जब एक राजनेता के प्रति अपने समर्पण और भक्ति को पुरानी मित्रता से अधिक महत्व दिया जाता है -15 फरवरी 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जिसे मैं बहुत समय से महसूस कर रहा हूँ। पिछले हफ्ते मैंने अपने एक भूतपूर्व मित्र के बारे में लिखा था, जिसे मेरे अधार्मिक होने से समस्या थी। एक बिल्कुल अलग मामला भी मेरे साथ पेश आया, जिसमें कुछ मित्रों ने राजनीति के कारण मुझसे मित्रता समाप्त कर दी!

पिछले साल कुछ बहुत पुराने मित्रों के साथ मुझे दो बार यह अनुभव हुआ। उनमें से एक तो मेरे पिताजी के 50 साल पुराने मित्र थे और जब भी वृन्दावन आते, हमसे मिलने आश्रम अवश्य आते थे। दूसरा मेरा एक मित्र था, जिसे मैं 20 साल से जानता था। मैं कभी-कभी उससे और उसके परिवार से फोन पर बात कर लिया करता था और हम एक-दूसरे के घर भी हो आए थे। दोनों मामलों में ये मित्र राजनीति पर मेरी लिखी बातों से आहत हो गए, विशेष रूप से सोशल मीडिया में, भारत के वर्त्तमान प्रधान मंत्री, मोदी के बारे में मेरे विचार पढ़कर।

जी हाँ, अलग विचार रखने के कारण मुझे अपने मित्रों से, बहुत पुराने मित्रों से हाथ धोना पड़ा है।

मैं हतप्रभ रह गया था। वास्तव में मैं सोच भी नहीं सकता था कि जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से अच्छी तरह जानता था, जिनके साथ मेरा निकट का प्रेम सम्बन्ध था- एक ऐसा सम्बन्ध, जो वर्षों, बल्कि दशकों के परिचय के कारण बहुत पुख्ता हो चुका था- ऐसे व्यक्तियों के साथ भी ऐसा हो सकता है! वह भी सिर्फ राजनैतिक मतभेद के कारण! क्योंकि वे एक राजनैतिक पार्टी के, विशेष रूप से उस पार्टी के एक नेता के समर्थक थे और मैं कतई नहीं था।

मैं राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूँ। शुरू से मेरी दृढ मान्यता रही है कि राजनीति सिवा नाटक-नौटंकी के कुछ नहीं है, महज फार्स (प्रहसन)। राजनैतिक नेता, जब उनके कैरीयर या उनकी प्रगति, सफलता या लाभ का सवाल आता है, पार्टी बदल लेते हैं। वे ऐसे वादे करते हैं, जो उन्हें चुनाव जितवा सकें और चुनाव जीतने के बाद उन्हें भूलकर कोई दूसरी बात शुरू कर देते हैं। वे असंवेदनशील होते हैं और करते कुछ हैं और उनके दिल में कुछ और होता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि देश में जो कुछ भी हो रहा है उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है! मैं भारतीय राजनीति में दिलचस्पी लेता हूँ, उसकी पूरी जानकारी रखता हूँ और उस पर अपना नज़रिया भी कायम करता हूँ। लेकिन मैं किसी एक पार्टी का समर्थक नहीं हूँ-और इसलिए मैं सभी पार्टियों और उनके नेताओं के मूर्खतापूर्ण कामों और बयानों पर सोशल मीडिया में लिखता हूँ क्योंकि मेरा ब्लॉग बहुत से गैर भारतीय पढ़ते हैं, जो भारत की राजनीति के बारे में न तो अधिक कुछ जानते हैं और न ही उससे उन्हें ख़ास मतलब होता है। ऑनलाइन यह सुविधा तो होती ही है कि आप अपनी पसंद की या अपने मतलब की विषयवस्तु ऑनलाइन छाँटकर पढ़ सकते हैं और जिन्हें नहीं पढ़ना चाहते, उनकी उपेक्षा कर सकते हैं।

