दैवी शक्तियों की मार्केटिंग – पवित्र शहर, वृंदावन के विज्ञापन – 13 सितंबर 2015

मैंने आपको बताया था कि पिछले सप्ताह हमारे यहाँ अमरीका से कुछ मेहमान आए हुए थे। हालांकि वे यहाँ कुछ दिन ही रहे मगर वृंदावन में उनका समय बड़ा शानदार रहा। एक दिन वे वृंदावन की 10 किलोमीटर लंबी परिक्रमा करके आए जिसमें कि शहर का एक पूरा चक्कर लग जाता है। शहर के बारे में उनकी राय बहुत सकारात्मक थी और विशेष रूप से वे यहाँ के विज्ञापनों की रचनात्मकता से बेहद प्रभावित हुए।

जी हाँ, शहर का चक्कर लगाते हुए आपको तरह-तरह के विज्ञापन देखने को मिलते हैं-विशालकाय विज्ञापन-बोर्ड (होर्डिंग्स), बैनर्स और तरह-तरह के पोस्टर्स, जिन्हें ऐसी जगहों पर लगाया जाता है कि आने-जाने वालों की नज़र उन पर पड़े बिना न रह सके और लोग उन्हें आसानी से पढ़ सकें। निश्चय ही, बहुत से इश्तहार आध्यात्मिक प्रवचनों की सूचनाएँ होते हैं, जिनमें गुरुओं और बाबाओं आदि को विज्ञापित किया जाता है। अधिकतर ये विज्ञापन हिन्दी भाषा में होते हैं परन्तु इनमें आप तरह-तरह के गुरुओं और उपदेशकों के फोटो देख सकते हैं!

लेकिन जिस बात पर उन्हें सबसे अधिक हँसी आ रही थी, वह था विज्ञापनों का लोगों के इस विचार को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करना कि वृंदावन 'कृष्ण की पवित्र भूमि' है। निश्चित ही यह स्थान पूजा-अर्चना और ईश्वर की आराधना का पवित्र स्थान है और हिन्दू विश्वास करते हैं कि ईश्वर की कृपा से ही इस स्थान पर निवास करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। और इस भोले विश्वास पर व्यापारियों की नज़र न पड़े यह संभव नहीं है! इसीलिए भावभक्ति पूर्ण नामों वाली बहुत सी हाउसिंग सोसाइटियाँ, बहुमंज़िला इमारतें और अत्यंत सुंदर और विशालकाय प्रवेशद्वारों से सुसज्जित रिहाइशी बस्तियाँ अस्तित्व में आ गई हैं या आ रही हैं, जिन्हें देखकर यहाँ आने वाले धनाढ्य तीर्थयात्री एकाध फ्लॅट, कोई ड्यूप्लेक्स मकान या बंगला खरीदने के लिए लालायित हो जाते हैं।

लेकिन आपको मानना पड़ेगा कि विदेश से आए व्यक्तियों के लिए यह देखना काफी दिलचस्प होता है: 'कृष्णभूमि अपार्टमेंट्स', 'हरेकृष्णा ऑर्चिड' और निश्चय ही, 'कृष्णा हाइट्स' भी। मज़ाक करते हुए हमारे मित्रों ने चुटकी ली कि अमरीका में इसे इस तरह कहा जा सकता है: 'जीज़स टावर', 'सैंट मैरी हाउसिंग कॉम्प्लेक्स' इत्यादि…! हाँ, क्यों नहीं!

स्वाभाविक ही प्रचार-वाक्य और नारे भी यही राग अलापते हैं। आपको 'दयानिधान' के 'आध्यात्मिक और पावन सान्निध्य' में निवास हेतु आमंत्रित किया जाता है। फ्लॅट खरीदने पर 'दैवी अनुग्रह' की छत्रछाया आप पर सदा-सदा बनी रहेगी। या कोई बंगला खरीदने पर आप 'धरती पर अवतरित ईश्वरीय स्वर्ग' में निवास कर सकेंगे! पैसे नहीं हैं, कोई बात नहीं- आपको सस्ते ऋण उपलब्ध कराए जाएँगे। उसके बाद आप इस 'पवित्र भूमि में रहने के दैवी परमानंद' से बचकर कहाँ जा सकते हैं!

लेकिन यदि ईनाम ही देना हो तो किसी हाउसिंग सोसाइटी को वह प्राप्त नहीं होगा बल्कि हाइवे के निर्गम स्थल पर लगे एक विज्ञापन होर्डिंग को मिलेगा, जो एक बड़े होटल का विज्ञापन है। हमारे मित्रों ने इसे ही सबसे पहले देखा था और उसकी दिलचस्प रचनात्मकता से अभिभूत हो गए थे और अंत तक उनके मन से निकलता ही नहीं था:

'देवभूमि की विलासिता का जादुई एहसास'

वॉव! 🙂

वृन्दावन में ओलावृष्टि – 5 अप्रैल 2015

आश्रम में पिछले कुछ दिनों से थॉमस और आइरिस के साथ बड़ा शानदार समय गुज़र रहा है-थोड़ा आराम, थोड़ा काम लेकिन कुल मिलाकर बेहद सुकून वाले शांत और सुखद दिनों का हम भरपूर आनंद उठा रहे हैं। शांत कह रहा हूँ लेकिन कल ही एक बड़ी घटना घटित हो गई, बल्कि कहा जाए कि बड़ा हादसा हो गया: हमारे शहर और हमारे इलाके में भयंकर ओलावृष्टि हुई!

