मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठाते हुए आर्थिक बराबरी का उपदेश – 25 नवम्बर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक बहुत कट्टर विचारों वाला व्यक्ति मेहमान बनकर आया। उसका विचार था कि हर व्यक्ति को एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। हम भी बराबरी के विचार के हामी हैं और आश्रम में भी बराबरी के इस विचार को प्रोत्साहित करते हैं लेकिन उसने अपने कुछ विचारों और आदर्शों का जैसा वर्णन किया, उससे हम कतई सहमत नहीं हो सकते थे। उनमें से एक यह था कि हर एक को काम के घंटों के अनुसार एक समान पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए। और हर एक को उतने घंटे ही काम करना चाहिए, जितने घंटे वह करना चाहता हो। इस विचार को इस तथ्य के साथ जोड़कर देखने पर कि वह स्वयं बेहद आलसी था, उसकी बात से सहमत होना मेरे लिए असंभब था!

मैं उसके विचार के मर्म को समझ रहा हूँ और निश्चित ही उसके कुछ बिंदुओं से सहमत भी हो सकता हूँ: कि एक तरफ कुछ लोग हैं जो कम से कम समय श्रम करके इतना अधिक कमा लेते हैं कि उस पैसे को जीवन भर खर्च नहीं कर सकते और दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करते हैं, छुट्टियाँ भी नही ले पाते और बड़ी मुश्किल से अपना घर-खर्च चला पाते हैं। इस स्थिति में सुधार होना चाहिए और किसी व्यक्ति को पैसे की कमी के कारण भूखा मरने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए।

लेकिन अपने उस मेहमान के विचार में मैं इस समस्या का समाधान नहीं देखता! उसने मुझसे कहा कि एक डॉक्टर, वैज्ञानिक, एक निर्माण मजदूर और सफाई कर्मचारी को एक समान वेतन मिलना चाहिए। और साथ ही, हम सबको चाहिए कि अपनी ज़रूरतों को कम करें, अर्थात हमें कम से कम साधनों में जीवन यापन करना चाहिए। इस तरह हर किसी को उसकी आवश्यकतानुसार प्राप्त हो जाएगा।

सैद्धांतिक रूप से यह पूरी तरह सही विचार लगता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में यह संभव नहीं है! निश्चित ही सभी का काम महत्वपूर्ण है, भले ही वे कोई भी काम कर रहे हों क्योंकि हमें फर्श भी लगवाना पड़ता है और उसे साफ़ भी करवाना पड़ता है और उसके बाद ही हम उस पर चल सकते हैं और उस पर प्रयोगशाला बनाकर वैज्ञानिक प्रयोग कर सकते हैं! लेकिन एक डॉक्टर ने अपनी पढ़ाई में सालों खर्च किए हैं और उसका काम जीवन बचाता है। वह बरतन भी साफ़ कर सकता है मगर इसका उल्टा संभव नहीं है! है क्या?

इसके अलावा, हम सब अलग-अलग लोग हैं! एक व्यक्ति किसी काम को किसी दूसरे के मुकाबले बहुत कम समय में पूरा कर सकता है। अगर यह बार-बार हो तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि पहला व्यक्ति उस काम में दूसरे से अधिक निपुण है-और तब यदि वह दूसरे से अधिक पैसे कमाता है तो इसमें कतई कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। है कि नहीं?

अब अगर आपका जवाब ‘नहीं’ है तो इसका अर्थ हुआ कि व्यक्तिगत क्षमता या दक्षता से कोई फर्क नहीं पड़ता और किसी काम पर जो जितना समय लगाएगा, उसी के अनुसार सबको भुगतान किया जाना चाहिए। तब मेरा प्रतिप्रश्न यह होगा: ‘उनका क्या किया जाएगा जो आलसी हैं’? और फिर एक प्रश्न और कि आप कौन होते हैं, किसी से उनकी ज़रूरतों को कम करने का आदेश देने वाले? हो सकता है, ज़रूरतों पर उनके एहसासात आपसे जुदा हों!

और इसीलिए उस पूरे विचार पर ही मैं हँसे बिना नहीं रह सका: जबकि वह बढ़िया गरम पानी से नहा-धोकर, स्वादिष्ट नाश्ता करके आराम से ए सी कमरे में बैठा हुआ था, अपना खुद का काम करने में उसकी कोई रुचि भी दिखाई नहीं दे रही थी।

इसलिए, जबकि वास्तव में मैं विश्वास करता हूँ कि हमें गरीबों की मदद करनी चाहिए और हममें से ज़्यादातर लोग थोड़ा न थोड़ा खर्च कम भी कर सकते हैं लेकिन जो लोग इसके समर्थन में सबसे अधिक भाषण झाड़ते हैं, वही अपने छोटे, सुखद दायरे में आराम फरमाते हैं और इस तरह अपने कथन के विरुद्ध आचरण करते हैं।

क्या करें जब चीज़ें आपके आदर्शों के अनुरूप न हों – 24 नवंबर 2015

कुछ समय पहले मैंने लिखा था कि आप कभी-कभी आदर्शवाद को खींच-तानकर यथार्थ से बहुत दूर ले जाते हैं और फिर दैनिक जीवन में दुखी होते रहते हैं। मेरा मानना है कि जीवन में अपने लिए कुछ आदर्शों का होना अच्छी बात है और सामान्य रूप से क्या सही है और क्या गलत, इस बात की स्पष्ट समझ हर एक के लिए उपयोगी और लाभदायक ही है। लेकिन यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि दुनिया आदर्श नहीं है-और बदलाव लाने की दिशा में हम सिर्फ अपने स्तर पर ही कुछ अच्छा कर सकते हैं।

और ऐसा करने की बहुत सी संभावनाएँ मौजूद हैं! सिर्फ आप अपनी नौकरी का उदाहरण लें: हो सकता है, आप वहाँ का माहौल बदल न पा रहे हों लेकिन, उदाहरण के लिए, आप कोई दूसरी नौकरी पाने का प्रयास कर सकते हैं जो आपके आदर्शों के अनुरूप हो या कम से कम उसके विरुद्ध न हो! एक शाकाहारी के रूप में आप किसी कसाई के यहाँ काम नहीं करेंगे। कार्यालय में भी नहीं क्योंकि वह आपके आदर्शों के विपरीत है। लेकिन कोई ऐसा रोजगार खोजना, जो आपके हर आदर्श के अनुसार चलता हो, असंभव है!