संभवतः आप अपने मित्र के विचार पहले से जानते हैं और इसके बावजूद उसकी टिप्पणी पर इतना परेशान होते हैं। क्यों? क्योंकि वह उस व्यक्ति की आलोचना करता है, जो आपका आदर्श है, एक ऐसा राजनैतिक नेता, जिसका आप समर्थन ही नहीं करते बल्कि जिसके प्रति आप समर्पित और निष्ठावान हैं। आपके और उसके बीच भक्त और आराध्य का रिश्ता बन चुका है-दुर्भाग्य से यही बात है, जिसकी मैं अकसर आलोचना किया करता हूँ। कि आप किसी की आराधना न करें, चाहे वह धर्मगुरु हो या राजनैतिक नेता! आप किसी के अंध-समर्थक न हों, इतने अनुगामी या अंध-भक्त न हो जाएँ कि अपने गुरु की हर गलती, हर अपराध पर आँखें मूँद लें। मैं जानता हूँ कि आपको अपने लिए 'भक्त' शब्द के प्रयोग पर एतराज़ हो सकता है। शायद आप उनके ‘प्रशंसक’ कहलाना पसंद करते लेकिन उनकी आलोचना पर इतना उद्वेलित होना, यहाँ तक कि अपनी इतनी पुरानी मित्रता तोड़ लेना आपको यही प्रमाणित करता है: निश्चय ही, एक भक्त!

मैं चाहता हूँ कि आप आँखें खोलें और इस तथ्य को देखें और समझें कि गुरुवाद ने मुझसे मेरे मित्र छीन लिए- पहले धर्म के कारण और अब राजनीति के कारण भी! लेकिन ऐसे लोगों का आपसे दूर चले जाना ही ठीक है, उन्हें खोकर बेकार परेशान होना व्यर्थ है। मित्रता और प्रेम से भक्ति कहीं ज़्यादा मजबूत होती है!

मेरे मन में इस विषय पर और भी बहुत से विचार हैं और इसलिए कल भी मैं इस बारे में लिखना जारी रखूँगा।

श्रद्धा से नहीं, पैसे के लिए मंत्र-जाप और कीर्तन – 7 अप्रैल 2014

हमारे स्कूल में चल रही बच्चों की नई भर्तियाँ पूरी हो चुकी हैं। हमने यह प्रक्रिया 1 अप्रैल से शुरू की थी और दूसरे ही दिन हमारे पास इतने बच्चे आ गए कि हमारी नई लोअर केजी की कक्षा और ऊंची कक्षाओं की कुछ अतिरिक्त सीटें भर गईं। उसके बाद हमें प्रतीक्षा सूची बनानी पड़ी और अभिभावकों से कहना पड़ा कि अब कोई जगह उपलब्ध नहीं है। पहले दिन से ही रमोना और पूर्णेंदु भर्ती के लिए आए नए बच्चों के परिवारों के रहन-सहन के स्तर और उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी लेने उनके घरों की तरफ निकल पड़े हैं। स्वाभाविक ही उन्हें रोज़ एक से एक रोचक अनुभव प्राप्त होते हैं, जिनमें से कुछ मैं आज और अगले कुछ दिनों तक आपके साथ साझा करता रहूँगा।

हमारे स्कूल के किसी भी बच्चे के अभिभावक ज़्यादा नहीं कमाते। वे किसी बड़े सरकारी ओहदे पर नहीं होते, अक्सर उनकी कोई नियमित और तयशुदा आमदनी नहीं होती और वे अपने मासिक खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। मज़ेदार बात यह है कि इसके लिए जो सबसे कड़ा संघर्ष कर रहे होते हैं वे मुख्य रूप से धार्मिक कामों में लगे हुए परिवार हैं!

जब उनसे पूछा जाता है कि वे अपने जीवन-यापन के लिए क्या करते हैं तो उनका उत्तर होता है कि वे आसपास के मंदिरों में पुजारी का काम करते हैं या यह कि वे कीर्तन करते हैं या मंत्र-जाप करते हैं। जो लोगों के घरों में जाकर धार्मिक कर्मकांड करवाते हैं या जो पुजारियों की मदद करते हैं, उनके लिए पूजा-सामग्रियाँ लेकर आते हैं, वे नहीं जानते कि उन्हें अगला काम कब उपलब्ध होगा। उनके लिए काम की उपलब्धता अनियमित है और खासकर इस शहर में ठीक यही काम करने वाले लोग हजारों की संख्या में हैं। वे यह काम सिर्फ इसलिए करते हैं कि वह बड़ा आसान होता है और अच्छा खासा चन्दा देने वाले तीर्थयात्री और धार्मिक लोग भी सहजता से उपलब्ध होते हैं। ऐसे धार्मिक लोग उपहार स्वरूप टीवी या फ्रिज भी दे देने में गुरेज नहीं करते, जैसा कि हमने कुछ घरों में देखा है।

