महज़ बुजुर्ग होना आपको बुद्धिमान नहीं बनाता इसलिए थोड़ी नम्रता प्रदर्शित कीजिए! 22 सितम्बर 2014

आज से मैं एक नए विषय पर लिखने की शुरुआत करना चाहता हूँ, जो हम सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण है चाहे वे किसी भी उम्र के हों। विषय है: युवा और वृद्धों के बीच सम्बन्ध-हमसे पहले वाली पीढ़ी, हमारी पीढ़ी और हमारे बाद आने वाली पीढ़ी के आपसी संबंधों के बारे में। आज मैं विशेषकर बुज़ुर्ग पुरुषों और महिलाओं के बेहद नकारात्मक रवैये के बारे लिखकर इस विषय का आगाज़ करूँगा: वे सोचते हैं कि सिर्फ उम्रदराज़ होने के कारण न सिर्फ वे दुनिया के सबसे अधिक समझदार व्यक्ति हो गए हैं बल्कि उन्हें यह अधिकार भी मिल गया है कि दूसरे सभी लोगों को मूर्ख घोषित कर दें।

मुझे लगता है कि अक्सर भारत के बुजुर्गों का जीवन तुलनात्मक रूप से दुनिया के दूसरे बुज़ुर्गों से बेहतर है। सम्मिलित परिवारों की परंपरा आज भी काफी हद तक जीवित है और युवा पीढ़ी आज भी मानती है कि अपने माता-पिता और दादा-दादियों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है। इसीलिए अधिकतर मामलों में वे सामान्य रूप से अपने बाल-बच्चों और नाती-पोतों के साथ जीवन व्यतीत करते हैं और इस तरह खाना बनाने, बच्चों की देखरेख जैसे घर के छोटे-मोटे कामों में और अपने ज्ञान और अनुभव के द्वारा शक्ति भर परिवार के मददगार होते हैं।

इसके अलावा भारत में बुजुर्गों का आदर एक बहुत महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में स्थापित है और बिल्कुल बचपन से ही जिस तरह उसे घुट्टी में पिलाया जाता है वह पश्चिमी देशों में अक्सर देखने को नहीं मिलता। इस विषय में अक्सर दिखाई देने वाली दिक्कतों का ज़िक्र करने से पहले मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ वास्तव में मैं इस परम्परा का समर्थक हूँ और इस पर मुझे बहुत गर्व भी है। मुझे लगता है कि निश्चय ही हमें उन लोगों के साथ एक घर में परिवार सहित रहना चाहिए, जो जीवन की राह में हमसे लम्बी यात्रा करके यहाँ तक पहुँचे हैं। लेकिन बुजुर्गों को भी चाहिए कि वे भी युवा पीढ़ी का आदर करें!

दुर्भाग्य से अक्सर ऐसा नहीं होता। भारत में यह एक सामान्य बात है कि माँ-बाप जब समझते हैं कि बच्चे कोई गलत कदम उठा रहे हैं तो खुले आम निस्संकोच उन्हें आगाह करते हैं। आदर्श स्थिति में बेटा अपने पिता की बात ध्यान से सुनता अपनी गलती को स्वीकार करता और स्वयं को बदलने का प्रयास करता है। साथ ही बच्चों की गलतियों पर उन्हें टोकने, उन्हें डाँटने-फटकारने का अधिकार सिर्फ खून के रिश्ते वालों तक ही महदूद नहीं है! सांस्कृतिक परंपरा से ही आपसे उम्र में बड़ा कोई भी व्यक्ति ‘आपको सुधारने’ की ज़िम्मेदारी वहन कर सकता है और अपने ज्ञान और अधिकार का रुतबा आप पर झाड़ सकता है। यह भी भारतीय संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है कि आप अगर उम्र में छोटे हैं तो जो कहा जा रहा है उसे चुपचाप सुनें और उसके विरुद्ध कुछ न कहें। यह उम्र में आपसे बड़े उस व्यक्ति का घोर अपमान माना जाता है!

परन्तु समस्या यह है कि यह आवश्यक नहीं कि उम्र बढ़ने के साथ हर व्यक्ति समझदार या ज्ञानी भी हो जाए। या फिर नम्र। कुछ समय पहले मुझसे एक बुज़ुर्ग पारिवारिक मित्र ने कहा कि मेरी उम्र अभी राजनीति पर बात करने की नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मुझे अपने राजनीतिक विचारों के लिए शर्मिंदा होना चाहिए। मेरे लिए यह अपमान की बात थी मगर वे सोच रहे थे कि उम्र में मुझसे बड़े होने के कारण उन्हें यह अधिकार प्राप्त है। यह अपने आपमें ही हास्यास्पद बात है, विशेष रूप से तब जबकि भारत में वोट देने की उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गई है और मैं लगभग 43 का हो चुका हूँ और वोट देने की उम्र कुछ साल पहले ही पार कर चुका हूँ।

आज मैं उन सभी लोगों से, जो यह ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं एक अपील करना चाहता हूँ: यह मत समझिए कि सिर्फ अधिक उम्र होने से ही आप बेहतर हो गए, ज्यादा बुद्धिमान हो गए या आपको किसी का अपमान करने का अधिकार मिल गया है। अगर आप बड़े हैं तो आप अपनी समझदारी, ज्ञान और अनुभव अपने से छोटी उम्र के लोगों के साथ साझा कर सकते हैं मगर नम्रता के साथ। लेकिन किसी भी हालत में यह न सोचिए कि सामने वाला सिर्फ इसलिए मूर्ख है कि उसका जन्म आपसे कुछ साल या कई साल बाद हुआ है!

