आपके विवाह के बाद जब आपकी सास आपकी माहवारी का हिसाब रखने लगती है – 11 जनवरी 2016

अपरा के जन्मदिन के सिलसिले में बहुत से मित्र आश्रम आए थे और उन समान सोच-विचार वाले मित्रों के साथ एक बार फिर खुलकर बातचीत करना अत्यंत सुखद रहा! जब हम एक साथ बैठे हुए थे तो एक महिला मित्र ने, जिसका विवाह अभी एक साल पहले ही हुआ था, बताया कि उस पर न सिर्फ उसके परिवार और उसके सास-ससुर का बल्कि सामान्य रूप से सारे समाज का ही बड़ा ज़बरदस्त दबाव है। किस बात का? जल्द से जल्द गर्भवती होने का!

जी हाँ। भारत में यह बिल्कुल सामान्य बात है कि शादी के कुछ ही माह बाद- शादी, जो अक्सर परिवार द्वारा तय की हुई शादी होती है-हर व्यक्ति यह खुशखबर सुन लेता है: बच्चा होने वाला है! यहाँ यही चलन है, यही होना चाहिए और आपकी शादी का यही एकमात्र मुख्य उद्देश्य है! आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बच्चे, और जहाँ तक हो सके, लड़का, पैदा करें और परिवार की वंश वृद्धि सुनिश्चित करें और उसके कारोबार के लिए वारिस तैयार हो! आपके जीवन का यही मुख्य उद्देश्य है: जितना जल्दी हो सके, बच्चा पैदा करो!

उस मित्र ने बताया कि वह और उसका पति फिलहाल बच्चा न पैदा करके पर्याप्त खुश और संतुष्ट हैं और उसके स्थान पर एक दूसरे को जानते-समझते हुए और अपने संबंध को कुछ और प्रगाढ़ बनाने की कोशिश करते हुए कुछ वक़्त गुज़ारना चाहते हैं। लेकिन भारत में यह विचार ही अत्यंत असामान्य विचार है। यहाँ लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि बच्चे तो वह गोंद है या वह चुंबक है जो माता-पिता को एक-दूसरे से मज़बूती के साथ जोड़े रखता है! लेकिन जबकि वे इस तरह रहते हुए खुश हैं, उनका परिवार दुखी है! और वह महिला मित्र परिवार और दूसरे सब लोगों के इस दबाव से बहुत अप्रसन्न है!

एक और मित्र, जिसकी तीन साल की बच्ची उस वक़्त अपरा के साथ खेल रही थी, अपने साथ पेश आए इसी तरह के व्यवहार को याद करने लगी। उसकी सास हर माह उससे पूछती कि उसकी माहवारी रुकी या नहीं! यहाँ तककि बाद में उसने कैलेंडर पर उसकी माहवारी के दिनों का हिसाब-किताब रखना शुरू कर दिया और ठीक उन्हीं दिनों में उससे खबर दरियाफ्त करने लगी। जब उसे पता चलता कि माहवारी हो गई है और कम से कम इस माह वह गर्भवती नहीं होगी तो वह बहुत दुखी हो जाती!

क्या आपने कभी कल्पना की है कि किसी महिला को अपने साथ होने वाले ऐसे व्यवहार पर कैसा महसूस होता होगा? उसे लगता होगा कि उस घर में वह सिर्फ प्रजनन की मशीन भर है, और कुछ भी नहीं! किसी को इससे कोई मतलब नहीं है कि वह खुद क्या चाहती है-आपके आसपास का सारा वातावरण यह सोचता है कि आपको भी बच्चे की चाहत होनी चाहिए। और सब के सब पूरी शिद्दत के साथ वह खुशखबर सुनने का इंतज़ार करते रहते हैं।

अगर कुछ माह या साल भर तक उस खबर की घोषणा नहीं होती तो अफवाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है: उन्हें बच्चा पैदा नहीं हो पा रहा है, कुछ न कुछ गड़बड़ है! कौन दोषी है? ज़रूर लड़की ही बाँझ होगी! अभी इलाज शुरू किया या नहीं? ऐसा तो नहीं कि लड़का सम्भोग में रुचि ही न लेता हो? कहीं वह समलैंगिक तो नहीं! इत्यादि, इत्यादि!

अफवाह फरोश पड़ोसी ऐसी बातों के इंतज़ार में ही होते हैं और रस ले-लेकर मुहल्ले भर में इस सामान्य बात को बहुत बड़े कलंक की तरह पेश करते हैं, जबकि वहाँ सिर्फ प्रकृति अपना खेल खेल रही होती है।

यह बेहद हास्यास्पद है कि हम महिलाओं से, और पुरुषों से भी, कहें कि उनका जीवन कैसा होना चाहिए और जीवन के किस बिंदु पर उन्हें क्या सोचना चाहिए, क्या इच्छा करनी चाहिए! समाज के लिए यह कतई स्वस्थ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता और न ही उस महिला के लिए या उस दंपति के लिए। क्योंकि क्या होगा यदि वे वास्तव में बच्चा पैदा न कर पाएँ? इस परिस्थिति पर दृष्टिपात करेंगे, कल…!

यदि आप पश्चिमी महिलाओं के साथ ऑनलाइन सेक्स चैट करने वाले भारतीय पुरुष हैं तो इसे अवश्य पढ़ें! 17 जून 2015

पश्चिमी महिलाओं की निराशा हमने अपनी आँखों से देखी है और उनके मुख से उनकी दास्तान सुनी है। उनकी निराशाजनक परिस्थितियों के बारे में मैं पिछले ब्लॉगों में आपको बता चुका हूँ। यह भी कि किस तरह वे भारतीय पुरुषों के साथ ऑनलाइन चैट करती हैं, उनके प्रेम में लिप्त हो जाती हैं, उनसे मिलने इतनी दूर भारत चली आती हैं। पिछले दो दिनों से मेरे शब्दों का रुख इन महिलाओं की ओर था लेकिन आज मैं यह ब्लॉग भारतीय पुरुषों के बारे में लिखना चाहता हूँ, जो इन परिस्थितियों की जड़ हैं।

मैं एक बार फिर स्पष्ट कर दूँ कि मेरे शब्द उन महिलाओं के अनुभवों पर आधारित हैं, जो ऐसी परिस्थिति से दो-चार हुईं और जिन्होंने यहाँ आकर अपनी दास्तानें हमें सुनाई हैं।

मेरे प्रिय भारतीय मित्रों, मुझे इस बात से कतई कोई एतराज़ नहीं होगा अगर आप मेरे मित्रों से सोशल नेटवर्क पर संपर्क करते हैं। अगर वे आपको जवाब देते हैं और आपके बीच मित्रता हो जाती है, चर्चाएँ होने लगती हैं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है तो मैं आप दोनों के लिए बड़ा खुश होऊँगा, बधाई दूँगा! लेकिन याद रखिए, इस बात की पूरी संभावना है कि जिस महिला के साथ आप इस तरह की चर्चा कर रहे हैं, मुझसे संपर्क करके मुझसे आपके बारे में पूछे और आपके बीच होने वाली बातों की चर्चा भी करे।