जो लोग मंदिरों या आश्रमों में मन्त्र-जाप करके या कीर्तन करके पैसा कमाते हैं वे अक्सर नियमित कमाई कर पाते हैं। वे रोज़ नियमित रूप से, उदाहरण के लिए, सुबह सात से आठ बजे तक उसी मंदिर में या उसी आश्रम में जाकर भजन गाते हैं। रोज़ एक घंटे कीर्तन करने, भजन गाने या मंत्र-जाप करने पर वे लगभग 13 डॉलर यानी लगभग 800 रुपए प्रति माह कमा पाते हैं।

जब आप तीर्थयात्री या पर्यटक के रूप में हमारे शहर आएँ और मंदिर में बैठे लोगों को सारा दिन समर्पित भक्तिभाव से भजन गाते या ईश्वर की स्तुति करते हुए देखकर प्रभावित होने लगें तो एक मिनट रुकिए, अब आपको उसके पीछे छिपी वास्तविकता का पता चल गया है: भक्तिभाव नहीं, पैसा है इसके पीछे। जीविका कमाने की मजबूरी! अपने काम के प्रति वास्तविक प्रेम का पता आपको तब लगेगा जब इन लोगों द्वारा बेहद बेसुरी, नीरस और उबाऊ आवाज़ में गाए जाने वाले कीर्तन चिंघाड़ते लाउड-स्पीकरों के जरिये आपके कानों तक पहुंचेंगे।

किसी ने यह तर्क दिया कि यह तो अच्छी बात है कि धर्म के कारण उन्हें रोजगार मिला हुआ है। मुझे लगता है कि यह मानव-संसाधन का दुरुपयोग है। मैं जिन लोगों के बारे में बात कर रहा हूँ वे खासे हट्टे-कट्टे, वयस्क युवा हैं लेकिन इस देश के विकास में योगदान देने की जगह दिन भर भजन गाते हुए बैठे रहते हैं! इस तरह वे खुद अपने लिए भी कुछ नहीं करते! ऐसा करते हुए वे ध्यान नहीं कर रहे होते और न ही आंतरिक आत्मशांति पाते हैं-वे वहाँ सिर्फ बैठे रहते हैं क्योंकि उन्हें उसके थोड़े-बहुत पैसे मिल जाते हैं और यह पैसा कमाने का आसान जरिया है!

ऐसे बहुत से अभिभावक हैं जो पैसा कमाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, एक निर्माण स्थल से दूसरे तक ईंटें और सीमेंट ढोते हैं। दिन के आखिर में वे जैसे भवन का हिस्सा ही प्रतीत होने लगते हैं। धर्म उन दूसरे अभिभावकों को माइक्रोफोन पर गाते रहने को मजबूर करता है, अपनी कर्कश आवाज़ से आस-पड़ोस के लोगों को परेशान करता है और राह चलते पर्यटकों और श्रद्धालुओं को इस भ्रम में रखता है कि ये गाने वाले ईश्वर को समर्पित महान भक्त हैं।

नहीं, पहले ही मैं धर्म का विशेष प्रशंसक नहीं हूँ-और जब मैं यह सब सोचता हूँ तो धर्म के बारे में मेरे विचार और दृढ़ हो जाते हैं!

अपनी जिम्मेदारियों से बचने का गुरु प्रदत्त सम्मोहक प्रस्ताव – 3 अप्रैल 2013

कल मैंने उन जिम्मेदारियों के बारे में लिखा था जो एक लेखक और पाठक, दोनों पर, आयद होती हैं और यह भी कि अपने जीवन और अपने कर्मों की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हें उठानी ही चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए और उन्हें अपने कंधों पर उठाने का साहस होना चाहिए। इस बात पर सभी सहमत होंगे कि ऐसा ही होना चाहिए मगर हिन्दू धर्म और प्रचलित गुरुवाद, दुर्भाग्य से, कुछ दूसरी ही बात सिखाते हैं: आप अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने गुरु पर डाल सकते हैं और आपको ऐसा करना भी चाहिए।