अगर आप उम्र में छोटे हैं और आपको नम्रतापूर्वक कोई सलाह दी जा रही है तो उसे आदर के साथ ध्यानपूर्वक सुनिए, सोचिए कि क्या उनकी बात आज के आधुनिक समय में भी प्रासंगिक और कारगर है और फिर उनकी सलाह का शुक्रिया अदा कीजिए। अगर आपने सलाह मांगी नहीं थी, अगर वह अपमानजनक है और आपको लग रहा है कि उससे आपको मदद मिलने की जगह सलाह के बहाने आप पर धौंस जमाई जा रही है तो उन्हें साफ़ साफ़ बता दीजिए। इस विषय में संकोच मत कीजिए कि लोग आपको मुँहफट कहेंगे!

आदर दोनों ओर से होना चाहिए और अधिक उम्र किसी को दूसरों का अपमान करने का अधिकार नहीं देती!

अपने बच्चों को स्वाभिमानी वयस्क बनाइए – उन्हें ‘नहीं’ कहना सिखाइए! 14 अप्रैल 2014

दो साल से ज़्यादा हो गए, जब से मैं एक स्वाभिमानी पिता हूँ। बच्चों की परवरिश करना एक ऐसा काम है, जिसका आनंद मेरे लिए कल्पनातीत है। अपनी बच्ची को अच्छे जीवन की बुनियादी बातें सिखाना, आसपास के वातावरण की खोजबीन करने में और खुद अपने आपको जानने में उसकी मदद करना अद्भुत है! इतनी सारी महत्वपूर्ण बाते हैं, जिन्हें, मैं चाहता हूँ कि वह सीखे और आज मैं उनमें से एक बात की चर्चा यहाँ करना चाहता हूँ: मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी 'नहीं' कहना सीखे, खासकर तब, जब लोग उसके इतना करीब आने लगें कि उसे असुविधा महसूस होने लगे। मैं समझता हूँ कि खासकर भारत के संदर्भ में इस बात को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चलिए, ऐसी परिस्थितियों का एक उदहारण देता हूँ। रमोना अपनी कुछ सहेलियों के साथ वृन्दावन के मुख्य बाज़ार में खरीदी करने गई थी। स्वाभाविक ही, अपरा भी उसके साथ थी। तो, जब सब महिलाएं कपड़े देख रही थीं, पहनकर, उनके बारे में चर्चा कर रही थीं और हर तरफ कपड़े बिखरे पड़े थे, रमोना और अपरा एक आईने के सामने खड़े होकर खेल रहे थे।

तभी एक सेल्सवूमन आई और दोनों का मुस्कुराकर स्वागत किया। रमोना ने उसके अभिवादन का प्रत्युत्तर दिया मगर अपरा खेलने में इतनी निमग्न थी कि उस सेल्सवूमन की ओर उसका ध्यान ही नहीं गया। इसलिए अपरा का ध्यान अपनी ओर खींचने के उद्देश्य से वह महिला घुटनों के बल नीचे झुकी और अपरा की ओर हाथ बढ़ाया। उसने अपरा को पकड़कर कुछ इस तरह की कोशिश की, जिसे बच्चे बिल्कुल पसंद नहीं करते मगर जो बड़ों की आदत में शुमार है: उसने अपरा के गाल अपने अंगूठे और मध्यमा के बीच लेकर कुछ ऐसा किया जैसे चिकोटी काटना चाहती हो। स्वाभाविक ही, वह ऐसा करने नहीं जा रही थी मगर अपरा को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। वह दो कदम पीछे हटकर रमोना के करीब आ गई। इस महिला ने इस संकेत की कोई परवाह नहीं की और दूसरा हाथ भी आगे बढ़ाया और हमारी बच्ची के दोनों गाल अपने हाथों में भर लिए।

यही वह बिंदु है, जहाँ हम चाहते हैं कि हमारी बच्ची खुद कह सके कि वह उनका स्पर्श नहीं चाहती। उस अजनबी के मुंह पर, मैं अपरा का साफ़ और तीखा इंकार ('नहीं!') सुनना चाहता हूँ। मैं उसे यह नहीं सिखाना चाहता कि उसे अपने चेहरे पर किसी की चिकोटियों को बर्दाश्त करना होगा!

आखिर यह किस तरह की आदत है, भई? मैं जानता हूँ कि मेरी बच्ची आपको बहुत मोहक लग रही है- मुझे भी लगती है- लेकिन क्या आप हर किसी अजनबी के गालों पर हाथ फेरते रहेंगे क्योंकि वह आपको आकर्षक लग रहा है? अगर आप और हम सब आपस में और वयस्कों के साथ भी इसी तरह व्यवहार करें तब तो कोई बात नहीं। तब अपरा को कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि वह इसे हर वक़्त, हर किसी के साथ होता हुआ देखती। लेकिन आप ऐसा नहीं करते!

क्योंकि अभी वह हाथ भर का है इसलिए आपको लगता है कि आप मेरे बच्चे की धैर्य-सीमा का उल्लंघन करते रहेंगे क्योंकि वह अभी एक मीटर ऊंचा भी नहीं है।

किसी वयस्क मगर कम उम्र के लड़के या लड़की से पूछिए कि इस तरह का व्यवहार उन्हें कितना अपमानजनक लगता है! किसी भी किशोर से पूछ लीजिए, यहाँ तक कि युवा वयस्कों से भी, और वे आपको बताएंगे कि वे इसे बेहद नापसंद करते थे। किसी अपरिचित द्वारा छुआ जाना। एक ऐसा व्यवहार, जो आपके साथ बचपन में तो अक्सर होता है मगर जब आपका शरीर यह ज़ाहिर करने लगता है कि अब आप बड़े और सम्मान के काबिल हो गए हैं, तब अचानक रुक जाता है। गरिमा और व्यक्तिगत मर्यादा वाले एक ऐसे व्यक्ति हो गए हैं, जिसकी सीमाओं का उल्लंघन उचित नहीं है।

लेकिन बच्चों के साथ आप ऐसा क्यों करते हैं?