मैं आपके सामने एक उदाहरण रखता हूँ। मान लीजिए आप किसी ऐसी कंपनी में काम करते हैं जो आपके आदर्शों की समर्थक है और वह जगह आपकी नौकरी के लिए सबसे उचित जगह है। मान लीजिए कि वह एक दुकान है जो जैविक खाद्यों और मेलों में बेचे जाने वाली सामग्रियों का व्यापार करती है। वह पूरी तरह आपके आदर्शों के अनुरूप है-सिर्फ दुकान के एक हिस्से को छोड़कर: दुकान के एक कोने में आध्यात्मिक या अतींद्रियवादी सामान भी बेचने के लिए रखा हुआ है-टेरो कार्ड्स, क्रिस्टल बॉल्स और आधुनिक डायनों, अतींद्रियवादियों और जादुई इलाज करने वालों के लिए तरह-तरह का सामान! आप इससे सहमत नहीं हैं, आपका विश्वास है कि यह लोगों में अंधविश्वास फैलाने वाली वस्तुएँ हैं-लेकिन आपको उस सामान को भी बेचना है!

यह आदर्श स्थिति नहीं है-मगर आप अकेले एक आदर्श दुनिया निर्मित नहीं कर सकते! इस दुनिया में हर तरह की चीजों का अस्तित्व है और अगर आप अति-आदर्शवादी हैं तो दुनिया में होने वाली बहुत सी बातों से आपको परेशानी होती रहेगी! इसलिए जो बातें आदर्श नहीं हैं, उनसे चिपके रहने से बेहतर है कि जितना संभव हो अपने आदर्शों के करीब पहुँचने की कोशिश करना-और शेष बातों को जैसी भी वे हैं, स्वीकार करना!

इस तरह जितना आप सोच रहे हैं, उससे आगे आप जा सकते हैं। कोशिश करके देखें। जैसे, मान लीजिए आपको पता चलता है कि जिस बैंक में आपका खाता है, वह आपके पैसे का उपयोग अस्त्र-शस्त्रों के व्यापार में लगा रही है, जिनका उपयोग युद्धों में किया जाता है और जिसके आप समर्थक नहीं हैं-या उन परियोजनाओं में जिसे आप उचित नहीं समझते और आपके आदर्शों के विरुद्ध हैं। अगर यह बात आपको परेशान करती है तो थोड़ी खोज करके कोई ऐसा बैंक ढूँढ़िए, जो पर्यावरण या दीर्घकालिक संवहनीय परियोजनाओं में आपका पैसा लगा रहे हैं- और निश्चित ही, ऐसी बैंकें भी अस्तित्व में हैं!

कुछ ऐसी चीज़ें भी हो सकती हैं, जो आपके लिए पूरी तरह वर्जित हैं और जिन्हें आप फिलहाल बदल नहीं सकते। ऐसे मामलों में उन्हें, जैसी हैं, उसी हालत में स्वीकार करना होगा-कि इस दुनिया में हर चीज़ आदर्श नहीं है, कि कुछ मामलों में बदलाव का काम हम भविष्य में कुछ समय बाद शुरू करेंगे, जैसे लोगों के पूर्वग्रह जाते-जाते ही जाते हैं। ऐसी बातों के लिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। उनके प्रति निस्पृह न हों-मैं यह सलाह नहीं दे रहा हूँ। आप पूरी शक्ति के साथ किसी गलत बात के विरुद्ध अपने विचार पर कायम रहें और इंतज़ार करें कि जब संभव होगा तब उन्हें बदलने की कोशिश की जाएगी। लेकिन उन बातों पर उद्विग्न होकर अपनी ऊर्जा और समय बरबाद न करें, जिन्हें आप इस समय कतई बदल नहीं सकते क्योंकि उन पर आपके प्रचंड क्रोध का कोई असर नहीं होने वाला है!

उन्हें बेहतर बनाने की संभावना सदा बनी रहती है, भले ही उसका अस्तित्व लंबे समय तक बना रहे-आप स्वयं एक बेहतर उदाहरण बनकर यह काम कर सकते हैं। आपके पास आपकी ईमानदारी है और आप उसे संभालकर रखें, उसकी हिफाजत करें। आपको बेईमान होने की ज़रूरत नहीं है। अगर स्थितियाँ आपको उस तरफ धकेल रही हैं तो उन्हें बदलने का प्रयास कीजिए। अन्यथा अच्छी, सुंदर बातों का नज़ारा कीजिए और खुश रहिए।

हाँ, मुझे सेक्स, पैसा, भौतिक पदार्थ और मेरी पत्नी पसंद हैं और मुझे कोई अपराधबोध भी नहीं है! 19 नवंबर 2015

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक ऐसा मेहमान आया, दुनिया के बारे में जिसका बहुत कट्टर नज़रिया था। कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो, आप कुछ भी कहें या करें, आपको नीचा दिखाने की चाह रखते हैं। यह व्यक्ति उसी तरह का व्यक्ति था- और आज मैं उसी व्यक्ति को ऐसे व्यवहार का उदाहरण बनाना चाहता हूँ।

यह व्यक्ति अपने आप को कम्युनिस्ट विचारधारा का नास्तिक कहता था। वह हमेशा बातचीत के लिए सन्नद्ध रहता था-जो अक्सर दूसरों को नीचा दिखाने की कवायत में बदल जाती थी। इसी तरह जब एक बार हम आश्रम में टहल रहे थे तो उसने मेरे कपड़ों के बारे में पूछा। निश्चय ही, यह पहला मौका नहीं था जब किसी ने मुझसे मेरे कपड़ों के बारे में पूछा था। दरअसल यह अक्सर होता है लेकिन इस बार प्रश्न के स्वर में एक प्रकार का आरोप नज़र आता था: अगर मैं खुद को नास्तिक कहता हूँ तो ऐसे कपड़े क्यों पहनता हूँ जिससे कोई अन्य धारणा बनती है?

अपने ब्लॉगों में पहले ही मैं स्पष्ट कर चुका हूँ कि अपने कपड़ों से मैं कोई सन्देश नहीं दे रहा हूँ। जैसे भी हों, मुझे यही कपड़े पसंद हैं और दूसरी तरह के कपड़े मैं नहीं पहनना चाहता।

अपने प्रश्न के इस उत्तर पर उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया: आपको अपने कपड़े पसंद हैं? यानी आपको भौतिक वस्तुएँ पसंद हैं?

