भारत में सामाजिक परिस्थिति लगातार बेहद शर्मनाक, शोचनीय और पीड़ादायक हो चली है – 7 अक्टूबर 2015

आम तौर पर मैं अपने ब्लॉग में राजनीति पर नहीं लिखता। उसके लिए मैं सोशल मीडिया का उपयोग करता हूँ लेकिन क्योंकि भारत में सामाजिक परिस्थितियाँ तेज़ी के साथ बिगड़ती जा रही हैं और अब यह विषय लगातार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा रहा है, अगर आप इजाज़त दें तो आज मैं भी अपना खेद और प्रतिरोध दर्ज कराना चाहूँगा।

हाल ही में भारत में हुई एक घटना दुनिया भर के बड़े समाचार-पत्रों की मुख्य खबर बनी। संभव है, आपने भी इसके विषय में सुना हो। एक गाँव के हिन्दू मंदिर में वहाँ के पुजारी ने भारत की सत्ताधारी पार्टी के एक नेता के बेटे ने उससे जो कहा था, जस की तस उसकी घोषणा कर दी। वास्तव में वह महज एक अफवाह थी कि गाँव के एक मुस्लिम परिवार ने गाय का मांस खाया है। यह सुनते ही भीड़ जुट गई और उसने उस परिवार के घर की दिशा में कूच कर दिया, परिवार के पिता और उसके बेटे को घर से बाहर निकालकर उस पर ईटों से हमला किया। हमला इतना जोरदार था कि पिता की मृत्यु हो गई और बेटे को घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जो इस बुरी तरह से घायल हुआ है कि उसकी जान जा सकती है। फिलहाल वह मौत से संघर्ष कर रहा है। जाँच से पता चला है कि उन्होंने गाय का मांस नहीं बल्कि बकरे का मांस खाया था-लेकिन इससे बच्चों का पिता और उनकी माँ का पति वापस नहीं आ सकते!

यह घटना स्वयं में बेहद घृणास्पद थी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने ठीक ही उसे अपने पृष्ठों में प्रमुखता से जगह दी लेकिन उससे भी भयावह सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सदस्यों की प्रतिक्रिया रही! अफवाह फैलाने वाले बीजेपी के नेता के बेटे तथा कुछ और लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन उनकी पार्टी के नेता उस लड़के के व्यवहार को नज़रअंदाज़ करते हुए तरह-तरह के बहाने बना रहे हैं। उनका कहना है कि वे सब भोले-भाले बच्चे हैं, और उत्साह में यह सब कर बैठे हैं! वे हत्या के आरोप में हुई उनकी गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे हैं!

लेकिन साथ ही वे उनके इस कृत्य पर खुले आम यह कहकर मुहर भी लगा रहे हैं कि जो भी गाय का मांस खाए, उसे यही सज़ा मिलनी चाहिए! हमारे देश की सत्ताधारी पार्टी के एक लोकसभा सदस्य ने कहा कि गाय हमारी माँ है और अगर आपने हमारी माँ की हत्या की है तो आपकी हत्या भी जायज़ है! ये लोग सिर्फ गाय का मांस खाने पर किसी की भी हत्या करने पर उतारू हैं!

निश्चित ही ये सभी राजनैतिक नेता पाखंडी हैं! देश के सबसे महंगे रेस्तराँ गाय का मांस बेचते हैं, देश के कई प्रांतों में, वहाँ की स्थानीय जनता के लिए गाय का मांस एक सामान्य भोजन है। इन सब तथ्यों से उन्हें कोई परेशानी नहीं है! लेकिन वे सामान्य, धार्मिक हिंदुओं की गाय के प्रति अत्यंत संवेदनशील भावनाओं का उपयोग जानबूझकर हिंसा फैलाने में कर रहे हैं, जिससे देश की जनता का ध्रुवीकरण हो जाए, वे दो गुटों में विभक्त हो जाएँ और इन नेताओं को अधिक से अधिक वोट मिल सकें!

जी हाँ, यह एक बहुत बड़ी साजिश है। एक और बीजेपी नेता ने प्रांतीय चुनावों से पहले कहा था, ‘अगर दंगे होते हैं तो हम चुनाव जीत जाएँगे’ और अतीत में यह बात सत्य सिद्ध हो चुकी है! राजनैतिक नेता विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच, विशेष रूप से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, हिंसक प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं और इस तरह उन्हें अलग-अलग गुटों में विभक्त कर देते हैं और इस तरह देश के टुकड़े-टुकड़े कर देना चाहते हैं। इन दंगों में, निश्चित ही बहुत से लोग मारे जाएँगे। और अंत में उन्हें अधिकांश हिन्दू वोट प्राप्त होंगे और बहुमत मिल जाएगा। जो लोग अभी कुछ साल पहले तक दंगों के आरोपी थे, आज संसद और विधानसभाओं में बैठे हैं! धर्म और जाति के आधार पर वोट प्राप्त करने और चुनाव जीतने की यह बड़ी आसान सी रणनीति है!

