एक साधु कहता है, यहाँ सोना गड़ा है और भारत सरकार वहाँ खोदना शुरू कर देती है! 4 नवंबर 2013

आज मैं आपको एक ऐसी सत्यकथा सुनाने जा रहा हूँ, जिस पर विश्वास करना आपके लिए बड़ा मुश्किल होगा। प्रथमदृष्ट्या यह कहानी आपको अविश्वसनीय लग सकती है मगर भारत में यह घटना वास्तव में घटित हुई है। और हाँ, शायद दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहां ऐसी मूर्खतापूर्ण बात संभव हो सकती है।

कुछ सप्ताह पहले एक साधु, शोभन सरकार ने अपने आसपास के लोगों को बताया कि उसने एक खजाने का सपना देखा है और वह खजाना कहीं दूर नहीं, वहीं, उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में, एक परित्यक्त किले में ज़मीन के नीचे गड़ा हुआ है। उसने दावा किया कि यह महज सपना नहीं है बल्कि वास्तव में उन्नीसवीं शताब्दी के इस किले में धरती के नीचे 1000 टन सोना-चाँदी गड़ा हुआ है, जिसे निकालने के लिए सिर्फ वहाँ थोड़ी सी खुदाई करने की ज़रूरत है! लेकिन उसमें एक पेंच भी था: अगर खुदाई ठीक से नहीं हुई तो सारा सोना मिट्टी हो जाएगा!

भारत एक ऐसा देश है, जहां लोग किसी भी बात पर विश्वास कर लेते हैं। साधारण लोगों में ही ऐसे विश्वासु नहीं पाए जाते बल्कि कई राजनेता और मंत्री भी इसके शिकार हैं, जो बेसिर-पैर की हास्यास्पद बातों पर भी विश्वास कर लेने की क्षमता रखते हैं! संयोग से इस सपने की खबर एक केंद्रीय मंत्री तक पहुंची और उनकी सहायता से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि यह कहानी सच भी हो सकती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग एक सरकारी उपक्रम है, जिस पर स्मारकों और ऐतिहासिक स्थानों की देखरेख का जिम्मा होता है और जो पुरातात्विक महत्व के स्थानों की खोज और उससे जुड़ी खुदाई आदि के काम करता है। तो, इसी सरकारी संस्था का उपयोग किले में खुदाई के लिए किया गया।

जल्द ही यह खबर सारे मीडिया जगत में छा गई। यह एक चटपटी और सनसनीखेज खबर थी और इसके विरोध में भी कई स्वर उभर रहे थे। एक तथाकथित पहुंचे हुए महात्मा के स्वप्न के आधार पर जनता का इतना रुपया इस खुदाई में बरबाद किया जा रहा था इसलिए मेरे जैसे संदेही लोग भी बड़ी तादात में थे, जो सरकार की इस कार्यवाही का मज़ाक बना रहे थे। कुछ लोग उस काल्पनिक सोने पर अपना दावा भी पेश करने लगे: जैसे उस राजा के कई वारिस निकल आए जो उसे अपनी अपने पूर्वजों की मिल्कियत मानते थे और कम से कम कुछ प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करना चाहते थे! इसके अलावा शोभन सरकार के शिष्य भी अपना कमीशन चाहते थे!

खैर, फिर टीवी चैनल्स बड़ी-बड़ी वैन में कैमरे और दूसरे उपकरण लेकर किले में पहुँच गए और वहाँ का विवरण लाइव टेलिकास्ट करना शुरू कर दिया! उनकी बातों का लब्बोलुआब यह था कि अगर यह खजाना मिल जाए तो भारत आर्थिक रूप से दुनिया के अग्रणी मुल्कों में शामिल हो जाएगा क्योंकि वह खजाना दुनिया में आज तक खोजा गया सबसे बड़ा सोने का भंडार होगा! अचानक वह गाँव नींद से जाग उठा था, दूर-दूर से लोग आ रहे थे और जैसे जैसे भीड़ बढ़ती थी, सुरक्षा के इंतज़ाम भी कड़े होते जाते थे! रात-दिन पहरा देने के लिए हजारों की संख्या में पुलिस बल और सुरक्षा कर्मी लगाए गए। गाँव वाले भी मौका देखकर थोड़ा बहुत कमाने के जुगाड़ में लग गए। उन्होंने बाहर से आने वाले लोगों के लिए भोजन की और चाय, समोसों, पकौड़ों की दुकानें खोल लीं। गाँव को जोड़ने वाले रास्तों के किनारे भी कई ऐसी दुकानें नज़र आने लगीं।