जी हाँ, पसंद हैं! मुझे बहुत से साज़ो-सामान पसंद हैं और पैसा कमाना भी पसंद है। मुझे अपने काम से प्यार है और मैं अपनी पत्नी और बेटी से भी प्यार करता हूँ! मैं किसी तरह की धार्मिक जड़ता से या ऐसे किसी अन्य दर्शन से बंधा हुआ नहीं हूँ, जो मुझे सलाह दे कि यह पहनो और वह न पहनो! मैं किसी दूसरे व्यक्ति के विचारों को इजाज़त नहीं देता कि वे मेरी भावनाओं को निर्देशित करने लगें!

बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि भौतिक वस्तुओं से अलिप्तता ही सही रास्ता है। बहुत से लोग ब्रह्मचर्य पर विश्वास करते हैं और भावनाओं के प्रति अलिप्तता को भी उचित मानते हैं। भारत में ऐसे लोग अधिकतर धार्मिक साधू होते हैं। पश्चिम में भी ऐसे लोग अध्यात्मवादियों में पाए जाते हैं। वे अधार्मिक हो सकते हैं लेकिन फिर भी उनकी कोई न कोई विचारधारा होती है और साथ ही यह विचार कि आपको क्या प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

ये सारे लोग मानते हैं कि हमें अपने कपड़ों से लगाव नहीं होना चाहिए, पैसे से प्यार नहीं होना चाहिए और हमें अपने करीबी लोगों से अलिप्त रहना चाहिए। उन्हें जो मानना है, मानते रहें लेकिन मैं अपने जीवन का पूरा मज़ा लेना चाहता हूँ! मैं मानता हूँ कि जीवन का आनंद न लेना गलत है इसलिए मुझे अपने वस्त्र पसंद हैं और मैं अपने काम से प्रेम करता हूँ। जैसे मुझे गरीब बच्चों की मदद करना अच्छा लगता है, उसी तरह पैसे कमाना भी बहुत अच्छा लगता है। मैं अपनी बेटी से और पत्नी से प्यार करता हूँ, मुझे सेक्स बहुत पसंद है और मुझे हर तरह की आरामदेह सुविधाओं का उपभोग भी बहुत पसंद है। मैं छुट्टियाँ मनाना पसंद करता हूँ-जैसा कि मैं इस समय जर्मनी में अपने परिवार और बहुत सारे दोस्तों के साथ कर रहा हूँ!

मुझे जीवन का आनंद लेना पसंद है। मुझे जीवन से प्यार है और मानता हूँ कि हम सब को जीवन का हरसंभव अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करना चाहिए। यदि आप कोई इतर विचार रखते हैं, तो बेशक अपने विचार के साथ खुश रहें और उसी के अनुसार जीवन बिताएँ-मुझे अपने विचारों के लिए नीचा दिखाने की कोशिश न करें। इसमें आपको सफलता नहीं मिलेगी और आप बेकार ही मेरा और खुद अपना समय बरबाद करेंगे। मैं आपको सहमत करने की कभी कोशिश नहीं करूँगा। मैं सिर्फ एक सलाह दूँगा: सिर्फ एक बार मेरी तरह जीवन का आनंद लेने और उससे प्यार करने की कोशिश करके देखिए। आप पछताएँगे नहीं!

आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए फंदा: अस्तित्वहीन की खोज का अंतहीन सिलसिला – 30 जुलाई 2014

कल मैंने इस बात की ओर इशारा किया था कि गुरु और धर्म लोगों को आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु बनाने के ज़िम्मेदार हैं। मेरा विश्वास है कि ऐसा जानबूझकर किया जाता है- जिससे वे ज़्यादा से ज़्यादा शक्तिशाली हो सकें!

मैं आपको बता चुका हूँ कि इसे किस तरह अंजाम दिया जाता है: मान लीजिए कोई वास्तव में अपने जीवन से असंतुष्ट है। उसका परिवार, उसका काम-धंधा, उसकी आर्थिक स्थिति या उसका व्यक्तिगत अथवा यौन जीवन, कुछ न कुछ होता है जो ठीक नहीं चल रहा होता। उसे एहसास होता है कि कोई चीज़ है जो उसके पास नहीं है मगर क्या, वह समझ नहीं पाता। बेचैन होकर वह उसकी खोज में, उसे किसी भी तरह प्राप्त करने की कोशिश में लग जाता है। और जो उसे मिलता है वह होता है इस खोज में उसकी सहायता का जबरदस्त आश्वासन-आध्यात्मिक गुरुओं की ओर से, साधु-संतों और स्वामियों की ओर से और सीधे-सीधे धर्मों (धर्मग्रंथों) की ओर से!

अब यह व्यक्ति अपने आपको ‘आध्यात्मिक साधक या जिज्ञासु या अन्वेषक कहता है और समझता है कि निश्चय ही उसने कुछ न कुछ खो दिया है। उसे यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसे उनका अनुसरण करना चाहिए जो कथित रूप से, यह जानते हैं कि उसने क्या खोया है। जो उसे रास्ता दिखा सकता है। लेकिन वह नहीं समझता कि उसकी तलाश कभी ख़त्म नहीं होने वाली है!

साधु-संत, गुरु और धर्म (धर्मग्रन्थ), ये सब यही सिखाते हैं कि कोई न कोई ऐसी रहस्यमय चीज़ मौजूद है जिसे आप नहीं समझ सकते, जज़्ब नहीं कर सकते और यह भी कि उसे आप सिर्फ उन्हीं के ज़रिए जान सकते हैं, प्राप्त कर सकते हैं। आपके पास अब यही काम रह जाता है कि उसे खोजें लेकिन आप उस पहेली को कभी भी हल नहीं कर सकते, उस भूलभुलैया से किसी भी हालत में बाहर नहीं निकल सकते।

सिर्फ आपके चलते, जो अपने आपको आध्यात्मिक साधक मानता है, उनका धंधा-पानी चल सकता है। वे तभी सफल ही सकते हैं जब आप जैसे अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ सकें। उन्हें इस विश्वास का भुलावा देकर कि वे आपको कुछ दे सकते हैं, कि वे आपको सुख-शांति की ओर ले जाने वाला सही रास्ता दिखा सकते हैं। वास्तव में वे चाहते ही नहीं हैं कि आप उस चीज़ को पा सकें, जिसकी खोज में आप लगे हुए हैं। इसलिए आप एक तरह की माया, मृगतृष्णा के पीछे भागते रह जाते हैं। एक प्रायोजित अयथार्थ, असार, बनावटी चीज़ के पीछे। परमानंद के मायाजाल के पीछे, जिसका वास्तविक आनंद से कोई संबंध नहीं है।