अगर उसके बाद मुझे पता चलता है कि आप उनके साथ इश्कबाज़ी कर रहे हैं और वे अब आप से मिलने के लिए भारत आने का विचार कर रही हैं तो मैं उनसे सतर्क रहने की गुज़ारिश अवश्य करूँगा, जैसा कि मैं अपने पिछले दो ब्लॉगों में बता चुका हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे इस संबंध को लेकर बहुत गंभीर हैं जबकि हो सकता है कि आप इस बारे में गंभीर न हों।

मैं इस बात को बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहता हूँ: वास्तव में यह महिला इंटरनेट पर एक ऐसे व्यक्ति से प्रेम कर बैठी है, जो बहुत दूर बैठा है, जिसे वह बिल्कुल नहीं जानती और वह व्यक्ति आप हैं! आप जो कुछ भी उससे कह रहे हैं, उस पर और आपकी चिकनी-चुपड़ी बातों पर वह ईमानदारी से विश्वास कर रही है। मैं हमेशा प्रेम के खुले इज़हार के पक्ष में रहा हूँ और सभी को इस बात की स्वतंत्रता है कि वह अपनी मर्ज़ी से अपनी राह चुनें और अपने जीवन साथी की खोज करें- लेकिन वह आपके प्रेम में लिप्त हो गई है और मुझे संदेह है कि आप खुद अपने शब्दों को लेकर उतने गंभीर नहीं हैं जितनी कि वह है!

आप किसी की भावनाओं के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों करते हैं? हो सकता है, आप वास्तव में न जानते हों कि सामने वाला आपकी मज़ाकिया छेड़छाड़, लटकों-झटकों और इश्कबाज़ी को गंभीरता से ले रहा है। हो सकता है, आप समझ रहे हों कि ऐसी ऑनलाइन बातें वह आप जैसे दस और लोगों के साथ कर रही होगी, जैसा कि आप स्वयं दस और महिलाओं के साथ कर रहे हैं। यह भी हो सकता है कि किसी भारतीय महिला के साथ आपका अनुभव रहा हो कि World Wide Web पर उसने भी आपसे गुमनाम रहकर बातें तो की थीं लेकिन उसका कोई गंभीर नतीजा नहीं निकला था। आप लोग सिर्फ मज़ाकिया छेड़छाड़ करते रहे, इस बात का मज़ा लेते रहे कि आप दोनों, इंटरनेट पर ही सही, इतने खुले मन से आपस में सेक्स की बातें कर पा रहे हैं। सच बात तो यह है कि भारत में आप सेक्स के बारे में बात नहीं कर पाते, वास्तविक सेक्स तो कर ही नहीं पाते क्योंकि ऐसा करना हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। न तो आपने, न उस लड़की ने भी सोचा होगा कि कभी आपकी मुलाक़ात हो सकती है। भले ही आपने आपस में संभोग करने का सपना तक देख डाला हो!

मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ: एक पश्चिमी महिला के लिए यह सब पूरी तरह भिन्न होता है। उसकी संस्कृति अलग है। वह बिल्कुल दूसरी तरह से सोचती है और हो सकता है कि उसने यौनिकता के दमन की वैसी पीड़ा न भुगती हो जैसी आपने भुगती है। यही कारण है कि बिना वास्तविक सेक्स की संभावना के ऐसी सेक्स की चर्चा करना उसके लिए आवश्यक नहीं है। वह गंभीर है क्योंकि वह जीवन के ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ वाकई उसे एक आत्मीय, स्थिर और टिकाऊ संबंध की आवश्यकता है! वह कभी भी यहाँ, आपके दरवाजे पर आकर खड़ी हो सकती है और वह सब मांग सकती है, जिसे देने का वादा आपने ऑनलाइन किया था!

क्या आपको डर लग रहा है? बढ़िया! बढ़िया इसलिए कि अगर आप डर रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आप वाकई इस मामले में गंभीर नहीं हैं और अगर गंभीर नहीं हैं तो आपको तुरंत इसे यहीं समाप्त कर देना चाहिए! आप जिस राह पर चल रहे हैं, वहाँ और आगे बढ़ने पर किसी के दिल पर ज़बरदस्त ठेस लग सकती है। उसके सामने स्पष्ट कर दें कि आप हँसी-ठट्ठा करके टाइम पास कर रहे थे, यह भी स्पष्ट करें कि आप कुछ साल बाद उस लड़की से शादी करने वाले है जिसे आपके अभिभावक आपके लिए चुनेंगे या आप वास्तव में शादीशुदा है और आप सिर्फ बातें करके मन बहलाना चाहते हैं। यह ठीक है और मैं दावा करता हूँ कि ज़्यादातर महिलाएँ इतना सब हो जाने के बाद भी एक मित्र के रूप में आपसे बात करती रहेंगी- लेकिन तब तक ही, जब तक कि आप उन्हें धोखा देने की कोशिश नहीं करते और उनके साथ झूठे वादे नहीं करते!

आयुर्वेद संबंधी हमारी कार्यशालाओं में अदृश्य शक्तियों से सम्बंधित कोई काम नहीं होता – 29 सितंबर 2014

हमने हाल ही में अपना आयुर्वेदिक मालिश प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया था। वह काफी सफल रहा, सहभागियों ने बहुत कुछ सीखा और हम अपने ज्ञान को और सबसे बढ़कर, आयुर्वेदिक मालिश और उपचार के अपने सालों के अनुभव को दूसरों के साथ साझा करके बहुत खुश हुए। लेकिन एक बिंदु था, जिसमें हमें असुविधा महसूस हुई: जब सहभागियों ने हमसे इन मालिशों के अलौकिक शक्तियों से सम्बंधित पहलुओं को जानना चाहा।

आयुर्वेद का शब्दशः अर्थ है जीवन का विज्ञान। आयुर्वेद विश्रांति सत्रों में हम आपकी शारीरिक और मानसिक समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और उन्हें आराम पहुँचाने की या संभव हो तो उनका उपचार करने की कोशिश करते हैं। मालिश शरीर को आराम पहुँचाती है और उससे आपके मस्तिष्क को भी आराम मिलता है। पीठ, कंधे, घुटने और शरीर के दूसरे अंगों में होने वाले दर्द के लिए उपचार उपलब्ध हैं। तनाव, अवसाद और अनिद्रा रोग का इलाज भी संभव है।