क्योंकि वे 'नहीं' नहीं कह सकते? क्योंकि वे प्रतिवाद नहीं कर सकते? लेकिन यही कारण पर्याप्त होना चाहिए कि आप वैसा न करें और मुझे उम्मीद है कि मैं अकेला ऐसा व्यक्ति नहीं होऊंगा जो अपने बच्चे को इसका बिल्कुल विपरीत सिखा रहा होऊंगा। अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपका बच्चा कभी भी 'नहीं' कहना नहीं सीख पाएगा, वयस्क हो जाने के बाद भी! आपके यहाँ ऐसे लोग होंगे जो 'नहीं' नहीं कह पाएंगे और जो वही करते रहेंगे, जो उनसे करने के लिए कहा जाएगा, जो लोगों को मौका देंगे कि कोई भी आकर उनके व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप कर सके, उनके धैर्य की परीक्षा ले सके। उनके साथ स्वाभिमान और आत्मबोध (आत्मसम्मान) की समस्या होगी। इसके विरुद्ध कुछ कीजिए और अपने बच्चे को 'नहीं' कहना सिखाइए!

कल मैं आपको बताऊंगा कि उस मौके पर अपरा और रमोना ने क्या प्रतिक्रिया दी और इस समस्या पर संभावित उपचार भी, जिन्हें बाद में चर्चा के दौरान मैंने और रमोना ने पाया।

यदि भारतीय पुरुष चाहते हैं कि उन्हें एक संभावित बलात्कारी न समझा जाए तो उन्हें क्या परिवर्तन लाने होंगे! 28 जनवरी 2014

मैं पिछले सप्ताह पश्चिमी महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन उत्पीड़न के विषय में लिखता रहा हूँ। इस दौरान मैंने बताया कि भारतीय महिलाओं को भी अपने दैनिक जीवन में, रोज़ ही ऐसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, मैंने तर्क और उदाहरण देकर यह भी स्पष्ट किया कि कैसे महिलाओं के वस्त्र उनके विरुद्ध होने वाले उत्पीड़न या बलात्कार के कारण नहीं हैं और अंत में इस समस्या के मूल कारणों की पड़ताल करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में व्याप्त सेक्स वर्जनाएँ ही इस समस्या के जड़-मूल में स्थित हैं। मैं आज भारतीय पुरुषों को संबोधित करते हुए एक अपील लिखना चाहता हूँ क्योंकि समाज में बदलाव आवश्यक है!

और क्या परिवर्तन की शुरुआत खुद अपने आपसे करना व्यावहारिक नहीं होगा?

जब मैं भारत में होने वाले बलात्कारों के बारे में लिखता हूँ तो अक्सर इस तरह की प्रतिक्रियाएँ प्राप्त होती हैं: लेकिन सिर्फ अपराधी ही तो बलात्कारी होते हैं, सामान्य लोग इन अपराधों में लिप्त नहीं होते! मैं मानता हूँ कि अपराधी प्रवृत्ति वाला कोई व्यक्ति ही ऐसा घृणित अपराध कर सकता है मगर दूसरी तरफ आप किसी भी भारतीय महिला से पूछें तो वह यही बताएगी कि जीवन में कम से कम एक बार उसके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है। यह बात क्या प्रदर्शित करती है? या तो देश के अधिकांश पुरुष अपराधी हैं या फिर महिलाओं के प्रति ऐसे अशिष्ट व्यवहार को अधिकांश पुरुष बहुत सामान्य मानते हैं, महिलाओं के प्रति असभ्यता और निरादर उनकी मूल प्रवृत्तियों में शामिल हो गया है। स्त्रियॉं के प्रति यौन प्रताड़ना हमारी संस्कृति में रूढ़ है और उसी तरह हम दैनिक जीवन में उनके साथ व्यवहार करते हैं।

एक बात स्पष्ट है: जब तक भारत की सड़कों पर स्त्रियॉं का यौन उत्पीड़न जारी है तब तक एक सामान्य भारतीय पुरुष के रूप में आप इस बात के लिए अभिशप्त हैं कि आपको महिलाओं द्वारा एक संभावित खतरे के रूप में देखा जाए, चाहे वे महिलाएं विदेशी हों या भारतीय।

आशा करता हूँ कि मेरे ब्लॉग पढ़ने के बाद आप किसी महिला के साथ बलात्कार नहीं करेंगे। मैं यह भी आशा करता हूँ कि आप उनमें से नहीं हैं जो महिलाओं को छूने का कोई मौका नहीं गँवाते, जो सरे-राह उन पर फब्तियाँ कसते हैं छीटाकशी करते हैं या वे असहज हो जाएँ इतना घूर-घूरकर उनकी तरफ देखते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इस विषय में आप क्या विचार रखते हैं? मित्रों के साथ चर्चाओं में आप महिलाओं के विषय में किस तरह बात करते हैं? अपने परिवार और आस-पड़ोस की महिलाओं के प्रति आपका रवैया क्या है? महिलाओं के विषय में सामान्य रूप से आप क्या महसूस करते हैं? पत्नी के साथ आपका बर्ताव कैसा है? अपने बच्चों को आप इस विषय में क्या सिखाते हैं? कहीं अपनी बेटी और अपने बेटे के साथ आपके व्यवहार में अंतर तो नहीं है?

