धार्मिक परम्पराएँ शिष्यों को गुरुओं के अपराधों पर पर्दा डालने पर मजबूर करती हैं-12 सितंबर 2013

आसाराम प्रकरण में सबसे बड़ी समस्या उनके शिष्यों की धार्मिक पृष्ठभूमि है। हिन्दू धर्म मनुष्य-पूजा (व्यक्ति पूजा) को प्रोत्साहित करता है! यह धार्मिक पृष्ठभूमि और संस्कार ही वे कारक हैं जो लोगों को अपने गुरु के विरुद्ध कुछ भी बोलने से रोकते हैं, भले ही उन्होंने गुरु को अपराध करते हुए देख लिया हो। यही कारण है कि गुरु द्वारा प्रताड़ित होने पर भी उनके शिष्य उसका प्रतिवाद नहीं करते और उसके अपराधों को किसी से कहते हुए सकुचाते हैं। ऐसे अपराध हो रहे हैं तो इनके पीछे सबसे मुख्य कारण यही है!

जिन धर्म-ग्रन्थों पर गुरु बनाने की परंपरा आधारित है, वे बताते हैं कि गुरु ईश्वर के समान या उससे भी बड़ा है। अर्थात, यह कि किसी दूसरे के मुंह से गुरु की आलोचना सुनना भी पाप है। जो भी गुरु करता है, ठीक करता है, इसलिए या तो आप उस व्यक्ति का मुंह बंद कर दें या अपने कान बंद कर लें, जिससे गुरु के विरुद्ध उच्चारे गए ऐसे कटु शब्द आपके दिमाग तक न पहुँचें।

हिन्दू धर्म कहता है कि गुरु के माध्यम से ही आपको मुक्ति प्राप्त हो सकती है-इसलिए हर मनुष्य के पास एक ऐसा व्यक्ति होना ही चाहिए जिसके बारे में वे कोई भी बुरी बात न सुनें। जैसे वे भगवान की मूर्ति के पाँव धोते हैं वैसे ही वे उसके भी पाँव पखारेंगे। भगवान के सामने नतमस्तक होते हैं उसी तरह गुरु के सामने भी होंगे। अपने गुरु के लिए उनका सम्पूर्ण समर्पण होगा।

हिन्दू धर्म की कुछ परम्पराओं में शिष्यों से अपने तन, मन और धन को गुरु के चरणों में समर्पित करने का आदेश है। कुछ गुरु जानबूझकर इसका शब्दशः अर्थ ग्रहण करते हैं और अपने शिष्यों से यथार्थ में अपने शरीर का समर्पण करने की अपेक्षा करते हैं। आसाराम के कुछ पूर्व शिष्य अब यह बता रहे हैं कि कैसे वह अश्लील बातें किया करता था और चाहता था कि वे धर्म-ग्रन्थों में लिखे आदेशानुसार अपने शरीर को उसे समर्पित करें!

ऐसी अपेक्षा रखने वाला अकेला आसाराम ही नहीं है। मैंने कई सम्प्रदायों के बारे में सुना है कि उनमें विवाह के तुरंत बाद घर की नई नवेली दुल्हिन को पहले परिवार के गुरु के पास जाना पड़ता है और उसके बाद ही वह अपने पति के साथ हमबिस्तर हो सकती है। उसे गुरु को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है जैसे देवताओं को चढ़ाया जाता है! जब गुरु उसके साथ सो लेगा, उसे आशीर्वाद देगा तभी उसका पति और परिवार वाले उसका स्वागत करेंगे! भारत में आज भी यह सब चल रहा है, मगर क्यों? क्योंकि उनके लिए गुरु ईश्वर जैसा ही है!

काफी समय पहले, मेरा एक दोस्त था जो मेरी तरह ही प्रवचन इत्यादि किया करता था और उसने गुरु का चोला भी पहन लिया था। वह शादीशुदा था और लगभग 40 वर्ष का था लेकिन जब वह एक गाँव में गया तो उसके आयोजक ने अपनी 17 वर्षीय लड़की उसे दान कर दी! उसने क्या किया? उसने अपनी पत्नी को छोड़ दिया और उस लड़की से विवाह कर लिया और अब उनके कई बच्चे हैं!

विश्वास ने ऐसे रीति-रिवाजों को जन्म दिया है। धर्म ही गुरुओं द्वारा किए जा रहे सारे अपराधों की जड़ है। बचपन से ही लोगों को सिखाया जाता है कि गुरु ही ईश्वर है। वह कोई गलत काम कर ही नहीं सकता और तुमसे अपेक्षा की जाती है कि गुरु की हर आज्ञा का पालन करोगे। अगर कोई कहता है कि यह गलत है तो उसका मुंह बंद कर दो या उसकी बात सुनो ही मत। उसके कथन की उपेक्षा करो या आलोचना से बचो, मन में आ रहे अपने विचारों का त्याग करो।

आसाराम का प्रकरण एक युवा लड़की की बहादुरी के चलते सामने आया। भारत भर में ऐसी बहुत सी दुखद कहानियाँ पीड़ितों के दिलोदिमाग में वाबस्ता हैं। डर, अपराध और दमन-धर्म और उसके ग्रंथ हमें सिर्फ और सिर्फ यही दे सकते हैं।

भक्तों की दुविधा: गुरु के अपराधों को जानते हैं मगर मानते नहीं- 11 सितंबर 2013

स्वाभाविक ही आसाराम के सारे शिष्य ऐसे नहीं होते जो उसके एक इशारे पर कोई भी अपराध करने के लिए बेझिझक तैयार हो जाएँ। इन भक्तों की भीड़ में बहुत से ऐसे भी होते हैं जिन्हें कई शंकाएँ होती हैं, लेकिन वे आँख बंद किए रहते हैं और अपने विश्वास को किसी तरह थामे रहते हैं। क्यों? चलिए, देखते हैं ऐसे लोगों के दिमागों में क्या चल रहा होता है और उनके जज़्बात क्या कहते हैं।

आसाराम के खिलाफ अब न सिर्फ यौन दुराचार का आरोप है बल्कि धीरे-धीरे उसकी और भी कई कारस्तानियाँ उजागर हो रहीं हैं जिनमें वह ऐसे ही और कई बिल्कुल दूसरी तरह के अपराधों में लिप्त पाया गया है। मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि देश भर में स्थित उसके आश्रम या तो आंशिक रूप से या पूरी तरह से हड़पी गई ज़मीनों पर निर्मित किए गए हैं। ये जमीनें वास्तव में सरकारी जमीनें हैं और बेचने के लिए नहीं थीं मगर कुछ भ्रष्ट अधिकारियों ने रिश्वत लेकर गैरकानूनी रूप से हो रहे आश्रम-निर्माण को जान बूझकर नज़रअंदाज़ किया और देखते देखते सरकारी जमीनें आसाराम के इन आश्रमों का हिस्सा बनती चली गईं। अब तो हर कोई इस समस्या की तरफ उंगली उठा रहा है, मगर आसाराम के जेल जाने से पहले वे सब कहाँ थे?

मगर क्या आरोप है यह कोई मानी नहीं रखता। आसाराम के ये भक्त बाहर कुछ नहीं कहते और हो सकता है कि पूछने पर कह दें कि उनके गुरु ने कुछ भी गलत नहीं किया है, मगर भीतर ही भीतर उनके मन में अपनी ही कही बात पर शक बना रहता है! वे देख रहे होते हैं, पढ़ते हैं, समाचार सुनते हैं और अगर वे वाकई ईमानदार हैं तो मानते भी हैं कि उनके गुरु ने वाकई ऐसा अपराध किया है।

फिर भी वे उस दिशा में इसके आगे सोचने की ज़रूरत नहीं समझते। कारण समझ में आता है: कई सालों से वे इस गुरु के साथ हैं और उसके बारे में उनके मन में कोमल भावनाएँ विकसित हो गई हैं, उस पर उन्होंने बहुत सा रुपया और समय खर्च किया है। गुरु के प्रति उनके समर्पण पर टीका-टिप्पणी करने वाले मित्रों और रिश्तेदारों के सामने उन्होंने दृढ़ता के साथ गुरु का पक्ष लिया है। अगर वे उसकी गलती स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें यह भी मानना होगा कि पिछले कई वर्षों से वे स्वयं गलत रास्ते पर थे! यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है!