इधर पुरातत्व विभाग की खुदाई को कई दिन बीत गए! जब तीन-चार दिन में उन्हें कुछ नहीं मिला तो धीरे-धीरे लोग निराश होने लगे। सबसे पहले अखबारों और टीवी के रिपोर्टर्स बिदा होने लगे और उनके साथ बहुत से दूसरे लोगों ने भी घर का रुख किया, हालांकि साधु अब भी लोगों का उत्साह बढ़ाने में लगे हुए थे। जब छह या सात दिनों बाद कुछ नहीं मिला तो प्रकल्प से जुड़े हुए सरकारी अधिकारी चिंतित होने लगे। उनके लिए मुंह छिपाना मुश्किल हो गया। अब उन्होंने कहना शुरू किया कि किसी व्यक्ति के स्वप्न के आधार पर वे खुदाई नहीं कर रहे थे बल्कि मेटल डिटेक्टर ने धरती के नीचे वास्तव में किसी धातु के होने की सूचना दी थी। एक और व्यक्ति ने ज़ोर देकर कहा कि भले ही उन्हें सोना न मिला हो मगर यदि उन्हें कुछ पुरानी मूर्तियां या पुरातात्विक अवशेष भी मिल जाते हैं तो भी वह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन साधारण जनता हतोत्साहित हो रही थी क्योंकि उन्हें मूर्तियों से कोई मतलब नहीं था और कुछ दिन बाद धीरे-धीरे उनकी संख्या कम से कमतर होने लगी। और फिर उनके साथ खाने-पीने की दुकानें भी उठने लगीं। आखिर खुदाई के 12वें या 13वें दिन पुरातत्व विभाग ने अपना प्रोजेक्ट बंद कर दिया। उन्हें खजाना नहीं मिला था।

वाकई अविश्वसनीय! चर्चित होने को लालायित उस बूढ़े साधु के स्वप्न पर न जाने कितना रुपया और समय व्यर्थ बरबाद किया गया। और साधु ने भी अपना निर्णय सुना दिया: खुदाई ठीक से नहीं की गई; अगर आप उसके प्रति गंभीर होते तो आपको खजाना अवश्य मिलता! न जाने कैसे देश में हम रह रहे हैं!?

हानिरहित नीमहकीमी से खतरनाक अन्धविश्वासों तक – 2 जुलाई 2013

मेरा मित्र अकेला नहीं था जो डॉक्टर की दवाओं और अंधविश्वासों के बीच झूल रहा था। यहाँ, भारत में बड़ी संख्या में लोग हैं, जो यह जानते हुए भी कि बीमार पड़ने पर डॉक्टर के इलाज के अलावा कोई चारा नहीं है, अपने धार्मिक और पारंपरिक रस्म-रिवाजों और कर्मकांडों को अंजाम देना नहीं छोडते। यही नहीं, वे साक्षात नीमहकीमों और कठबैदों, जो अपने चमत्कारों से बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं, के पास भी जाने से नहीं हिचकिचाते। जैसा कि मैंने पहले बताया, उनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे उन पर भी पूरा भरोसा नहीं करते बल्कि डॉक्टर की सेवाएँ भी लेते हैं! ऐसे लोगों के इतने उदाहरण मेरे नज़र में हैं कि मैंने सोचा एक और किस्सा आपको सुनाऊँ। अपनी किशोरावस्था में हम लोग कस्बे में रहते थे। जहां हम रहते थे वहाँ एक व्यक्ति था जो पीलिया का इलाज करने में माहिर समझा जाता था। वह डॉक्टर नहीं था, न ही दवाइयों का जानकार (pharmacist) था, दवाई बेचने वाला दूकानदार तक नहीं था। वह एक साधु था, एक धार्मिक व्यक्ति जिसे लोग बहुत पहुंचा हुआ साधु समझते थे कि जो अपनी अर्जित शक्तियों से पीलिया के रोगी को रोगमुक्त कर सकता था।

एक बार हमारा एक पड़ोसी पीलिया से ग्रसित हुआ तो उसकी इच्छा पर मैं उसके साथ इलाज के लिए उस साधु के पास गया। इलाज का तरीका बहुत सरल और सीधा-सादा था: साधु ने पड़ोसी को कुछ दिया, जो किसी वृक्ष की छाल जैसा नज़र आता था, और उससे कहा कि थोड़ा सा आगे की ओर झुकते हुए उसे अपने सिर पर रख ले। फिर साधु ने एक जग में पानी लिया और उसे पड़ोसी के सिर पर रखी जड़ीबूटियों पर और सिर पर उंडेलने लगा। जग में रखा पानी स्वच्छ था मगर जब वह उन लकड़ियों के टुकड़ों को छूता हुआ नीचे उसके चेहरे पर बहता था तो उसका रंग गहरा पीला हो जाता था। साधु ने तुरंत हमें बताया कि पीले रंग के पानी के साथ, दरअसल पीलिया रोग बाहर निकल रहा है। स्वाभाविक ही रोगी आश्चर्यचकित रह गया और उसे विश्वास हो गया कि इस इलाज से उसे लाभ हुआ है!