सामान्य रूप से भारतीय संस्कृति, पूर्वाग्रह और मनोवृत्तियां भारतीय पुरुषों में महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी के लिए उत्तरदायी हैं। स्त्रियों को देवियों के रूप में मंदिरों में पूजा जाता है लेकिन घर में सबसे निचली पायदान पर उनकी उपस्थिति होती है, उनका दमन किया जाता है और उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनका दखल वर्जित होता है: यानी कुल मिलाकर उन्हें सम्मानजनक रूप से बराबरी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं। आपको अपने जीवन में परिवर्तन लाकर इस परिस्थिति के खिलाफ हरसंभव कार्यवाही करनी चाहिए।

मेहरबानी करके अपने लड़कों को महिलाओं का आदर करना सिखाएँ, कि वे उन्हें अपने समान मानें और उनके साथ बराबरी का व्यवहार करें। अपने व्यवहार से यह बात साबित करें और अपने मित्रों के लिए भी उदाहरण बनें। अपनी पत्नी, बेटियों, बहनों और महिला मित्रों को ठीक वही सम्मान दें, जो आप अपने पुरुष संबंधियों को देते हैं। सबसे मुख्य बात यह कि उन्हें खुद से प्रेम और खुद का आदर करना सिखाएँ। उन्हें यह न सिखाएँ कि वे क्या पहनें और क्या नहीं। अगर वे पढ़ना या नौकरी करना चाहें तो अपने स्वप्न पूरे करने की न सिर्फ उन्हें छूट दें बल्कि उनकी मदद करें कि वे उन्हें पूरा कर सकें। अपनी बेटियों को अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी छूट दें, एक ऐसा व्यक्ति चुनने की, जो उसे प्रेम करता हो। उन्हें शक्ति और समर्थन प्रदान करें।

अपने यौन जीवन का पूरा लुत्फ उठाएँ। अपनी यौनिकता का दमन न करें बल्कि अपनी पत्नी के साथ अपनी और उसकी कामनाओं और स्वैर कल्पनाओं (fantasies) पर चर्चा करें। उन्हें अधिक से अधिक पूरा करने का प्रयास करें। एक दूसरे के लिए पर्याप्त समय निकालें, अपने प्यार का प्रदर्शन करें और प्यार की अति करके उसे अचंभित कर दें। अपने सम्मान युक्त प्रेम-सम्बन्ध को ऐसा बनाए कि आपके बच्चों और दोस्तों के सामने वह एक दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत हो सके, उन्हें पता चले कि एक महिला का सम्मान किस तरह किया जाना चाहिए।

देश की सड़कों पर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले यौन दुराचार को आप महज अपराधियों का काम कह कर अनदेखा नहीं कर सकते। इसका नतीजा आपके लिए ही बुरा होगा। जी हाँ, सिर्फ देश की प्रतिष्ठा के लिए ही नहीं, न ही सिर्फ पर्यटन उद्योग के लिए क्योंकि फिर विदेशी महिलाएं पर्यटन के लिए किसी दूसरे देश को वरीयता देंगी, बल्कि आपके लिए भी। जी हाँ, यह आपके लिए बुरी बात होगी क्योंकि इन महिलाओं द्वारा आपको एक संभावित बलात्कारी के रूप में देखा जाएगा, भले ही आप वैसे न हों। क्या आप चाहते हैं कि आपको एक बलात्कारी के रूप में देखा जाए?

जब तक आप अपने समाज को पूरी तरह बदलते नहीं तब तक आप भी महिलाओं की नज़र में एक संभावित खतरा हैं।

इसलिए इस सामाजिक परिवर्तन के लिए पूरी शक्ति के साथ काम करें।

क्या करें, जब आस्थाओं और रुचियों की विभिन्नता के चलते आपकी मित्रता में अपेक्षित अंतरंगता नहीं हो पाती? 17 दिसंबर 2013

कल मैंने स्पष्ट किया था कि ऐसे मित्र भी हो सकते हैं, जिनके विचार और आस्थाएँ आपके विचारों और आस्थाओं से पूरी तरह भिन्न हों। ऐसी स्थिति में क्या करें जब आप देखें कि आपने किसी से मित्रता तो कर ली मगर वह महज़ औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ रही है, जब कि आप उसके साथ गाढ़ी मित्रता चाहते थे?

सबसे पहले तो आप उसे विभिन्न विषयों पर अपने विचारों से अवगत करा दें। ऐसे विषयों पर, जहां आप परस्पर विरोधी विचार रखते हैं, पहले चर्चा करें, जिससे दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचान लें। जब आपको लगे कि आप दोनों अपने-अपने विचारों को बदल नहीं सकते तो आपसी असहमतियों पर सहमत हो जाएँ!

इन असहमतियों को मित्रता के बंधन को तोड़ने का बहाना न बनने दें। लेकिन साथ ही इस मित्रता से ज़्यादा अपेक्षाएँ न रखें। प्रेम बनाए रखें मगर वह सिर्फ कभी-कभार की मुलाकातों और औपचारिक बातचीत से आगे नहीं बढ़ पाता तो निराश न हों।

अपनी दादी माँ और अपने पिताजी का उदाहरण देते हुए कहना चाहूँगा कि वे दोनों बदले ज़रूर मगर उतना नहीं जितना मैं बदल गया। उम्र के इन पड़ावों पर वे इससे अधिक क्या बदलते! उन्होंने अपने पूरे जीवन धर्म के नाम कर दिये थे और भले ही वे उससे जुड़ी बहुत सी बातें पीछे छोड़ आए थे, पूरी तरह उसका त्याग करना उनके लिए असंभव था। और मैं उसकी अपेक्षा भी नहीं करता था।