साल के इस समय के लिहाज से यह अत्यंत अनपेक्षित मौसम कहा जाएगा। पिछले कुछ सप्ताह से लगातार रुक-रुककर बारिश होती रही थी इसीलिए जब शुक्रवार के दिन अचानक सूरज और नीला साफ़ आकाश अचानक लुप्त हो गया और उसकी जगह गहरे काले बादलों ने ले ली तो हमें आश्चर्य नहीं हुआ। दूर कहीं बिजली कड़कने लगी और तेज़ हवाएँ चलने लगी, जिन्होंने बड़े-बड़े पेड़ों को झंझोड़कर रख दिया और सड़कों पर पत्तियों और पेड़ों की टहनियों का अम्बार लग गया। तूफ़ान की आमद थी, हम समझ गए थे। लेकिन अचानक अजीबोगरीब आवाज़ों से शहर दहशत में आ गया!

पहले तो लगा, सिर्फ बिजली गरज रही है लेकिन वह गड़गड़ाहट रुक नहीं रही थी और नगाड़े अभी भी दूर बज रहे थे। फिर यह क्या था-हम सोच में थे, भरमाए से एक-दूसरे की ओर ताक रहे थे? फिर शुरुआत छोटे-छोटे ओलों से हुई और हम जान गए कि मामला क्या है: आवाज़ ओलों की थी, लेकिन भारी-भरकम ओले भी करीब ही थे!

यह समझ में आते ही हमारा ड्राईवर कार की ओर दौड़ा-वह इस वक़्त तक भी बाहर ही, आश्रम के सामने खुले में रखी थी। वह कार के अंदर कूदा और गीले, चिकने फर्श पर, जितना तेज़ भगा सकता था, भगाकर रेस्तरां के छज्जे के नीचे ले जाने लगा।

वह आधी दूर ही पहुँचा था कि ओलावृष्टि इतनी तेज़ हो गई कि सेकंडों में बड़े-बड़े ओले ज़मीन पर बरसने लगे और रास्ते में, बगीचे में और हम लोगों के सामने, आँगन में हर तरफ ठोस बर्फ की चादर बिछ गई!

अद्भुत नज़ारा था! प्रकृति के प्रकोप का ऐसा दृश्य हमने कभी नहीं देखा था! अविश्वसनीय और थोड़ा डरावना भी!

ऐसा लग रहा था कि यह कुछ देर चलेगा लेकिन सब कुछ कुछ मिनटों में समाप्त हो गया। जब वह ओलावृष्टि थमी, हल्की बारिश शुरू हो गई और कुछ देर बार वह भी बंद हो गई। फिर तो बच्चे और बच्चों जैसे हमारे कर्मचारी बाहर निकलकर ओले बीनने लगे, एक दूसरे पर उनकी बौछार शुरू कर दी, जैसे बर्फ का कोई खेल हो रहा हो और कुछ तो ओलों को बाल्टियों में इकट्ठा करने लगे। स्वाभाविक ही हम इस दृश्य को कैमेरे और मोबाइल फोनों में कैद करने का लोभ संवरण नहीं कर सके और ओलों की तस्वीरें भी ली गईं: कुछ ओले तो टेनिस की गेंद के बराबर भी थे!

हम लोगों के लिए यह विस्मयकारी था लेकिन आप कल्पना कर सकते हैं कि इस इलाके में इस ओलावृष्टि ने कितना नुकसान पहुँचाया होगा! खेतों में, जहाँ पिछली बारिश के चलते गेहूँ की फसल लगभग नष्ट ही हो गई थी, इस आघात के बाद हर तरफ तबाही का नज़ारा है। सबेरे और शाम आश्रम के गेट पर खड़े हुए हमने सैकड़ों टूटी-फूटी कारों को निकलते देखा, जिनमें किसी की विंडशील्ड्स टूटी है तो किसी की खिड़कियाँ और कुछ कारों में कई जगह खरोंच लग गई है और ढाँचा क्षतिग्रस्त हो गया है। इस मामले में है भाग्यशाली रहे कि हमारी कार में मुश्किल से चार या पाँच डेंट्स लगे हैं!

सबसे बुरी बात यह है कि इस ओलावृष्टि में 14 लोगों की जानें भी गई हैं! कुछ मामलों में सीधे ओलों की मार से और कुछ दूसरे मामलों में तूफान के कारण उड़कर आने वाली किसी सख्त चीज़ के आघात से।

मौसम में बदलाव साफ नज़र आ रहा है। पहले ऐसा बदलाव कभी नहीं देखा गया-और हम इस बदलाव के नतीजे भुगतने के लिए मजबूर हैं!

यमुना आरती – अन्धविश्वास, भोजन की बरबादी, प्रदूषण और मस्ती भरा माहौल – 3 दिसम्बर 2014

हम लोग इस समय खुशियाँ मना रहे हैं-दरअसल मेरे सबसे पहले जर्मन मित्र, माइकल और आंद्रिया यहाँ आए हुए हैं तो उनके साथ आश्रम में हम सब खूब मज़े कर रहे हैं! स्वाभाविक ही वे थोड़ा-बहुत बाहर भी घूमना चाहते हैं इसलिए रमोना उन्हें उन्हें लेकर केशी घाट गई थी और उन्हें यमुना आरती दिखाकर अभी-अभी लौटी है। निश्चित ही मेरी पत्नी के लिए यह कोई नई बात नहीं थी और उसे आरती के दौरान कुछ अधार्मिक अनुभव प्राप्त हुए।

हमारे मित्र, जो स्वयं भी धार्मिक नहीं हैं, रमोना और पूर्णेन्दु के साथ बैठे सारे अनुष्ठान को गौर से देखते रहे। सबसे पहले अनुष्ठान कराने वाले पुरोहित ने नदी में बहुत सारा दूध बहा दिया। उसके बाद उन्होंने देखा कि बहुत सारी मिठाइयाँ यमुना नदी में बहाई जा रही हैं और अंत में हज़ारों की संख्या में गुलाब की पंखुड़ियाँ भी बहाई गईं। नदी में बहती पंखुड़ियों को देखते हुए अचानक उन्हें खयाल आया कि इन पंखुड़ियों का क्या हुआ होगा: वास्तव में महज 100 मीटर आगे कुछ बच्चे इन्हीं पंखुड़ियों को नदी में से निकालकर इकठ्ठा कर रहे थे। फटे-पुराने गंदे कपड़ों में, नंगे पैर और शरीर पर धूल और गंदगी लिपटी हुई। और यही बच्चे कुछ देर पहले दोनों में कुछ गुलाब की पंखुड़ियाँ और एक रुई की बाती रखकर उन्हें हमारी टोली को बेचने की कोशिश कर रहे थे कि वे भी दिया जलाकर दोनों को यमुना में प्रवाहित करें।