लेकिन हम मायावी ताकतों जैसा कोई काम नहीं करते।

वास्तव में हम इस प्रकार की किन्हीं अदृश्य शक्तियों जैसी किसी चीज़ पर विश्वास ही नहीं करते! हम जानते हैं कि कुछ लोग इस विज्ञान को, जिसका शरीर पर एक परिमेय, वास्तविक असर होता है, अदृश्य शक्ति जैसी चीज़ से, जिसे छुआ नहीं जा सकता, जिसे नापा नहीं जा सकता और न ही जिसकी कोई व्याख्या की जा सकती है, जोड़ने की कोशिश करते हैं। जिसके बारे में यह भी कहा जा सकता है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। मैं यह भी जानता हूँ कि मालिश से इलाज करने वाले (massage therapists), अपने धार्मिक विश्वासों के चलते इस तरह मालिश करते हैं, जो पूरी तरह अंधविश्वास से भरी हुई प्रतीत होती है: जैसे वे पूजा की वेदी पर मोमबत्ती जलाते हैं, वे उस टेबल को हाथों और अपने सिर से छूकर प्रार्थना करते हैं- शायद मदद हेतु या मरीज के इलाज हेतु या पता नहीं किसलिए। हम इस तरह का कोई कर्मकांड नहीं करते।

धार्मिक उपचारकों के इन कामों से और बहुत हद तक धार्मिक आयुर्वेद शिक्षकों के व्याख्यानों के कारण भी ऐसे व्यक्ति को, जो आयुर्वेद से जुड़ा हुआ नहीं है, यह गलतफहमी हो सकती है कि यह सब भी आयुर्वेद के हिस्से हैं, कि आयुर्वेद का संबंध ऊर्जा से भी है। लेकिन यह मूलतः ऐसा विज्ञान है, जिसका असर प्रमाणित किया जा सकता है।

एक्यूप्रेशर पॉइंट्स आप स्वयं दबाते हें, खिंची हुई मांसपेशियों पर आप स्वयं अपने हाथ फेरते हैं और आप खुद ही जानते हैं कि तकलीफदेह जोड़ों पर किस तरह हाथ चलाया जाए! स्वाभाविक ही आप सामने वाले की मदद कर रहे होते हैं, स्वाभाविक ही वहाँ एक शांत वातावरण होता है और एक भीतरी नीरवता का एहसास होता है, जो आपको अपना काम बेहतर तरीके से अंजाम देने में मदद करता है। हमारा विचार है कि यह सब आपसे संबन्धित है, आपकी भीतरी स्थिति और आपके काम से संबन्धित है न कि किसी बाहरी शक्ति से। इसके मनोवैज्ञानिक असर के अलावा हम नहीं मानते कि वे सब धार्मिक और अंधविश्वास से पूर्ण कर्मकांड आपके लिए या आपके सामने पड़े व्यक्ति के लिए किसी भी तरह उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

यह स्पष्ट है कि अगर आप यह अपेक्षा करते हैं कि हमारी प्रशिक्षण कार्यशालाओं में ये सब चीज़ें सिखाई जाएँगी तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। हम आपको किसी भी तरह का अनुष्ठान, कर्मकांड या पूजा करने का तरीका नहीं बता सकते और न ही किसी बाहरी उपचारक शक्ति से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि वह आकर आपके सामने पड़े व्यक्ति का इलाज कर दे। आप खुद यह सब करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन हम यह सब आपको सिखाने में असमर्थ हैं। सिर्फ इसलिए कि हमारा इन चीजों में विश्वास ही नहीं है।

हमारे सहभागी आश्रम से आयुर्वेदिक मालिश के ज्ञान और अभ्यास का प्रशिक्षण लेकर प्रसन्नचित्त और संतुष्ट होकर ही वापस लौटे। संभव है वे ऊर्जा संबंधी बिन्दुओं को न समझ पाए हों मगर हम इस संबंध में अपना दृष्टिकोण उनके सामने रखने में सफल हुए। लेकिन इस घटना से हमें एक बात समझ में आई और वह यह कि हमें अपनी वेबसाइट पर यह नोट लगाना चाहिए कि हमारे कार्यक्रमों और कार्यशालाओं में अदृश्य शक्तियों संबंधी कोई बात शामिल नहीं होती। बिल्कुल भी नहीं। इससे हमें प्रशिक्षण हेतु उपयुक्त व्यक्तियों का चुनाव करने में मदद मिलेगी और उन्हें भी यहाँ आकार निराशा का सामना नहीं करना पड़ेगा।

बच्चों के मन मेँ हम अवसाद और अक्रियाशीलता के बीज बोते हैं – 2 अप्रैल 2014

कल मैंने आपसे कहा था कि क्यों बच्चों को इस तरह एक कठोर समय-सारिणी के साथ बांध देना कि उन्हें कोई अवकाश का समय ही न मिल पाए, एक अच्छा विचार नहीं है। ऐसा करके उन्हें अपने आपको व्यस्त रखने की काबिलियत से महरूम कर देने के अलावा हम उनमें आज की कुछ बहुत बड़ी समस्याओं, अवसाद, अक्रियाशीलता और दूसरी मनोवैज्ञानिक बीमारियों के बीज बो देते हैं। ये समस्याएँ, जो पहले उम्र के चौथे दशक मेँ नज़र आती थीं, आजकल स्कूल मेँ पढ़ने वाले दुनिया भर के युवाओं मेँ भी अक्सर दिखाई दे जाती हैं।

चलिए, जिन गतिविधियों मेँ अभिभावक अपने बच्चों को व्यस्त रखना चाहते हैं, उनकी ओर लौटते हैं। ऐसी बहुत सी गतिविधियां हैं: कुछ ज़्यादा शैक्षिक होती हैं तो कुछ कम। कुछ कथित रूप से बच्चों की प्रज्ञा को उद्दीप्त करती हैं तो कुछ संगीत कौशल बढ़ाती हैं और कुछ उनसे शारीरिक व्यायाम करवाती हैं। डेट्स जैसे कुछ खेल होते हैं जो उन्हें सामाजिक व्यवहार-कुशलता सिखाते हैं। सभी गतिविधियों का अपना कोई न कोई उद्देश्य होता है।

जी हाँ, इसके पीछे विचार यह है कि बच्चा कुछ सीखे। इसमें एक अपेक्षा की जा रही है: बच्चे इन गतिविधियों मेँ अच्छा प्रदर्शन करें! अगर वे लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो उनकी प्रशंसा होगी। सामाजिक कार्यक्रमों मेँ भी पर्यवेक्षकों की पैनी निगाहें हर वक़्त आसपास हो रही बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखती हैं कि वह कितना प्रभावशाली है। यह अपेक्षा बच्चों पर बोझ बन जाती है।

अब ‘फुरसत की गतिविधियों’ को छोड़कर हम बात करें कि स्कूल मेँ क्या होता है: हमारे छोटे-छोटे बच्चों को कितना बोझ वहन करना होता है इसकी आप कल्पना नहीं कर सकते! उन्हें बहुत सी चीज़ें सीखनी होती हैं और उन्हें लगातार आगाह किया जाता है कि अगर वे नहीं सीख पाए तो उसके क्या परिणाम होंगे। उनके नाज़ुक दिलों मेँ भविष्य का डर बैठा दिया जाता है।

शिक्षक, अभिभावक, स्कूल और यहाँ तक कि सहपाठी भी आपस मेँ एक-दूसरे को बार-बार याद दिलाते रहते हैं कि जीवन मज़ाक नहीं है। यह सीख एक बड़े उद्देश्य से दी जाती है: कि वे स्कूल की पढ़ाई के बाद भी बेरोजगार न रह जाएँ और उन्हें बिना पैसे-लत्ते के सड़क पर वक़्त न गुज़ारना पड़े। क्योंकि पैसा ही सब कुछ है। और पैसा कमाने के लिए आपके पास अच्छा रोजगार होना चाहिए, उसके लिए आपको अच्छे अंक लेकर परीक्षाएँ पास करनी होंगी, उसके लिए आपको अधिक से अधिक पढ़ना होगा! बहुत मौजमस्ती ठीक नहीं है, पढ़ाई हंसी-मज़ाक नहीं है! एक भी गलती हुई तो सज़ा मिलकर रहेगी। अपने आसपास के लोगों से स्पर्धा करो! क्या वे आपसे बेहतर हैं? और मेहनत करो! क्या वे आपसे पिछड़ गए हैं? सतर्क रहो कि वे आपकी बराबरी न कर पाएँ!