मूल बात यह है कि आप एक दूसरे को समझें और एक दूसरे का आदर करें। उन्हें अपनी मर्ज़ी पर छोड़ दें और खुद भी अपनी मर्ज़ी के मालिक बने रहें। जिस तरह परिवार में होता है कि कुछ भी हो जाए परिवार का सदस्य, परिवार का सदस्य ही बना रहता है, उसी तरह मित्रता के मामले में भी यह संभव है कि आप किसी भिन्न विचार रखने वाले के साथ मित्रवत संबंध कायम रख सकें, हालांकि परिवार की तुलना में यह कुछ अधिक मुश्किल होता है। सच बात तो यह है कि अगर आपके बीच वास्तविक मित्रता और प्रेम है और दोनों में से एक भले ही न बदले मगर दूसरा बदलने की कोशिश करे तो दोनों की मित्रता मज़े में चलती रह सकती है।

लेकिन यह बात निश्चित है: आप दोनों के बीच भिन्नता है। दोनों एक दूसरे के साथ अपने मन की बात कह नहीं पाते, आप एक दूसरे के जीवनों में भागीदार नहीं हो पाते और दोनों बैठकर आपस में लंबी चर्चाएँ नहीं कर पाते।

लेकिन इस संबंध में कोई बेईमानी नहीं है। आप एक दूसरे का भला चाहते हैं लेकिन आपके विचार इतने अलग हैं कि आपको उसके साथ वैसा आनंद प्राप्त नहीं हो सकता, जैसा किसी समान विचार वाले के साथ अपनी भावनाएँ साझा करके हो सकता है।

इस तथ्य को स्वीकार करें। अगर आप यह मान लें कि दूसरा आपसे अलग है तो आपको यह भी स्वीकार करना होगा कि आप उसके साथ उतने अंतरंग नहीं हो सकते, जितना विचार-भिन्नता न होने पर हो सकते थे। दूसरे की आस्थाओं का सम्मान करें और अपने दिल में प्रेम बनाए रखें। ऐसी मित्रता बनाए रखने के लिए आप इतना ही कर सकते हैं।

कई प्राचीन परंपराएँ आपके सम्मान की हकदार नहीं हैं! – 13 मई 2013

अपेक्षानुसार, आयोजित विवाहों (अरेंज्ड मैरेज) से संबंधित अपनी डायरियों पर मुझे बहुत सी प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुई हैं। इस विषय पर और ऐसे ही दूसरे विषयों पर यह एक टिप्पणी अवश्य होती है: 'आपको अपनी प्राचीन परंपराओं का आदर करना चाहिए न कि उनका अपमान!' मेरा छोटा सा जवाब होता है कि नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा! विस्तृत जवाब चाहिए तो ठीक है; लीजिये, हाजिर है!

आयोजित विवाहों के एक बड़े समर्थक ने यह तर्क पेश किया: 'प्रेम क्या है? अगर आपने कोई कुत्ता पाल रखा है तो साथ रहते रहते उससे भी आप प्रेम करने लगते हैं।' उनका मतलब यह है कि विवाह से पहले प्रेम भी हो, यह आवश्यक नहीं है। आप किसी के साथ भी लंबे समय तक रहें तो परस्पर प्रेम करने लगेंगे। माफ करें, मैं उस परंपरा का कोई सम्मान नहीं कर सकता जो एक पालतू कुत्ते और पत्नी में कोई भेद नहीं करता। यह हमारी भारतीय संस्कृति है, हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित परंपराएँ हैं जो जानवरों की तरह महिलाओं, बेटियों और पत्नियों का सौदा करती हैं। प्रेम महत्वपूर्ण नहीं है, वह साथ रहते-रहते हो ही जाएगा! हो सकता है।

अगर ऐसा ही है तो फिर आजकल संभावित दूल्हे और दुल्हिन को विवाह से पहले आपस में मिलने ही क्यों दिया जाता है? अगर प्रेम हो ही जाना है तो फिर सशरीर किसी को देखने की आवश्यकता ही क्या है? क्या आप वाकई मानते हैं कि प्राचीन परंपरा यही थी? आपके परदादाओं के जमाने में तो विवाह से पहले दूल्हा और दुल्हन एक दूसरे को देखते तक नहीं थे। ऐसे खयाल को तुरंत नामंजूर कर दिया जाता था क्योंकि उसे संस्कृति और परंपरा का अपमान माना जाता था।

अधकचरे आधुनिक लोग मुझसे कहते हैं कि वे मॉडर्न हैं लेकिन फिर भी परंपराओं का सम्मान करते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। आप अपने बच्चों को सलाह देते हैं कि वे प्रेम तो कर सकते हैं मगर अपनी जाति या उपजाति में ही! क्या आप ऐसे आयोजनों में इतने दक्ष हैं कि अपने बच्चों को ठीक-ठीक निर्देश दे सकें कि किससे प्रेम किया जाए? क्या आप वाकई ऐसा मानते हैं कि यह संभव है? आपको मालूम होना चाहिए कि यह आपका भ्रम है अन्यथा आपका दूसरा वाक्य धमकी और अस्वीकार से भरा नहीं हो सकता: 'मैं किसी दूसरी जाति, धर्म या देश की लड़की या लड़के को स्वीकार नहीं कर सकता!'