ऐसे भक्त एक ऐसे व्यक्ति के प्रति, जो भगवान जैसा या उससे भी ऊपर है, अपने अंधविश्वास को बनाए रखना चाहते हैं। स्वाभाविक ही, उनके लिए वह कभी गलती न करने वाला और अपतनशील है और वे उसके द्वारा किए गए किसी भी दुर्व्यवहार को या अपराध को झूठा साबित करने के लिए कोई भी कुतर्क प्रस्तुत करने पर आमादा रहते हैं! बाद में वे यही कुतर्क खुद अपने आपको शांत रखने में और अपनी शंकाओं का शमन करने में इस्तेमाल करते हैं। इसके बावजूद इस बारे में उन्हें कभी भी पूरी तरह चैन नहीं मिल पाता और वे कोशिश करते हैं कि सार्वजनिक रूप से इस विषय पर किसी विवाद में न उलझें।

वे अपने कान बंद कर लेते हैं, गलतफहमी में रहे आते हैं और तूफान के थमने का इंतज़ार करते हुए समय गुज़ारते हैं, इस आशा में कि कुछ समय बाद गाड़ी पटरी पर आ जाएगी और जैसा अब तक चल रहा था फिर चल पड़ेगा।

ऐसे भक्तों के लिए मेरी सलाह है कि डरिए नहीं और जो कुछ आप भीतर ही भीतर पहले से जानते हैं उसके लिए अपनी आँखें और कान खुले रखिए। आपका गुरु भगवान नहीं है, वैसे ही जैसे आप भगवान नहीं हैं! यह समझने का साहस दिखाइए कि आपकी ही तरह वह भी एक सामान्य मनुष्य है और यह भी कि उसने, शायद अपनी प्रसिद्धि और धन के बल पर ऐसे काम किए हैं जो न सिर्फ नैतिक रूप से गलत हैं बल्कि गैरकानूनी भी हैं।

इस बात का एहसास करें कि ऐसे व्यक्ति की आपको कोई आवश्यकता नहीं है। अपने आसपास के लोगों से सलाह और मदद लें मगर किसी भी हालत में अपना सर्वस्व किसी पर भी निछावर न करें। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं वहन करें और तब आप महसूस करेंगे कि जीवन में आए इस परिवर्तन ने आपको कितना मजबूत बना दिया है!

गुरु की वासना-शांति के लिए लड़कियां मुहैया कराना, आँख मूंदकर उसके अपराध के भागीदार बनना-10 सितंबर 2013

गुरुओं से धोखा खाए हुए लोगों की, आसाराम प्रकरण में प्रताड़ित लड़की के पिता की, परिस्थिति का जायजा लेने के बाद मैं चाहता हूँ कि आसाराम के उन शिष्यों पर भी नज़र दौड़ा ली जाए जो आसाराम की अनैतिक और गैरकानूनी कारगुजारियों में पूरी सक्रियता के साथ हिस्सा लेते रहे थे और आज भी यही मान रहे हैं कि उनके गुरु ने कुछ भी गलत नहीं किया है और यह सब उसके खिलाफ षड्यंत्र का हिस्सा भर है।

ये लोग इस प्रकरण के चलते बहुत उत्तेजित हो गए हैं और सारी भावनाओं में गुस्सा सबसे ऊपर है-लेकिन जब कि छला गया शिष्य गुरु पर नाराज़ है, इनका गुस्सा प्रताड़ित, उसके परिवार, मीडिया और हर ऐसे व्यक्ति पर टूट रहा है जो उनके गुरु, आसाराम के विरुद्ध कुछ भी कहने का साहस कर रहा है। वे अपने मालिक को खुश करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं और वे हर ऐसे व्यक्ति से घृणा करते हैं जो उसे अप्रसन्न करने वाला कोई काम करता है।

आसाराम के निकटस्थ सहायकों का उदाहरण लें: मीडिया ने विस्तार से बताया कि आयोजनों के दौरान जिनमें स्कूल के बच्चे उपस्थित रहा करते थे, आसाराम ठीक उन लड़कियों पर फूल बरसाता था या उन पर प्रकाश की किरण फेंकता था जो उसकी आँखों को मोहक लग रही होती हैं। सहायक समझ जाते थे कि आसाराम इन लड़कियों को पाना चाहता है और वे उन्हें किसी न किसी बहाने, जैसे किसी लड़की के लिए आवश्यक ‘विशेष कर्मकांड’ के बहाने, उस तक पहुंचा देते थे। वे अपने कार्य के औचित्य या अनौचित्य के विषय में सोचने की आवश्यकता ही नहीं समझते थे। अपने गुरु को खुश करने की इच्छा को उन्होंने सारे नैतिक मूल्यों और स्वयं की सोच और समझ से ऊपर रखा हुआ था। उनका गुरु यह चाहता है इसलिए यह उचित है और उन्हें यह करना ही है।

दुर्भाग्य से यह हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा है जिसने बहुत से लोगों को मुश्किल में डाल रखा है क्योंकि वे अपनी ज़िम्मेदारी को बिलकुल विस्मृत कर देते हैं और जघन्य से जघन्य अपराध करते समय भी अपने गुरु का अनुसरण करते हैं।

इस तरह जब आसाराम ने राजनीतिज्ञों पर षड्यंत्र करने का आरोप लगाते हुए बयान दिया, जब उसने कहा कि इसाई उन पर आक्रमण करके दरअसल हिन्दू धर्म पर आघात करने का प्रयास कर रहे हैं, जब उसने मीडिया को तोड़-फोड़ की धमकी दी, उसके सभी अंधभक्त भेंड-बकरियों की तरह उसके पीछे चल दिये और एक स्वर में वही राग अलापने लगे। उन्होंने ‘षड्यंत्र’ का प्रतिवाद करना शुरू कर दिया और अभी भी सार्वजनिक स्थलों पर उनके प्रदर्शन जारी हैं। वे पीड़िता के परिवार वालों को धमकी देने लगे और उन्हें रिश्वत देकर खरीदने की कोशिश भी की। उन्होंने अपने गुरु को कहते हुए सुना कि उसके अनुयायी हिंसा नहीं करेंगे इसकी जमानत वह नहीं दे सकता और वे आसाराम के आश्रम के सामने संवाददाताओं के साथ हाथापाई और हिंसा पर उतर आए। कई टीवी चैनलों ने दिखाया कि कैसे उसके ये अंधभक्त कैमरामैन और रेपोर्टरों के साथ उलझ गए और उन्हें शोर मचाकर और मार-पीटकर भगा दिया!