कुछ स्कूलों मेँ और कुछ बच्चों के लिए यह कुछ अधिक स्पष्ट होता है और कुछ दूसरों के लिए यह दबाव सूक्ष्म और अदृश्य होता है। लेकिन हर स्थिति मेँ आप उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों की कल्पना कर सकते हैं। इस दबाव की निकासी आसान नहीं है, इतना वक़्त नहीं है कि उसके विसर्जन का प्रयास भी किया जा सके। और किसी को इस हकीकत का एहसास तक नहीं है कि हर व्यक्ति भिन्न होता है और सभी संभ्रांत नहीं हो सकते। यह भी कि हम सभी डॉक्टर या इंजीनियर नहीं हो सकते।

इसीलिए बच्चों मेँ शिक्षा सम्बन्धी विकार, मानसिक तनाव और अक्रियाशीलता पैदा हो जाते हैं। क्योंकि वे कभी भी उतने योग्य नहीं हो सकते, जितनी की उनसे अपेक्षा की जा रही है। क्योंकि वे चाहे जितना प्रयास करें, उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लगता है!

हमें इस स्थिति को बदलना है।

अपने बच्चों को स्वतंत्र माहौल में ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करें, उन्हें हंसने-खेलने और मौज-मस्ती करने का मौका दें। उनके साथ सकारात्मक व्यवहार करें और उन्हें भी वह शिक्षा दें, जो उनके भीतर सकारात्मक सोच विकसित करे!

क्या करें, जब आस्थाओं और रुचियों की विभिन्नता के चलते आपकी मित्रता में अपेक्षित अंतरंगता नहीं हो पाती? 17 दिसंबर 2013

कल मैंने स्पष्ट किया था कि ऐसे मित्र भी हो सकते हैं, जिनके विचार और आस्थाएँ आपके विचारों और आस्थाओं से पूरी तरह भिन्न हों। ऐसी स्थिति में क्या करें जब आप देखें कि आपने किसी से मित्रता तो कर ली मगर वह महज़ औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ रही है, जब कि आप उसके साथ गाढ़ी मित्रता चाहते थे?

सबसे पहले तो आप उसे विभिन्न विषयों पर अपने विचारों से अवगत करा दें। ऐसे विषयों पर, जहां आप परस्पर विरोधी विचार रखते हैं, पहले चर्चा करें, जिससे दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह पहचान लें। जब आपको लगे कि आप दोनों अपने-अपने विचारों को बदल नहीं सकते तो आपसी असहमतियों पर सहमत हो जाएँ!

इन असहमतियों को मित्रता के बंधन को तोड़ने का बहाना न बनने दें। लेकिन साथ ही इस मित्रता से ज़्यादा अपेक्षाएँ न रखें। प्रेम बनाए रखें मगर वह सिर्फ कभी-कभार की मुलाकातों और औपचारिक बातचीत से आगे नहीं बढ़ पाता तो निराश न हों।

अपनी दादी माँ और अपने पिताजी का उदाहरण देते हुए कहना चाहूँगा कि वे दोनों बदले ज़रूर मगर उतना नहीं जितना मैं बदल गया। उम्र के इन पड़ावों पर वे इससे अधिक क्या बदलते! उन्होंने अपने पूरे जीवन धर्म के नाम कर दिये थे और भले ही वे उससे जुड़ी बहुत सी बातें पीछे छोड़ आए थे, पूरी तरह उसका त्याग करना उनके लिए असंभव था। और मैं उसकी अपेक्षा भी नहीं करता था।

मूल बात यह है कि आप एक दूसरे को समझें और एक दूसरे का आदर करें। उन्हें अपनी मर्ज़ी पर छोड़ दें और खुद भी अपनी मर्ज़ी के मालिक बने रहें। जिस तरह परिवार में होता है कि कुछ भी हो जाए परिवार का सदस्य, परिवार का सदस्य ही बना रहता है, उसी तरह मित्रता के मामले में भी यह संभव है कि आप किसी भिन्न विचार रखने वाले के साथ मित्रवत संबंध कायम रख सकें, हालांकि परिवार की तुलना में यह कुछ अधिक मुश्किल होता है। सच बात तो यह है कि अगर आपके बीच वास्तविक मित्रता और प्रेम है और दोनों में से एक भले ही न बदले मगर दूसरा बदलने की कोशिश करे तो दोनों की मित्रता मज़े में चलती रह सकती है।

लेकिन यह बात निश्चित है: आप दोनों के बीच भिन्नता है। दोनों एक दूसरे के साथ अपने मन की बात कह नहीं पाते, आप एक दूसरे के जीवनों में भागीदार नहीं हो पाते और दोनों बैठकर आपस में लंबी चर्चाएँ नहीं कर पाते।

लेकिन इस संबंध में कोई बेईमानी नहीं है। आप एक दूसरे का भला चाहते हैं लेकिन आपके विचार इतने अलग हैं कि आपको उसके साथ वैसा आनंद प्राप्त नहीं हो सकता, जैसा किसी समान विचार वाले के साथ अपनी भावनाएँ साझा करके हो सकता है।

इस तथ्य को स्वीकार करें। अगर आप यह मान लें कि दूसरा आपसे अलग है तो आपको यह भी स्वीकार करना होगा कि आप उसके साथ उतने अंतरंग नहीं हो सकते, जितना विचार-भिन्नता न होने पर हो सकते थे। दूसरे की आस्थाओं का सम्मान करें और अपने दिल में प्रेम बनाए रखें। ऐसी मित्रता बनाए रखने के लिए आप इतना ही कर सकते हैं।

दोस्त ने पार्टी में नहीं बुलाया-ठीक है, कोई बात नहीं! बल्कि अच्छा ही है! 23 अक्तूबर 2013

आज आपको मैं एक ऐसी घटना के बारे में बताना चाहूंगा, जो पुनः यह स्पष्ट करती है कि कैसे धर्म, ईश्वर और उससे जुड़ी हुई चीज़ों पर विश्वास न करने पर जीवन में बहुत से परिवर्तनों का सामना करना पड़ता है।

