एक मित्र, जो धर्म पढ़ाता है मगर उस पर विश्वास नहीं करता – 17 जुलाई 2014

शहर:
केमनित्ज़
देश:
जर्मनी

जर्मनी में मेरा एक दोस्त है, जिससे मैं, जब भी जर्मनी आता हूँ, अवश्य मिलता हूँ। वह एक स्कूल में धर्म विषय पढ़ाता है। जर्मनी के स्कूलों में धर्म को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और विद्यार्थियों के पास तीन विकल्प होते हैं-या तो वे कैथोलिक या प्रोटेस्टंट ईसाई धर्म पढ़ें या अगर आप अपने बच्चे को किसी भी धर्म की शिक्षा नहीं देना चाहते तो फिर धर्म के स्थान पर आप उन्हें नीति-शास्त्र भी पढ़ा सकते हैं। मैं शुरू से जानता था कि मेरा मित्र किसी भी धर्म में विश्वास नहीं करता इसलिए इस बार मैंने उससे पूछ ही लिया: "तुम धर्म पढ़ाते ही हो या उस पर विश्वास भी करते हो?"

उत्तर: अरे नहीं! सिर्फ पढ़ाता हूँ, विश्वास नहीं करता!

इस तथ्य की स्वीकारोक्ति का उसका स्पष्टीकरण मुझे बड़ा मज़ेदार लगा और मैं सोचता हूँ आपको भी लगेगा। उसने कहा, मुख्य बात यह कि मैं बायबल को पवित्र पुस्तक नहीं मानता बल्कि प्राचीन धार्मिक उक्तियों और कथाओं का संग्रह मानता हूँ। उसके अनुसार बायबल ईश्वरीय वाणी का लिखित पाठ नही है, जैसा कि कुछ लोग विश्वास करते हैं, बल्कि अलग-अलग समय पर बहुत से लोगों द्वारा कही और लिखी गई कहानियों का संग्रह है, जिन्हें उदाहरणों और प्रतीकों की सहायता से लोगों तक संदेश पहुँचाने के उद्देश्य से लिखा गया था।

जब आप बायबल पर गौर करें तो इस बात का ध्यान अवश्य रखें। वह प्रतीकों और उपमा-अलंकारों से भरी पड़ी है क्योंकि अतीत में लोग बातों को इसी तरह बेहतर समझ पाते थे और उसमें निहित संदेशों को अच्छी तरह ग्रहण कर पाते थे। उन कहानियों को शब्दशः स्वीकार नहीं किया जा सकता, उनके निहितार्थों की खोज करना आवश्यक है कि क्या कहा जा रहा है। और यह भी खोजना पड़ता है कि क्या वे सन्देश आज के युग में भी कारगर हैं या नहीं।

लेकिन उसके अनुसार, मज़ेदार बात अधिक समझ में आने वाली है, तर्कपूर्ण है: आज के समाज में और लोगों के जीवन में आप धर्म का प्रभाव लक्षित कर सकते हैं, उन पाठों और उन मूल्यों का प्रभाव, जिन्हें हज़ारों साल पहले बताया गया था। ये ऐतिहासिक दस्तावेज़ हैं, जो हमें हमारे समाज के विकास के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं! यूरोपीयन्स के मूल्यों, उनके व्यवहार, रहन-सहन और उनकी भाषाओं पर ईसाइयत का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है!

उसने बताया: मेरे स्कूल में ही धर्म पढ़ाने वाले और भी शिक्षक हैं, जो बायबल को शब्दशः सही मानते हैं! वे उसके एक-एक शब्द पर विश्वास रखते हैं और उसके पाठों को उसी भावना से पढ़ाते हैं! स्वाभाविक ही यह बात बड़ी हास्यास्पद है और विद्यार्थी भी यह बात समझते हैं-लेकिन यह भी सही है कि दुनिया में हर तरह के लोग पाए जाते हैं और इसीलिए, मेरे विचार में स्कूलों में धर्म की कक्षाएँ नहीं होनी चाहिए: पता नहीं कब कोई मूर्ख अतिवादी ईसाई-पंथी आपके बच्चे को बरगलाना शुरू कर दे! इसकी संभावना कम करके नहीं आँकी जा सकती। यह क्षेत्र ऐसे दावों से भरा पड़ा है, जिन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता इसलिए यहाँ हर वक़्त अतिवाद पनपने की पूरी संभावना होती है। इसलिए सिर्फ वैज्ञानिक सोच अपनाना ही मेरी समझ से उचित तरीका हो सकता है।

इसलिए जब मेरे मित्र ने कहा कि वह तो एक वैज्ञानिक है, पुरोहित नहीं तो मैं उसका मंतव्य अच्छी तरह समझ गया। हम दोनों ने ही धर्म-विज्ञान का अध्ययन किया है मगर पूरी तरह अलग-अलग तरीके से!