अगर पाना चाहते हैं तो खोजना बंद करें! 29 जुलाई 2014

दर्शनशास्त्र

कल मैंने आपको एक व्यक्ति के बारे में बताया था जो मेरे व्यक्तिगत-सत्र में आया था और जीवन के उद्देश्य के बारे में पूछ रहा था। कई लोग मुझसे ऐसे दार्शनिक प्रश्न पूछते रहते हैं और लगभग हमेशा ही वे मुझसे कहते हैं: ‘मैं जिज्ञासु अथवा साधक हूँ’। इस जानकारी के बाद जो भी वे पूछते हैं, वह उनका अगला कदम होता है। लेकिन सबसे पहले मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि मेरे विचार से यह दृष्टिकोण ही गलत है!

लोग मुझसे कहते हैं, वे किसी की खोज में लगे हुए हैं। वे यह बात कुछ इस तरह कहते हैं जैसे किसी चीज़ का वर्णन कर रहे हों, अपनी परिभाषा बता रहे हों, किसी ज़ाहिर सी बात पर उँगली रख रहे हों, अपने आप को किसी खाँचे में ढाल रहे हों। लेकिन मुझे बताइए, आप यह खोज किसलिए कर रहे हैं? ईश्वर के लिए?

अगर आप कुछ खोज रहे हैं तो इसका अर्थ यह है कि कुछ खो गया है। कुछ अधूरा है, आपकी कोई चीज़ गुम हो गई है, आप कुछ भूल रहे हैं और आपने ऐसा कुछ खो दिया है जिसे अब आप ढूंढ़ रहे हैं। अगर आपको ऐसा महसूस हो रहा है कि आप ईश्वर को खोज रहे हैं, किसी उच्च शक्ति को या हर जगह मौजूद कोई ऊर्जा, जिसकी आप कल्पना कर रहे हैं, तो मुझे आपसे एक बात पूछनी है: क्या ईश्वर वास्तव में गुम हो गया है? अगर वह खो सकता है तो क्या आप उसे कोई उच्च शक्ति मान सकते हैं? वह अपना इतना भी ख्याल नहीं रख सकता कि न गुमे! नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता।

इसका जवाब देते हुए लोग मुझसे कहते हैं कि दरअसल ईश्वर नहीं गुमा है, वे स्वयं गुम गए हैं।

एक और विचलन, एक दूसरा ही खयाल। अब यह कि आपने ध्यान नहीं दिया और ईश्वर गुम गया। क्या अब आपको नहीं लगता कि काश कोई गुरु होता, जिसका हम अनुसरण कर पाते, एक गुरु या धर्म जैसी कोई संस्था, कोई संगठन, जिसकी सहायता से आप अपना रास्ता खोज सकते? देखा, कितनी खूबसूरती से आपको इस दलदल में खींच लिया गया है!

अगर इस तरह खोजते रहे तो आप जीवन भर खोजते ही रहेंगे और किसी हालत में वह नहीं मिल पाएगा जिसकी खोज में आप लगे हुए हैं! आप हमेशा-हमेशा के लिए एक साधक या किसी के अनुयायी ही बने रहेंगे।

मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी ने कहा हो: ‘मैं जिज्ञासु था और अब मैंने वह ढूंढ़ लिया है, जिसकी तलाश मैं कर रहा था!’

आपको यह खोज बंद करनी होगी। अन्यथा आपका सारा जीवन इसी खोजबीन में मर-खप जाएगा। आप अपने जीवन से असंतुष्ट हैं और यही कारण है कि आप लगातार इस खोज की आवश्यकता महसूस करते हैं! एक बार यदि आप इस बात को समझ लें और अपने सामान्य जीवन की ओर लौट सकें तो आप देख सकेंगे कि आपके पास कितना कुछ उपलब्ध है। इसलिए यह तलाश करने की कोशिश करें कि अपने जीवन का कौन सा हिस्सा, अपने जीवन की कौन सी बात आपको दुखी करती है। ठीक-ठीक कौन सी चीज़ है जो आपके पास नहीं है, जिसकी आप आवश्यकता महसूस करते हैं? निश्चय ही, इस बात का मैं आपको भरोसा दिला सकता हूँ कि आपको पता चलेगा, वह चीज़ ईश्वर नहीं है, न ही वह कोई रहस्यमय वस्तु है।

आपको अपने वास्तविक जीवन में तृप्ति और संतोष की खोज करनी चाहिए न कि किसी काल्पनिक, अवास्तविक और मायावी संसार की खोज में अपना जीवन बरबाद करना चाहिए! कल्पनाएँ आपके मन में संदेह पैदा करती हैं-आपका वास्तविक जीवन ही आपको वास्तविक ख़ुशी प्रदान कर सकता है!

अपने आसपास के संसार का आनंद लें। जी हाँ, भौतिक संसार का, भले ही आपके आध्यात्म से ग्रसित कानों को यह कितना भी अजीब क्यों न लगे। भौतिक संसार का आनंद लेने का अर्थ है जीवन की चंचल सुन्दरता में डुबकी लगाना, उसके विभिन्न रंगों का आस्वाद लेना! अगर आप जीवन में प्रसन्न और संतुष्ट हैं तो आपके मन में किसी काल्पनिक वस्तु को खोजने, प्राप्त करने या कोई लक्ष्य हासिल करने का ख़याल तक नहीं आएगा। आपके सामने यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि वह तो यहीं है, पहले से आपके पास मौजूद है।

प्रेम, सुख, संतोष।

खोज बंद कीजिए और ये आपको खुद ब खुद मिल जाएँगे।

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