हमारे एक नजदीकी पारिवारिक मित्र ने हाल ही में नया मकान बनवाया। जब घर का निर्माण चल रहा था, मैं और मेरे परिवार के सदस्य वहां गए भी थे और उत्सुक थे कि कब निर्माण कार्य पूर्ण होता है और वे यहाँ रहने आते हैं, क्योंकि वह नया मकान हमारे बिल्कुल पड़ोस में ही बन रहा था। आखिर गृहप्रवेश का वह दिन आया और उन्होंने गृहप्रवेश के पूजन और रिशतेदारों, मित्रों के लिए सामूहिक भोजन का आयोजन किया।

भारत जैसे धर्मप्रधान देश में नए घर में प्रवेश करते समय ग्रहप्रवेश की पूजा की जाती है और लोगों को पूजा में और पूजा के बाद होने वाले प्रीतिभोज में शामिल होने का न्योता दिया जाता है। उस परिवार ने हमें उनके ग्रहप्रवेश की तारीख बताई। मेरी पत्नी बड़ी खुश हुई और परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ उस आयोजन में शिरकत करने की मंशा से तैयार होने लगी। उन्होंने इस अवसर पर देने के लिए उपहार भी तैयार कर लिया और आश्रम में आए अपने मित्र को भी बताया कि वे लोग कुछ समय आश्रम में उपलब्ध नहीं होंगे क्योंकि उन्हें गृहप्रवेश की पार्टी में जाना है।

इस तरह के आयोजनों में मेरी बहुत रुचि नहीं होती मगर मेरी पत्नी उन्हें पसंद करती है। क्योंकि हमें तारीख का पता था मगर किस समय आयोजन होने वाला है यह पता नहीं था, मेरी जर्मन पत्नी ने एक दिन पहले मुझसे पूछा कि उसे किस वक़्त उनके यहाँ पहुँचना चाहिए। मैंने उससे कहा कि हमारे बीच इतने औपचारिक संबंध नहीं है कि लिखित निमंत्रण-पत्र भेजे जाएँ और जब भी आयोजन होगा वे हमें बुला लेंगे और उस वक़्त तुम लोग चले जाना!

वे इंतज़ार करते रहे-लेकिन कोई बुलाने नहीं आया। सारा दिन व्यतीत हो गया, वे गेट से बाहर हलवाइयों को उनके यहाँ बर्तन और खाद्य सामग्री ले जाते देखते रहे, आयोजन की गहमागहमी उन्हें साफ नज़र आती रही, मगर किसी ने उनसे आने के लिए नहीं कहा।

शाम को उस पड़ोसी परिवार के एक सदस्य का फोन आया। उसे हम भी जानते थे और उसके साथ हुई बातों का लब्बो-लुबाव कुछ इस तरह था कि इस खयाल से कि हम लोग शायद धार्मिक आयोजन पसंद नहीं करते, हमें जानबूझकर बुलाया ही नहीं गया है। हम धार्मिक कर्मकांडों में विश्वास नहीं करते, हम नास्तिक हैं-इसलिए उन्होंने यही उचित समझा कि हमें ऐसे आयोजन में बुलाया ही न जाए।

भारत जैसे धार्मिक देश में सभी अवसर किसी न किसी धार्मिक कर्मकांड और रस्म-रिवाजों से संबन्धित होते हैं। हर आयोजन और समारोह में, चाहे वह गृहप्रवेश हो, नामकरण हो, विवाह या अंतिम-क्रिया हो, धर्म सारे आयोजन का सबसे प्रमुख हिस्सा होता है। विशेषकर धार्मिक परिवार ऐसे कर्मकांडों और रीति-रिवाजों का बड़ा ध्यान रखते हैं और निश्चय ही उस दिन के समारोह में भी यही सब मुख्य रूप से होना था। शायद हवन वगैरह भी होने वाला था और एक अधार्मिक के रूप में, ऐसे आयोजनों में हमारी वहाँ कोई आवश्यकता नहीं समझी गई थी।

स्वाभाविक ही, यह अनुभव मेरे लिए भी प्रीतिकर नहीं था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हमारी अपावन उपस्थिति उस आयोजन के पवित्र वातावरण को नष्ट कर देगी। खैर, उनके लिए कारण कुछ भी रहा हो, हमें बुलाया नहीं गया था। भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील मनुष्य होने के नाते मेरे लिए यह बर्दाश्त करना मुश्किल था कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसे हम अपने मित्र से भी ज़्यादा समझते थे, हमें अपनी खुशियों में सहभागी बनाना नहीं चाहता। स्वाभाविक ही, सिर्फ मैं ही नहीं, परिवार के सारे सदस्य, जिन्होंने वहाँ शामिल होने के लिए बड़े उत्साह के साथ तैयारियां की थीं, बड़े निराश और दुखी हुए।

हम इस विषय पर बात करते रहे मगर अंततः मैं ऐसी भावनाओं को ज़्यादा देर तक मन में नहीं रखता और न ही उन्हें खुद पर हावी होने का मौका देता हूँ। मैं घटनाओं के सकारात्मक पहलुओं को देखने की कोशिश करता हूँ और ये सकारात्मक बातें मेरे सामने स्पष्ट थीं: हमें इस बात पर खुश होना चाहिए कि लोग हमारे बारे में बेहतर तरीके से जानने लगे हैं। वे समझ गए हैं कि हमारे विचार क्या हैं और अब धार्मिक आयोजनों में हमें नहीं बुलाएँगे। स्वाभाविक ही, इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि धार्मिक आयोजनों के बाद होने वाले प्रीतिभोज में, समारोहों में और नाच-गाने में भी आपको न बुलाया जाए, लेकिन मेरी नज़र में वह भी खुश होने की ही बात है।

हमें ऐसी घटनाओं के बाद बहुत हल्का महसूस करना चाहिए क्योंकि वह आपको बहुत सी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त करती हैं। जब मैंने इस घटना को फेसबुक पर शेयर किया तो हमारा वह पड़ोसी परिवार दुखी हो गया-लेकिन मैं उसके बारे में कल आपको बताऊंगा।

खुद से अपनी नैसर्गिक सीमाओं से ज़्यादा की अपेक्षा न रखें- 15 अक्तूबर 2013

जो लोग अपने आपको आध्यात्मिक मानते हैं, उनके बीच इस बारे में विभिन्न धारणाएँ प्रचलित हैं कि आपको कैसा जीवन जीना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि वे सभी सकारात्मक बाते हैं, जो बताती हैं कि अपने आसपास के लोगों से प्रेम करना चाहिए, खुद का आकलन करना चाहिए कि आप क्या चाहते हैं, जीवन से अपनी अपेक्षाओं को कम से कम रखना चाहिए, जिससे बाद में आपको निराशा न हो और यह भी कि अपने अहं को अपने काबू में रखना चाहिए। पश्चिम में यह एक सामान्य प्रवृत्ति है कि इन विचारों को पूर्वी दार्शनिक चिंतन से आयात करके उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश की जाती है लेकिन मुझे लगता है कि ऐसा करते हुए उन्हें दोनों सभ्यताओं के सांस्कृतिक अंतर को भी ध्यान में रखना चाहिए। कुछ बातें पूर्वी संस्कृतियों में, जैसे भारतीय संस्कृति में, तो अच्छी तरह से फिट हो सकती हैं मगर पश्चिमी संस्कृतियों के लिए वे इतनी विजातीय और पराई होती हैं कि उसे अपनी संस्कृति पर लागू करना आपके लिए असुविधाजनक हो सकता है।