जो थोड़ी बहुत कसर रह गई थी, वह प्रधानमंत्री की चुप्पी ने पूरी कर दी है। उनकी पार्टी विकास का मुद्दा जनता के सामने रखती है लेकिन वह एक प्रहसन से अधिक कुछ भी नहीं है-विकास सिर्फ अमीरों का हो रहा है और वे दिन-ब-दिन और अमीर होते जा रहे हैं जब कि सामान्य गरीब जनता की आर्थिक स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा है! अगर वे धार्मिक हिन्दू नहीं हैं तो उनकी हालत खराब ही हुई है, बल्कि वे संकट में हैं। दुर्भाग्य से दक्षिणपंथी पार्टी की सरकार होने के कारण अतिवादी और अतिराष्ट्रवादी हिन्दू सत्ता में आ गए हैं और न सिर्फ बहुत शक्तिशाली हो गए हैं बल्कि उन्हें इसके लिए पूरा राजनैतिक समर्थन भी मिलता है कि उन लोगों के विरुद्ध हिंसा भड़का सकें, जिनकी आस्थाएँ अलग हैं और जो उनके अनुसार नहीं सोचते।

इसी कारण जाने-माने तर्कवादियों, नास्तिक लेखकों की हत्या की जा चुकी है और धार्मिक चरमपंथियों ने बाकायदा एक सूची बना रखी है, जिसके अनुसार वे एक के बाद एक बुद्धिजीवियों, तर्कवादियों, धर्मविरोधियों या नास्तिकों को निशाना बनाने का विचार रखते हैं।

इस समय हमारा देश अत्यंत नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है और इसीलिए मैं आज यह ब्लॉग लिख रहा हूँ कि इस बहुत संवेदनशील समय की एक झलक आपको दे सकूँ। कल मैंने आपको बताया था कि कैसे एक छोटा सा प्रयास भी मददगार साबित हो सकता है और बहुत से प्रख्यात लेखकों का भी यही विचार है। उन्होंने इसके इस आतंकवाद के प्रतिरोध में सरकार को अपने पुरस्कार वापस कर दिए हैं। हमें यह साबित करना होगा कि हम ऐसा भारत नहीं चाहते। यह एक खुला, सांस्कृतिक विविधतापूर्ण, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबके विचारों का सम्मान करने वाला भारत नहीं है, जिसका दावा करते हम नहीं थकते!

आभार यूरोप! शरणार्थियों की मदद करने का बहुत बहुत शुक्रिया – 1 सितंबर 2015

कल से मैंने इस विषय पर लिखना शुरू किया था, जो बहुत महत्वपूर्ण भी है और मेरे मन को विचलित करने वाला भी: यूरोप में शरणार्थियों की हालत खराब है। तकलीफदेह लंबी यात्रा में वे भयानक अनुभवों से गुज़रते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं और पहुँचने के बाद और नई जगह अस्थाई आवास हेतु पंजीकरण करा लेने के बाद भी कई बार उन्हें बेहद खराब परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है और स्थानीय लोगों की घृणा और उनके क्रोध का सामना करना पड़ा है। लेकिन इस दुखद कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है: हज़ारों, लाखों लोग सहायता के लिए भी आगे आए हैं! मैं तहेदिल से उन सभी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ और साथ ही अपने सभी यूरोपीय साथियों और पाठकों से गुज़ारिश करना चाहता हूँ कि उन बेघरबार लोगों की मदद का अपना काम जारी रखें और यदि यह काम आपने शुरू न किया हो तो तुरंत आगे बढ़कर इस महती कार्य में हाथ बँटाएँ!

स्वाभाविक ही घृणा करने वाले, जातिवादी और नव-नाज़ीवादी और दक्षिणपंथी भी बहुत से लोग होंगे। हम समाचारों में उनके चेहरे देख सकते हैं। लेकिन कम से कम जर्मन समाचारों में हम उससे भी अधिक स्पष्टता के साथ, ज़्यादातर, और ज़्यादा संख्या में उन लोगों को देख सकते हैं जो उनके विपरीत विचार रखते हैं:वे शरणार्थियों का स्वागत करते हैं और निःस्वार्थ भाव से उनकी हर संभव मदद करते हैं। और ऐसे लोग सिर्फ जर्मनी में ही नहीं हैं, अपने मन में करुणा और प्रेम लिए ऐसे शानदार लोग सारे यूरोप में मौजूद नज़र आते हैं!