इन शिष्यों को उनके गुरु द्वारा हिंसा करने के लिए सिर्फ इसलिए भड़काया गया क्योंकि उनका इस बात पर कट्टर विश्वास है कि उनका गुरु ठीक है और हर वह व्यक्ति जो इसके विपरीत सोचता है, पागल है, मूर्ख है और उन्हें और उनके गुरु को हानि पहुंचाना चाहता है।

समस्या यह है कि ऐसे लोगों तक पहुंचना और उन्हें समझा पाना बहुत मुश्किल है! उनके दिमाग पूरी तरह अपने गुरु पर केन्द्रित होते हैं और जब आप एक शब्द भी उनके गुरु के विरुद्ध कहते हैं, वे महसूस करते हैं कि उन पर आक्रमण हुआ है और वे पलटकर वार करते हैं।

क्या उनके विचारों में परिवर्तन लाने का कोई उपाय है? अपने गुरु के प्रति उनका नज़रिया बदलने की तब तक कोई संभावना मुझे नज़र नहीं आती जब तक स्वयं उन पर कोई हादसा नहीं गुज़रता। वे उसके लिए कुछ भी करने के लिए उद्यत हैं-यहाँ तक कि वह उनका अपमान करे या गाली-गलौज करे, मारे-पीटे वे यही समझते हैं कि गुरु ठीक ही कर रहा है। उनकी अंधभक्ति तभी दूर होगी जब कोई बड़ी चोट उन्हें लगे और वे हिल उठें, उनके दिमाग के चारों ओर बनी मजबूत दीवारें ढह जाएँ, कोई दरार उसमें पड़ जाए, जहां से कोई तार्किक और समझदारी की बात उनके दिमाग में प्रवेश कर सके।

जब तक यह घटित नहीं होता तब तक वे अपने गुरु के पीछे, जिज्ञासा और विचार विहीन, गुरु के वचनों या कर्मों पर बिना कोई सवाल किए, अंधी भेंड़ों की तरह चलते चले जाएंगे।

आसाराम द्वारा प्रताड़ित लड़की के पिता को रिश्वत का प्रयास, मारने की धमकी के बावजूद सराहनीय है मजबूती-9 सितंबर 13

पिछले हफ्ते मैंने आसाराम के बारे में और उसके द्वारा किए गए यौन दुराचार के बारे में बहुत सी बातें आपको बताई थीं, जिसके लिए अब वह गिरफ्तार भी हो गया है। जब कि लगातार अधिकाधिक विस्तृत सूचनाएँ प्राप्त हो रही हैं, मैं चाहूँगा कि उन लोगों की मानसिक हालत का भी जायजा ले लिया जाए जो इन घटनाओं से किसी न किसी तरह प्रभावित हुए हैं; क्योंकि, वैसे भी, यह कोई इकलौता, इस प्रकार का प्रकरण नहीं है। यह रोज़-बरोज होता रहता है, गुरु और शिष्य बदल जाते हैं, किस्सा वही रहता है और कभी न कभी भक्त को पता चल ही जाता है कि उसके गुरु वैसे धार्मिक और पवित्र नहीं हैं जैसा कि उन्होंने इतने दिनों से समझ रखा था। सबसे पहले धोखा खाए हुए शिष्यों और भक्तों की भावनाओं और उनकी परिस्थिति पर नज़र दौड़ा लें।

आसाराम के प्रकरण में यह व्यक्ति उस 16 वर्षीय पीड़िता के पिता हैं। सालों से उन्होंने अपना जीवन, अपना प्रेम, अपना बहुमूल्य समय, अपनी भक्ति और बहुत सारा धन अपने इस गुरु को समर्पित किया हुआ था। उन्होंने अपने बच्चों को उसके स्कूल में पढ़ने भेजा, यह सोचकर कि उनके बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा वहाँ पाएंगे-जबकि यह शिक्षा भी कोई सस्ती शिक्षा नहीं थी! लेकिन उन्होंने सब कुछ खुशी-खुशी किया क्योंकि वह जानते थे कि इससे उनके प्रिय गुरु की उसके पवित्र काम में मदद होगी।

और उसके बाद यह सिला! उनके विश्वास की ऐसी धज्जियां उड़ीं कि कोई बाप इससे अधिक बुरा कुछ सोच ही नहीं सकता! क्या आप पूरी तरह ध्वस्त भावनाओं की कल्पना कर सकते हैं? किसी पर समर्पित सालों की बरबादी की कल्पना या समर्पण के साथ अपने आप आ जाने वाली बेबसी की? और यह सब उस व्यक्ति के लिए जिसने, उनकी लड़की के अनुसार उसके साथ यौन संबंध स्थापित करने का प्रयास किया और हत्या तक करने की धमकी दे डाली? पूरी तरह निर्भ्रांत, भग्न-हृदय और साथ ही इतना क्रोधित, जितना ज़िंदगी में कभी हुआ न हो!

जो वे अधिक से अधिक कर सकते थे, उन्होंने किया: पुलिस में अपराध की रपट लिखवाई। दुर्भाग्य से पुलिस, या कहें, भारतीय राजनीति ने उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना शुरू कर दिया। उसने आसाराम को वीआईपी माना और लगभग दो हफ्ते उसे गिरफ्तार ही नहीं किया!

इस दौरान, उन्हें आसाराम के चेलों की तरफ से धमकियाँ मिलती रहीं। आखिर उन्हें प्रयास करके अपने फोन को पुलिस की निगरानी में रखना पड़ा। कुछ दूसरे चेलों ने उन्हें रिश्वत का लालच दिखलाया, खरीदने की कोशिश की कि वह अपने आरोप वापस ले ले। आसाराम की एक करीबी महिला जो उसकी बेटी कहलाती है और उसके परिवार के दूसरे सदस्य व्यक्तिगत रूप से उनके घर आए और आसाराम के लिए उनके पैरों पर गिरकर माफ़ी की भीख मांगी।

लेकिन वे टस से मस नहीं हुए-और क्यों और कैसे हों? उन्होंने बताया कि "मैंने आसाराम को इतना रुपया दिया लेकिन उसने मेरी ऐसी चीज़ छीन ली है जिसे वापस पाना असंभव है! ऐसे अपराध के लिए मैं क्या मांगूँ जिससे मुझे उसका प्रतिदान मिल सके? और फिर मुझे भयभीत क्यों होना चाहिए, जबकि पहले ही मैं इतना अपमान झेल चुका हूँ?"

नहीं, वे एक बार भी ढीले नहीं पड़े। इसके विपरीत, जब ऐसा लग रहा था कि पुलिस सम्मन की समय सीमा गुज़र जाने के बाद भी आसाराम पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, वे यह कहते हुए भूख हड़ताल पर बैठ गए कि वे तब तक भोजन नहीं करेंगे जब तक पुलिस आसाराम को गिरफ्तार नहीं कर लेती, जैसा कि कानूनन उसे करना ही चाहिए।

मेरा मानना है कि उन्होंने पूरी तरह उचित कदम उठाया: बहुत से दूसरे पिताओं के विपरीत, इस प्रकरण को जनता के सामने लाकर शायद वे बहुत सी लड़कियों को बचा रहे हैं। इसके अलावा बहुत से अंधों की आँखों पर पड़ा पर्दा भी इससे हट सकेगा!

और मैं उन्हें यह सलाह दूँगा कि जब भी आपको छ्ले जाने का गम सताए कि इस कुपात्र पर इतना समय, धन, ऊर्जा और प्रेम अर्पित करने के बाद मुझे क्या मिला, तो आप यही सोचिए कि एक बार आंखे खुलने के बाद कि क्या सही है और क्या गलत, आपने कार्रवाई की और आपके इस कदम से कई दूसरे लोग ऐसी निराशाजनक स्थितियों का सामना करने से बच सकेंगे।

अफसोस मत कीजिए, जो भी हुआ उसे स्वीकार कीजिए और उसे लेकर बेहतर भविष्य के विश्वास के साथ आगे बढ़ें! दूसरों की मदद करें, उन्हें अपने पास आने दें और उनको बार बार अपनी कहानी बयान करें जिससे कई और लोगों की आँखें खुल सकें और वे आपसे सीख लेकर ऐसे संत-महात्माओं के चंगुल से आज़ाद हो सकें और उन्हें ऐसी समस्याओं का सामना न करना पड़े!