आपका दुख और अवसाद ईश्वर के खो जाने से नहीं है। आप उनके द्वारा प्रस्तावित और प्रदान की गई काल्पनिक चीजों से कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि आप अपने भौतिक जीवन की किसी बात से नाखुश हैं। आप प्रेम खो बैठे हैं, या सम्मान या प्रशंसा, रुपया-पैसा या सफलता, किसी दोस्त या भावनात्मक सहारे को खो बैठे हैं।

इसका संबंध किसी न किसी सांसारिक कमी से है-और इसमें मैं प्रेम को भी शामिल करता हूँ-जिसने आपको इस खोज की ओर प्रवृत्त किया है। और एक बार फिर मैं यह बात दोहराता हूँ: खोजना बंद करें और आपको मिलेगा। ऐसे किसी व्यक्ति के चंगुल में न फँसें, जिसका धंधा ही आध्यात्मिक जिज्ञासुओं को उनकी समस्याओं के मायावी और काल्पनिक समाधान की ओर उद्यत करना है!

अगर पाना चाहते हैं तो खोजना बंद करें! 29 जुलाई 2014

कल मैंने आपको एक व्यक्ति के बारे में बताया था जो मेरे व्यक्तिगत-सत्र में आया था और जीवन के उद्देश्य के बारे में पूछ रहा था। कई लोग मुझसे ऐसे दार्शनिक प्रश्न पूछते रहते हैं और लगभग हमेशा ही वे मुझसे कहते हैं: ‘मैं जिज्ञासु अथवा साधक हूँ’। इस जानकारी के बाद जो भी वे पूछते हैं, वह उनका अगला कदम होता है। लेकिन सबसे पहले मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मेरे विचार से यह दृष्टिकोण ही गलत है!

लोग मुझसे कहते हैं, वे किसी की खोज में लगे हुए हैं। वे यह बात कुछ इस तरह कहते हैं जैसे किसी चीज़ का वर्णन कर रहे हों, अपनी परिभाषा बता रहे हों, किसी ज़ाहिर सी बात पर उँगली रख रहे हों, अपने आप को किसी खाँचे में ढाल रहे हों। लेकिन मुझे बताइए, आप यह खोज किसलिए कर रहे हैं? ईश्वर के लिए?

अगर आप कुछ खोज रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि कुछ खो गया है। कुछ अधूरा है, आपकी कोई चीज़ गुम हो गई है, आप कुछ भूल रहे हैं और आपने ऐसा कुछ खो दिया है जिसे अब आप ढूंढ़ रहे हैं। अगर आपको ऐसा महसूस हो रहा है कि आप ईश्वर को खोज रहे हैं, किसी उच्च शक्ति को या हर जगह मौजूद कोई ऊर्जा, जिसकी आप कल्पना कर रहे हैं, तो मुझे आपसे एक बात पूछनी है: क्या ईश्वर वास्तव में गुम हो गया है? अगर वह खो सकता है तो क्या आप उसे कोई उच्च शक्ति मान सकते हैं? वह अपना इतना भी ख्याल नहीं रख सकता कि न गुमे! नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता।

इसका जवाब देते हुए लोग मुझसे कहते हैं कि दरअसल ईश्वर नहीं गुमा है, वे स्वयं गुम गए हैं।

एक और विचलन, एक दूसरा ही खयाल। अब यह कि आपने ध्यान नहीं दिया और ईश्वर गुम गया। क्या अब आपको नहीं लगता कि काश कोई गुरु होता, जिसका हम अनुसरण कर पाते, एक गुरु या धर्म जैसी कोई संस्था, कोई संगठन, जिसकी सहायता से आप अपना रास्ता खोज सकते? देखा, कितनी खूबसूरती से आपको इस दलदल में खींच लिया गया है!

अगर इस तरह खोजते रहे तो आप जीवन भर खोजते ही रहेंगे और किसी हालत में वह नहीं मिल पाएगा जिसकी खोज में आप लगे हुए हैं! आप हमेशा-हमेशा के लिए एक साधक या किसी के अनुयायी ही बने रहेंगे।

मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी ने कहा हो: ‘मैं जिज्ञासु था और अब मैंने वह ढूंढ़ लिया है, जिसकी तलाश मैं कर रहा था!’

आपको यह खोज बंद करनी होगी। अन्यथा आपका सारा जीवन इसी खोजबीन में मर-खप जाएगा। आप अपने जीवन से असंतुष्ट हैं और यही कारण है कि आप लगातार इस खोज की आवश्यकता महसूस करते हैं! एक बार यदि आप इस बात को समझ लें और अपने सामान्य जीवन की ओर लौट सकें तो आप देख सकेंगे कि आपके पास कितना कुछ उपलब्ध है। इसलिए यह तलाश करने की कोशिश करें कि अपने जीवन का कौन सा हिस्सा, अपने जीवन की कौन सी बात आपको दुखी करती है। ठीक-ठीक कौन सी चीज़ है जो आपके पास नहीं है, जिसकी आप आवश्यकता महसूस करते हैं? निश्चय ही, इस बात का मैं आपको भरोसा दिला सकता हूँ कि आपको पता चलेगा, वह चीज़ ईश्वर नहीं है, न ही वह कोई रहस्यमय वस्तु है।

आपको अपने वास्तविक जीवन में तृप्ति और संतोष की खोज करनी चाहिए न कि किसी काल्पनिक, अवास्तविक और मायावी संसार की खोज में अपना जीवन बरबाद करना चाहिए! कल्पनाएँ आपके मन में संदेह पैदा करती हैं-आपका वास्तविक जीवन ही आपको वास्तविक ख़ुशी प्रदान कर सकता है!