ऐसे लोग भी हैं जो रेलवे स्टेशनों पर शरणार्थियों के स्वागत के लिए खड़े रहते हैं। जब थके-हारे युवा, लुटे-पिटे वृद्ध और सताई हुई महिलाएँ बसों में लदे-फँदे उनके शहर पहुँचते हैं तो वे फूलों और 'वेलकम' के साइन बोर्ड उठाकर उनकी ओर लहराते हैं कि निराश होने की ज़रूरत नहीं है और न ही भयभीत होने की – हम लोग यहाँ आपको सहारा देने, आपकी मदद के लिए हाजिर हैं।

यूरोप के शहरों में, कस्बों, देहातों में अनगिनत स्वयंसेवक आगे आए हैं, जो अपना बहुमूल्य समय, अपना श्रम और पैसा चैरिटी संगठनों को खुले हाथों अर्पित कर रहे हैं। वे शरणार्थियों को भोजन, कपडे-लत्ते, बच्चों को खिलौने इत्यादि वितरित कर रहे हैं, अस्थाई आवासों की सुचारू व्यवस्था में लगे हुए हैं।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मदद करना चाहते हैं मगर समय नहीं निकाल पाते; लेकिन वे भी किसी न किसी तरह शरणार्थियों के लिए पुराने कपड़े, आवश्यक वस्तुएँ और उनके पास उपलब्ध हर वह अतिरिक्त वस्तु, जो शरणार्थियों के किसी काम आ सकती हैं, भेजने की व्यवस्था कर रहे हैं।

कुछ परिवारों ने और दंपतियों और अकेले रहने वालों ने शरणार्थियों को अपने घरों में रहने की जगह दी है, बिलकुल मुफ्त और एक तरह से प्रस्ताव रखा है कि जल्द से जल्द वे अपने गम भुलाकर इस नए समाज में घुल-मिल जाएँ।

कुछ स्वयंसेवियों ने अपने देश की भाषाएँ सिखाने की कक्षाएँ शुरू की हैं, जिससे उन्हें भविष्य में वहाँ रहने में कोई दिक्कत न हो। वहाँ वे नए देश में आवश्यक व्यावहारिक कौशल सिखाने की व्यवस्था कर रहे हैं, वे मरीज शरणार्थियों को डॉक्टरों के पास ले जाते हैं या उन कार्यालयों में, जहाँ से शरणार्थियों को अस्थाई निवास संबंधी विभिन्न दस्तावेज़ प्राप्त करने हैं।

और ऐसे भी बहुत से शानदार लोग हैं, जो शरणार्थियों के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं-उनके स्वागत में सभाएँ आयोजित की जा रही हैं, परिचय-समारोह हो रहे हैं, जिससे वे विभिन्न संगठनों के स्वयंसेवियों से मिल-जुल सकें, भविष्य में किसी सहायता के लिए उनसे संपर्क कर सकें। बच्चों को खेल के मैदानों में खेलने की सुविधा मुहैया कराई जा रही है, बगीचों और झीलों की सैर कराई जा रही है। इसी तरह के बहुत से मेल-जोल के कार्यक्रमों के ज़रिए शरणार्थियों के ज़ख़्मों पर मरहम रखने का भरसक प्रयास किया जा रहा है।

आप देख रहे होंगे कि शरणार्थियों के कल्याण के लिए बहुत सारे काम किए जा रहे हैं। उन छोटे-छोटे मगर महत्वपूर्ण कामों की लंबी सूची बनाई जा सकती है, जिन्हें ये शानदार लोग अंजाम दे रहे हैं। यह देखकर वास्तव में आश्चर्य होता है।

हालांकि मैं कभी भी शरणार्थी नहीं रहा, कभी ऐसी आपातकालीन स्थिति नहीं झेली, कभी इस तरह संकट में नहीं पड़ा लेकिन जर्मनी और यूरोप को मैंने नजदीक से देखा है और पाया है कि वहाँ के लोग दोस्ताना गर्मजोशी और खुले दिल से मेहमानों का स्वागत करते हैं। यह देखकर संतोष और खुशी से मन भर आता है। इससे मेरी इस आस्था को बल मिलता है कि दुनिया में घृणा का जहर फैलाने वालों की तुलना में करुणा और प्यार बाँटने वालों की संख्या कई गुना अधिक है।

यूरोप में शरणार्थियों की दुखद परिस्थिति – 31 अगस्त 2015

पिछले कुछ हफ्तों से मुझे बड़ी संख्या में बेहद विचलित और विक्षुब्ध कर देने वाले समाचार मिल रहे हैं-क्योंकि लाखों लोग तकलीफ झेल रहे हैं।