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक रॉक स्टार गुरुओं तक का विकास- 23 जुलाई 2013

कल गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में अवकाश था और मैंने गुरुओं, उनकी दीक्षाओं और उनके शिष्यों के बारे में लिखना शुरू किया। परंपरा यह थी कि गुरु बहुत कम संख्या में शिष्यों को दीक्षित किया करते थे। उसके अपने हर शिष्य के साथ अलग अलग संबंध होते थे। वे सभी एक साथ 'गुरुकुल' में रहते थे, जहां वे एक परिवार की तरह सभी चीजों को साझा करते थे और विद्या ग्रहण करते थे। कुछ समय बाद शिष्य अपनी मर्ज़ी के अनुसार कोई दूसरा काम करने चल देता था, जिससे दूसरे शिष्यों के लिए स्थान रिक्त हो सके। लेकिन वह विभिन्न अवसरों पर अपने गुरु के पास वापस लौटता थे: जैसे किसी विषय पर सलाह लेने, उसका अभिवादन करने, आशीर्वाद लेने या फिर गुरु पूर्णिमा के दिन, उसका सम्मान करने।

आजकल यह सब कुछ बदला-बदला सा लगता है। सबसे बड़ा फर्क यह है कि आज के गुरु बहुत प्रतिष्ठित और लोकप्रिय होते हैं, जो फिल्म स्टारों की तरह जीवन जीते हैं। वे स्टेज पर प्रस्तुत होकर प्रवचन करते हैं, अपने कार्यक्रम करते हैं, जहां हजारों की संख्या में उनके शिष्यगण उनके दर्शन के लिए घंटों इंतज़ार करते रहते हैं, जैसा कि अक्सर फिल्म स्टारों के साथ होता है। उनके दौरों के लिए टूर-बसें होती हैं जिनमे बैठकर वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करने जाते हैं। लोगों से पैसा उगाहने के लिए उनके कार्यक्रमों में प्रवेश शुल्क के स्थान पर कई तरह के दूसरे तरीके अपनाए जाते हैं। वे विभिन्न कर्मकांडों के जरिये, दान दक्षिणा के ज़रिये और अपनें विभिन्न धार्मिक उत्पादों की बिक्री के जरिये भी वे धन प्राप्त करते हैं। जहां भी वे जाते हैं, विशाल जनसमूह उनके आगमन का इंतज़ार करता है और अगर आप किसी तरह उसके पास पहुँच सकें और वह आपसे व्यक्तिगत रूप से कुछ कह दे तो यह बड़े सम्मान की बात होती है।

यह संभव नहीं होता कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने हर भक्त को पारंपरिक विधि-विधान के साथ दीक्षित करे-वे अपने हर भक्त से मुलाक़ात नहीं कर सकते और उनके साथ व्यक्तिगत रूप से बात नहीं कर सकते! तो वे ज़ोर-शोर के साथ घोषणा करते हैं: मैं ऐसा गुरु हूँ जो दीक्षा नहीं देता! यह कहना उन्हें अपने भक्तों की नज़रों में और भी महान और विशिष्ट बना देता है। ये लोग झांसे में आ जाते हैं और इस भ्रम में फंस जाते हैं कि उनका गुरु दूसरे सभी गुरुओं की तुलना में ज़्यादा महान और बेहतर है। यहाँ तक कि वे यह भी समझते हैं कि आज तक उन जैसा गुरु पैदा नहीं हुआ, जो कि दीक्षा भी नहीं देता और उसके भक्तों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगती है।

इनमें से कुछ भक्त पहले से ही यह समझे हुए होते हैं कि गुरुवाद कोई बहुत अच्छी बात नहीं है। वास्तव में वे पारंपरिक रूप से चली आ रही गुरु की गुलामी की प्रथा को पसंद नहीं करते और सोचते हैं कि गुरु शिष्य परंपरा अब ज़्यादा विकसित हो गई है, जब कि वे इसके सभी लाभ पा रहे हैं, गुरु अब लाखों की संख्या में शिष्यों का उत्पादन करता है। जब उनसे इस बारे में पूछा जाता है तो वे बताते हैं कि वे दरअसल इस गुरु के वैसे पारंपरिक शिष्य नहीं हैं, गुरु तो बस हमारा 'आध्यात्मिक सलाहकार' (mentor) है। वही पुरानी बात कहने का यह एक फैशनबल और आधुनिक तरीका है।

ये शिष्य अपने आपको पूरी तरह से गुरु को समर्पित कर देते हैं और उसके साथ बहुत नजदीकी रिश्ता होने का भ्रम पैदा करते हैं, जोकि दरअसल होता नहीं। वे अपने 'आध्यात्मिक सलाहकार' के साथ दिमागी तार जुड़े होने की मूर्खतापूर्ण बात करते हैं, भले ही सड़क पर आमने-सामने पड़ने पर उनका गुरु उन्हें पहचान भी न पाए। आपको बधाई कि आपके पास एक पित्रतुल्य व्यक्ति है जो इतना भी नहीं जानता कि आप हैं कौन!

कभी न कभी इस करीबी रिश्ते की कल्पना उनके लिए खतरनाक भी हो सकती है। 'आध्यात्मिक सलाहकार' शब्द में जिस कल्पनातीत नजदीकी का अर्थ निहित है उसके बारे में वे सोच भी नहीं कर सकते और न वह उनके बीच स्थापित हो पाता है। और जब वे पाते हैं कि उनकी कल्पना, कोरी कल्पना भर थी और वे अपने गुरु के लिए हमेशा ही एक अजनबी थे तो वे निराशा के गहरे, अंधे कुएं में गिर पड़ते हैं। फिर उनका जीवन दिशाहीन होकर भटकने लगता है और उन्हें लगता है कि उन्होंने अपने इतने साल एक काल्पनिक संसार में, एक भ्रम में बरबाद कर दिये।

मैं समझता हूँ कि आधुनिक गुरु, लोगों के लिए, अतीत के गुरुओं से भी ज़्यादा खतरनाक है।

अपनी जिम्मेदारियों से बचने का गुरु प्रदत्त सम्मोहक प्रस्ताव – 3 अप्रैल 2013

कल मैंने उन जिम्मेदारियों के बारे में लिखा था जो एक लेखक और पाठक, दोनों पर, आयद होती हैं और यह भी कि अपने जीवन और अपने कर्मों की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हें उठानी ही चाहिए। हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए और उन्हें अपने कंधों पर उठाने का साहस होना चाहिए। इस बात पर सभी सहमत होंगे कि ऐसा ही होना चाहिए मगर हिन्दू धर्म और प्रचलित गुरुवाद, दुर्भाग्य से, कुछ दूसरी ही बात सिखाते हैं: आप अपनी सारी जिम्मेदारियों का बोझ अपने गुरु पर डाल सकते हैं और आपको ऐसा करना भी चाहिए।

जी हाँ, यही सब बड़े से बड़े धर्मग्रंथों में लिखा हुआ है और यही सब कुछ सैकड़ों सालों से गुरुओं का उपदेश रहा है जिसे उनके शिष्य निष्पादित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसके पीछे का विचार यह है कि आप अपने आपको पूरी तरह गुरु के चरणों में निछावर कर दें। अपने साथ आप अपने बुरे कर्मों को और अपने अच्छे कर्मों को भी गुरु को समर्पित कर दें और अपने लिए बिना किसी अपेक्षा के जैसा गुरु कहता है वैसा करते चले जाएँ। फिर आप उस स्थिति को प्राप्त हो जाएंगे जहां आपके सारे कर्म आपके नहीं रह जाएंगे और इस तरह मृत्यु के बाद आपको स्वर्ग प्राप्त हो जाएगा।

यही वह आधार है जिस पर सारे गुरुवाद की इमारत खड़ी है। गुरु लोगों का आह्वान करते हैं: आओ, अपने सारे कर्म मुझे सौंप दो, वही करो जिसके लिए मैं तुम्हें प्रेरित कर रहा हूँ और फिर तुम्हें इस जीवन की, यहाँ तक कि उसके बाद की भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। अपने आप को समर्पित कर दो, निछावर कर दो, तुम्हारे इस जन्म की और अगले जन्मों की भी चिंता मैं करूंगा।

कितना आकर्षक विचार है! किसी भोले-भाले, साधारण धर्मभीरु व्यक्ति के लिए यह एक ललचाने वाला प्रस्ताव है! हर हिन्दू जो ऐसे धार्मिक वातावरण में बड़ा हुआ है यह विश्वास कर सकता है कि यही एकमात्र उचित राह है। कोई भी इसके मोहक स्वरों को समझ सकता है: मेरी नौका में सवार हो जाओ, मैं तुम्हें उस पार पहुंचा दूँगा! तुम्हें सोचने की, चिंता करने की ज़रूरत नहीं, तुम वहाँ सुरक्षित पहुँच जाओगे। तुम नौका को हिला नहीं सकते, लहरों के तेज़ थपेड़े तुम्हें डिगा नहीं सकेंगे, डूबने की तो कोई संभावना ही नहीं- यहाँ तक कि तुम गीले तक नहीं होगे!