उनके लिए यह किसी रहस्य के खुलने जैसा था: एक तरफ लोग सैकड़ों लीटर पौष्टिक दूध नदी के गन्दे पानी में विसर्जित कर रहे हैं और दूसरी तरफ गरीब बच्चे हैं, जो किसी तरह कुछ रुपए कमाकर घर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे उनका परिवार चावल, आटा, दाल और हाँ-दूध-खरीद सके। इतने परिश्रम के बाद भी दूध के साथ नदी में फेंकी जाने वाली मिठाइयों का आनंद वे नहीं ले पाएंगे क्योंकि वे बहुत महंगी हैं और उन्हें खरीद पाना उनके बूते के बाहर की बात है।

इसके अलावा अगर आप नदी को देखें तो सोच में पड़ जाएँगे कि क्या इसे वास्तव में नदी कहा भी जा सकता है! कम बारिश के कारण और दिल्ली शहर में नदी पर बड़े-बड़े बांध बन जाने के बाद आजकल उसमें बहुत कम पानी होता है। नदी के पाट का बड़ा हिस्सा साफ़ दिखाई देता है और जहाँ पहले नावें पर्यटकों को घुमाने ले जाती थीं वहाँ ऊँट इधर-उधर घूमते-फिरते हैं। इस अनुष्ठान के लिए भी उन्हें एक नहर खोदकर पानी को घाट की सीढ़ियों तक लेकर आना पड़ता है। अब इस छोटे से गंदे पानी के गढ़े में ही वे लोग फूल, दूध और मिठाइयाँ फेंकते हैं और पहले से अत्यधिक प्रदूषित पानी को और ज़्यादा प्रदूषित करते हैं।

ज़्यादा से ज़्यादा वह गटर के पानी और दिल्ली से आ रहे रासायनिक कचरे का मिश्रण भर रह गई है। उसमें कोई जीवन नहीं रह गया है। मछली नहीं, कछुए नहीं और न ही कोई दूसरे जीव जंतु, बचपन में जिनके साथ हम पानी में खेला करते थे! वे यहाँ बचे नहीं रह सकते थे-पानी में जान ही नहीं है।

इन सबके बावजूद और इसके बावजूद भी कि दो-दो भोपुओं पर पुरोहितों के कर्कश स्वर गुंजायमान थे और एक दूसरे से होड़ कर रहे थे, रमोना और हमारे मित्रों ने नदी किनारे घूमने का और वहाँ चल रहे अनुष्ठानों का भरपूर आनंद उठाया। कैसे? मेरी पत्नी ने इसे स्पष्ट करने की पूरी कोशिश की: उसे कोई धार्मिक आकर्षण या धर्म के प्रति कोई आदर या लगाव नहीं है। ऐसा कोई एहसास नहीं है कि वहाँ हो आने पर किसी देवी या देवता की कृपा उसे प्राप्त होगी। लेकिन डूबते सूरज की सुनहरी रौशनी में ऐतिहासिक इमारतों के सामने, घाट की शिलाओं पर बैठना, लोगों का गाना-बजाना सुनना और लोगों को एक साथ इतनी बड़ी संख्या में वहाँ से गुज़रते देखना अपने आप में बहुत सुखद एहसास करा रहा था। यह सब एक अनोखा माहौल पैदा करता है, जिसका हिस्सा बनना ही आपको भावविभोर कर देता है।

इसमें कोई दैवी या आध्यात्मिक बात नहीं है। वहाँ कोई भगवान आपको प्रसन्न नहीं कर रहा है। आप खुद प्रसन्न हैं। आप इतने सारे लोगों के बीच खुद को पाकर खुश हैं क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे लोगों के साथ, उनके साथ बैठकर, आपस में घुल-मिलकर अच्छा लगता है। आप नैसर्गिक सौंदर्य देखकर प्रसन्न होते हैं, हालाँकि वह इससे भी अधिक प्रभावशाली हो सकता था। और आप संगीत का आनंद लेते हैं, दूसरों का गाना-बजाना सुनकर प्रसन्न होते हैं।

क्या यह सब, यह सुखद और आनंददायक माहौल, हम बिना किसी अन्धविश्वास का सहारा लिए, खाने-पीने का सामान बरबाद किए बगैर, नदी को गंदा किए बगैर और बिना प्रदूषण फैलाए पैदा नहीं कर सकते?

बाढ़ प्रवण क्षेत्र में दो कमरों में छः वयस्क और दो बच्चे – हमारे स्कूल के बच्चे- 30 अगस्त 2013

अपने बच्चों के विषय में हर शुक्रवार, नियमित रूप से जारी होने वाली हमारी रिपोर्टें और बच्चों के घरों के वीडियो देखकर हमारी एक स्पोंसर ने ईमेल भेजकर पूछा कि क्या उसके द्वारा प्रायोजित बच्चे के घर से भी हम ऐसा वीडियो बनाकर लाएँगे और उसका भी परिचय करवाएँगे। वह उस लड़के के बारे में, उसके रहन-सहन के बारे में कुछ विस्तार से जानना चाहती थी और साथ ही उसके परिवार से 'मिलना' भी चाहती थी। वैसे भी हमने तय किया था कि हम लोग एक-एक करके सभी बच्चों के पास जाएंगे और उन्हें आपसे मिलवाएँगे, इसलिए हमें मुरारी से मिलने में कोई दिक्कत नहीं थी!

