मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठाते हुए आर्थिक बराबरी का उपदेश – 25 नवम्बर 2015

दर्शनशास्त्र

कुछ समय पहले हमारे आश्रम में एक बहुत कट्टर विचारों वाला व्यक्ति मेहमान बनकर आया। उसका विचार था कि हर व्यक्ति को एक-दूसरे के बराबर होना चाहिए। हम भी बराबरी के विचार के हामी हैं और आश्रम में भी बराबरी के इस विचार को प्रोत्साहित करते हैं लेकिन उसने अपने कुछ विचारों और आदर्शों का जैसा वर्णन किया, उससे हम कतई सहमत नहीं हो सकते थे। उनमें से एक यह था कि हर एक को काम के घंटों के अनुसार एक समान पारिश्रमिक दिया जाना चाहिए। और हर एक को उतने घंटे ही काम करना चाहिए, जितने घंटे वह करना चाहता हो। इस विचार को इस तथ्य के साथ जोड़कर देखने पर कि वह स्वयं बेहद आलसी था, उसकी बात से सहमत होना मेरे लिए असंभब था!

मैं उसके विचार के मर्म को समझ रहा हूँ और निश्चित ही उसके कुछ बिंदुओं से सहमत भी हो सकता हूँ: कि एक तरफ कुछ लोग हैं जो कम से कम समय श्रम करके इतना अधिक कमा लेते हैं कि उस पैसे को जीवन भर खर्च नहीं कर सकते और दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जो दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करते हैं, छुट्टियाँ भी नही ले पाते और बड़ी मुश्किल से अपना घर-खर्च चला पाते हैं। इस स्थिति में सुधार होना चाहिए और किसी व्यक्ति को पैसे की कमी के कारण भूखा मरने के लिए नहीं छोड़ देना चाहिए।

लेकिन अपने उस मेहमान के विचार में मैं इस समस्या का समाधान नहीं देखता! उसने मुझसे कहा कि एक डॉक्टर, वैज्ञानिक, एक निर्माण मजदूर और सफाई कर्मचारी को एक समान वेतन मिलना चाहिए। और साथ ही, हम सबको चाहिए कि अपनी ज़रूरतों को कम करें, अर्थात हमें कम से कम साधनों में जीवन यापन करना चाहिए। इस तरह हर किसी को उसकी आवश्यकतानुसार प्राप्त हो जाएगा।

सैद्धांतिक रूप से यह पूरी तरह सही विचार लगता है लेकिन व्यावहारिक जीवन में यह संभव नहीं है! निश्चित ही सभी का काम महत्वपूर्ण है, भले ही वे कोई भी काम कर रहे हों क्योंकि हमें फर्श भी लगवाना पड़ता है और उसे साफ़ भी करवाना पड़ता है और उसके बाद ही हम उस पर चल सकते हैं और उस पर प्रयोगशाला बनाकर वैज्ञानिक प्रयोग कर सकते हैं! लेकिन एक डॉक्टर ने अपनी पढ़ाई में सालों खर्च किए हैं और उसका काम जीवन बचाता है। वह बरतन भी साफ़ कर सकता है मगर इसका उल्टा संभव नहीं है! है क्या?

इसके अलावा, हम सब अलग-अलग लोग हैं! एक व्यक्ति किसी काम को किसी दूसरे के मुकाबले बहुत कम समय में पूरा कर सकता है। अगर यह बार-बार हो तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि पहला व्यक्ति उस काम में दूसरे से अधिक निपुण है-और तब यदि वह दूसरे से अधिक पैसे कमाता है तो इसमें कतई कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। है कि नहीं?

अब अगर आपका जवाब ‘नहीं’ है तो इसका अर्थ हुआ कि व्यक्तिगत क्षमता या दक्षता से कोई फर्क नहीं पड़ता और किसी काम पर जो जितना समय लगाएगा, उसी के अनुसार सबको भुगतान किया जाना चाहिए। तब मेरा प्रतिप्रश्न यह होगा: ‘उनका क्या किया जाएगा जो आलसी हैं’? और फिर एक प्रश्न और कि आप कौन होते हैं, किसी से उनकी ज़रूरतों को कम करने का आदेश देने वाले? हो सकता है, ज़रूरतों पर उनके एहसासात आपसे जुदा हों!

और इसीलिए उस पूरे विचार पर ही मैं हँसे बिना नहीं रह सका: जबकि वह बढ़िया गरम पानी से नहा-धोकर, स्वादिष्ट नाश्ता करके आराम से ए सी कमरे में बैठा हुआ था, अपना खुद का काम करने में उसकी कोई रुचि भी दिखाई नहीं दे रही थी।

इसलिए, जबकि वास्तव में मैं विश्वास करता हूँ कि हमें गरीबों की मदद करनी चाहिए और हममें से ज़्यादातर लोग थोड़ा न थोड़ा खर्च कम भी कर सकते हैं लेकिन जो लोग इसके समर्थन में सबसे अधिक भाषण झाड़ते हैं, वही अपने छोटे, सुखद दायरे में आराम फरमाते हैं और इस तरह अपने कथन के विरुद्ध आचरण करते हैं।

Leave a Comment