जब एक राजनेता के प्रति अपने समर्पण और भक्ति को पुरानी मित्रता से अधिक महत्व दिया जाता है -15 फरवरी 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे एक राजनैतिक नेता की आलोचना करने के कारण उन्होंने अपने मित्रों को खो दिया। वे मित्र अपने आपको उस नेता का समर्थक कहते थे लेकिन बालेंदु जी बता रहे हैं कि कैसे वे अपने नेता की उपासना करते थे।

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श्रद्धा से नहीं, पैसे के लिए मंत्र-जाप और कीर्तन – 7 अप्रैल 2014

स्वामी बालेंदु अपने स्कूली बच्चों के कुछ अभिभावकों के काम के बारे में जानकारी दे रहे हैं: वे पैसों के लिए मंदिरों में भजन गाते हैं और पुजारी की मदद करते हैं। बालेंदु जी इस विषय में क्या सोचते हैं, यहाँ पढ़िये।

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अपनी जिम्मेदारियों से बचने का गुरु प्रदत्त सम्मोहक प्रस्ताव – 3 अप्रैल 2013

स्वामी बालेन्दु लिखते हैं कि किस तरह हिन्दू धर्म में किस तरह गुरुवाद को बढ़ावा दिया गया है और उसके क्या दुष्परिणाम होते हैं|

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धर्म की सूक्ष्म चालबाज़ियाँ आपको पागलपन की सरहद पर ला पटकती हैं! 11 सितंबर 2012

स्वामी बालेंदु धार्मिक समर्पण के विषय में लिख रहे हैं जो लोगों को ऐसे-ऐसे काम करने पर मजबूर कर देता है, जिसे वे स्वयं पागलपन कहेंगे, बशर्ते वे धर्म की चालबाज़ियों को समझ सकें। उदाहरणार्थ प्रस्तुत है उनकी, स्वयं की आपबीती!

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बेवफाई करेंगें लेकिन खुद ज़ख्म बर्दाश्त नहीं करना चाहते – 20 नवम्बर 08

स्वामी जी उन लोगों के बारे में लिखते हैं जो प्रेमसंबंधों में धोखा देते हैं , दूसरों को ज़ख्म देते हैं लेकिन खुद चोट खाने से बचते हैं|

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बदलाव चाहते हैं तो पहले स्वयं को बदलिए – 7 नवम्बर 08

Swami Ji writes about acceptance in relationships. Do not expect your partner to change if you cannot change yourself.

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