मुरारी 13 साल का है और पाँच साल से हमारे स्कूल में पढ़ रहा है। नर्सरी (pre-school) से शुरू करके अब वह तीसरी कक्षा में है। वह अपने परिवार के साथ रहता है और उसके दो बड़े भाई हैं, जिनकी उम्र 26 और 24 साल है। इस तरह बहुत समय तक, पिछले साल तक, जब उसके सबसे बड़े भाई की पत्नी ने एक शिशु यानी उसके भतीजे को जन्म दिया, वह घर का बेबी-बॉय रहा है। बच्चे के जन्म की घटना से पहले उनके यहाँ एक और सुखद कार्य, दूसरे भाई के विवाह, सम्पन्न हुआ था। इस भाई की पत्नी भी अब उनके साथ ही रहती है, जैसा कि भारत में सामान्य सी बात है। अर्थात, अब उस दो कमरे, एक संडास और थोड़ी सी खुली जगह वाले घर में छह वयस्क, मुरारी और वह छोटा शिशु एक साथ रहते हैं। उसी खुली जगह में हमने उनसे बातचीत की।

मुरारी के पिता के साथ अपनी बातचीत के दौरान ही हमें पता चला कि पहले वह एक बढ़ई था लेकिन बढ़ती उम्र और एक सड़क दुर्घटना के बाद, जैसा कि उसने बताया, उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती और वह लकड़ी के साथ कठोर श्रम कर पाने में असमर्थ है और जब कभी मिल जाता है, छोटा-मोटा फुटकर काम कर लेता है। इस काम से ज़्यादा आमदनी नहीं हो पाती मगर उसके दोनों बड़े लड़के मजदूरी करते हैं और हालांकि इन सबकी कुल आमदनी भी पर्याप्त नहीं होती, परिवार किसी तरह चल रहा है।

अपनी छत पर वे एक और कमरा बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं, जिससे सबसे बड़ा भाई और उसकी पत्नी अलग कमरे में रह सकें। इससे एक और लाभ यह होगा कि बारिश के दिनों में, जैसा कि इस बाढ़ प्रवण इलाके में अक्सर होता है, अगर पानी बढ़कर घर में आने लगे तो वे वहाँ जाकर कुछ दिन रह सकते हैं।

मुरारी का घर संजू, जिससे हम पहले ही आपको मिलवा चुके हैं, के घर से ज़्यादा दूर नहीं है। सन 2010 में, जब वृन्दावन में बहुत बाढ़ आई थी, मुरारी के घर में बाढ़ का पानी घुस गया था और वह बाढ़ उतरने तक आश्रम में रहने आया था। परिवार के दूसरे सभी लोग, चोरों के डर से, कई दिन छत पर डेरा डाले पड़े रहे। उन्हें डर था कि कहीं उनका थोड़ा-बहुत सामान भी चोर उठाकर न ले जाएँ।

जबकि पानी की समस्या वहाँ बनी ही रहती है, मुरारी उस जगह से प्रेम करता है और वहीं रहता है। "मेरे स्कूल के सभी दोस्त वहीं आसपास ही रहते है," वह कहता है। अभिभावक खुश हैं कि वे मुरारी को हमारे स्कूल भेज सके, जिससे उन पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ कुछ कम हो सका। उन्हें उम्मीद है कि पढ़कर मुरारी अच्छी आमदनी वाली कोई नौकरी पा लेगा, क्योंकि अभी से वह परिवार के किसी भी सदस्य से ज़्यादा अंग्रेज़ी जानता है। उसके शिक्षक सहमत हैं-मुरारी अच्छा विद्यार्थी है, पढ़ने में तेज़ है और अगर अपने यार-दोस्तों से अपना ध्यान हटाकर एकाग्र होकर पढ़ाई करे तो वह और भी अच्छी तरह से और ज़्यादा जल्दी विषय को पकड़ सकता है, उन्हें आपस में जोड़ सकता है और उन्हें बेहतर ढंग से समझ सकता है।

जब मानसून की बारिश बहुत खतरनाक हो जाती है – हमारे स्कूल के बच्चे- 16 अगस्त 2013

आज मैं आपको हमारे स्कूल में पढ़ रहे एक विद्यार्थी, संजू से मिलवाना चाहता हूँ। संजू बारह साल का है और पिछले दस साल से वृन्दावन में निवास कर रहा है। उसे कोई दूसरा घर याद ही नहीं है और यह इलाका, जहां वह रह रहा है, उसे बहुत भाता है क्योंकि उसके कई मित्र भी इसी इलाके में, आसपास ही, रहते हैं। यहाँ एक ही बात उसे खलती है: हर साल बारिश के मौसम में अपने माँ-बाप को परेशान देखना और इस सवाल का सामना करना: "क्या इस साल बाढ़ में घर बचा रहेगा या नहीं?"

संजू के पिता रिक्शा चलाते हैं। उन्होंने हमेशा ऐसे ही काम किए हैं जिसमें रोज़ अनिश्चित कमाई ही हो पाती है और इसलिए वह शहर दर शहर भटकते फिरते हैं। अपने गाँव में उनका एक घर है-पर वहाँ काम नहीं है, जिससे वह कुछ कमा सकें और अपने परिवार का लालन-पालन कर सकें। उनकी पत्नी कलकत्ता की है मगर उसकी एक बहन वृन्दावन में रहती है और इसी कारण वह अपने दो साल के बेटे, संजू और एक माह की उसकी बहन को लेकर वृन्दावन आ गए थे। आते ही फिर एक बच्चा हो गया और उन्होंने तय किया कि अगर आर्थिक दृष्टि से संभव हुआ तो आगे वृन्दावन में ही बस जाएंगे। उन्होंने एक मकान खरीदा और खुश थे कि रहने को एक घर तो हुआ। फिर मानसून आया और बारिश का पानी न सिर्फ छत से टपकने लगा बल्कि दरवाजा तोड़कर घर के भीतर भी चला आया।