कहा जा सकता है कि यूरोप में शरणार्थियों की बाढ़ आई हुई है। यह भी कहा जा सकता है कि कुछ देशों में लंबे समय से चले आ रहे खराब हालात अब चरम पर पहुँच गए हैं और लाखों लोग अपने घर-बार और देश छोड़कर, जहाँ सिर समाए भाग निकलने को मजबूर हो चुके हैं। और वही लोग अब यूरोप पहुँच रहे हैं, अक्सर बड़े खतरनाक रास्तों से और बेहद तकलीफदेह यात्राएँ करके। सिर्फ शरणार्थियों की विशाल संख्या ही यूरोपीय देशों को प्रलयंकारी नज़र आ रही हैं। और इसलिए शरणार्थी आवास, अस्थाई कैंप, व्यायामशालाएँ, टाउनहॉल, पुराने मालगोदाम, और ऐसी ही दूसरी तमाम जगहें लोगों से बजबजाई हुई हैं। सरकारें संघर्ष कर रही हैं कि प्रशासन तेज़ गति से काम करे और दफ्तरी औपचारिकताओं को जल्द से जल्द निपटाया जाए।

रिपोर्टों का अवलोकन करने, उनकी कहानियाँ पढ़ने और यह जानने के बाद कि वे लोग किन बदतरीन स्थितियों से गुज़र रहे होंगे, आप अवसादग्रस्त हो जाते हैं कि इस तरह की चीज़ें वर्तमान में, आज की दुनिया में भी संभव हैं। परिवार, जिन्होंने यह यात्रा साथ-साथ शुरू की थी, बीच रास्ते में इधर-उधर बिखर गए। अभिभावक अपने बच्चों की खोज में लगे हुए हैं, पति अपनी पत्नियों को ढूँढ़ रहे हैं। दूसरे बहुत से हैं, जो जान गए हैं कि अब अपने रिश्तेदारों को ढूँढ़ना व्यर्थ है, वे अब ज़िंदा नहीं बचे हैं।

वे सैकड़ों, हजारों मील लंबा रास्ता पैदल चलकर आए हैं। उनमें से बहुत से उस भयानक जहाजों और नावों में सवार थे और किसी तरह भूमध्य सागर पार करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन बहुत सी नावें बीच समुद्र में डूब गईं, अर्थात उनमें सवार हजारों लोग निश्चित ही मारे गए। पिता अपने बेटों और बेटियों को डूबता देखता रह गया-उन्हें अमानवीय दैत्यों ने जहाज़ से उठाकर बाहर फेंक दिया, जबकि सुरक्षित उस पार पहुँचाने की एवज में वे पहले ही बहुत बड़ी रकम ले चुके थे।

दलाल, बिचौलिये, गुंडे, अपराधी, सभी उन लोगों का शोषण कर रहे हैं, जो पहले ही युद्ध और अपने देशों के तानाशाहों की प्रताड़ना से बुरी तरह टूट चुके हैं, अपने धर्म और अपनी जाति के कारण आतंकियों के ज़ुल्मों सितम झेल चुके हैं। इस आशा में कि उन्हें कहीं कोई शांतिपूर्ण, सुरक्षित जगह रहने को मिल पाएगी- कहीं न कहीं, कहीं भी, थोड़ी सी जगह – वे यह भयंकर शोषण, मारपीट, अपमान सहन करते चले जा रहे हैं और अंततः यूरोप के किसी अजनबी हाइवे पर किसी ट्रक के पीछे दम घुटने से मारे जा रहे हैं या और भी कई तरह से मृत्यु का खतरा उठा रहे हैं।

वे काँटेदार तारों की बाड़ लांघकर या नीचे से निकलकर सीमा पार करते हैं। बिना टिकिट ट्रेनों में चढ़ जाते हैं। वे गैरकानूनी रूप से सुरंग के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और समुद्र के नीचे 50-50 किलोमीटर पैदल चलकर किसी न किसी तरह उस पार निकल जाते हैं। वे पहले से खुद ही गैरकानूनी हो चुके हैं, उनमें अब कोई शक्ति नहीं बची है, प्राणों के सिवा वे अपना सब कुछ खो चुके हैं और क्वचित ही किसी का कोई रिश्तेदार बचा है। इससे बुरा और क्या हो सकता है?