वे समर्पण कर देते हैं। यह बहुत आसान है और यह समाज में अच्छा भी माना जाता है! यह घोषणा करते हुए वे गर्व से भर उठते हैं: "मैंने सर्वस्व परित्याग किया है, मैं उपासना में लीन हो गया हूँ, मैं भक्त हूँ और सिर्फ वही करता हूँ जो मेरे गुरु की वाणी मुझसे करवाती है। मैं कुछ भी नहीं हूँ।" यह विनम्रता ही उनसे अपेक्षित है। उनसे कहा गया है कि ‘अपने अहं को खत्म करो’ अन्यथा गुरु आपकी ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता। आपके कर्मों कि ज़िम्मेदारी वह तभी लेगा जब आपके कर्मों पर उसका अधिकार होगा।

लेकिन गुरु की इस सेवा के बदले आपको एक निश्चित फीस भी अदा करनी होगी। कुछ गुरु सीधे यह फीस वसूल नहीं करते। कुछ बैंक की तरह होते हैं जहां कुछ विशिष्ट सेवाओं के लिए आपका एक तरह का बीमा किया जाता है। लेकिन आपको भुगतान करना अवश्य पड़ता है, सीधे सीधे या फिर किसी और माध्यम से।

ये गुरु आपकी इस मनोवृत्ति का लाभ सिर्फ मोटी रकम वसूल करके ही नहीं उठाते। उनके कई शिष्य इतने समर्पित होते हैं कि वे उनकी ज़बान खुलते ही उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। उनके शिष्यों द्वारा प्रदत्त यह शक्ति उनके लिए यौन शोषण की राह भी खोल देती है। पहले शिष्य रहीं कुछ महिलाओं ने मुझे बताया कि वे तो अपने गुरु को भगवान ही समझती थीं। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था, इस विश्वास के साथ कि गुरु के आदेश का पालन करने पर वे उनके माध्यम से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। जब उनसे कहा गया कि गुरु की सेवा हेतु उनके बेडरूम में जाओ, उनके जननांगों का मर्दन करो और यहाँ तक कि उनके साथ संभोग करो तो उनमें से बहुत सी इंकार नहीं कर सकीं। ऐसे कई प्रकरण हैं जहां गुरुओं ने अपनी शिष्याओं का इस तरह शोषण किया क्योंकि वे अपने भोलेपन में यह सोचती थीं कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

इस तरह आप देखते हैं कि अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं न उठाकर उन्हें किसी और को सौंपने का आसान रास्ता अख्तियार करके आप कहाँ पहुँच सकते हैं। यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं उठाओ, अपने कर्मों और उनसे उपजे परिणामों की पूरी ज़िम्मेदारी आपकी है। समझिए कि जीवन का आनंद उठाने के लिए किसी गुरु की आपको कोई आवश्यकता नहीं है।

श्री श्री रविशंकर पर लिखने के बाद प्रशंसा , अपशब्दों एवं चेतावनियों का लेखा – जोखा – 22 फरवरी 13

Balendu

श्री श्री रविशंकर की मोबाइल फोन चार्ज करने की तथाकथित चमत्कारी शक्तियां हों या मेरे लेखों पर आईं प्रतिक्रियाएं, इस पूरे सप्ताह डायरी के पन्नों पर श्री श्री रविशंकर छाए रहे। मैंने सोचा कि क्यों न अपनी डायरी के इन पन्नों पर विभिन्न लोगों की प्रतिक्रियाओं को आपसे साझा करूं। आपके लिए भी रोचक रहेगा यह जानना।

निःसंदेह श्री श्री रविशंकर के अनुयायियों और आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के सदस्यों की प्रतिक्रिया आक्रोश से भरी हुई थी। कुछ लोगों की प्रतिक्रिया तो इतनी भद्दी थी कि वे गाली – गलौज पर उतर आए थे। मैं ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग अपने ब्लॉग पर नहीं करता हूं और इसीलिए यहां भी उसे नहीं लिखूंगा। इन बीते चार दिनों में उन्होंने जिस अश्लील, अभद्र और अपमानजनक भाषा का प्रयोग मुझे लताड़ने के लिए किया है, उसकी शायद कल्पना भी न कर पाएं आप। मजे की बात तो यह है कि ये सभी लोग वे हैं जो ध्यान करते हैं, जो शांति और संतुलन की खोज में रहते हैं एवं जिन्हें उनके गुरु स्वयं यह शिक्षा देते हैं उन्हें किसी के भी बारे में कुछ भी बुरा न कहना चाहिए और न ही सोचना चाहिए।

जब कभी भी मैं किसी पाखंडी गुरु के बारे लिखता हूं या उसके कपट का भंडाफोड़ करता हूं तो ऐसा ही होता है। यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। उनसे मुझे यही उम्मीद थी कि वे एक डरे हुए जानवर की भांति दुम दबाकर भाग जाएंगें। अपने पूज्य गुरु की धोखाधड़ी से आमना – सामना होने पर ये भक्तगण अपने बचाव के लिए आक्रमण की मुद्रा में आ गए हैं लेकिन अफसोस कि ये अपना बचाव भी समझदारी के साथ नहीं कर पा रहे हैं।

कुछ सामान्य प्रतिक्रियाएं भी आईं हैं। एक व्यक्ति जिसने श्री श्री की सिखाई हुई प्राणायाम की क्रियाओं का अभ्यास किया और उनसे लाभान्वित भी हुआ, उसने अपने गुरु की इन बेतुकी बातों की सफाई देने की कोशिश की। लेकिन वह स्वयं इस प्रश्न पर उलझन में था कि क्यों कोई ऐसी बेहूदा बात लिखेगा या अपने प्रवचन में कहेगा। तो उसने गुरु के वचनों को जायज़ ठहराने के लिए एक रास्ता निकाला कि उस प्रवचन में आए श्रोता ग्रामीण अंचलों के ‘भोले – भाले‘ और ‘कम बुद्धि‘ के लोग थे और अपने गुरु के श्रीमुख से ऐसी ही कहानियां सुनना चाहते थे।

दर असल इस कहानी की इस प्रकार व्याख्या करना बड़ा ही हास्यास्पद है। आप बड़ी चतुराई से यह कहना चाह रहे हैं: कि श्रोता मूर्ख हैं, इसलिए गुरु जी को उनके स्तर की बात करनी पड़ती है। वाह, क्या बात है! क्या एक प्रबुद्ध व्यक्ति से इस प्रकार की उम्मीद की जाती है? सबसे पहली बात तो यह है कि कभी भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति मूर्ख है। इसके अलावा आप यह नहीं कह सकते कि श्रोता जो सुनना चाहते थे, उन्हें वहीं सुना दिया गया। एक ईमानदार व्यक्ति कदापि ऐसा व्यवहार नहीं करेगा। चलिए मान लेते हैं कि लोग श्री श्री रविशंकर से यही सब सुनना चाहते हैं, तो भी क्या लोगों को खुश करने के लिए उन्हें ऐसी बेहूदी बातें बोलनी चाहिए थीं?