हर साल परिवार की यही हालत होती है। पानी से बचने के लिए उन्हें घर में जगह-जगह बाल्टियाँ या दूसरे बर्तन रखने पड़ते हैं जिससे उनके, दो कमरों के छोटे से, घर में पानी न भरे। लेकिन जब बारिश का पानी सड़कों और गलियों में बहना शुरू करता है तो उसे घर में आने से रोकने का कोई उपाय वे नहीं कर पाते। पूरा इलाका बाढ़-प्रवण है क्योंकि घर यमुना नदी के बहुत किनारे पर बना हुआ है।

सन 2010 की पिछली बाढ़ के दौरान उन पर जैसे अक्षरशः आसमान ही फट पड़ा था: उनका घर छत तक पानी में डूब गया था। जब पानी का स्तर ऊपर जा रहा था तब उसका आवेग इतना अधिक था कि घर की दीवारे उसे बरदाश्त नहीं कर पाईं। दीवारों में दरारें पड़ गईं और लगता था कि घर ही पानी में बह जाएगा। उस साल हमने भी वृन्दावन और उसके आसपास के इलाके में बहुत सा चैरिटी का काम किया था। हमने स्वास्थ्य-केंद्र स्थापित किए थे, भोजन की व्यवस्था की थी, जहां हम स्वयं बारिश में तबाह लोगों के लिए भोजन पकाते थे। यहाँ तक कि जिनका संपर्क दुनिया से कट गया था, उन पीड़ितों के पास हम नावों की सहायता से पहुंचे और भोजन वितरित किया। उस समय संजू और उसकी माँ ने हमें अपना घर दिखाया था: वह ऐसा नज़र आता था जैसे जल्द ही बाढ़ में बह जाएगा। आप सन 2010 की बाढ़ का वह दृश्य नीचे दिये गए वीडियो में देख सकते हैं।

अपने दूसरे बच्चों को लेकर संजू की माँ को अपने रिश्तेदारों के घर आश्रय लेना पड़ा और संजू, कुछ दूसरे पीड़ित बच्चों के साथ, हमारे यहाँ, आश्रम में, रहने आ गया। यहाँ आने के कारण, बाढ़ के बावजूद उनकी पढ़ाई में कोई व्यवधान उपस्थित नहीं हुआ और वह नियमित रूप से स्कूल की पढ़ाई जारी रख सका। अपने जैसे ही दूसरे गरीब लोगों की तरह संजू के पिताजी को भी छत पर सोना पड़ा, जिससे उनका थोड़ा बहुत, जो भी सामान बचा रह गया था, उसे चोरों से बचाया जा सके।

किसी तरह आश्चर्य ही था कि, कुदरत की कृपादृष्टि ही थी कि बाढ़ दीवारों को बहाकर नहीं ले जा सकी। धीरे-धीरे पानी का स्तर नीचे आया और परिवार खुश था कि उनका घर जहां था, वहीं मौजूद है। घर में जगह-जगह दरारें पड़ गई थी और वहाँ नमी के मारे सांस लेना दूभर था। परिवार के पास घर की मरम्मत के लिए धन नहीं था। पैसे की कमी के चलते दीवारों को जोड़ना और दरारों को भरना भी संभव नहीं था। अगली बार जब नदी में बाढ़ आएगी, तब क्या हालत होगी? क्या हालत होगी, जब किसी दिन तूफान और पानी का बहाव इतना तेज़ होगा कमजोर दीवारे बाढ़ में बह जाएंगी? वे जानते हैं कि वे खतरे में हैं, किसी भी दिन दीवारें उन पर गिर सकती हैं लेकिन उनके पास कोई चारा नहीं है। जो पैसा वे कमाते हैं वह बाल-बच्चों और अपने लिए भोजन और कपड़े-लत्तों के इंतज़ाम में ही खर्च हो जाता है।

कम से कम उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता नहीं करनी पड़ती। संजू पहले से हमारे स्कूल में पढ़ता है और उन्होंने अपने दूसरे बच्चों को भी अगले साल से हमारे स्कूल में भेजने का वादा किया है। इस तरह बच्चों को गरमागरम भोजन भी मिल जाएगा और वे स्कूल में रहकर कुछ न कुछ सीख सकेंगे और अपने परिवार का भविष्य कुछ उज्ज्वल बनाने में अपना योगदान कर सकेंगे!

गुरु से दीक्षा लेने से मना करना यानी मुसीबत मोल लेना!- 21 जुलाई 2013

जब मेरे जर्मन मित्र, जिनके भारतीय विवाह के बारे में मैं पिछले हफ्ते लिख चुका हूँ, 2005 में भारत आए तो उन्हें एक और अनुभव हुआ, जो बड़ा मज़ेदार है और जो भारत आने वाले और भी लोगों के साथ घटित हो सकता है। चलिए, मैं उसके बारे में विस्तार से बताता हूँ।

जब वे हमारे आश्रम आए तो पेशोपेश में पड़ गए। हाल ही में हमने दूसरी मंज़िल का निर्माण करवाया था और कुछ काम अभी भी चल ही रहा था। इमारत का काम अभी जारी था, आने जाने के रास्ते पर मुरुम पड़ी थी और हालांकि दीवारों पर प्लास्टर चढ़ाया जा चुका था, उनमें पुताई का काम होना बाकी था।

उपलब्ध कमरों में से चुनकर उन्हें सबसे बढ़िया कमरा दिया गया था और हालांकि उस वक़्त वह साधारण सा कमरा था, वे वहाँ आराम से रहने लगे। उन्हें वृन्दावन में ही एक पुजारी का भी निमंत्रण था। वह पुजारी पुरानी परंपरा का संगीतकार था, जिसमें हमारे मित्रों की रुचि थी। यह निमंत्रण पाकर वे बहुत सम्मानित महसूस कर रहे थे और उन्होंने मेरे भाई से कहा कि वे उसके यहाँ जाना चाहते हैं। लेकिन यह मुलाक़ात उनकी अपेक्षा से थोड़ा भिन्न रही!

