मुक्ति की आकांक्षा में मृत्यु कि प्रतीक्षा करने के स्थान पर जीवित रहते हुए अपने आपको धर्म के बंधन से मुक्त कीजिए और खुश रहिए! 16 जुलाई 2014

धर्म

क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं, जो अपने जीवन को लेकर नकारात्मकता और अफसोस (दीनता) से भरे होते हैं? मुझे हाल ही में इसका एक धार्मिक कारण याद आ गया है, जो कम से कम हिंदुओं के मामले में साफ मौजूद दिखाई देता है। दीनता का औचित्य अथवा जीवन का अफसोस क्यों?: हिन्दू धर्म के मुताबिक आप जीवन की शुरुआत ही पाप से करते हैं।

शायद आप जानते होंगे कि हिन्दू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता पाई जाती है। हिन्दू धर्मग्रंथों के इस विचार के अनुसार वे यह भी मानते हैं कि मनुष्य का जन्म होता ही उसकी आत्मा के अधःपतन के चलते है।

जब एक भले व्यक्ति की मृत्यु होती है तो हिन्दू समझते हैं कि उसने अच्छे कर्म किए हैं इस कारण वह व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश का और वहाँ अस्थाई रूप से रहने का हकदार हो गया है। जब वह स्वर्ग में रहकर अपने पुण्य कर्मों को खर्च कर देता है तो उसे वापस पृथ्वी पर लौटना पड़ता है क्योंकि स्वर्ग में कर्मों के अनुसार उसका निर्धारित समय पूरा हो चुका है । वह अभी मुक्त नहीं हुआ है अन्यथा उसे स्वर्ग जाना ही नहीं पड़ता-उसकी आत्मा मुक्त हो जाती और सीधे इस संसार के रचयिता परमपिता परमेश्वर में मिल जाती। इस तरह धार्मिक रूप से एक हिन्दू का जीवन में एकमात्र मक़सद मुक्ति पाना होता है, जिससे उसे दोबारा जन्म लेकर धरती पर वापस न आना पड़े!

कुल मिलाकर यह कि आपका पुनर्जन्म लेना एक बुरी बात है। आपकी एकमात्र इच्छा होती है कि काश पुनः जन्म लेकर धरती पर आने की आवश्यकता न पड़ती, काश मैं इस संसार में नहीं होता, कि काश मुझे मुक्ति मिल गई होती! अर्थात आप कह रहे होते हैं कि काश मेरा जन्म नहीं होता! तो आप पूरा ज़ोर इस बात पर लगा देते हैं कि इस पुनर्जन्म के चक्कर से पीछा छुड़ा सकें। आप दिन में कई बार प्रार्थना करते हैं, देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं, गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाने के लिए लम्बी यात्राएँ करते हैं और हर साल तीर्थाटन करते हैं।

आप जन्म से ही पापी हैं। आप खुश रहने की अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

मैंने सुना है कि ईसाइयत में भी यह विचार मौजूद है! विस्तार से इस विषय में मैं नहीं जानता मगर इतना जानता हूँ कि वे उस मिथकीय कहानी पर विश्वास करते हैं, जिसके अनुसार मनुष्य स्वर्ग की जगह इस धरती पर सिर्फ इसलिए है कि मनुष्य जाति की आदि-माता ईव ने ईश्वर के आदेश के विरुद्ध जाकर भले-बुरे के ज्ञान-वृक्ष का सेव्-फल खा लिया था। अब सारा जीवन आपको भला व्यक्ति बनने की कोशिश करनी चाहिए, ईश्वर से प्रेम करना चाहिए और सारी मनुष्य जाति के पापों का प्रायश्चित्त करने वाले जीसस से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे आपकी रक्षा करें।

धर्म चाहता है कि आप अपने अपराधबोध से कभी मुक्त न हों। उस अपराध या पाप के लिए जिसे आप जानते तक नहीं, जिसे आपने अंजाम नहीं दिया है! आप पैदा ही इसलिए हुए कि आपके किसी पूर्वज ने यह अपराध किया था और अब उसका प्रायश्चित्त आपको करना है और इस कहानी में परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है!

तो आपको इस एहसास के साथ सारा जीवन गुज़ारना है, सिर्फ ऐसे काम करने हैं जिनसे आप पर उस काल्पनिक ईश्वर की कृपा बनी रहे। जब आप इन बातों पर विश्वास करते हैं तो फिर कभी भी खुश कैसे रह सकते हैं?

धर्म आपको बताता है कि मृत्यु के बाद आपको किस तरह मुक्ति मिल सकती है-लेकिन अगर आप वास्तव में खुश रहना चाहते हैं तो आपको जीवित रहते हुए ही मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए!

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