अपने आसपास के संसार का आनंद लें। जी हाँ, भौतिक संसार का, भले ही आपके आध्यात्म से ग्रसित कानों को यह कितना भी अजीब क्यों न लगे। भौतिक संसार का आनंद लेने का अर्थ है जीवन की चंचल सुन्दरता में डुबकी लगाना, उसके विभिन्न रंगों का आस्वाद लेना! अगर आप जीवन में प्रसन्न और संतुष्ट हैं तो आपके मन में किसी काल्पनिक वस्तु को खोजने, प्राप्त करने या कोई लक्ष्य हासिल करने का ख़याल तक नहीं आएगा। आपके सामने यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि वह तो यहीं है, पहले से आपके पास मौजूद है।

प्रेम, सुख, संतोष।

खोज बंद कीजिए और ये आपको खुद ब खुद मिल जाएँगे।

सिर्फ असंतुष्ट लोग ही जीवन के मकसद के बारे में पूछते हैं – 28 जुलाई 2014

मैंने अभी हाल ही में एक व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत सत्र किया, जिसके मन में कुछ अजीबोगरीब प्रश्न घूम रहे थे। स्वाभाविक ही, जब मेरी किसी के साथ इस तरह की बातचीत होती है तो मुझे अपने ब्लॉग का विचार आता है और आपका भी कि निश्चय ही आप लोग होते तो इस कमरे में हमारी बातचीत में शामिल होकर उसका भरपूर आनंद ले सकते थे। क्योंकि यह संभव नहीं है मैं इस ब्लॉग के माध्यम से अपनी चर्चा आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ।

जो व्यक्ति मेरे पास व्यक्तिगत सत्र हेतु आया था, उसने बताया कि कुल मिलाकर वह अपने जीवन से पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। वह एक अवकाशप्राप्त व्यक्ति था, जिसका एक परिवार था और उसके कुछ शौक थे, जिन्हें पूरा करके वह खुशी से भर उठता था। योग उनमें से एक था। लेकिन उसने यह भी जोड़ा कि उसकी योग कक्षाओं में अधिकतर लोग अपने आपको जिज्ञासु मानते हैं और उससे पूछते हैं कि क्या "जीवन के मूलभूत प्रश्नों" के उत्तर जानने की उसे कोई जिज्ञासा नहीं होती: जैसे, मैं इस धरती पर क्यों आया हूँ? या यह कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

उसने आगे कहा कि अब उसे भी यह महसूस होने लगा है कि उसे भी इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहिए या कम से कम इसकी खोज करने का प्रयास तो करना ही चाहिए। इस दिशा में वह विभिन्न संभावनाओं पर विचार भी कर चुका था, जिनमें से एक यह विचार था कि उसका यह जीवन उसका एक अवतार मात्र है और इस जीवन को उसे अच्छे कर्म करते हुए बिताना चाहिए, जिससे एक दिन उसे निर्वाण यानी पूर्ण मुक्ति प्राप्त हो सके। उसने मुझसे पूछा कि मैं उसके इस विचार के बारे में क्या सोचता हूँ।

मैंने जवाब दिया कि मेरा मानना यह है कि ये सारे प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं हैं। आपका अस्तित्व यहाँ और अभी है। जब तक आप यहाँ, इस दुनिया में हैं और आपके पास सभी आवश्यक सुख सुविधाएँ मौजूद हैं तो फिर इस बारे में व्यर्थ परेशान होने की आवश्यकता ही क्या है? आप स्वस्थ हैं, आपके पास पर्याप्त भोजन उपलब्ध है, आपके बहुत से यार-दोस्त और भरा-पूरा परिवार है। इसके अलावा आप कह रहे हैं कि इस वक़्त आप वास्तव में बड़े खुश हैं! तो फिर वास्तव में ऐसे प्रश्नों का क्या मतलब रह जाता है?

ये प्रश्न उन लोगों के लिए हैं बल्कि उन्हीं लोगों द्वारा पैदा किए गए हैं, जो नाखुश हैं। जो लोग उन चीजों से संतुष्ट नहीं हैं जो जीवन में उनके पास मौजूद हैं। आप इस वक़्त यहाँ हैं! इस बात पर ध्यान केन्द्रित करने की जगह, इस बात को सुनिश्चित करने की जगह कि आपके जीवन में जो कमी है उसे पूरा करने का प्रयास करें, आप उस समय के बारे में सोचते हैं जो आपकी मृत्यु के बाद आने वाला है!

कोई नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है और हमारी आखिरी साँस के बाद क्या होगा। लेकिन मेरे विचार से उसका कोई महत्व भी नहीं है। वास्तव में जीवन के इस पल में यह बात पूरी तरह अप्रासंगिक है।

मुझे लगता है कि सिर्फ धर्म और वे लोग, जो दूसरों के आध्यात्मिक भ्रमों से लाभ उठाते हैं, इन प्रश्नों का समर्थन और प्रचार करते हैं, इन प्रश्नों को बड़े से बड़ा बनाकर पेश करते हैं और इस तरह उसे इतना महत्वपूर्ण बना देते हैं, जितने महत्वपूर्ण वे कतई नहीं होते।

सिर्फ यहाँ और अभी खुश रहने की कोशिश कीजिए। आपका अस्तित्व है या नहीं? अगर हैं तो फिर उन बातों को, उन चीजों को खोजना शुरू मत कीजिए, जिनका अस्तित्व ही नहीं है या उन प्रश्नों से भ्रमित न होइए, जिनका वास्तव में कोई उत्तर है ही नहीं। दूसरों को आपके जीवन में भ्रम पैदा करने मत दीजिए! जो आप हैं और जो आपके पास उपलब्ध है, उसी में खुश रहिए- आपको किसी काल्पनिक या वायवीय चीज़ को खोजने की ज़रूरत नहीं है!

एक मित्र, जो धर्म पढ़ाता है मगर उस पर विश्वास नहीं करता – 17 जुलाई 2014

जर्मनी में मेरा एक दोस्त है, जिससे मैं, जब भी जर्मनी आता हूँ, अवश्य मिलता हूँ। वह एक स्कूल में धर्म विषय पढ़ाता है। जर्मनी के स्कूलों में धर्म को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और विद्यार्थियों के पास तीन विकल्प होते हैं-या तो वे कैथोलिक या प्रोटेस्टंट ईसाई धर्म पढ़ें या अगर आप अपने बच्चे को किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं देना चाहते तो फिर धर्म के स्थान पर आप उन्हें नीति-शास्त्र भी पढ़ा सकते हैं। मैं शुरू से जानता था कि मेरा मित्र किसी भी धर्म में विश्वास नहीं करता इसलिए इस बार मैंने उससे पूछ ही लिया: "तुम धर्म पढ़ाते ही हो या उस पर विश्वास भी करते हो?"

उत्तर: अरे नहीं! सिर्फ पढ़ाता हूँ, विश्वास नहीं करता!