ओह! क्या ऐसा भी हो सकता है! दुर्भाग्य से यह सच सिद्ध हो रहा है: जब उन्हें वादे के मुताबिक़ किसी जगह पर पहुँचा दिया जाता है कि अब वे वहाँ रह सकेंगे, कागज़ी कार्यवाहियाँ चल रही हैं, शायद वीजा मिल जाएगा, मामूली रोज़गार करने की इजाज़त मिल जाएगी, सम्भव है, शरण भी मिल जाए- तभी उनका सामना लोगों की भीड़ से होता है, जो उनके अस्थाई आवासों के सामने आंदोलन कर रहे होते हैं, नारेबाज़ी कर रहे होते हैं, उन्हें उनका वहाँ होना पसंद नहीं है! उनके आबाद होने से पहले ही, उनके सामने कुछ लोगों ने उनके घरों में आग लगा दी है! सुना है, लोग सड़कों पर निकल आए हैं और उन्हें निकाल बाहर करने की मांग कर रहे हैं- उनकी उपस्थिति उन्हें पल भर के लिए भी बर्दाश्त नहीं है!

इतनी दूर बैठकर भी ये समाचार देखकर मेरा मन दुःख और अवसाद से भर उठता है, कि हालत यहाँ तक पहुँच गई है! बहुत से लोगों के जीवन में न सिर्फ इतना भयानक परिवर्तन आया हुआ है बल्कि उसने उन्हें बरबाद कर दिया है, वे परिस्थितियों के ग्रास बन रहे हैं, मर-खप रहे हैं! इतनी बड़ी संख्या में लोग भीषण दुःख उठा रहे हैं, जबकि कुछ लोगों ने अपने लिए आवश्यकता से अधिक सरंजाम इकठ्ठा कर रखा है!

और बहुत से लोग हैं जो उनके विरुद्ध अपमानजनक नारे लगा रहे हैं, अखबारों में लेख लिख रहे हैं, आंदोलन कर रहे हैं कि इन पीड़ित, मार खाए लोगों को वे बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह आश्चर्यजनक है, मेरी कल्पना से बाहर की बात है!

लेकिन अंत में आशा की किरण भी दिखाई देती है, लंबी अँधेरी गुफा के बाद प्रकाश चमक रहा है क्योंकि और भी लोग हैं- ऐसे लोग, जो अलग तरह से सोचते हैं, जिनकी इंसानियत अभी मरी नहीं है, वे मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं! लेकिन उनके विषय में मैं कल लिखूँगा।

भारत में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस – चीन से चटाइयां और योग के शक्तिशाली व्यापारियों को धनलाभ – 21 जून 2015

आज फिर इतवार है: 21 जून, जिसे इस साल पहली बार ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में भी मनाया जा रहा है। यह मेरी आँखों से कैसे ओझल हो सकता था- क्योंकि भारत में आज के कार्यक्रम और समारोह कई दिनों से टीवी समाचारों के केंद्र में थे और उसे स्वास्थ्य जागरूकता के प्रसार के स्थान पर मीडिया का बहुत बड़ा तमाशा, दिखावे का पाखंडी समारोह और सरकारी प्रचार तंत्र में बदल दिया गया। क्यों और कैसे? अभी बताता हूँ।

भारत सरकार ने आज के दिन को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित करवाने के प्रयास किए थे और बहुत से दूसरे देशों की सहमति प्राप्त हो जाने के बाद आखिर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सूचना जारी कर दी कि भविष्य में 21 जून का दिन इसी नाम से जाना जाएगा। विश्व के किसी भी भाग में अगर आप किसी सामान्य व्यक्ति से भी पूछें कि योग की शुरुआत कहाँ हुई तो वह भारत का ही नाम लेगा क्योंकि यह बात सभी जानते हैं। और योग के लाभों को कौन नकारेगा? मैं तो निश्चित ही नहीं, लेकिन भारत सरकार द्वारा मनाए जा रहे समारोह में पर्दे के पीछे कुछ ऐसी बातें चल रही हैं जो दर्शाती हैं कि इस धूमधाम का मकसद सिर्फ योग-भावना का उत्साह नहीं है, कुछ और भी है।

इस आयोजन और उसके प्रचार पर आज के दिन के लिए भारत सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च कर दिए। स्वाभाविक ही, सबसे बड़ा आयोजन दिल्ली में हुआ, जहाँ राजपथ पर-जहाँ अक्सर औपचारिक सरकारी कार्यक्रम होते रहते हैं- प्रधान मंत्री, नरेंद्र मोदी ने आज प्रातः 35000 लोगों के साथ योग किया। इस आँकड़े पर गौर कीजिए-गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भारत का नाम दर्ज कराने के लिए इतना बड़ा तमाशा किया गया था, जैसे दुनिया को भारत की देन यही है!