उस किशोरावस्था में भी मुझे उस चमत्कारिक इलाज पर शक था। मैं सोच रहा था कि वह लकड़ी की छाल किस पेड़ की थी, और मुझे लग रहा था कि अवश्य ही उसमें कोई रसायन होगा जो पानी के साथ रासायनिक क्रिया करके उसे पीले रंग में बदल देता था। पाठकों को यह बहुत मूर्खतापूर्ण लगेगा कि बहुत से लोग ऐसे इलाज पर भरोसा करते थे और वह साधु अपने इस ‘इलाज’ के कारण बहुत सम्मानित था!

कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारा पड़ोसी डॉक्टर के पास भी गया… उसे भी उस अंधविश्वास पर भरोसा नहीं था, मगर भरोसा डॉक्टर पर भी नहीं था!

उस साधु जैसे पता नहीं कितने लोग हैं जो अपनी चमत्कारिक हिकमतों से विभिन्न बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं और असंख्य ऐसे भी लोग हैं जो उनके पास बीमारियों के इलाज के लिए जाते हैं। डॉक्टर से भी इलाज कराते हैं मगर ऐसे ढोंगियों के पास भी ज़रूर जाते हैं। वे पथरी निकलवाने के लिए, कैंसर सेल निकवाने के लिए और दूसरे संक्रमित अंगों को निकलवाने के लिए सर्जरी करवाते हैं, मगर किसी जादूगर या चमत्कारी साधु से हाथ की सफाई और झाड़फूँक भी करवाते हैं।

यह तुलनात्मक रूप से हानिरहित अंधविश्वास है लेकिन आप जब सुदूर गांवों में जाते हैं तो पाते हैं कि वहाँ लोग इससे ज़्यादा अंधविश्वासी हैं और उनके अंधविश्वास, किसी दूसरे विकल्प के अभाव में, बेहद खतरनाक हो चुके हैं। वे लोग छोटी-मोटी, सामान्य बीमारियों को प्रेतबाधा समझते हैं और अपने बीमार बाल-बच्चों पर आए ऐसे ‘भूत-प्रेतों’ को भगाने के लिए ओझाओं के पास जाते हैं। इन ओझाओं द्वारा किए जाने वाले इलाज अजीबोगरीब तो होते ही हैं, बेहद क्रूर और पीड़ादायक, और कई बार बीमार व्यक्ति के लिए खतरनाक भी साबित होते हैं। भारत में इसे तंत्र कहा जाता है और यह आपको मध्य-युग में ले जाता है। आज भी लोग जादू-टोना करने का आरोप लगाकर महिलाओं की हत्या कर देते हैं।

निश्चय ही मेरा पड़ोसी या मेरा मित्र ऐसा नहीं समझते कि कोई जादू-टोना कर सकता है और ऐसा करने वाले की हत्या कर देनी चाहिए। वे अंधविश्वासी हैं मगर उनका स्तर दूसरा है; वे उन गाँव वालों जितना अंधविश्वासी नहीं हैं और आधुनिक, प्रगतिशील दुनिया से उनका संपर्क हो चुका है। फिर भी मैं समझता हूँ कि अपने व्यवहार से वे ऐसे अति-अंधविश्वासों को बढ़ावा ही देते हैं। वे उन्हें खत्म नहीं होने देंगे, बल्कि नीमहकीमों के पास इलाज कराते रहेंगे और अंधविश्वासों को ज़िंदा रखेंगे।

शिक्षित आधुनिक अन्धविश्वासी का अंतर्द्वंद – 1 जुलाई 2013

मेरे एक मित्र ने बताया कि एक बार वह अपने दो मित्रों के साथ अंधेरे में पैदल एक मीटिंग में शामिल होने जा रहा था। वे एक सामान्य भारतीय सड़क पर, आप जानते ही हैं कि भारतीय सड़कें कैसी होती हैं, चले जा रहे थे कि मेरे मित्र के पैरों में जोर का दर्द हुआ और वह चिल्ला उठा। दूसरों ने उसकी ओर देखा और टॉर्च जलाकर देखने लगे कि उसे क्या हो गया।

मेरा मित्र घबराहट में चिल्ला रहा था कि उसे किसी साँप-वांप ने काट खाया है और यह देखकर कि वह अपना पाँव पकड़कर बैठा है, उसके मित्र टॉर्च की रोशनी उसके पैरों पर डालकर देखने लगे। उसके पैर के पास ही उन्हें एक बिच्छू दिखाई दिया जिसकी पूंछ पर ऊंचा उठा हुआ डंक अभी भी चमक रहा था। मेरे मित्र को बिच्छू ने काट लिया था।