इस तथ्य की स्वीकारोक्ति का उसका स्पष्टीकरण मुझे बड़ा मज़ेदार लगा और मैं सोचता हूँ आपको भी लगेगा। उसने कहा, मुख्य बात यह कि मैं बायबल को पवित्र पुस्तक नहीं मानता बल्कि प्राचीन धार्मिक उक्तियों और कथाओं का संग्रह मानता हूँ। उसके अनुसार बायबल ईश्वरीय वाणी का लिखित पाठ नही है, जैसा कि कुछ लोग विश्वास करते हैं, बल्कि अलग-अलग समय पर बहुत से लोगों द्वारा कही और लिखी गई कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उदाहरणों और प्रतीकों की सहायता से लोगों तक संदेश पहुँचाने के उद्देश्य से लिखा गया था।

जब आप बायबल पर गौर करें तो इस बात का ध्यान अवश्य रखें। वह प्रतीकों और उपमा-अलंकारों से भरी पड़ी है क्योंकि अतीत में लोग बातों को इसी तरह बेहतर समझ पाते थे और उसमें निहित संदेशों को अच्छी तरह ग्रहण कर पाते थे। उन कहानियों को शब्दशः स्वीकार नहीं किया जा सकता, उनके निहितार्थों की खोज करना आवश्यक है कि क्या कहा जा रहा है। और यह भी खोजना पड़ता है कि क्या वे सन्देश आज के युग में भी कारगर हैं या नहीं।

लेकिन उसके अनुसार, मज़ेदार बात अधिक समझ में आने वाली है, तर्कपूर्ण है: आज के समाज में और लोगों के जीवन में आप धर्म का प्रभाव लक्षित कर सकते हैं, उन पाठों और उन मूल्यों का प्रभाव, जिन्हें हज़ारों साल पहले बताया गया था। ये ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं, जो हमें हमारे समाज के विकास के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं! यूरोपीयन्स के मूल्यों, उनके व्यवहार, रहन-सहन और उनकी भाषाओं पर ईसाइयत का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है!

उसने बताया: मेरे स्कूल में ही धर्म पढ़ाने वाले और भी शिक्षक हैं, जो बायबल को शब्दशः सही मानते हैं! वे उसके एक-एक शब्द पर विश्वास रखते हैं और उसके पाठों को उसी भावना से पढ़ाते हैं! स्वाभाविक ही यह बात बड़ी हास्यास्पद है और विद्यार्थी भी यह बात समझते हैं-लेकिन यह भी सही है कि दुनिया में हर तरह के लोग पाए जाते हैं और इसीलिए, मेरे विचार में स्कूलों में धर्म की कक्षाएँ नहीं होनी चाहिए: पता नहीं कब कोई मूर्ख अतिवादी ईसाई-पंथी आपके बच्चे को बरगलाना शुरू कर दे! इसकी संभावना कम करके नहीं आँकी जा सकती। यह क्षेत्र ऐसे दावों से भरा पड़ा है, जिन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता इसलिए यहाँ हर वक़्त अतिवाद पनपने की पूरी संभावना होती है। इसलिए सिर्फ वैज्ञानिक सोच अपनाना ही मेरी समझ से उचित तरीका हो सकता है।

इसलिए जब मेरे मित्र ने कहा कि वह तो एक वैज्ञानिक है, पुरोहित नहीं तो मैं उसका मंतव्य अच्छी तरह समझ गया। हम दोनों ने ही धर्म-विज्ञान का अध्ययन किया है मगर पूरी तरह अलग-अलग तरीके से!

मुक्ति की आकांक्षा में मृत्यु कि प्रतीक्षा करने के स्थान पर जीवित रहते हुए अपने आपको धर्म के बंधन से मुक्त कीजिए और खुश रहिए! 16 जुलाई 2014

क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं, जो अपने जीवन को लेकर नकारात्मकता और अफसोस (दीनता) से भरे होते हैं? मुझे हाल ही में इसका एक धार्मिक कारण याद आ गया है, जो कम से कम हिंदुओं के मामले में साफ मौजूद दिखाई देता है। दीनता का औचित्य अथवा जीवन का अफसोस क्यों?: हिन्दू धर्म के मुताबिक आप जीवन की शुरुआत ही पाप से करते हैं।

शायद आप जानते होंगे कि हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता पाई जाती है। हिन्दू धर्मग्रंथों के इस विचार के अनुसार वे यह भी मानते हैं कि मनुष्य का जन्म होता ही उसकी आत्मा के अधःपतन के चलते है।

जब एक भले व्यक्ति की मृत्यु होती है तो हिन्दू समझते हैं कि उसने अच्छे कर्म किए हैं इस कारण वह व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश का और वहाँ अस्थाई रूप से रहने का हकदार हो गया है। जब वह स्वर्ग में रहकर अपने पुण्य कर्मों को खर्च कर देता है तो उसे वापस पृथ्वी पर लौटना पड़ता है क्योंकि स्वर्ग में कर्मों के अनुसार उसका निर्धारित समय पूरा हो चुका है । वह अभी मुक्त नहीं हुआ है अन्यथा उसे स्वर्ग जाना ही नहीं पड़ता-उसकी आत्मा मुक्त हो जाती और सीधे इस संसार के रचयिता परमपिता परमेश्वर में मिल जाती। इस तरह धार्मिक रूप से एक हिन्दू का जीवन में एकमात्र मक़सद मुक्ति पाना होता है, जिससे उसे दोबारा जन्म लेकर धरती पर वापस न आना पड़े!

कुल मिलाकर यह कि आपका पुनर्जन्म लेना एक बुरी बात है। आपकी एकमात्र इच्छा होती है कि काश पुनः जन्म लेकर धरती पर आने की आवश्यकता न पड़ती, काश मैं इस संसार में नहीं होता, कि काश मुझे मुक्ति मिल गई होती! अर्थात आप कह रहे होते हैं कि काश मेरा जन्म नहीं होता! तो आप पूरा ज़ोर इस बात पर लगा देते हैं कि इस पुनर्जन्म के चक्कर से पीछा छुड़ा सकें। आप दिन में कई बार प्रार्थना करते हैं, देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं, गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाने के लिए लम्बी यात्राएँ करते हैं और हर साल तीर्थाटन करते हैं।

आप जन्म से ही पापी हैं। आप खुश रहने की अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

मैंने सुना है कि ईसाइयत में भी यह विचार मौजूद है! विस्तार से इस विषय में मैं नहीं जानता मगर इतना जानता हूँ कि वे उस मिथकीय कहानी पर विश्वास करते हैं, जिसके अनुसार मनुष्य स्वर्ग की जगह इस धरती पर सिर्फ इसलिए है कि मनुष्य जाति की आदि-माता ईव ने ईश्वर के आदेश के विरुद्ध जाकर भले-बुरे के ज्ञान-वृक्ष का सेव्-फल खा लिया था। अब सारा जीवन आपको भला व्यक्ति बनने की कोशिश करनी चाहिए, ईश्वर से प्रेम करना चाहिए और सारी मनुष्य जाति के पापों का प्रायश्चित्त करने वाले जीसस से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे आपकी रक्षा करें।

धर्म चाहता है कि आप अपने अपराधबोध से कभी मुक्त न हों। उस अपराध या पाप के लिए जिसे आप जानते तक नहीं, जिसे आपने अंजाम नहीं दिया है! आप पैदा ही इसलिए हुए कि आपके किसी पूर्वज ने यह अपराध किया था और अब उसका प्रायश्चित्त आपको करना है और इस कहानी में परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है!