वे वहाँ गए तो उन्हें पता चला कि वह व्यक्ति, संगीतकार, जिससे वे मिलना चाहते थे, घर पर नहीं था। और उनकी अपेक्षा के विपरीत वहाँ संगीत का कोई कार्यक्रम होने वाला है, इसकी कोई हलचल भी नहीं थी। लेकिन पुजारी के परिवार ने उनका स्वागत किया और उनसे उनके यहाँ रुकने का अनुरोध किया। घर की महिला ने उनके लिए भोजन तैयार किया-खास भारतीय खाना और स्वाभाविक ही, बहुत तीखा-और भोजन के दौरान बार-बार अपने द्वारा बनाए गए व्यंजनों को दोबारा लेने का आग्रह करती रहीं। मित्र नम्र थे और जो भी परोसा जाता, खाते रहे और खाना कुछ ज़्यादा ही हो गया। उन्होंने मन में यह भी सोचा कि इन्हें खुश करने के लिए हमने जितना भी संभव था, सब कुछ किया, लेकिन भीतर से नजदीकी का एहसास गायब है। उन्हें महसूस हो रहा था, जैसे वह परिवार उनसे कुछ अपेक्षा कर रहा है और जल्द ही पता भी चल गया कि वे लोग उनसे क्या चाहते हैं: उनकी अपेक्षा थी कि हमारे जर्मन मित्र उनसे दीक्षा ग्रहण कर लें!

सौभाग्य से, इतने अच्छे स्वागत से भी वे इतने प्रभावित नहीं थे कि दीक्षा ही ले लेते! मेरा मित्र पहले भी भारत आ चुका था और इस तरह के अनुभवों से गुज़र चुका था और जानता था कि दीक्षा का अर्थ यह है कि आप गुरु की सेवा करते रहें। गुरु के ज्ञानपूर्ण वचनों पर सिर हिलाते रहें, उसकी सलाह मानें और अपनी आमदनी का एक हिस्सा गुरु के चरणों में अर्पित करें। दीक्षा कई जिम्मेदारियों को जन्म देती हैं और उसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं। उन्होंने भरसक नम्रता के साथ उन्हें मना करने की कोशिश की, लेकिन यह भी महसूस किया कि उनके इंकार से माहौल अचानक बदला-बदला नज़र आने लगा है। मेजबान लगभग ज़बरदस्ती पर उतर आए थे और साफ दिखाई देता था कि वे गुस्से में हैं। लेकिन जल्द ही वे समझ गए कि वे हमारे मित्रों का निर्णय बदल नहीं सकते और यह सोचकर उनके मुंह लटक गए।

हमारे मेहमानों को उनका कमरा दिखाया गया-एक बहुत साधारण कमरे में सोने के लिए एक तखत रखा था मगर गद्दा नदारद था। कमरे में मच्छर भिनभिना रहे थे। कमरा दिखाकर उन्होंने मेहमानों से कहा कि वे शाम के पूजा समारोह में आएँ और उसके बाद वहीं से 10 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा के लिए भी निकलना होगा। इस परिस्थिति से हमारे मेहमान, स्वाभाविक ही, बहुत खुश नहीं थे।

तो वे इस हालत में मंदिर में बैठे हुए थे, आज्ञाकारी ढंग से, शाम का आयोजन देखते हुए और सोचते हुए कि इस झमेले से कैसे मुक्त हुआ जाए। वे वहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहते थे मगर उन्हें डर था कि उनका इस तरह चले जाना, एक अशिष्ट व्यवहार होगा और उनके मेजबान को बुरा लगेगा!

इसी समय किसी भूत की तरह मंदिर में पूर्णेन्दु अवतरित हुए, शुभ्र सफ़ेद कपड़ों में, काला चश्मा लगाए! वह उनके पास जाकर बैठ गया और उनसे पूछा कि "क्या हाल-चाल है?" प्रश्न सुनते ही सारी कटुता और बेचैनी उनके मुंह से पूरी ताकत के साथ बाहर निकल आई। विस्मित, पूर्णेन्दु ने उनकी ओर देखा और कहा, "अगर आप लोग यहाँ नहीं रहना चाहते तो बिल्कुल मत रहिए। आश्रम वापस चले चलिए!"

पूर्णेन्दु ने पुजारी को बड़ी नम्रता के साथ सारी बात विस्तार से समझाई और इस तरह वे आश्रम वापस आ गए। उसके बाद उन मित्रों को न तो अनपुती दीवारें नज़र आईं और न ही निर्माणाधीन इमारत का रेत-गारा और दिया गया कमरा भी उन्हें अपने बेडरूम की तरह आरामदेह और पुरसुकून महसूस हुआ। उन्हें लगा जैसे वे स्वर्ग में आ गए हों।

इस घटना से यही सीख मिलती है कि आपको अपनी भावनाओं का अनुसरण करना चाहिए, वही करना चाहिए जिससे आपको खुशी मिले-और याद रखें, भारत आपके सामने ऐसे रोमांचक अवसर अक्सर प्रस्तुत करता रहता है!

