे और तब भी थे, जब उन्होंने मुझसे कहा कि मैं अपने दिल का कहा मानूँ, भले ही उससे मेरी राह उस राह से अलग हो जाती थी, जिस राह पर वे स्वयं चलते रहे थे और मुझे भी चलने के लिए प्रेरित किया था।

इस तरह मैं जो भी हूँ, जो भी करूँ, अपने परिवार के लगातार समर्थन और प्रोत्साहन के लिए उन सभी का सदा के लिए ऋणी रहूँगा। हमने एक साथ अपनी जीवन-यात्रा शुरू की और मैंने कभी भी एक क्षण के लिए भी उन्हें मेरा साथ छोड़ते हुए नहीं पाया। वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे और उसी तरह मैं भी हमेशा उनकी इच्छाओं और निर्णयों के समर्थन में खड़ा रहूँगा। मैं समझता हूँ कि सिर्फ इसी तरह हम सब प्रसन्न रह सकेंगे!

नास्तिक होने का अर्थ…- 27 जून 2013

नास्तिक किसी अलौकिक शक्तियों पर विश्वास नहीं करते। इसके विपरीत वे स्वयं पर भरोसा करते हैं।

नास्तिक नर्क जाने के डर से बुरे कामों को करने से नहीं बचते बल्कि इसलिए उनसे दूर रहते हैं कि वे बुरे काम हैं।

नास्तिक अपने स्वर्गारोहण के उद्देश्य से अच्छे काम नहीं करते बल्कि चैरिटी और दूसरों की भलाई के लिए करते हैं।

नास्तिक उन पुस्तकों पर आँख मूंदकर भरोसा नहीं करते जो हजारों साल पहले लिखी गईं बल्कि स्वतंत्रतापूर्वक अपने दिमाग से सोचते हैं।

नास्तिक अपने कार्यों की जवाबदारी किसी गुरु, धर्म या ईश्वर पर नहीं डालते बल्कि उसे खुद उठाते हैं।

नास्तिक धर्म या धार्मिक संस्थाओं के आदेशों का पालन नहीं करते बल्कि वैज्ञानिक जानकारियों, अनुभवों और सहज बुद्धि से अपने निर्णय लेते हैं।

नास्तिक पूजा करते हुए ईश्वर को रिश्वत नहीं चढ़ाते बल्कि अपनी क्षमताओं पर भरोसा करते हुए आत्मविश्वास के साथ वही करते हैं जो वे करना चाहते हैं।

नास्तिक उन बातों के लिए अपराधबोध से ग्रसित नहीं होते जो उन्होंने नहीं की हैं या उनके काबू में नहीं हैं बल्कि अपने कर्मों या गलत निर्णयों के परिणामों को भुगतने के लिए तैयार रहते हैं।

नास्तिक किसी मिथकीय, रहस्यमय शक्ति या जीवों से नहीं डरते बल्कि भौतिक नियमों से परिचालित क्रमिक विकास के परणामस्वरूप अस्तित्व में आई प्रजातियों की विविधता को देखकर प्रसन्न और चमत्कृत होते हैं।

नास्तिक आपसे चंदा नहीं मांगते कि उसके बदले वे आपको जीवन में खुशी और मृत्यु के बाद स्वर्ग प्रदान करने में सहायक होंगे।

नास्तिक अंधविश्वासी नहीं होते।

अनगढ़ प्रेम – 25 जून 2013

क्या आप एक से अधिक लोगों के साथ प्रेम कर सकते हैं?

जी हाँ, बिलकुल कर सकते हैं। प्रेम क्या है?

जब आप किसी पुरुष के प्रति प्रेम का अनुभव करती हैं तो क्या उससे विवाह करना भी ज़रूरी है?

जब आप किसी महिला से प्रेम करते हैं तो क्या उसके साथ सोना भी ज़रूरी है?

जितने लोगों के साथ प्रेम करना चाहें, करें।

अपने प्रेम की सुगंध जितना फैला सकें फैलाएँ, उसे बांधकर न रखें। दूसरों से प्रेम करने और उनसे प्रेम पाने के सुख का आनंद उठाएँ। उनकी आँखों में आंखे डालकर देखें, जिन बातों को आप शिद्दत के साथ महसूस करते हैं, उन्हें बताएं, अपने मन को खोल दें और उसे साझा करें।

सबके साथ विवाह करना ज़रूरी नहीं है। सबके साथ संभोग करना आवश्यक नहीं है।

प्रेम सिर्फ शारीरिक संबंध ही नहीं होता। चुंबन, रोमान्स या छेड़छाड़ हो ही, यह आवश्यक नहीं है।

प्रेम सिर्फ प्रेम है।

हो सकता है कि आपका प्रेम संबंध इतना भाग्यशाली हो कि उसकी परिणति आपके विवाह में भी हो जाए और आप उसके साथ जीवन भर साथ रहें।

यह प्रेम है।

आपके प्रेम संबंध का अर्थ वर्षों की गहरी मित्रता के रूप में भी सामने आ सकता है।

वह भी प्रेम है।

आपका प्रेम संबंध सिर्फ एक घंटा समीप बैठकर कप भर कॉफी पीने तक सिमट सकता है।

लेकिन वह भी प्रेम है।

आपका प्रेम संबंध पल भर का भी हो सकता है जिसमें आप आँखों ही आँखों में कितना कुछ कह जाते हैं। एक क्षण, जिसमें आप महसूस कर लेते हैं कि यह दुनिया आपकी और उसकी साझा मिल्कियत है। इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

यह भी प्रेम है।

प्रेम की अपनी सुंदरता है, पता नहीं वह कितने तरीकों से खुद को व्यक्त करता है। आपका प्रिय, उसके प्रति आपके प्रेम को जानता हो या न जानता हो, प्रेम का आनंद लें।

प्रेम एक अनुभव है। यह एक अहसास है। वह आपका है, मगर सबका भी है।

उसकी मूर्ति बनाने की या उसका चित्र बनाकर मढ़ने की कोशिश मत करो, उसे किसी खांचे में फिट मत करो, अपने विचारों के अनुसार उसे बदलने की कोशिश मत करो। उसे किसी संबंध का नाम देकर छोटा करने की कोशिश मत करो। उसे सीमाओं में न बांधो, स्वतन्त्रता पूर्वक प्रेम करो।

प्रेम को वही बने रहने दो, जो वह है।

प्रेम स्वतंत्र है।

प्रेम सबके लिए है।