जी हाँ, यही सब बड़े से बड़े धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है और यही सब कुछ सैकड़ों सालों से गुरुओं का उपदेश रहा है जिसे उनके शिष्य निष्पादित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके पीछे का विचार यह है कि आप अपने आपको पूरी तरह गुरु के चरणों में निछावर कर दें। अपने साथ आप अपने बुरे कर्मों को और अपने अच्छे कर्मों को भी गुरु को समर्पित कर दें और अपने लिए बिना किसी अपेक्षा के जैसा गुरु कहता है वैसा करते चले जाएँ। फिर आप उस स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे जहां आपके सारे कर्म आपके नहीं रह जाएंगे और इस तरह मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।

यही वह आधार है जिस पर सारे गुरुवाद की इमारत खड़ी है। गुरु लोगों का आह्वान करते हैं: आओ, अपने सारे कर्म मुझे सौंप दो, वही करो जिसके लिए मैं तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ और फिर तुम्हें इस जीवन की, यहाँ तक कि उसके बाद की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अपने आप को समर्पित कर दो, निछावर कर दो, तुम्हारे इस जन्म की और अगले जन्मों की भी चिंता मैं करूंगा।

कितना आकर्षक विचार है! किसी भोले-भाले, साधारण धर्मभीरु व्यक्ति के लिए यह एक ललचाने वाला प्रस्ताव है! हर हिन्दू जो ऐसे धार्मिक वातावरण में बड़ा हुआ है यह विश्वास कर सकता है कि यही एकमात्र उचित राह है। कोई भी इसके मोहक स्वरों को समझ सकता है: मेरी नौका में सवार हो जाओ, मैं तुम्हें उस पार पहुंचा दूँगा! तुम्हें सोचने की, चिंता करने की ज़रूरत नहीं, तुम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाओगे। तुम नौका को हिला नहीं सकते, लहरों के तेज़ थपेड़े तुम्हें डिगा नहीं सकेंगे, डूबने की तो कोई संभावना ही नहीं- यहाँ तक कि तुम गीले तक नहीं होगे!

वे समर्पण कर देते हैं। यह बहुत आसान है और यह समाज में अच्छा भी माना जाता है! यह घोषणा करते हुए वे गर्व से भर उठते हैं: "मैंने सर्वस्व परित्याग किया है, मैं उपासना में लीन हो गया हूँ, मैं भक्त हूँ और सिर्फ वही करता हूँ जो मेरे गुरु की वाणी मुझसे करवाती है। मैं कुछ भी नहीं हूँ।" यह विनम्रता ही उनसे अपेक्षित है। उनसे कहा गया है कि ‘अपने अहं को खत्म करो’ अन्यथा गुरु आपकी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। आपके कर्मों कि ज़िम्मेदारी वह तभी लेगा जब आपके कर्मों पर उसका अधिकार होगा।

लेकिन गुरु की इस सेवा के बदले आपको एक निश्चित फीस भी अदा करनी होगी। कुछ गुरु सीधे यह फीस वसूल नहीं करते। कुछ बैंक की तरह होते हैं जहां कुछ विशिष्ट सेवाओं के लिए आपका एक तरह का बीमा किया जाता है। लेकिन आपको भुगतान करना अवश्य पड़ता है, सीधे सीधे या फिर किसी और माध्यम से।

ये गुरु आपकी इस मनोवृत्ति का लाभ सिर्फ मोटी रकम वसूल करके ही नहीं उठाते। उनके कई शिष्य इतने समर्पित होते हैं कि वे उनकी ज़बान खुलते ही उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके शिष्यों द्वारा प्रदत्त यह शक्ति उनके लिए यौन शोषण की राह भी खोल देती है। पहले शिष्य रहीं कुछ महिलाओं ने मुझे बताया कि वे तो अपने गुरु को भगवान ही समझती थीं। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, इस विश्वास के साथ कि गुरु के आदेश का पालन करने पर वे उनके माध्यम से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। जब उनसे कहा गया कि गुरु की सेवा हेतु उनके बेडरूम में जाओ, उनके जननांगों का मर्दन करो और यहाँ तक कि उनके साथ संभोग करो तो उनमें से बहुत सी इंकार नहीं कर सकीं। ऐसे कई प्रकरण हैं जहां गुरुओं ने अपनी शिष्याओं का इस तरह शोषण किया क्योंकि वे अपने भोलेपन में यह सोचती थीं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इस तरह आप देखते हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं न उठाकर उन्हें किसी और को सौंपने का आसान रास्ता अख्तियार करके आप कहाँ पहुँच सकते हैं। यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं उठाओ, अपने कर्मों और उनसे उपजे परिणामों की पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। समझिए कि जीवन का आनंद उठाने के लिए किसी गुरु की आपको कोई आवश्यकता नहीं है।