तो आपको इस एहसास के साथ सारा जीवन गुज़ारना है, सिर्फ ऐसे काम करने हैं जिनसे आप पर उस काल्पनिक ईश्वर की कृपा बनी रहे। जब आप इन बातों पर विश्वास करते हैं तो फिर कभी भी खुश कैसे रह सकते हैं?

धर्म आपको बताता है कि मृत्यु के बाद आपको किस तरह मुक्ति मिल सकती है-लेकिन अगर आप वास्तव में खुश रहना चाहते हैं तो आपको जीवित रहते हुए ही मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए!

क्यों आप खुद कठपुतली बनकर अपने जीवन को किसी गुरु के हवाले करना चाहते हैं?- 22 जुलाई 2013

आज गुरु-पूर्णिमा है, जिसे आचार्य दिवस भी कहा जा सकता है। इस दिन हर शिष्य अपने गुरु का सम्मान करता है। सारा साल भले ही वह उसे भूला हुआ हो, आज के दिन वह गुरु के पास अवश्य आएगा, गुरु के पाँव पखारेगा, उसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेगा और उसे दक्षिणा के रूप में कुछ धन अर्पित करेगा। अगर वह बहुत दूर रह रहा है तो वह उससे फोन पर बात करेगा और उनसे आशीर्वाद लेगा। मैं खुद भी बहुत समय तक गुरु की भूमिका में रहा हूँ और इस स्थिति से वाकिफ हूँ। मैं अब बदल चुका हूँ, इतना बदल चुका हूँ कि जिस बात की मैं सालों पहले खुद अनुशंसा किया करता था उसी का आज मैं कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ। इसके साथ ही गुरुवाद के इस चलन का भी।

मैं धर्म-ग्रन्थों में लिखी बातों पर भरोसा किया करता था और उसी का उपदेश देते हुए उसका प्रचार-प्रसार करता था। वह यह कि: "गुरु के बिना आपकी मुक्ति नहीं है। मुक्ति ही मनुष्यमात्र का लक्ष्य होना चाहिए और मुक्ति प्राप्त करने के लिए उसे जीवन भर प्रयास करते रहना चाहिए-इसलिए हर एक को चाहिए कि पहले वह एक ऐसे गुरु की तलाश करे जो उसे मुक्ति दे सकता है।"

आज मैं महसूस करता हूँ कि लोगों की यही हालत इस क्षेत्र में होने वाले भ्रष्टाचार की जड़ है। भोले भाले, मासूम लोग उनके पास आते हैं और उन्हें तीन बातें सिखाई जाती हैं:

1) आपको मुक्ति तभी मिलेगी जब आप किसी को गुरु बना लें।

2) जैसे आपके एक ही पिता हो सकते हैं उसी तरह आप जीवन में सिर्फ एक ही व्यक्ति को गुरु बना सकते हैं।

3) आपको अपना सर्वस्व गुरु को समर्पित करना होगा। वह आपकी सारी ज़िम्मेदारी वहन करेगा और बदले में आपको वही करना होगा जो उसका आदेश हो।

जिस पल आप अपने गुरु से दीक्षा ग्रहण करते हैं, आप अपने सारे कर्मकांड उसे अर्पित कर देते हैं। आप उसकी सलाह पर चलते हैं और अपनी प्रार्थनाएँ, मन ही मन, उसके साथ ही करते हैं। उसके इस दावे पर

कि वह आपको इस मृग-माया से निकालकर मुक्ति दिलाएगा, आप अपनी सहमति से और खुशी-खुशी उसकी कठपुतली बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्वाभाविक ही गुरु इसे और इसके साथ आने वाली हर चीज को पसंद करते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है। अपने शिष्यों को अपने साथ बनाए रखने के लिए वे इस नियम का प्रचार करते हैं कि किसी भी शिष्य का एक ही गुरु हो सकता है।

यह पूरी व्यवस्था ही मेरे विचार में, दुरुपयोग तथा शोषण करने के इरादे से ही बनाई गई है और यही कई दशकों से, बल्कि सदियों से हो रहा है। ये गुरु अपने शिष्यों के मस्तिष्क पर पूरा अधिकार रखते हैं और वे जान-बूझकर दौलत पाने और न सिर्फ अपने शारीरिक सुख बल्कि अपनी स्वैर, अप्राकृतिक यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी उनका दुरुपयोग करते हैं। वहाँ होने वाले कृत्य बेहद अनैतिक और समाजविरोधी होते है।

मेरे विचार में गुरु महज एक शिक्षक होता है, जो कि उसका शाब्दिक अर्थ भी है। अगर आप कुछ सीखना चाहते हैं तो आपको गुरु की आवश्यकता पड़ती है। जब मैं स्कूल जाता था तो कक्षा के सारे बच्चे शिक्षकों को आदर के साथ ‘गुरुजी’ कहा करते थे। इस बात से कोई मतलब नहीं होता था कि वह व्यक्ति कौन है। कोई भी, जिससे आप कुछ सीखते हैं, आपका गुरु हो सकता है, भले ही वह आपसे उम्र में छोटा ही क्यों न हो। और इस तरह आपके कई गुरु हो सकते हैं, जो भी आपको शिक्षा प्रदान करता है।

किसी की कठपुतली मत बनिए। जिससे भी आप कुछ सीखते हैं उसे आप आदरपूर्वक शिक्षक का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह निर्भर न रहिए। अपने संबंध को सिर्फ शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध ही बना रहने दें और उसमें किसी दैवत्व के पहलू को जगह न दें।

लोग यह तर्क कर सकते हैं कि अगर आप धर्मग्रंथों और धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं तो आपको एक आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु की आवश्यकता हो सकती है। मैंने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा इसी काम में खर्च किया है। आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ: आखिर आप क्यों इस धार्मिक दर्शन का अध्ययन करना चाहते हैं? मेरे विचार में यह बिलकुल व्यर्थ है। आप एक ईमानदार और सुखपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। इसके लिए वेदों, कुरान या बाइबल की आपको कहाँ आवश्यकता है? उन्हें पढ़कर आप अपने ज्ञान के क्षितिज को सीमित कर लेंगे, अपने रास्ते को संकरा कर लेंगे और संदेहग्रस्त हो जाएंगे। तो अगर आपको ऐसे दर्शन की आवश्यकता ही नहीं है तो फिर धार्मिक गुरु की आवश्यकता क्यों होगी?