सरकार ने भारत भर में 651 केंद्र शुरू किए, जहाँ एक साथ, एक ही समय में योग समारोह आयोजित किए गए। एक घंटे का यह योग समारोह सफलता पूर्वक सम्पन्न हो सके, इसके लिए हर केंद्र को 1 लाख रुपए अर्थात् 1500 यू एस डॉलर प्राप्त हुए। इसे बड़े पैमाने पर किया गया एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है लेकिन तब तक ही जब तक आपको पता नहीं चलता कि इन 651 में से 191 केंद्रों को चलाने का ठेका रामदेव को और 69 का श्री श्री रविशंकर को दिया गया है, जो, दोनों ही, दूर दूर तक योगी नहीं हैं बल्कि योग के बड़े व्यापारी हैं और उनका करोड़ों डॉलर का विस्तृत व्यवसाय है!

पिछले चुनावों में सत्ताधारी पार्टी को जिताने के लिए रामदेव ने बहुत काम किया था। स्पष्ट ही, इसे उसकी सेवाओं का मेहनताना कहा जाना चाहिए। उसके इसी काम की वे कीमत चुका रहे हैं-और यह सौदा बड़े काम का है क्योंकि अपने तरह-तरह के उत्पादों के साथ रामदेव अब मीडिया में छाया हुआ है।

फिर सरकार को अचानक होश आया कि इतने सारे सहभागियों के लिए चटाइयों की ज़रूरत होगी और चीन से आयात करने के सिवा उन्हें कोई बेहतर विकल्प नहीं सूझा! मोदी, जो दुनिया को यह समझाने में लगे हुए हैं कि भारत एक बढ़िया निर्माता है और दुनिया भर में घूम-घूमकर ‘मेक इन इंडिया’ का प्रचार-अभियान चला रहे हैं, अब यह व्यापार एक दूसरे देश की झोली में डालने के लिए तैयार हो गए! क्या चटाइयाँ भारत में तैयार नहीं की जा सकती थीं? या पूरी तरह परंपरागत तरीके से स्थानीय दस्तकारों से घास-फूस की चटाइयाँ ही बनवा लेते! कल्पना कीजिए, कितने गरीब कारीगरों को इस समारोह के चलते रोज़गार मिल जाता!

मेरा इशारा अब आप समझ गए होंगे! स्वाभाविक ही, मैं योग के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही इसके विरुद्ध हूँ कि वैश्विक पैमाने पर किसी दिन को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाए। लेकिन प्रश्न दूसरा है। उसी संयुक्त राष्ट्र ने हाल ही में घोषित किया है कि भारत में दुनिया के सबसे ज़्यादा संख्या में भूखे लोग बसते हैं। उन्नीस करोड़ चालीस लाख लोग लोग रोज़ भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। देश के 48% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। और सरकार करोड़ों रुपया गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में प्रवेश की चमक-दमक के ग्लेमर पर खर्च कर रही है!

देश के मजदूरों को साल में एक दिन के योग की ज़रुरत नहीं है। वे खेतों और निर्माण-स्थलों में कड़ी मेहनत करके पर्याप्त व्यायाम कर लेते हैं और मुश्किल से इतना कमा पाते हैं कि बच्चों को खिला सकें! योग उन्हें क्या देगा? और उन्हें रोज़गार मुहैया करवाने की जगह आप अपने यहाँ के रोजगार और अपना पैसा चीन भेज देते हैं।

निश्चित ही, पतंजलि अगर जीवित होते और यह ड्रामेबाज़ी देखते तो अविश्वास से दीवार पर सिर फोड़ लेते!

खैर, मैंने तो रोज की तरह आज भी योग किया- और मैं सलाह दूंगा कि आप भी यही करें। योग एक जीवन पद्धति है। उसे अपने दैनिक जीवन में उतारिए। साल में एक दिन का योग पर्याप्त नहीं है और उसे सिर्फ कुछ व्यायामों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। जीवन के हर एक पल में जीना सीखिए, भविष्य की अनावश्यक चिंता मत कीजिए और न ही पिछली बातों पर पछतावा कीजिए। खुद पर नज़र रखिए और अपने विचारों, शब्दों और कामों के प्रति हर वक़्त जागरूक रहिए। जब भी संभव हो, दूसरों की मदद करने की कोशिश कीजिए- जैसे किसी ज़रूरतमन्द को काम देकर- न कि दूसरों से सम्मान या मान्यता प्राप्त करने के लिए पैसे बरबाद कीजिए- जैसे विश्व रेकॉर्ड बनाने के लिए…

बलात्कारी पंच – पंचायतें जहां बलात्कार अपराध नहीं बल्कि प्रेम की सज़ा है – 27 जनवरी 2014