उदाहरण के लिए ‘अपेक्षा’ को लें। सभी जानते हैं कि आध्यात्मिक रुचियों वाले लोगों का यह लक्ष्य ही होता है कि वे अपनी अपेक्षाओं को कम करें और संभव हो तो पूरी तरह समाप्त ही कर दें। मैंने हमेशा कहा है कि वास्तव में अपनी अपेक्षाओं को पूरी तरह समाप्त करने का कोई कारण नहीं है। कुछ अपेक्षाएँ तो होनी ही चाहिए और अगर आप अपने परिवार और मित्रों के साथ सामान्य जीवन जीना चाहते हैं तो कुछ अपेक्षाएँ तो रहेंगी ही। तो, हमें चाहिए कि हम अपनी अपेक्षाओं को काफी कम करते हुए उन्हें न्यूनतम रखने के बारे में विचार करें।

मुझे लगता है कि यह एक उचित विचार है, जो आपको सुकून पहुंचा सकता है क्योंकि तब आप अत्यधिक निराशा से बच सकेंगे। लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि कोई अपेक्षा न हो, इसके लिए आपको बहुत प्रयास नहीं करना चाहिए और न ही इसके लिए अपने आपको मजबूर करना चाहिए। इसके अलावा यह आत्मग्लानि भी ठीक नहीं है कि अपने आपसे आपकी अपेक्षाएँ बहुत ज़्यादा हैं और उन्हें आप कम भी नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, अपेक्षाओं की सीमा आपकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है।

अगर आप भारतीय परिवेश में पले-बढ़े किसी व्यक्ति पर नज़र डालें तो पाएंगे कि पश्चिमी देशों में पले-बढ़े व्यक्ति के मुकाबले उसकी अपेक्षाएं बहुत कम होती हैं। यहाँ लोग किसी से समय के पाबंद होने की ज़्यादा अपेक्षा नहीं रखते। पहले से निश्चित समय पर काम पूरा हो जाएगा, इसकी आशा भी यहाँ नहीं की जाती। लोग यह भी आशा नहीं रखते कि कोई काम इच्छित गुणवत्ता के अनुरूप और अच्छे तरीके से पूरा हो ही जाएगा। एक सामान्य भारतीय पहले से ही तालमेल, समझौतों और कमियों का आदी होता है। उसके लिए पहले ही कम निराशाएँ हैं क्योंकि उसकी आशाएँ और अपेक्षाएँ पहले से ही नगण्य हैं।

अगर आप अपने दैनिक जीवन में अनुचित अपेक्षाओं से दूर हो चुके हैं तो आपने एक बड़ा कदम उठा लिया है। अगर आप इस बात से परेशान हैं कि आप अब भी अपने चाहने वालों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे होटल में नियत समय पर खाना खाने आ जाएंगे तो मेरा खयाल है कि ऐसी अपेक्षा करना वाजिब ही है! यह आपका परिवेश है, जिसमें रहकर आप बड़े हुए हैं और वह आपके भीतर इतना धंसा हुआ है कि आप उसे निकालकर बाहर नहीं कर पा रहे हैं।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि आपको यह सोचना बंद कर देना चाहिए कि "जब भी मैं कोई आशा करता हूँ तो वह पूरी नहीं होती!" अपने दिमाग को उन साधारण अपेक्षाओं को लेकर परेशान न करें, जिनका कारण यह है कि किसी दूसरे देश के लोग समय बर्बाद करने के आदी हैं और आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरते। आपकी संस्कृति अलग है, आपकी पहचान दूसरी है।

आप जो भी हैं, स्वीकार करें और उन चीजों को बदलने की कोशिश न करें, जिन्हें बदलने की वास्तव में ज़रूरत ही नहीं है। कुछ चीज़ें जैसी हैं, वैसी ही ठीक हैं, भले ही दूसरे ऐसा न समझें।

यहाँ आने से पहले जांच लें कि आप हमारे साथ आनन्द ले सकते हैं या नहीं? – 28 मई 2013

जैसे-जैसे समय गुज़रता गया और खासकर अपने अजीबोगरीब अनुभवों के बाद, जिनका ज़िक्र मैं अपने पिछले कुछ ब्लॉगों में कर चुका हूँ, हमने यह सीखा कि आने वाले मेहमानों से पहले ही साफ-साफ बता दिया जाए कि आश्रम में वे क्या अपेक्षा कर सकते हैं। हमारे यहाँ ऐसे मेहमानों की एक सूची है जिनका हम स्वागत करते हैं और दूसरी सूची ऐसे लोगों की है जिनके लिए हमारे आश्रम में कोई जगह नहीं है। हम इस बारे में वाकई बहुत स्पष्ट हैं, इसके बावजूद हमारे यहाँ एक ऐसा मेहमान आया जो हमारे लिए अनुपयुक्त अतिथि सिद्ध हुआ।

वह भारतीय मूल का एक अमरीकी था जिसने हमारे आश्रम में भ्रमण हेतु बुकिंग कराने के लिए ईमेल द्वारा संपर्क किया था। उसने अपने संक्षिप्त परिचय के दौरान बताया था कि उसके अभिभावक बहुत पहले अमरीका में बस गए थे और आश्रम में विश्रांति के बाद वह भारत स्थित अपने कुछ रिश्तेदारों से मिलने जाएगा। हमने हमेशा की तरह उसका स्वागत किया मगर यह भी स्पष्ट कर दिया कि हम लोग बिल्कुल धार्मिक नहीं हैं। उन यात्राओं में जिनमें हम एक समूह को यात्रा कराते हैं, आसपास के धार्मिक स्थानों पर या किसी मंदिर वगैरह नहीं ले जाते। समय मिले तो सहभागी स्वयं अपने खर्चे पर मंदिर या और कहीं भी जाकर पूजा आदि करने के लिए स्वतंत्र हैं मगर क्योंकि यात्रा का हमारा मुख्य उद्देश्य कुछ दूसरा ही होता है, कोई धार्मिक व्यक्ति, जो किसी तीर्थयात्रा की अपेक्षा करता है, हमारे साथ यात्रा करके निराश हो सकता है।

जब हमने यह बात उसके सामने रखी तो उसका बहुत सकारात्मक जवाब आया और हम आश्वस्त हो गए कि उसके साथ कोई समस्या पेश नहीं आएगी। उस व्यक्ति ने हमें लिखा कि उसने मेरी डायरी के बहुत से पृष्ठ पढ़े हैं और दरअसल वह खुद भी बहुत सी पारंपरिक आदतों को शक की निगाह से देखता है और सोचता है कि ऐसा क्यों है! उसके शब्दों में, हर बात पर उसके पास शंकाएँ थीं-और यह बात उसने बाद में रूबरू भी दोहराईं। वह एक गुरु की तलाश में भी रहा था और उनके गंदे व्यवहार, पैसे पर उनका ज़ोर और उनकी दुनियावी अभिरुचियों के चलते वह बुरी तरह निराश हुआ था क्योंकि वे उपदेश निर्लिप्तता का देते थे।