अपने गुरु आप खुद बनिए। आपका प्रेम, आपकी सहज विनम्रता और नैतिकता आपकी गुरु है। यही चीज़ें आपको सही रास्ता दिखाएंगी। बस, उन्हें वैसा करने आज़ादी दे दीजिए।

अगर मैं, आप और हम सब ईश्वर हैं तो आप ये उपदेश किसे दे रहे हैं? – 21 जून 2013

मुझे विश्वास है कि आपने कभी न कभी वेदान्त के दर्शन के बारे में अवश्य सुना होगा जो यह कहता है कि "मैं ही ईश्वर हूँ, आप भी ईश्वर हैं और सभी ईश्वर हैं।" यह दर्शन हमें यह सिखाता है कि जो कुछ भी आपके आस-पास है सभी ईश्वर के ही रूप हैं। एक समय ऐसा भी था जब मैं इस दर्शन के प्रति बहुत आकर्षित था लेकिन ईश्वर और धर्म पर विश्वास समाप्त होने के बाद मैंने इस दर्शन पर भी बहुत विचार किया, जिसका सार आज आपके सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ।

अगर सभी वस्तुएँ और सारे व्यक्ति ईश्वर हैं तो फिर आप किसे यह बताना चाहते हैं? आप ईश्वर हैं-तो फिर आप ईश्वर के बारे में ही उपदेश क्यों दे रहे हैं? अगर आप ईश्वर हैं तो आपको ऐसे प्रचार से ऊपर होना चाहिए जिसमें दूसरों को कायल करने की कोशिश की जाती है। या तो आपमें इतनी क्षमता होनी चाहिए कि दूसरे स्वतः आप पर विश्वास करें क्योंकि आप तो सब कुछ कर सकने वाले सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं। या फिर आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि वे आप पर विश्वास नहीं करते, क्योंकि आप तो जानते ही हैं कि ईश्वर के रूप में आपका अस्तित्व है ही।

लेकिन थोड़ा रुकिए। अगर आपके आस-पास के सभी व्यक्ति भी ईश्वर हैं तो फिर इस प्रश्न के साथ कि ‘आप क्यों उपदेश दे रहे हैं’ के साथ ही यह प्रश्न भी उपस्थित हो जाता है कि ‘आप किसे उपदेश दे रहे हैं’? अगर सामने वाला भी ईश्वर ही है तो उसे भी जानना चाहिए कि सभी ईश्वर हैं, जैसा कि आप जानते हैं। इसलिए आखिर उन्हें ईश्वर के विषय में उपदेश देने की आवश्यकता ही क्या है?

इसका तो मतलब यही हुआ कि या तो आप अपने विश्वास पर दृढ़ नहीं हैं कि आप ईश्वर हैं या फिर आप यह विश्वास नहीं करते कि सामने वाला, जिसे आप अपना उपदेश सुना रहे हैं, ईश्वर है। अर्थात, आप जो कह रहे हैं उस पर वास्तव में आपका विश्वास नहीं है। जो इस दर्शन के बारे में सुनता है या पढ़ता है, उसे बड़ा अच्छा लगता है, क्योंकि ये शब्द बड़े मोहक हैं मगर उनमें इसके अलावा कुछ नहीं है!

इन शब्दों से आप किसी का दुख-दर्द नहीं मिटा सकते। किसी अन्याय, शोषण, तानाशाही या अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने में भी ये शब्द मदद नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि जो अन्याय कर रहा है, शोषण कर रहा है, तानाशाह, अपराधी, हत्यारा और बलात्कारी, सभी, हैं तो ईश्वर ही!

यहाँ तक कि आप किसी से प्रेम भी नहीं कर सकते! आप पूछेंगे, प्रेम क्यों नहीं कर सकते भाई? यदि कोई अच्छा व्यक्ति है और आप मानते हैं कि वह ईश्वर जैसा है, उससे निश्चय ही आपको प्रेम हो जाना चाहिए! लेकिन आप यह देखिए कि प्रेम के लिए कम से कम दो लोग तो चाहिए और यहाँ तो सब मिलाकर एक ही हैं!

सिद्धान्त के रूप में यह बड़ा सुहावना लगता है मगर व्यवहार में इस सिद्धान्त का कोई अर्थ नहीं है। इस सिद्धान्त ने मुझे एक बार पुनः यह समझाया कि कैसे धर्म ने ईश्वर नाम का एक काल्पनिक चरित्र गढ़ा है और इस बार वह कोई ‘एकमात्र’ नहीं बल्कि ‘सब कुछ’ है। लोगों को बेवकूफ बनाने का एक नया तरीका! धर्मग्रंथों में इतने सारे अंतर्विरोध हैं कि एक विचार या सिद्धान्त को समझने में आपको वर्षों लग जाते हैं और फिर कोई दूसरा विचार सामने आता है और पिछले विचार को भूल-भालकर इस दूसरे विचार को समझना पड़ता है।

लेकिन, दोनों में से कोई भी आपके किसी काम का नहीं है! इसलिए निस्संकोच अपने मोटे-मोटे, विशालकाय धर्मग्रंथों को रद्दी की टोकरी में फेंक दीजिए और धर्मों को तिलांजलि दे दीजिए। ये अपने पेचीदा दार्शनिक सिद्धांतों से आपके दिमाग को न सिर्फ उलझाते हैं, समय बर्बाद करते हैं, बल्कि एक तरह का फितूर भी पैदा करते हैं!

आखिर, प्रेम और ईमानदारी के साथ जीवन गुजारने के लिए आपको इन धर्मग्रंथों, ईश्वर और दार्शनिक विचारों की आवश्यकता ही क्या है?