पिछले सप्ताह से मैं भारत में महिलाओं के विरुद्ध होने वाली यौन प्रताड़नाओं और बलात्कारों के विषय में लगातार लिखता रहा हूँ और देखिये, इसी बीच बंगाल में एक और वीभत्स हादसा पेश आ गया। कलकत्ता से सिर्फ 180 किलोमीटर दूर एक गाँव में एक महिला पर सामूहिक बलात्कार किया गया। और इस बार यह बिना सोचे-समझे या दुर्भाग्यवश चंगुल में फंसी किसी महिला के साथ नहीं हुआ है बल्कि यह काफी सोच-विचार करने के बाद, महिला पर आरोप मढ़कर, पंचायत द्वारा सज़ा दिलवाकर किया गया सामूहिक बलात्कार है। वाकई यह एक सामान्य बलात्कार नहीं है। बलात्कारियों में सज़ा मुकर्रर करने वाले जज, पंच-सरपंच आदि सभी शामिल थे।

20 वर्षीय एक लड़की का एक पुरुष के साथ प्रेम हो जाता है। उनकी नज़र में पड़ोस के गाँव का वह पुरुष बुरा व्यक्ति था और उसके साथ गाँव की लड़की का प्रेम समाज को स्वीकार नहीं था। एक बार गाँव वालों को वे दोनों एक साथ दिखाई दे गए और वे उन दोनों को घसीटते हुए गाँव ले आए और तुरत-फुरत पंचायत (ग्राम अदालत) बिठा दी गई।

लड़की के परिवार को आदेश दिया गया कि वे 50000 रुपए अदा करें जो इतनी बड़ी रकम थी कि वे अदा नहीं कर सकते थे और यह बात पंचायत भी जानती थी। जब परिवार वालों ने कहा कि उनके पास इतनी रकम नहीं है तो पंचायत ने लड़की के विरुद्ध यह भयंकर फैसला सुनाया, जिसमें गाँव के कुछ पुरुषों से कहा गया कि वे उस लड़की पर बलात्कार करके उसे उपयुक्त सज़ा दें।

अब उसे याद नहीं है कि कितने लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया लेकिन उनकी संख्या कम से कम तेरह थी। इनमें से कई तो ऐसे थे, जिन्हें वह चाचा और भाई कहा करती थी और जिनके साथ उसके संबंध परिवार के सदस्यों जैसे आत्मीय थे। बलात्कार के बाद लड़की के बुरी तरह ज़ख्मी होने और रक्तरंजित होने के बावजूद परिवार वालों को घंटों उसे अस्पताल ले जाने से रोका गया। आखिर जब वे उसे अस्पताल ले जा सके तभी पुलिस में रपट भी लिखाई जा सकी।

पुलिस ने तेरह लोगों को इस आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया है, जिनमें वह पंच भी शामिल हैं जिन्होंने यह ‘सज़ा’ सुनाई थी। फिर भी वे गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करते रहे और पुलिस को अतिरिक्त पुलिस बुलवानी पड़ी तब जाकर संदिग्ध अपराधियों को गिरफ्तार किया जा सका।

हाल में पढ़ने में आया, इस तरह स्तब्ध कर देने वाला यह सबसे भयानक अपराध है। इसलिए नहीं कि दूसरे ऐसे अपराध कम गंभीर हैं बल्कि इसलिए कि यह आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति द्वारा शारीरिक और मानसिक उत्तेजना में तत्क्षण किया जाने वाला अपराध नहीं था। इस मामले में अपराध करने वाले समझ रहे थे कि वे न्याय कर रहे हैं, वे सोच रहे थे कि उस लड़की के साथ बलात्कार किया जाना आवश्यक है!

महिलाओं के विरुद्ध भारत में होने वाले कुल अपराधों में पश्चिम बंगाल का हिस्सा सबसे बड़ा है। सुदूर गावों में बुज़ुर्गों द्वारा अपने कानून बना लिए जाते हैं और उनके आधार पर अपराधों की सजाएँ सुनाई जाती हैं। इन्हें ग्राम पंचायत कहा जाता है और ऐसी घटनाओं से आप समझ सकते हैं कि वे महिलाओं के बारे में क्या विचार रखते हैं, उस समाज में महिलाओं की स्थिति क्या है और उनकी तुलना में ज़ुल्म करने वाले पुरुष कितने शक्तिशाली हैं।

ऐसी घटनाएँ आपके मन में क्षोभ, जुगुप्सा ही पैदा करती हैं और आप सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, ऐसे समाज मौजूद हैं, जहां बलात्कार को पीड़िता की ही गलती के कारण होने वाला अपराध माना जाता है, जैसे मानसिक रूप से बीमार पुरुष का कोई अपराध ही न हो!