इतनी वेदना में भी सबसे पहला काम जो मेरे मित्र ने किया वह था उस बिच्छू को जान से मार देना। मेरे ख्याल से सभी, यह सोचकर कि किसी और को न काटे, यही करते। लेकिन मेरे मित्र ने उसे मारने का जो कारण बताया वह दूसरा था। उसका कहना था कि मारना ज़रूरी इसलिए था कि बिच्छू का जहर उसके शरीर में न फैले! निश्चय ही यह एक अंधविश्वास है क्योंकि जहर तो उसके शरीर में पहुँच चुका था और बिच्छू उससे दूर था। लेकिन यह भी एक बहुत छोटा सा अंधविश्वास है।

असली अंधविश्वास तो मैंने बाद में देखा जब मेरे उस मित्र ने बताया कि वे सीधे पास के गाँव में रहने वाले एक साधु के पास गए जो इतना पहुंचा हुआ था कि मंत्रोच्चार से बिच्छू का जहर उतारने की हिकमत जानता था।

जी हाँ, वे उस साधु के पास गए जिसने कुछ दक्षिणा लेकर मेरे मित्र पर अपना जादू आजमाया। उसने एक कपड़ा मित्र की जांघ में कसकर बांध दिया और कुछ तिनके इकट्ठा करके उन्हें झाड़ू की शक्ल में बांधकर मंत्र पढ़ते हुए ब्रश की तरह मित्र के पैर पर चलाने लगा। यह नाटक इसलिए किया गया कि ऐसा करने से न सिर्फ बिच्छू का जहर उसके शरीर में फैलना बंद हो जाएगा बल्कि वह बाहर निकल जाएगा। और वाकई मेरे मित्र ने जहर को धीरे-धीरे नीचे की ओर उतरते हुए महसूस किया। लेकिन वापस कार में बैठते ही उसके विचारों में आपसी कलह शुरू हो गया: वह एक पढ़ा-लिखा, विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त व्यक्ति था और किताबों में उसने पढ़ा था, विद्वानों के मुख से भी सुना था कि बिच्छू के काटने पर डॉक्टर को अवश्य दिखाना चाहिए। उसे इस पर भी भरोसा था कि साधु ने जहर उतार दिया है। फिर वह डॉक्टर के पास क्यों जाना चाहता था? लेकिन वह गया, दवाइयाँ खरीदीं और शायद इंजेक्शन भी लगवाया। वह बिच्छू के काटने के हादसे से पूरी तरह निपटना चाहता था: उसकी नज़र में वह दुगना सुरक्षित हो गया था; धार्मिक मंत्र भी पढ़वा लिए और वैज्ञानिक इलाज भी करवा लिया।

मैं इस वाकये के बारे में इसलिए लिख रहा हूँ कि आप देखें कि अंधविश्वास अच्छे-खासे, पढे-लिखे समझदार व्यक्ति को कहाँ पहुंचा देता है! उसे लगता है कि उसके विश्वास और उस अटूट विश्वास के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के कारण साधु के मंत्रों ने अपना काम किया होगा। मैं जानता हूँ कि सिर्फ डॉक्टर के इलाज से ही बिच्छू के जहर से उसे छुटकारा मिला था।

इस व्यक्ति के सामने बहुत बड़ी समस्या है। वह दुविधा में है कि विज्ञान पर भरोसा करे या अपने अंधविश्वास पर। वास्तव में वह पूरी तरह दोनों में से किसी पर भी विश्वास नहीं करता! उसे यह विश्वास नहीं है कि सिर्फ साधु के मंत्र जहर उतार सकते हैं और डॉक्टर पर भी विश्वास नहीं है कि सिर्फ उसकी दवाइयाँ उसे जहर से मुक्त कर सकती हैं। पहले वह उसके पास जाएगा जो उसका इलाज ईश्वरीय शक्ति से करेगा और फिर डॉक्टर के पास भी जाएगा जो फीस लेकर उसका वैज्ञानिक इलाज करेगा!

यह एक दिमागी बीमारी है जो इस व्यक्ति को पूरी हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ किसी एक पर भरोसा करने और उसके अनुसार निर्णय लेने से रोकती है। वह हमेशा बीच का रास्ता चुनेगा और दोनों पर विश्वास करेगा, दोनों विश्वासों के आधार पर निर्णय लेगा और इस तरह अपना समय और पैसा बर्बाद करता रहेगा! आशा ही कर सकता हूँ कि कभी न कभी ऐसी परिस्थितियों में उलझे लोग वास्तविकता को समझेंगे कि अंधविश्वास किसी की रक्षा नहीं कर सकता।