अगर आप ऐसा करते हैं तो क्या आप वाकई अपनी 'प्राचीन परंपराओं' का निर्वाह कर रहे हैं? प्रकट रूप में आपकी महान संस्कृति बच्चों का अपनी मर्ज़ी से प्रेम करना बर्दाश्त नहीं करती मगर आप यह भी जानते हैं कि आप परिवर्तन को रोक नहीं सकते और इसलिए आप परंपरा की बेड़ियों को थोड़ा ढीला भर कर देते हैं। एक कदम आगे जाकर मैं कहूँगा कि वास्तविकता यह है कि आप स्वयं ही जस का तस अपनी परंपराओं का सम्मान नहीं कर रहे हैं। आप उसमें ढील ही तो दे रहे हैं!

आपकी महान संस्कृति कहती है कि प्रेम करना अपराध है। आप अपनी बेटियों को सीख देते हैं कि अपने साथ पढ़ने वाले लड़कों से बात तक मत करो लेकिन अपेक्षा करते हैं कि वह एक अजनबी के साथ विवाह कर ले और उसके साथ हमबिस्तर होने के लिए मजबूर हो जाए। क्या यह गलत नहीं है?

अगर आप अपने बच्चों के विवाह आयोजित करते हैं तो आप सिर्फ शरीरों का सौदा कर रहे हैं। आप अगर अपने बच्चों को अपनी जाति के लड़के या लड़की से प्रेम करने की इजाज़त दे भी देते हैं तब भी आप अपने बच्चों को एक दकियानूसी और पूरी तरह गलत जाति प्रथा में बांधकर ही रखना चाहते हैं। अगर आप दहेज लेते हैं या देते हैं तो आप महिलाओं का अपमान करते हैं। अगर आप किसी लड़की या लड़के के शरीर को देखकर उसका चुनाव करते हैं तो आप मनुष्यता का अपमान करते है। आखिर एकाध घंटे की मुलाकात में आप इतना ही तो देख पाते हैं। आप इतने समय में किसी भी व्यक्ति की आत्मा, उसके विचार या उसकी भावनाएं नहीं जान सकते। और इस तरह यह महज शरीर का लेन-देन भर बनकर रह जाता है। किसी अनजान परिवार में अपनी लड़की या लड़के को बेचना। एक विवाह, जोकि सामान्य रूप से एक सुखकर अवसर होना चाहिए, प्रेम से लबालब होना चाहिए, एक व्यापार और दौलत का दिखावा भर बनकर रह जाता है।

पुरुष-सत्तात्मक भारतीय समाज इन परंपराओं से चिपका हुआ है क्योंकि वे पुरुषों की ताकत को बरकरार रखती हैं, वे जाति प्रथा की समाप्ति में अवरोध का काम करती हैं और क्योंकि वे पुरुषों को इस बात की इजाज़त देती हैं कि वे महिलाओं से घोड़ों जैसा व्यवहार करें, उन पर दांव लगाएँ और उनकी लगाम अपने हाथों में रख सकें जिससे महिलाएं अपनी ऊर्जा का उपयोग अपनी बेहतरी के लिए न कर सकें। अगर आप परंपराओं की बात करते हैं तो हमारे देश में और हमारी संस्कृति में बहुत सी ऐसी परंपराएँ हैं जो पहले भी गलत थीं और आज भी गलत हैं। कई परंपराएँ पहले ही खत्म हो चुकी हैं मगर कई आज भी मौजूद हैं, जैसे दहेज की परंपरा, प्रिय व्यक्ति के देहावसान पर भोज का आयोजन, महिला भ्रूणहत्या और जाति प्रथा। हाँ, मैं मानता हूँ कि मैं ऐसी किसी परंपरा का सम्मान नहीं कर सकता और उनका निरादर भी करता रहूँगा जो मनुष्य को मनुष्य नहीं मानती और उसका हर तरह से अपमान करती हैं। और यह मैं जीवन भर करता रहूँगा। अगर आपको यह ठीक नहीं लगता तो मेरा कहना है कि मैं इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करता!

अपनी ईमानदारी के साथ समझौता? – 27 अप्रैल 2009

अपनी २३ अप्रैल की डायरी पर मुझे एक कमेंट प्राप्त हुआ। समझौते के संबंध में उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को इस दुनिया में समझौता करना पड़ता है, अन्यथा आपका मिलन नहीं हो सकता बल्कि आप एक-दूसरे से अलग हो जायेंगे। मैं पूर्णतः समझता हूं कि उनके कथन का अर्थ क्या है और उसका सम्मान करता हूं परन्तु जब मैं कहता हूं कि मैं समझौता नहीं करना चाहता तो उसका मतलब भिन्न है।

जब आप प्रेम में ऐसा करते हैं तो मेरे लिये वह समझौता नहीं है बल्कि प्रेम के प्रति सम्मान है। जब आप प्रेम में हैं आप सभी चीजों का आनंद लेते हैं। बेशक आपको कुछ चीजें करनी पड़ती हैं परन्तु यदि यह सम्मान और प्रेम के लिये है, मेरे लिये यह समझौता नहीं है। निःसंदेह हम इस दुनिया और समाज में रहते हैं और हमें लोगों के साथ – साथ चलना पड़ता है| हमें अन्य लोगों की भावनाओं का सम्मान करना पड़ता है|

जब मैं कहता हूं कि मैं समझौता नहीं करना चाहता, इसका कुछ और ही मतलब होता है। जब आप अपने दिल, अपने सिद्धांतों और मूल्यों जिनके साथ आप जीना चाहते हैं या जब आप स्वयं को और अपने मूल्यों को बेच देते हैं तब आप अपनी ईमानदारी के साथ समझौता करते हैं। अगर आप ऐसा करते हैं, यदि आप समझौता करते हैं, आपका अंतःकरण आपके पूरे जीवन भर दूषित रहेगा।