धर्म की सूक्ष्म चालबाज़ियाँ आपको पागलपन की सरहद पर ला पटकती हैं! 11 सितंबर 2012

आश्रम में हमारे घर से गेट तक सुंदर रास्ता बना हुआ है और हर रोज़ हम लोग थोड़ी देर इस रास्ते पर टहलते हैं। अपरा को गोद में लिए हम वहाँ तक आकर कभी-कभी थोड़ी देर के लिए गेट पर ही रुक जाते हैं और बाहर का नज़ारा देखते हैं। दौड़ती हुई कारें, साइकिलें और मोटर साइकिलें देखने में अपरा को बड़ा लुत्फ आता है। इसके अलावा सड़क पर घर लौटते हुए कर्मचारियों या कस्बे के परिक्रमा-मार्ग पर परिक्रमा करते तीर्थयात्रियों की चहल-पहल भी होती है। तीर्थयात्री और कई स्थानीय लोग भी नंगे पाँव और अक्सर कोई मंत्र-पाठ करते हुए प्रतिदिन यह परिक्रमा करते हैं। कुछ अधिक श्रद्धालु जन अपने आपको इससे ज़्यादा कष्ट देते हैं: वे लेट जाते हैं और खड़े होकर तीन कदम चलते हैं और फिर लेट जाते हैं। यही क्रम दोहराते हुए वे लगभग दस किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा पूरी करते हैं, इसे डंडौती परिक्रमा कहा जाता है।

कुछ दिन पहले हम लोग गेट पर खड़े यातायात का अवलोकन कर रहे थे कि हमने देखा कि एक तीर्थयात्री सड़क पर लेट गया और फिर खड़ा होकर नृत्य करते हुए कुछ कदम आगे बढ़ा और फिर लेट गया। स्वाभाविक ही वह अपने समर्पण में बेपनाह खुश दिखाई दे रहा था। रमोना मेरी तरफ मुड़ी और कहा: "यह सब करते-करते लोग पागल हो जाते होंगे, है न?" पल भर बाद मैंने जवाब दिया: "नहीं, यह सब करने के लिए पहले से आपका पागल होना ज़रूरी है!"

इससे पहले कि हिन्दू कट्टरपंथी इस प्रथा के पक्ष में अपनी बकबक शुरू करें और मेरे मित्र मुझे पाखंडी समझते हुए आरोप लगाएँ कि "लेकिन, तुम खुद यह सब किया करते थे!", मैं यह स्वीकार कर लेना चाहता हूँ कि जी हाँ, मैंने भी इसी तरह परिक्रमा की है और यह भी कि मेरी पत्नी भी यह जानती है।

मैं जानता हूँ कि उस वक़्त मेरे मन की क्या दशा थी, गुफा में प्रवेश से पहले। अगर वह व्यक्ति, जो कि उस वक़्त का मैं खुद था, आज मिल जाए तो मैं उसे निश्चित ही पागल कहूँगा।

धार्मिक विश्वास और आस्तिकता लोगों के दिमाग की जो गत बनाते हैं, उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इन बातों पर उनकी इतनी अधिक श्रद्धा, इतना दृढ़ विश्वास हो जाता है कि जो वे कर रहे हैं वह उनके लिए ही नहीं, विश्व भर के लिए भी अच्छा और शुभ है, कि वे उनके बारे में तर्कपूर्ण ढंग से सोचना ही बंद कर देते हैं। आपका दो या तीन दिन तक सड़क पर लेटना, फिर उठना और तीन कदम चलते हुए थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ना आपके ईश्वर का और आपका क्या भला कर सकता है, समझ से बाहर है। वे इस बात को अपनी भक्ति कहते हैं लेकिन मैं इसे उनके दिमाग के साथ धर्म का छल कहता हूँ। जब समर्पण इस सीमा तक बढ़ जाता है तब वह आपको अंधा बना देता है। आप दर्द महसूस नहीं करते, सोच-समझ नहीं पाते और देखते-देखते पागलपन की हद पार कर जाते हैं।