दिव्यता का दिखावा या धार्मिक शोर-शराबा – 9 नवंबर 2012

इस सप्ताह मेरा विषय था धर्म और उसका समापन मैं अपने घर, वृन्दावन, के बारे में आपको बताते हुए करना चाहता हूँ। आप सब जानते हैं की हमारा कस्बा बेहद धार्मिक कस्बा है। यह हिन्दू देवता कृष्ण का क्रीड़ांगण माना जाता है और लोग बताते हैं कि यहाँ 5000 से ज़्यादा मंदिर हैं, जहां आप हिंदुओं के विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा कर सकते हैं। यहाँ की धार्मिकता वृन्दावन में प्रवेश करते ही आपको दिखाई देने लगती है। सड़क के किनारों पर कई तीर्थ हैं, कई मंदिर और पूजास्थल आपको दिखाई देते हैं जहां लोग पूजा-अर्चना करने आते हैं और हर तरफ आपको दिखाई देते हैं मंत्रोच्चार करते या भजन और दूसरे भक्तिगीत गाते-बजाते लोग। यही धार्मिक शोर है जिसके बारे में मैं आज आपको बताना चाहता हूँ।

अगर आप कभी भारत नहीं आए हैं तो आप सोच सकते हैं कि ये आवाज़ें जिन्हें मैं शोर कह रहा हूँ, चर्च की घण्टियों की तरह या चर्च के वाद्यवृंद जैसा कुछ होगा, जिसमें बच्चे अपने नाज़ुक स्वरों में कोई गीत गा रहे होंगे। असलियत जाननी हो, उनमें अंतर समझना हो तो खुद यहाँ आकर आपको देखना होगा कि यहाँ क्या होता है। जिस मंदिर की जितनी प्रतिष्ठा है, उसके मुताबिक वहाँ सड़क की तरफ मुंह फाड़े, बड़े-बड़े स्पीकर लगे होते हैं जो शोर को बाहर की तरफ, सड़क पर बिखेर देते हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं होता कि मंदिर में कोई कार्यक्रम हो रहा है या नहीं; चाहे दो-चार लोग ही वहाँ क्यों न हों, वे ऊंची आवाज़ में स्पीकर चला देंगे और सड़क और पास-पड़ोस उसके शोर से गुंजायमान हो उठेगा। यह कोई सौम्य और मधुर संगीत नहीं होता बल्कि तेज़ आवाज़ में बजता कर्कश मंत्रोच्चार या भजन होता है जो अक्सर सांगीतिक प्रतिभा, मिठास और लय-ताल से कोसों दूर होता है। मैं उसे हमेशा ही धार्मिक ध्वनि-प्रदूषण कहता हूँ।

इसके पहले कि अपने कस्बे से प्रेम करने वाले घोर वृन्दावन-प्रेमी मुझे कोसना शुरू करें, मैं बताना चाहता हूँ कि मुझे धार्मिक स्तोत्रों और भजनों से कोई शिकायत नहीं है। वास्तव में मैं तो खुशनुमा माहौल में गीत-संगीत का समर्थक हूँ और आश्रम में भी जब लोग मधुर आवाज़ में गाते हैं और रसोई तक मधुर संगीत में शराबोर हो जाती है, मुझे बड़ा अच्छा और सुखकर लगता है। हर मंदिर का यह अधिकार भी है कि गाना-बजाना कर सकें, भले ही गाने वाले संगीत में बहुत निष्णात न हों। लेकिन आप उन चार या पाँच लाउडस्पीकरों को अपने मंदिर की दीवार पर क्यों लगा देते हैं? आखिर क्यों? उन्हें सम्पूर्ण तीव्रता के साथ लगाने की कौन सी मजबूरी है? क्यों सड़क पर आने जाने वालों के और पड़ोसियों के कानों में चीखने चिल्लाने के लिए उन्हें छुट्टा छोड़ देते है? जिन्हें आपका संगीत सुनना है वे मंदिर आकर सुन सकते हैं और जो नहीं आ रहे हैं वे आपका संगीत नहीं सुनना चाहते। फिर आप ऐसा क्यों करते हैं? आखिर क्यों?

मैं मानता हूँ कि यह बाहरी और दिखावटी धर्म है अंदरूनी नहीं। आप यह प्रदर्शित करना चाहते हैं कि आप कितने धार्मिक हैं और समझते हैं कि जितना तेज़ आप चीखेंगे उतना ही धार्मिक और ईश्वर के करीब होंगे। क्या आप समझते हैं कि तेज़ आवाज़ में स्पीकर चलाकर और दूसरों की नींद खराब करके आप नास्तिकों को और दूसरे धर्म को मानने वालों को अपने धर्म की ओर मोड़ सकते हैं? इतना तो आप मानते ही होंगे कि ऐसा आप दूसरों के लिए करते हैं, अपने लिए नहीं! अगर आप यह अपने लिए कर रहे होते तो स्पीकर की आवश्यकता ही क्या है, आप स्वयमेव खुश रहते, गाते-बजाते, संगीत सुनते और जो भी धार्मिक भावनाएँ आप अपने भीतर जगा सकते हैं, जगाते हुए, अपने में मग्न।

मैं कई बार सोचता हूँ कि जब लाउडस्पीकर नहीं हुआ करते थे तब कैसा माहौल रहा करता होगा। जब मैं छोटा था, हम सिर्फ त्योहारों पर लाउडस्पीकर सुना करते थे, हमेशा, साल भर नहीं, रोज़-बरोज, सुबह-शाम नहीं! मैं इससे इंकार नहीं करता कि लगातार संगीत कस्बे को एक खास तरह का माहौल प्रदान करता है-लेकिन ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’! मुझे लगता है कि यह कुछ ज़्यादा ही हो गया है, अत्यधिक तीखा और कर्कश भी। यह विभिन्न मंदिरों के बीच चल रही प्रतियोगिता जैसा हो गया है कि कौन सबसे तेज़ और ज़्यादा वक़्त लाउडस्पीकर चलाता है। मुझे विश्वास है कि सड़क पर चलते लोग मंदिर से निकलने वाले वास्तविक मानवीय स्वर सुनना ज़्यादा पसंद करेंगे, लाउडस्पीकर से होकर आने वाला शोर नहीं।