नहीं, मैं नहीं मानता कि आप उनके बचाव में यह स्पष्टीकरण या बहाना पेश कर सकते हैं। मेरे विचार से कोई एक ऐसा व्यक्ति नियुक्त है जो सब कुछ लिखता है या प्रत्येक प्रवचन को रिकॉर्ड करता है और फिर उसका एक अलग वेबपेज बनाता है, एक अलग लेख लिखता है जिसका कोई रीव्यू नहीं किया जाता श्री श्री ने यह सब कहा, इसे प्रकाशित किया गया और जब उन्होंने देखा कि हर कोई उनके ‘सर्वज्ञ‘, ‘सर्वव्यापी‘ या ‘आलौकिक‘ होने की बात पर यकीन करने को तैयार नहीं है तो उन्होंने इस कहानी को वेबपेज से हटा लिया।

कई पाठकों और मित्रों ने मेरा समर्थन करते हुए टिप्पणियां की हैं। जो लोग इस संगठन की कार्यप्रणाली से निराश हुए हैं एवं वे जो उन्हें एक सच्चा और संजीदा गुरु मानते थे, उनके भी कॉमेंट्स आए हैं। कुछ मित्र इन लेखों को लेकर मेरे बारे में चिंतित हैं। उनका मानना है कि श्री श्री का संगठन बहुत बड़ा है और उनके पास पैसे की ताक़त है, पहुंच वाले लोग हैं, अतः मुझे किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा सकते हैं।

इस समर्थन के लिए मैं आप सभी मित्रों का धन्यवाद करता हूं। मेरे बारे में चिंता करने की कोई बात नहीं है। मैं जानता हूं कि मैं अकेला नहीं हूं जब मैं इन पोंगापंथी गुरुओं के बारे में लिखता हूं, इनकी धोखाधड़ी का भंडाफोड़ करता हूं या जब इन पाखंडियों, लम्पटों और नकली धर्मगुरुओं की खबरें इकठ्ठी करता हूं। मेरी तरह और भी हजारों लाखों लोग हैं जो इन गुरुओं से नाखुश हैं। वे जानते हैं कि जो हो रहा है, वह ग़लत है और वे सभी मेरा समर्थन करते हैं। मैं जानता हूं कि वे मेरी तरह मुखर नहीं हैं। लेकिन इस बात को केवल मैं ही नहीं जानता, वे सारे गुरु भी अच्छी तरह से जानते समझते हैं।

ईश्वर की तरह ‘सर्वज्ञ’ श्री श्री रविशंकर को चायपत्ती क्यों चुरानी पड़ी – 21 फरवरी 13

सोमवार को अपनी डायरी में मैंने आपको श्री श्री रविशंकर की मोबाइल फोन चार्ज करने की तथाकथित शक्तियों के बारे में बताया था। यह कहानी मैंने उनकी वेबसाइट पर पढ़ी थी। मेरी डायरी का वह पन्ना इंटरनेट पर प्रकाशित होने के बाद उन्होंने वह कहानी अपनी वेबसाइट पर से हटा दी। आपको याद होगा कि हमने उस पेज का स्क्रीन शॉट ले लिया था। उस स्क्रीन शॉट को दोबारा ध्यान से देखने पर मेरी नज़र एक और कहानी पर गई जो श्री श्री अपने भक्तों को सुनाते हैं। इसमें भी गुरु – शिष्य के संबंध पर अंधविश्वासपूर्ण धार्मिक विचारों और गुरु के चतुराई भरे वचनों कि एक भक्त गुरु से ज्यादा शक्तिसंपन्न होता है, का मसाला भरा हुआ है।

संक्षेप में प्रस्तुत है नई कहानीः कोई दस साल पहले श्री श्री रविशंकर और उनके कुछ शिष्य दक्षिणी अफ्रीका के डरबन शहर में किसी सज्जन के अतिथि के रूप में ठहरे हुए थे। जब वे वहां से प्रस्थान करने वाले थे तो अचानक श्री श्री कुछ बेचैनी सी महसूस करने लगे और अपने भक्तों के कमरे में गए। वहां उन्होंने एक चायपत्ती का पैकेट पड़ा हुआ देखा। जब पूछने पर भी यह पता नहीं चल पाया कि वह पैकेट किसका था तो उन्होंने उसे उठाकर अपने सूटकेस में रखा लिया।

उनके भक्तों को यह देखकर कुछ अजीब सा लगा कि गुरुजी सरेआम ‘चोरी’ कर रहे हैं लेकिन जब वे जोहानेसबर्ग के हवाईअड्डे पर उतरे वहां उन्हें एक आदमी मिला जिसने उनसे पूछाः

“गुरुदेव मैंने चायपत्ती का एक पैकेट आपके लिए भेजा था, क्या वह आपको मिल गया है? यह एक विशेष किस्म की चाय है। मैं स्वयं जाकर इसे विशेषतः आपके लिए खरीदकर लाया हूं। मैं डर्बन नहीं आ सका तो मैंने किसी और व्यक्ति हाथ इसे आपके लिए भिजवा दिया था|“

कहानी की अगली पंक्तियां कुछ इतनी खूबसूरती से लिखी गईं हैं कि मैं बिना किसी काट – छांट के उन्हें जस का तस आपको पढ़वाना चाहता हूं|:

“अच्छा, तो तुमने किसी के हाथ इसे भिजवाया था और इन लोगों ने उसे दूसरे कमरे में रख दिया क्योंकि ये जानते हैं कि मैं चाय नहीं पीता और इसी कारण इन्होंने इस विषय में मुझे बताया भी नहीं। यह माज़रा था|
तब मैंने कहा ‘हाँ मुझे चाय का पैकेट मिल गया|’

“इसका अर्थ है कि जब आप भक्तों की भावनाएं इतनी तीव्र होती हैं तो मैं तो आपके हाथों की कठपुतली बन जाता हूं। इसीलिए वह पैकेट मैंने उठा लिया था|“

तो ये कहानी है कि मुझे चायपत्ती का पैकेट क्यों चुराना पड़ा। दरअसल यह चोरी नहीं है। यह तो मेरे लिए ही आया था लेकिन उस समय ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं एक ऐसी वस्तु चुरा रहा हूं जो मेरी नहीं है|“

यह कहानी दिलचस्प लग सकती है यदि आप एक कमरे में बैठकर भक्तों के समूह को यह सुना रहे हों और सभी श्रोता आनंदरस में डूबे हुए हों क्योंकि उन्हें केवल अपने प्रिय गुरु की वाणी सुनाई दे रही है। लेकिन यदि आप अपने घर में बैठकर इस कहानी को पढ़ें तो आपको यकायक इस बात पर यकीन नहीं होगा कि लोग गुरु की इस कहानी पर कैसे विश्वास कर सकते हैं और गुरु कैसे सार्वजनिक रूप से इसे अपनी वेबसाइट पर पोस्ट करने की सोच सकते हैं! लोगों को ऐसी कहानियां सुनाने के पीछे उनका मक़सद केवल एक ही है कि लोग उन्हें भगवान मानने लगें। यह कहानी दिमाग़ में कई सवाल खड़े करती है।

सबसे पहला और महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह हैः यदि आप सर्वज्ञ हैं, जिसे आपने कहानी के प्रांरभ में अस्वीकार नहीं किया है, तो ऐसा कैसे संभव है कि आपको इस बात का जरा भी भान नहीं हुआ कि चायपत्ती का वह पैकेट आपके लिए ही वहां भेजा गया था?

अग़र आपको यह पता नहीं था कि वह आपके लिए था, तो आपने उसे उठाया ही क्यों? किसी दूसरे की वस्तु उठाना चोरी कहलाता है। और अग़र आपको बाद में यह पता चल भी गया कि यह आपके लिए ही था, तो भी चोरी तो आप कर ही चुके हैं। यह एक ग़लत बात है। श्री श्री, आप इस बात से यूं ही पल्ला नहीं झाड़ सकते!