हमें उसके पास से बहुत से अच्छे ईमेल मिले जो प्रदर्शित करते थे कि वह भी परिवर्तन के उसी दहाने पर स्थित है जहां से मैं कुछ समय पहले ही गुज़र चुका था। हमने एक-दूसरे से कहा कि आश्रम में रूबरू मिलने के बाद हम लोग और विस्तार से बहुत सुखद बातचीत कर पाएंगे।

उसने अपनी बुकिंग कराई और आ गया। तुरंत यात्रा पर निकलना था और बातचीत करने का हमें ज़्यादा समय नहीं मिल पाया लेकिन जो भी थोड़ी सी बातचीत हम कर पाए उससे मुझे लगा कि यह व्यक्ति उतना अधार्मिक (non-religious) नहीं था जितना अपने ईमेल में उसने बताया था! अपनी एक डायरी में मैंने हमारी बातचीत के कुछ हिस्से का वर्णन किया है। इसलिए मुझे बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ जब यशेंदु और दूसरे सहभागियों ने मुझे वापस आकर बताया कि वह उन्हें प्रार्थना करने के तरीके बताता था जैसे वह स्वयं कोई आध्यात्मिक गुरु हो!

यहाँ तक कि कई बार वह कहता, 'ओह, मैं जो कर रहा हूँ वह आपको अंधविश्वास लग सकता है मगर…', जिसका अर्थ यही था कि वह हमारे विचारों को अच्छी तरह से जानता था जैसा कि उसने स्वयं भी इस बात की ताईद की थी कि वह इन बातों पर मुझसे पूरी तरह सहमत है।

खैर, इस घटना से मैं यही निष्कर्ष निकाल सकता हूँ कि सिर्फ हमारा ईमानदारी से अपने बारे में बताना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि मेहमानों पर भी यह ज़िम्मेदारी आयद होती है। आप जानते हैं कि आप हमसे क्या अपेक्षा कर सकते हैं और विचार कर सकते हैं कि आप हमारे सान्निध्य में प्रसन्नता का अनुभव कर पाएंगे या नहीं। इसलिए अपने आपसे और हमसे भी ईमानदार रहिए और यहाँ आने के बारे में निर्णय तभी लीजिये जब आप हर तरह से संतुष्ट हो जाएँ। हम आपका हर हाल में स्वागत करेंगे मगर आप अपने प्रवास का मज़ा ज़्यादा अच्छी तरह ले सकते हैं अगर हम एक दूसरे के बारे में पहले से पूरी तरह और स्पष्ट रूप से जानते हों।

भारतीय अपनी औरतों से इतनी अपेक्षा क्यों रखते हैं? – 23 अप्रैल 2013

मेरी पत्नी, रमोना ने एक दिन अप्रत्याशित रूप से कहा, "मैं बहुत खुश हूँ कि मैं भारतीय नहीं हूँ." मुझे लगा कि उसके मन में कुछ उद्विग्न हलचल है इसलिए मैंने उससे पूछा कि क्यों? "भारतीय अपनी औरतों से बहुत सारी अपेक्षाएँ रखते हैं लेकिन यह ठीक है कि मुझे उनका सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि मैं भारतीय नहीं हूँ!" जब मैंने यह कथन फेसबुक के अपने पेज पर पोस्ट किया तो वाद-विवाद शुरू हो गया। तब उसने अपने कथन को ज़रा और स्पष्ट करते हुए अपनी बात रखी। मुझे लगता है कि वृंदावन में बिताए इन छह वर्षों के उसके अनुभव के निचोड़ को आप भी समझना पसंद करेंगे:

"जो मैंने कहा वह वृंदावन में अपने मित्रों, अपने कर्मचारियों और हमारी पाठशाला के विद्यार्थियों के अभिभावकों के साथ हुए अपने अनुभवों से उपजा है। हम किसी बड़े मेट्रो में नहीं रह रहे हैं जहां सशक्त महिलाएं बड़ी-बड़ी कंपनियों में प्रशासनिक पदों पर विराजमान हैं! अगर मैं किसी बड़े शहर में रहती तो शायद मेरे अनुभव बहुत अलग होते। यहाँ बहुत से लोग यह समझते हैं कि अगर कोई महिला बाहर निकलकर कोई काम करती है तो अवश्य ही उसका परिवार बहुत गरीब होगा। इतना गरीब कि महिला काम न करे तो परिवार पर अस्तित्व का संकट उपस्थित हो जाए।

मैं बात कर रही हूँ महिलाओं से की जाने वाली उन अपेक्षाओं की जो उनके व्यवहार, उनके पहनावे, उनके बात करने के ढंग कि जब वे कुछ ‘खास’ विषयों पर बात करें तो शर्माते, झिझकते हुए करें, पुरुषों से बात करते वक़्त सिर्फ मौन प्रतिक्रिया दें और जहां तक हो सके अपने विचारों को प्रकट न करें। बालिग महिलाएं भी अपनी मर्ज़ी से यह निर्णय नहीं कर ले सकतीं कि उन्हें काम करने के लिए बाहर निकलना चाहिए या नहीं, उन्हें कितनी तनख्वाह मिलनी चाहिए और काम पर जाने और वापस लौटने का उचित वक़्त क्या हो।

वे रोजगार के लिए इंटरव्यू देने भी अपने पति, बड़े भाई या पिता के साथ आती हैं और अंतिम निर्णय के लिए पूरी तरह उन पर निर्भर रहती हैं। हमारे यहाँ की शिक्षिकाएँ कहती हैं, ‘मैं छह माह काम करूंगी फिर मेरी शादी हो जाएगी’ और जब मैं उनसे पूछती हूँ कि शादी के बाद तुम काम क्यों नहीं करना चाहती तो वे कहती हैं, ‘मेरे सास-ससुर चाहेंगे तो करूंगी…’! 25-30 साल की बालिग, पढ़ी-लिखी, समझदार महिलाओं को भी हमारे स्कूल के उन कार्यक्रमों में आने की इजाज़त नहीं होती जो शाम 7 बजे के बाद समाप्त होने वाले हों। और ये ‘कामकाजी महिलाएं’ कहलाती हैं!