मैं मानता हूँ कि यह थोड़ा पागलपन तो है ही, मगर धर्म इससे भी ज़्यादा पागलपन करने के लिए लोगों को मजबूर कर देता है। भावना वही होती है, धर्म का छल उसी तरह काम कर रहा होता है, जब लोग सोचते हैं कि अपनी आखिरी दमड़ी धर्म पर खर्च करना एक अच्छी बात होगी, पता नहीं कब विश्व का अंत हो जाए! या दूसरे सहविश्वासु लोगों के साथ जानलेवा जहर खा लिया जाए। धर्म की यही धोखाधड़ी तब भी काम कर रही होती है जब एक व्यक्ति अपनी कमर पर बम लगाकर खुद को एक भीड़ भरे स्थान पर उड़ा देता है, जिसमें सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती है। या प्लेन हाईजैक करके बहु-मंज़िला इमारत पर दे मारता है और हजारों निर्दोष लोगों की मौत का और उनके परिवार के लिए भयंकर दुख का कारण बनता है।

यह पागलपन है। यह धर्म है। कुछ नतीजे कम हानिकारक होते हैं और कुछ ज़्यादा। आप बर्दाश्त भी कर लें अगर वह दूसरों को और खुद को भी किसी तरह का नुकसान न पहुंचाए। उसे आप मूर्ख कह सकते हैं। लेकिन अंततः धर्म ही है, जिसने उसके दिमाग को छल-कपट से यह भक्तिपूर्ण कार्य करने के लिए मजबूर किया है।

बेवफाई करेंगें लेकिन खुद ज़ख्म बर्दाश्त नहीं करना चाहते – 20 नवम्बर 08

एक बार एक महिला और एक पुरुष इकठ्ठे हीलिंग के लिए आए। वे दोनों साथ – साथ रह रहे थे लेकिन फिर भी मैं उन्हें युगल (कपल) नहीं कहूंगा। हालांकि शुरु में मैंने उन्हें युगल ही समझा था परंतु मैं यहां स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि उन दोनों को एक महिला और एक पुरुष ही कहना ज्यादा उचित होगा और मैं यही लिखुंगा भी। हीलिंग सत्र शुरु होने से पहले उस महिला ने मुझे बताया, “मैं पुरुषों और प्रेमसंबंधों से बहुत डरती हूं क्योंकि पूर्व में मुझे बहुत कड़ुवे अनुभव हुए हैं। अब मैं बहुत फूंक – फूंककर कदम रखती हूं क्योंकि मैं अब और ज़ख्म बर्दाश्त नहीं कर सकती। न ही मैं चाहती हूं कि कोई मेरे साथ बेवफाई करे। सच तो यह है कि मैं खुद भी नहीं जानती कि मैं चाहती क्या हूं? मेरी खोज अभी जारी है|”

मैंने अनुमान लगाया कि जिस पुरुष के साथ यह आई है उसकी गर्लफ्रेंड होगी। मैंने उससे पूछा,” क्या आप दोनों आपस में प्रेम करते हैं? “ उसने उत्तर दिया, “शायद! मैं उसे पसंद करती हूं और उसके साथ रहती हूं, घूमती – फिरती हूं और उसके साथ सोती भी हूं, परंतु यह नहीं कहा जा सकता कि हम दोनों प्रेम करते हैं, क्योंकि उसकी एक गर्लफ्रेंड है। हालांकि वे दोनों बहुत कम मिलते हैं लेकिन फिर भी उनका रिश्ता है आपस में|“

मैं सोचने लगा कि आखिर यह स्त्री कर क्या रही है! इस संबंध को क्या नाम दिया जा सकता है? इस तरह से साथ रहकर आखिर वह पाना क्या चाहती है? किस चीज़ की तलाश है उसे? मेरे दिमाग में एकसाथ कई प्रश्न कौंधने लगे। कभी कहती है कि उसकी तलाश अभी जारी है और अब और धोखे व ज़ख्म बर्दाश्त नहीं कर सकती! तो आखिर यह कर क्या रही है? क्या वह उस दूसरी स्त्री को धोखा नहीं दे रही है? क्या यह पुरुष अपनी गर्लफ्रेंड के साथ बेवफाई नहीं कर रहा है? क्या यह महिला एक धोखेबाज़ पुरुष के साथ नहीं रह रही है? और ऐसा करके क्या यह इस धोखाधड़ी में सहयोग नहीं दे रही है? क्या यह अजीब बात नहीं है कि यह खुद तो कोई चोट नहीं खाना चाहती लेकिन अपने व्यवहार से उस दूसरी महिला को चोट पहुंचा रही है? क्या वह इस बात का नाजायज़ फायदा नहीं उठा रही है कि किन्हीं परिस्थितियों के कारण इस पुरुष की गर्लफ्रेंड अपने प्रेमी से बहुत कम मिल पाती है? यह पुरुष उस स्त्री को अपनी गर्लफ्रेंड मानता है, अनुपस्थिति की वजह से उससे शारीरिक नज़दीकी उतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए, लेकिन फिर भी कहीं न कहीं एक भावनात्मक रिश्ता तो दोनों के बीच ज़रूर है अन्यथा वह ऐसा क्यों कहता कि उसकी एक गर्लफ्रेंड है। क्या आप किसी और से शारीरिक संबंध बनाकर एक भावनात्मक रिश्ते की बेक़द्री नहीं कर रहे हैं? हम इतने स्वार्थी क्यों हो गए हैं? मैं तो कहता हूं कि ऐसा करके आप स्वयं से धोखा कर रहे हैं, आप भावनाओं के साथ बेवफाई कर रहे हैं।