अग़र कोई व्यक्ति आपके लिए कोई विशेष किस्म की चायपत्ती खरीदता भी है और जानता है वह आपसे भेंट करने के लिए जोहानेसबर्ग आयेगा, तो वह इस पैकेट को डर्बन क्यों भेजेगा?

हो सकता है कि उसे यह पता न हो कि वह जोहानेसबर्ग आयेगा और इस कारण से उसने पैकेट वास्तव में डर्बन भेज दिया, तो वाहक ने पैकेट व्यक्तिगत रूप से आपको क्यों नहीं सौंपा? बात साफ है कि भेजने वाला व्यक्ति इतना खास था कि वह आपको जोहानेसबर्ग हवाई अड्डे पर मिला। इतने खास व्यक्ति का संदेशवाहक आप तक क्यों नहीं पहुंच पाया? सवाल यह है कि चायपत्ती सीधे आप तक क्यों नहीं पहुंची?

कहानी का सबसे मज़ेदार हिस्सा तो यह हैः

“इसका अर्थ है कि जब आप भक्तों की भावनाएं इतनी तीव्र होती हैं तो मैं तो आपके हाथों की कठपुतली बन जाता हूं। इसीलिए वह पैकेट मैंने उठा लिया था|“

इसी पेज पर एक और तीसरी कहानी के माध्यम से वह इस बात को और पुख्ता करते हैं। वह बाहर प्रतीक्षा में बैठे भक्तों को दर्शन नहीं दे पाए और वे सब बहुत निराश हुए और नाराज़ भी। इस कारण से वह शारीरिक तौर पर खुद को कमजोर और बीमार महसूस कर रहे थे। यदि इस बात में इतनी ही सच्चाई है तो वह सदा भक्तों द्वारा सम्मोहित से क्यों नज़र नहीं आते और क्यों नहीं वह सब करते जो उनके भक्त उनसे चाहते हैं। मैं यह जानता हूं कि उनके अनुयायी उनकी भक्ति में आकंठ डूबे हुए हैं। पिछले तीन दिनों से मेरे वेबपेज और फेसबुक पेज पर उनकी तीखी प्रतिक्रियाएं, जिन्हें मैंने वहां से मिटा दिया है, इस बात की गवाह हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि मैं इस बेहूदा कहानी में कतई विश्वास नहीं करता। यह बात तो कतई मेरे गले नहीं उतरती कि वह सर्वज्ञ हैं। मैं तो यह मानना ज्यादा पसंद करूंगा कि या तो यह एक मनगढ़ंत कहानी है या फिर वह कभी कभी चाय पीना पसंद करते हैं, लेकिन इस बात को खुले तौर पर स्वीकार करने से परहेज़ करते हैं। क़यास तो कुछ भी लगाया जा सकता है लेकिन एक बात तो पक्की हैः यदि वह सर्वज्ञ हैं तो इस बात को छुपाना बखूबी जानते हैं।

श्री श्री रविशंकर की अपील – सोचो मत, मेरे पीछे चले आओ! – 20 फरवरी 13

मेरी डायरी के पिछले दो पन्नों पर पाठकों की जो सकारात्मक प्रतिक्रिया आई है उससे मुझे आश्चर्यमिश्रित खुशी हो रही है। सोमवार को मैंने आर्ट ऑफ लिविंग की वेबसाइट पर छपे एक हास्यास्पद लेख के बारे में बताया था जिसमें श्री श्री रविशंकर दावा करते हैं उनके भक्त बिना किसी चार्जर का इस्तेमाल किए उनकी तस्वीर के सामने अपना मोबाइल फोन रखकर उसे चार्ज कर सकते हैं। जब उस ऑनलाइन लेख पर सवाल उठाए गए तो श्री श्री ने तय किया कि यह कहानी प्रचारित करने योग्य नहीं है और उन्होंने झटपट उस पेज को अपनी वेबसाइट से हटा लिया। उसके बाद से बहुत लोग मुझे लिख रहे हैं और उन्होंने इन गुरु और उनकी फाउंडेशन के बारे में अपने अनुभव बताए हैं। मैंने सोचा कि मुझे भी श्री श्री रविशंकर, उनके कार्य और जनता को आकर्षित करने के लिए अपनाए गए उनके हथकंडों के बारे में अपनी इस डायरी में लिखना चाहिए।

ऊपर आप एक समाचारपत्र में डाला गया फोटो विज्ञापन देख रहे हैं। यह विज्ञापन अहमदाबाद में अखबारों के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया है। इसमें सबसे नीचे कार्यक्रमों, कोर्सेज़, रीट्रीट, कार्यक्रम स्थल (जो फाउंडेशन की अपनी जगह है) और संपर्क सूत्र का ज़िक्र किया गया है। इस विज्ञापन में जो मुख्य बात पाठक का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करती है, वह है : सोचो मत. . . . अभी आर्ट ऑफ लिविंग के सदस्य बन जाओ। यह इतने बड़े बड़े शब्दों में लिखा गया है कि पर्चे की अन्य विषय सामग्री इसके सामने गौण सी हो गई है और यह पढ़कर मुझे बड़ी क़ोफ्त हुई।

वाह क्या तरीका है ! आप क्या सोचते हैं कि लोगों को बरगलाने के लिए किसी पोंगापंथ के कार्यक्रम को विज्ञापित करने का यह सबसे प्रच्छन्न व आसान तरीका है? मोबाइल फोन चार्ज करने की कहानी के बाद तो मुझे यकीन हो गया है कि आर्ट ऑफ लिविंग तथा श्री श्री रविशंकर और कुछ नहीं बस लोगों के दिमाग़ को कुंद करने का काम कर रहे हैं ताकि आप सोचने समझने में अक्षम हो जाएं। यह एक ऐसी जगह है जहां आप वही करेंगे जो आपसे करने के लिए कहा जाएगा और आप इस झूठ को सच मानने लगेगें कि ऐसा करके आप दिव्यज्ञान और समाधि की परम अवस्था तक पहुंच सकते हैं, यहां तक कि जीवन के अंत में मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। उन सभी को शुभकामनाएं जो इस इस विज्ञापन की तरफ आकृष्ट हो रहे हैं!

हो सकता है कि वे अपने उद्देश्य में सफल हो जाए क्योंकि वे खुलेआम अपनी बात कह रहे हैं। अन्य पोंगापंथों की भांति वे इस सच्चाई को छुपाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं कि वे यह नहीं चाहते हैं कि लोग अपनी विचारशक्ति का इस्तेमाल करें बल्कि यह चाहते है कि वे गुरुजी की बात में विश्वास करें। जैसाकि मैंने भी कल भी कहा था कि आम तौर पर श्री श्री रविशंकर सार्वजनिक रूप से स्वयं को सर्वज्ञ या सर्वव्यापी गुरु के रूप में प्रस्तुत नहीं करते क्योंकि ऐसा करने से उनकी छवि को नुकसान ही पहुंचेगा। वह इस बात से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं कि आज मीडिया ऐसे गुरुओं की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखता जो अविश्वसनीय चमत्कारी शक्तियों से संपन्न होने का दावा करते हैं ।

निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि वैसे तो श्री श्री रविशंकर अन्य पाखंडी गुरुओं जैसा न दिखने की कोशिश करते हैं लेकिन ओढ़ी हुई नकली निर्मलता का आवरण यदा – कदा उघड़ ही जाता है और भीतर की सच्चाई निर्वस्त्र हो जाती है। मोबाइल चार्ज करने की चमत्कारी शक्ति पर लेख, लोगों को सोचना समझना बंद कर आर्ट ऑफ लिविंग में शामिल होने के लिए प्रेरित करता विज्ञापन और ग़रीब और ज़रूरतमंदों के लिए आबंटित सरकारी ज़मीन पर आर्ट ऑफ लिविंग के ध्यान केंद्रों की इमारतें खड़ी करने के आरोप लगाती रिपोर्ट्स इसके गवाह हैं।