मेरा मुख्य मुददा यह था कि लोग अपनी धार्मिकता का दिखावा करना पसंद करते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं है-यथार्थ और वास्तविक बनें-जो आप हैं उससे अधिक प्रदर्शित करने का पाखंड न करें। यह आवश्यक नहीं कि आप अपना संगीत दूसरों को ज़बरदस्ती सुनाने की कोशिश करें, उन पर थोप दें।

धर्म की सूक्ष्म चालबाज़ियाँ आपको पागलपन की सरहद पर ला पटकती हैं! 11 सितंबर 2012

आश्रम में हमारे घर से गेट तक सुंदर रास्ता बना हुआ है और हर रोज़ हम लोग थोड़ी देर इस रास्ते पर टहलते हैं। अपरा को गोद में लिए हम वहाँ तक आकर कभी-कभी थोड़ी देर के लिए गेट पर ही रुक जाते हैं और बाहर का नज़ारा देखते हैं। दौड़ती हुई कारें, साइकिलें और मोटर साइकिलें देखने में अपरा को बड़ा लुत्फ आता है। इसके अलावा सड़क पर घर लौटते हुए कर्मचारियों या कस्बे के परिक्रमा-मार्ग पर परिक्रमा करते तीर्थयात्रियों की चहल-पहल भी होती है। तीर्थयात्री और कई स्थानीय लोग भी नंगे पाँव और अक्सर कोई मंत्र-पाठ करते हुए प्रतिदिन यह परिक्रमा करते हैं। कुछ अधिक श्रद्धालु जन अपने आपको इससे ज़्यादा कष्ट देते हैं: वे लेट जाते हैं और खड़े होकर तीन कदम चलते हैं और फिर लेट जाते हैं। यही क्रम दोहराते हुए वे लगभग दस किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा पूरी करते हैं, इसे डंडौती परिक्रमा कहा जाता है।

कुछ दिन पहले हम लोग गेट पर खड़े यातायात का अवलोकन कर रहे थे कि हमने देखा कि एक तीर्थयात्री सड़क पर लेट गया और फिर खड़ा होकर नृत्य करते हुए कुछ कदम आगे बढ़ा और फिर लेट गया। स्वाभाविक ही वह अपने समर्पण में बेपनाह खुश दिखाई दे रहा था। रमोना मेरी तरफ मुड़ी और कहा: "यह सब करते-करते लोग पागल हो जाते होंगे, है न?" पल भर बाद मैंने जवाब दिया: "नहीं, यह सब करने के लिए पहले से आपका पागल होना ज़रूरी है!"

इससे पहले कि हिन्दू कट्टरपंथी इस प्रथा के पक्ष में अपनी बकबक शुरू करें और मेरे मित्र मुझे पाखंडी समझते हुए आरोप लगाएँ कि "लेकिन, तुम खुद यह सब किया करते थे!", मैं यह स्वीकार कर लेना चाहता हूँ कि जी हाँ, मैंने भी इसी तरह परिक्रमा की है और यह भी कि मेरी पत्नी भी यह जानती है।

मैं जानता हूँ कि उस वक़्त मेरे मन की क्या दशा थी, गुफा में प्रवेश से पहले। अगर वह व्यक्ति, जो कि उस वक़्त का मैं खुद था, आज मिल जाए तो मैं उसे निश्चित ही पागल कहूँगा।

धार्मिक विश्वास और आस्तिकता लोगों के दिमाग की जो गत बनाते हैं, उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इन बातों पर उनकी इतनी अधिक श्रद्धा, इतना दृढ़ विश्वास हो जाता है कि जो वे कर रहे हैं वह उनके लिए ही नहीं, विश्व भर के लिए भी अच्छा और शुभ है, कि वे उनके बारे में तर्कपूर्ण ढंग से सोचना ही बंद कर देते हैं। आपका दो या तीन दिन तक सड़क पर लेटना, फिर उठना और तीन कदम चलते हुए थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ना आपके ईश्वर का और आपका क्या भला कर सकता है, समझ से बाहर है। वे इस बात को अपनी भक्ति कहते हैं लेकिन मैं इसे उनके दिमाग के साथ धर्म का छल कहता हूँ। जब समर्पण इस सीमा तक बढ़ जाता है तब वह आपको अंधा बना देता है। आप दर्द महसूस नहीं करते, सोच-समझ नहीं पाते और देखते-देखते पागलपन की हद पार कर जाते हैं।

मैं मानता हूँ कि यह थोड़ा पागलपन तो है ही, मगर धर्म इससे भी ज़्यादा पागलपन करने के लिए लोगों को मजबूर कर देता है। भावना वही होती है, धर्म का छल उसी तरह काम कर रहा होता है, जब लोग सोचते हैं कि अपनी आखिरी दमड़ी धर्म पर खर्च करना एक अच्छी बात होगी, पता नहीं कब विश्व का अंत हो जाए! या दूसरे सहविश्वासु लोगों के साथ जानलेवा जहर खा लिया जाए। धर्म की यही धोखाधड़ी तब भी काम कर रही होती है जब एक व्यक्ति अपनी कमर पर बम लगाकर खुद को एक भीड़ भरे स्थान पर उड़ा देता है, जिसमें सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती है। या प्लेन हाईजैक करके बहु-मंज़िला इमारत पर दे मारता है और हजारों निर्दोष लोगों की मौत का और उनके परिवार के लिए भयंकर दुख का कारण बनता है।

यह पागलपन है। यह धर्म है। कुछ नतीजे कम हानिकारक होते हैं और कुछ ज़्यादा। आप बर्दाश्त भी कर लें अगर वह दूसरों को और खुद को भी किसी तरह का नुकसान न पहुंचाए। उसे आप मूर्ख कह सकते हैं। लेकिन अंततः धर्म ही है, जिसने उसके दिमाग को छल-कपट से यह भक्तिपूर्ण कार्य करने के लिए मजबूर किया है।