व्यक्तिगत जीवन में भी उनसे बहुत सारी अपेक्षाएँ की जाती हैं और पाबंदियाँ भी बहुत होती हैं। अगर कोई बालिग, मित्र लड़की, मुझसे मिलने आश्रम आती है और आधा घंटा भी देर हो जाती है तो उसका मोबाइल बजने लगता है, ‘तुम कहाँ हो? क्या कर रही हो?’ जब मैं अपने ससुर के साथ बात करती हूँ और उनकी बात पर मैं कोई प्रतिवाद करती हूँ तो आसपास बैठे लोग आश्चर्य से चौंक उठते हैं और अनमने से मुस्कुराने लगते हैं। मेरे ससुर को कोई शिकायत नहीं होती मगर दूसरे लोग सोचते हैं, ‘ओह इस विदेशी महिला को समझ नहीं है…’

मैं एक वाक्य में यही सब कहना चाहती थी। मैं जानती हूँ कि मेट्रोज़ में बदलाव आ रहा है और कई बहुत मजबूत महिलाएं हैं जो इन अपेक्षाओं की परवाह न करने का साहस रखती हैं-लेकिन यहाँ, वृंदावन में मैं जो रोज़ देखती हूँ वह बहुत उत्साहजनक नहीं है।

लेकिन मुझे गलत न समझें-मुझे भारत से और भारतीय जनता से प्रेम है और सबसे ज़्यादा मैं अपने परिवार से प्रेम करती हूँ जो किसी भी सख्त परंपराओं को मनाने वाला नहीं है और जो मुझसे कोई अपेक्षा नहीं रखता। यह मेरा घर है और मैं यहाँ अपनी निजता और अपने व्यक्तित्व के साथ स्वतंत्र हूँ।

क्या आप ध्यान साधना की अवधि से किसी की चेतना के स्तर को नाप सकते हैं? – 4 अप्रैल 2013

हमारे आश्रम में कुछ दिन पहले एक मेहमान आए थे। उनके साथ मेरी जो बातचीत हुई मैं उसे आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। हम ध्यान के बारे में बात कर रहे थे, ध्यान साधना के बारे में मेरे विचार और उसके बारे में आम तौर पर प्रचलित या प्रचारित विचार और दोनों के बीच भेद।

मैं अपने मेहमान के पास बैठा और कुछ इधर-उधर की बातचीत के बाद उन्होंने पूछा, 'अच्छा बताइए, आप दिन भर में कितना समय ध्यान में व्यतीत करते हैं?' वे मेरी तरफ जिज्ञासु आँखों से देख रहे थे और लगता था कि वे एक प्रभावशाली उत्तर की अपेक्षा कर रहे हैं। वे अनुमान लगा रहे थे कि मैं कम से कम एक घंटा तो अवश्य ही ध्यान और चिंतन-मनन में व्यतीत करता हूंगा, क्योंकि वे स्वयं काम पर जाने से पहले ऐसा करते हैं।

मैं उनकी तरफ देखकर मुस्कुराया और बताया कि क्योंकि हमारी नन्ही बच्ची अपरा हमारे साथ है, मैं उसके साथ खेलते हुए ध्यान में मग्न हो जाता करता हूँ। मेरा सारा ध्यान और चिंतन-मनन उसके साथ होना, उसके साथ समय बिताना है । उसे हँसाना, उसके साथ खेलना, किस तरह वह गेंद या दीवार पर चढ़ते छिपकली के पीछे भाग रही है यह सब देखते हुए ही मेरी ध्यान साधना हो जाती है।

मैं देख रहा था कि उनका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। कोशिश तो की, मगर मेरे इस ईमानदार उत्तर पर अपनी निराशा को वे छिपा नहीं पाए। मैं जानता हूँ कि उनके मन में यह विचार आ रहा है कि मैंने अपना आत्मनियंत्रण खो दिया है, कि मैं अपनी पहले अर्जित आध्यात्मिकता से बहुत नीचे आ गया हूँ। अपनी मानसिक स्थिति के बारे में मैं लापरवाह हो गया हूँ और यह भी कि उपयुक्त और धर्मसम्मत मार्ग से मैं भटक गया हूँ। अपने बारे में ऐसी बातें मैं पहले भी कई लोगों से सुन चुका था, इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं हुआ।

ज़ाहिर है कुछ लोग मेरे विवाह या मेरी पत्नी जो एक पश्चिमी महिला हैं, को इसका दोष देने लगते हैं कि उसने इस आध्यात्मिक या धार्मिक व्यक्ति को बिगाड़ दिया और उसे उसकी आध्यात्मिक साधना से दूर कर दिया। जो ऐसा करते हैं वे नहीं जानते कि ध्यान साधना के बारे में हमेशा से मेरे विचार आम पारंपरिक विचारों से ज़रा हटकर रहे हैं। आम तौर पर यह धारणा है कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति को विवाह नहीं करना चाहिए या बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए।

लेकिन यह तो तब ठीक माना जाएगा जब आप ध्यान को किसी प्रतियोगिता ही तरह समझें। जो ध्यान लगाकर सबसे ज्यादा समय तक बैठ सकता है वह जीता! ऐसा व्यक्ति इस प्रतियोगिता में दूसरों से पहले ज्ञान प्राप्त कर लेगा या उसे ज्ञान प्राप्त हो चुका है! जो आधा घंटा भी एक मुद्रा में नहीं बैठ सकते वे तो अभी शुरुआत कर रहे हैं, हार चुके हैं, भौतिकवादी हैं और आध्यात्मिक व्यक्ति हैं ही नहीं!

मैं ध्यान साधना को बिल्कुल अलग दृष्टि से देखता हूँ। मैं नहीं समझता कि इसके लिए आपको पद्मासन लगाकर ही बैठना होगा, आँखें बंद करनी होंगी और गहरी सांसें ही लेनी होंगी। ध्यान का अर्थ है कि आपकी चेतना सदा वर्तमान में उपस्थित रहे, अतीत या भविष्य के बारे विचार स्थगित रखते हुए आपको बोध होना चाहिए कि आप उस क्षण क्या कर रहे हैं, कर भले ही कुछ भी रहे हों!

और ठीक यही मैं करता हूँ जब अपरा के साथ होता हूँ। आपके पास ध्यान लगाने के अलावा कोई मौका ही नहीं होता जब आप अपरा के साथ होते हैं क्योंकि वह उस क्षण आपका सारा ध्यान अपनी ओर खींचे रहती है। आपको उसे देखते रहना पड़ता है और आप वही अनुभव करते हैं जो वह अनुभव कर रही होती है। आप उसके चेहरे की ओर देखें तो आपको पता चल जाता है कि वह क्या सोच रही है। उसके साथ खेलना, बात करना, अपने विचारों की तरफ उसे आकृष्ट करना और अपनी दुनिया दिखाना; इन सब बातों का मुझ पर अद्भुत असर होता है जो ध्यान साधना ही है। इससे मुझे परम आनंद और असीम शांति का अनुभव होता है।

बहुत बड़ा साधक होने का दिखावा करने के लिए अगर मुझे दिन के कई घंटे किसी बंद कमरे के एकांत में रहना पड़े तो वह मेरी कमी महसूस करेगी और मैं भी उसे मिस करूंगा। अपनी बेटी के साथ होना ही मेरा ध्यान है और मैं प्रसन्न हूँ कि मैं उसके साथ इस तरह समय व्यतीत कर सकता हूँ और उसे और अपने आपको खुश कर पाता हूँ।