ईमानदार होने के बारे में मेरे कथन का यही अर्थ है। समझौते के कारण आप हमेशा स्वयं को दोषी महसूस करेंगे। अगर इस तरह से यदि आप समझौता नहीं करते हैं, और ईमानदार हैं, तो आपको भौतिक चीजों की कमी हो सकती है परन्तु आप गर्व के साथ जीयेंगे और जब आपकी मृत्यु होगी, आपको कोई पश्चाताप नहीं रहेगा।

नशे के आदी बच्चों के माता-पिता क्या करें – 11 दिसम्बर 08

एक माँ अपने 15 साल के बेटे की समस्या लेकर मेरे सामने आई। उसने बताया कि उसका बेटा इंटरनेट गेम्स का आदी हो गया है। गेम्स में बेहतर कर दिखाने के लिए वो पैसे के साथ समय भी व्यर्थ करता है। उसने कहा कि अपनी इसी गेम खेलने की लत की वजह से उसने मेरे क्रेडिट कार्ड से 3000 यूरो खर्च कर दिए|

एक अन्य मां ने बताया कि उसका बेटा तो घर पर ड्रग्स लेने लगा है। वहीं एक महिला ने शिकायत की कि उसकी 13 साल की बेटी घर पर नशे में धुत्त आती है। इसी तरह एक की शिकायत थी कि उसकी 16 साल की बेटी सुबह चार बजे पार्टी से घर आती है। वहीं एक ने बताया कि उसका किशोर बेटा तब तक शराब पीता है जब तक बेहोश न हो जाए और अस्पताल ले जाने की नौबत न आ जाए।

ये सब परेशानियां मैं माता-पिता से अक्सर सुनता हूँ। इनको सुनने के बाद मैं सोचता हूँ कि हमारे समाज के युवाओं को क्या हो गया है? इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? क्यों वो अपने माता-पिता की नजरों से सम्मान खो रहे हैं? क्यों वो अपने शरीर, मन और आत्मा के साथ गलत कर रहे हैं? ये स्थिति रात-बिरात पैदा नहीं हुई है बल्कि वर्षों की प्रक्रिया का दुष्परिणाम है। शायद स्थिति इतनी बदतर न होती अगर माता-पिता बच्चों की पहली सिगरेट या शराब से ही उन पर ध्यान देना शुरू कर देते।

मैंने इस विषय पर पहले भी बात की है और मुझे लगता है कि ये समाज का महत्वपूर्ण विषय है। इन समस्याओं से हम जूझ रहे हैं और अपने बच्चों व युवाओं के भविष्य के लिए हमें इस पर सोचना होगा। मुझे लगता है कि इन स्थितियों के पैदा होने में कहीं न कहीं माता-पिता भी जिम्मेदार होते हैं। व्यस्तता के चलते ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को वो समय और प्यार नहीं दे पाते जिनकी अपेक्षा बच्चे करते हैं। उन्हें बच्चे के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। उन्हें अपने काम और मौज-मस्ती में इतना खो नहीं जाना चाहिए। कम से कम बच्चे की खास उम्र में उस पर ध्यान देना अति-आवश्यक है।

मैं बच्चों की स्वतंत्रता का समर्थन करता हूँ। लेकिन एक खास उम्र में जब वे पूरी तरह से विकसित नहीं होते उन्हें मार्गदर्शन की जरूरत होती है। उनको कोई ये बताने वाला होना चाहिए कि ये सही है, ये गलत, ये अच्छा है और ये बुरा है। बड़ों को ये सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे उनकी आज्ञा का पालन करें। इसके लिए उन्हें कड़ा रुख अपनाना होगा। प्यार और स्वतंत्रता होनी चाहिए पर नियंत्रण की भी आवश्यकता है। नियंत्रण से बाहर होने की स्थिति में किशोर गलत रास्ता अपना लेते हैं। आपको उन्हें इसलिए नियंत्रित करना होगा क्योंकि आप उन्हें बहुत प्यार करते हैं और उन्हें किसी कीमत पर भी गलत मार्ग पर जाने नहीं दे सकते। कई बार अच्छा न लगने पर भी आपको कड़ा होकर निर्णय लेना पड़ता है। आपका बच्चा भी इससे खुश न हो शायद पर जब आप दूर की सोचेंगे तो बच्चे के लिए अच्छा होगा।

माता-पिता बच्चे के आदर्श होते हैं। आप स्वयं भी ऐसा कुछ मत कीजिए जो आप अपने बच्चे में देखना नहीं चाहते। अन्यथा वो आपसे जो सुनेंगे वही सीखेंगे और जो आपको करते देखेंगे वही करेंगे। अपने बच्चों को प्रेम कीजिए, अच्छा है। उन्हें स्वतंत्र भी रखिए पर साथ ही उन्हें ये भी बताईए कि क्या गलत है।