ऐसी घटनाएं भी हुई हैं जिनकी वज़ह से धर्मभीरू भारतीय जनता के मध्य भी उनकी आदर्श गुरु की छवि को धक्का पहुंचा है और उनकी लोकप्रियता में कमी आई है।उदाहरण के लिए उन्होंने पिछले साल मार्च महीने सार्वजनिक तौर पर कहा कि सरकारी स्कूल आतंकवादियों को पैदा कर रहे हैं, क्यों नहीं इनका प्रबंधन निजी संगठनों को सौंप दिया जाता। देश भर में उनकी इस बात का भारी विरोध हुआ । यहां तक की संसद सदस्यों और मंत्रियों, जो स्वयं इस सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं, ने उनका विरोध किया। श्री श्री ने इस सारे प्रकरण से अपना पल्ला झाड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन अपने बयान की विडियो रिकॉर्डिंग को वह कैसे झुठलाते।

हो सकता है कि श्री श्री रविशंकर अपने दोष छिपाने की भरसक कोशिश करें। हो सकता है कि लोगों को यह सद्बुद्धि आ जाए कि आंतरिक शांति के लिए, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए और योग, ध्यान व प्राणायाम सीखने के लिए उनके जैसे गुरु की आवश्यकता नहीं है। यह सब कुछ सर्वसुलभ है। श्री श्री रविशंकर या और किसी अन्य गुरु के नाम का ठप्पा लग जाने से ये सारी क्रियाएं अधिक गुणकारी या महत्वपूर्ण नहीं बन जातीं।

श्री श्री रविशंकर ने बिना समय गंवाए हटा दी अपनी चमत्कारी शक्तियों की कहानी – 19 फरवरी 13

आज फिर एक नया दिन, डायरी के एक नए पन्ने के साथ। साथ ही प्रस्तुत है कल की डायरी में श्री श्री रविशंकर के पाखंड को बेपर्दा करने की मेरी मुहिम से पैदा हुई हलचल की रिपोर्ट। कल मैंने अपनी डायरी में लिखा था कि मैंने श्री श्री की फाउंडेशन ‘आर्ट ऑफ लिविंग‘ की अधिकारिक वेबसाइट पर एक स्टोरी पढ़ी थी जिसमें वे यह दावा कर रहे थे कि उनके भक्त, मात्र उनकी तस्वीर के सामने अपना मोबाइल रखकर उसे चार्ज कर लेते हैं। आज मेरे ब्राउज़र ने स्वतः उसी पेज को खोला क्योंकि मैंने उसे कल इसी सैटिंग में रख छोड़ा था। देखा तो पाया कि उन्होंने उस पूरे पेज को ही मिटा दिया है। अब वहां यह संदेश लिखा हुआ है ‘आप इस पेज पर जाने के लिए अधिकृत नहीं हैं|‘

आप लोगों में से जो कोई भी इस पेज को नहीं पढ़ पाए थे उनकी सुविधा के लिए बता दूं कि हमने इसका एक स्क्रीन शॉट ले लिया था। निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करेंगें तो जो नई विंडो खुलेगी उसमें आप सारी कहानी स्वयं पढ़ सकते हैं :

http://www.jaisiyaram.com/ravishankar-web.htm

यदि एक बार कोई विषयसामग्री इंटरनेट पर आ जाती है तो उसे वहां से हटा पाना मुश्किल होता है, खासकर तब जबकि हजारों लोगों का ध्यान इसकी तरफ आकर्षित हो चुका हो। हमेशा की तरह मैंने कल दोपहर भी अपनी डायरी पोस्ट की और फेसबुक पर अपने पेज पर भी इसे साझा किया। देखते ही देखते यह बात इंटरनेट पर जंगल की आग की तरह फैल गई। जाहिर था श्री श्री रविशंकर तक भी जा पहुंची। उन्होंने ने बिना वक़्त गंवाए उस स्टोरी को वहां से मिटा दिया। मेरी कही हुई बातों के सुबूत मिटाने के लिए उन्होंन यह सब किया। ऑनलाइन हुए किसी भी घटनाक्रम का सुबूत आधुनिक संचार माध्यम बड़ी आसानी से प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। और सुबूत के तौर पर उपरोक्त लिंक आप देख सकते हैं।

सच तो यह है कि मुझे श्री श्री रविशंकर की वेबसाइट पर अंधविश्वास फैलाने वाला ऐसा लेख मिलने की उम्मीद नहीं थी क्योंकि अब तक मेरे दिमाग पर यह छाप थी कि वह अपनी एक अलग छवि प्रस्तुत करना चाहते थे। मुझे यह भी लगता था कि वह दुनिया को यह बताना चाहते थे वह अन्य गुरुओं की तरह पाखंडी नहीं है जो भक्तों को लुभाने के लिए चमत्कार दिखाते हैं और दावा करते हैं कि वह “सर्वज्ञ और सर्वव्यापी“ हैं। मेरे पर्दाफाश करने के बाद श्री श्री और उनकी टीम ने उस लेख को मिटाने का जो फैसला लिया उसके पीछे सच्चाई यह है कि वे यह जानते हैं कि यह कहानी ग़लत है। वे जानते हैं कि यह बात संभव नहीं है, महज़ एक कल्पना है, लोगों को प्रभावित करने के लिए रची गई मनगढ़ंत कहानी है।

वह स्वयं कहते हैं कि यह भारत के एक ग्रामीण हिस्से की कहानी है जहां लोग निहायत अंधविश्वासी हैं, जहां लोगों की सोच वैज्ञानिक नहीं है जो कहानी को तर्क की कसौटी पर कस सके। गांवों के लोग इतने भोले – भाले और धार्मिक हैं कि बिना सोचे – समझे ऐसे पाखंडी गुरुओं का अनुसरण करने लगते हैं जो उन्हें अपनी तथाकथित चमत्कारी शक्तियों का प्रदर्शन करके बरगलाते हैं। भक्तों को अपने से ज्यादा शक्तिसम्पन्न बताकर दरअसल वह उन्हें एक तरह का प्रलोभन दे रहे हैं ताकि उनके दिलों में भी ऐसी शक्तियां अर्जित करने का लालच पैदा हो।

अपनी शक्तियों का झूठा प्रचार करके न जाने अब तक वह कितने लोगों को अपने जाल में फंसा चुके होंगें, उन्हें धोखा दे चुके होंगें। इससे पहले कि लोग उनकी बताई हुई योग क्रियाओं के हुए फायदों को गिनाते हुए मुझे अपने कॉमेंट्स भेजने लगें, मैं आपको एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि योग, ध्यान और प्राणायाम के फायदों के बारे में मुझे किसी प्रकार का कोई शुबहा नहीं है। हां, मैं इस बात में विश्वास नहीं करता हूं कि कोई पाखंडी गुरु लोगों को अपनी शक्तियों की झूठी कहानियां सुनाकर उनका का भला कर सकता है या लोग उसके भक्त बनकर चमत्कारी शक्तियों को प्राप्त कर सकते हैं।

मेरी डायरी को पढ़ने वाले सभी से मैं यह अपील करना चाहता हूं कि इस एक उदाहरण से आप यह समझ सकते हैं कि इस जैसे गुरु अपने कहे शब्दों को वापिस लेने में एक सेकंड भी नहीं लगाते। आज एक बात कहते हैं तो कल दूसरी। वे ईमानदार नहीं हैं, किसी प्रकार की चमत्कारी शक्तियां उनके पास नहीं हैं और न ही ये कोई प्रबुद्ध आत्माएं हैं। ये आपकी सहायता नहीं करना चाहते। ये आपका पैसा हथियाना चाहते हैं, आपको बेवकूफ बनाना चाहते हैं और चाहते हैं कि आप सदा के लिए उन पर आश्रित हो जाएं। इनके जाल में न फंसें। अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वयं संभालें और इस तरह के पाखंडी गुरुओं से दूरी बनाए रखकर अपना जीवन खुशहाल बनाएं।