गांधी को भूले अन्ना – अन्ना हजारे ने किया शराबियों को पीटने का समर्थन – 28 नवम्बर 11

अन्ना को आधुनिक महात्मा गांधी कहा जाता है। उनमें गांधी की छवि देखी जाती है। रामलीला मैदान में हुए अनशन के दौरान मंच पर लगी महात्मा गांधी की भव्य प्रतीमा इस बात की साक्षी है। पर गांधीवादी अन्ना के विचारों में द्वंद देखा गया। उन्होंने नशे के आदी लोगों को पीटने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि उनके गाँव में शराबियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता था।

अन्ना हजारे ने कहा कि नशे के आदी लोगों को तीन बार चेतावनी देनी चाहिए कि, ये उनकी सेहत के लिए अच्छी नहीं है। अगर वो नहीं छोड़ता, तो उसे मंदिर में ले जाकर भगवान की कसम दिलानी चाहिए कि आज के बाद वो शराब को हाथ भी नहीं लगाएगा। इस पर भी वो न माने, तो सार्वजनिक स्थान पर एक खंभे से बांधकर उसकी पिटाई की जानी चाहिए।

ये वही शख्स है जिनमें लोगों ने अहिंसावादी महात्मा गाँधी की छवि देखी थी। यह शराबियों के लिए हिंसा की बात कर रहे हैं। कांग्रेस और बीजेपी अभी तक कह रहे थे कि हम अन्ना के खिलाफ नहीं हैं। अन्ना के इस बयान के बाद कह रहे हैं कि हम लोगों के साथ हिंसा का समर्थन नहीं करते। जो लोग अभी तक अन्ना हजारे के अभियान से डरे हुए थे, अब उन्हें एक अच्छा मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि ये तालिबानी तरीका है। अगर इस तरीके को लागू किया गया तो आधा केरला, तीन चौथाई आंध्र प्रदेश और लगभग चौथे-पाँचवें पँजाब के भाग को पीटा जाएगा। मेरा मानना है अन्ना को गाँधी के रूप में देखने की छवि अब पूरी तरह धूमिल हो गई है।

मैं अपने लेखन के माध्यम से लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई में शामिल था। मैंने अन्ना को पत्र लिखा। मनमोहन सिंह को पत्र लिखा और लोगों से अपील की कि अन्ना को न रोके। हमें आज भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होकर चलना है। हालांकि मैंने शुरु से ही कहा है कि किसी इंसान को पूजना ठीक नहीं है, भ्रष्टाचार को समाप्त करने पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। यहां गौर करने वाली बात है कि अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए थे। मैंने उनमें अहम भी देखा। मीडिया भी मुद्दे पर ध्यान देने के बजाय अन्ना हजारे पर ध्यान दे रही थी। मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रही लड़ाई के साथ था न कि किसी व्यक्ति के साथ। मैं उनके बयान का समर्थन नहीं करता।

उन्होंने उन सभी लोगों को निराश किया है जो उनको धर्मात्मा मानने लगे थे। अगर आप व्यक्ति से धर्मात्मा के रूप में कार्य की अपेक्षा करेंगे तो आप निराश ही होंगे। उन्होंने वही कहा है जो वो सोचते हैं। बेशक उन्होंने राजघाट पर बैठकर ध्यान किया था, लोग उनकी तुलना महात्मा गाँधी से करने लगे थे। क्या आपको लगता है कि महात्मा गाँधी कभी शराबी को पीटने के पक्ष में होते? शराबी वैसे ही कमजोर होते हैं। उनकी लत की वजह से उनको पीटकर या समाज में डराकर प्रताड़ित करने से समस्या का हल नहीं निकलेगा। आपको ये समझना होगा कि वो कैसे इसका आदी हुआ। आप उसकी समस्या समझ जांएगे तो उसके लिए कुछ कर भी सकते हैं। जबकि हिंसा इस मामले में कोई सहायता नहीं कर सकती। जो लोग नशा छोड़ना चाहते हैं उन्हें अन्ना ने ध्यान करने को कहा होता तो अच्छा होता।

एक ओर अन्ना ने राष्ट्रीय समस्याओं और उनके हल के बारे में बात की तो दूसरी ओर नशे के आदी लोगों के लिए हिंसा का समर्थन किया। गाँव में समस्याओं से निपटने का यही तरीका रहा है। गाँव की अदालत में कुछ गिने-चुने लोग सजा सुना देते हैं। इन सजाओं में ज्यादातर पीटना शामिल होता है। आधुनिक समय में यह तरीका ठीक नहीं बैठता। अन्ना ने इस बयान के बाद अपनी प्रतिष्ठा खो दी है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जाने वाली जंग अब समाप्त हो गई है। क्योंकि ये अन्ना हजारे की बात नहीं थी। लोग और मीडिया उन्हें मुक्तिदाता के रूप में देखे इससे भी फर्क नहीं पड़ता। मुद्दा है भ्रष्टाचार, लोगों में क्षमता है कि वो एकजुट होकर फिर से उठें और इसे जड़ से समाप्त कर दें।