बदलाव चाहते हैं तो पहले स्वयं को बदलिए – 7 नवम्बर 08

किसी भी रिश्ते में स्वीकारभाव का होना बहुत जरूरी है। यदि हम दूसरों को जस का तस स्वीकार नहीं कर सकते तो हम किसी के साथ भी एक सफल रिश्ता नहीं बना सकते। अगर हम हर वक़्त किसी को बदलने की ज़द्दोज़हद में लगे रहते हैं और चाहते हैं कि वह हमारे मनमुताबिक बदल जाए, तो यह निश्चित है कि इस कोशिश में हमें ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचेगा। आखिर हम दूसरे को बदलना क्यों चाहते हैं? हम खुद को क्यों नहीं बदल सकते? और अग़र यदि आप स्वयं को ही नहीं बदल सकते तो दूसरे में बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यदि आप वास्तव में परिवर्तन चाहते हैं तो सबसे पहले अपने भीतर झांककर देखें और यह जानने की कोशिश करें जो आप साथी से चाहते हैं क्या वह सब आप स्वयं कर पाए हैं। यदि नहीं, तो सबसे पहले स्वयं को बदलें। असल में होता यह है कि लोग दूसरों को बदलना चाहते हैं और शायद इसके ज़रिए समाज को और यहां तक कि सारी व्यवस्था को बदलने का मंसूबा रखते हैं। परंतु भरसक कोशिश करने के बावजूद वे इसमें सफल नहीं हो पाते। वे सफल हो भी नहीं सकते क्योंकि दूसरों को जो शिक्षा वे देते हैं उसका स्वयं पालन नहीं करते। लेकिन यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को बदलने की कोशिश करे तो चीज़ें अवश्य बदल सकती हैं।

रिश्ता सफल होता है समर्पण से, अहम या उम्मीदों से नहीं। उम्मीदों को पीछे छोड़ना होगा और साथी को स्वीकार करना होगा, उसका आदर करना होगा। मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि यदि प्रेमसंबंध में आप स्वीकारभाव, आदर और प्यार चाहते हैं तो निश्चय ही पहले स्वयं को स्वीकार, आदर और प्यार करना होगा।

आज अक्षय नवमी है। इस दिन लोग यहाँ आंवला के वॄक्ष की पूजा करते हैं। कई आयुर्वेदिक औषधियों में आंवले का प्रयोग किया जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। यह पाचन के लिए अच्छा होता है और आपको युवा बनाए रखता है। एंटी – एजिंग लोशनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद कहता है आंवला ‘अमृत‘ है। कभी भी और किसी भी रूप में इसका सेवन करना फायदेमंद होता है। यह सदैव आपके लिए गुणकारी है। मैं इस तरह की परंपराओं को पसंद करता हूं जो हमें प्रकृति के नज़दीक ले जाती हैं।

रिश्ते का स्वरूप न बदलें 6 नवम्बर 08

किसी भी रिश्ते की सफलता की कुंजी है अपने साथी को यह अवसर देना कि वह अपनी भावनाओं और इच्छाओं को जैसे चाहे वैसे व्यक्त कर सके। प्रेमसंबंध का अर्थ स्वामित्व नहीं है। मैंने पहले भी कई बार कहा है कि जिस व्यक्ति से आप प्रेम करते हैं उसे यह स्वतंत्रता आपको देनी होगी। निःसंदेह साथी को भी अपने प्रियतम की भावनाओं की क़द्र करनी चाहिए। दोनों पक्षों को परस्पर यह स्वतंत्रता देनी ही होगी। मैंने पहले भी लिखा था कि सबसे महत्वपूर्ण बात है आपके रिश्ते का जो मौजूदा स्वरूप है उसे वैसा ही बनाए रखें।

यदि आप अपने वर्तमान संबंध में किसी दूसरे संबंध को चस्पां करते हैं तो यह इस बात की तरफ संकेत करता है कि आपके पुराने रिश्ते में कुछ खामी थी। यदि आप पति – पत्नी हैं और कुछ समय बीतने पर कहने लगे कि आप दोनों भाई – बहन हैं, तो यह इस बात को प्रमाणित करता है कि आपके मौजूदा रिश्ते में कहीं कोई गड़बड़ी अवश्य है। आप अपने रिश्ते को ठीक से संभाल नहीं पाए। हो सकता है कि आपको इस बारे में चिंतन करने की आवश्यकता हो। इस बारे में विचार करें कि ऐसी नौबत क्यों आई और अब इस विषय में क्या किया जा सकता है। साथ ही यह भी जानने की कोशिश करें कि क्यों आप अपने रिश्ते की मधुरता का आनंद नहीं ले पाए तथा वह कौन सा कारण था कि आपको अपनी भावनाओं का स्वरूप बदलना पड़ा? मैं इस बारे में बहुत आशावादी हूं। मैं यह मानता हूं कि यदि आप वास्तव में समस्या का हल ढूंढने के इच्छुक हैं तो वह आपको अवश्य मिल जाएगा। हल ढूंढने के बजाए रिश्ते का स्वरूप बदल देना एक प्रकार की पलायनवादी सोच है।

मैं अकसर देखता हूं कि लोग प्रेम के कारण रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं और प्रेम का आनंद लेना चाहते हैं। जब कोई एक संबंध नाकाम हो जाता है तो वे उसी व्यक्ति से दूसरा सम्बन्ध बनाना चाहते हैं। मैं नहीं समझता कि भावनाओं का स्वरूप बदल देने से आपको संतुष्टि मिल सकती है। उल्टे आप स्वयं को अधूरा सा महसूस करेंगें। ऐसा लगेगा कि आपने कुछ खो दिया है। आप जब चाहे तब रिश्ते के स्वरूप को बदल नहीं सकते, इससे तो और ज्यादा उलझन पैदा होगी। पिछले कुछ दिनों से इस विषय पर लिखते हुए मुझे बहुत अच्छा लग रहा है क्योंकि इसे पढ़कर कई लोगों को उनके प्रश्नों के उत्तर मिल रहे हैं। पाठकों की सकारात्मक टिप्पणियां इस बात की सूचक हैं।

नोट: भारतीय पाठक गौर करेंगे, पश्चिमी सभ्यता में ऐसी स्तिथियाँ अक्सर आती रहती हैं, वहां के मनोचिकित्सकों के साथ काउंसलिंग का काम करने के कारण वहां की समस्याएं मेरे लेखन में प्रतिबिंबित होती हैं|