आजकल अकसर हमें ऐसी बातें अपने आसपास के समाज में कई रूपों में देखने को आती हैं। मैंने पहले भी इससे मिलते – जुलते विषय पर चर्चा की थी। मैं किसी पर कोई आरोप नहीं लगाना चाहता। मैं यह विश्लेषण करने की कोशिश कर रहा था कि हमारे आसपास क्या हो रहा है? और अंत में हमें इस सब से क्या हासिल हो रहा है? रिश्ते की गाड़ी प्रेम और और समर्पण के दो पहियों से चलती है, हेराफेरी से नहीं।

बदलाव चाहते हैं तो पहले स्वयं को बदलिए – 7 नवम्बर 08

किसी भी रिश्ते में स्वीकारभाव का होना बहुत जरूरी है। यदि हम दूसरों को जस का तस स्वीकार नहीं कर सकते तो हम किसी के साथ भी एक सफल रिश्ता नहीं बना सकते। अगर हम हर वक़्त किसी को बदलने की ज़द्दोज़हद में लगे रहते हैं और चाहते हैं कि वह हमारे मनमुताबिक बदल जाए, तो यह निश्चित है कि इस कोशिश में हमें ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचेगा। आखिर हम दूसरे को बदलना क्यों चाहते हैं? हम खुद को क्यों नहीं बदल सकते? और अग़र यदि आप स्वयं को ही नहीं बदल सकते तो दूसरे में बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यदि आप वास्तव में परिवर्तन चाहते हैं तो सबसे पहले अपने भीतर झांककर देखें और यह जानने की कोशिश करें जो आप साथी से चाहते हैं क्या वह सब आप स्वयं कर पाए हैं। यदि नहीं, तो सबसे पहले स्वयं को बदलें। असल में होता यह है कि लोग दूसरों को बदलना चाहते हैं और शायद इसके ज़रिए समाज को और यहां तक कि सारी व्यवस्था को बदलने का मंसूबा रखते हैं। परंतु भरसक कोशिश करने के बावजूद वे इसमें सफल नहीं हो पाते। वे सफल हो भी नहीं सकते क्योंकि दूसरों को जो शिक्षा वे देते हैं उसका स्वयं पालन नहीं करते। लेकिन यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को बदलने की कोशिश करे तो चीज़ें अवश्य बदल सकती हैं।

रिश्ता सफल होता है समर्पण से, अहम या उम्मीदों से नहीं। उम्मीदों को पीछे छोड़ना होगा और साथी को स्वीकार करना होगा, उसका आदर करना होगा। मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि यदि प्रेमसंबंध में आप स्वीकारभाव, आदर और प्यार चाहते हैं तो निश्चय ही पहले स्वयं को स्वीकार, आदर और प्यार करना होगा।

आज अक्षय नवमी है। इस दिन लोग यहाँ आंवला के वॄक्ष की पूजा करते हैं। कई आयुर्वेदिक औषधियों में आंवले का प्रयोग किया जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। यह पाचन के लिए अच्छा होता है और आपको युवा बनाए रखता है। एंटी – एजिंग लोशनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद कहता है आंवला ‘अमृत‘ है। कभी भी और किसी भी रूप में इसका सेवन करना फायदेमंद होता है। यह सदैव आपके लिए गुणकारी है। मैं इस तरह की परंपराओं को पसंद करता हूं जो हमें प्रकृति के नज़दीक ले जाती हैं।